भारतीय परिषद अधिनियम (1861) : प्रमुख प्रावधान, विधायी विकेंद्रीकरण, भारतीयों की भागीदारी और आलोचना

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भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 : परिचय

➣ भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act, 1861) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था, जिसने भारत में विधायी एवं प्रशासनिक व्यवस्था का आंतरिक पुनर्गठन किया।।

जहाँ भारत शासन अधिनियम, 1858 ने केवल लंदन स्थित गृह-सरकार – यानी भारत सचिव व भारत परिषद – का स्वरूप तय किया था, वहीं 1861 के अधिनियम ने पहली बार भारत के भीतर की शासन-मशीनरी – गवर्नर-जनरल की परिषद, प्रांतीय सरकारें तथा कानून बनाने की प्रक्रिया – का पुनर्गठन किया।

➣ इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि इसने पहली बार भारतीयों को (नामांकन द्वारा) केंद्रीय विधायी प्रक्रिया से औपचारिक रूप से जोड़ा, तथा 1833 के चार्टर एक्ट से चली आ रही अत्यधिक केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को उलटते हुए मद्रास व बंबई को विधायी शक्तियाँ लौटाईं।

➣ इस प्रकार भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 को भारत में विधायी विकेंद्रीकरण, भारतीयों की सीमित भागीदारी तथा पोर्टफोलियो-आधारित कार्यपालिका की दिशा में एक आधारभूत संवैधानिक कदम माना जाता है – जिसने आगे 1892, 1909, 1919 व 1935 के सुधारों की नींव रखी।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 की पृष्ठभूमि

1858 के अधिनियम की अधूरी विरासत

➣ 1858 में जब भारत का शासन कंपनी से छीनकर ब्रिटिश क्राउन को सौंपा गया, तो उस अधिनियम ने केवल इंग्लैंड में बैठे भारत सचिव और भारत परिषद का ढांचा बदला था। ।

भारत के भीतर की वास्तविक शासन-मशीनरी – गवर्नर-जनरल, उसकी परिषद, कानून बनाने की प्रक्रिया – पूरी तरह वैसी ही बनी रही जैसी कंपनी के समय थी। दूसरे शब्दों में, मालिक तो बदल गया था, लेकिन भारत के अंदर शासन चलाने का ढांचा 1833 के चार्टर एक्ट के समय जैसा ही अपरिवर्तित पड़ा रहा। यही अधूरापन आगे चलकर 1861 के अधिनियम की तात्कालिक ज़मीन तैयार करता है।

सर सैयद अहमद ख़ान की चेतावनी

➣ 1857 के विद्रोह के तुरंत बाद, 1858 में ही, सर सैयद अहमद ख़ान ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद में एक तीखा तर्क रखा।

➣ उन्होंने लिखा कि विद्रोह का एक बड़ा कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को अपनी निर्णय-प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा हुआ था, जिससे शासन को भारतीय जनमत की कोई वास्तविक जानकारी ही नहीं मिल पाती थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया कि भारतीयों को विधायी परिषदों में शामिल किया जाना चाहिए।

➣ यह कोई अलग-थलग आवाज़ नहीं थी – उसी समय भारत सचिव सर चार्ल्स वुड भी इसी निष्कर्ष पर पहुँच रहे थे कि पुरानी निरंकुश प्रशासनिक शैली अब स्थायी रूप से नहीं चल सकती।

संसद में विधेयक पेश करते हुए वुड ने स्वयं स्वीकार किया कि जब एक प्रभुत्वशाली नस्ल दूसरी पर शासन करती है, तो निरंकुशता ही उसका सबसे हल्का रूप होता है – अर्थात वे स्वयं मानते थे कि मौजूदा व्यवस्था कठोर है और उसमें कुछ नरमी व भारतीय सहभागिता आवश्यक है।

➣ इसके अलावा 1833 के अतिकेंद्रीकरण का बढ़ता बोझ भी एक शुद्ध प्रशासनिक समस्या थी। जिसमे मद्रास और बंबई जैसी प्रांतीय सरकारों से उनकी स्वतंत्र कानून बनाने की शक्ति छीनकर सारी विधायी शक्ति कलकत्ता स्थित गवर्नर-जनरल की परिषद में केंद्रित कर दी गई।

संसद में विधेयक – 1861

➣ इन्हीं परिस्थितियों – भारतीय जनमत को शासन से जोड़ने की राजनीतिक आवश्यकता, तथा अतिकेंद्रीकरण की प्रशासनिक समस्या – के दबाव में भारत सचिव सर चार्ल्स वुड ने एक नया विधेयक ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया।

➣ यह विधेयक 1 अगस्त, 1861 को राजकीय स्वीकृति प्राप्त कर भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act, 1861) बन गया।

➣ इसके कार्यान्वयन का दायित्व तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग पर था, जिन्होंने अगले ही वर्ष (1862) इसके प्रावधानों का उपयोग करते हुए पहली बार भारतीयों को केंद्रीय विधायी परिषद में नामित भी किया।

➣ इस प्रकार भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 किसी अचानक लिए गए निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि यह 1857 के विद्रोह के तत्काल बाद उठे भारतीय सहभागिता के सवाल और तीन दशक पुरानी केंद्रीकरण की समस्या – इन दो समानांतर धाराओं के मिलन का परिणाम था।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के प्रावधान

गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन एवं पोर्टफोलियो प्रणाली को वैधानिक मान्यता

➣ अधिनियम ने गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद में एक पाँचवाँ सदस्य (विधि सदस्य) जोड़ा, जिससे परिषद में अब गृह, राजस्व, सैन्य, वित्त तथा विधि – पाँच विषयों के लिए सदस्य हो गए (1874 में लोक निर्माण हेतु छठा सदस्य जोड़ा गया)।

➣ पोर्टफोलियो प्रणाली से पहले सरकारी कार्यों का निपटारा मुख्यतः गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता था – प्रत्येक फाइल पूरी परिषद के समक्ष प्रस्तुत होती थी और सामूहिक विचार-विमर्श के बाद ही निर्णय लिया जाता था। प्रशासनिक कार्यों की संख्या और जटिलता बढ़ने के कारण यह सामूहिक प्रक्रिया धीमी तथा अव्यावहारिक होती जा रही थी।

➣ इसी समस्या को दूर करने के लिए अधिनियम ने भारत सरकार में पहले से व्यवहार में चली आ रही पोर्टफोलियो प्रणाली – जिसे लॉर्ड कैनिंग ने 1859 में अनौपचारिक रूप से आरंभ किया था – को औपचारिक वैधानिक मान्यता प्रदान की।

➣ इसके अंतर्गत कार्यकारी परिषद के प्रत्येक सदस्य को एक विशिष्ट विभाग सौंपा जाता था, जिसके दैनिक प्रशासन के लिए वह प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होता था और अपने विभाग से संबंधित आदेश स्वयं जारी कर सकता था, बिना हर मामूली मामले को पूरी परिषद के समक्ष ले जाए।

➣ इस व्यवस्था से प्रत्येक सदस्य अपने सौंपे गए विभाग के लिए अधिक प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी बन गया, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक तीव्र तथा व्यवस्थित हुई और विभिन्न विभागों में क्रमशः विशेषज्ञता विकसित होने लगी।

➣ इससे गवर्नर-जनरल की परिषद एक प्रकार के लघु मंत्रिमंडल जैसी कार्य करने लगी, जिसमें अलग-अलग सदस्य अलग-अलग विभागों के लिए वैसे ही उत्तरदायी थे जैसे आधुनिक मंत्रिमंडल में अलग-अलग मंत्री होते हैं।

➣ अधिनियम ने कमांडर-इन-चीफ को भी, गवर्नर-जनरल की आवश्यकता पर, कार्यकारी परिषद का अतिरिक्त (असाधारण) सदस्य बनाए जाने का प्रावधान किया। ध्यान रहे कि कमांडर-इन-चीफ परिषद का नियमित/स्थायी सदस्य नहीं था – उसकी सदस्यता पूर्णतः गवर्नर-जनरल के विवेक तथा आवश्यकता पर निर्भर करती थी।

➣ इस प्रकार 1861 के अधिनियम ने केंद्रीय कार्यपालिका की मूल संरचना को बनाए रखते हुए उसके कार्य-संचालन को अधिक विभागीय, विशेषज्ञ एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। यही विभागीय व्यवस्था आगे चलकर आधुनिक भारतीय मंत्रिमंडलीय एवं विभागीय प्रशासन के विकास की एक महत्वपूर्ण आधारभूमि बनी।

▪ इसी नए ढांचे के अंतर्गत प्रसिद्ध विधिवेत्ता सर हेनरी मेन – जिनकी पुस्तक Ancient Law (1861) ने उन्हें व्यापक ख्याति दिलाई थी – को 1861 में विधि सदस्य के पद की पेशकश की गई, परंतु उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से इसे अस्वीकार कर दिया। उनकी जगह विलियम रिची को नियुक्त किया गया, लेकिन रिची की 22 मार्च 1862 को मृत्यु हो गई।
▪ इसके बाद यह पद पुनः मेन को प्रस्तावित किया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वे 1862 से 1869 तक विधि सदस्य रहे और इस दौरान पंजाब की भूमि-व्यवस्था, सिविल विवाह तथा विधि-संहिताकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भारत सरकार को सलाह दी।

गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद का विस्तार

➣ कानून बनाने के प्रयोजन से गवर्नर-जनरल की परिषद को अतिरिक्त सदस्यों को शामिल कर विस्तारित किया गया – गवर्नर-जनरल को 6 से कम और 12 से अधिक नहीं ऐसे अतिरिक्त सदस्य नामित करने का अधिकार दिया गया, जिनका कार्यकाल 2 वर्ष रखा गया।

➣ इन अतिरिक्त सदस्यों में से कम-से-कम आधे (अर्थात न्यूनतम 3) ऐसे होने चाहिए थे जो ब्रिटिश या भारतीय – कोई भी हों, परंतु सरकारी सेवा में कार्यरत (गैर-सरकारी) न हों। यही प्रावधान आगे भारतीयों के नामांकन का द्वार बना।

➣ ध्यान देने योग्य है कि इन अतिरिक्त सदस्यों की भूमिका पूर्णतः विधायी कार्यों तक सीमित थी – वे कार्यकारी परिषद के नियमित सदस्य नहीं थे और सामान्य प्रशासन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। वे केवल विधेयकों पर विचार-विमर्श हेतु आयोजित विशिष्ट विधायी बैठकों में ही भाग ले सकते थे (इनकी शक्तियों की विस्तृत सीमाएँ आगे “गवर्नर-जनरल की विशेष विधायी शक्तियाँ एवं सीमाएँ” खंड में बताई गई हैं)।

➣ इस प्रकार विस्तारित परिषद वास्तव में दो अलग-अलग टोपियों में कार्य करती थी – जब वह सामान्य प्रशासनिक निर्णय लेती, तब केवल मूल कार्यकारी सदस्य ही उपस्थित होते। परंतु जब वह कानून बनाने के लिए बैठती, तब इसमें अतिरिक्त विधायी सदस्य भी शामिल हो जाते।

➣ इस विभाजन ने भारत में कार्यकारी एवं विधायी कार्यों के बीच एक प्रारंभिक संस्थागत भेद उत्पन्न किया, यद्यपि दोनों की सर्वोच्च अध्यक्षता गवर्नर-जनरल के पास ही रही।

➣ गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल करने के इस प्रावधान का व्यापक महत्व यह था कि इसके माध्यम से सरकार से बाहर के कुछ प्रभावशाली भारतीय एवं यूरोपीय व्यक्तियों को भी कानून-निर्माण प्रक्रिया में औपचारिक रूप से भाग लेने का अवसर मिला, भले ही यह भागीदारी नामांकन तक ही सीमित थी और उनकी कोई प्रभावी निर्णायक शक्ति नहीं थी।

भारतीयों का पहली बार नामांकन

➣ अधिनियम में स्पष्ट रूप से भारतीय शब्द का उल्लेख नहीं था, परंतु गैर-सरकारी सदस्य के प्रावधान का उपयोग करते हुए लॉर्ड कैनिंग ने 1862 में पहली बार भारतीयों को केंद्रीय विधायी परिषद में नामित किया।

➣ यह भारत में निर्वाचन नहीं, बल्कि नामांकन पर आधारित व्यवस्था थी, इसलिए इसे प्रतिनिधि शासन नहीं माना जा सकता। फिर भी, यह भारतीयों को केंद्रीय कानून-निर्माण प्रक्रिया से जोड़ने वाला पहला वैधानिक कदम था।

➣ 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार भारतीय समाज के परंपरागत रूप से प्रभावशाली, संपन्न तथा निष्ठावान वर्गों को शासन-व्यवस्था से जोड़कर उनका समर्थन बनाए रखना चाहती थी। इसीलिए प्रारंभिक नामांकन में शिक्षित मध्यम वर्ग या पेशेवरों के बजाय प्रभावशाली भारतीय वर्गों को प्राथमिकता दी गई।

➣ नामित भारतीय सदस्यों के अधिकार भी उतने ही सीमित थे जितने ऊपर बताए गए अन्य अतिरिक्त सदस्यों के थे। वे विधायी बैठकों में उपस्थित होकर विधेयकों पर चर्चा में भाग ले सकते थे, लेकिन उनकी भागीदारी पूर्णतः नामांकन-आधारित थी और स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर आधारित नहीं थी।

➣ फिर भी, इस व्यवस्था का दीर्घकालिक ऐतिहासिक महत्व अत्यंत बड़ा था – यह भारत के संवैधानिक इतिहास में पहला अवसर था जब भारतीयों को औपचारिक रूप से केंद्रीय विधान-निर्माण प्रक्रिया का, चाहे सीमित रूप में ही सही, हिस्सा बनाया गया।

➣ यहीं से आगे चलकर भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 तथा मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1909 के माध्यम से भारतीय विधायी भागीदारी क्रमशः विस्तृत होती गई तथा नामांकन से निर्वाचन की दिशा में यात्रा शुरू हुई।

इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए लॉर्ड कैनिंग ने 1862 में प्रथम तीन भारतीय सदस्यों को नामित किया – (1) बनारस के राजा, (2) पटियाला के महाराजा, तथा (3) सर दिनकर राव (ग्वालियर रियासत के पूर्व दीवान/प्रधानमंत्री)। तीनों ही परंपरागत राजघराने अथवा बड़े जमींदार वर्ग से थे, कोई भी शिक्षित मध्यम वर्ग या पेशेवर वर्ग से नहीं था – यह ब्रिटिश सरकार की सुविचारित राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है।

प्रांतीय विधायी शक्तियों की पुनर्स्थापना

➣ चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा छीनी गई प्रांतीय विधायी शक्तियाँ मद्रास और बंबई की सरकारों को पुनः लौटाई गईं, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों के लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कानून व विनियम बना सकें।

➣ कलकत्ता स्थित केंद्रीय विधायी परिषद को पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार रहा, जबकि मद्रास व बंबई की परिषदें केवल अपनी-अपनी प्रेसीडेंसी की शांति व सुशासन से जुड़े विषयों पर ही कानून बना सकती थीं।

➣ यह पुनर्स्थापना इसलिए आवश्यक समझी गई क्योंकि भारत के विभिन्न प्रांतों की सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक तथा प्रशासनिक परिस्थितियाँ एक-दूसरे से काफी भिन्न थीं – बंगाल, मद्रास, बंबई और पंजाब जैसे विविध क्षेत्रों के लिए एक ही दूर बैठी केंद्रीय परिषद द्वारा उपयुक्त, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कानून बनाना 1850 के दशक तक व्यावहारिक रूप से कठिन होता जा रहा था, और स्थानीय प्रशासकों की लगातार यह शिकायत थी कि केंद्र को उनकी क्षेत्रीय समस्याओं की पर्याप्त जानकारी ही नहीं मिल पाती।

➣ अधिनियम ने गवर्नर-जनरल को यह शक्ति भी दी कि वह आवश्यकता पड़ने पर बंगाल, उत्तर-पश्चिमी प्रांत तथा पंजाब जैसे अन्य क्षेत्रों में भी नई प्रांतीय विधान परिषदें स्थापित कर सके (आगे चलकर बंगाल में 1862 में, तथा अन्य प्रांतों में क्रमिक रूप से ऐसी परिषदें बनाई गईं)।

➣ हालांकि यह प्रांतीय विधायी शक्ति पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थी। प्रांतीय सरकारों द्वारा बनाए गए किसी भी कानून पर गवर्नर-जनरल की स्वीकृति अनिवार्य रूप से आवश्यक थी, और कुछ महत्वपूर्ण/संवेदनशील विषयों पर तो प्रांत स्वयं विधेयक प्रस्तुत ही नहीं कर सकते थे जब तक केंद्रीय अनुमति न मिले। इस प्रकार प्रांतीय सरकारों को स्वायत्तता नहीं, बल्कि केवल सीमित एवं नियंत्रित विधायी विकेंद्रीकरण प्राप्त हुआ।

➣ फिर भी इस व्यवस्था का दूरगामी महत्व यह था कि इसने भारत में केंद्र और प्रांतों के बीच विधायी शक्तियों के पुनर्वितरण की एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया की शुरुआत की, जो आगे 1892, 1919 तथा 1935 के अधिनियमों के माध्यम से प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में क्रमशः आगे बढ़ती गई।

▪ अधिनियम में दी गई इसी शक्ति के प्रयोग से आगे चलकर क्रमशः नई प्रांतीय विधान परिषदें बनाई गईं – बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिमी प्रांत (1866), तथा पंजाब (1897)। इस प्रकार यह प्रक्रिया एक ही वर्ष में पूरी नहीं हुई, बल्कि दशकों तक क्रमिक रूप से चलती रही।

गवर्नर-जनरल की विशेष विधायी शक्तियाँ एवं सीमाएँ

➣ भले ही विधायी परिषद का विस्तार किया गया था, फिर भी उसकी शक्तियाँ गवर्नर-जनरल के अधीन ही रहीं – अधिनियम ने गवर्नर-जनरल को परिषद पर कई प्रकार के नियंत्रण अधिकार भी दिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि अंतिम निर्णायक शक्ति सदैव कार्यपालिका के पास ही बनी रहे।

➣ विधायी परिषद द्वारा पारित कोई भी विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता था जब तक गवर्नर-जनरल उसे स्वीकृति न दे। गवर्नर-जनरल के पास विधेयक को अस्वीकार करने अथवा ब्रिटिश क्राउन के विचारार्थ सुरक्षित रखने की भी शक्ति थी – अर्थात परिषद की विधायी शक्ति किसी भी स्तर पर कार्यपालिका से स्वतंत्र नहीं थी।

➣ सार्वजनिक राजस्व, सरकारी ऋण, मुद्रा, धर्म, सेना-नौसेना तथा विदेशी संबंधों जैसे संवेदनशील विषयों से जुड़ा कोई भी विधेयक गवर्नर-जनरल की पूर्व अनुमति के बिना परिषद में प्रस्तुत ही नहीं किया जा सकता था।

➣ इसका स्पष्ट उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वित्तीय, सामरिक अथवा राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों पर कार्यपालिका की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून न बन सके।

➣ इसी प्रकार, विधायी परिषदों को बजट पर मतदान अथवा उस पर पूर्ण नियंत्रण का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था, और न ही उन्हें कार्यपालिका के दैनिक प्रशासनिक निर्णयों को बाध्य करने की कोई शक्ति थी। उनकी भूमिका विशुद्ध रूप से विधायी परामर्श तक सीमित थी।

➣ परिषदों की संरचना भी अभी निर्वाचन या जनप्रतिनिधित्व पर आधारित नहीं थी – अधिकांश सदस्य नामित किए जाते थे, जिससे कार्यपालिका का परिषदों पर पर्याप्त प्रभाव बना रहता था।

➣ इस प्रकार 1861 का अधिनियम विधायी संस्थाओं का विस्तार तो करता था, परंतु साथ ही यह भी सुनिश्चित करता था कि अंतिम विधायी एवं राजनीतिक सर्वोच्चता गवर्नर-जनरल तथा ब्रिटिश कार्यपालिका के पास ही केंद्रित रहे – इसलिए इसे पूर्ण विधायी स्वायत्तता अथवा उत्तरदायी शासन की शुरुआत नहीं माना जा सकता।

गवर्नर-जनरल की अध्यादेश शक्ति

➣ ऐसी आपातकालीन परिस्थितियों के लिए, जहाँ विधायी परिषद की बैठक बुलाना संभव न हो, अधिनियम ने गवर्नर-जनरल को परिषद से परामर्श किए बिना अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी। इस शक्ति का प्रयोग गवर्नर-जनरल अपने विवेक से तभी कर सकता था, जब उसे लगे कि परिस्थितियों के कारण तत्काल कार्रवाई अनिवार्य है।

➣ ऐसे अध्यादेश को कानून के समान प्रभाव प्राप्त था – अर्थात वह सामान्य विधायी प्रक्रिया से पारित कानून की भाँति ही तुरंत प्रभावी होकर लागू हो जाता था। परंतु यह कोई स्थायी कानून नहीं था। इसकी वैधता अधिकतम 6 महीने तक ही सीमित थी।

➣ यदि निर्धारित छह महीने की अवधि के भीतर संबंधित विषय पर विधायी परिषद द्वारा नियमित रूप से कोई स्थायी कानून पारित नहीं किया जाता, तो अध्यादेश स्वतः निष्प्रभावी हो जाता था।

➣ इस प्रकार अध्यादेश-शक्ति को जान-बूझकर एक अस्थायी एवं आपातकालीन उपाय के रूप में ही सीमित रखा गया, ताकि गवर्नर-जनरल इसका उपयोग सामान्य विधायी प्रक्रिया को स्थायी रूप से दरकिनार करने के लिए न कर सके।

➣ यह प्रावधान भारत के संवैधानिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह पहला अवसर था जब कार्यपालिका को सामान्य विधायी प्रक्रिया से हटकर स्वतंत्र रूप से कानून जैसा प्रभाव रखने वाला आदेश जारी करने की शक्ति वैधानिक रूप से प्राप्त हुई।

➣ यही अवधारणा आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 तथा वर्तमान भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति (अनुच्छेद 123) एवं राज्यपाल (अनुच्छेद 213) की अध्यादेश-शक्ति के रूप में विकसित हुई।

नए प्रांतों के गठन की शक्ति

➣ गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को प्रशासनिक आवश्यकतानुसार नए प्रांत बनाने, उनकी सीमाएँ निर्धारित करने तथा लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने की शक्ति भी प्रदान की गई, जिससे विस्तृत होते ब्रिटिश भारत के प्रशासन को अधिक लचीला बनाया जा सके।

➣ यह शक्ति उस समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय क्षेत्र निरंतर विस्तृत हो रहा था और विभिन्न भागों की भौगोलिक, प्रशासनिक तथा स्थानीय परिस्थितियाँ एक-दूसरे से भिन्न थीं। एक ही स्थिर प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत इतने विशाल एवं विविध क्षेत्र का संचालन सदैव व्यावहारिक नहीं था।

➣ इस शक्ति के माध्यम से नए प्रांतों के गठन अथवा मौजूदा सीमाओं के पुनर्गठन के साथ उन क्षेत्रों के लिए पृथक एवं उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की जा सकती थी, जिससे स्थानीय प्रशासन पर पड़ने वाला भार कम करने तथा शासन को अधिक सुव्यवस्थित बनाने में सहायता मिली।

➣ इस प्रावधान का व्यापक महत्व यह था कि इसने भारत की प्रशासनिक इकाइयों की संरचना को स्थिर एवं अपरिवर्तनीय बनाए रखने के बजाय, आवश्यकतानुसार पुनर्गठित किए जा सकने वाली एक लचीली व्यवस्था का संवैधानिक आधार तैयार किया – जो आगे चलकर भारत में समय-समय पर हुए प्रांतीय पुनर्गठन की प्रक्रियाओं (जैसे 1905 का बंगाल विभाजन तथा स्वतंत्रता के बाद का भाषायी पुनर्गठन) के लिए एक प्रारंभिक विधिक मिसाल बना।

1833 बनाम 1861 – केंद्रीकरण से विकेंद्रीकरण की ओर

पहलूचार्टर एक्ट, 1833 (केंद्रीकरण)भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (आंशिक विकेंद्रीकरण)
विधायी शक्तिपूरी तरह गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल (कलकत्ता) में केंद्रितमद्रास व बंबई को पुनः सीमित प्रांतीय विधायी शक्ति
प्रांतीय सरकारेंस्वतंत्र कानून बनाने का अधिकार समाप्तअपने क्षेत्र की “शांति व सुशासन” हेतु कानून बनाने का अधिकार बहाल
भारतीयों की भूमिकाविधायी प्रक्रिया में कोई भूमिका नहींसीमित संख्या में नामांकन द्वारा भागीदारी
कार्यपालिका की प्रकृतिसामूहिक निर्णय (कोई स्पष्ट विभागीय बंटवारा नहीं)पोर्टफोलियो-आधारित विभागीय उत्तरदायित्व

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 की सीमाएँ/आलोचना

➣ जैसा ऊपर बताया गया, भारतीय सदस्य निर्वाचित नहीं, नामांकित थे, और वे भी मुख्यतः रजवाड़ों व बड़े जमींदारों में से चुने गए थे – पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग या पेशेवर वर्ग को प्रतिनिधित्व लगभग नहीं मिला, जो इस व्यवस्था की एक स्पष्ट सीमा थी।

➣ स्वयं भारत सचिव सर चार्ल्स वुड ने संसद में विधेयक पेश करते हुए स्वीकार किया था कि यह व्यवस्था मूलतः एक निरंकुश शासन ही बनी रहेगी, केवल उसका स्वरूप कुछ नरम होगा – इसलिए इसे उत्तरदायी या प्रतिनिधि शासन नहीं कहा जा सकता।

➣ जैसा ऊपर भी बताया गया, प्रांतीय विधायी शक्तियों की पुनर्स्थापना का अर्थ प्रांतीय स्वायत्तता नहीं था – प्रांतीय कानूनों पर केंद्र व गवर्नर-जनरल का नियंत्रण पूर्ववत बना रहा।

➣ अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के अधिकार-क्षेत्र का कोई स्पष्ट, संघीय ढंग का विभाजन नहीं किया – गवर्नर-जनरल की परिषद पूरे भारत के लिए तथा प्रांतीय परिषदें अपने-अपने क्षेत्र के लिए, दोनों साथ-साथ कानून बना सकती थीं, जिससे क्षेत्राधिकार को लेकर स्पष्टता की कमी बनी रही।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 का महत्व

➣ इसने चार्टर एक्ट, 1833 से चली आ रही अत्यधिक केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को उलटते हुए मद्रास व बंबई को विधायी शक्तियाँ लौटाकर भारत में विधायी विकेंद्रीकरण की शुरुआत की, जो आगे चलकर 1892, 1919 तथा 1935 के अधिनियमों के माध्यम से प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में क्रमशः आगे बढ़ती गई।

➣ इसने नामांकन के माध्यम से ही सही, भारतीयों को पहली बार केंद्रीय कानून-निर्माण प्रक्रिया से जोड़ा – जो आगे 1892 के अधिनियम तथा मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1909 के माध्यम से क्रमिक रूप से विस्तृत हुई भारतीय विधायी भागीदारी की नींव बना, और नामांकन से निर्वाचन की ओर यात्रा की शुरुआत हुई।

➣ इसने पोर्टफोलियो प्रणाली को वैधानिक आधार देकर केंद्रीय कार्यपालिका को विभागीय ढांचे में ढाला, जिससे परिषद एक प्रकार के लघु मंत्रिमंडल जैसी कार्य करने लगी – यही व्यवस्था आगे चलकर आधुनिक मंत्रिमंडलीय एवं विभागीय प्रशासन के विकास की नींव बना।

➣ इसने विधायी परिषद में अतिरिक्त सदस्यों को शामिल कर कार्यकारी एवं विधायी कार्यों के बीच एक प्रारंभिक संस्थागत भेद उत्पन्न किया – विस्तारित परिषद प्रशासनिक निर्णयों के लिए और कानून-निर्माण के लिए अलग-अलग रूपों में कार्य करने लगी, जो आधुनिक शासन-व्यवस्था में कार्यपालिका एवं विधायिका के पृथक्करण की एक प्रारंभिक झलक थी।

➣ इसने अध्यादेश-शक्ति जैसा प्रावधान भी पहली बार भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में शामिल किया, जो आज तक (राष्ट्रपति/राज्यपाल के अध्यादेश अधिकार के रूप में) भारतीय राजव्यवस्था में जीवित है।

➣ इसने गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को नए प्रांत बनाने तथा प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन की शक्ति देकर भारत की प्रशासनिक इकाइयों की संरचना को एक स्थिर ढांचे के बजाय आवश्यकतानुसार पुनर्गठित की जा सकने वाली लचीली व्यवस्था बनाया – जो आगे 1905 के बंगाल विभाजन तथा स्वतंत्रता के बाद के भाषायी पुनर्गठन जैसी प्रक्रियाओं के लिए एक प्रारंभिक विधिक आधार बना।

➣ इन सभी उपलब्धियों के बावजूद, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 1861 का अधिनियम पूर्ण विधायी स्वायत्तता अथवा उत्तरदायी शासन की शुरुआत नहीं था। विधायी परिषदों को बजट पर मतदान करने, कार्यपालिका से प्रश्न पूछने अथवा प्रशासन को बाध्य करने का कोई अधिकार नहीं था। अधिकांश सदस्य नामित (न कि निर्वाचित) थे। तथा हर विधेयक पर गवर्नर-जनरल की स्वीकृति अनिवार्य थी। इस प्रकार अंतिम विधायी एवं राजनीतिक सर्वोच्चता सदैव गवर्नर-जनरल तथा ब्रिटिश कार्यपालिका के पास ही केंद्रित रही – अधिनियम ने संस्थाओं का विस्तार अवश्य किया, परंतु सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण नहीं किया।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 – भ्रम बिंदु

➣ भारतीयों को विधायी परिषदों में शामिल करने की व्यवस्था निर्वाचन पर नहीं, बल्कि नामांकन पर आधारित थी।

➣ 1861 को भारत में प्रतिनिधि या उत्तरदायी शासन की शुरुआत नहीं मानना चाहिए – इसने केवल सीमित विधायी भागीदारी दी। कार्यपालिका ब्रिटिश नियंत्रण में ही रही।

➣ प्रांतीय विधायी शक्तियों की पुनर्स्थापना का अर्थ प्रांतीय स्वायत्तता नहीं था – प्रांतीय परिषदों पर केंद्रीय सरकार व गवर्नर-जनरल का नियंत्रण बना रहा।

➣ चार्टर एक्ट, 1833 केंद्रीकरण के लिए जाना जाता है, जबकि 1861 का अधिनियम उसी केंद्रीकरण को आंशिक रूप से कम करने वाला विकेंद्रीकरण-कदम था।

➣ पोर्टफोलियो प्रणाली 1861 में शुरू नहीं हुई थी – इसे लॉर्ड कैनिंग ने 1859 में आरंभ किया था। 1861 के अधिनियम ने इसे केवल वैधानिक मान्यता दी।

➣ अध्यादेश जारी करने की शक्ति को विधायी परिषद की सामान्य कानून-निर्माण शक्ति के समान नहीं समझना चाहिए – यह केवल तत्काल एवं अस्थायी (अधिकतम 6 महीने की) आवश्यकता के लिए थी।

➣ विधायी परिषद के विस्तार से परिषद को कार्यपालिका पर नियंत्रण प्राप्त नहीं हुआ – गवर्नर-जनरल व ब्रिटिश कार्यपालिका की सर्वोच्चता बनी रही।

➣ मद्रास व बंबई को विधायी शक्तियाँ लौटना भारत में पूर्ण संघीय व्यवस्था की शुरुआत नहीं थी – यह केवल सीमित प्रांतीय विधायी विकेंद्रीकरण था।

➣ भारत शासन अधिनियम, 1858 और भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 को एक न समझें – 1858 ने लंदन की गृह-सरकार बदली (कंपनी → क्राउन), जबकि 1861 ने भारत के भीतर की शासन-मशीनरी (गवर्नर-जनरल की परिषद, प्रांतीय शक्तियाँ) का पुनर्गठन किया।

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