बंग-भंग आंदोलन: परिचय
➣ बंग-भंग आंदोलन (1905–1911) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला व्यापक जनआंदोलन था, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया स्वरूप प्रदान किया।
➣ यह आंदोलन लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन (16 अक्टूबर 1905) के विरोध में प्रारम्भ हुआ। अंग्रेज़ सरकार ने विभाजन को प्रशासनिक सुविधा के लिए आवश्यक बताया, किन्तु भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसे फूट डालो और शासन करो की नीति का हिस्सा माना।
➣ बंग-भंग आंदोलन केवल बंगाल विभाजन के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शीघ्र ही यह एक अखिल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन बन गया।
➣ इस आंदोलन के दौरान स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार तथा राष्ट्रीय चेतना को सशक्त बनाने पर विशेष बल दिया गया।
➣ इसके परिणामस्वरूप विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों और आम जनता ने भी बड़ी संख्या में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया।
➣ बंग-भंग आंदोलन ने भारतीय राजनीति में उग्र राष्ट्रवाद को नई दिशा दी तथा आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन और स्वराज की मांग को अधिक संगठित रूप प्रदान किया।
➣ जन-विरोध के बढ़ते दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को अंततः 1911 ई. में बंगाल विभाजन को रद्द करना पड़ा। इस प्रकार बंग-भंग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
बंगाल की प्रशासनिक स्थिति
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक बंगाल ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा एवं सबसे महत्वपूर्ण प्रांत था। उस समय इसके अंतर्गत केवल वर्तमान पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि बिहार, उड़ीसा (ओडिशा) तथा कुछ अन्य क्षेत्र भी सम्मिलित थे।
➣ विशाल क्षेत्रफल और अत्यधिक जनसंख्या के कारण इस प्रांत का प्रभावी प्रशासन ब्रिटिश सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। ब्रिटिश अधिकारियों का तर्क था कि इतने विशाल प्रांत का प्रशासन एक ही प्रांतीय सरकार के लिए कठिन होता जा रहा है।
➣ विशेष रूप से पूर्वी बंगाल के दूरस्थ क्षेत्रों तक प्रशासनिक सुविधाएँ, संचार व्यवस्था और सरकारी सेवाएँ प्रभावी ढंग से नहीं पहुँच पा रही थीं। इसी कारण ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के पुनर्गठन की आवश्यकता पर विचार करना प्रारम्भ किया।
➣ 20वीं सदी के प्रारम्भ में बंगाल प्रेसीडेंसी का कुल क्षेत्रफल लगभग 4,89,500 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या लगभग 7.85–8 करोड़ थी, जो उस समय ब्रिटिश भारत की कुल जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई भाग थी।
➣ इतनी विशाल जनसंख्या और क्षेत्रफल का प्रशासन एक ही लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन संचालित होता था, जिसके पास राजस्व, न्याय, पुलिस, शिक्षा आदि सभी विभागों का उत्तरदायित्व था।
➣ 1854 ई. में गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को बंगाल के प्रत्यक्ष प्रशासन से मुक्त कर एक पृथक लेफ्टिनेंट गवर्नर की व्यवस्था लागू की गई।
➣ प्रशासनिक बोझ कम करने के उद्देश्य से 1874 ई. में आसाम को सिलहट सहित बंगाल से पृथक कर एक अलग चीफ कमिश्नरी बनाया गया।
➣ 1898 ई. में लुशाई क्षेत्र को भी अस्थायी रूप से आसाम में सम्मिलित कर दिया गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार समय-समय पर बंगाल प्रांत का पुनर्गठन कर प्रशासनिक बोझ कम करने का प्रयास करती रही, फिर भी बंगाल प्रेसीडेंसी अत्यंत विशाल बनी रही।
➣ बंगाल प्रांत में बांग्ला, बिहारी भाषाएँ, उड़िया आदि अनेक भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती थीं। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण भी समान नहीं था, जिससे पूरे प्रांत में एक समान प्रशासन चलाना और अधिक कठिन हो जाता था।
➣ प्रांत के विभिन्न भागों की आर्थिक प्रगति भी समान नहीं थी। जहाँ कलकत्ता केंद्रित पश्चिमी क्षेत्र अपेक्षाकृत विकसित था, वहीं पूर्वी बंगाल तथा अन्य सुदूर क्षेत्र प्रशासनिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे।
➣ पूर्वी बंगाल नदियों तथा दलदली भूभाग से घिरा हुआ था। इसके साथ ही वहाँ संचार के साधन भी पर्याप्त विकसित नहीं थे, जिसके कारण यह क्षेत्र कलकत्ता केंद्रित प्रशासन से काफी हद तक कटा हुआ था।
➣ परिणामस्वरूप वहाँ न्यायिक, पुलिस एवं राजस्व संबंधी कार्य समय पर संपन्न नहीं हो पाते थे, और स्थानीय जनता को भी प्रशासनिक सेवाओं हेतु लंबी दूरी तय कर कलकत्ता तक जाना पड़ता था।
लॉर्ड कर्जन की बंगाल विभाजन योजना
➣ लॉर्ड कर्जन ने 1899 ई. में भारत के वायसराय का पद संभाला। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रशासनिक सुधारों के नाम पर कई निर्णय लिए, जिनमें बंगाल विभाजन उनकी सबसे विवादास्पद योजना थी।
➣ बंगाल की प्रशासनिक समस्याओं को आधार बनाकर लॉर्ड कर्जन ने प्रांत के पुनर्गठन की योजना तैयार की। उनका मत था कि प्रशासन को अधिक प्रभावी और सुविधाजनक बनाने के लिए बंगाल का विभाजन आवश्यक है।
➣ ब्रिटिश सरकार ने भी इसे एक प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि इससे दूरस्थ क्षेत्रों का विकास होगा तथा प्रशासन अधिक सुचारु रूप से संचालित किया जा सकेगा।
➣ 1 जून, 1903 को लॉर्ड कर्जन ने अपने सीमा-पुनर्गठन मिनट के माध्यम से बंगाल के पुनर्गठन का प्रारम्भिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसे ही बंगाल विभाजन योजना का आधार माना जाता है।
➣ प्रारम्भिक योजना में चटगाँव, ढाका तथा मैमनसिंह जिलों को बंगाल से अलग कर असम में मिलाने तथा छोटा नागपुर क्षेत्र को मध्य प्रांत में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा गया था।
➣ 1903 ई. में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन के अध्यक्ष लालमोहन घोष ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इस प्रस्तावित योजना की आलोचना की तथा संभावित बंग-भंग के प्रति देश को सचेत किया।
➣ बंगाल विभाजन योजना को अंतिम रूप देने में लॉर्ड कर्जन के अतिरिक्त बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ए. फ्रेजर तथा भारत सरकार के गृह विभाग के सचिव एच.एच. रिजले की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ जनवरी, 1904 में ब्रिटिश सरकार ने विभाजन संबंधी प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से प्रकाशित किया, जिसके बाद इसके पक्ष और विपक्ष में व्यापक चर्चा प्रारम्भ हो गई।
➣ फरवरी, 1904 में लॉर्ड कर्जन ने ढाका, चटगाँव और मैमनसिंह सहित पूर्वी बंगाल के अनेक जिलों का दौरा कर विभाजन योजना के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
➣ इस योजना का सर हेनरी कॉटन सहित अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने विरोध किया। प्रारम्भ में ढाका के नवाब ख्वाजा सलीमुल्लाह ने भी इसका विरोध किया, यद्यपि बाद में वे इसके समर्थक बन गए।
➣ 2 फरवरी, 1905 को बंगाल विभाजन की संशोधित एवं अंतिम योजना स्वीकृति के लिए भारत सचिव के पास लंदन भेज दी गई। इसके बाद सरकार ने विभाजन की औपचारिक घोषणा की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
बंगाल विभाजन के वास्तविक उद्देश्य
➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन को प्रशासनिक सुधार बताया, किन्तु अधिकांश भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
➣ उनके अनुसार विभाजन का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा से अधिक राजनीतिक था। उस समय बंगाल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था और राष्ट्रीय चेतना तेजी से फैल रही थी।
➣ भारतीय नेताओं का मानना था कि लॉर्ड कर्जन बंगाल की इस बढ़ती राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना चाहते थे। विभाजन के माध्यम से वे बंगाली भाषी जनता को दो अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बाँटकर राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति को कम करना चाहते थे।
➣ बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे सक्रिय केंद्र था। इसलिए ब्रिटिश सरकार इस क्षेत्र में बढ़ते राष्ट्रवादी प्रभाव को कमजोर करना चाहती थी।
➣ विभाजन के माध्यम से बंगाली भाषी जनता की एकता को तोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव कम हो सके।
➣ पूर्वी बंगाल एवं असम में मुस्लिम आबादी अधिक थी, जबकि पश्चिमी भाग में हिन्दू आबादी का प्रभुत्व था। राष्ट्रवादियों का मानना था कि यह व्यवस्था हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा देने और ब्रिटिश शासन की फूट डालो और शासन करो की नीति का हिस्सा थी।
➣ विभाजन के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा बंगाल के राष्ट्रवादी नेताओं के प्रभाव को सीमित करने का भी प्रयास किया गया।
➣ इन्हीं कारणों से भारतीय जनता ने बंगाल विभाजन को केवल प्रशासनिक निर्णय न मानकर राजनीतिक उद्देश्य से उठाया गया कदम माना। परिणामस्वरूप पूरे बंगाल में इसका व्यापक विरोध प्रारम्भ हुआ, जो आगे चलकर बंग-भंग आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
बंगाल विभाजन की घोषणा (19 जुलाई, 1905)
➣ 2 फरवरी, 1905 को बंगाल विभाजन की अंतिम योजना भारत सचिव को भेजे जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे लागू करने की प्रक्रिया तेज कर दी।
➣ सार्वजनिक विरोध के बावजूद अंततः 19 जुलाई, 1905 को भारत सरकार ने बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा कर दी।
➣ 20 जुलाई, 1905 को भारत सचिव ने इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति प्रदान कर दी, जिसके बाद विभाजन को लागू करने की प्रशासनिक तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी गईं।
➣ इस योजना के अनुसार पूर्वी बंगाल एवं असम नामक एक नया प्रांत बनाया गया। इसमें ढाका, चटगाँव तथा राजशाही डिवीजन (दार्जिलिंग को छोड़कर), मालदा, हिल त्रिपुरा तथा असम को सम्मिलित किया गया।
➣ नए प्रांत पूर्वी बंगाल एवं असम की राजधानी ढाका तथा मुख्यालय शिलांग बनाया गया। इस प्रांत की जनसंख्या लगभग 3.1 करोड़ थी, जिनमें मुसलमान बहुसंख्यक थे।
➣ दूसरी ओर शेष बंगाल को बिहार और उड़ीसा के साथ पुनर्गठित किया गया, जिसकी राजधानी कलकत्ता बनी रही। इस नए प्रांत की जनसंख्या लगभग 5.4 करोड़ थी।
➣ ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि यह नया प्रशासनिक पुनर्गठन 16 अक्टूबर, 1905 से प्रभावी होगा। किंतु इस घोषणा के साथ ही पूरे बंगाल में व्यापक असंतोष फैल गया, जिसने आगे चलकर बंग-भंग आंदोलन का रूप ले लिया।
16 अक्टूबर 1905 : विभाजन लागू
➣ विरोध के बावजूद 16 अक्टूबर को ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन को औपचारिक रूप से लागू कर दिया। इसी दिन से बंगाल को दो प्रशासनिक इकाइयों में बाँट दिया गया।
➣ एक ओर पूर्वी बंगाल एवं असम नामक नया प्रांत अस्तित्व में आया, जबकि दूसरी ओर शेष बंगाल को बिहार और उड़ीसा के साथ पुनर्गठित किया गया।
➣ पूर्वी बंगाल एवं असम की राजधानी ढाका बनाई गई। इस नए प्रांत का क्षेत्रफल लगभग 2,75,000 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या लगभग 3.1 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी।
➣ पुनर्गठित बंगाल प्रांत की राजधानी कलकत्ता बनी रही। इसके अंतर्गत पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र सम्मिलित किए गए, जहाँ हिन्दू आबादी बहुसंख्यक थी।
| बंगाल विभाजन – 1905 | |
|---|---|
|
पश्चिम बंगाल
बंगाल + बिहार + उड़ीसा
(हिन्दू जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्र)
↓
राजधानी कलकत्ता
↓
लेफ्टिनेंट गवर्नर एंड्रयू फ्रेजर
|
पूर्वी बंगाल
बांग्लादेश + असम
(मुस्लिम जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्र)
↓
राजधानी ढाका
↓
लेफ्टिनेंट गवर्नर बैम्फिल्ड फुलर
|
➣ विभाजन लागू होते ही पूरे बंगाल में व्यापक असंतोष फैल गया। अनेक स्थानों पर लोगों ने 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाया तथा इसे बंगाल की एकता पर आघात बताया।
➣ इस दिन बड़ी संख्या में लोगों ने गंगा स्नान किया, उपवास रखा तथा नंगे पैर जुलूस निकालकर विभाजन का शांतिपूर्ण विरोध किया। लोगों ने एक-दूसरे को राखी बाँधकर बंगाल की एकता और भाईचारे का संदेश दिया।
➣ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी इस अवसर पर रक्षाबंधन समारोह का नेतृत्व किया और हिन्दू-मुस्लिम एकता का आह्वान किया। इसी दिन वंदे मातरम् के नारों के साथ अनेक सभाएँ और जुलूस निकाले गए।
➣ 16 अक्टूबर, 1905 की घटनाओं ने बंगाल विभाजन के विरोध को एक व्यापक जनआंदोलन का रूप दे दिया। आगे चलकर यही आंदोलन स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन
➣ 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में स्वदेशी एवं बहिष्कार का प्रस्ताव पारित होने के साथ ही इस आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई।
➣ जबकि 16 अक्टूबर, 1905 को बंगाल विभाजन लागू होने के बाद यह आंदोलन पूरे बंगाल में तीव्र गति से फैल गया और शीघ्र ही एक व्यापक जनआंदोलन का रूप धारण कर लिया।
➣ इसका उद्देश्य केवल बंगाल विभाजन का विरोध करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन के आर्थिक हितों को चुनौती देना, स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित करना तथा भारतीयों में आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना भी था।
➣ बहिष्कार आंदोलन के अंतर्गत केवल विदेशी वस्त्रों का ही नहीं, बल्कि सरकारी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों, अदालतों, सरकारी उपाधियों तथा सरकारी नौकरियों के बहिष्कार का भी आह्वान किया गया।
➣ अनेक स्थानों पर विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक रूप से होली जलाई गई तथा ब्रिटिश वस्तुएँ बेचने वाली दुकानों के सामने शांतिपूर्ण धरने देकर लोगों से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की अपील की गई।
➣ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से स्वदेशी उद्योगों को नया प्रोत्साहन मिला। इस काल में कलकत्ता पॉटरीज़, बंगाल कैमिकल्स, बंग लक्ष्मी कॉटन मिल्स, मोहिनी मिल्स तथा नेशनल टैनरी जैसे भारतीय उद्योग स्थापित हुए।
➣ इसके अतिरिक्त साबुन, माचिस, तम्बाकू उद्योग, ऑयल मिल्स, स्वदेशी बैंक, बीमा कंपनियाँ तथा स्टीम नेविगेशन कंपनियाँ भी स्थापित की गईं।
आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय ने बंगाल कैमिकल्स तथा बंगाल कैमिकल्स स्वदेशी स्टोर्स के माध्यम से स्वदेशी उद्योगों को महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।➣ स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में अनेक राष्ट्रीय स्वयंसेवी समितियों का गठन किया गया। बारीसाल के शिक्षक अश्विनी कुमार दत्त ने स्वदेश बांधव समिति की स्थापना 6 अगस्त, 1905 को की, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में आंदोलन का व्यापक प्रचार किया।
➣ इसके अतिरिक्त डॉन सोसायटी (1902), एंटी-सर्कुलर सोसायटी (1905), अनुशीलन समिति (1902), सुहृद समिति (1901), व्रती समिति (1905) तथा साधना समिति (1905) ने भी स्वदेशी आंदोलन के प्रचार, जनसंगठन, राहत कार्यों तथा राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आंदोलन के दौरान महिलाओं, विद्यार्थियों, व्यापारियों, वकीलों तथा शिक्षित मध्यम वर्ग ने सक्रिय भागीदारी निभाई। हालांकि अधिकांश किसान तथा मुस्लिम समुदाय का बड़ा भाग इस आंदोलन से अपेक्षाकृत दूर रहा।
➣ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसी आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध गीत आमार सोनार बांग्ला की रचना की, जिसे स्वदेशी जुलूसों में बड़े उत्साह से गाया जाता था।
➣ बाद में 1971 ई. में यही गीत बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख नारों में वन्दे मातरम्, विभाजन नहीं चाहिए तथा बंगाल एक है विशेष रूप से लोकप्रिय हुए।
➣ स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव भारतीय कला पर भी पड़ा। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने पाश्चात्य शैली से हटकर भारतीय परम्परा पर आधारित चित्रकला को बढ़ावा दिया तथा 1905 ई. में प्रसिद्ध भारत माता चित्र बनाया। उन्हें नव-बंगाल चित्रकला शैली का प्रवर्तक माना जाता है।
1907 ई. में उन्होंने अपने भाई गगनेन्द्रनाथ ठाकुर के साथ इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना की, जिसने भारतीय कला के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। नन्दलाल बोस इसी संस्था से छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले प्रथम प्रमुख चित्रकार थे।➣ विज्ञान के क्षेत्र में जगदीश चन्द्र बोस, आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय तथा अन्य भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों ने भी राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत किया और स्वदेशी आंदोलन को वैचारिक बल प्रदान किया।
➣ स्वदेशी आंदोलन के दौरान दिसम्बर, 1905 में बनारस में रमेशचन्द्र दत्त की अध्यक्षता में प्रथम भारतीय औद्योगिक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय उद्योगों के विकास तथा स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित करना था।
➣ स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के दौरान आंदोलन की दिशा को लेकर तीन प्रमुख राजनीतिक प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आईं-
➣ 1. संतुलित (नरमपंथी) विचार – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र तथा नरेन्द्र कुमार सेन के नेतृत्व में यह धारा संवैधानिक तरीकों और जनमत के माध्यम से आंदोलन चलाने की पक्षधर थी।
➣ 2. रचनात्मक स्वदेशी – सतीशचन्द्र मुखर्जी, अश्विनी कुमार दत्त, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा प्रफुल्ल चन्द्र राय जैसे नेताओं का लक्ष्य आत्मशक्ति के माध्यम से स्वदेशी उद्योगों, सामाजिक पुनर्निर्माण तथा राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करना था।
➣ 3. राजनीतिक उग्रवाद – बिपिन चन्द्र पाल (न्यू इंण्डिया), अरविन्द घोष (बन्दे मातरम्), ब्रह्मबान्धव उपाध्याय (संध्या) तथा भूपेन्द्रनाथ दत्त (युगांतर) के नेतृत्व में यह धारा विकसित हुई। इसका उद्देश्य बहिष्कार को ब्रिटिश प्रशासन, न्यायालयों और सरकारी सेवाओं तक विस्तारित करना था।
| वर्ष / तिथि | महत्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 1901 | सुहृद समिति की स्थापना। |
| 1902 | डॉन सोसायटी तथा अनुशीलन समिति की स्थापना। |
| 6 अगस्त 1905 | अश्विनी कुमार दत्त द्वारा बारीसाल में स्वदेश बांधव समिति की स्थापना। |
| 7 अगस्त 1905 | कलकत्ता टाउन हॉल में स्वदेशी एवं बहिष्कार का प्रस्ताव पारित; आंदोलन की औपचारिक शुरुआत। |
| 1905 | एंटी-सर्कुलर सोसायटी, व्रती समिति और साधना समिति जैसी समितियों का गठन। |
| 16 अक्टूबर 1905 | बंगाल विभाजन लागू; स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन पूरे बंगाल में तीव्र हुआ। |
| 1905 | अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा प्रसिद्ध ‘भारत माता’ चित्र का निर्माण। |
| दिसंबर 1905 | बनारस में रमेशचन्द्र दत्त की अध्यक्षता में प्रथम भारतीय औद्योगिक सम्मेलन। |
| 1907 | अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और गगनेन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना। |
| 1920 के दशक से पहले | स्वदेशी आंदोलन के दौरान विकसित भारतीय उद्योग, बैंकिंग, बीमा और स्वदेशी संस्थाओं ने आर्थिक राष्ट्रवाद को मजबूत किया। |
| 1971 | रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ‘आमार सोनार बांग्ला’ बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। |
स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख धाराएँ
| धारा | प्रमुख नेता | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| संतुलित / नरमपंथी | सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र, नरेन्द्र कुमार सेन | संवैधानिक तरीकों और जनमत के माध्यम से आंदोलन। |
| रचनात्मक स्वदेशी | सतीशचन्द्र मुखर्जी, अश्विनी कुमार दत्त, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रफुल्ल चन्द्र राय | आत्मशक्ति, स्वदेशी उद्योग, शिक्षा और सामाजिक पुनर्निर्माण। |
| राजनीतिक उग्रवाद | बिपिन चन्द्र पाल, अरविन्द घोष, ब्रह्मबान्धव उपाध्याय, भूपेन्द्रनाथ दत्त | बहिष्कार को सरकारी संस्थाओं, न्यायालयों और प्रशासन तक विस्तारित करना। |
राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन
➣ स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और महाविद्यालयों का बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दिया। इसके उत्तर में ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाए। 22 अक्टूबर, 1905 को बंगाल सरकार के मुख्य सचिव आर. डब्ल्यू. कार्लाइल ने प्रसिद्ध कार्लाइल परिपत्र जारी किया। इस परिपत्र में आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के विरुद्ध छात्रवृत्तियाँ, सरकारी अनुदान तथा शिक्षण संस्थानों की मान्यता समाप्त करने जैसी दमनात्मक कार्यवाहियों की चेतावनी दी गई।
➣ इन परिस्थितियों में राष्ट्रवादी नेताओं ने अनुभव किया कि केवल सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके स्थान पर राष्ट्रीय आदर्शों पर आधारित स्वतंत्र शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना भी आवश्यक है।
➣ इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का आरम्भ हुआ। इसका उद्देश्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना था, जो भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा तथा आत्मनिर्भरता पर आधारित हो।
➣ सतीशचन्द्र मुखर्जी द्वारा स्थापित डॉन सोसायटी ने राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया। इस संस्था ने स्वदेशी शिक्षा, राष्ट्रीय चरित्र निर्माण तथा भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शान्तिनिकेतन को राष्ट्रीय शिक्षा के आदर्श केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। यहाँ भारतीय संस्कृति, प्रकृति के निकट शिक्षा तथा स्वतंत्र चिंतन पर विशेष बल दिया गया।
➣ अगस्त, 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की स्थापना करना तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना था।
➣ 15 अगस्त, 1906 को बंगाल नेशनल कॉलेज एवं स्कूल की स्थापना की गई, जिसके प्रथम प्राचार्य अरविन्द घोष बने। यह संस्था राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गई।
➣ 25 जुलाई, 1906 को बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भारतीय युवाओं को तकनीकी एवं औद्योगिक शिक्षा प्रदान करना था। आगे चलकर यही संस्थान जादवपुर विश्वविद्यालय के विकास का आधार बना।
➣ राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन के परिणामस्वरूप बंगाल के विभिन्न जिलों में अनेक राष्ट्रीय प्राथमिक, माध्यमिक विद्यालय तथा महाविद्यालय स्थापित किए गए। इन संस्थानों में भारतीय इतिहास, संस्कृति, विज्ञान तथा तकनीकी शिक्षा पर विशेष बल दिया गया।
➣ राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन ने भारतीय युवाओं में राष्ट्रीय चेतना, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की भावना को मजबूत किया। साथ ही इसने ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन
➣ बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में प्रारम्भ हुए आंदोलन को व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ कांग्रेस ने अपने वार्षिक अधिवेशनों में बंगाल विभाजन की आलोचना करते हुए स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा जैसे कार्यक्रमों का समर्थन किया।
➣ यद्यपि कांग्रेस के नरमपंथी और उग्रपंथी नेताओं के बीच आंदोलन की सीमा और स्वरूप को लेकर मतभेद थे, फिर भी दोनों धाराएँ बंगाल विभाजन का विरोध करने के पक्ष में थीं।
बनारस अधिवेशन (1905)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 21वाँ अधिवेशन 27-30 दिसम्बर, 1905 को बनारस (वाराणसी) में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले ने की।
➣ यह बंगाल विभाजन (1905) के बाद आयोजित होने वाला कांग्रेस का पहला अधिवेशन था। इसलिए अधिवेशन में बंग-भंग आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन तथा बहिष्कार आंदोलन प्रमुख चर्चा के विषय रहे।
➣ अधिवेशन में बंगाल विभाजन की कड़ी निंदा करते हुए इसे भारतीय जनमत की अवहेलना तथा ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और शासन करो की नीति का परिणाम बताया गया।
➣ कांग्रेस ने स्वदेशी आंदोलन तथा स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का समर्थन करते हुए भारतीयों से देशी उद्योगों को प्रोत्साहन देने का आह्वान किया। विदेशी वस्तुओं के देशव्यापी एवं पूर्ण बहिष्कार को कांग्रेस की आधिकारिक नीति के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
➣ नरमपंथी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने अपने अध्यक्षीय भाषण में बंगाल विभाजन को अन्यायपूर्ण बताते हुए इसे भारतीय जनमत की उपेक्षा का उदाहरण कहा। उन्होंने आंदोलन को संवैधानिक, शांतिपूर्ण एवं वैधानिक साधनों के माध्यम से आगे बढ़ाने पर बल दिया।
➣ अधिवेशन में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के प्रश्न पर नरमपंथी और उग्रवादी नेताओं के बीच मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए।
➣ नरमपंथी नेताओं का मत था कि आंदोलन को संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण सीमाओं में रखा जाए, जबकि उग्रवादी नेता बहिष्कार आंदोलन को अधिक व्यापक बनाकर उसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रभावी राजनीतिक हथियार के रूप में अपनाना चाहते थे।
➣ यद्यपि इस अधिवेशन में नरमपंथी विचारधारा का प्रभाव अधिक रहा, फिर भी कांग्रेस ने बंग-भंग आंदोलन तथा स्वदेशी आंदोलन को नैतिक एवं राजनीतिक समर्थन प्रदान किया। इससे बंगाल के आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर वैधता और व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
➣ इस अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर नरमपंथी और उग्रवादी विचारधाराओं के मतभेद अधिक स्पष्ट होकर सामने आए।
कलकत्ता अधिवेशन (1906)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 22वाँ अधिवेशन 26–29 दिसम्बर, 1906 को कलकत्ता में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दादाभाई नौरोजी ने की।
➣ उस समय कांग्रेस के भीतर नरमपंथी और उग्रपंथी नेताओं के बीच मतभेद बढ़ रहे थे। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों की सहमति से दादाभाई नौरोजी को अध्यक्ष चुना गया।
➣ बंग-भंग आंदोलन की पृष्ठभूमि में आयोजित यह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
➣ अपने अध्यक्षीय भाषण में दादाभाई नौरोजी ने स्पष्ट किया कि भारत का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत अन्य स्वशासित उपनिवेशों के समान स्वशासन प्राप्त करना है।
इस अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने स्वराज को अपना घोषित राजनीतिक लक्ष्य स्वीकार किया।
➣ अधिवेशन में कांग्रेस ने चार महत्वपूर्ण प्रस्तावों—स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा—का समर्थन किया। इन प्रस्तावों ने बंग-भंग आंदोलन को वैचारिक और राजनीतिक आधार प्रदान किया।
➣ कांग्रेस ने भारतीयों से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग, देशी उद्योगों को प्रोत्साहन तथा राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों के विकास में सहयोग देने का आह्वान किया। साथ ही, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को बंगाल तक सीमित न मानकर राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावी राजनीतिक साधन के रूप में स्वीकार किया गया।
➣ अधिवेशन के दौरान नरमपंथी और उग्रपंथी नेताओं के बीच आंदोलन की कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए। नरमपंथी संवैधानिक और वैधानिक उपायों पर बल दे रहे थे, जबकि उग्रपंथी स्वदेशी, बहिष्कार और जनआंदोलन को अधिक व्यापक रूप से अपनाने के पक्षधर थे।
➣ हालाँकि दादाभाई नौरोजी के नेतृत्व में दोनों पक्षों के बीच कुछ समय के लिए समझौता बना रहा, जिससे कांग्रेस की एकता बनी रही।
➣ कलकत्ता अधिवेशन के निर्णयों ने बंग-भंग आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। इसके बाद स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख राजनीतिक कार्यक्रम बन गए।
➣ साथ ही, कांग्रेस के भीतर नरमपंथी और उग्रपंथी विचारधाराओं का संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया, जिसका परिणाम आगे चलकर 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के विभाजन के रूप में सामने आया।
बंग-भंग आंदोलन का प्रभाव एवं परिणाम
➣ बंग-भंग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक निर्णायक चरण सिद्ध हुआ। इसके प्रभाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसने भारतीय राजनीति, राष्ट्रीय आंदोलन तथा ब्रिटिश शासन की नीतियों को भी गहराई से प्रभावित किया।
➣ इस आंदोलन के परिणामस्वरूप उग्र राष्ट्रवाद को नई शक्ति मिली तथा आगे चलकर मुस्लिम लीग की स्थापना जैसी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि भी तैयार हुई।
मुस्लिम लीग की स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ बंगाल विभाजन (1905) के बाद ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति को और अधिक सक्रिय रूप से अपनाया। एक ओर बंग-भंग आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर फैल रहा था, वहीं दूसरी ओर सरकार ने मुस्लिम अभिजात वर्ग को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि पूर्वी बंगाल एवं असम के गठन से उनके राजनीतिक एवं प्रशासनिक हितों की बेहतर रक्षा होगी।
➣ 1 अक्टूबर, 1906 को आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय लॉर्ड मिंटो से भेंट कर मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व की मांग की। ब्रिटिश सरकार के सकारात्मक रुख ने एक पृथक मुस्लिम राजनीतिक संगठन की आवश्यकता को बल दिया।
➣ इन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप 30 दिसम्बर, 1906 को ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। इसका विस्तृत अध्ययन ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ अध्याय में किया जा सकता है।
उग्र राष्ट्रवाद का उदय
➣ बंग-भंग आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इस आंदोलन के दौरान पहली बार उग्र राष्ट्रवादी नेताओं को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
➣ ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन को जनमत की उपेक्षा करते हुए लागू करने तथा शांतिपूर्ण विरोध की अनदेखी करने से अनेक भारतीयों का नरमपंथी राजनीति से विश्वास उठने लगा।
➣ परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा तेजी से मजबूत हुई और बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल जैसे नेता राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गए।
➣ उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चन्द्र पाल ने किया, जिन्हें संयुक्त रूप से लाल-बाल-पाल कहा जाता है।
➣ तिलक ने महाराष्ट्र, लाजपत राय ने पंजाब तथा बिपिन चन्द्र पाल ने बंगाल में आंदोलन का नेतृत्व किया।
➣ तिलक ने केसरी और मराठा समाचार-पत्रों के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया तथा उनका प्रसिद्ध उद्घोष स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा उग्र राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।
➣ बिपिन चन्द्र पाल ने न्यू इंडिया के माध्यम से उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार किया तथा देशभर में भाषण देकर स्वदेशी, स्वराज और निष्क्रिय प्रतिरोध का समर्थन किया।
लाला लाजपत राय ने पंजाब में आंदोलन को संगठित किया और अपने समाचार-पत्र द पंजाबी तथा द पीपुल के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया।➣ अरविन्द घोष उग्र राष्ट्रवाद के प्रमुख वैचारिक नेता बनकर उभरे। उन्होंने वन्दे मातरम् तथा बाद में कर्मयोगी के माध्यम से स्वराज और उग्र राष्ट्रवाद का प्रचार किया। वे बंगाल नेशनल कॉलेज के प्रथम प्राचार्य भी रहे।
➣ वहीं ब्रह्मबान्धव उपाध्याय ने संध्या तथा भूपेन्द्रनाथ दत्त ने युगान्तर समाचार-पत्र के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया।
➣ उग्र राष्ट्रवाद के प्रभाव से अनेक युवाओं ने क्रांतिकारी संगठनों का रुख किया। बंगाल में अनुशीलन समिति (1902, प्रमथनाथ मित्र) तथा उसके क्रांतिकारी अंग युगान्तर समूह (1906, बरीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त) की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं।
➣ कांग्रेस के भीतर उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव तथा नरमपंथी नेताओं के साथ बढ़ते वैचारिक मतभेद अंततः 1907 ई. के सूरत विभाजन का कारण बने।
बंगाल विभाजन रद्द (1911)
➣ बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध लगातार चल रहे बंग-भंग आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन तथा देशव्यापी जनविरोध के कारण ब्रिटिश सरकार पर विभाजन के निर्णय पर पुनर्विचार करने का दबाव बढ़ने लगा।
➣ लगभग छह वर्षों तक चले व्यापक विरोध के बाद ब्रिटिश सरकार ने अंततः बंगाल विभाजन को समाप्त करने का निर्णय लिया।
➣ 12 दिसम्बर, 1911 को दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की। यह घोषणा भारतीय जनता के लंबे संघर्ष और निरंतर जनदबाव का परिणाम मानी जाती है।
➣ विभाजन रद्द होने के बाद पूर्वी बंगाल एवं असम प्रांत को समाप्त कर दिया गया तथा पूर्वी बंगाल को पुनः बंगाल में मिला दिया गया। साथ ही असम को पुनः एक पृथक प्रांत का दर्जा दिया गया।
➣ प्रशासनिक पुनर्गठन के अंतर्गत बिहार एवं उड़ीसा को बंगाल से अलग कर 1912 ई. में एक नया प्रांत बनाया गया। इस प्रकार बंगाल प्रांत का पुनर्गठन नए स्वरूप में किया गया।
➣ इसी दिल्ली दरबार (1911) में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की भी घोषणा की। 23 दिसम्बर, 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय के दिल्ली प्रवेश के साथ यह परिवर्तन प्रभावी रूप से लागू हुआ।
➣ बंगाल विभाजन की समाप्ति ने यह सिद्ध किया कि संगठित जनआंदोलन ब्रिटिश सरकार की नीतियों को प्रभावित करने में सक्षम था। यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ बंगाल विभाजन की योजना का प्रारम्भिक प्रस्ताव 1 जून, 1903 को लॉर्ड कर्जन के Territorial Redistribution Minute से जुड़ा माना जाता है।
➣ 19 जुलाई, 1905 को ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा की तथा इसे 16 अक्टूबर, 1905 से लागू किया गया।
➣ विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल एवं असम नामक नया प्रांत बनाया गया, जिसकी राजधानी ढाका थी।
➣ 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल की ऐतिहासिक सभा में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई।
➣ 16 अक्टूबर, 1905 को विभाजन लागू होने के दिन पूरे बंगाल में शोक दिवस, रक्षाबंधन, अरंधन, गंगा स्नान तथा वन्दे मातरम् के सामूहिक गायन के माध्यम से विरोध दर्ज कराया गया।
➣ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग आंदोलन के दौरान रक्षाबंधन उत्सव को हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में लोकप्रिय बनाया तथा इसी आंदोलन के दौरान अमर सोनार बांग्ला गीत की रचना की, जो आगे चलकर बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
➣ 22 अक्टूबर, 1905 को जारी कार्लाइल परिपत्र द्वारा आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई की गई, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को बल मिला।
➣ 15 अगस्त, 1906 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद तथा बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई। अरविन्द घोष इसके प्रथम प्राचार्य बने।
➣ लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक एवं बिपिन चन्द्र पाल) भारतीय उग्र राष्ट्रवाद के प्रमुख नेता माने जाते हैं।
➣ अनुशीलन समिति की स्थापना 1902 ई. में प्रमथनाथ मित्र ने की, जबकि युगान्तर समूह का गठन 1906 ई. में बरीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ दत्त ने किया।
➣ 30 दिसम्बर, 1906 को ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसकी पृष्ठभूमि में बंगाल विभाजन की राजनीति का महत्वपूर्ण प्रभाव था।
➣ दिसम्बर, 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का नरमपंथी और उग्रपंथी विभाजन हुआ।
➣ अप्रैल, 1908 के मुजफ्फरपुर बम कांड ने ब्रिटिश सरकार को क्रांतिकारी गतिविधियों के विरुद्ध और अधिक कठोर दमनात्मक नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया।
➣ 1908 ई. में बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में मांडले जेल भेजा गया, जहाँ उन्होंने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ गीता रहस्य लिखा।
➣ 1908 ई. के अलीपुर बम षड्यंत्र केस के बाद अरविन्द घोष ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और 1910 ई. में पांडिचेरी चले गए।
➣ 1909 ई. के मार्ले-मिंटो सुधार (भारतीय परिषद अधिनियम, 1909) के अंतर्गत पहली बार पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू की गई।
➣ 12 दिसम्बर, 1911 को दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने बंगाल विभाजन को रद्द करने तथा भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की।
कालक्रम (Timeline)
| वर्ष / तिथि | घटना |
|---|---|
| 1 जून, 1903 | लॉर्ड कर्जन ने Territorial Redistribution Minute प्रस्तुत किया, जिससे बंगाल विभाजन की योजना को औपचारिक रूप मिला। |
| 1903 | कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में लालमोहन घोष ने बंगाल विभाजन की प्रस्तावित योजना का विरोध किया। |
| जनवरी, 1904 | ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन की योजना सार्वजनिक की। |
| फरवरी, 1904 | लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल का दौरा कर विभाजन के पक्ष में जनमत बनाने का प्रयास किया। |
| 2 फरवरी, 1905 | बंगाल विभाजन की अंतिम योजना भारत सचिव को अनुमोदन हेतु भेजी गई। |
| 19 जुलाई, 1905 | ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा की। |
| 7 अगस्त, 1905 | कलकत्ता टाउन हॉल में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। |
| 16 अक्टूबर, 1905 | बंगाल विभाजन लागू; शोक दिवस, रक्षाबंधन, अरंधन एवं गंगा स्नान के माध्यम से विरोध। |
| 22 अक्टूबर, 1905 | कार्लाइल परिपत्र जारी किया गया। |
| 16 नवम्बर, 1905 | राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने के लिए समिति गठित की गई। |
| 27–30 दिसम्बर, 1905 | कांग्रेस का बनारस अधिवेशन (अध्यक्ष – गोपाल कृष्ण गोखले)। |
| 25 जुलाई, 1906 | बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट की स्थापना। |
| 15 अगस्त, 1906 | राष्ट्रीय शिक्षा परिषद एवं बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना। |
| 1 अक्टूबर, 1906 | शिमला प्रतिनिधिमंडल ने लॉर्ड मिंटो से भेंट की। |
| 30 दिसम्बर, 1906 | ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना। |
| 26–29 दिसम्बर, 1906 | कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन (अध्यक्ष – दादाभाई नौरोजी)। |
| दिसम्बर, 1907 | कांग्रेस का सूरत विभाजन। |
| 1907 | लाला लाजपत राय एवं सरदार अजीत सिंह का मांडले निर्वासन। |
| अप्रैल, 1908 | मुजफ्फरपुर बम कांड (खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी)। |
| 1908 | बाल गंगाधर तिलक को मांडले जेल भेजा गया। |
| 1908–1909 | अलीपुर बम षड्यंत्र केस। |
| 1909 | मार्ले-मिंटो सुधार एवं पृथक निर्वाचन की व्यवस्था। |
| 1910 | अरविन्द घोष पांडिचेरी चले गए। |
| 12 दिसम्बर, 1911 | दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने बंगाल विभाजन रद्द करने तथा राजधानी दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की। |
| 1912 | बिहार-उड़ीसा नया प्रांत बना तथा असम पुनः पृथक प्रांत बना। |
अक्सर होने वाले भ्रम
➣ बंगाल विभाजन की घोषणा 19 जुलाई, 1905 को हुई थी, जबकि इसे 16 अक्टूबर, 1905 से लागू किया गया।
➣ 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई थी, जबकि 16 अक्टूबर, 1905 को विभाजन लागू होने के बाद यह आंदोलन पूरे देश में अधिक व्यापक हो गया।
➣ बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) और बंग-भंग आंदोलन (Anti-Partition Movement) एक ही घटना नहीं हैं। पहला ब्रिटिश सरकार का निर्णय था, जबकि दूसरा उसके विरोध में चला जनआंदोलन था।
➣ बनारस अधिवेशन (1905) में कांग्रेस ने स्वदेशी का समर्थन किया, लेकिन विदेशी वस्तुओं के पूर्ण एवं देशव्यापी बहिष्कार को आधिकारिक नीति के रूप में स्वीकार नहीं किया।
➣ कलकत्ता अधिवेशन (1906) में पहली बार कांग्रेस ने स्वराज को अपना घोषित लक्ष्य स्वीकार किया तथा स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज—इन चारों कार्यक्रमों का समर्थन किया।
➣ कार्लाइल परिपत्र (22 अक्टूबर, 1905) विद्यार्थियों को आंदोलन से रोकने के उद्देश्य से जारी किया गया था। इसी के विरोध ने राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को और अधिक गति प्रदान की।
➣ डॉन सोसायटी की स्थापना सतीशचन्द्र मुखर्जी ने की थी, जबकि स्वदेश बांधव समिति के संस्थापक अश्विनी कुमार दत्त थे।
➣ बंगाल नेशनल कॉलेज के प्रथम प्राचार्य अरविन्द घोष थे, जबकि बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट आगे चलकर जादवपुर विश्वविद्यालय के विकास का आधार बना।
➣ आमार सोनार बांग्ला की रचना रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। यही गीत बाद में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
➣ भारत माता का प्रसिद्ध चित्र अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने बनाया था, जबकि नन्दलाल बोस नव-बंगाल चित्रकला के प्रमुख कलाकार थे।
➣ बंगाल विभाजन को 12 दिसम्बर, 1911 को सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार में रद्द करने की घोषणा की थी।
➣ 1911 में राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की भी घोषणा की गई, जबकि बिहार-उड़ीसा का नया प्रांत 1912 में अस्तित्व में आया।
➣ UPSC/PCS में बार-बार पूछा जाता है कि लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया था, जबकि सम्राट जॉर्ज पंचम ने 1911 में इसे रद्द करने की घोषणा की थी।
➣ UPSC/PCS में यह भी पूछा जाता है कि स्वराज को कांग्रेस का घोषित लक्ष्य कलकत्ता अधिवेशन (1906) में स्वीकार किया गया था, न कि बनारस अधिवेशन (1905) में।
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