सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (1905): स्थापना, उद्देश्य एवं राष्ट्रीय योगदान

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (1905)
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सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (1905 ई.)

सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना 12 जून 1905 ई. को पूना (वर्तमान पुणे) में गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा की गई थी।

➣ इसका मुख्य उद्देश्य देश की सेवा के लिए समर्पित एवं प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का निर्माण करना, भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का विकास करना तथा संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देना था।

गोपाल कृष्ण गोखले का विश्वास था कि भारत की वास्तविक प्रगति केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने से नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सुधार और सार्वजनिक सेवा के माध्यम से ही संभव है। इसी कारण उन्होंने राष्ट्रसेवा को एक संगठित, अनुशासित और आजीवन समर्पित स्वरूप देने के लिए इस संस्था की स्थापना की।

➣ संस्था में सम्मिलित होने वाले सदस्यों को अनुशासित जीवन, सार्वजनिक सेवा तथा राष्ट्रहित के प्रति पूर्ण समर्पण की शपथ दिलाई जाती थी। यही कारण है कि यह संस्था केवल एक सामाजिक संगठन न होकर राष्ट्रसेवकों के प्रशिक्षण-केंद्र के रूप में भी विकसित हुई।

पृष्ठभूमि एवं संगठन

गोपाल कृष्ण गोखले अपने गुरु न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे के सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों से गहराई से प्रभावित थे। रानाडे का मानना था कि भारत की उन्नति के लिए शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा संवैधानिक सुधारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इन विचारों ने गोखले की सार्वजनिक जीवन की दिशा निर्धारित की।

➣ सोसाइटी की स्थापना से पूर्व गोखले डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी से जुड़े हुए थे। वहाँ कार्य करते हुए उन्हें अनुभव हुआ कि केवल शैक्षिक संस्थाएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रसेवा के लिए पूर्णकालिक, अनुशासित एवं समर्पित कार्यकर्ताओं का एक स्वतंत्र संगठन भी आवश्यक है। इसी सोच के परिणामस्वरूप 12 जून 1905 ई. को सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की गई।

➣ इस संस्था के गठन में जी. के. देवधर, ए. वी. पटवर्धन तथा एन. ए. द्राविड़ जैसे सहयोगियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन सभी ने संस्था के प्रारम्भिक संगठन, विस्तार तथा जनसेवा कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में गोखले का सहयोग किया।

➣ संस्था ने स्वयं को मुख्यतः ग्रामीण, आदिवासी एवं वंचित वर्गों के उत्थान, साक्षरता, आपदा-राहत तथा अन्य जनकल्याणकारी कार्यों के लिए समर्पित किया। इसके साथ ही इसने जानबूझकर स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखते हुए रचनात्मक एवं सामाजिक कार्यों पर अधिक बल दिया।

प्रमुख पदाधिकारी

  • गोपाल कृष्ण गोखले1905 से 1915 ई. (मृत्यु तक) सोसाइटी के प्रथम अध्यक्ष रहे।
  • वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री — गोखले के निधन के बाद 1915 से 1927 ई. तक द्वितीय अध्यक्ष रहे तथा संस्था के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • गोपाल कृष्ण देवधर1928 से 1936 ई. तक तृतीय अध्यक्ष रहे और संस्था की जनसेवा संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाया।

➣ प्रारम्भिक वर्षों में वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, हृदयनाथ कुंजरू तथा ए. वी. ठक्कर जैसे युवा राष्ट्रवादी इसके सदस्य बने। उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी भी गोपाल कृष्ण गोखले के मार्गदर्शन में कुछ समय तक इस संस्था से जुड़े रहे। संस्था का मुख्यालय पूना (पुणे) में था, जबकि इसकी शाखाएँ मद्रास (चेन्नई), बॉम्बे (मुंबई), इलाहाबाद तथा नागपुर सहित अनेक स्थानों पर स्थापित की गईं।

उद्देश्य

  • देश की सेवा के लिए समर्पित एवं प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का निर्माण करना।
  • भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना एवं सार्वजनिक जीवन के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
  • शिक्षा, सामाजिक सुधार एवं जनकल्याण के कार्यों को प्रोत्साहित करना।
  • संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से राजनीतिक सुधारों की माँग करना।
  • गरीब, पिछड़े एवं वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करना।

प्रमुख कार्य एवं योगदान

➣ सोसाइटी ने 1911 ई. में नागपुर से अपनी अंग्रेज़ी पत्रिका The Hitavada (द हितवाद) का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका के माध्यम से शिक्षा, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना तथा संवैधानिक सुधारों से संबंधित विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता था। आगे चलकर यह मध्य भारत के प्रमुख समाचार-पत्रों में से एक बन गई।

1930 ई. में सोसाइटी ने पूना (पुणे) में गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स की स्थापना की। यह संस्थान आगे चलकर अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान तथा लोक नीति (Public Policy) के अध्ययन एवं शोध का एक प्रतिष्ठित केंद्र बना।

➣ सोसाइटी ने शिक्षा, साक्षरता, अकाल-राहत, स्वास्थ्य-सेवा, स्वच्छता, अस्पृश्यता-निवारण तथा ग्रामीण एवं आदिवासी कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए। इसके सदस्य विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जनजागरण, सामाजिक सुधार तथा लोकसेवा के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे।

सोसाइटी का महत्व

➣ इसने राष्ट्रसेवा को संगठित, अनुशासित एवं आजीवन समर्पित स्वरूप प्रदान किया तथा सार्वजनिक जीवन को सेवा और नैतिकता से जोड़ने का प्रयास किया।

➣ इस संस्था ने शिक्षा, सामाजिक सुधार, जनसेवा, ग्रामीण विकास तथा जनकल्याण के क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान में योगदान दिया।

➣ इसने अनेक राष्ट्रसेवकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं सार्वजनिक जीवन के नेताओं को तैयार किया, जिन्होंने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन तथा समाज सुधार आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ यह उदारवादी विचारधारा की प्रमुख प्रतिनिधि संस्था थी, जिसने संवैधानिक, शांतिपूर्ण एवं अहिंसक उपायों के माध्यम से राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारों का समर्थन किया।

➣ यह संस्था आज भी सक्रिय है और शिक्षा, ग्रामीण विकास, आदिवासी कल्याण तथा सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में कार्यरत है। इस कारण स्वतंत्रता-पूर्व स्थापित भारतीय संस्थाओं में इसका एक विशेष एवं स्थायी स्थान माना जाता है।

एक झलक

विषय विवरण
स्थापना 12 जून 1905 ई., पूना (वर्तमान पुणे)
संस्थापक गोपाल कृष्ण गोखले (सहयोगी: जी. के. देवधर, ए. वी. पटवर्धन, एन. ए. द्राविड़)
वैचारिक प्रेरणा न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे
प्रथम अध्यक्ष गोपाल कृष्ण गोखले (1905–1915)
उत्तरवर्ती अध्यक्ष वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री (1915–1927), गोपाल कृष्ण देवधर (1928–1936)
प्रमुख सदस्य वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, हृदयनाथ कुंजरू, ए. वी. ठक्कर (महात्मा गांधी भी कुछ समय जुड़े रहे)
मुख्यालय पूना (पुणे); शाखाएँ – मद्रास, बॉम्बे, इलाहाबाद, नागपुर आदि
मुख्य उद्देश्य देश की सेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का निर्माण तथा शिक्षा, सामाजिक सुधार एवं जनसेवा को बढ़ावा देना।
कार्यप्रणाली पाँच वर्ष का प्रशिक्षण, सादगीपूर्ण जीवन, संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों से जनसेवा तथा सक्रिय राजनीति से दूरी।
प्रमुख प्रकाशन The Hitavada (द हितवाद)1911 ई. से नागपुर से प्रकाशित।
प्रमुख संस्थान गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स, पुणे (1930 ई.)
वर्तमान स्थिति संस्था आज भी सक्रिय है तथा शिक्षा, ग्रामीण विकास एवं आदिवासी कल्याण के क्षेत्र में कार्यरत है।
विशेषता गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा स्थापित उदारवादी संस्था, जिसने राष्ट्रसेवा को संगठित स्वरूप दिया तथा भारत की प्रारम्भिक धर्मनिरपेक्ष सेवा-संस्थाओं में प्रमुख स्थान प्राप्त किया।

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