मॉर्ले-मिंटो सुधार : परिचय
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 ब्रिटिश शासन द्वारा लागू किए गए प्रमुख संवैधानिक सुधारों में से एक था। इसे तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले तथा भारत के वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के नाम पर मॉर्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है।
➣ इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों को शासन-व्यवस्था में सीमित भागीदारी देना तथा बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन को शांत करना था। इसके अंतर्गत केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया, भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई तथा पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई।
➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने इसे भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार बताया, किन्तु भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इसकी कई व्यवस्थाओं की आलोचना की।
➣ विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली को भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक आधार को मजबूत करने वाला कदम माना गया।
➣ विधिक दृष्टि से यह अधिनियम भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 तथा 1892 में संशोधन करने वाला एक अपेक्षाकृत संक्षिप्त दस्तावेज था, जिसमें आठ अनुच्छेद और दो अनुसूचियाँ थीं।
➣ इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि पहली बार केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों के गैर-सरकारी सदस्यों के चयन हेतु निर्वाचन के सिद्धांत को औपचारिक विधिक मान्यता दी गई।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
(सीमित प्रतिनिधित्व एवं परिषदों का विस्तार)
↓
भारत परिषद अधिनियम, 1909
(मॉर्ले-मिंटो सुधार लागू किए गए)
↓
मॉन्टेग्यू घोषणा, 1917
(उत्तरदायी शासन की नीति घोषित)
पृष्ठभूमि
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम था।
➣1892 के भारतीय परिषद अधिनियम से असंतोष, बंगाल विभाजन (1905), स्वदेशी आंदोलन, उग्र राष्ट्रवाद का उदय, मुस्लिम लीग की स्थापना (1906) तथा भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता ने ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक सुधारों का दबाव बढ़ा दिया।
1892 के अधिनियम से असंतोष और स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव
➣ भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 द्वारा विधान परिषदों का कुछ विस्तार किया गया और सदस्यों को प्रश्न पूछने तथा बजट पर चर्चा करने का सीमित अधिकार दिया गया, लेकिन उनकी शक्तियाँ अभी भी बहुत कम थीं।
➣ वे न तो सरकार को उत्तरदायी बना सकते थे और न ही कानून निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण रख सकते थे। इससे कांग्रेस के नेताओं और शिक्षित भारतीयों में असंतोष बढ़ा तथा अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों की मांग तेज हुई।
➣ इसी बीच 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन किए जाने से देशभर में तीव्र राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई। इसके विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन प्रारम्भ हुए तथा कांग्रेस के भीतर उग्र राष्ट्रवादी विचारों को भी बल मिला।
➣ बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने राजनीतिक आंदोलन को अधिक सक्रिय और जन-आधारित बनाने पर जोर दिया। इससे ब्रिटिश सरकार को भारतीय असंतोष के और व्यापक होने की आशंका हुई।
मुस्लिम राजनीति का उभार और पृथक प्रतिनिधित्व की मांग
➣ आगा खान तृतीय के नेतृत्व में 35 से अधिक मुस्लिम नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने 1 अक्टूबर 1906 को शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से भेंट कर मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन, जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व तथा सरकारी नौकरियों में समुचित हिस्सेदारी जैसी मांगें रखीं। इसे शिमला प्रतिनिधिमंडल कहा जाता है। इसी वर्ष ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।
➣ इस प्रकार मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व की ओर से अलग प्रतिनिधित्व की मांग संगठित रूप से सामने आने लगी।
➣ ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को स्वीकार करने में रुचि दिखाई। इससे उसे भारतीय राजनीति में सामुदायिक आधार पर अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने का अवसर मिला।
➣ आगे चलकर यही नीति भारत परिषद अधिनियम, 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था के रूप में सामने आई।
ब्रिटिश सरकार की सुधार नीति
➣ बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन, संवैधानिक सुधारों की मांग और भारतीय राजनीति में बढ़ती सक्रियता को देखते हुए तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय ने भारतीय प्रशासन में कुछ सुधार करने की दिशा में कदम उठाए।
➣ ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य एक ओर भारतीयों को सीमित राजनीतिक भागीदारी देना था, तो दूसरी ओर बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करना भी था।
➣ इन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप भारत परिषद अधिनियम, 1909 पारित किया गया, जिसे मॉर्ले-मिंटो सुधार के नाम से जाना जाता है।
➣ इस अधिनियम ने विधान परिषदों का विस्तार किया और पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को कानूनी रूप दिया।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 और भारत परिषद अधिनियम, 1909 में अंतर
➣ 1909 का अधिनियम 1892 के अधिनियम की कमियों को दूर करने के प्रयास के रूप में लाया गया था। दोनों अधिनियमों के मध्य प्रमुख अंतर निम्नलिखित तालिका में दर्शाए गए हैं-
| आधार | भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 | भारत परिषद अधिनियम, 1909 |
|---|---|---|
| निर्वाचन का सिद्धांत | औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं; केवल अप्रत्यक्ष सिफारिश (नामांकन) की प्रक्रिया | पहली बार निर्वाचन के सिद्धांत को विधिक मान्यता |
| केंद्रीय विधान परिषद के सदस्य | सीमित वृद्धि (अधिकतम 16 तक) | 16 से बढ़ाकर 60 |
| सदस्यों के अधिकार | बजट पर सीमित चर्चा, प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार, पूरक प्रश्न की अनुमति नहीं | प्रस्ताव रखने, पूरक प्रश्न पूछने तथा बजट पर विस्तृत चर्चा का अधिकार |
| सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व | कोई व्यवस्था नहीं | मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत |
| कार्यकारिणी में भारतीय | कोई भारतीय सदस्य नहीं | सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त |
मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909)
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 को तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले तथा वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के नाम पर मॉर्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है। यह अधिनियम 25 मई 1909 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया था।
➣ इसका उद्देश्य भारतीयों को शासन-व्यवस्था में सीमित भागीदारी देना तथा बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव को कुछ हद तक कम करना था।
➣ ब्रिटिश सरकार का दावा था कि इन सुधारों से भारतीयों को प्रशासन में पहले की अपेक्षा अधिक अवसर मिलेंगे। इसी उद्देश्य से केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया, भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई तथा परिषदों के अधिकारों में कुछ वृद्धि की गई।
➣ यद्यपि मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी में कुछ वृद्धि की, फिर भी वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार, वायसराय तथा प्रांतीय गवर्नरों के हाथों में ही बनी रही। इसलिए अधिकांश भारतीय नेताओं ने इसे सीमित और अपर्याप्त सुधार माना।
➣ मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) भारतीय संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे। आगे चलकर इन्हीं सुधारों के अनुभवों और उनकी कमियों के आधार पर मॉन्टेग्यू घोषणा (1917), मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1919 का मार्ग प्रशस्त हुआ।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान एवं परिषदों की संरचना
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 के अंतर्गत केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों को चार श्रेणियों में बाँटा गया- पदेन सदस्य (गवर्नर-जनरल तथा कार्यकारिणी परिषद के सदस्य), मनोनीत सरकारी सदस्य, मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य तथा निर्वाचित सदस्य। प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्य संख्या एक समान नहीं थी, जैसा निम्न तालिका में दर्शाया गया है-
| विधान परिषद | सदस्य संख्या |
|---|---|
| केंद्रीय (इंपीरियल) विधान परिषद | 16 से बढ़ाकर 60 |
| बंगाल, मद्रास, बंबई तथा संयुक्त प्रांत | 50-50 |
| पंजाब, बर्मा तथा असम | 30-30 |
➣ केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी (पदेन एवं मनोनीत) सदस्यों का बहुमत बना रहा, जिससे वहाँ सरकारी बहुमत बरकरार रहा।
इसके विपरीत प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों को बहुमत दिया गया, किन्तु इनमें से कुछ गैर-सरकारी सदस्य भी सरकार द्वारा ही मनोनीत होते थे। इसलिए व्यवहार में प्रांतों में भी वास्तविक निर्वाचित बहुमत स्थापित नहीं हो सका।➣ निर्वाचन प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि बहुस्तरीय एवं अप्रत्यक्ष था- स्थानीय निकाय एक निर्वाचक मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) चुनते थे, जो प्रांतीय विधान परिषद के सदस्यों को निर्वाचित करता था, और प्रांतीय परिषदों के सदस्य आगे केंद्रीय विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव करते थे।
➣ इस अधिनियम के अंतर्गत बंबई, मद्रास तथा बंगाल प्रांतों में कार्यकारिणी परिषदोंका भी गठन किया गया, जिससे इन प्रांतों के गवर्नरों को प्रशासन में सहयोग हेतु एक औपचारिक कार्यकारिणी संरचना प्राप्त हुई।
केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत तथा प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी (नाममात्र) बहुमत रखा गया, किन्तु मनोनयन के कारण प्रांतों में भी वास्तविक निर्वाचित बहुमत नहीं बन सका।
पृथक निर्वाचन प्रणाली
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 की सबसे महत्वपूर्ण तथा सबसे विवादास्पद विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत थी। पहली बार किसी धार्मिक समुदाय को अलग निर्वाचन व्यवस्था प्रदान की गई।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही मतदान कर सकते थे और मुस्लिम प्रतिनिधियों का चुनाव भी केवल मुस्लिम मतदाता ही करते थे। अन्य समुदायों के मतदाता इन सीटों पर मतदान नहीं कर सकते थे।
➣ इस अधिनियम के अंतर्गत मुसलमानों को केवल पृथक निर्वाचक मंडल ही नहीं मिला, बल्कि कई प्रांतों में उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व भी प्रदान किया गया।
➣ पृथक निर्वाचन प्रणाली की मांग सबसे पहले 1906 के शिमला प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के समक्ष रखी थी। बाद में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भी इस मांग का समर्थन किया। ब्रिटिश सरकार ने इसे स्वीकार करते हुए 1909 के अधिनियम में शामिल कर लिया।
➣ ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि मुसलमान एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय हैं, इसलिए उनके राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए उन्हें पृथक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सरकार का कहना था कि इससे विभिन्न समुदायों को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा।
➣ दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इस व्यवस्था का कड़ा विरोध किया। उनका मत था कि इससे चुनाव धार्मिक आधार पर होने लगेंगे, राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी और भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलेगा।
➣ आगे चलकर यही व्यवस्था भारतीय राजनीति का एक प्रमुख विवाद बन गई। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में इसका और अधिक विस्तार किया गया तथा बाद में सांप्रदायिक पुरस्कार, 1932 के माध्यम से इसे अन्य समुदायों तक भी बढ़ाया गया।
पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत भारत परिषद अधिनियम, 1909 से हुई थी। इसे मॉर्ले-मिंटो सुधारों की सबसे महत्वपूर्ण तथा सबसे विवादास्पद व्यवस्था माना जाता है।
परिषदों की शक्तियों में वृद्धि
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों के अधिकारों में पहले की अपेक्षा कुछ वृद्धि की गई। इससे परिषदों के सदस्य प्रशासनिक विषयों पर पहले से अधिक सक्रिय रूप से अपने विचार रख सकते थे।
➣ सदस्यों को सार्वजनिक महत्व के विषयों पर प्रस्ताव प्रस्तुत करने, प्रशासन से संबंधित प्रश्न पूछने तथा अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। इससे सरकारी नीतियों पर चर्चा का दायरा पहले की तुलना में कुछ बढ़ा।
➣ सदस्यों को वार्षिक बजट पर चर्चा करने का भी अधिक अवसर मिला, किन्तु वे बजट को अस्वीकार नहीं कर सकते थे और न ही सरकार को किसी निर्णय के लिए बाध्य कर सकते थे।
➣ यद्यपि इन सुधारों से विधान परिषदों की कार्यवाही पहले की अपेक्षा अधिक सक्रिय हुई, फिर भी उनकी शक्तियाँ सीमित रहीं। परिषदों के निर्णय सरकार पर बाध्यकारी नहीं थे और अंतिम अधिकार वायसराय तथा प्रांतीय गवर्नरों के पास ही बना रहा।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने विधान परिषदों को चर्चा और प्रश्न पूछने के अधिक अधिकार दिए, लेकिन उन्हें वास्तविक कानून निर्माण या सरकार को उत्तरदायी बनाने की शक्ति नहीं दी।
भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 के अंतर्गत केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या पहले की तुलना में बढ़ाई गई। इससे अधिक भारतीयों को कानून निर्माण की प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिला।
➣ परिषदों में सरकारी और गैर-सरकारी दोनों प्रकार के सदस्य होते थे। गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, जिनमें कुछ सदस्य निर्वाचित तथा कुछ मनोनीत होते थे। इससे परिषदों का प्रतिनिधित्व पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक हुआ।
➣ यद्यपि भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ी, फिर भी वे अधिकांश मामलों में निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकते थे। केंद्र में सरकारी सदस्यों का प्रभाव बना रहा और अंतिम निर्णय लेने की शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के पास ही थी।
➣ इस प्रकार भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी में कुछ वृद्धि अवश्य हुई, लेकिन यह भागीदारी सीमित थी और इससे उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं हुई।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाया, किन्तु वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बनी रही।
सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा की नियुक्ति
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 के बाद पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया। यह सम्मान सर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा को प्राप्त हुआ।
➣ 1909 में उन्हें विधि सदस्य नियुक्त किया गया। इससे पहले वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में कोई भारतीय सदस्य नहीं था। इसलिए यह नियुक्ति भारतीयों की उच्च प्रशासनिक भागीदारी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी।
➣ यद्यपि सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा की नियुक्ति का प्रतीकात्मक महत्व बड़ा था, फिर भी इससे भारतीयों को शासन की वास्तविक सत्ता प्राप्त नहीं हुई। वायसराय के पास व्यापक कार्यकारी अधिकार बने रहे और शासन की निर्णायक शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रही।
➣ भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों पर सीमित प्रतिनिधित्व देने की यह प्रक्रिया आगे भी जारी रही, लेकिन भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी और वास्तविक सत्ता में वृद्धि के प्रश्न पर इन सुधारों की सीमाएँ बनी रहीं।
➣ इसी क्रम में लंदन स्थित भारत सचिव की परिषद (Council of India) में भी पहली बार दो भारतीयों—कृष्ण गोविंद गुप्त तथा सैयद हुसैन बिलग्रामी—को मनोनीत किया गया।
सर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य थे। उन्हें 1909 में विधि सदस्य नियुक्त किया गया था।
भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार) के प्रति मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की।
➣ एक ओर उसने विधान परिषदों के विस्तार तथा भारतीयों की सीमित राजनीतिक भागीदारी बढ़ने का स्वागत किया, वहीं दूसरी ओर उसने स्पष्ट किया कि ये सुधार भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
➣ कांग्रेस का मत था कि केवल परिषदों का विस्तार कर देने से उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं हो सकता, जब तक भारतीयों को शासन-व्यवस्था में वास्तविक निर्णय लेने का अधिकार न मिले।
➣ जब इन सुधारों की रूपरेखा सार्वजनिक हुई, तब दिसंबर 1908 के मद्रास अधिवेशन (अध्यक्ष – रासबिहारी घोष) में कांग्रेस ने सरकार से अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों की मांग की।
➣ इस पूरी प्रक्रिया में गोपाल कृष्ण गोखले ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लंदन में जॉन मॉर्ले से कई बार भेंट कर कांग्रेस का पक्ष रखा और सुधारों को अधिक उदार बनाने का प्रयास किया।
➣ गोखले ने इन सुधारों को उत्तरदायी शासन की दिशा में एक प्रारम्भिक कदम तो माना, किन्तु उनका स्पष्ट मत था कि परिषदों को केवल प्रश्न पूछने, पूरक प्रश्न करने और बजट पर चर्चा करने का अधिकार देना पर्याप्त नहीं है। जब तक भारतीय प्रतिनिधियों को वित्तीय मामलों और कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक स्वशासन की स्थापना संभव नहीं होगी।
➣ अधिनियम पारित होने के बाद दिसंबर 1909 के लाहौर अधिवेशन (अध्यक्ष – पंडित मदन मोहन मालवीय) में कांग्रेस ने इसकी विस्तार से समीक्षा की। कांग्रेस ने इसे एक सीमित सुधार मानते हुए भविष्य में अधिक व्यापक संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।
➣ उसने यह भी मांग की कि विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हो तथा उन्हें केवल चर्चा करने के बजाय वास्तविक विधायी और प्रशासनिक अधिकार भी दिए जाएँ।
➣ कांग्रेस का यह भी मत था कि निर्वाचन प्रणाली अभी भी अत्यंत सीमित और अप्रत्यक्ष थी, जिसके कारण सामान्य जनता की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो सकी।
➣ कांग्रेस की सबसे कड़ी आपत्ति मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को लेकर थी। उसका मानना था कि धर्म के आधार पर निर्वाचन की व्यवस्था भारतीय राष्ट्रीयता की भावना को कमजोर करेगी और भविष्य में सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देगी।
➣ कांग्रेस के अनेक नेताओं ने इसे ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और शासन करो’ नीति का हिस्सा बताया तथा कहा कि प्रतिनिधित्व का आधार धर्म नहीं, बल्कि समान नागरिकता और भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र होने चाहिए।
➣ उल्लेखनीय है कि इस समय मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस के ही सदस्य थे (वे 1913 में मुस्लिम लीग में शामिल हुए) और उन्होंने शिमला प्रतिनिधिमंडल की संरचना तथा विशुद्ध सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर सैद्धांतिक आपत्ति जताई थी। फिर भी व्यवहार में उन्होंने जनवरी 1910 में बंबई की मुस्लिम पृथक निर्वाचन सीट से ही इंपीरियल विधान परिषद का चुनाव लड़ा और जीता।
➣ आगे चलकर 1916 के लखनऊ समझौते में वे स्वयं कांग्रेस की ओर से मुस्लिम लीग के साथ पृथक निर्वाचन को औपचारिक रूप से स्वीकार करवाने में प्रमुख भूमिका निभाएँगे।
➣ साथ ही, 1907 के सूरत विभाजन के बाद उग्रवादी नेताओं के कांग्रेस से अलग हो जाने के कारण इस विषय पर कांग्रेस की आधिकारिक प्रतिक्रिया मुख्यतः नरमपंथी नेतृत्व के दृष्टिकोण को ही प्रतिबिंबित करती थी।
➣ कुल मिलाकर कांग्रेस ने मॉर्ले-मिंटो सुधारों को अपूर्ण किन्तु स्वागतयोग्य सुधार माना।
➣ उसका मत था कि इन सुधारों से भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी में कुछ वृद्धि अवश्य हुई, किन्तु वास्तविक उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं हुई। इसलिए कांग्रेस ने भविष्य में अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों तथा भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार प्रदान करने की मांग जारी रखी।
उग्रवादी नेताओं की प्रतिक्रिया
➣ उग्रवादी नेताओं ने भी इसे एक सीमित और भ्रामक प्रयास माना। उनका मत था कि ब्रिटिश सरकार इन सुधारों के माध्यम से बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन, विशेषकर स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन तथा क्रांतिकारी गतिविधियों से उत्पन्न दबाव को कम करना चाहती थी, न कि भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देना।
➣ 1907 के सूरत विभाजन के बाद उग्रवादी नेता कांग्रेस से अलग हो चुके थे, इसलिए उनकी प्रतिक्रिया कांग्रेस की आधिकारिक नीति से भिन्न और अधिक तीखी थी।
➣ उस समय बाल गंगाधर तिलक 1908 के राजद्रोह मामले में दंडित होकर मांडले (बर्मा) की जेल में थे, जहाँ वे 1914 तक रहे। इसलिए 1909 के सुधारों पर उनकी तत्काल सार्वजनिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं मिलती। तिलक के विचार मुख्यतः उनके पूर्व के लेखन तथा 1914 में रिहाई के बाद व्यक्त विचारों से समझे जाते हैं।
➣ दूसरी ओर लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल तथा अन्य उग्रवादी नेताओं ने इन सुधारों की खुलकर आलोचना की और उन्हें भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं माना।
➣ उग्रवादी नेताओं का मानना था कि परिषदों में कुछ अतिरिक्त स्थान, सीमित निर्वाचित प्रतिनिधित्व तथा प्रश्न पूछने या बजट पर चर्चा करने जैसे अधिकार भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति नहीं दे सकते।
➣ उनके अनुसार भारत का लक्ष्य केवल परिषदों में अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वराज्य की स्थापना होना चाहिए। यही विचार आगे चलकर तिलक के प्रसिद्ध कथन स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है में और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
➣ उग्रवादी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि एक ओर ब्रिटिश सरकार संवैधानिक सुधारों की घोषणा कर रही थी, जबकि दूसरी ओर राष्ट्रवादी नेताओं, प्रेस और क्रांतिकारी गतिविधियों के विरुद्ध दमनकारी कानून लागू कर रही थी।
➣ उनके अनुसार यह दमन और रियायत की दोहरी नीति थी, जिसका उद्देश्य एक ओर राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना और दूसरी ओर सीमित सुधारों के माध्यम से भारतीयों को संतुष्ट रखना था।
➣ पृथक निर्वाचन प्रणाली के प्रश्न पर उग्रवादी और नरमपंथी दोनों का मानना था कि यह व्यवस्था ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और शासन करो’ नीति का परिणाम है। हालांकि उग्रवादी नेताओं ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन की एकता पर सीधा आघात बताते हुए इसकी कहीं अधिक तीखी आलोचना की।
➣ कुल मिलाकर उग्रवादी नेताओं ने मॉर्ले-मिंटो सुधारों को अपर्याप्त और निराशाजनक माना। इसलिए उन्होंने जनता से स्वराज्य की प्राप्ति तक राष्ट्रीय आंदोलन को निरंतर सशक्त बनाए रखने का आह्वान किया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने मॉर्ले-मिंटो सुधार का सामान्य रूप से स्वागत किया। लीग का मानना था कि इस अधिनियम ने पहली बार मुसलमानों की पृथक राजनीतिक पहचान और उनके विशेष प्रतिनिधित्व की मांग को आधिकारिक मान्यता प्रदान की है।
➣ विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली को मुस्लिम लीग ने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना। लीग का तर्क था कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के अंतर्गत मुसलमानों को उनकी जनसंख्या और राजनीतिक स्थिति के अनुरूप प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हो सकेगा। इसलिए पृथक निर्वाचन को उन्होंने अपने राजनीतिक अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया।
➣ पृथक निर्वाचन प्रणाली स्वीकार किए जाने के बाद मुस्लिम लीग के अनेक नेताओं ने लॉर्ड मिंटो द्वितीय की भूमिका की सराहना की। लीग के कुछ वर्गों ने उन्हें मुसलमानों का उद्धारकर्ता तक कहा, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल की मांगों को स्वीकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
➣ स्वयं मिंटो ने भारत सचिव मॉर्ले को लिखे एक पत्र में इस व्यवस्था के दूरगामी प्रभावों की ओर संकेत किया था, और इसी कारण उन्हें आगे चलकर सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का जनक कहा जाने लगा।
➣ यद्यपि मुस्लिम लीग ने इन सुधारों का स्वागत किया, फिर भी उसका मत था कि भविष्य में भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी और विधान परिषदों की शक्तियों में और वृद्धि की जानी चाहिए। इसलिए लीग ने इन सुधारों को अंतिम समाधान नहीं, बल्कि आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना।
➣ कुल मिलाकर मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति को पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत बनाया।
➣ विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया, जिसका प्रभाव आगे के संवैधानिक सुधारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों की प्रमुख कमियाँ एवं आलोचना
उत्तरदायी शासन की स्थापना न होना
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी में कुछ वृद्धि अवश्य की गई, किन्तु उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं की गई।
➣ वास्तविक कार्यपालिका पहले की तरह वायसराय, प्रांतीय गवर्नरों तथा अंततः ब्रिटिश सरकार के प्रति ही उत्तरदायी रही, न कि निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों के प्रति।
➣ यद्यपि विधान परिषदों का विस्तार किया गया और भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, फिर भी उन्हें सरकार के गठन, कार्यपालिका को नियंत्रित करने अथवा उसे पद से हटाने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। इस कारण परिषदों की भूमिका मुख्यतः सलाह देने और सीमित चर्चा तक ही सीमित रही।
➣ वायसराय और प्रांतीय गवर्नरों के पास प्रशासनिक तथा विधायी मामलों में व्यापक अधिकार बने रहे। वे परिषदों की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं थे और महत्वपूर्ण निर्णयों पर अंतिम अधिकार भी उन्हीं के पास था। इसलिए भारतीय प्रतिनिधियों की भूमिका वास्तविक शासन के बजाय सीमित परामर्श तक ही सीमित रही।
➣ इतिहासकारों का मत है कि मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीयों को शासन-व्यवस्था में भाग लेने का अवसर तो दिया, लेकिन उन्हें वास्तविक राजनीतिक उत्तरदायित्व नहीं सौंपा। इसलिए यह अधिनियम प्रतिनिधित्व का विस्तार तो था, परंतु उत्तरदायी शासन की दिशा में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं माना जाता।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों की सबसे बड़ी संवैधानिक कमियों में से एक यह थी कि इसने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी तो बढ़ाई, लेकिन कार्यपालिका को निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया।
सीमित प्रतिनिधित्व एवं सीमित शक्तियाँ
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया और भारतीय सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई गई, किन्तु यह प्रतिनिधित्व सीमित था।
➣ निर्वाचन व्यवस्था सार्वभौमिक न होकर संपत्ति, कर-भुगतान, शिक्षा तथा अन्य निर्धारित योग्यताओं पर आधारित थी। परिणामस्वरूप भारत की अधिकांश जनता निर्वाचन प्रक्रिया से बाहर रही।
➣ इसके अतिरिक्त अधिकांश चुनाव अप्रत्यक्ष (Indirect) थे। अनेक प्रतिनिधियों का चुनाव सीधे जनता द्वारा न होकर स्थानीय निकायों, विश्वविद्यालयों, जमींदारों, वाणिज्य एवं उद्योग मंडलों तथा अन्य विशेष हित समूहों के माध्यम से किया जाता था। इससे विधान परिषदों में समाज के सीमित और प्रभावशाली वर्गों का प्रतिनिधित्व अधिक रहा, जबकि सामान्य जनता की भागीदारी बहुत कम रही।
➣ परिषदों की शक्तियाँ भी अत्यंत सीमित थीं। सदस्यों को प्रश्न पूछने, पूरक प्रश्न करने, प्रस्ताव रखने तथा बजट पर चर्चा करने जैसे अधिकार तो दिए गए, किन्तु सरकार उन प्रस्तावों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं थी। परिषदें न तो कार्यपालिका को नियंत्रित कर सकती थीं और न ही उसके निर्णयों को प्रभावी रूप से बदल सकती थीं।
➣ इतिहासकारों का मत है कि प्रतिनिधित्व का विस्तार और परिषदों की सीमित शक्तियाँ भारतीयों को राजनीतिक प्रक्रिया से परिचित कराने की दिशा में एक प्रारम्भिक कदम अवश्य थीं, किन्तु इनसे वास्तविक लोकतांत्रिक शासन या प्रभावी जन-प्रतिनिधित्व स्थापित नहीं हो सका।
आलोचकों का मत: मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने प्रतिनिधित्व का दायरा तो बढ़ाया, लेकिन सीमित मताधिकार, अप्रत्यक्ष निर्वाचन और परिषदों की कमजोर शक्तियों के कारण ये संस्थाएँ प्रभावी जन-प्रतिनिधि निकाय नहीं बन सकीं।
पृथक निर्वाचन प्रणाली के दीर्घकालीन प्रभाव
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा पहली बार पृथक निर्वाचन प्रणाली को कानूनी मान्यता दी गई। प्रारम्भ में यह व्यवस्था केवल मुसलमानों के लिए लागू की गई थी, किन्तु इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भारतीय संवैधानिक विकास पर लंबे समय तक दिखाई दिए।
➣ इस व्यवस्था के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार नागरिकता या क्षेत्र के बजाय धार्मिक समुदाय बनने लगा। परिणामस्वरूप चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों की अपेक्षा सामुदायिक हितों को अधिक महत्व मिलने लगा और भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की प्रवृत्ति धीरे-धीरे मजबूत होती गई।
➣ आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में पृथक निर्वाचन प्रणाली का और विस्तार किया गया। बाद के संवैधानिक सुधारों में भी यह व्यवस्था बनी रही, जिससे भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को संस्थागत आधार मिलता गया।
➣ अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि मॉर्ले-मिंटो सुधारों का यही प्रावधान सबसे अधिक दूरगामी और विवादास्पद सिद्ध हुआ। यद्यपि इसका उद्देश्य विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना बताया गया था, किन्तु व्यवहार में इसने भारतीय राजनीति की दिशा को लंबे समय तक प्रभावित किया। इसी कारण लॉर्ड मिंटो द्वितीय को इतिहास में प्रायः ‘सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का जनक’ कहा जाता है।
➣ 1909 में शुरू हुई यह व्यवस्था आगे चलकर सांप्रदायिक पुरस्कार, 1932 के माध्यम से सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा दलित वर्गों (Depressed Classes) तक भी विस्तारित की गई, जिसका महात्मा गांधी ने पूना (यरवडा जेल) में आमरण अनशन कर कड़ा विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप गांधी-अंबेडकर के मध्य पूना समझौता, 1932 हुआ, जिसके अंतर्गत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित स्थान की व्यवस्था स्वीकार की गई। स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता वाली परामर्शदात्री समिति की सिफारिश पर संविधान सभा ने पृथक निर्वाचन प्रणाली को पूर्णतः अस्वीकार कर दिया, और वर्तमान संविधान में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए केवल संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था ही अपनाई गई।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों का महत्व
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार) भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। यद्यपि इसकी अनेक सीमाएँ थीं, फिर भी इसने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी को पहले की तुलना में कुछ हद तक बढ़ाया और आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया तथा परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। इससे अधिक भारतीयों को कानून निर्माण की प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्यों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।
➣ मॉर्ले-मिंटो सुधारों के बाद पहली बार किसी भारतीय, सर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा, को वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में स्थान मिला। यद्यपि यह एक प्रतीकात्मक परिवर्तन था, फिर भी इसने उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों की भागीदारी की दिशा में नई शुरुआत की।
➣ इस अधिनियम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारतीय अब केवल सीमित सुधारों से संतुष्ट नहीं होने वाले हैं। इसके लागू होने के बाद उत्तरदायी शासन, व्यापक प्रतिनिधित्व और अधिक राजनीतिक अधिकारों की माँग पहले की अपेक्षा और अधिक मजबूत हुई।
➣ इतिहासकारों के अनुसार मॉर्ले-मिंटो सुधार भारतीय संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी थे। इनसे प्राप्त अनुभवों और इनकी कमियों ने आगे चलकर मॉन्टेग्यू घोषणा (1917), मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1919 जैसे व्यापक संवैधानिक सुधारों की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ मॉर्ले-मिंटो सुधारों का महत्व इस बात में है कि इन्होंने भारतीय संवैधानिक विकास को एक नई दिशा दी। यद्यपि ये सुधार सीमित थे, फिर भी इन्होंने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाई और भविष्य के संवैधानिक सुधारों का आधार तैयार किया।
मॉर्ले-मिंटो सुधारों के परिणाम
➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार) के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। यद्यपि इन सुधारों से भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी कुछ बढ़ी, लेकिन साथ ही इनकी सीमाएँ भी शीघ्र स्पष्ट हो गईं।
➣ पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू होने से भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई। आगे चलकर यही व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम, 1919 में और अधिक विस्तारित हुई तथा भारतीय राजनीति का एक स्थायी विषय बन गई।
➣ इन सुधारों से भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं। परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और अधिक संगठित हुआ तथा उत्तरदायी शासन, व्यापक मताधिकार और वास्तविक स्वशासन की माँग पहले की तुलना में अधिक प्रबल हो गई।
➣ मॉर्ले-मिंटो सुधारों की कमियों ने ब्रिटिश सरकार को भी यह अनुभव कराया कि केवल सीमित संवैधानिक सुधारों से भारतीयों को लंबे समय तक संतुष्ट नहीं रखा जा सकता।
➣ इसी कारण आगे चलकर मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) की गई, जिसके आधार पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) और भारत सरकार अधिनियम, 1919 अस्तित्व में आए।
➣ इस प्रकार मॉर्ले-मिंटो सुधार भारतीय संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुए। एक ओर इन्होंने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी का दायरा बढ़ाया, तो दूसरी ओर अपनी कमियों के कारण भविष्य में अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता को भी स्पष्ट कर दिया।
महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत परिषद अधिनियम, 1909 को मॉर्ले-मिंटो सुधार के नाम से भी जाना जाता है।
- इसका नाम तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले तथा वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के नाम पर पड़ा।
- इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य भारतीयों की शासन-व्यवस्था में सीमित राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना था; हालांकि इसने उत्तरदायी शासन की स्थापना नहीं की।
- इसके द्वारा केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया तथा पहली बार परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई।
- केंद्रीय विधान परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई। प्रांतीय परिषदों में बंगाल, मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत तथा पूर्वी बंगाल एवं असम में अधिकतम 50-50, जबकि पंजाब और बर्मा में 30-30 सदस्य किए गए।
- केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत बना रहा, जबकि प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत सुनिश्चित किया गया। हालांकि इनमें कुछ गैर-सरकारी सदस्य भी नामित होते थे, इसलिए इसे पूर्ण निर्वाचित बहुमत नहीं माना जा सकता।
- परिषदों में निर्वाचन मुख्यतः अप्रत्यक्ष तथा बहुस्तरीय था। स्थानीय निकायों तथा अन्य निर्वाचन मंडलों के माध्यम से प्रांतीय परिषदों और आगे केंद्रीय परिषद के लिए प्रतिनिधियों का निर्वाचन किया जाता था।
- अधिनियम ने मद्रास और बंबई की कार्यकारिणी परिषदों में भारतीयों की नियुक्ति का मार्ग खोला तथा बंगाल में कार्यकारिणी परिषद स्थापित करने का प्रावधान किया।
- परिषदों के सदस्यों को प्रश्न पूछने, पूरक प्रश्न करने, बजट पर चर्चा करने तथा सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव प्रस्तुत करने जैसे अधिकार दिए गए। हालांकि इन अधिकारों पर महत्वपूर्ण सीमाएँ बनी रहीं।
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत पहली बार इसी अधिनियम द्वारा की गई। इसकी मांग 1 अक्टूबर 1906 को आगा खान तृतीय के नेतृत्व वाले शिमला प्रतिनिधिमंडल ने लॉर्ड मिंटो के समक्ष रखी थी।
- पृथक निर्वाचन के अंतर्गत मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों का निर्वाचन करते थे। इस प्रकार धार्मिक समुदाय को पहली बार संवैधानिक प्रतिनिधित्व की पृथक राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता मिली।
- कई प्रांतों में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व अर्थात भारांक (Weightage) भी प्रदान किया गया।
- मुसलमानों के अतिरिक्त जमींदारों, विश्वविद्यालयों, वाणिज्य मंडलों तथा अन्य विशेष हितों के लिए भी पृथक या विशेष प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई।
- लॉर्ड मिंटो को प्रायः ‘सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का जनक’ कहा जाता है, क्योंकि उनके कार्यकाल में मुस्लिम पृथक निर्वाचन को संवैधानिक मान्यता मिली।
- पृथक निर्वाचन का सिद्धांत आगे भारत सरकार अधिनियम, 1919 के माध्यम से अन्य समुदायों तक विस्तारित हुआ और सांप्रदायिक पुरस्कार, 1932 के द्वारा इसे और व्यापक बनाया गया।
- सर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय बने। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया।
- मॉर्ले ने भारत सचिव की परिषद में भी दो भारतीयों को नियुक्त किया।
- इस अधिनियम के लागू होने के समय बाल गंगाधर तिलक मांडले (बर्मा) की जेल में थे।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इन सुधारों को अपर्याप्त माना, क्योंकि इनमें उत्तरदायी शासन और वास्तविक सत्ता-हस्तांतरण की व्यवस्था नहीं थी। दूसरी ओर, मुस्लिम लीग ने विशेष रूप से पृथक निर्वाचन की स्वीकृति का स्वागत किया।
- मोहम्मद अली जिन्ना 1909 के समय कांग्रेस से जुड़े हुए थे और 1913 में मुस्लिम लीग में शामिल हुए। जनवरी 1910 में वे बंबई की मुस्लिम सीट से इंपीरियल विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए।
- इस अधिनियम की प्रमुख आलोचना पृथक निर्वाचन प्रणाली, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व तथा उत्तरदायी शासन के अभाव को लेकर हुई।
- मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया, लेकिन कार्यपालिका को विधान परिषदों के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया और केंद्रीय स्तर पर सरकारी नियंत्रण बनाए रखा।
- मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने आगे चलकर मॉन्टेग्यू घोषणा (1917), मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1919 की पृष्ठभूमि तैयार की।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने लॉर्ड मिंटो को “पाकिस्तान का जनक” कहा था। यह टिप्पणी 1909 में लागू पृथक निर्वाचन प्रणाली के संदर्भ में थी, जिसे उन्होंने आगे चलकर भारत के विभाजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना।
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