शेरशाह सूरी : प्रशासनिक व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी ने अपने अल्पकालीन (1540–1545 ई.) शासन में अत्यंत प्रभावशाली एवं संगठित प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। उसकी प्रशासनिक नीतियों का प्रभाव बाद में अकबर के शासनकाल में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
➣ शेरशाह के शासन की प्रमुख प्रशासनिक राजधानी दिल्ली एवं आगरा थीं, जहाँ से वह सम्पूर्ण साम्राज्य का संचालन करता था।
➣ शेरशाह के प्रशासन की जानकारी समकालीन इतिहासकार अब्बास खाँ सरवानी द्वारा रचित तारीख-ए-शेरशाही से प्राप्त होती है।
➣ इतिहासकारों के अनुसार शेरशाह की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था थी, न कि केवल उसकी सैनिक विजयें। इसी कारण उसे अकबर का पूर्वगामी (Forerunner of Akbar) कहा जाता है।
➣ शेरशाह ने कोई पूर्णतः नई प्रशासनिक व्यवस्था विकसित नहीं की, बल्कि दिल्ली सल्तनत की पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं में आवश्यक सुधार करके उन्हें अधिक प्रभावी एवं व्यवस्थित बनाया।
➣ इतिहासकार के. आर. कानूनगो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Sher Shah and His Times में स्पष्ट किया है कि शेरशाह का योगदान नई व्यवस्था स्थापित करने की अपेक्षा पुरानी प्रशासनिक प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना था।
प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| शासन का स्वरूप | केन्द्रीयकृत एवं सुदृढ़ प्रशासन |
| प्रमुख उपलब्धि | प्रशासनिक सुधार |
| प्रशासन का आधार | सल्तनत काल की व्यवस्था में सुधार |
| प्रशासनिक प्रभाव | अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था का आधार |
| मुख्य स्रोत | तारीख-ए-शेरशाही |
शेरशाह सूरी का प्रशासनिक ढाँचा
| प्रशासनिक स्तर | मुख्य अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| साम्राज्य | सुल्तान | सम्पूर्ण शासन का संचालन |
| प्रान्त (सूबा / इक्ता) | हाकिम / फौजदार | प्रान्तीय प्रशासन |
| सरकार (जिला) | शिकदार-ए-शिकदारान एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान | कानून-व्यवस्था एवं राजस्व |
| परगना | शिकदार एवं मुंसिफ | स्थानीय प्रशासन एवं लगान |
| ग्राम | मुकद्दम, पटवारी एवं चौकीदार | ग्राम प्रशासन |
केन्द्रीय प्रशासन
➣ शेरशाह के शासन में समस्त प्रशासनिक शक्तियाँ सुल्तान में निहित थीं। अंतिम निर्णय का अधिकार केवल शेरशाह के पास था।
➣ मंत्री स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं लेते थे, बल्कि वे शासक के आदेशों का पालन करते हुए अपने-अपने विभागों का संचालन करते थे।
➣ दिल्ली सल्तनत की परम्परा के अनुसार शेरशाह ने विभिन्न प्रशासनिक विभागों का गठन किया, जिनके माध्यम से शासन का संचालन किया जाता था।
केन्द्रीय प्रशासन के प्रमुख विभाग
| विभाग | प्रमुख अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| दीवान-ए-वजारत | वजीर | राजस्व, वित्त एवं समस्त आर्थिक कार्यों की देखरेख। |
| दीवान-ए-अर्ज (आरिज) | आरिज-ए-मुमालिक | सैन्य प्रशासन, सेना का संगठन एवं सैन्य अभिलेख। |
| दीवान-ए-रिसालत | — | विदेशी राज्यों से पत्र-व्यवहार; कुछ इतिहासकार इसे धार्मिक मामलों से भी सम्बद्ध मानते हैं। |
| दीवान-ए-इंशा | — | शाही आदेशों का लेखन, अभिलेख एवं सरकारी पत्राचार। |
| दीवान-ए-कज़ा | काज़ी | न्यायिक व्यवस्था एवं दीवानी-फौजदारी मामलों की देखरेख। |
| दीवान-ए-बरीद | बरीद-ए-मुमालिक | गुप्तचर विभाग एवं डाक व्यवस्था का संचालन। |
प्रमुख विभागों का संक्षिप्त विवरण
➣ दीवान-ए-वजारत राज्य का सबसे महत्वपूर्ण विभाग था। इसका अध्यक्ष वजीर होता था, जो वित्तीय प्रशासन के साथ अन्य विभागों की भी निगरानी करता था।
➣ दीवान-ए-अर्ज का प्रमुख आरिज-ए-मुमालिक कहलाता था। यद्यपि सैन्य विभाग उसके अधीन था, फिर भी सैनिकों की भर्ती एवं सर्वोच्च सेनापति का कार्य स्वयं शेरशाह करता था।
➣ दीवान-ए-रिसालत अन्य राज्यों के साथ संबंध बनाए रखने का कार्य करता था। कुछ इतिहासकार इसे धार्मिक मामलों एवं दान-संबंधी कार्यों से भी जोड़ते हैं।
➣ दीवान-ए-इंशा शाही आदेशों, सरकारी पत्राचार तथा अभिलेखों के संरक्षण का उत्तरदायी था।
➣ दीवान-ए-कज़ा न्याय विभाग था, जिसका प्रमुख अधिकारी काज़ी होता था।
➣ दीवान-ए-बरीद गुप्तचर विभाग के साथ-साथ डाक व्यवस्था का संचालन भी करता था। इसका प्रमुख बरीद-ए-मुमालिक कहलाता था।
केंद्रीय प्रशासन की विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| सर्वोच्च शक्ति | सुल्तान |
| मंत्रियों की स्थिति | सुल्तान के प्रति उत्तरदायी |
| शासन का स्वरूप | केन्द्रीयकृत |
| प्रमुख विभाग | वजारत, अर्ज, रिसालत, इंशा, कज़ा एवं बरीद |
✓ शेरशाह के प्रशासन का प्रमुख स्रोत: तारीख-ए-शेरशाही (अब्बास खाँ सरवानी)
✓ शेरशाह को अकबर का क्या कहा जाता है? पूर्वगामी (Forerunner)
✓ राजस्व विभाग: दीवान-ए-वजारत
✓ सैन्य विभाग: दीवान-ए-अर्ज
✓ गुप्तचर विभाग: दीवान-ए-बरीद
✓ न्याय विभाग: दीवान-ए-कज़ा
✓ डाक एवं गुप्तचर विभाग का प्रमुख: बरीद-ए-मुमालिक
प्रान्तीय प्रशासन
➣ शेरशाह सूरी का साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था। प्रशासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए उसने अपने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों (सूबों/इक्ताओं) में विभाजित किया।
➣ यद्यपि शेरशाह के समय सम्पूर्ण साम्राज्य में एक समान प्रान्तीय व्यवस्था नहीं थी, फिर भी अधिकांश क्षेत्रों में इक्ता प्रणाली को प्रशासनिक आधार बनाया गया।
➣ बंगाल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विद्रोहों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था अपनाई गई थी।
प्रान्तीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रशासनिक इकाई | सूबा / इक्ता |
| मुख्य अधिकारी | हाकिम / फौजदार (कुछ क्षेत्रों में) |
| मुख्य उत्तरदायित्व | शांति व्यवस्था, सैन्य नियंत्रण एवं प्रशासन |
| केंद्रीय नियंत्रण | सुल्तान का प्रत्यक्ष नियंत्रण |
सूबा एवं इक्ता व्यवस्था
➣ शेरशाह ने अपने साम्राज्य को अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया, जिन्हें सामान्यतः सूबा अथवा इक्ता कहा जाता था।
➣ प्रत्येक प्रान्त का सर्वोच्च अधिकारी हाकिम अथवा फौजदार होता था, जो कानून-व्यवस्था, सैन्य नियंत्रण तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए उत्तरदायी था।
➣ अनेक प्रान्तों में गवर्नर के अधीन सैनिक टुकड़ियाँ रहती थीं, जिससे विद्रोहों एवं सीमावर्ती क्षेत्रों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| हाकिम | प्रान्तीय प्रशासन एवं शासन |
| फौजदार | सैन्य एवं कानून-व्यवस्था |
| मोमिन / अमीन | कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक सहयोगी अधिकारी |
बंगाल की विशेष प्रशासनिक व्यवस्था
➣ शेरशाह के शासनकाल में बंगाल सबसे संवेदनशील प्रान्त था, क्योंकि वहाँ समय-समय पर विद्रोह होते रहते थे।
➣ इन विद्रोहों पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए बंगाल को अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया तथा वहाँ के अधिकारियों पर केन्द्र का नियंत्रण अपेक्षाकृत अधिक रखा गया।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मुख्य समस्या | बार-बार होने वाले विद्रोह |
| प्रशासनिक नीति | केंद्रीय नियंत्रण को मजबूत करना |
| उद्देश्य | राजस्व संग्रह एवं शांति व्यवस्था बनाए रखना |
सरकारों (जिलों) की संख्या
➣ शेरशाह के प्रशासनिक विभाजन के संबंध में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में संख्या को लेकर मतभेद मिलता है।
| स्रोत | सरकारों की संख्या |
|---|---|
| अनेक प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकों में | 47 सरकार |
| अब्बास खाँ सरवानी (तारीख-ए-शेरशाही) | 66 सरकार |
➣ प्रतियोगी परीक्षाओं में दोनों तथ्य मिलते हैं, इसलिए उत्तर लिखते समय प्रश्न के स्रोत अथवा परीक्षा की मानक पुस्तक का ध्यान रखना चाहिए।
प्रान्तीय प्रशासन की प्रशासनिक संरचना
| प्रशासनिक इकाई | मुख्य अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| सूबा / इक्ता | हाकिम / फौजदार | प्रान्तीय प्रशासन |
| सरकार (जिला) | शिकदार-ए-शिकदारान एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान | कानून-व्यवस्था एवं राजस्व |
| परगना | शिकदार एवं मुंसिफ | स्थानीय प्रशासन |
| ग्राम | मुकद्दम, पटवारी एवं चौकीदार | ग्राम प्रशासन |
✓ शेरशाह के समय प्रान्त को क्या कहा जाता था? सूबा / इक्ता
✓ प्रान्त का प्रमुख अधिकारी: हाकिम / फौजदार
✓ सबसे संवेदनशील प्रान्त: बंगाल
✓ बंगाल में विशेष व्यवस्था क्यों की गई? बार-बार होने वाले विद्रोह
✓ प्रतियोगी पुस्तकों में सरकारों की संख्या: 47
✓ तारीख-ए-शेरशाही के अनुसार सरकारों की संख्या: 66
✓ प्रान्त के मुख्य अधिकारी: हाकिम / फौजदार
सरकार (जिला) प्रशासन
➣ शेरशाह सूरी ने प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक प्रान्त (इक्ता) को अनेक सरकारों (जिलों) में विभाजित किया था।
➣ प्रत्येक सरकार में प्रशासनिक एवं राजस्व शक्तियों का विभाजन अलग-अलग अधिकारियों के बीच किया गया था, जिससे किसी एक अधिकारी के हाथ में अत्यधिक शक्ति केन्द्रित न हो।
➣ प्रत्येक सरकार में मुख्यतः दो सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त किए जाते थे— शिकदार-ए-शिकदारान तथा मुंसिफ-ए-मुंसिफान।
सरकार (जिला) के प्रमुख अधिकारी
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| शिकदार-ए-शिकदारान | कानून-व्यवस्था बनाए रखना, सैनिक व्यवस्था एवं फौजदारी मामलों की देखरेख। |
| मुंसिफ-ए-मुंसिफान | राजस्व संग्रह, भूमि अभिलेख तथा दीवानी मामलों का निपटारा। |
➣ शिकदार-ए-शिकदारान सरकार का सबसे प्रभावशाली अधिकारी माना जाता था। उसके अधीन सैनिक बल रहता था तथा वह शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता था।
➣ मुंसिफ-ए-मुंसिफान का मुख्य कार्य राजस्व व्यवस्था, लेखा-जोखा तथा दीवानी न्याय से संबंधित मामलों की देखरेख करना था।
➣ बंगाल में शिकदार-ए-शिकदारान की नियुक्ति सीधे केंद्रीय सरकार द्वारा की जाती थी, जबकि अन्य क्षेत्रों में इनकी नियुक्ति सामान्यतः हाकिम अथवा फौजदार के माध्यम से होती थी।
सरकार प्रशासन की विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख इकाई | सरकार (जिला) |
| मुख्य अधिकारी | शिकदार-ए-शिकदारान एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान |
| मुख्य उद्देश्य | कानून-व्यवस्था एवं राजस्व प्रशासन |
| विशेषता | प्रशासनिक एवं राजस्व शक्तियों का पृथक्करण |
परगना प्रशासन
➣ प्रत्येक सरकार (जिला) अनेक परगनों में विभाजित होती थी। परगना प्रशासन स्थानीय स्तर पर राजस्व एवं कानून-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण इकाई था।
➣ प्रत्येक परगना में प्रशासनिक एवं राजस्व कार्यों के लिए अनेक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
परगना के प्रमुख अधिकारी
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| शिकदार | कानून-व्यवस्था, सुरक्षा एवं सैनिक दल का नेतृत्व। |
| मुंसिफ | भूमि मापन, लगान निर्धारण एवं दीवानी मुकदमों का निर्णय। |
| फोतदार | खजांची के रूप में राजस्व राशि की सुरक्षा। |
| कारकून | लेखा-जोखा एवं अभिलेख तैयार करना। सामान्यतः दो कारकून नियुक्त होते थे। |
➣ शिकदार के साथ एक सैनिक टुकड़ी रहती थी, जो परगने में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में उसकी सहायता करती थी।
➣ मुंसिफ भूमि की नाप, लगान निर्धारण तथा दीवानी न्याय का प्रमुख अधिकारी था।
➣ फोतदार राजकोष का संरक्षक होता था, जबकि कारकून लेखा एवं अभिलेखों का संधारण करते थे।
सरकार एवं परगना प्रशासन में अंतर
| आधार | सरकार (जिला) | परगना |
|---|---|---|
| प्रशासनिक स्तर | उच्च | स्थानीय |
| मुख्य अधिकारी | शिकदार-ए-शिकदारान एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान | शिकदार एवं मुंसिफ |
| मुख्य कार्य | जिले का प्रशासन | भूमि, लगान एवं स्थानीय व्यवस्था |
| राजस्व नियंत्रण | व्यापक स्तर | स्थानीय स्तर |
✓ सरकार (जिला) का प्रमुख सैनिक अधिकारी: शिकदार-ए-शिकदारान
✓ सरकार का प्रमुख राजस्व अधिकारी: मुंसिफ-ए-मुंसिफान
✓ परगना का सैनिक अधिकारी: शिकदार
✓ परगना का राजस्व अधिकारी: मुंसिफ
✓ खजांची: फोतदार
✓ लेखा रखने वाले अधिकारी: कारकून
✓ बंगाल में शिकदार-ए-शिकदारान की नियुक्ति कौन करता था? केंद्रीय सरकार
ग्राम प्रशासन
➣ ग्राम शेरशाह सूरी के प्रशासन की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई थी। गाँव के दैनिक प्रशासन में शेरशाह ने परम्परागत व्यवस्था को बनाए रखा तथा उसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया।
➣ ग्राम प्रशासन का उद्देश्य शांति व्यवस्था बनाए रखना, भू-राजस्व का अभिलेख रखना तथा कृषि व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करना था।
➣ शेरशाह ने स्थानीय अधिकारियों को सरकारी मान्यता देकर प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाया।
ग्राम के प्रमुख अधिकारी
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| मुकद्दम (मुखिया) | गाँव का प्रधान, शांति व्यवस्था बनाए रखना तथा ग्रामीणों का नेतृत्व करना। |
| पटवारी | भूमि, कृषकों, फसलों एवं भू-राजस्व का अभिलेख रखना। |
| चौकीदार | ग्राम की सुरक्षा एवं अपराधों की सूचना देना। |
| प्रधान | स्थानीय प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करना। |
➣ मुकद्दम ग्राम का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी था। वह ग्रामीणों एवं सरकार के बीच संपर्क स्थापित करता था तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता था।
➣ पटवारी भूमि की माप, किसानों की जोत, उपज तथा लगान से संबंधित अभिलेख तैयार करता था।
➣ चौकीदार ग्राम की सुरक्षा तथा अपराधियों की सूचना प्रशासन तक पहुँचाने का कार्य करता था।
ग्राम प्रशासन की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| सबसे छोटी इकाई | ग्राम |
| प्रमुख अधिकारी | मुकद्दम |
| भूमि अभिलेख | पटवारी |
| सुरक्षा व्यवस्था | चौकीदार |
| विशेषता | परम्परागत ग्राम व्यवस्था को बनाए रखा गया। |
प्रमुख अधिकारियों का एक दृष्टि में सार
| अधिकारी | विभाग / स्तर | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| वजीर | दीवान-ए-वजारत | राजस्व एवं वित्त |
| आरिज-ए-मुमालिक | दीवान-ए-अर्ज | सैन्य प्रशासन |
| काज़ी | दीवान-ए-कज़ा | न्याय व्यवस्था |
| बरीद-ए-मुमालिक | दीवान-ए-बरीद | गुप्तचर एवं डाक व्यवस्था |
| हाकिम / फौजदार | प्रान्त | प्रान्तीय प्रशासन |
| शिकदार-ए-शिकदारान | सरकार (जिला) | कानून-व्यवस्था |
| मुंसिफ-ए-मुंसिफान | सरकार (जिला) | राजस्व एवं दीवानी न्याय |
| मुकद्दम | ग्राम | ग्राम का प्रधान |
| पटवारी | ग्राम | भूमि एवं लगान अभिलेख |
✓ शेरशाह के प्रशासन की सबसे छोटी इकाई: ग्राम
✓ ग्राम का प्रमुख अधिकारी: मुकद्दम (मुखिया)
✓ भूमि अभिलेख रखने वाला अधिकारी: पटवारी
✓ ग्राम की सुरक्षा का अधिकारी: चौकीदार
✓ प्रान्त का प्रमुख अधिकारी: हाकिम / फौजदार
✓ सरकार (जिला) का सैनिक अधिकारी: शिकदार-ए-शिकदारान
✓ सरकार (जिला) का राजस्व अधिकारी: मुंसिफ-ए- मुंसिफान
✓ परगना का राजस्व अधिकारी: मुंसिफ
✓ शेरशाह को अकबर का क्या कहा जाता है? पूर्वगामी (Forerunner of Akbar)
भू-राजस्व व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी की वित्त व्यवस्था का मुख्य आधार भू-राजस्व (लगान) था। राज्य की अधिकांश आय भूमि पर लगाए जाने वाले कर से प्राप्त होती थी।
➣ शेरशाह ने किसानों एवं राज्य के बीच प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। उसकी भू-राजस्व व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका सीमित थी, इसलिए इसे रैय्यतवाड़ी प्रवृत्ति की व्यवस्था माना जाता है।
➣ मुल्तान को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रों में किसानों से प्रत्यक्ष रूप से भू-राजस्व वसूला जाता था।
➣ मुल्तान में पूर्व से प्रचलित बटाई (हिस्सेदारी) व्यवस्था को यथावत रखा गया तथा वहाँ सामान्यतः उत्पादन का 1/4 भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।
➣ किसानों को भू-राजस्व नकद अथवा अनाज—दोनों रूपों में देने की सुविधा थी, किन्तु राज्य नकद भुगतान को अधिक प्रोत्साहित करता था।
➣ शेरशाह की भू-राजस्व व्यवस्था आगे चलकर अकबर के टोडरमल के बंदोबस्त (जब्ती प्रणाली) की नींव बनी। इसलिए शेरशाह को अकबर के राजस्व सुधारों का पूर्वाधार भी कहा जाता है।
शेरशाह की भू-राजस्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| मुख्य आय का स्रोत | भू-राजस्व (लगान) |
| राजस्व व्यवस्था | किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क |
| भुगतान का माध्यम | नकद अथवा अनाज |
| सामान्य लगान | उत्पादन का लगभग 1/3 भाग |
| मुल्तान | बटाई व्यवस्था, लगभग 1/4 उत्पादन |
भूमि का वर्गीकरण
➣ शेरशाह ने भूमि की उर्वरता एवं उत्पादन क्षमता के आधार पर भूमि को तीन श्रेणियों में विभाजित किया।
| भूमि का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| अच्छी | अधिक उपज देने वाली भूमि |
| मध्यम | सामान्य उत्पादन वाली भूमि |
| खराब | कम उत्पादन देने वाली भूमि |
➣ इन तीनों श्रेणियों के औसत उत्पादन के आधार पर भूमि कर निर्धारित किया जाता था।
कर निर्धारण की प्रमुख प्रणालियाँ
➣ शेरशाह ने भूमि कर निर्धारण के लिए मुख्यतः तीन प्रणालियों का उपयोग किया।
| प्रणाली | अन्य नाम | आधार |
|---|---|---|
| गलाबख्शी | बटाई | उपज का वास्तविक बँटवारा |
| नस्क / मुक्ताई | कनकूत | अनुमानित उत्पादन के आधार पर कर |
| नकदी | जब्ती / जमई | भूमि माप एवं निर्धारित दर के आधार पर नकद कर |
➣ शेरशाह ने कर निर्धारण के लिए राई (फसलों एवं उनकी दरों की सूची) तैयार करवाई, जिसके आधार पर विभिन्न फसलों का औसत उत्पादन निर्धारित किया जाता था।
➣ सामान्यतः औसत उत्पादन का 1/3 भाग भू-राजस्व के रूप में वसूला जाता था।
➣ किसानों को सुविधानुसार तीनों प्रणालियों में से किसी भी प्रणाली को अपनाने की अनुमति थी, किन्तु जब्ती (जमई) व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय थी।
तीनों प्रणालियों की तुलना
| आधार | बटाई | कनकूत | जब्ती |
|---|---|---|---|
| कर निर्धारण | वास्तविक उपज | अनुमानित उपज | भूमि मापन |
| भुगतान | उपज का हिस्सा | अनुमानित हिस्सा | मुख्यतः नकद |
| लोकप्रियता | क्षेत्र विशेष | सीमित | सबसे अधिक लोकप्रिय |
अतिरिक्त कर
➣ भू-राजस्व के अतिरिक्त किसानों से कुछ सहायक शुल्क भी लिए जाते थे।
| कर | उद्देश्य | दर |
|---|---|---|
| जरीवाना | भूमि मापन (सर्वेक्षण) शुल्क | भू-राजस्व का 2.5% |
| महासिलाना | राजस्व संग्रह शुल्क | भू-राजस्व का 5% |
✓ शेरशाह की आय का मुख्य स्रोत: भू-राजस्व (लगान)
✓ भूमि की श्रेणियाँ: अच्छी, मध्यम एवं खराब
✓ सामान्य भू-राजस्व: उत्पादन का लगभग 1/3 भाग
✓ मुल्तान में भू-राजस्व: उत्पादन का लगभग 1/4 भाग
✓ भूमि कर निर्धारण की प्रमुख प्रणालियाँ: बटाई, कनकूत एवं जब्ती
✓ राई क्या थी? फसलों एवं उनकी दरों की सूची
✓ जरीवाना: भूमि मापन शुल्क
✓ महासिलाना: कर संग्रह शुल्क
पट्टा एवं कबूलियत व्यवस्था
➣ किसानों को शोषण से बचाने तथा भू-राजस्व व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से शेरशाह सूरी ने पट्टा एवं कबूलियत व्यवस्था को प्रचलित किया।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत राज्य एवं किसान के बीच भू-राजस्व संबंधी शर्तों को लिखित रूप दिया जाता था, जिससे मनमानी वसूली की संभावना कम हो जाती थी।
पट्टा एवं कबूलियत में अंतर
| आधार | पट्टा | कबूलियत |
|---|---|---|
| स्वरूप | राजकीय दस्तावेज | किसान द्वारा दिया गया स्वीकृति-पत्र |
| जारीकर्ता | राज्य | किसान |
| विवरण | भूमि, फसल, लगान एवं राजस्व की शर्तें | निर्धारित लगान स्वीकार करने की सहमति |
| उद्देश्य | राजस्व की स्पष्ट जानकारी देना | भू-राजस्व भुगतान की स्वीकृति |
➣ पट्टा में भूमि का क्षेत्रफल, फसल, अनुमानित उत्पादन तथा देय भू-राजस्व का विवरण अंकित रहता था।
➣ कबूलियत वह लिखित स्वीकृति थी जिसमें किसान निर्धारित भू-राजस्व का भुगतान करने की सहमति देता था।
भूमि की माप
➣ शेरशाह ने भू-राजस्व निर्धारण को अधिक वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित बनाने के लिए कृषि योग्य तथा परती—दोनों प्रकार की भूमि का सर्वेक्षण एवं मापन कराया।
➣ भूमि मापन के कार्य में अहमद खाँ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
| मापन का साधन | विवरण |
|---|---|
| सिकन्दरी गज | 39 अंगुल (लगभग 32 इंच) लंबाई का मानक गज |
| सन की जरीब | भूमि मापन हेतु प्रयुक्त रस्सी (डोरी) |
➣ शेरशाह ने भूमि की माप के लिए सिकन्दरी गज तथा सन की जरीब का प्रयोग कराया। बाद में अकबर ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भूमि मापन व्यवस्था को और अधिक विकसित किया।
जरीब
➣ जरीब भूमि की माप के लिए प्रयुक्त रस्सी अथवा डोरी थी। शेरशाह ने इसे राजस्व निर्धारण का महत्वपूर्ण आधार बनाया।
➣ जरीब द्वारा भूमि का मापन करने से कर निर्धारण अधिक नियमित एवं अपेक्षाकृत निष्पक्ष हो गया।
शेरशाह के भू-राजस्व सुधार
| सुधार | महत्व |
|---|---|
| भूमि मापन | वैज्ञानिक आधार पर कर निर्धारण |
| पट्टा व्यवस्था | किसानों को राजस्व की स्पष्ट जानकारी |
| कबूलियत व्यवस्था | राज्य एवं किसान के बीच लिखित समझौता |
| जरीब का प्रयोग | भूमि मापन में एकरूपता |
| औसत उत्पादन पर कर | सामान्यतः उपज का लगभग 1/3 भाग |
| नकद भुगतान को प्रोत्साहन | राजस्व संग्रह को सरल बनाना |
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
➣ शेरशाह ने अपने कुछ सिक्कों एवं राजकीय अभिलेखों पर देवनागरी लिपि का भी प्रयोग कराया, जिससे उसकी प्रशासनिक व्यावहारिकता एवं भारतीय परंपराओं के प्रति दृष्टिकोण का परिचय मिलता है।
➣ शेरशाह की भू-राजस्व व्यवस्था ने आगे चलकर अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल द्वारा विकसित भू-राजस्व प्रणाली के लिए आधार तैयार किया।
✓ पट्टा क्या था? राज्य द्वारा जारी भू-राजस्व संबंधी दस्तावेज
✓ कबूलियत क्या थी? किसान द्वारा दिया गया स्वीकृति-पत्र
✓ भूमि मापन में किसने सहायता की? अहमद खाँ
✓ भूमि मापन का मानक: सिकन्दरी गज
✓ सिकन्दरी गज की लंबाई: 39 अंगुल (लगभग 32 इंच)
✓ भूमि मापन की रस्सी: सन की जरीब
✓ जरीब का उपयोग: भूमि की माप
✓ शेरशाह की व्यवस्था को आगे किसने विकसित किया? अकबर के समय राजा टोडरमल ने
न्याय व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी न्यायप्रिय, निष्पक्ष एवं कठोर शासक था। वह स्वयं को प्रजा के प्रति उत्तरदायी मानता था तथा न्याय को शासन का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानता था।
➣ शेरशाह साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था। वह प्रत्येक बुधवार को स्वयं दरबार में बैठकर महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई करता था।
➣ शेरशाह का मानना था कि “न्याय करना सभी धार्मिक कार्यों में सर्वोत्तम है और इसे प्रत्येक शासक—चाहे वह मुसलमान हो या गैर-मुसलमान—को अपनाना चाहिए।”
➣ उसकी न्याय व्यवस्था का उद्देश्य अपराधियों को कठोर दण्ड देकर राज्य में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना था।
शेरशाह की न्यायप्रियता
➣ समकालीन इतिहासकार अब्बास खाँ सरवानी ने शेरशाह की न्यायप्रियता का वर्णन करते हुए लिखा है कि—
“शेरशाह के राज्य में एक वृद्धा अपने सिर पर स्वर्णाभूषणों से भरी टोकरी लेकर निर्भय होकर यात्रा कर सकती थी, क्योंकि किसी चोर अथवा डाकू में उसे लूटने का साहस नहीं होता था।”
➣ यह वर्णन शेरशाह के शासनकाल में कानून-व्यवस्था की सुदृढ़ता एवं अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।
न्यायिक अधिकारी
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| सुल्तान | सर्वोच्च न्यायाधीश |
| काज़ी | न्यायिक मामलों की सुनवाई एवं न्याय प्रदान करना |
| मुंसिफ | परगना स्तर पर दीवानी मुकदमों का निर्णय |
| मुंसिफ-ए-मुंसिफान | सरकार (जिला) स्तर पर दीवानी न्याय एवं राजस्व संबंधी मामलों की देखरेख |
| शिकदार | परगना स्तर पर फौजदारी मामलों एवं कानून-व्यवस्था की देखरेख |
| शिकदार-ए-शिकदारान | सरकार (जिला) स्तर पर फौजदारी न्याय एवं शांति व्यवस्था |
➣ मुंसिफ एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान मुख्यतः दीवानी (सिविल) मामलों का निर्णय करते थे।
➣ शिकदार एवं शिकदार-ए-शिकदारान फौजदारी (आपराधिक) मामलों तथा कानून-व्यवस्था की देखरेख करते थे।
➣ काज़ी न्यायिक मामलों का प्रमुख अधिकारी था तथा उच्च स्तर के मुकदमों की सुनवाई करता था।
➣ गाँवों के छोटे-मोटे विवादों का निपटारा प्रायः ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता था।
पुलिस व्यवस्था
➣ शेरशाह के शासनकाल में आधुनिक अर्थों में पृथक पुलिस विभाग नहीं था।
➣ प्रशासनिक अधिकारियों को ही अपने-अपने क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा अपराधों को नियंत्रित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था।
➣ शेरशाह ने पुलिस व्यवस्था में उत्तरदायित्व के सिद्धांत को अपनाया। इसके अनुसार जिस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में अपराध होता था, उसी अधिकारी को उसके लिए उत्तरदायी माना जाता था।
पुलिस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| स्तर | उत्तरदायी अधिकारी |
|---|---|
| सरकार (जिला) | शिकदार-ए-शिकदारान |
| परगना | शिकदार |
| ग्राम | मुकद्दम, चौधरी एवं चौकीदार |
➣ ग्राम स्तर पर मुकद्दम, चौधरी तथा चौकीदार मिलकर शांति व्यवस्था बनाए रखते थे तथा अपराध होने पर उसकी सूचना उच्च अधिकारियों तक पहुँचाते थे।
न्याय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| सर्वोच्च न्यायाधीश | शेरशाह सूरी |
| न्याय दिवस | प्रत्येक बुधवार |
| दीवानी न्याय | मुंसिफ एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान |
| फौजदारी न्याय | शिकदार एवं शिकदार-ए-शिकदारान |
| स्थानीय न्याय | ग्राम पंचायत |
| पुलिस व्यवस्था | पृथक पुलिस विभाग नहीं था |
✓ शेरशाह के समय सर्वोच्च न्यायाधीश कौन था? स्वयं शेरशाह सूरी
✓ शेरशाह किस दिन न्याय करता था? प्रत्येक बुधवार
✓ दीवानी मुकदमों का निर्णय कौन करता था? मुंसिफ एवं मुंसिफ-ए-मुंसिफान
✓ फौजदारी मुकदमों का निर्णय कौन करता था? शिकदार एवं शिकदार-ए-शिकदारान
✓ ग्राम स्तर पर विवादों का निपटारा कौन करता था? ग्राम पंचायत
✓ क्या पृथक पुलिस विभाग था? नहीं
✓ पुलिस व्यवस्था किस सिद्धांत पर आधारित थी? उत्तरदायित्व का सिद्धांत
गुप्तचर विभाग एवं डाक व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी ने अपने विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने के लिए सुदृढ़ गुप्तचर विभाग एवं संगठित डाक व्यवस्था का विकास किया।
➣ राजनीतिक अस्थिरता एवं समय-समय पर होने वाले विद्रोहों को देखते हुए शेरशाह का मानना था कि शासक को साम्राज्य के प्रत्येक भाग की घटनाओं की जानकारी समय पर मिलनी चाहिए।
➣ गुप्तचर एवं डाक व्यवस्था का संचालन मुख्यतः दीवान-ए-बरीद के अधीन होता था, जिसका प्रमुख अधिकारी बरीद-ए-मुमालिक कहलाता था।
गुप्तचर विभाग
➣ शेरशाह ने राज्य के विभिन्न भागों में गुप्तचर (बरीद) नियुक्त किए, जो प्रशासनिक गतिविधियों, कानून-व्यवस्था तथा अधिकारियों के कार्यों की नियमित सूचना राजधानी तक पहुँचाते थे।
➣ गुप्तचर सरायों, प्रमुख बाजारों, व्यापारिक मार्गों तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष रूप से नियुक्त किए जाते थे।
➣ गुप्तचर विभाग के कारण शेरशाह को साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों की घटनाओं की जानकारी शीघ्र प्राप्त हो जाती थी, जिससे विद्रोहों एवं प्रशासनिक अनियमितताओं पर तत्काल नियंत्रण संभव हो पाता था।
गुप्तचर विभाग की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख विभाग | दीवान-ए-बरीद |
| प्रधान अधिकारी | बरीद-ए-मुमालिक |
| मुख्य कार्य | गुप्त सूचनाएँ एकत्र करना एवं शासक तक पहुँचाना |
| कार्य क्षेत्र | सराय, बाजार, प्रमुख मार्ग एवं सीमावर्ती क्षेत्र |
| मुख्य उद्देश्य | प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण एवं विद्रोहों की रोकथाम |
डाक व्यवस्था
➣ शेरशाह ने प्रशासनिक कार्यों को तीव्र गति से संचालित करने के लिए एक प्रभावशाली डाक व्यवस्था स्थापित की।
➣ प्रमुख राजमार्गों पर नियमित अंतराल पर सराय स्थापित की गई थीं, जहाँ से शाही संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्र पहुँचाए जाते थे।
➣ प्रत्येक सराय में डाक एवं संदेश भेजने के लिए घोड़े तथा आवश्यक कर्मचारी नियुक्त रहते थे।
➣ डाक व्यवस्था का उपयोग केवल शाही पत्राचार के लिए ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सूचनाओं तथा गुप्तचर रिपोर्टों के आदान-प्रदान के लिए भी किया जाता था।
डाक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| व्यवस्था | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|
| सराय | यात्रियों एवं डाक व्यवस्था का प्रमुख केंद्र |
| घुड़सवार संदेशवाहक | समाचार एवं शाही आदेशों का तीव्र संचार |
| डाक चौकियाँ | नियमित अंतराल पर संदेशों का आदान-प्रदान |
| गुप्तचर रिपोर्ट | राजधानी तक शीघ्र पहुँचाना |
गुप्तचर एवं डाक व्यवस्था का महत्व
| क्षेत्र | महत्व |
|---|---|
| प्रशासन | सम्राट का साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण |
| सुरक्षा | विद्रोह एवं षड्यंत्र की समय रहते सूचना |
| संचार | शाही आदेशों का शीघ्र प्रसारण |
| व्यापार | राजमार्गों एवं सरायों के माध्यम से सुरक्षित आवागमन |
✓ गुप्तचर विभाग का प्रमुख विभाग: दीवान-ए-बरीद
✓ गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी: बरीद-ए-मुमालिक
✓ गुप्तचर कहाँ नियुक्त किए जाते थे? सराय, बाजार एवं प्रमुख मार्गों पर
✓ डाक व्यवस्था का मुख्य आधार: सराय एवं घुड़सवार संदेशवाहक
✓ डाक व्यवस्था का उद्देश्य: शाही आदेश एवं सूचनाओं का तीव्र संचार
✓ गुप्तचर एवं डाक व्यवस्था का मुख्य लाभ: साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण
मुद्रा-प्रणाली
➣ शेरशाह सूरी के प्रशासनिक सुधारों में मुद्रा सुधार का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उसकी सुव्यवस्थित मुद्रा प्रणाली ने व्यापार, वाणिज्य तथा शिल्प उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ शेरशाह के शासनकाल में लगभग 23 टकसालें कार्यरत थीं, जहाँ मानक सिक्कों का निर्माण किया जाता था।
➣ उसने प्रचलित मिश्रित धातुओं एवं खोटे सिक्कों के स्थान पर सोने, चाँदी एवं ताँबे के शुद्ध एवं निश्चित मानक वाले सिक्के जारी किए।
➣ शेरशाह की मुद्रा प्रणाली इतनी प्रभावशाली थी कि बाद में मुगल शासकों, विशेषकर अकबर, ने भी इसी प्रणाली को अपनाया और आगे विकसित किया।
शेरशाह के प्रमुख सिक्के
| सिक्का | धातु | विशेषता |
|---|---|---|
| अशरफी (अशरफ) | सोना | उच्च मूल्य का स्वर्ण सिक्का |
| रुपया | चाँदी | मानक चाँदी का सिक्का |
| दाम | ताँबा | सामान्य लेन-देन हेतु प्रचलित सिक्का |
प्रमुख सिक्कों का विवरण
➣ अशरफी शेरशाह का स्वर्ण सिक्का था, जिसका भार लगभग 167 ग्रेन माना जाता है। इसे कुछ स्रोतों में अशरफ भी कहा गया है।
➣ रुपया नामक मानक चाँदी का सिक्का सर्वप्रथम शेरशाह सूरी ने प्रचलित किया। इसका भार लगभग 178 ग्रेन (लगभग 11.5 ग्राम) था।
➣ दाम ताँबे का सिक्का था, जिसका उपयोग सामान्य व्यापार एवं दैनिक लेन-देन में किया जाता था। इसका भार लगभग 380 ग्रेन था।
➣ शेरशाह ने दाम के आधे, चौथाई एवं सोलहवें भाग के सिक्के भी जारी किए, जिससे छोटे लेन-देन को सुविधा मिली।
सिक्कों का मानक
| सिक्का | धातु | मानक भार |
|---|---|---|
| अशरफी | सोना | लगभग 167 ग्रेन |
| रुपया | चाँदी | लगभग 178 ग्रेन |
| दाम | ताँबा | लगभग 380 ग्रेन |
रुपये का महत्व
➣ शेरशाह द्वारा प्रचलित चाँदी का रुपया भारतीय मुद्रा इतिहास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।
➣ इतिहासकार वी. ए. स्मिथ (V. A. Smith) के अनुसार शेरशाह का रुपया आगे चलकर भारतीय मुद्रा प्रणाली का आधार बना।
➣ शेरशाह की रुपया प्रणाली का प्रभाव इतना व्यापक था कि बाद में मुगल शासकों ने भी इसे अपनाया तथा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी लंबे समय तक इसी मानक पर आधारित रुपया प्रचलित रखा।
मुद्रा सुधारों का महत्व
| सुधार | महत्व |
|---|---|
| मानक सिक्के | व्यापार में विश्वास एवं स्थिरता |
| शुद्ध धातु | खोटे सिक्कों की समस्या का समाधान |
| एकरूप मुद्रा प्रणाली | साम्राज्य में सुगम व्यापार |
| छोटे मूल्य के सिक्के | दैनिक लेन-देन में सुविधा |
शेरशाह के मुद्रा सुधारों का महत्व
| सुधार | महत्व |
|---|---|
| मानकीकृत सिक्के | संपूर्ण साम्राज्य में एकरूप मुद्रा प्रणाली |
| शुद्ध धातु | व्यापारियों का विश्वास बढ़ा |
| रुपये की शुरुआत | भारतीय मुद्रा इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धि |
| नागरी लिपि का प्रयोग | भारतीय परंपरा एवं प्रशासनिक व्यावहारिकता का परिचय |
| मुगलों पर प्रभाव | अकबर सहित बाद के शासकों ने प्रणाली अपनाई |
✓ शेरशाह के समय टकसालों की संख्या: लगभग 23
✓ रुपया सर्वप्रथम किसने चलाया? शेरशाह सूरी
✓ अशरफी किस धातु की थी? सोना
✓ रुपया किस धातु का था? चाँदी
✓ दाम किस धातु का था? ताँबा
✓ रुपये का मानक भार: लगभग 178 ग्रेन
✓ दाम का भार: लगभग 380 ग्रेन
शेरशाह की मुद्रा प्रणाली की विशेषताएँ
➣ शेरशाह सूरी ने भारत में पहली बार मानकीकृत मुद्रा प्रणाली स्थापित की, जिसमें सिक्कों का भार, धातु तथा शुद्धता निश्चित की गई।
➣ उसके द्वारा जारी सिक्कों पर शासक का नाम, उपाधि तथा टकसाल का नाम अंकित कराया जाता था।
➣ सिक्कों पर लेख मुख्यतः अरबी भाषा में उत्कीर्ण किए जाते थे, साथ ही कुछ सिक्कों पर देवनागरी (नागरी) लिपि का भी प्रयोग मिलता है।
➣ सिक्कों पर नागरी लिपि का प्रयोग करने वाला शेरशाह प्रारम्भिक मुस्लिम शासकों में से एक माना जाता है।
➣ शेरशाह के कुछ सिक्कों पर प्रथम चार खलीफाओं के नाम भी अंकित मिलते हैं।
शेरशाह के सिक्कों की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| धातु | सोना, चाँदी एवं ताँबा |
| मानक भार | प्रत्येक सिक्के का निश्चित भार |
| अभिलेख | शासक का नाम, उपाधि एवं टकसाल |
| लिपि | अरबी तथा कुछ सिक्कों पर नागरी |
| विशेष उल्लेख | कुछ सिक्कों पर प्रथम चार खलीफाओं के नाम |
अन्य प्रचलित सिक्के
➣ शेरशाह के शासनकाल में टका तथा पैसा नामक सिक्कों का भी प्रचलन मिलता है।
➣ दैनिक लेन-देन को सुविधाजनक बनाने के लिए विभिन्न मूल्यवर्ग के सिक्के जारी किए गए, जिससे छोटे एवं बड़े दोनों प्रकार के व्यापार में सुविधा हुई।
| सिक्का | धातु / उपयोग |
|---|---|
| अशरफी | सोने का उच्च मूल्य का सिक्का |
| रुपया | चाँदी का मानक सिक्का |
| दाम | ताँबे का सामान्य प्रचलित सिक्का |
| टका | कुछ क्षेत्रों में प्रचलित मुद्रा |
| पैसा | छोटे लेन-देन हेतु ताँबे का सिक्का |
शेरशाह की मुद्रा प्रणाली का प्रभाव
➣ शेरशाह द्वारा स्थापित मानक मुद्रा प्रणाली को बाद में मुगल शासकों, विशेषकर अकबर, ने अपनाया तथा और अधिक विकसित किया।
➣ इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार शेरशाह का रुपया भारतीय मुद्रा प्रणाली के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
➣ शेरशाह की मुद्रा व्यवस्था का प्रभाव इतना व्यापक था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी लंबे समय तक इसी मानक पर आधारित चाँदी के रुपये का प्रचलन बनाए रखा।
➣ उसकी सुव्यवस्थित मुद्रा प्रणाली ने व्यापार, कर-संग्रह तथा आंतरिक व बाह्य वाणिज्य को अधिक संगठित एवं सुगम बनाया।
✓ शेरशाह के सिक्कों पर कौन-सी लिपियाँ मिलती हैं? अरबी तथा कुछ सिक्कों पर नागरी
✓ सिक्कों पर क्या अंकित कराया जाता था? नाम, उपाधि एवं टकसाल का नाम
✓ शेरशाह के कुछ सिक्कों पर किनके नाम मिलते हैं? प्रथम चार खलीफाओं के
✓ मुद्रा प्रणाली को आगे किसने अपनाया? मुगल शासकों, विशेषकर अकबर ने
✓ रुपये की ऐतिहासिक महत्ता क्या है? भारतीय मानक मुद्रा प्रणाली का आधार
✓ अन्य प्रचलित सिक्के: टका एवं पैसा
➣ शेरशाह का रुपया (178 ग्रेन चाँदी) इतना सफल सिक्का साबित हुआ कि मुगलों ने भी इसे बिना बड़े बदलाव के अपनाया, और यही परंपरा आगे अंग्रेजों के जमाने तक चली — इसीलिए स्मिथ इसे ब्रिटिश मुद्रा-व्यवस्था की नींव कहते हैं। याद रखें कि रुपया शब्द और उसकी बुनियादी बनावट शेरशाह की ही देन है, अकबर या मुगलों की नहीं।सैन्य व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी ने एक सुदृढ़, अनुशासित एवं संगठित स्थायी सेना का निर्माण किया। उसकी सैन्य व्यवस्था का उद्देश्य साम्राज्य की सुरक्षा, विद्रोहों का दमन तथा सीमाओं की रक्षा करना था।
➣ शेरशाह ने अलाउद्दीन खिलजी द्वारा प्रारम्भ की गई दाग (घोड़ों पर सरकारी निशान) तथा हुलिया (सैनिकों का व्यक्तिगत विवरण) प्रणाली को पुनः लागू कर सेना में अनुशासन स्थापित किया।
➣ शेरशाह स्वयं सर्वोच्च सेनापति था तथा सैनिकों की भर्ती एवं सैन्य संगठन पर उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण रहता था।
➣ शेरशाह का प्रमुख हिन्दू सेनापति ब्रह्मजीत गौड़ था, जिसने अनेक सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सैनिक भर्ती व्यवस्था
➣ शेरशाह ने प्रत्यक्ष भर्ती प्रणाली अपनाई, जिसमें सैनिकों की नियुक्ति सीधे राज्य द्वारा की जाती थी।
➣ प्रत्येक सैनिक का हुलिया (व्यक्तिगत विवरण) सरकारी अभिलेखों में दर्ज किया जाता था, जिससे फर्जी भर्ती एवं वेतन संबंधी अनियमितताओं पर नियंत्रण रखा जा सके।
➣ सैनिकों के घोड़ों पर दाग लगाया जाता था, जिससे सरकारी घोड़ों की पहचान सुनिश्चित रहती थी।
शेरशाह के सैन्य सुधार
| सुधार | उद्देश्य |
|---|---|
| दाग प्रथा | घोड़ों की सही पहचान एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण |
| हुलिया प्रथा | सैनिकों का व्यक्तिगत अभिलेख तैयार करना |
| प्रत्यक्ष भर्ती | योग्य सैनिकों की नियुक्ति एवं अनुशासन बनाए रखना |
| नकद वेतन | सैनिकों को नियमित भुगतान एवं भ्रष्टाचार में कमी |
वेतन व्यवस्था
➣ शेरशाह सैनिकों की योग्यता एवं सेवा के आधार पर उनका वेतन निर्धारित करता था।
➣ सामान्य सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था, जबकि उच्च अधिकारियों एवं प्रमुख सैन्य पदाधिकारियों को प्रायः जागीर प्रदान की जाती थी।
| श्रेणी | वेतन |
|---|---|
| सैनिक | नकद वेतन |
| उच्च अधिकारी | जागीर |
शेरशाह की सेना
➣ समकालीन विवरणों के अनुसार शेरशाह की सेना अत्यंत विशाल एवं सुसंगठित थी।
| सेना का अंग | अनुमानित संख्या |
|---|---|
| घुड़सवार सेना | लगभग 1,50,000 |
| पैदल सेना | लगभग 25,000 |
| हाथी | लगभग 5,000 |
| तोपखाना | पर्याप्त एवं सुसंगठित |
सैन्य व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| सर्वोच्च सेनापति | स्वयं शेरशाह सूरी |
| प्रमुख हिन्दू सेनापति | ब्रह्मजीत गौड़ |
| भर्ती प्रणाली | प्रत्यक्ष भर्ती |
| घोड़ों की पहचान | दाग प्रथा |
| सैनिक पहचान | हुलिया प्रथा |
| वेतन | सैनिकों को नकद, अधिकारियों को जागीर |
✓ शेरशाह ने किसकी सैन्य व्यवस्था को पुनर्जीवित किया? अलाउद्दीन खिलजी की
✓ घोड़ों की पहचान हेतु कौन-सी प्रथा अपनाई गई? दाग प्रथा
✓ सैनिकों का व्यक्तिगत विवरण किस प्रथा में दर्ज किया जाता था? हुलिया प्रथा
✓ शेरशाह का प्रमुख हिन्दू सेनापति कौन था? ब्रह्मजीत गौड़
✓ सैनिकों को किस प्रकार वेतन मिलता था? नकद
✓ अधिकारियों को क्या दिया जाता था? जागीर
✓ घुड़सवार सेना की अनुमानित संख्या: लगभग 1,50,000
✓ शेरशाह स्वयं क्या था? सर्वोच्च सेनापति
व्यापार एवं चुंगी व्यवस्था
➣ शेरशाह सूरी ने आन्तरिक व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से चुंगी (सीमा शुल्क) व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए।
➣ उसने राज्य के भीतर प्रान्तों, जिलों तथा मार्गों पर लगने वाली अनेक चुंगियों को समाप्त कर दिया, जिससे व्यापारियों को बार-बार कर नहीं देना पड़ता था।
➣ शेरशाह ने अनेक स्थानीय चुंगियों के स्थान पर केवल दो चुंगी केन्द्र निर्धारित किए—
- व्यापारिक वस्तुओं के राज्य में प्रवेश के समय।
- वस्तुओं की बिक्री (विक्रय) के समय।
➣ इस व्यवस्था से व्यापारियों का समय एवं व्यय दोनों कम हुए तथा राज्य के विभिन्न भागों के बीच व्यापार अधिक सुगम हो गया।
चुंगी व्यवस्था
| चरण | चुंगी वसूली |
|---|---|
| राज्य में प्रवेश | प्रथम चुंगी |
| विक्रय (बिक्री) | द्वितीय चुंगी |
➣ शेरशाह ने राज्य के भीतर स्थित अधिकांश चुंगी चौकियों को समाप्त कर दिया, जिससे आन्तरिक व्यापार को उल्लेखनीय बढ़ावा मिला।
➣ सीमा शुल्क (Custom Duty) सामान्यतः ढाई प्रतिशत (2.5%) लिया जाता था। यह शुल्क मुख्य रूप से बंगाल तथा सिन्धु तट पर स्थित प्रवेश केन्द्रों से वसूला जाता था।
व्यापारिक सुधारों का महत्व
| सुधार | प्रभाव |
|---|---|
| अनेक चुंगियों का उन्मूलन | व्यापार में बाधाएँ कम हुईं |
| केवल दो चुंगी केन्द्र | कर व्यवस्था सरल हुई |
| 2.5% सीमा शुल्क | व्यापारियों पर कर का बोझ कम हुआ |
| आन्तरिक व्यापार को प्रोत्साहन | राजस्व एवं व्यापार दोनों में वृद्धि |
शेरशाह की व्यापार नीति की विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | व्यापार को प्रोत्साहन देना |
| आन्तरिक चुंगी | अधिकांश समाप्त |
| चुंगी की संख्या | केवल दो प्रमुख चुंगी |
| सीमा शुल्क | लगभग 2.5% |
| मुख्य वसूली केन्द्र | बंगाल एवं सिन्धु तट |
✓ शेरशाह ने अधिकांश चुंगी चौकियाँ क्यों समाप्त कीं? आन्तरिक व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए
✓ चुंगी कितनी बार ली जाती थी? दो बार
✓ पहली चुंगी कब ली जाती थी? राज्य में वस्तुओं के प्रवेश के समय
✓ दूसरी चुंगी कब ली जाती थी? वस्तुओं की बिक्री के समय
✓ सीमा शुल्क की सामान्य दर: 2.5%
✓ मुख्य सीमा शुल्क केन्द्र: बंगाल एवं सिन्धु तट
स्थापत्य कला
➣ शेरशाह सूरी केवल एक महान विजेता एवं प्रशासक ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट भवन निर्माता भी था। यद्यपि उसका शासनकाल केवल पाँच वर्ष (1540–1545 ई.) का था, फिर भी उसने अनेक भव्य भवनों, किलों, नगरों तथा मस्जिदों का निर्माण कराया।
➣ शेरशाह की स्थापत्य कला में अफगान शैली, इस्लामी वास्तुकला तथा भारतीय (हिन्दू) स्थापत्य का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यही विशेषता आगे चलकर मुगल स्थापत्य के विकास का आधार बनी।
शेरशाह की स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मुख्य शैली | अफगान एवं भारतीय शैली का समन्वय |
| प्रमुख निर्माण | मकबरे, किले, मस्जिदें एवं नगर |
| विशेषता | सादगी, विशालता एवं संतुलित स्थापत्य |
| ऐतिहासिक महत्व | मुगल स्थापत्य के विकास की आधारशिला |
सासाराम का मकबरा
➣ शेरशाह सूरी का सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य स्मारक बिहार के सासाराम में स्थित उसका भव्य मकबरा है। इसका निर्माण उसने अपने जीवनकाल में ही प्रारम्भ कराया था।
➣ यह मकबरा एक विशाल कृत्रिम झील के मध्य बने ऊँचे चबूतरे पर स्थित है तथा चारों ओर से जल से घिरा हुआ है।
➣ यह अष्टकोणीय (Octagonal) योजना पर निर्मित है, जो अफगान स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
सासाराम के मकबरे की विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्थान | सासाराम (बिहार) |
| निर्माण | शेरशाह के जीवनकाल में प्रारम्भ |
| आकार | अष्टकोणीय |
| स्थिति | झील के मध्य ऊँचे चबूतरे पर |
| वास्तुकार | अलीवल खाँ |
हिन्दू एवं मुस्लिम स्थापत्य का समन्वय
➣ शेरशाह के मकबरे का बाहरी स्वरूप इस्लामी (मुस्लिम) स्थापत्य शैली से प्रभावित है, जबकि इसकी आंतरिक सजावट में भारतीय (हिन्दू) स्थापत्य कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
| भाग | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|
| बाहरी स्वरूप | मुस्लिम स्थापत्य |
| आंतरिक सजावट | हिन्दू स्थापत्य |
इतिहासकारों की टिप्पणी
➣ इतिहासकार के. आर. कानूनगो ने शेरशाह के मकबरे के विषय में कहा—
“यह बाहर से मुस्लिम तथा भीतर से हिन्दू है।”
➣ पुरातत्त्वविद् अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने शेरशाह के मकबरे की प्रशंसा करते हुए इसे ताजमहल से भी अधिक प्रभावशाली बताया।
➣ शेरशाह तथा उसके पिता हसन खाँ सूर के सासाराम स्थित मकबरों का वास्तुकार अलीवल खाँ था।
✓ शेरशाह का प्रसिद्ध मकबरा कहाँ स्थित है? सासाराम (बिहार)
✓ मकबरे का आकार: अष्टकोणीय
✓ मकबरा कहाँ बनाया गया है? झील के मध्य ऊँचे चबूतरे पर
✓ वास्तुकार कौन था? अलीवल खाँ
✓ के. आर. कानूनगो का प्रसिद्ध कथन: “बाहर से मुस्लिम, भीतर से हिन्दू”
✓ कनिंघम ने किस स्मारक से तुलना की? ताजमहल
✓ शेरशाह के पिता का नाम: हसन खाँ सूर
शेरशाह के अन्य प्रमुख निर्माण कार्य
➣ शेरशाह सूरी ने अपने अल्प शासनकाल में अनेक किले, मस्जिदें, नगर तथा सार्वजनिक भवन बनवाए, जो उसकी स्थापत्य प्रतिभा एवं प्रशासनिक दूरदर्शिता के प्रमाण हैं।
➣ उसके अधिकांश निर्माणों में सुरक्षा, उपयोगिता तथा सौंदर्य—तीनों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
पुराना किला (दिल्ली)
➣ हुमायूँ द्वारा निर्मित दीनपनाह के परिसर पर शेरशाह ने व्यापक निर्माण एवं विस्तार कराया, जिसे आज पुराना किला (Purana Qila) के नाम से जाना जाता है।
➣ इस परिसर का उपयोग शेरशाह ने अपनी राजधानी के रूप में किया तथा इसमें अनेक नए भवनों का निर्माण कराया।
शेरमंडल
➣ पुराने किले के भीतर स्थित शेरमंडल एक अष्टभुजाकार (Octagonal) तीन मंजिला भवन है।
➣ बाद में इसी भवन का उपयोग हुमायूँ ने पुस्तकालय के रूप में किया। परंपरागत विवरणों के अनुसार इसी भवन की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूँ की मृत्यु हुई थी।
शेरगढ़ (दिल्ली शेरशाही)
➣ शेरशाह ने दिल्ली में शेरगढ़ अथवा दिल्ली शेरशाही नामक नगर का विकास किया। इसे प्रायः दिल्ली का छठा नगर माना जाता है।
➣ इस नगर से लाल दरवाजा एवं खूनी दरवाजा जैसे ऐतिहासिक प्रवेश द्वार जुड़े हुए हैं।
किला-ए-कुहना मस्जिद
➣ शेरशाह ने 1542 ई. में दिल्ली के पुराने किले के भीतर किला-ए-कुहना मस्जिद का निर्माण कराया।
➣ यह मस्जिद अफगान स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है तथा उत्तर भारत की महत्वपूर्ण मस्जिदों में इसका विशेष स्थान है।
अन्य प्रमुख निर्माण
| निर्माण | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| रोहतासगढ़ दुर्ग | बिहार | सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्ग |
| शेरसूर नगर | कन्नौज के निकट | नवीन नगर की स्थापना |
| पटना | बिहार | 1541 ई. में पाटलिपुत्र का पुनर्विकास एवं ‘पटना’ नाम से स्थापना |
शेरशाह के प्रमुख स्थापत्य कार्य
| निर्माण | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| शेरशाह का मकबरा | सासाराम | अष्टकोणीय, झील के मध्य निर्मित |
| पुराना किला | दिल्ली | दीनपनाह परिसर का विस्तार |
| शेरमंडल | पुराना किला, दिल्ली | अष्टभुजाकार तीन मंजिला भवन |
| किला-ए-कुहना मस्जिद | दिल्ली | 1542 ई. में निर्मित |
| रोहतासगढ़ दुर्ग | बिहार | सामरिक दुर्ग |
| शेरगढ़ | दिल्ली | दिल्ली का छठा नगर |
| पटना | बिहार | 1541 ई. में पुनः स्थापित |
कालक्रम (Timeline)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1541 ई. | पाटलिपुत्र का पुनर्विकास कर पटना की स्थापना |
| 1542 ई. | किला-ए-कुहना मस्जिद का निर्माण |
✓ दीनपनाह के परिसर का विस्तार कर किस किले का विकास किया गया? पुराना किला
✓ शेरमंडल कहाँ स्थित है? पुराना किला, दिल्ली
✓ शेरमंडल का आकार: अष्टभुजाकार
✓ किला-ए-कुहना मस्जिद का निर्माण कब हुआ? 1542 ई.
✓ शेरगढ़ को क्या कहा जाता है? दिल्ली का छठा नगर
✓ पाटलिपुत्र को किस नाम से पुनः स्थापित किया गया? पटना
✓ पटना का पुनर्विकास कब हुआ? 1541 ई.
✓ रोहतासगढ़ किस कारण प्रसिद्ध है? सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्ग
सड़कें एवं राजमार्ग
➣ शेरशाह सूरी ने अपने प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत सड़कों के निर्माण, पुरानी सड़कों के पुनर्निर्माण तथा राजमार्गों के विकास पर विशेष ध्यान दिया। इन सड़कों ने प्रशासन, व्यापार, सेना तथा डाक व्यवस्था को अत्यधिक सुदृढ़ बनाया।
➣ शेरशाह द्वारा निर्मित एवं विकसित सड़कें साम्राज्य के विभिन्न भागों को जोड़ती थीं, जिससे व्यापार, संचार तथा सैनिक आवागमन पहले की अपेक्षा अधिक सुगम हो गया।
शेरशाह द्वारा निर्मित प्रमुख सड़कें
| सड़क | मार्ग |
|---|---|
| सड़क-ए-आज़म | सोनारगाँव (बंगाल) → दिल्ली → लाहौर → अटक |
| द्वितीय सड़क | आगरा → बुरहानपुर |
| तृतीय सड़क | आगरा → जोधपुर → चित्तौड़ |
| चतुर्थ सड़क | लाहौर → मुल्तान |
सड़क-ए-आज़म (Grand Trunk Road)
➣ शेरशाह द्वारा विकसित सबसे प्रसिद्ध राजमार्ग सड़क-ए-आज़म था। यह उसके साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सड़क मानी जाती है।
➣ यह मार्ग सोनारगाँव (बंगाल) से प्रारम्भ होकर दिल्ली, लाहौर होते हुए अटक तक जाता था।
➣ बाद में लॉर्ड ऑकलैंड ने इसी मार्ग को ग्रैंड ट्रंक रोड (Grand Trunk Road) नाम दिया।
➣ यह मार्ग प्राचीन उत्तरापथ का विकसित एवं पुनर्निर्मित स्वरूप माना जाता है। उत्तरापथ का विकास प्राचीन भारत, विशेषकर मौर्य काल में हुआ था, जबकि शेरशाह ने इसका पुनर्निर्माण एवं विस्तार कराया।
सड़क-ए-आज़म का महत्व
| क्षेत्र | महत्व |
|---|---|
| प्रशासन | राजधानी एवं प्रान्तों के बीच त्वरित संपर्क |
| व्यापार | आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार को बढ़ावा |
| सैनिक उपयोग | सेना की शीघ्र आवाजाही |
| डाक व्यवस्था | समाचार एवं शाही आदेशों का तीव्र संचार |
प्रमुख राजमार्गों का महत्व
➣ शेरशाह की सड़क नीति का मुख्य उद्देश्य केवल यात्रा को सुविधाजनक बनाना नहीं था, बल्कि साम्राज्य का प्रशासनिक एकीकरण, व्यापारिक विकास तथा सैन्य नियंत्रण को सुदृढ़ बनाना भी था।
| उद्देश्य | लाभ |
|---|---|
| सड़क निर्माण | यात्रा एवं परिवहन में सुविधा |
| राजमार्गों का विस्तार | व्यापार में वृद्धि |
| सैनिक मार्ग | सीमाओं की सुरक्षा एवं त्वरित सैन्य संचालन |
| प्रशासनिक संपर्क | साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण |
✓ शेरशाह द्वारा निर्मित सबसे प्रसिद्ध सड़क: सड़क-ए-आज़म
✓ सड़क-ए-आज़म कहाँ से कहाँ तक जाती थी? सोनारगाँव से अटक तक
✓ ग्रैंड ट्रंक रोड नाम किसने दिया? लॉर्ड ऑकलैंड
✓ सड़क-ए-आज़म किस प्राचीन मार्ग का विकसित रूप थी? उत्तरापथ
✓ शेरशाह ने कुल कितनी प्रमुख सड़कें विकसित कीं? चार
✓ सड़कों का प्रमुख उद्देश्य: प्रशासन, व्यापार एवं सैनिक आवागमन को सुदृढ़ बनाना
सराय एवं कोस मीनार
➣ शेरशाह सूरी ने अपनी सड़क नीति को प्रभावी बनाने के लिए प्रमुख राजमार्गों पर सरायों, कोस मीनारों तथा यात्रियों की अन्य सुविधाओं का व्यापक विकास कराया।
➣ इन सरायों का उद्देश्य केवल यात्रियों को विश्राम देना ही नहीं था, बल्कि डाक व्यवस्था, व्यापार, सैन्य आवागमन तथा प्रशासनिक नियंत्रण को भी सुदृढ़ बनाना था।
➣ प्रमुख मार्गों पर निश्चित दूरी (लगभग प्रत्येक कोस) पर कोस मीनारें एवं सराय स्थापित कराई गईं, जिससे यात्रियों को मार्ग की जानकारी एवं विश्राम की सुविधा मिलती थी।
सराय व्यवस्था
➣ शेरशाह ने अपने साम्राज्य में लगभग 1700 सरायों का निर्माण कराया, जो उस समय की सबसे संगठित सार्वजनिक सुविधाओं में से एक थीं।
➣ प्रत्येक सराय में हिन्दू एवं मुस्लिम यात्रियों के ठहरने की अलग-अलग व्यवस्था की गई थी।
➣ सरायों में यात्रियों के लिए भोजन, पानी, विश्राम तथा घोड़ों को बदलने जैसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध रहती थीं।
➣ इन सरायों का उपयोग डाक चौकी एवं गुप्तचर विभाग द्वारा भी किया जाता था, जिससे शाही समाचारों एवं आदेशों का तीव्र संचार संभव हो सका।
सरायों की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कुल संख्या | लगभग 1700 |
| धार्मिक व्यवस्था | हिन्दू एवं मुस्लिम यात्रियों के लिए अलग व्यवस्था |
| मुख्य सुविधाएँ | भोजन, पानी, विश्राम एवं घोड़े बदलने की व्यवस्था |
| अतिरिक्त उपयोग | डाक एवं गुप्तचर व्यवस्था |
कोस मीनार
➣ प्रमुख राजमार्गों पर निश्चित दूरी पर कोस मीनारें स्थापित कराई गईं, जो यात्रियों को दूरी का अनुमान लगाने एवं मार्ग की पहचान कराने में सहायक थीं।
➣ कोस मीनारों के समीप प्रायः सराय एवं पेयजल की व्यवस्था भी रहती थी, जिससे यात्रियों को यात्रा के दौरान सुविधा मिलती थी।
प्रशासन एवं व्यापार में योगदान
| क्षेत्र | योगदान |
|---|---|
| व्यापार | व्यापारिक मार्ग अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक बने |
| डाक व्यवस्था | समाचार एवं शाही आदेशों का तीव्र संचार |
| सैनिक व्यवस्था | सेना की त्वरित आवाजाही |
| यात्रा | यात्रियों के लिए सुरक्षित एवं आरामदायक यात्रा |
| प्रशासन | साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण |
इतिहासकारों की टिप्पणी
➣ इतिहासकार के. आर. कानूनगो ने शेरशाह की सरायों की प्रशंसा करते हुए उन्हें साम्राज्य रूपी शरीर की धमनियाँ कहा है।
➣ वास्तव में शेरशाह की सड़क एवं सराय व्यवस्था ने प्रशासन, व्यापार, डाक तथा सैन्य संगठन को एक-दूसरे से प्रभावी रूप से जोड़ दिया था।
✓ शेरशाह ने लगभग कितनी सरायों का निर्माण कराया? लगभग 1700
✓ सरायों में किनके लिए अलग व्यवस्था थी? हिन्दू एवं मुस्लिम यात्रियों के लिए
✓ सरायों का उपयोग किन कार्यों में होता था? विश्राम, डाक, गुप्तचर एवं व्यापार
✓ कोस मीनारों का उद्देश्य क्या था? दूरी का संकेत एवं यात्रियों का मार्गदर्शन
✓ इतिहासकार कानूनगो ने सरायों को क्या कहा? साम्राज्य रूपी शरीर की धमनियाँ
✓ सरायों की देखभाल कौन करता था? शिकदार
✓ सरायों से किस व्यवस्था को सबसे अधिक लाभ मिला? व्यापार, डाक एवं प्रशासन
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