मुगलकालीन प्रशासन, अर्थव्यवस्था एवं सैन्य व्यवस्था

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मुगल प्रशासन

➣ मुगल शासन प्रणाली भारतीय तथा विदेशी (विशेषतः अब्बासी एवं फ़ातिमी प्रशासनिक परम्पराओं) के समन्वय पर आधारित थी।

➣ मुगल प्रशासन एक केन्द्रीकृत एवं निरंकुश शासन व्यवस्था थी, जिसमें समस्त कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं सैन्य शक्ति का सर्वोच्च केन्द्र सम्राट (बादशाह) होता था।

➣ प्रशासन नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) के सिद्धान्त पर आधारित था। इसी कारण सूबेदार एवं दीवान जैसे उच्च अधिकारियों के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन किया गया था।

➣ मुगलकालीन राजत्व का सर्वाधिक विस्तृत वर्णन अबुल फ़ज़ल द्वारा रचित आइने-अकबरी में मिलता है। अबुल फ़ज़ल के अनुसार राजत्व ईश्वर प्रदत्त दैवी शक्ति (Divine Light) है।

➣ मुगल प्रशासन में राजस्व व्यवस्था भारतीय एवं अरबी परम्पराओं से प्रभावित थी, जबकि मनसबदारी व्यवस्था पर मध्य एशियाई प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

➣ प्रशासनिक कार्यों के संचालन हेतु सम्राट की सहायता के लिए एक मन्त्रिपरिषद होती थी, जिसे विजारत कहा जाता था।

मुगल प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँविवरण
शासन का स्वरूपकेन्द्रीकृत एवं निरंकुश
सर्वोच्च अधिकारीसम्राट (बादशाह)
मुख्य आधारसैन्य शक्ति एवं केन्द्रीकरण
मन्त्रिपरिषदविजारत
राजत्व का प्रमुख स्रोतआइने-अकबरी

केंद्रीय प्रशासन

➣ मुगल साम्राज्य का सर्वोच्च अधिकारी बादशाह होता था। वही साम्राज्य का सर्वोच्च शासक, सेनापति तथा न्यायाधीश था।

➣ बादशाह का निजी प्रतिष्ठान खासा-ए-शरीफा कहलाता था।

➣ विशाल साम्राज्य के सुचारु संचालन हेतु बादशाह की सहायता के लिए अनेक उच्च अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।

सर्वोच्च पदमुख्य कार्य
बादशाहसर्वोच्च शासक, सेनापति एवं न्यायाधीश
खासा-ए-शरीफाबादशाह का निजी प्रतिष्ठान
विजारतमन्त्रिपरिषद

वकील-ए-मुतलक (वकील)

➣ प्रारम्भिक मुगलकाल में वकील-ए-मुतलक साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली अधिकारी था। वह सम्राट के बाद शासन का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था।

➣ बाबर एवं हुमायूँ के शासनकाल में वकील (वजीर) को सैनिक एवं असैनिक दोनों प्रकार के व्यापक अधिकार प्राप्त थे।

➣ बाबर ने वजीर को “राजसी ऐश्वर्य का स्तम्भ” कहा है।

मुगल शासकप्रमुख वकील / वजीर
बाबरनिजामुद्दीन खलीफा
हुमायूँअमीर उवैस एवं हिन्दूबेग
अकबर (प्रारम्भिक काल)बैरम खाँ
अकबर (अन्तिम वकील)मिर्जा अज़ीज़ कोका

अकबर के प्रशासनिक सुधार

➣ अकबर ने वकील के अत्यधिक अधिकारों को सीमित करने के लिए उसके अधिकारों का विभाजन कर दिया।

अधिकारजिस अधिकारी को सौंपे गए
वित्तदीवान
सैन्य विभागमीर बख्शी
शाही कारखाने एवं महलमीर-ए-सामाँ
धार्मिक विभागसद्र-उस-सुदूर

➣ इन सुधारों के बाद वकील का पद धीरे-धीरे केवल सम्मानसूचक रह गया।

➣ शाहजहाँ के शासनकाल में वकील का पद लगभग समाप्त हो गया तथा दीवान को ही वज़ीर-ए-आज़म के रूप में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी माना जाने लगा।

माहम अनगा

➣ माहम अनगा मुगलकाल की एकमात्र प्रभावशाली महिला थीं, जिन्होंने अकबर के प्रारम्भिक शासनकाल में शासन संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें संयुक्त रूप से वकील/प्रधानमंत्री के रूप में भी उल्लेखित किया जाता है।

🧠 याद रखें:

✓ मुगल प्रशासन का स्वरूप → केन्द्रीकृत एवं निरंकुश

✓ मन्त्रिपरिषद का नाम → विजारत

✓ बादशाह का निजी प्रतिष्ठान → खासा-ए-शरीफा

✓ बाबर का वजीर → निजामुद्दीन खलीफा

✓ अकबर का प्रथम वकील → बैरम खाँ

✓ अकबर का अन्तिम वकील → मिर्जा अज़ीज़ कोका

✓ मुगलकाल की प्रमुख महिला वकील → माहम अनगा

✓ वकील का पद किसके समय समाप्त हुआ? → शाहजहाँ

दीवान (वज़ीर)

➣ अकबर द्वारा वकील-ए-मुतलक के अधिकार सीमित किए जाने के बाद दीवान (वज़ीर) मुगल प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बन गया। वह साम्राज्य के वित्त एवं राजस्व विभाग का प्रमुख होता था।

➣ दीवान का मुख्य कार्य राजस्व निर्धारण, करों की वसूली, शाही आय-व्यय का लेखा-जोखा तथा प्रांतीय दीवानों पर नियंत्रण रखना था।

➣ मुगलकाल में सभी आय-व्यय का अंतिम लेखा दीवान के कार्यालय में तैयार किया जाता था।

दीवान के प्रमुख कार्यविवरण
राजस्व प्रशासनभू-राजस्व का निर्धारण एवं नियंत्रण
वित्त विभागशाही आय-व्यय का प्रबंधन
लेखा परीक्षणराजस्व अभिलेखों की जाँच
प्रांतीय नियंत्रणसूबों के दीवानों की देखरेख

प्रमुख मुगल दीवान

शासकप्रमुख दीवान / वज़ीरविशेष तथ्य
अकबरराजा टोडरमलभू-राजस्व सुधार एवं दहसाला व्यवस्था
जहाँगीरग़ियास बेग (एतमादुद्दौला)नूरजहाँ के पिता
शाहजहाँसादुल्ला खाँप्रसिद्ध प्रशासक एवं वज़ीर
औरंगजेबअसद खाँदीर्घकाल तक वज़ीर पद पर रहे

मीर बख्शी

➣ मीर बख्शी मुगल साम्राज्य के सैन्य विभाग का सर्वोच्च अधिकारी था। वह सैनिकों की भर्ती, मनसबदारों का अभिलेख, वेतन तथा निरीक्षण का उत्तरदायी होता था।

➣ मनसबदारों एवं सैनिकों की नियुक्ति से संबंधित आदेश सम्राट की स्वीकृति के बाद मीर बख्शी द्वारा जारी किए जाते थे।

मीर बख्शी के प्रमुख कार्यविवरण
सैनिक भर्तीसैनिकों एवं मनसबदारों की नियुक्ति
चेहरा प्रणालीसैनिकों का विवरण एवं पहचान दर्ज करना
दाग प्रणालीघोड़ों पर सरकारी मुहर लगवाना
वेतन व्यवस्थामनसबदारों एवं सैनिकों के वेतन संबंधी अभिलेख

➣ मीर बख्शी समय-समय पर सेना का निरीक्षण करता था तथा घोड़ों एवं सैनिकों की वास्तविक संख्या की जाँच भी कराता था।

मीर बख्शी के अधीन अधिकारी

अधिकारीमुख्य कार्य
बख्शी-ए-हुज़ूरशाही सेना का प्रबंधन
बख्शी-ए-शागिर्दशाही सेवकों एवं प्रशिक्षुओं का अभिलेख
वाकिया-नवीसघटनाओं की सूचना दरबार तक पहुँचाना

मीर-ए-सामाँ

➣ मीर-ए-सामाँ शाही कारखानों (कारखाना), महलों तथा राजकीय भंडार का प्रमुख अधिकारी था।

➣ उसके अधीन शाही भवनों के निर्माण, शाही परिवार की आवश्यक वस्तुओं तथा कारखानों में निर्मित सामग्री का प्रबंधन किया जाता था।

मीर-ए-सामाँ के प्रमुख कार्यविवरण
शाही कारखानेकारखानों का संचालन एवं निरीक्षण
राजकीय भंडारसामग्री का संग्रह एवं वितरण
महल व्यवस्थाशाही परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति
निर्माण कार्यमहलों एवं शाही भवनों के लिए सामग्री उपलब्ध कराना

मीर-ए-सामाँ के अधीन अधिकारी

अधिकारीमुख्य कार्य
दीवान-ए-बयूतातशाही कारखानों के वित्त का प्रबंधन
दरोगा-ए-बयूतातकारखानों का दैनिक संचालन
मुशरिफ-ए-बयूतातलेखा एवं अभिलेख तैयार करना
तहवीलदारसामग्री एवं भंडार की देखरेख

दीवान, मीर बख्शी एवं मीर-ए-सामाँ में अंतर

पदमुख्य विभागमुख्य उत्तरदायित्व
दीवानवित्त एवं राजस्वआय-व्यय एवं भू-राजस्व
मीर बख्शीसैन्य विभागसेना, मनसबदार एवं भर्ती
मीर-ए-सामाँशाही कारखानेकारखाने, महल एवं भंडार

🧠 याद रखें:

✓ वित्त विभाग का प्रमुख: दीवान (वज़ीर)

✓ दहसाला व्यवस्था का प्रवर्तक: राजा टोडरमल

✓ सैन्य विभाग का प्रमुख: मीर बख्शी

✓ चेहरा एवं दाग प्रणाली से संबंधित अधिकारी: मीर बख्शी

✓ शाही कारखानों का प्रमुख: मीर-ए-सामाँ

✓ नूरजहाँ के पिता एवं जहाँगीर के दीवान: ग़ियास बेग (एतमादुद्दौला)

✓ शाहजहाँ का प्रसिद्ध वज़ीर: सादुल्ला खाँ

सद्र-उस-सुदूर

➣ सद्र-उस-सुदूर मुगल साम्राज्य के धार्मिक एवं दान विभाग का सर्वोच्च अधिकारी था।

➣ इसका मुख्य कार्य धार्मिक संस्थाओं, मस्जिदों, मदरसों तथा विद्वानों को मदद-ए-माश एवं वक्फ भूमि प्रदान करना तथा उन पर नियंत्रण रखना था।

सद्र-उस-सुदूर के प्रमुख कार्यविवरण
धार्मिक अनुदानमदद-ए-माश एवं वक्फ भूमि का वितरण
मदरसों की देखरेखधार्मिक शिक्षा संस्थानों का निरीक्षण
उलेमा एवं विद्वानों का संरक्षणअनुदान एवं आर्थिक सहायता प्रदान करना
धार्मिक मामलों में सलाहसम्राट को धार्मिक विषयों पर परामर्श देना

काज़ी-उल-कुज़ात

➣ काज़ी-उल-कुज़ात मुगल साम्राज्य का प्रधान न्यायाधीश होता था। सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था उसी के अधीन संचालित होती थी।

➣ वह इस्लामी कानून (शरीअत) के अनुसार न्यायिक निर्णय देता था तथा प्रांतीय काज़ियों की नियुक्ति एवं निरीक्षण भी करता था।

मुख्य कार्यविवरण
प्रधान न्यायाधीशसाम्राज्य की सर्वोच्च न्यायिक व्यवस्था
काज़ियों की नियुक्तिप्रांतीय एवं स्थानीय काज़ियों की देखरेख
शरीअत की व्याख्याधार्मिक कानूनों के अनुसार न्याय

मुहतसिब

➣ मुहतसिब सार्वजनिक नैतिकता, बाजार व्यवस्था तथा धार्मिक आचरण की देखरेख करने वाला अधिकारी था।

➣ विशेष रूप से औरंगजेब के शासनकाल में इस पद का महत्व बढ़ गया था।

मुख्य कार्यविवरण
बाज़ार निरीक्षणमाप-तौल एवं कीमतों की निगरानी
सार्वजनिक नैतिकताइस्लामी आचार-व्यवहार का पालन कराना
निषिद्ध कार्यों पर नियंत्रणशराब, जुआ एवं सामाजिक अनियमितताओं की रोकथाम

डाक एवं गुप्तचर विभाग

➣ मुगल प्रशासन में डाक एवं गुप्तचर व्यवस्था अत्यन्त संगठित थी। इसका उद्देश्य साम्राज्य के विभिन्न भागों से शीघ्र सूचना प्राप्त करना तथा अधिकारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखना था।

अधिकारीमुख्य कार्य
दरोगा-ए-डाक चौकीडाक एवं गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी
वाकिया-नवीसदैनिक घटनाओं एवं प्रशासनिक सूचनाओं का लेखा-जोखा भेजना
खुफिया-नवीसगुप्त सूचनाएँ एकत्र कर शाही दरबार तक पहुँचाना
सवानेह-निगारजागीरदारों एवं अधिकारियों की गतिविधियों की रिपोर्ट भेजना

अन्य प्रमुख अधिकारी

अधिकारीमुख्य कार्य
मीर आतिशतोपखाने का प्रमुख अधिकारी
मीर अर्जप्रजा की याचिकाएँ एवं आवेदन प्रस्तुत करना
मीर मंज़िलशाही शिविर एवं पड़ाव की व्यवस्था
मीर तौज़कदरबारी समारोह एवं राजकीय प्रोटोकॉल की व्यवस्था

प्रमुख अधिकारियों की तुलना

अधिकारीविभागमुख्य उत्तरदायित्व
सद्र-उस-सुदूरधार्मिक विभागदान, वक्फ एवं मदद-ए-माश
काज़ी-उल-कुज़ातन्याय विभागप्रधान न्यायाधीश
मुहतसिबनैतिक एवं बाजार नियंत्रणबाज़ार एवं सार्वजनिक आचरण
दरोगा-ए-डाक चौकीडाक एवं गुप्तचरसूचना एवं संचार व्यवस्था
मीर आतिशतोपखानातोपखाने का संचालन

🧠 याद रखें:

✓ धार्मिक विभाग का प्रमुख: सद्र-उस-सुदूर

✓ प्रधान न्यायाधीश: काज़ी-उल-कुज़ात

✓ बाज़ार एवं नैतिकता का निरीक्षक: मुहतसिब

✓ डाक एवं गुप्तचर विभाग का प्रमुख: दरोगा-ए-डाक चौकी

✓ तोपखाने का प्रमुख: मीर आतिश

✓ जागीरदारों की गतिविधियों की रिपोर्ट कौन भेजता था? सवानेह-निगार

✓ गुप्त सूचनाएँ एकत्र करने वाला अधिकारी: खुफिया-नवीस

मुगल प्रशासनिक संरचना

➣ मुगल प्रशासन को विभिन्न स्तरों में विभाजित किया गया था, जिससे शासन कार्य सुचारु रूप से संचालित हो सके।

क्रमप्रशासनिक इकाईमुख्य अधिकारी
1साम्राज्यबादशाह
2सूबासूबेदार
3सरकार (जिला)फौजदार
4चकला (शाहजहाँ के समय)चकलादार
5परगनाशिकदार एवं आमिल
6ग्राममुकद्दम एवं पटवारी

मुगल साम्राज्य के सूबे

➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए मुगल साम्राज्य को सूबों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक सूबे का प्रशासन सूबेदार के अधीन होता था, जबकि वित्तीय कार्यों की देखरेख प्रांतीय दीवान करता था।

➣ मुगल साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ सूबों की संख्या भी बढ़ती गई। अकबर ने सर्वप्रथम साम्राज्य को व्यवस्थित रूप से सूबों में विभाजित किया।

मुगल शासकसूबों की संख्या
अकबर (1580 ई.)12
अकबर (शासन के अंत तक)15
जहाँगीर17
शाहजहाँ18
औरंगजेब20 (प्रचलित मत)

औरंगजेब के समय प्रमुख सूबे

उत्तर भारतदक्षिण भारत (दक्कन)
दिल्लीऔरंगाबाद
आगराबीजापुर
अवधहैदराबाद
इलाहाबादबरार
बिहारखानदेश
बंगाल
गुजरात
अजमेर
कश्मीर
लाहौर
मुल्तान
काबुल
ठट्टा (सिंध)
उड़ीसा
मालवा

प्रांतीय प्रशासन

➣ प्रत्येक सूबे में केंद्रीय प्रशासन की भाँति विभिन्न अधिकारी नियुक्त किए जाते थे, जिससे प्रशासन में संतुलन बना रहे।

अधिकारीमुख्य कार्य
सूबेदारप्रांतीय प्रशासन एवं कानून-व्यवस्था का प्रमुख
प्रांतीय दीवानराजस्व एवं वित्त विभाग
प्रांतीय बख्शीसैन्य व्यवस्था एवं सैनिकों का निरीक्षण
सद्रधार्मिक एवं दान संबंधी कार्य
काज़ीन्यायिक कार्य

सूबेदार

➣ सूबेदार प्रांत का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता था। वह शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने, शाही आदेशों को लागू करने तथा सैन्य शक्ति का संचालन करने के लिए उत्तरदायी था।

➣ सूबेदार के अधिकारों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उसके साथ प्रांतीय दीवान की नियुक्ति की जाती थी, जो सीधे केंद्रीय दीवान के अधीन कार्य करता था।

सूबेदार एवं प्रांतीय दीवान में अंतर

आधारसूबेदारप्रांतीय दीवान
विभागप्रशासन एवं सैन्यवित्त एवं राजस्व
उत्तरदायित्वशांति एवं शासनआय-व्यय एवं लेखा
नियंत्रणसम्राटकेंद्रीय दीवान

चकला

➣ शाहजहाँ के शासनकाल में प्रशासनिक सुविधा के लिए सरकार (जिला) और परगना के बीच चकला नामक नई प्रशासनिक इकाई का विकास हुआ।

🧠 याद रखें:

✓ अकबर ने सूबा व्यवस्था कब प्रारम्भ की? 1580 ई.

✓ औरंगजेब के समय प्रचलित सूबों की संख्या: 20

✓ प्रांत का सर्वोच्च अधिकारी: सूबेदार

✓ प्रांत का वित्त अधिकारी: प्रांतीय दीवान

✓ सरकार का प्रमुख अधिकारी: फौजदार

✓ परगना के प्रमुख अधिकारी: शिकदार एवं आमिल

✓ चकला का विकास किसने किया? शाहजहाँ

सरकार (जिला) प्रशासन

➣ मुगलकाल में प्रत्येक सूबा अनेक सरकारों (जिलों) में विभाजित होता था। सरकार प्रशासन की प्रमुख इकाई थी, जिसके माध्यम से कानून-व्यवस्था, राजस्व एवं न्यायिक कार्य संचालित किए जाते थे।

➣ प्रत्येक सरकार में प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों को अलग-अलग अधिकारियों के बीच बाँटा गया था, जिससे किसी एक अधिकारी के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न हो।

अधिकारीमुख्य कार्य
फौजदारकानून-व्यवस्था, सैन्य व्यवस्था एवं शांति बनाए रखना।
अमलगुजार (आमिल)भू-राजस्व की वसूली एवं राजस्व प्रशासन।
बितिकचीभूमि एवं राजस्व संबंधी अभिलेख तैयार करना।
खजानदारसरकारी कोष एवं राजस्व की सुरक्षा।

परगना प्रशासन

➣ प्रत्येक सरकार (जिला) कई परगनों में विभाजित होती थी। परगना मुगल प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण राजस्व इकाई मानी जाती थी।

अधिकारीमुख्य कार्य
शिकदारकानून-व्यवस्था एवं सुरक्षा बनाए रखना।
आमिल (अमलगुजार)भू-राजस्व निर्धारण एवं वसूली।
कानूनगोभूमि एवं राजस्व अभिलेखों का संरक्षण।
कानूनगो का मुंशीराजस्व अभिलेख तैयार करना एवं लेखन कार्य।
पोतदारराजस्व राशि का संग्रह एवं कोष की देखरेख।
कारकूनलेखन एवं कार्यालयी कार्य।

ग्राम प्रशासन

➣ मुगल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। गाँव का प्रशासन स्थानीय अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता था।

अधिकारीमुख्य कार्य
मुकद्दमगाँव का प्रधान एवं किसानों का प्रतिनिधि।
पटवारीभूमि, फसल एवं भू-राजस्व का अभिलेख रखना।
चौधरीराजस्व वसूली में सहयोग एवं स्थानीय नेतृत्व।

प्रशासनिक इकाइयों की तुलना

प्रशासनिक इकाईमुख्य अधिकारीमुख्य उत्तरदायित्व
सूबासूबेदारप्रांतीय प्रशासन
सरकार (जिला)फौजदारकानून-व्यवस्था एवं सुरक्षा
परगनाशिकदार एवं आमिलराजस्व एवं स्थानीय प्रशासन
ग्राममुकद्दम एवं पटवारीस्थानीय प्रशासन एवं भूमि अभिलेख

प्रमुख अधिकारियों का एक दृष्टि में सार

अधिकारीविभागमुख्य कार्य
सूबेदारप्रांतीय प्रशासनशासन एवं सैन्य व्यवस्था
दीवानवित्तराजस्व एवं लेखा
मीर बख्शीसैन्य विभागभर्ती एवं मनसबदारी
मीर-ए-सामाँशाही कारखानेभंडार एवं शाही सामग्री
सद्र-उस-सुदूरधार्मिक विभागदान एवं वक्फ
काज़ी-उल-कुज़ातन्याय विभागप्रधान न्यायाधीश
मुहतसिबबाज़ार एवं नैतिकतामाप-तौल एवं सार्वजनिक आचरण

🧠 याद रखें:

✓ सरकार (जिला) का प्रमुख अधिकारी: फौजदार

✓ राजस्व अधिकारी (सरकार): अमलगुजार

✓ परगना का कानून-व्यवस्था अधिकारी: शिकदार

✓ परगना का राजस्व अधिकारी: आमिल (अमलगुजार)

✓ भूमि अभिलेखों का संरक्षक: कानूनगो

✓ गाँव का प्रधान: मुकद्दम

✓ भूमि अभिलेख रखने वाला अधिकारी: पटवारी

✓ चकला की शुरुआत किसने की? शाहजहाँ

जागीरदारी व्यवस्था

➣ मुगलकाल में जब किसी मनसबदार को नकद वेतन के स्थान पर किसी भू-क्षेत्र का राजस्व वसूलने का अधिकार दिया जाता था, तो उस क्षेत्र को जागीर अथवा तियूल कहा जाता था।

➣ जागीर प्राप्त करने वाले अधिकारी को जागीरदार अथवा तियूलदार कहा जाता था। जागीरदार भूमि का स्वामी नहीं होता था, बल्कि उसे केवल निश्चित अवधि तक उस क्षेत्र से भू-राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त होता था।

शब्दअर्थ
जागीर / तियूलमनसबदार को वेतन के बदले दिया गया राजस्व क्षेत्र।
जागीरदार / तियूलदारजागीर का राजस्व वसूलने वाला अधिकारी।
जमाजागीर से होने वाली अनुमानित (निर्धारित) आय।
हाल-ए-हासिलजागीर से वास्तव में प्राप्त राजस्व।

जागीरों के प्रकार

प्रकारविशेषता
जागीर-ए-तनख्वाहनकद वेतन के स्थान पर प्रदान की जाने वाली जागीर।
मशरूत जागीरकिसी प्रशासनिक पद अथवा विशेष दायित्व के साथ दी जाने वाली जागीर।
वतन जागीरमनसबदार के पैतृक अथवा पारिवारिक क्षेत्र में स्थित जागीर।

वतन जागीर

➣ वतन जागीर की अवधारणा अकबर के शासनकाल के अंतिम वर्षों में विकसित हुई।

➣ वतन जागीर सामान्यतः हस्तांतरणीय नहीं होती थी, जबकि अन्य अधिकांश जागीरों का समय-समय पर स्थानांतरण किया जाता था।

➣ वतन जागीर की अवधारणा का महत्वपूर्ण प्रमाण बीकानेर के शासक राजा राय सिंह को प्रदान किए गए अकबर के फरमान से प्राप्त होता है।

जागीर व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ

विशेषताविवरण
भूमि पर अधिकारकेवल भू-राजस्व वसूलने का अधिकार।
प्रशासनिक अधिकारसामान्यतः प्राप्त नहीं होते थे।
स्थानांतरणवतन जागीर को छोड़कर अधिकांश जागीरें हस्तांतरणीय थीं।
मुख्य उद्देश्यमनसबदारों को किसी क्षेत्र में स्थायी शक्ति प्राप्त होने से रोकना।

सवानेह-निगार

➣ सवानेह-निगार वह अधिकारी था, जिसका कार्य जागीरदारों की गतिविधियों पर निगरानी रखना तथा उनकी रिपोर्ट शाही दरबार को भेजना था।

जमींदार एवं सैन्य दायित्व

➣ जिन जमींदारों के अधिकार में पूरा परगना होता था, उन्हें आवश्यकता पड़ने पर राज्य को निश्चित संख्या में सैनिक उपलब्ध कराने पड़ते थे।

➣ जिन जमींदारों का अधिकार केवल तरफ़ (परगने के कुछ गाँवों) तक सीमित होता था, वे सैनिकों के स्थान पर सलामी (एक प्रकार की भेंट) अदा करते थे।

जमींदारी व्यवस्था

➣ मुगलकाल में जमींदार ऐसे स्थानीय भूस्वामी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति होते थे, जिन्हें कुछ गाँवों से भू-राजस्व वसूल करने का वंशानुगत अधिकार प्राप्त होता था।

➣ जमींदार भूमि का पूर्ण स्वामी नहीं होता था। उसका मुख्य अधिकार किसानों से भू-राजस्व वसूल कर राज्य को निर्धारित हिस्सा देना था।

जमींदारों के क्षेत्रीय नाम

क्षेत्रप्रचलित नाम
महाराष्ट्रदेशमुख
दक्षिण भारतनायक
दक्कन / महाराष्ट्रपाटिल

मालिकाना

➣ भू-राजस्व की वसूली के बदले जमींदार को कुल राजस्व का लगभग 10% भाग प्राप्त होता था, जिसे मालिकाना कहा जाता था।

जागीरदारी एवं जमींदारी में अंतर

आधारजागीरदारीजमींदारी
स्वरूपराजस्व अधिकारवंशानुगत राजस्व अधिकार
अधिकारमनसबदार को प्रदानस्थानीय जमींदार को प्राप्त
स्थानांतरणसामान्यतः हस्तांतरणीयवंशानुगत एवं अपेक्षाकृत स्थायी
भूमि का स्वामित्वनहींपूर्ण स्वामित्व नहीं, केवल राजस्व अधिकार

🧠 याद रखें:

✓ जागीर का दूसरा नाम: तियूल

✓ अनुमानित आय: जमा

✓ वास्तविक आय: हाल-ए-हासिल

✓ वतन जागीर की शुरुआत: अकबर के शासनकाल के अंतिम वर्षों में

✓ जागीरदारों की निगरानी करने वाला अधिकारी: सवानेह-निगार

✓ जमींदार को मिलने वाला हिस्सा: मालिकाना (लगभग 10%)

✓ जागीरदारी और जमींदारी में मुख्य अंतर: जागीरदारी हस्तांतरणीय, जमींदारी वंशानुगत

मुगलकालीन न्याय व्यवस्था

➣ मुगलकाल में बादशाह राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। न्याय व्यवस्था का प्रमुख आधार सामान्यतः इस्लामी शरीअत था,

➣ किन्तु अकबर के शासनकाल में व्यवहारिक एवं उदार नीति अपनाते हुए स्थानीय परम्पराओं तथा हिन्दू विधि को भी महत्व दिया गया।

➣ मुगल बादशाह प्रत्येक बुधवार को सार्वजनिक दरबार में बैठकर स्वयं मुकदमों की सुनवाई करता था तथा अंतिम निर्णय सुनाता था।

न्याय व्यवस्था की विशेषताएँविवरण
सर्वोच्च न्यायाधीशमुगल बादशाह
न्याय का प्रमुख आधारइस्लामी शरीअत (अकबर के समय अपेक्षाकृत उदार नीति)
न्याय दिवसप्रत्येक बुधवार
अंतिम अपीलबादशाह के समक्ष

प्रमुख न्यायिक अधिकारी

➣ बादशाह के बाद काज़ी-उल-कुज़ात (प्रधान काज़ी) न्याय विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था। उसकी सहायता के लिए मुफ्ती तथा अन्य न्यायिक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।

अधिकारीमुख्य कार्य
काज़ी-उल-कुज़ातसाम्राज्य का प्रधान न्यायाधीश
काज़ीस्थानीय स्तर पर न्यायिक कार्य
मुफ्तीशरीअत एवं कुरानी कानून की व्याख्या करना
मीर-ए-अदलन्यायिक कार्यवाही एवं न्यायालयीन सहायता

जहाँगीर एवं न्याय व्यवस्था

➣ जहाँगीर तथा शाहजहाँ के शासनकाल में प्रजा को सीधे बादशाह के समक्ष न्याय की गुहार लगाने का अधिकार प्राप्त था।

➣ जहाँगीर ने न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए प्रसिद्ध न्याय की स्वर्ण जंजीर (Chain of Justice) स्थापित करवाई थी, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति सीधे सम्राट तक अपनी फरियाद पहुँचा सकता था।

शासकन्याय व्यवस्था में योगदान
जहाँगीरन्याय की स्वर्ण जंजीर की स्थापना तथा प्रत्यक्ष फरियाद की व्यवस्था
शाहजहाँप्रजा को सीधे बादशाह के समक्ष फरियाद का अधिकार

अकबर की न्याय नीति

➣ अकबर ने हिन्दुओं से संबंधित मुकदमों के निपटारे के लिए हिन्दू पण्डितों की नियुक्ति की, ताकि निर्णय हिन्दू धर्मशास्त्र एवं स्थानीय परम्पराओं के अनुसार दिए जा सकें।

➣ जहाँगीर ने श्रीकान्त नामक एक हिन्दू विद्वान को हिन्दू मुकदमों की सुनवाई हेतु न्यायाधीश नियुक्त किया।

शासकविशेष कार्य
अकबरहिन्दू मुकदमों के लिए हिन्दू पण्डितों की नियुक्ति
जहाँगीरश्रीकान्त को हिन्दू न्यायाधीश नियुक्त किया

औरंगजेब एवं न्याय व्यवस्था

➣ औरंगजेब ने न्याय व्यवस्था में इस्लामी कानून को अधिक महत्व दिया। उसके शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण कार्य फतवा-ए-आलमगीरी का संकलन कराना था।

➣ प्रतियोगी परीक्षाओं की अनेक पुस्तकों में जवाबित-ए-आलमगीरी का उल्लेख औरंगजेब के धर्मनिरपेक्ष राजकीय आदेशों के संकलन के रूप में मिलता है।

ग्रंथमहत्व
फतवा-ए-आलमगीरीइस्लामी विधि (शरीअत) का संकलन
जवाबित-ए-आलमगीरीराजकीय आदेशों (जवाबित) का संकलन

🧠 याद रखें:

✓ मुगलकाल का सर्वोच्च न्यायाधीश: बादशाह

✓ बादशाह किस दिन न्याय करता था? प्रत्येक बुधवार

✓ प्रधान न्यायाधीश: काज़ी-उल-कुज़ात

✓ कुरानी कानून की व्याख्या कौन करता था? मुफ्ती

✓ न्याय की स्वर्ण जंजीर किसने स्थापित की? जहाँगीर

✓ हिन्दू मुकदमों हेतु पण्डितों की नियुक्ति किसने की? अकबर

✓ श्रीकान्त को न्यायाधीश किसने नियुक्त किया? जहाँगीर

✓ फतवा-ए-आलमगीरी का संकलन किसने कराया? औरंगजेब

मुगलकालीन राजस्व के स्रोत

➣ मुगल साम्राज्य की आय का सबसे प्रमुख स्रोत भू-राजस्व (लगान) था। इसके अतिरिक्त व्यापारिक कर, धार्मिक कर, उपहार (नज़र), युद्ध-लाभ तथा अन्य स्थानीय करों से भी राज्य को आय प्राप्त होती थी।

➣ व्यापक रूप से मुगलकालीन राजस्व के स्रोतों को दो भागों में विभाजित किया जाता है—

राजस्व का प्रकारमुख्य स्रोत
केन्द्रीय आय के स्रोतभू-राजस्व (खिराज), जजिया, जकात, खुम्स, सीमा शुल्क, पेशकश, नजर आदि।
स्थानीय आय के स्रोतस्थानीय उपकर, आबवाब, दसेहरी, जरीबाना, महासिलाना आदि।

➣ अकबर ने मुगल राजस्व व्यवस्था को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उसके शासनकाल में राजा टोडरमल के नेतृत्व में भूमि मापन, कर निर्धारण तथा लगान वसूली की एक सुव्यवस्थित प्रणाली विकसित की गई, जिसे मुगल प्रशासन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में माना जाता है।

भूमि का वर्गीकरण

➣ भू-राजस्व व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मुगलकालीन भूमि को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया था।

भूमि का प्रकारविवरणमुख्य उद्देश्य
खालसा भूमिप्रत्यक्ष रूप से बादशाह के नियंत्रण में रहने वाली भूमि।इससे प्राप्त समस्त राजस्व सीधे शाही खजाने में जमा होता था।
जागीर भूमिमनसबदारों एवं अधिकारियों को वेतन (तनख्वाह) के बदले दी जाने वाली भूमि।मनसबदार इसी भूमि से प्राप्त आय द्वारा अपना वेतन तथा सैनिक व्यय पूरा करते थे।
सयूरगल / मदद-ए-माश (मिल्क)धार्मिक विद्वानों, सूफी संतों, शिक्षकों तथा योग्य व्यक्तियों को दी जाने वाली कर-मुक्त (लगानहीन) अनुदान भूमि।धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं को प्रोत्साहन देना।

➣ मदद-ए-माश भूमि सामान्यतः धार्मिक, शैक्षणिक अथवा सामाजिक सेवाओं के लिए दी जाती थी तथा इस पर किसी प्रकार का भू-राजस्व नहीं लिया जाता था।

जाब्ती प्रणाली

➣ प्रारम्भ में अकबर ने शेरशाह सूरी द्वारा विकसित जाब्ती प्रणाली को अपनाया। इस व्यवस्था में भूमि की पैमाइश तथा वास्तविक उत्पादन के आधार पर कर निर्धारित किया जाता था। सामान्यतः उपज का लगभग एक-तिहाई (1/3) भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।

➣ जाब्ती अथवा जाब्ती-ए-हरसाला प्रणाली भूमि की पैमाइश, फसल की गुणवत्ता तथा औसत उत्पादन पर आधारित कर व्यवस्था थी।

विशेषताविवरण
आधारभूमि की पैमाइश एवं वास्तविक उत्पादन
कर की दरसामान्यतः उपज का 1/3 भाग
मुख्य क्षेत्रबिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, आगरा, दिल्ली, लाहौर तथा मुल्तान
कमियाँअत्यधिक खर्चीली, समय लेने वाली तथा व्यवहार में कठिन

➣ जाब्ती प्रणाली अत्यधिक खर्चीली एवं दोषपूर्ण सिद्ध होने के कारण 1568 ई. में शिहाबुद्दीन अहमद की सिफारिश पर इसे समाप्त कर दिया गया।

नस्क (कनकूत) व्यवस्था

➣ जाब्ती प्रणाली के स्थान पर नस्क अथवा कनकूत व्यवस्था लागू की गई। इस व्यवस्था में पिछले वर्षों की पैदावार एवं कर भुगतान के आधार पर अनुमान लगाकर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था।

विशेषताविवरण
आधारपूर्व वर्षों की औसत उपज एवं कर भुगतान का अनुमान
स्वरूपअनुमान आधारित (कच्चा अनुमान)
प्रकृतिएक प्रकार की ठेकेदारी व्यवस्था
मुख्य क्षेत्रबंगाल, गुजरात एवं काठियावाड़

➣ कनकूत शब्द का अर्थ है— खड़ी फसल का अनुमान लगाकर भू-राजस्व निर्धारित करना। इस पद्धति में प्रत्येक खेत की वास्तविक पैदावार काटने की आवश्यकता नहीं होती थी, जिससे समय एवं प्रशासनिक व्यय दोनों की बचत होती थी।

🧠 याद रखें:

✓ मुगलकालीन आय का सबसे बड़ा स्रोत: भू-राजस्व (लगान)

✓ जाब्ती प्रणाली को अपनाने वाला मुगल शासक: अकबर

✓ जाब्ती प्रणाली का आधार: भूमि की पैमाइश एवं उत्पादन

✓ नस्क व्यवस्था का आधार: पूर्व वर्षों की औसत उपज का अनुमान

✓ मदद-ए-माश भूमि: कर-मुक्त अनुदान भूमि

करोड़ी व्यवस्था

➣ 1573 ई. में गुजरात विजय के बाद अकबर ने भू-राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार प्रारम्भ किए। इसी क्रम में उसने बंगाल, बिहार एवं गुजरात को छोड़कर शेष क्षेत्रों में करोड़ी नामक अधिकारियों की नियुक्ति की।

➣ करोड़ी अधिकारियों की कुल संख्या 182 थी। इनका प्रमुख कार्य निर्धारित क्षेत्र से राजस्व की वसूली करना तथा कृषि एवं भूमि सम्बन्धी अभिलेखों को व्यवस्थित रखना था।

विषयतथ्य
प्रारम्भ1573 ई.
प्रवर्तकअकबर
कुल अधिकारी182
मुख्य कार्यएक करोड़ दाम राजस्व एकत्र करना तथा भूमि-राजस्व व्यवस्था का निरीक्षण करना।
कार्य क्षेत्रबंगाल, बिहार एवं गुजरात को छोड़कर शेष प्रमुख प्रदेश।

➣ करोड़ी का अर्थ ऐसे अधिकारी से था, जिसका लक्ष्य अपने अधिकार क्षेत्र से लगभग एक करोड़ दाम (लगभग 2,50,000 रुपये; क्योंकि 1 रुपया = 40 दाम) राजस्व एकत्र करना था।

➣ राजा टोडरमल ने बाद में इसी व्यवस्था के अनुभव के आधार पर मुगल भू-राजस्व प्रणाली को और अधिक वैज्ञानिक एवं स्थायी स्वरूप प्रदान किया।

आइन-ए-दहसाला (टोडरमल बंदोबस्त)

➣ 1580 ई. में अकबर ने अपने शासनकाल के 24वें वर्ष में आइन-ए-दहसाला नामक नवीन भू-राजस्व व्यवस्था लागू की। इसे टोडरमल बंदोबस्त भी कहा जाता है।

➣ इस व्यवस्था के वास्तविक प्रणेता राजा टोडरमल थे, जबकि ख्वाजा शाह मंसूर ने भी इसके निर्माण में महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।

➣ दहसाला व्यवस्था में विभिन्न फसलों की पिछले दस वर्षों की औसत उपज तथा उनके औसत बाजार मूल्य के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। सामान्यतः औसत उपज का एक-तिहाई (1/3) भाग राज्य का हिस्सा होता था।

विशेषताविवरण
प्रारम्भ1580 ई.
प्रवर्तकअकबर
मुख्य निर्माताराजा टोडरमल
आधारपिछले 10 वर्षों की औसत उपज एवं औसत बाजार मूल्य।
राजस्वऔसत उपज का लगभग 1/3 भाग।
भुगतान का माध्यममुख्यतः नकद

➣ इस व्यवस्था में किसान को सामान्यतः नकद रूप में भू-राजस्व देना पड़ता था। इससे राज्य की आय अधिक नियमित एवं निश्चित हो गई।

➣ यद्यपि कर निर्धारण दस वर्षों की औसत उपज पर आधारित था, किन्तु भू-राजस्व की वसूली प्रतिवर्ष की जाती थी। इसे माल-ए-हरसाला कहा जाता था।

➣ आइन-ए-दहसाला को एक प्रकार की रैय्यतवाड़ी प्रकृति की व्यवस्था माना जाता है, क्योंकि इसमें कृषक सीधे राज्य के प्रति उत्तरदायी था।

➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत खालसा तथा जागीर—दोनों प्रकार की भूमि को सम्मिलित किया गया था।

➣ बाद में शाहजहाँ के शासनकाल में मुर्शिद कुली खाँ ने दक्कन में भी इस व्यवस्था को लागू करने का प्रयास किया।

दहसाला व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ

विशेषताविवरण
भूमि मापनवैज्ञानिक पैमाइश के आधार पर।
कर निर्धारणदस वर्षों की औसत उपज एवं मूल्य के आधार पर।
भुगतानमुख्यतः नकद।
लाभराज्य एवं किसान—दोनों के लिए अपेक्षाकृत निश्चित एवं व्यवस्थित व्यवस्था।
सीमायह सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य में समान रूप से लागू नहीं थी।

➣ दहसाला व्यवस्था का नाम भले ही “दहसाला” था, किन्तु यह न तो दस वर्षों के लिए लागू की जाने वाली व्यवस्था थी और न ही स्थायी बंदोबस्त।

➣ हालाँकि कर निर्धारण पिछले दस वर्षों की औसत उपज के आधार पर किया जाता था, जबकि वसूली प्रतिवर्ष होती थी किन्तु आवश्यकता पड़ने पर राज्य इसमें संशोधन भी कर सकता था।

🧠 याद रखें:

✓ टोडरमल बंदोबस्त किसे कहा जाता है? आइन-ए-दहसाला

✓ आइन-ए-दहसाला कब लागू हुई? 1580 ई.

✓ दहसाला व्यवस्था किस औसत पर आधारित थी? पिछले 10 वर्षों की औसत उपज एवं मूल्य

✓ करोड़ी व्यवस्था कब प्रारम्भ हुई? 1573 ई.

✓ करोड़ी का प्रमुख कार्य: एक करोड़ दाम राजस्व एकत्र करना।

✓ माल-ए-हरसाला: दहसाला व्यवस्था के अंतर्गत प्रतिवर्ष वसूला जाने वाला भू-राजस्व।

कर निर्धारण

➣ मुगलकाल में भू-राजस्व (लगान) राज्य की आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था। विभिन्न प्रांतों की परिस्थितियों एवं कृषि उत्पादन को ध्यान में रखते हुए अनेक कर निर्धारण प्रणालियाँ प्रचलित थीं। इनमें बँटाई, जाब्ती, नस्क (कनकूत) तथा दहसाला प्रमुख थीं।

➣ इन प्रणालियों में बँटाई (गल्ला बख्शी) सबसे प्राचीन एवं सर्वाधिक प्रचलित व्यवस्था मानी जाती है।

बँटाई (गल्ला बख्शी) व्यवस्था

➣ बँटाई अथवा गल्ला बख्शी व्यवस्था को भाओली भी कहा जाता था।

➣ इस प्रणाली में राज्य एवं किसान के बीच वास्तविक कृषि उपज का निश्चित अनुपात में बँटवारा किया जाता था। सामान्यतः उपज का एक-तिहाई (1/3) भाग राज्य का होता था।

विषयतथ्य
अन्य नामगल्ला बख्शी, भाओली
आधारवास्तविक कृषि उपज का बँटवारा
राज्य का हिस्सासामान्यतः उपज का 1/3 भाग
भुगताननकद अथवा अनाज – दोनों रूपों में
प्रमुख क्षेत्रसिन्ध, काबुल के कुछ भाग, कंधार एवं कश्मीर

बँटाई के प्रकार

➣ बँटाई व्यवस्था के अंतर्गत फसल के विभाजन की प्रक्रिया के आधार पर इसे तीन प्रकारों में बाँटा गया था।

प्रकारकब बँटवारा होता था?मुख्य विशेषता
खेत बँटाईफसल तैयार होने के तुरंत बादखेत का भाग निर्धारित कर दिया जाता था।
लंक बँटाईफसल काटने के बादगट्ठरों (पूलों) का बँटवारा किया जाता था।
राशि बँटाईमड़ाई के बादतैयार अनाज का बँटवारा किया जाता था।

तिजारती (नकदी) फसलों पर कर

➣ बँटाई व्यवस्था में किसान अपनी सुविधा के अनुसार नकद अथवा अनाज में कर अदा कर सकता था, किन्तु तिजारती (नकदी) फसलों पर कर सामान्यतः नकद ही लिया जाता था।

प्रमुख नकदी फसलेंकर भुगतान
कपासनकद
नील
तिलहन
गन्ना (ईख)

जिहात

➣ निर्धारित भू-राजस्व के अतिरिक्त किसानों से जिहात नामक एक अतिरिक्त कर भी लिया जाता था। यह मुख्य भू-राजस्व के अतिरिक्त लगाया जाने वाला सहायक कर था।

कनकूत (दाना बंदी) व्यवस्था

➣ कनकूत व्यवस्था, बँटाई प्रणाली का विकसित एवं संशोधित रूप थी। इसे दाना बंदी भी कहा जाता था।

➣ इस व्यवस्था में खेत की पैदावार का अनुमान लगाकर प्रति बीघा उपज के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। इससे प्रत्येक खेत की वास्तविक उपज मापने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी और प्रशासनिक खर्च भी कम होता था।

विषयकनकूत व्यवस्था
अन्य नामदाना बंदी
आधारखड़ी फसल का अनुमान
लाभसमय एवं प्रशासनिक व्यय की बचत
स्वरूपअनुमान आधारित भू-राजस्व व्यवस्था

बँटाई एवं कनकूत में अंतर

आधारबँटाईकनकूत
कर निर्धारणवास्तविक उपज के आधार परअनुमानित उपज के आधार पर
समयफसल तैयार होने के बादफसल तैयार होने से पूर्व अनुमान
प्रशासनिक व्ययअधिककम
सटीकताअधिकअनुमान आधारित

🧠 याद रखें:

✓ गल्ला बख्शी का दूसरा नाम: भाओली

✓ बँटाई के प्रकार: खेत बँटाई, लंक बँटाई एवं राशि बँटाई

✓ दाना बंदी किसे कहा जाता था? कनकूत व्यवस्था

✓ बँटाई व्यवस्था में राज्य का सामान्य हिस्सा: उपज का 1/3 भाग

✓ तिजारती फसलों पर कर: मुख्यतः नकद

भू-राजस्व निर्धारण

➣ मुगलकाल में भू-राजस्व निर्धारण को अधिक वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित बनाने का श्रेय अकबर को दिया जाता है।

➣ भूमि की प्रकृति, उसकी उत्पादकता तथा नियमित खेती के आधार पर भूमि का वर्गीकरण किया गया, जिससे कर निर्धारण अधिक न्यायसंगत हो सका।

भूमि का वर्गीकरण

➣ अकबर ने भूमि को उसकी कृषि उपयोगिता एवं खेती की नियमितता के आधार पर चार भागों में विभाजित किया।

भूमि का प्रकारविशेषताखेती की स्थिति
पोलजसबसे उपजाऊ एवं नियमित रूप से जोती जाने वाली भूमिप्रत्येक वर्ष खेती; सामान्यतः वर्ष में दो फसलें
परतीउर्वरता बनाए रखने के लिए कुछ समय खाली छोड़ी जाने वाली भूमिएक या दो वर्ष के अंतराल के बाद खेती
चाचरलम्बे समय तक खाली रहने के बाद पुनः खेती योग्य बनाई जाने वाली भूमितीन से चार वर्ष के अंतराल पर खेती
बंजरअनुपजाऊ अथवा खेती योग्य नहीं मानी जाने वाली भूमिइस पर सामान्यतः लगान नहीं लिया जाता था

➣ पोलज एवं परती भूमि से नियमित आय प्राप्त होती थी, इसलिए मुगल प्रशासन इन दोनों पर विशेष ध्यान देता था।

भूमि वर्गीकरण का महत्व

लाभप्रभाव
भूमि की सही पहचानउचित कर निर्धारण संभव हुआ।
उत्पादकता का आकलनराजस्व व्यवस्था अधिक वैज्ञानिक बनी।
कृषकों के साथ समान व्यवहारअनुचित कर वसूली में कमी आई।
प्रशासनिक सुविधाभू-अभिलेख अधिक व्यवस्थित हुए।

भूमि की श्रेणियाँ

➣ केवल पोलज एवं परती भूमि को उनकी उत्पादकता के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता था।

श्रेणीविशेषताराजस्व निर्धारण
उत्तमसर्वाधिक उपजाऊ भूमिउच्च औसत उपज के आधार पर
मध्यमसामान्य उपज वाली भूमिमध्यम औसत उपज के आधार पर
निकृष्टकम उपज देने वाली भूमिकम औसत उपज के आधार पर

➣ इन तीनों श्रेणियों की औसत उपज निकालकर उसी के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। इससे कर निर्धारण अपेक्षाकृत अधिक न्यायपूर्ण माना जाता था।

भू-राजस्व निर्धारण का आधार

आधारविवरण
भूमि की प्रकृतिभूमि की उर्वरता एवं खेती की नियमितता
औसत उपजभूमि की वास्तविक उत्पादक क्षमता
भूमि की श्रेणीउत्तम, मध्यम एवं निकृष्ट
फसलविभिन्न फसलों की औसत पैदावार

इलाही संवत (फसली संवत)

➣ भू-राजस्व व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से अकबर ने सौर गणना पर आधारित इलाही संवत प्रारम्भ किया। इसे फसली संवत भी कहा जाता है।

विषयतथ्य
प्रारम्भ1583 ई.
प्रवर्तकअकबर
आधारसौर (Solar) गणना
अन्य नामफसली संवत
उद्देश्यभू-राजस्व एवं कृषि वर्ष का एकरूपी निर्धारण

➣ इलाही संवत का उद्देश्य राजस्व वर्ष को कृषि चक्र के अनुरूप बनाना था, जिससे लगान वसूली में सुविधा हो तथा किसानों एवं प्रशासन—दोनों के लिए एक समान समय-निर्धारण उपलब्ध हो सके।

🧠 याद रखें:

✓ भूमि का चार भागों में वर्गीकरण किसने किया? अकबर

✓ सबसे उपजाऊ भूमि: पोलज

✓ तीन से चार वर्ष बाद जोती जाने वाली भूमि: चाचर

✓ खेती योग्य नहीं मानी जाने वाली भूमि: बंजर

✓ इलाही संवत कब प्रारम्भ हुआ? 1583 ई.

✓ इलाही संवत का आधार: सौर गणना

भूमि की माप

➣ मुगलकाल में अकबर ने भू-राजस्व व्यवस्था को अधिक वैज्ञानिक बनाने के लिए भूमि मापन प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार किए। सटीक भूमि मापन के कारण कर निर्धारण अधिक न्यायसंगत एवं व्यवस्थित हो सका।

➣ प्रारम्भ में भूमि की माप गज-ए-सिकंदरी से की जाती थी, किन्तु 1588 ई. में अकबर ने इसके स्थान पर गज-ए-इलाही को लागू किया।

विषयतथ्य
पुरानी मापगज-ए-सिकंदरी
नई मापगज-ए-इलाही
प्रारम्भ1588 ई.
प्रवर्तकअकबर
दोनों मापों का अनुपात39 : 41

➣ गज-ए-इलाही के लागू होने से भूमि मापन अधिक समान एवं प्रमाणिक हो गया, जिससे भू-राजस्व निर्धारण में एकरूपता आई।

शाहजहाँ के भूमि मापन सुधार

➣ शाहजहाँ ने भी भूमि मापन प्रणाली में परिवर्तन करते हुए दो नई मापों का प्रचलन किया।

नई मापविशेषता
बीघा-ए-इलाहीभूमि मापन की मानक इकाई
दिरा-ए-शाहजहाँनीइसे बीघा-ए-दफ्तरी भी कहा जाता था।

➣ औरंगजेब के पश्चात् बीघा-ए-दफ्तरी का प्रयोग धीरे-धीरे समाप्त हो गया, जबकि बीघा-ए-इलाही का उपयोग मुगल साम्राज्य के अंतिम काल तक होता रहा।

तनब से जरीब तक

➣ भूमि मापन की शुद्धता बढ़ाने के लिए अकबर ने तनब (रस्सी) के स्थान पर जरीब का प्रयोग प्रारम्भ कराया।

तनबजरीब
रस्सी से बनी होती थी।लोहे की कड़ियों से जुड़े बाँस के डंडों से बनाई जाती थी।
मौसम के अनुसार सिकुड़ती एवं फैलती थी।लम्बाई स्थिर रहती थी।
भूमि मापन में त्रुटि की संभावना अधिक।भूमि मापन अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय।

➣ जरीब का प्रयोग प्रारम्भ करने वाला पहला मुगल शासक अकबर था। यह मुगल भूमि सुधारों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

कनकूत एवं नस्क प्रथा

➣ कनकूत प्रथा में खेत की माप कर प्रति बीघा अनुमानित उपज के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था।

➣ नस्क तथा कनकूत दोनों अनुमान आधारित व्यवस्थाएँ थीं, किन्तु विभिन्न क्षेत्रों में इनके स्थानीय नाम भिन्न थे।

क्षेत्रप्रचलित नाम
कश्मीरगल्ला-ए-बख्श
गुजरातनक्स-ए-जुज़ (आंशिक नस्क)

भूमि मापन सुधारों का महत्व

सुधारलाभ
गज-ए-इलाहीमानकीकृत भूमि मापन
जरीबअधिक शुद्ध पैमाइश
बीघा-ए-इलाहीभूमि अभिलेखों में एकरूपता
दहसाला व्यवस्थावैज्ञानिक भू-राजस्व निर्धारण

🧠 याद रखें:

✓ गज-ए-इलाही किसने प्रारम्भ किया? अकबर

✓ गज-ए-इलाही कब प्रारम्भ हुआ? 1588 ई.

✓ जरीब का प्रयोग प्रारम्भ करने वाला शासक: अकबर

✓ बीघा-ए-दफ्तरी का दूसरा नाम: दिरा-ए-शाहजहाँनी

✓ कश्मीर में नस्क का स्थानीय नाम: गल्ला-ए-बख्श

✓ गुजरात में नस्क का स्थानीय नाम: नक्स-ए-जुज़

मुगलकाल में भू-राजस्व दर

➣ मुगलकाल में भू-राजस्व की दरें सभी क्षेत्रों में समान नहीं थीं। इनका निर्धारण भूमि की उर्वरता, सिंचाई की व्यवस्था, फसल के प्रकार तथा स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाता था।

➣ सामान्यतः अकबर के शासनकाल में कृषि उपज का लगभग एक-तिहाई (1/3) भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था। यह दर उस समय की अपेक्षाकृत संतुलित एवं व्यावहारिक राजस्व व्यवस्था मानी जाती है।

क्षेत्र / शासनकालभू-राजस्व दरविशेष टिप्पणी
सामान्य क्षेत्र (अकबर)उपज का लगभग 1/3 भागसबसे प्रचलित दर
गुजरातउपज का लगभग 1/2 भागउच्च उत्पादकता के कारण अधिक दर
राजपूतानासामान्यतः 1/7 या 1/8 भागस्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपेक्षाकृत कम दर

शाहजहाँ के समय भू-राजस्व व्यवस्था

➣ शाहजहाँ के शासनकाल में राज्य की बढ़ती आर्थिक आवश्यकताओं के कारण अनेक क्षेत्रों में भू-राजस्व की दरों में वृद्धि की गई।

विषयतथ्य
सामान्य भूमिलगभग 50% तक भू-राजस्व
कुओं से सिंचित भूमिउपज का लगभग 1/3 भाग
मुख्य उद्देश्यशाही आय में वृद्धि

➣ सिंचित भूमि पर अपेक्षाकृत कम दर इसलिए रखी गई क्योंकि कुओं द्वारा सिंचाई में किसानों को अतिरिक्त श्रम एवं व्यय करना पड़ता था।

ठेकेदारी प्रथा

➣ शाहजहाँ के शासनकाल में भू-राजस्व वसूली के लिए ठेकेदारी प्रथा का विस्तार हुआ। इस व्यवस्था में राज्य सीधे किसानों से लगान वसूल करने के स्थान पर ठेकेदारों अथवा मध्यस्थों के माध्यम से राजस्व प्राप्त करता था।

लाभहानि
राज्य को निश्चित आय प्राप्त होती थी।किसानों पर ठेकेदारों का अत्यधिक दबाव बढ़ जाता था।
प्रशासनिक कार्य अपेक्षाकृत सरल हो जाता था।राज्य एवं कृषकों के बीच प्रत्यक्ष संबंध कमजोर पड़ गया।
वसूली की जिम्मेदारी ठेकेदार पर होती थी।कई स्थानों पर किसानों का शोषण बढ़ा।

जमा एवं हासिल

➣ मुगल राजस्व प्रशासन में जमा तथा हासिल दो महत्वपूर्ण शब्द थे। प्रतियोगी परीक्षाओं में इनसे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।

शब्दअर्थ
जमासरकार द्वारा निर्धारित अनुमानित भू-राजस्व
हासिलवास्तव में वसूल किया गया भू-राजस्व

➣ यदि किसी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा, अकाल अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती थीं, तो हासिल प्रायः जमा से कम रहता था।

➣ शाहजहाँ ने जमा एवं हासिल के बीच के अंतर को कम करने के लिए मासिक अनुपात के आधार पर मनसबदारों के वेतन तथा उनके सैनिक दायित्वों में आवश्यक संशोधन किए।

🧠 याद रखें:

✓ अकबर के समय सामान्य भू-राजस्व: उपज का लगभग 1/3 भाग

✓ गुजरात में भू-राजस्व: उपज का लगभग 1/2 भाग

✓ राजपूताना में भू-राजस्व: लगभग 1/7 या 1/8 भाग

✓ जमा: अनुमानित राजस्व

✓ हासिल: वास्तविक वसूला गया राजस्व

✓ ठेकेदारी प्रथा का विस्तार: शाहजहाँ के शासनकाल में

जागीर भूमि एवं भू-राजस्व व्यवस्था

➣ शाहजहाँ के शासनकाल तक मुगल साम्राज्य की अधिकांश उपजाऊ भूमि मनसबदारों एवं उच्च अधिकारियों को जागीर के रूप में प्रदान की जा चुकी थी।

विषयतथ्य
शासनकालशाहजहाँ
जागीर के अधीन भूमिलगभग 70%
शेष भूमिमुख्यतः खालसा भूमि
मुख्य उद्देश्यमनसबदारों के वेतन एवं सैनिक व्यय की पूर्ति

➣ जागीरदार भूमि का स्वामी नहीं होता था, बल्कि उसे केवल उस क्षेत्र से निश्चित अवधि तक राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त होता था। भूमि का अंतिम स्वामित्व राज्य के पास ही रहता था।

भू-राजस्व के अतिरिक्त लिए जाने वाले उपकर

➣ किसानों को निर्धारित भू-राजस्व के अतिरिक्त भूमि मापन, वसूली तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए कुछ अतिरिक्त शुल्क भी देने पड़ते थे।

उपकरउद्देश्यदर / विवरण
जाबितानाभूमि मापन एवं अभिलेख व्यवस्था से संबंधित शुल्कप्रति बीघा एक दाम (कुछ क्षेत्रों में)
जरीबानाभूमि की पैमाइश हेतु लिया जाने वाला शुल्कलगभग 2.5%
महासिलानाराजस्व वसूली करने वाले कर्मचारियों का पारिश्रमिकलगभग 5%

अन्य कर एवं उपकर

करविवरण
दसेहरीप्रति बीघा के आधार पर लिया जाने वाला अतिरिक्त कर।
आबवाबभू-राजस्व के अतिरिक्त लगाए जाने वाले विभिन्न स्थानीय उपकरों का सामूहिक नाम।

➣ समय के साथ आबवाब की संख्या बढ़ती गई, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ा। बाद के अनेक शासकों ने इन अतिरिक्त उपकरों को कम करने या समाप्त करने का प्रयास किया।

दक्कन की भू-राजस्व व्यवस्था

➣ मुगल साम्राज्य के दक्कन क्षेत्र में प्रारम्भिक काल में भू-राजस्व की वसूली उत्तर भारत से भिन्न पद्धति से की जाती थी।

विषयतथ्य
शासनकालअकबर
राजस्व निर्धारण का आधारहल (Plough) की संख्या
विशेषताभूमि की पैमाइश के बजाय कृषि क्षमता के आधार पर कर निर्धारण

➣ बाद में दक्कन के अनेक क्षेत्रों में भी मुगल भू-राजस्व सुधारों के अंतर्गत अधिक व्यवस्थित प्रणालियाँ लागू की गईं।

🧠 याद रखें:

✓ शाहजहाँ के समय जागीर भूमि: लगभग 70%

✓ जाबिताना: भूमि मापन संबंधी शुल्क

✓ जरीबाना: लगभग 2.5%

✓ महासिलाना: लगभग 5%

✓ दसेहरी: प्रति बीघा लिया जाने वाला कर

✓ आबवाब: अतिरिक्त स्थानीय उपकर

✓ दक्कन में भू-राजस्व का आधार: हल की संख्या

राजस्व के अन्य स्रोत

➣ भू-राजस्व (खिराज) मुगल साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था, किन्तु इसके अतिरिक्त भी अनेक धार्मिक, व्यापारिक एवं प्रशासनिक करों से शाही आय प्राप्त होती थी।

शब्दअर्थ
खालसाजिसका राजस्व सीधे शाही खजाने में जाता था।
जागीरमनसबदार को राजस्व वसूली हेतु दी गई भूमि।
जरीबानाभूमि मापन शुल्क।
महासिलानाराजस्व वसूली शुल्क।
आबवाबविभिन्न अतिरिक्त स्थानीय कर।
राजस्व का स्रोतसंक्षिप्त विवरण
जजियागैर-मुस्लिम प्रजा से लिया जाने वाला कर
जकातमुसलमानों पर लगाया जाने वाला धार्मिक कर
खुम्सयुद्ध में प्राप्त लूट पर लगाया जाने वाला कर
तमगाव्यापार एवं आवागमन से संबंधित कर
पेशकश एवं नजरअधीनस्थ शासकों एवं मनसबदारों द्वारा दी जाने वाली भेंट

जजिया

➣ जजिया गैर-मुस्लिम प्रजा से लिया जाने वाला व्यक्तिगत कर था। इसका उद्देश्य केवल राजस्व प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि इस्लामी शासन व्यवस्था के अंतर्गत गैर-मुस्लिम प्रजा की स्थिति को भी निर्धारित करना था।

➣ भारत में सर्वप्रथम 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध विजय के बाद जजिया कर लगाया।

घटनातथ्य
भारत में प्रथम जजिया712 ई. – मुहम्मद बिन कासिम
अकबर1564 ई. में जजिया समाप्त किया
औरंगजेब1679 ई. में पुनः लागू किया
मुहम्मदशाह18वीं शताब्दी में इसका प्रभाव समाप्त हो गया

➣ सामान्यतः ब्राह्मण, महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध, अपंग, साधु-संत तथा कुछ अन्य विशेष वर्गों को जजिया से छूट प्राप्त थी।

जजिया की दरें

आय / सम्पत्तिजजिया
10,000 दिरहम से अधिक48 दिरहम
200–10,000 दिरहम24 दिरहम
200 दिरहम से कम12 दिरहम

जकात

➣ जकात मुसलमानों पर लगाया जाने वाला धार्मिक कर था। सामान्यतः यह कुल सम्पत्ति का 2.5% होता था।

विषयतथ्य
किससे लिया जाता था?मुसलमानों से
दरकुल सम्पत्ति का 2.5%
मुगलकाल में उपयोगमुख्यतः सीमा शुल्क एवं व्यापारिक कर के रूप में

➣ अकबर ने जकात सहित कई करों को समाप्त करने का प्रयास किया, जबकि औरंगजेब ने भी कुछ परिस्थितियों में इसकी वसूली पर रोक लगाने के आदेश दिए।

खुम्स

➣ खुम्स युद्ध में प्राप्त लूट से संबंधित कर था। प्रारम्भिक इस्लामी परम्परा के अनुसार इसका 1/5 भाग राज्य का तथा 4/5 भाग सैनिकों का होता था।

भागप्राप्तकर्ता
1/5राज्य
4/5सैनिक

➣ मुगलकाल में नियमित वेतन प्रणाली लागू होने के बाद खुम्स का महत्व धीरे-धीरे कम हो गया।

तमगा

➣ तमगा व्यापार एवं आवागमन से संबंधित कर था।

शासककार्य
जहाँगीरतमगा कर समाप्त किया

पेशकश एवं नजर

➣ अधीनस्थ राजा, सामंत तथा मनसबदार समय-समय पर सम्राट को पेशकश (नकद भेंट) एवं नजर (सम्मान स्वरूप उपहार) प्रस्तुत करते थे। इससे भी शाही आय में वृद्धि होती थी।

बैतुलमाल

➣ यदि किसी उच्च अधिकारी या अमीर की मृत्यु बिना उत्तराधिकारी के हो जाती थी, तो उसकी सम्पत्ति राजगतिमा कानून के अंतर्गत बैतुलमाल (शाही कोष) में जमा कर दी जाती थी।

शब्दअर्थ
बैतुलमालराजकीय / शाही खजाना
राजगतिमावारिसहीन सम्पत्ति का राज्य में विलय

🧠 याद रखें:

✓ भारत में सर्वप्रथम जजिया किसने लगाया? मुहम्मद बिन कासिम (712 ई.)

✓ अकबर ने जजिया कब समाप्त किया? 1564 ई.

✓ औरंगजेब ने जजिया कब पुनः लगाया? 1679 ई.

✓ जकात की सामान्य दर: 2.5%

✓ खुम्स में राज्य का हिस्सा: 1/5

✓ तमगा कर किसने समाप्त किया? जहाँगीर

भू-राजस्व अधिकारी

➣ मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित थी। यद्यपि भू-राजस्व का निर्धारण प्रत्येक कृषक (रैय्यत) के आधार पर किया जाता था, किन्तु उसकी वसूली एवं अभिलेखों का कार्य विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जाता था।

➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए राजस्व व्यवस्था को ग्राम, परगना, सरकार एवं सूबा स्तर पर संगठित किया गया था। प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग अधिकारी नियुक्त होते थे।

ग्राम स्तर के अधिकारी

अधिकारीमुख्य कार्यपारिश्रमिक / विशेषता
मुकद्दमगाँव का प्रधान; किसानों से लगान वसूल करना तथा प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना।लगभग 2.5% नकद अथवा राजस्व-मुक्त भूमि।
पटवारीभूमि, फसल एवं राजस्व का अभिलेख रखना।वसूले गए राजस्व का लगभग 1% दस्तूरी।

➣ मुकद्दम तथा पटवारी दोनों पद सामान्यतः वंशानुगत होते थे।

➣ गाँव की परती एवं चारागाह भूमि पर अंतिम अधिकार राज्य का माना जाता था।

परगना स्तर के अधिकारी

अधिकारीमुख्य कार्य
आमिल (अमलगुजार)भू-राजस्व की वसूली, राजस्व प्रशासन एवं कानून-व्यवस्था की देखरेख।
कानूनगोभूमि, लगान एवं परंपरागत अभिलेखों का संरक्षण तथा राजस्व अधिकारियों को जानकारी उपलब्ध कराना।
अमीनभूमि की पैमाइश, उपज का आकलन तथा राजस्व निर्धारण में सहायता करना।

करोड़ी अधिकारी

➣ 1573 ई. में अकबर ने बंगाल, बिहार एवं गुजरात को छोड़कर शेष क्षेत्रों में करोड़ी अधिकारियों की नियुक्ति की।

विषयतथ्य
प्रवर्तकअकबर
प्रारम्भ1573 ई.
कुल संख्या182
मुख्य कार्यएक करोड़ दाम राजस्व की वसूली तथा राजस्व व्यवस्था का निरीक्षण।

➣ करोड़ी अधिकारी बाद में टोडरमल द्वारा विकसित दहसाला व्यवस्था की आधारशिला सिद्ध हुए।

मदद-ए-माश एवं वक्फ ग्राम

➣ जिन गाँवों अथवा भूमि को मदद-ए-माश या वक्फ के रूप में कर-मुक्त प्रदान किया जाता था, वे धार्मिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त होते थे।

प्रकारउद्देश्य
मदद-ए-माशविद्वानों, सूफी संतों एवं योग्य व्यक्तियों को अनुदान।
वक्फधार्मिक संस्थाओं एवं सार्वजनिक कल्याण के लिए समर्पित भूमि।

मुक्तई प्रथा

➣ मुक्तई प्रथा को एक प्रकार की मिश्रित राजस्व व्यवस्था माना जाता है। इसके अंतर्गत गाँव के मुखिया अथवा भू-स्वामी से दो से तीन वर्षों के लिए एक निश्चित राशि पर लगान वसूली का समझौता किया जाता था।

विशेषताविवरण
अवधि2–3 वर्ष
आधारएकमुश्त निर्धारित लगान
उद्देश्यराजस्व वसूली को सरल एवं निश्चित बनाना

राजस्व अधिकारियों का प्रशासनिक स्तर

प्रशासनिक स्तरप्रमुख अधिकारी
ग्राममुकद्दम, पटवारी
परगनाआमिल, कानूनगो, अमीन
विशेष राजस्व अधिकारीकरोड़ी

🧠 याद रखें:

✓ गाँव का प्रधान: मुकद्दम

✓ भूमि अभिलेख रखने वाला अधिकारी: पटवारी

✓ परगना का प्रमुख राजस्व अधिकारी: आमिल (अमलगुजार)

✓ भूमि अभिलेखों का संरक्षक: कानूनगो

✓ भूमि की पैमाइश करने वाला अधिकारी: अमीन

✓ 1573 ई. में नियुक्त अधिकारी: करोड़ी

✓ एक करोड़ दाम वसूलने वाला अधिकारी: करोड़ी

✓ मुक्तई प्रथा की अवधि: 2–3 वर्ष

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। इसके अतिरिक्त उद्योग, व्यापार, हस्तशिल्प तथा भू-राजस्व व्यवस्था ने भी साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ मुगलकालीन आर्थिक जीवन की विस्तृत जानकारी मुख्यतः आइन-ए-अकबरी, तुजुक-ए-जहाँगीरी तथा विदेशी यात्रियों के विवरणों से प्राप्त होती है।

मुख्य स्रोतविवरण
आइन-ए-अकबरीअबुल फ़ज़ल द्वारा रचित; मुगल प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ।
तुजुक-ए-जहाँगीरीजहाँगीर की आत्मकथा; प्रशासन एवं समकालीन परिस्थितियों की जानकारी।
विदेशी यात्रीबर्नियर, पेलसार्ट, मनूची, टैवर्नियर आदि के विवरण।

कृषि

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि थी। अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं उससे संबंधित व्यवसायों पर निर्भर थी।

➣ फ्राँस्वा बर्नियर के अनुसार मुगलकाल में सम्राट को समस्त भूमि का सर्वोच्च स्वामी माना जाता था, जबकि किसान भूमि पर खेती करने का अधिकार रखते थे।

➣ कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्य किसानों को तकाबी (कृषि ऋण) प्रदान करता था, जिससे वे बीज, पशु एवं कृषि उपकरण खरीद सकें।

विषयतथ्य
मुख्य व्यवसायकृषि
कृषि ऋणतकाबी
ऋण का उद्देश्यबीज, बैल, कृषि उपकरण एवं खेती का विस्तार
भूमि का सर्वोच्च स्वामीसम्राट (बर्नियर के अनुसार)

वनकटी प्रथा

➣ कृषि योग्य भूमि का विस्तार करने के लिए जंगलों को साफ कर नई भूमि को खेती योग्य बनाया जाता था। इस प्रक्रिया को वनकटी कहा जाता था।

प्रथाउद्देश्य
वनकटीजंगल साफ कर कृषि योग्य भूमि का विस्तार करना।

कृषक वर्ग

➣ मुगलकाल में कृषकों को भूमि पर अधिकार एवं कृषि कार्य की प्रकृति के आधार पर मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था।

कृषक वर्गविशेषताभूमि पर अधिकार
खुदकाश्तअपने ही गाँव में स्वयं की भूमि पर खेती करने वाले किसान।स्थायी एवं वंशानुगत अधिकार।
पाहीकाश्तदूसरे गाँव में जाकर अस्थायी रूप से खेती करने वाले किसान।अस्थायी अधिकार।
मुजारियानबटाईदार किसान; दूसरों की भूमि लेकर खेती करते थे।स्वामित्व अधिकार नहीं।

खुदकाश्त किसान

➣ खुदकाश्त किसान अपने गाँव में अपनी भूमि पर खेती करते थे। इन्हें भूमि का वंशानुगत स्वामी माना जाता था।

➣ इन्हें अपनी भूमि बेचने, दान देने अथवा बटाई पर देने का अधिकार प्राप्त था। इन्हें मालिक-ए-जमीन भी कहा जाता था।

पाहीकाश्त किसान

➣ पाहीकाश्त किसान दूसरे गाँवों में जाकर अस्थायी रूप से खेती करते थे। ये सामान्यतः उतनी ही भूमि जोतते थे, जितनी पर उनका परिवार कृषि कार्य कर सके।

मुजारियान किसान

➣ मुजारियान किसान प्रायः बटाईदार होते थे। इनके पास स्वयं की भूमि नहीं होती थी या बहुत कम होती थी।

➣ ये खुदकाश्त किसानों से भूमि लेकर खेती करते थे तथा उपज का निश्चित भाग भूमि स्वामी को देते थे।

➣ इन्हें अपनी जोत को बेचने, गिरवी रखने (रेहन) अथवा हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं था।

कृषक वर्ग की तुलना

आधारखुदकाश्तपाहीकाश्तमुजारियान
भूमि का स्वामित्वहाँनहींनहीं
खेती का स्थानअपना गाँवदूसरा गाँवदूसरों की भूमि
भूमि बेचने का अधिकारहाँनहींनहीं
मुख्य पहचानमालिक-ए-जमीनअस्थायी कृषकबटाईदार किसान

🧠 याद रखें:

✓ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार: कृषि

✓ कृषि ऋण: तकाबी

✓ भूमि का सर्वोच्च स्वामी (बर्नियर के अनुसार): सम्राट

✓ वनकटी: जंगल साफ कर कृषि भूमि बनाना

✓ मालिक-ए-जमीन: खुदकाश्त किसान

✓ बटाईदार किसान: मुजारियान

✓ दूसरे गाँव में खेती करने वाला किसान: पाहीकाश्त

फसलें

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। आइन-ए-अकबरी में रबी एवं खरीफ दोनों प्रकार की फसलों तथा उनसे प्राप्त राजस्व का विस्तृत विवरण मिलता है।

फसल का प्रकारमुख्य तथ्य
रबीलगभग 16 फसलों का उल्लेख मिलता है।
खरीफलगभग 25 फसलों का उल्लेख मिलता है।

प्रमुख फसलें

➣ मुगलकाल में खाद्यान्न एवं नकदी (तिजारती) दोनों प्रकार की फसलों की खेती की जाती थी। नकदी फसलों से राज्य को अधिक राजस्व प्राप्त होता था।

खाद्यान्न फसलेंनकदी (तिजारती) फसलें
गेहूँगन्ना
चावलकपास
जौनील
बाजरारेशम
दालेंअफीम

➣ गन्ना, कपास, नील एवं रेशम को तिजारती (नकदी) फसलें अथवा जीन्स-ए-आला कहा जाता था। इन पर सामान्यतः अधिक दर से भू-राजस्व लिया जाता था तथा कर का भुगतान प्रायः नकद किया जाता था।

प्रमुख उत्पादन केंद्र

फसलप्रमुख क्षेत्रविशेष तथ्य
गन्नाबंगाल, पंजाब, गुजरातबंगाल का गन्ना सर्वोत्तम माना जाता था।
नीलबयाना (आगरा), सरखेज (गुजरात)इसका वर्णन पेलसार्ट ने किया है।
अफीमबिहार एवं मालवामुख्यतः औषधीय उपयोग।
गुड़ एवं चीनीपंजाब, बंगाल एवं गुजरातमहत्वपूर्ण व्यापारिक वस्तुएँ।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

विषयतथ्य
मक्कापूर्वी राजस्थान एवं महाराष्ट्र में 18वीं शताब्दी से व्यापक रूप से उगाई जाने लगी; आइन-ए-अकबरी में इसका उल्लेख नहीं मिलता।
दालेंमुगलकाल की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में सम्मिलित।
जीन्स-ए-आलाउच्च मूल्य वाली नकदी (तिजारती) फसलें।

तंबाकू

➣ तंबाकू भारत की मूल फसल नहीं थी। इसका आगमन पुर्तगालियों के माध्यम से हुआ और शीघ्र ही यह भारत के अनेक भागों में लोकप्रिय हो गई।

घटनातथ्य
भारत में आगमनपुर्तगालियों द्वारा
अकबर के दरबार में प्रस्तुतिबीजापुर के कुछ सरदारों द्वारा
व्यापक खेती का प्रसारजहाँगीर के शासनकाल में
प्रतिबंध का प्रयासजहाँगीर के बारह अध्यादेशों के अंतर्गत

➣ तंबाकू के लोकप्रिय होने के बावजूद जहाँगीर ने इसके सेवन को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उसके बारह अध्यादेशों में तंबाकू के सेवन पर रोक लगाने का उल्लेख मिलता है।

🧠 याद रखें:

✓ रबी फसलों का उल्लेख: लगभग 16

✓ खरीफ फसलों का उल्लेख: लगभग 25

✓ जीन्स-ए-आला: नकदी (तिजारती) फसलें

✓ सर्वश्रेष्ठ नील: बयाना एवं सरखेज

✓ अफीम का प्रमुख उत्पादन: बिहार एवं मालवा

✓ भारत में तंबाकू लाने वाले: पुर्तगाली

✓ तंबाकू की खेती का प्रसार: जहाँगीर के शासनकाल में

✓ तंबाकू पर रोक लगाने का प्रयास: जहाँगीर के बारह अध्यादेश

मुगलकाल में अकाल

➣ मुगलकाल में समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में अकाल पड़ते रहे, जिनका कृषि, व्यापार तथा जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनमें 1630–31 ई. का अकाल सबसे भीषण माना जाता है।

➣ 1630–31 ई. में शाहजहाँ के शासनकाल में गुजरात, दक्कन (दक्षिण भारत) तथा आसपास के क्षेत्रों में भीषण अकाल पड़ा। इसका विस्तृत वर्णन इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी तथा अंग्रेज यात्री पीटर मुंडी ने अपने विवरणों में किया है।

➣ इस अकाल के कारण कृषि उत्पादन नष्ट हो गया, खाद्यान्न की भारी कमी उत्पन्न हुई तथा बड़ी संख्या में लोगों को भुखमरी एवं महामारी का सामना करना पड़ा।

➣ राहत कार्यों के अंतर्गत शाहजहाँ ने खालसा भूमि (राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली भूमि) पर लगाए जाने वाले भू-राजस्व में लगभग 70 लाख रुपये की छूट प्रदान की। साथ ही अनेक स्थानों पर राहत एवं सहायता कार्य भी कराए गए।

विषयविवरण
समय1630–31 ई.
शासकशाहजहाँ
प्रभावित क्षेत्रगुजरात एवं दक्कन (दक्षिण भारत)
ऐतिहासिक स्रोतअब्दुल हमीद लाहौरी एवं पीटर मुंडी
राहत उपायखालसा भूमि के भू-राजस्व में लगभग 70 लाख रुपये की छूट
विशेषतामुगलकाल के सबसे भीषण अकालों में से एक

मुगलकालीन सिंचाई व्यवस्था

➣ मुगलकाल में कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर थी, फिर भी कुओं, तालाबों, रहट तथा नहरों के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी।

➣ तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) में उल्लेख मिलता है कि भारत में मध्य एशिया जैसी विकसित नहर व्यवस्था का अभाव था, यद्यपि कृषि भूमि अत्यन्त उपजाऊ थी।

➣ कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों द्वारा कुएँ, तालाब, रहट (Persian Wheel) तथा स्थानीय जल स्रोतों का व्यापक उपयोग किया जाता था।

शाहजहाँ के सिंचाई सुधार

➣ शाहजहाँ ने कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा अकाल की समस्या से निपटने के लिए सिंचाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। उसके शासनकाल में अनेक नहरों का निर्माण एवं पुरानी नहरों का विस्तार कराया गया।

नहरनिर्माता / संरक्षकविशेषता
नहर-ए-फैजशाहजहाँकृषि सिंचाई हेतु निर्मित।
नहर-ए-शाहशाहजहाँफ़िरोज़ तुगलक की नहर का विस्तार एवं पुनर्निर्माण।

➣ फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा निर्मित नहर-ए-साहिब का शाहजहाँ ने पुनरुद्धार कराया, उसे लगभग 60 मील तक बढ़ाया तथा उसका नाम नहर-ए-शाह रखा।

मुगलकाल में सिंचाई के प्रमुख साधन

साधनउपयोग
कुएँस्थानीय सिंचाई का प्रमुख साधन।
तालाबवर्षा जल संचयन एवं सिंचाई।
नहरेंबड़े कृषि क्षेत्रों की सिंचाई।
रहटकुओं से पानी निकालकर खेतों तक पहुँचाना।

सिंचाई व्यवस्था का महत्व

क्षेत्रप्रभाव
कृषि उत्पादनफसलों की उत्पादकता में वृद्धि।
अकाल नियंत्रणसूखे की स्थिति में आंशिक राहत।
राजस्वभू-राजस्व में स्थिरता बनी रही।
ग्रामीण अर्थव्यवस्थाकृषि आधारित जीवन को सहायता मिली।

🧠 याद रखें:

✓ 1630–31 का भीषण अकाल किसके शासनकाल में पड़ा? शाहजहाँ

✓ अकाल का वर्णन किन लोगों ने किया? अब्दुल हमीद लाहौरी एवं पीटर मुंडी

✓ भू-राजस्व में कितनी छूट दी गई? लगभग 70 लाख रुपये

✓ तुज़ुक-ए-बाबरी किसकी रचना है? बाबर

✓ नहर-ए-फैज का निर्माण किसने कराया? शाहजहाँ

✓ नहर-ए-शाह किस नहर का विस्तारित रूप थी? फ़िरोज़ तुगलक की नहर-ए-साहिब

✓ रहट क्या है? कुओं से पानी निकालने का सिंचाई यंत्र

मुगलकालीन उद्योग एवं व्यापार

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि था, किन्तु उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य ने भी साम्राज्य की समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ भारत के सूती वस्त्र, रेशमी कपड़े, नील, मसाले एवं हस्तशिल्प की विदेशों में अत्यधिक माँग थी।

➣ मुगल शासकों के संरक्षण में अनेक शाही कारखाने (कारखाना) स्थापित किए गए, जहाँ वस्त्र, हथियार, आभूषण, कालीन एवं विलासिता की वस्तुओं का निर्माण किया जाता था।

व्यापार की प्रमुख विशेषताएँविवरण
मुख्य आधारकृषि एवं हस्तशिल्प
प्रमुख निर्यातसूती वस्त्र, नील, अफीम, शोरा, मसाले
प्रमुख आयातसोना, चाँदी, घोड़े, कच्चा रेशम
विशेषताभारत का विदेशी व्यापार अत्यन्त विकसित था।

वस्त्र उद्योग

➣ मुगलकाल में वस्त्र उद्योग भारत का सबसे विकसित एवं समृद्ध उद्योग था। भारतीय वस्त्र अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता, महीन बुनाई तथा आकर्षक रंगाई के कारण एशिया एवं यूरोप के बाजारों में अत्यधिक लोकप्रिय थे।

➣ विशेष रूप से सूती वस्त्र उद्योग सबसे अधिक विकसित था। भारतीय सूती कपड़ों की विदेशी बाजारों में अत्यधिक माँग थी, जिसके कारण यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण निर्यात उद्योग बन गया।

सूती वस्त्र उद्योग

➣ भारत में निर्मित सूती वस्त्रों को यूरोपीय व्यापारी सामान्यतः कैलिको (Calico) कहते थे। यह नाम कालीकट (Calicut) से निर्यात होने वाले कपड़ों के कारण प्रसिद्ध हुआ।

प्रमुख केन्द्रविशेषता
बंगालअत्यन्त महीन सूती वस्त्र एवं मलमल
अहमदाबादउच्च गुणवत्ता के सूती वस्त्र
लखनऊसूती एवं कढ़ाईदार वस्त्र
मदुरादक्षिण भारत का प्रमुख वस्त्र केन्द्र
नासिक एवं नागपुरसूती कपड़ा उत्पादन

➣ ढाका की मलमल विश्वविख्यात थी। इसे इतना महीन माना जाता था कि विदेशी यात्री इसे “बुना हुआ वायु” (Woven Air) तक कहते थे।

रेशम उद्योग

➣ मुगलकाल में रेशम उद्योग भी अत्यन्त विकसित था। गुजरात का प्रसिद्ध पटोला रेशमी वस्त्र अपनी उत्कृष्ट बुनाई एवं आकर्षक डिज़ाइन के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध था।

प्रमुख केन्द्रविशेषता
ढाकारेशमी एवं मिश्रित वस्त्र
कश्मीररेशमी एवं शाही वस्त्र
आगरारेशमी वस्त्र निर्माण
लाहौररेशम उद्योग का प्रमुख केन्द्र
दिल्लीशाही कारखानों में रेशमी वस्त्र निर्माण
अहमदाबादपटोला रेशमी वस्त्र के लिए प्रसिद्ध

➣ रेशम उद्योग के विकास के बावजूद मुगलकाल में कच्चे रेशम का आयात भी किया जाता था, विशेषकर फ़ारस (ईरान) एवं मध्य एशिया से।

ऊनी वस्त्र उद्योग

➣ मुगलकाल में कश्मीर एवं पंजाब ऊनी वस्त्र एवं शाल निर्माण के लिए प्रसिद्ध थे।

➣ जहाँगीर ने अमृतसर में ऊनी वस्त्र उद्योग को विशेष संरक्षण प्रदान किया, जिससे वहाँ इस उद्योग का विकास हुआ।

प्रमुख केन्द्रविशेषता
कश्मीरपश्मीना एवं शाल उद्योग
पंजाबऊनी वस्त्र एवं शाल
अमृतसरजहाँगीर के संरक्षण में ऊनी वस्त्र उद्योग

वस्त्र उद्योग : एक दृष्टि में

उद्योगप्रमुख केन्द्रविशेष पहचान
सूतीबंगाल, अहमदाबाद, लखनऊ, मदुराविदेशों में सर्वाधिक निर्यात
रेशमीढाका, कश्मीर, आगरा, लाहौर, दिल्लीपटोला रेशम प्रसिद्ध
ऊनीकश्मीर, पंजाब, अमृतसरशाल एवं पश्मीना

🧠 याद रखें:

✓ मुगलकाल का सबसे विकसित उद्योग: सूती वस्त्र उद्योग

✓ भारतीय सूती कपड़ों का यूरोपीय नाम: कैलिको (Calico)

✓ पटोला रेशम का प्रमुख केन्द्र: अहमदाबाद (गुजरात)

✓ विश्वप्रसिद्ध मलमल: ढाका

✓ ऊनी शालों का प्रमुख केन्द्र: कश्मीर

✓ ऊनी वस्त्र उद्योग को संरक्षण देने वाला मुगल शासक: जहाँगीर

धातु उद्योग

➣ मुगलकाल में धातु उद्योग अत्यंत विकसित था। ताँबा, पीतल, कांसा, लोहा, चाँदी एवं सोने से विभिन्न प्रकार के बर्तन, हथियार, मूर्तियाँ तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

➣ शाही संरक्षण के कारण धातु उद्योग का व्यापक विकास हुआ। बड़े नगरों में शाही कारखानों (Karkhanas) में कुशल कारीगर कार्य करते थे।

उद्योगप्रमुख केन्द्रविशेषता
ताँबा एवं पीतलबनारस, अहमदाबाद, पूना, नासिक, तंजौरबर्तन एवं घरेलू उपयोग की वस्तुएँ
काँसाबंगालकाँसे के बर्तनों का प्रमुख उत्पादन
हस्तशिल्पलाहौरधातु एवं अन्य हस्तनिर्मित वस्तुओं का प्रमुख केन्द्र

धातु जड़ाई कला

➣ मुगलकाल में धातु पर नक्काशी एवं जड़ाई कला अत्यन्त विकसित थी।

केन्द्रविशेषता
बीदरचाँदी की जड़ाई (बिदरी कला) के लिए प्रसिद्ध।
तंजौरधातु जड़ाई एवं कलात्मक धातु शिल्प।

➣ बीदर की प्रसिद्ध बिदरी कला (Bidri Ware) में काले धातु पात्रों पर चाँदी की सुंदर जड़ाई की जाती थी। यह आज भी भारत की प्रसिद्ध हस्तशिल्प कलाओं में गिनी जाती है।

खनिज एवं धातुएँ

खनिज / धातुप्रमुख क्षेत्र
ताँबाराजस्थान एवं मध्य भारत
हीरागोलकुण्डा एवं छोटानागपुर

हथियार उद्योग

➣ मुगलकाल में युद्धों की अधिकता के कारण हथियार उद्योग अत्यन्त विकसित था। तलवार, बंदूक, ढाल, कवच, भाले तथा तोपों का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जाता था।

हथियारप्रमुख केन्द्र
तोड़दार बन्दूक (मस्कट / तुफंग)मेवाड़ एवं सियालकोट
तलवारकालिंजर, बनारस, लाहौर, गोलकुण्डा एवं गुजरात

➣ मुगल सेना में उत्कृष्ट गुणवत्ता के हथियारों के निर्माण हेतु शाही कार्यशालाएँ स्थापित थीं, जहाँ कुशल कारीगरों द्वारा हथियार बनाए जाते थे।

हीरा उद्योग

➣ मुगलकाल में गोलकुण्डा विश्व के प्रमुख हीरा उत्पादक क्षेत्रों में से एक था। यहाँ से प्राप्त हीरे एशिया एवं यूरोप तक निर्यात किए जाते थे।

विषयतथ्य
प्रमुख हीरा क्षेत्रगोलकुण्डा एवं छोटानागपुर
विश्वप्रसिद्ध हीराकोहिनूर
शाहजहाँ को भेंटमीर जुमला (मुहम्मद सैय्यद)

➣ विश्वप्रसिद्ध कोहिनूर हीरा गोलकुण्डा की खानों से प्राप्त हुआ था। बाद में मीर जुमला ने इसे शाहजहाँ को भेंट किया।

अन्य उद्योग

➣ वस्त्र एवं धातु उद्योग के अतिरिक्त मुगलकाल में अनेक लघु उद्योग भी विकसित थे।

उद्योगप्रमुख केन्द्रविशेषता
गुड़ एवं चीनीबंगाल, गुजरात, पंजाबव्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उद्योग
मिट्टी के बर्तनदिल्ली, बनारस, चुनारघरेलू एवं सजावटी उपयोग
रेशम उद्योगआगरा, लाहौर, दिल्ली, ढाका, बंगालशाही संरक्षण प्राप्त उद्योग
चमड़ा उद्योगविभिन्न नगरजूते, मशक एवं अन्य उपयोगी वस्तुएँ

➣ मुगलकाल में समुद्री जहाज निर्माण का उद्योग यूरोपीय देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम विकसित था, फिर भी पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर व्यापारिक जहाजों का निर्माण किया जाता था।

🧠 याद रखें:

✓ बिदरी कला का प्रमुख केन्द्र: बीदर

✓ काँसा उद्योग का प्रमुख केन्द्र: बंगाल

✓ हस्तशिल्प का प्रमुख केन्द्र: लाहौर

✓ तोड़दार बन्दूक का प्रमुख केन्द्र: मेवाड़ एवं सियालकोट

✓ तलवार निर्माण के प्रमुख केन्द्र: कालिंजर, बनारस, लाहौर, गोलकुण्डा, गुजरात

✓ कोहिनूर हीरा: गोलकुण्डा की खान

✓ कोहिनूर शाहजहाँ को किसने भेंट किया? मीर जुमला

निर्यात एवं आयात

➣ मुगलकाल में भारत का विदेशी व्यापार अत्यन्त समृद्ध था। भारत से निर्मित वस्तुओं का बड़े पैमाने पर निर्यात होता था, जबकि बहुमूल्य धातुएँ एवं कुछ विशेष वस्तुएँ आयात की जाती थीं।

निर्यात की प्रमुख वस्तुएँआयात की प्रमुख वस्तुएँ
सूती वस्त्रसोना
नीलचाँदी
शोराघोड़े
अफीमकच्चा रेशम

व्यापारी वर्ग

➣ मुगलकाल में व्यापारियों के विभिन्न वर्ग थे, जो अपने कार्य के अनुसार अलग-अलग नामों से जाने जाते थे।

व्यापारीमुख्य कार्य
सेठबड़े थोक व्यापारी एवं वित्तदाता
बोहरालम्बी दूरी का व्यापार एवं थोक व्यापार
मोदीअनाज एवं दैनिक उपयोग की वस्तुओं का व्यापार
वणिकखुदरा व्यापारी
बंजारेएक स्थान से दूसरे स्थान तक माल का परिवहन

➣ बंजारे बैलों एवं ऊँटों के बड़े काफिलों के माध्यम से विभिन्न राज्यों के बीच वस्तुओं का परिवहन करते थे। दक्षिण भारत में ऐसे हिन्दू व्यापारियों को कोलिंग अथवा किलंगो कहा जाता था।

वाणिज्य

➣ मुगलकाल में आन्तरिक एवं विदेशी व्यापार दोनों अत्यन्त विकसित थे। भारत के वस्त्र, नील, अफीम, शोरा, मसाले तथा अन्य हस्तनिर्मित वस्तुओं की एशिया एवं यूरोप में व्यापक माँग थी।

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः मुद्रा आधारित थी। व्यापारिक लेन-देन में हुंडी, सर्राफ, बीमा तथा बैंकिंग जैसी व्यवस्थाएँ विकसित हो चुकी थीं।

विशेषताएँविवरण
व्यापार का स्वरूपआन्तरिक एवं विदेशी दोनों
लेन-देन का आधारमुद्रा प्रणाली
प्रमुख साधनहुंडी, सर्राफ, बीमा एवं बैंकिंग

हुंडी

➣ हुंडी मुगलकाल की एक महत्वपूर्ण साख-पत्र (Credit Instrument) व्यवस्था थी। इसके माध्यम से व्यापारी बिना नकद धन साथ रखे दूर-दराज़ के क्षेत्रों में सुरक्षित व्यापार कर सकते थे।

विषयतथ्य
स्वरूपसाख-पत्र / विनिमय-पत्र
उपयोगव्यापारिक भुगतान एवं धन हस्तांतरण
लाभनकद धन ले जाने की आवश्यकता नहीं

➣ बड़े व्यापारिक लेन-देन सामान्यतः हुंडी के माध्यम से ही किए जाते थे।

सर्राफ

➣ सर्राफ मुद्रा विनिमय, धन जमा करने तथा हुंडी जारी करने का कार्य करता था। वह आधुनिक बैंक की भाँति व्यापारियों को वित्तीय सेवाएँ प्रदान करता था।

कार्यविवरण
मुद्रा विनिमयविभिन्न सिक्कों का आदान-प्रदान
हुंडीजारी करना एवं भुगतान करना
धन जमाव्यापारियों की पूँजी सुरक्षित रखना

चुंगी (सीमा शुल्क)

➣ मुगलकाल में व्यापारिक वस्तुओं पर चुंगी (Custom Duty) लगाई जाती थी। समय के साथ इसकी दरों में परिवर्तन हुआ।

कालचुंगी की दर
प्रारम्भिक मुगल कालवस्तु के मूल्य का 2.5%
बाद में3.5%
औरंगजेब (हिन्दू व्यापारी)5%
औरंगजेब (मुस्लिम व्यापारी)2.5%

मुसादात

➣ मुगलकाल में अमीरों एवं उच्च अधिकारियों को राज्य द्वारा दिए जाने वाले ऋण को मुसादात कहा जाता था।

प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ एवं उत्पादन केन्द्र

वस्तुप्रमुख केन्द्र
नीलसरखेज (गुजरात) एवं बयाना (आगरा)
शोराबिहार एवं कोरोमण्डल तट
सूती वस्त्रबंगाल, अहमदाबाद, लखनऊ

बर्नियर की टिप्पणी

➣ फ्राँस्वा बर्नियर ने लिखा कि विश्व के विभिन्न भागों से सोना एवं चाँदी अन्ततः भारत पहुँच जाते थे, क्योंकि भारत से बड़ी मात्रा में वस्तुओं का निर्यात होता था और बदले में बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त होती थीं।

🧠 याद रखें:

✓ थोक व्यापारी: सेठ, बोहरा, मोदी

✓ खुदरा व्यापारी: वणिक

✓ हुंडी: साख-पत्र / विनिमय-पत्र

✓ सर्राफ: मुद्रा विनिमय एवं हुंडी विशेषज्ञ

✓ प्रारम्भिक चुंगी दर: 2.5%

✓ औरंगजेब के समय हिन्दू व्यापारियों पर चुंगी: 5%

✓ भारत का प्रमुख निर्यात: सूती वस्त्र

✓ मुसादात: राज्य द्वारा अमीरों को दिया जाने वाला ऋण

मुगलकालीन मुद्रा व्यवस्था

➣ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार मुद्रा प्रणाली थी। साम्राज्य में करों की वसूली, व्यापार तथा दैनिक लेन-देन मुख्यतः नकद मुद्रा के माध्यम से होता था।

➣ मुगलों ने मुख्यतः सोने (मुहर), चाँदी (रुपया) तथा ताँबे (दाम) के सिक्के प्रचलित किए।

➣ मुगलकाल में ताँबे का दाम दैनिक लेन-देन की सबसे अधिक प्रचलित मुद्रा थी, जबकि चाँदी का रुपया बड़े व्यापार एवं राजस्व वसूली का प्रमुख माध्यम था।

➣ अकबर ने शेरशाह की मुद्रा प्रणाली को अपनाकर पूरे मुगल साम्राज्य में एक समान मुद्रा व्यवस्था लागू की। उसके शासनकाल में सिक्कों की ढलाई, वजन तथा धातु की शुद्धता को निश्चित मानकों के अनुसार नियंत्रित किया गया।

➣ मुगल शासकों ने शेरशाह सूरी द्वारा स्थापित त्रिधातु (सोना–चाँदी–ताँबा) मुद्रा प्रणाली को अपनाकर उसे अधिक संगठित एवं मानकीकृत रूप प्रदान किया।

➣ मुगलकालीन सिक्के मुख्यतः गोलाकार होते थे, किन्तु अकबर ने वर्गाकार (जलाली) तथा कुछ विशेष अवसरों पर अन्य आकृतियों वाले सिक्के भी जारी किए।

➣ मुगल साम्राज्य में विभिन्न स्थानों पर टकसालें स्थापित थीं, जहाँ सिक्कों की ढलाई की जाती थी। प्रत्येक टकसाल में सिक्कों की शुद्धता, वजन तथा एकरूपता का विशेष ध्यान रखा जाता था।

➣ टकसाल का सर्वोच्च अधिकारी दरोगा-ए-टकसाल कहलाता था। सिक्कों की धातु की शुद्धता की जाँच तथा मानकों के पालन में दरोगा एवं सर्राफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

➣ 1577 ई. में अकबर ने दिल्ली में शाही टकसाल की स्थापना की तथा प्रसिद्ध चित्रकार एवं सुलेखक ख्वाजा अब्दुस्समद को उसका प्रधान नियुक्त किया। उन्हें शीरी कलम की उपाधि प्राप्त थी।

➣ मुगलकाल में सिक्कों की सर्वाधिक ढलाई तथा टकसालों का सर्वाधिक विस्तार औरंगजेब के शासनकाल में हुआ।

बाबर एवं अकबर

➣ बाबर ने चाँदी के सिक्कों पर एक ओर कलमा तथा चारों खलीफाओं के नाम और दूसरी ओर बाबर का नाम एवं उपाधि अंकित रहती थी।

➣ बाबर ने काबुल एवं कंधार की टकसालों से शाहरूखी तथा बाबरी नामक चाँदी के सिक्के जारी किए।

➣ हुमायूँ के शासनकाल में राजनीतिक अस्थिरता के कारण मुद्रा व्यवस्था में कोई विशेष सुधार नहीं हो सका। उसने प्रचलित सिक्का प्रणाली को ही बनाए रखा।

➣ शेरशाह ने 180 ग्रेन (लगभग 11.5–11.6 ग्राम) वजन का चाँदी का रुपया चलाया, जिसमें लगभग 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी होती थी। यही रुपया आगे चलकर मुगल साम्राज्य की प्रमुख मुद्रा बना।

➣ अकबर ने अपने सिक्कों पर “अल्लाहु अकबर” तथा “जल्ले जलालुहू” जैसे वाक्य अंकित कराए। बाद में दीन-ए-इलाही की स्थापना के पश्चात् कुछ सिक्कों पर इलाही संवत् का भी प्रयोग किया गया।

➣ अकबर ने अपने शासन के 50वें वर्ष (1605 ई.) विशेष स्मारक सिक्के जारी कराए, जिन पर भगवान राम एवं माता सीता की आकृतियाँ अंकित थीं तथा देवनागरी लिपि में “राम सिया” लिखा गया था।

➣ असीरगढ़ दुर्ग की विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने एक विशेष स्वर्ण सिक्का जारी कराया, जिसके एक ओर बाज की आकृति तथा दूसरी ओर टकसाल एवं तिथि अंकित थी।

➣ अकबर ने रुपये के कई अंशमूल्य भी जारी किए, जिनमें दरब (आधा रुपया), चरण (चौथाई रुपया), पनडाऊ (रुपये का पाँचवाँ भाग), अष्ठा (आठवाँ भाग), काला (सोलहवाँ भाग) तथा सूकी (बीसवाँ भाग) प्रमुख थे।

➣ अकबर ने स्वर्ण (मुहर एवं इलाही), रजत (रुपया एवं जलाली) तथा ताँबे (दाम) के सिक्कों को व्यापक रूप से प्रचलित किया।

➣ ताँबे का सबसे छोटा सिक्का जीतल (चीतल) कहलाता था। यह लेखांकन एवं छोटे लेन-देन में प्रयुक्त होता था तथा इसका मूल्य दाम के 1/25 भाग के बराबर माना जाता था।

➣ अकबर ने जलाली नामक वर्गाकार चाँदी का सिक्का भी चलाया, जो मुगलकाल के विशिष्ट सिक्कों में से एक माना जाता है।

जहाँगीर, शाहजहाँ एवं औरंगजेब के सिक्के

➣ जहाँगीर को मुगलकाल का सर्वाधिक कलाप्रेमी एवं प्रयोगशील शासक माना जाता है। उसने सिक्कों की आकृति, अभिलेख एवं कलात्मकता में अनेक नवीन प्रयोग किए।

➣ जहाँगीर प्रथम मुगल शासक था, जिसने अपने चित्र वाले सिक्के जारी कराए। कुछ सिक्कों में उसे हाथ में मदिरा का प्याला लिए हुए भी प्रदर्शित किया गया है।

➣ जहाँगीर ने कुछ सिक्कों पर अपना तथा नूरजहाँ दोनों का नाम अंकित कराया। यह मुगलकाल की एक विशिष्ट विशेषता थी।

➣ जहाँगीर ने प्रसिद्ध राशिचक्र (Zodiac) सिक्के भी जारी किए, जिन पर बारह राशियों (मेष, वृष, मिथुन आदि) के चिह्न अंकित थे। ये सिक्के मुगलकालीन कला एवं मुद्रा इतिहास की अनूठी धरोहर माने जाते हैं।

➣ जहाँगीर ने नूरशाही, नूर सुल्तानी, नूर दौलत, नूर करम, नूर मिहर आदि नामों से अनेक विशेष सिक्के जारी किए।

➣ राज्यारोहण के पश्चात् जहाँगीर ने एक विशेष स्वर्ण मुहर भी जारी कराई, जिस पर अकबर की आकृति अंकित थी।

➣ शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल मुद्रा प्रणाली में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया गया। उसने अकबर द्वारा स्थापित मानकीकृत मुद्रा व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया।

➣ शाहजहाँ के समय सिक्कों की सुलेख, धातु की शुद्धता तथा कलात्मक गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया। उसके शासनकाल में मुगल सिक्के अपनी उत्कृष्ट बनावट के लिए प्रसिद्ध हुए।

➣ औरंगजेब ने धार्मिक दृष्टिकोण के कारण सिक्कों पर कलमा अंकित कराने की परम्परा समाप्त कर दी, ताकि सिक्कों के अपवित्र होने की सम्भावना न रहे।

➣ औरंगजेब के शासनकाल में साम्राज्य के सर्वाधिक विस्तार के कारण टकसालों की संख्या तथा सिक्कों की ढलाई भी सर्वाधिक हुई।

➣ औरंगजेब के समय चाँदी का रुपया लगभग 180 ग्रेन का था तथा 1 रुपया = 60 दाम के बराबर माना जाता था।

➣ शासन के अन्तिम वर्षों में औरंगजेब ने कुछ सिक्कों पर मीर अब्दुल बाकी शाहबाई द्वारा रचित फ़ारसी पद्य भी अंकित कराए।

चित्रयुक्त (Portrait) सिक्के — सर्वप्रथम जहाँगीर ने जारी किए।
राशिचक्र (Zodiac) सिक्के — जहाँगीर के समय जारी हुए।
सिक्कों पर नूरजहाँ का नाम — जहाँगीर के शासनकाल की विशेषता।
सिक्कों पर कलमा लिखने की परम्परा समाप्त — औरंगजेब।
सर्वाधिक टकसालें एवं सिक्कों की ढलाई — औरंगजेब के समय।

मुगलकालीन प्रमुख सिक्के एवं महत्वपूर्ण तथ्य

विषय / सिक्काविवरण
मुगलकाल की प्रमुख मुद्राचाँदी का रुपया
रुपयाशेरशाह सूरी द्वारा मानकीकृत चाँदी का सिक्का, जिसे मुगल शासकों ने व्यापक रूप से अपनाया।
मुहरमुगलकाल का प्रमुख स्वर्ण सिक्का, जिसका व्यापक प्रचलन विशेषकर अकबर के समय हुआ।
इलाहीअकबर द्वारा जारी स्वर्ण सिक्का, जिसका मूल्य लगभग 10 रुपये के बराबर माना जाता था।
शहंशाहीउच्च मूल्य का विशेष स्वर्ण सिक्का, जिसका उपयोग बड़े राजकीय एवं औपचारिक लेन-देन में किया जाता था।
जलालीअकबर द्वारा जारी वर्गाकार चाँदी का सिक्का।
निसारजहाँगीर द्वारा जारी चाँदी का अंशमूल्य सिक्का, जिसका प्रयोग उपहार एवं इनाम देने में भी किया जाता था।
दाममुगलकाल का सबसे अधिक प्रचलित ताँबे का सिक्का; अकबर के समय 1 रुपया = 40 दाम।
जीतल (चीतल)ताँबे का सबसे छोटा सिक्का, जिसका मूल्य लगभग दाम के 1/25 भाग के बराबर माना जाता था।
महमूदीगुजरात का प्रसिद्ध चाँदी का सिक्का, जिसकी ढलाई मुगल शासन में भी जारी रही।
भारतीय रुपये का आधारशेरशाह सूरी द्वारा प्रचलित रुपया।
शाही टकसाल1577 ई. में अकबर ने दिल्ली में स्थापित की।
शाही टकसाल का प्रधानख्वाजा अब्दुस्समद, जिन्हें शीरी कलम की उपाधि प्राप्त थी।
चित्रयुक्त (Portrait) सिक्केसर्वप्रथम जहाँगीर ने जारी किए।
राशिचक्रसिक्केजहाँगीर द्वारा जारी किए गए।
राम-सीता अंकित सिक्केअकबर द्वारा शासन के 50वें वर्ष जारी किए गए स्मारक सिक्के।
कलमा हटाने वाला शासकऔरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा अंकित कराने की परम्परा समाप्त की।
सर्वाधिक टकसालें एवं सिक्कों की ढलाईऔरंगजेब के शासनकाल में।
अकबर के समय मुद्रा अनुपात1 रुपया = 40 दाम
औरंगजेब के समय मुद्रा अनुपात1 रुपया = 60 दाम

🧠 याद रखें:

✓ शेरशाह सूरी ने मानकीकृत चाँदी का रुपया प्रचलित किया।

✓ अकबर ने मुगल मुद्रा प्रणाली को संगठित एवं मानकीकृत बनाया।

✓ 1577 ई. में दिल्ली में शाही टकसाल की स्थापना की गई।

✓ ख्वाजा अब्दुस्समद शाही टकसाल के प्रथम प्रधान नियुक्त किए गए।

✓ जलाली अकबर का प्रसिद्ध वर्गाकार चाँदी का सिक्का था।

✓ इलाही अकबर का प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्का था।

✓ राम-सीता अंकित स्मारक सिक्के अकबर ने जारी किए।

✓ जहाँगीर ने अपने चित्र, नूरजहाँ के नाम तथा राशिचक्र वाले सिक्के जारी किए।

✓ औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा अंकित कराने की परम्परा समाप्त कर दी।

✓ मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार चाँदी का रुपया तथा दैनिक लेन-देन का प्रमुख माध्यम ताँबे का दाम था।

मुगलकालीन सैन्य विभाग

➣ मुगल साम्राज्य की शक्ति का प्रमुख आधार उसकी सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था थी। विशाल साम्राज्य की स्थापना, विस्तार तथा सुरक्षा का मुख्य दायित्व सेना पर ही निर्भर था।

➣ प्रारम्भिक मुगल सेना का संगठन मंगोल एवं तैमूरी सैन्य परम्पराओं पर आधारित था। बाद में अकबर ने अपने शासन के 19वें वर्ष (1575 ई.) में मनसबदारी व्यवस्था लागू कर सेना को अधिक संगठित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।

➣ मुगल सेना में विभिन्न जातीय एवं क्षेत्रीय समूहों जैसे ईरानी, तूरानी, तुर्क, अफगान, उजबेक, मंगोल, भारतीय मुसलमान तथा मराठा सैनिक सम्मिलित थे।

मुगल सेना के प्रमुख अंग

सेना का प्रकारमुख्य कार्य
पैदल सेनास्थल युद्ध एवं दुर्गों की सुरक्षा।
घुड़सवार सेनामुगल सेना की सबसे शक्तिशाली एवं प्रमुख शाखा।
तोपखानायुद्ध में तोपों एवं बारूद का संचालन।
हस्ति सेनायुद्ध, रसद एवं शाही प्रतिष्ठा का प्रतीक।
नौसेनानदी एवं समुद्री अभियानों में सीमित उपयोग।

मुगल सेना की विशेषताएँ

विशेषताविवरण
संगठनमनसबदारी व्यवस्था पर आधारित।
मुख्य शक्तिघुड़सवार सेना एवं तोपखाना।
सैनिक संरचनाविभिन्न जातीय समूहों का मिश्रण।
सर्वोच्च सेनापतिमुगल बादशाह।
सैन्य विभाग का प्रमुखमीर बख्शी।

मुगल सेना के प्रमुख सैनिक

➣ मुगल सेना में सैनिकों को उनकी नियुक्ति एवं नियंत्रण के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया था।

सैनिकविशेषता
अहदीसीधे बादशाह के अधीन रहने वाले सैनिक।
दाखिलीराज्य द्वारा भर्ती, परन्तु मनसबदारों के अधीन नियुक्त सैनिक।
मनसबदारों के सैनिकमनसबदारों द्वारा रखे एवं नियंत्रित सैनिक।
अधीनस्थ राजाओं के सैनिकसामंत एवं आश्रित शासकों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सैनिक।

अहदी सैनिक

➣ अहदी सैनिक सीधे बादशाह के अधीन रहते थे। इन्हें मुगल सेना का सबसे विश्वसनीय वर्ग माना जाता था।

➣ इनकी भर्ती, वेतन, घोड़े, हथियार तथा वर्दी का पूरा प्रबन्ध राज्य द्वारा किया जाता था।

➣ अहदी सैनिकों के लिए अलग बख्शी तथा अमीर नियुक्त किए जाते थे।

दाखिली सैनिक

➣ दाखिली सैनिक भी राज्य द्वारा भर्ती किए जाते थे, किन्तु इन्हें विभिन्न मनसबदारों के अधीन सेवा हेतु नियुक्त किया जाता था।

➣ इनका वेतन मनसबदारों के माध्यम से दिया जाता था, जबकि नियुक्ति राज्य की ओर से होती थी।

अहदी एवं दाखिली सैनिकों में अंतर

आधारअहदी सैनिकदाखिली सैनिक
नियंत्रणसीधे बादशाह के अधीनमनसबदारों के अधीन
भर्तीराज्य द्वाराराज्य द्वारा
वेतनसीधे राज्य सेमनसबदारों के माध्यम से
महत्वशाही निजी सेनासामान्य सैन्य सहायता

🧠 याद रखें:

✓ मुगल सेना का सर्वोच्च सेनापति: बादशाह

✓ सैन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी: मीर बख्शी

✓ मनसबदारी व्यवस्था कब लागू हुई? अकबर के शासन के 19वें वर्ष (1575 ई.)

✓ मुगल सेना की सबसे महत्वपूर्ण शाखा: घुड़सवार सेना

✓ सीधे बादशाह के अधीन सैनिक: अहदी

✓ मनसबदारों के अधीन नियुक्त सैनिक: दाखिली

✓ बाबर की सेना किस परम्परा पर आधारित थी? मंगोल एवं तैमूरी परम्परा

पैदल सेना

➣ मुगल सेना में पैदल सेना (Infantry) का महत्व घुड़सवार सेना की तुलना में कम था, फिर भी दुर्गों की सुरक्षा, रसद व्यवस्था तथा युद्ध के समय सहायक सेना के रूप में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

➣ पैदल सेना मुख्यतः दो प्रकार की होती थी— अहशाम तथा सेहबन्दी।

पैदल सैनिकमुख्य कार्य
अहशामबन्दूक, तलवार एवं अन्य हथियारों से युद्ध करने वाले नियमित सैनिक।
सेहबन्दीअस्थायी सैनिक, जो राजस्व वसूली, रसद व्यवस्था एवं आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता प्रदान करते थे।

➣ सेहबन्दी सैनिक शांति काल में राजस्व वसूली तथा प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करते थे, जबकि युद्धकाल में सेना की सहायक टुकड़ी के रूप में कार्य करते थे।

अहशाम एवं सेहबन्दी में अंतर

आधारअहशामसेहबन्दी
स्वरूपनियमित सैनिकअस्थायी सैनिक
मुख्य कार्ययुद्ध करनाराजस्व वसूली एवं रसद व्यवस्था
नियुक्तिस्थायीआवश्यकतानुसार

घुड़सवार सेना (रिसाला)

➣ घुड़सवार सेना (रिसाला) मुगल सेना की सबसे शक्तिशाली एवं प्रभावशाली शाखा थी। साम्राज्य की अधिकांश सैन्य सफलताओं का आधार इसी शाखा को माना जाता है।

➣ घुड़सवार सैनिक मुख्यतः बारगीर एवं सिलेदार दो प्रकार के होते थे।

घुड़सवार सैनिकविशेषता
बारगीरघोड़े, हथियार एवं साज-सामान राज्य द्वारा उपलब्ध कराया जाता था।
सिलेदारघोड़े एवं युद्ध सामग्री की व्यवस्था सैनिक स्वयं करता था। इसलिए इसका वेतन अपेक्षाकृत अधिक होता था।

बारगीर एवं सिलेदार में अंतर

आधारबारगीरसिलेदार
घोड़ाराज्य द्वारास्वयं का
हथियारराज्य द्वारास्वयं की व्यवस्था
वेतनतुलनात्मक रूप से कमतुलनात्मक रूप से अधिक

घोड़ों की संख्या के आधार पर घुड़सवार

प्रकारविशेषता
यक-अस्पाएक घोड़ा रखने वाला घुड़सवार।
दु-अस्पादो घोड़े रखने वाला घुड़सवार।
सिह-अस्पातीन घोड़े रखने वाला घुड़सवार।
निम-अस्पादो सैनिकों के बीच एक घोड़े की व्यवस्था।

➣ युद्ध के समय मनसबदारों की सहायता के लिए भेजे जाने वाले अतिरिक्त घुड़सवार कुमकी कहलाते थे।

दाग एवं चेहरा प्रणाली

➣ सैनिक संगठन में भ्रष्टाचार रोकने तथा सेना की वास्तविक संख्या सुनिश्चित करने के लिए अकबर ने दाग एवं चेहरा प्रणाली लागू की।

प्रणालीउद्देश्य
दागघोड़ों पर सरकारी मुहर (Branding) लगाना।
चेहरासैनिकों का हुलिया, नाम एवं पहचान का अभिलेख तैयार करना।

➣ इन दोनों व्यवस्थाओं के माध्यम से फर्जी सैनिकों एवं नकली घोड़ों की प्रविष्टि पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाता था।

दहबिस्ती व्यवस्था

➣ अकबर ने दहबिस्ती व्यवस्था के अंतर्गत सैनिकों के लिए पर्याप्त संख्या में घोड़े रखना अनिवार्य किया, जिससे युद्ध के समय सेना की गतिशीलता बनी रहे। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसे सामान्यतः प्रत्येक सैनिक द्वारा दो घोड़े रखने की व्यवस्था के रूप में उल्लेखित किया जाता है।

🧠 याद रखें:

✓ मुगल सेना की सबसे शक्तिशाली शाखा: घुड़सवार सेना (रिसाला)

✓ नियमित पैदल सैनिक: अहशाम

✓ अस्थायी सैनिक: सेहबन्दी

✓ राज्य द्वारा घोड़ा प्राप्त करने वाला सैनिक: बारगीर

✓ स्वयं का घोड़ा रखने वाला सैनिक: सिलेदार

✓ दो घोड़े रखने वाला घुड़सवार: दु-अस्पा

✓ तीन घोड़े रखने वाला घुड़सवार: सिह-अस्पा

✓ घोड़ों पर सरकारी मुहर लगाने की व्यवस्था: दाग

✓ सैनिकों की पहचान दर्ज करने की व्यवस्था: चेहरा

✓ मनसबदारों की सहायता हेतु भेजे जाने वाले घुड़सवार: कुमकी

तोपखाना

➣ मुगल सेना की सबसे महत्वपूर्ण शाखाओं में तोपखाना का विशेष स्थान था। भारत में संगठित रूप से तोपों एवं बारूद के प्रभावी सैन्य प्रयोग का श्रेय बाबर को दिया जाता है।

➣ बाबर के समय फारसी तोपचियों उस्ताद अली कुली तथा मुस्तफा रूमी के नेतृत्व में मुगल तोपखाने का प्रभावी संगठन हुआ। इन्होंने प्रथम पानीपत (1526) एवं खानवा (1527) के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभाई।

➣ मुगल तोपखाने का सर्वोच्च अधिकारी मीर-ए-आतिश कहलाता था।

प्रमुख व्यक्तियोगदान
उस्ताद अली कुलीमुख्य तोपची एवं तोपखाने का संगठन
मुस्तफा रूमीबारूद एवं तोप संचालन का विशेषज्ञ
मीर-ए-आतिशमुगल तोपखाने का प्रमुख अधिकारी

मुगल तोपों के प्रकार

तोपविशेषता
नरनालमनुष्य द्वारा ले जाई जाने वाली हल्की तोप।
गजनालहाथी पर स्थापित की जाने वाली तोप।
शुतरनालऊँट पर स्थापित की जाने वाली तोप।
धमाकाअत्यधिक तेज़ आवाज़ करने वाली तोप।
जंबूरमधुमक्खी जैसी ध्वनि उत्पन्न करने वाली तोप।

तोपखाने का वर्गीकरण

➣ मुगल तोपखाने को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता था।

प्रकारविशेषता
जिन्सीभारी एवं बड़े आकार की तोपें।
दस्तीहल्की एवं आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाई जाने वाली तोपें।

➣ शुक्रनीति जैसी संस्कृत रचनाओं में भी बारूद एवं छोटी तोपों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि इस तकनीक का ज्ञान भारत में भी प्रचलित था।

हस्ति सेना

➣ भारत में प्राचीन काल से ही हाथियों का सैन्य उपयोग होता रहा था। मुगल शासकों ने भी युद्ध, रसद परिवहन तथा शाही प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में हाथियों का व्यापक उपयोग किया।

➣ अकबर ने हाथियों के प्रबंधन हेतु पीलखाना नामक पृथक विभाग की स्थापना की।

➣ अकबर को हाथियों का विशेष शौक था और उनके शासनकाल में हाथियों का उपयोग युद्ध, शाही यात्राओं तथा भारी सामग्री के परिवहन में किया जाता था।

हस्ति सेना की विशेषताएँविवरण
प्रमुख विभागपीलखाना
मुख्य उपयोगयुद्ध, रसद एवं शाही समारोह
विशेष रुचिअकबर

नौसेना

➣ मुगल साम्राज्य मुख्यतः स्थल-आधारित (Land Empire) था, इसलिए उसकी नौसेना अपेक्षाकृत कमजोर एवं सीमित रही।

➣ 1572 ई. में गुजरात विजय तथा बंगाल अभियान के बाद अकबर ने नौसेना के महत्व को समझा।

➣ गुजरात विजय के पश्चात् अकबर ने मीर-ए-बहर के अधीन नवाड़ा नामक विभाग का गठन किया, जो नावों एवं छोटे जहाजों का प्रबंधन करता था।

➣ औरंगजेब ने मुगल नौ-शक्ति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इस कार्य में शाइस्ता खाँ तथा मीर जुमला का महत्वपूर्ण योगदान था।

➣ पश्चिमी तट पर औरंगजेब ने जंजीरा के सिद्दियों तथा मोपला नाविकों के सहयोग से नौसैनिक शक्ति को सुदृढ़ किया।

अधिकारी / व्यक्तियोगदान
मीर-ए-बहरनौसेना का प्रमुख अधिकारी
शाइस्ता खाँऔरंगजेब के समय नौसैनिक अभियानों का संचालन
मीर जुमलापूर्वी भारत में नौसैनिक अभियानों में योगदान
जंजीरा के सिद्दीपश्चिमी तट पर नौसैनिक सहयोग

तोपखाना, हस्ति सेना एवं नौसेना की तुलना

सेनाप्रमुख अधिकारी / विभागमुख्य विशेषता
तोपखानामीर-ए-आतिशबारूद एवं तोपों का संचालन
हस्ति सेनापीलखानायुद्ध एवं रसद व्यवस्था
नौसेनामीर-ए-बहरनावों एवं छोटे जहाजों का संचालन

🧠 याद रखें:

✓ मुगल तोपखाने का प्रमुख अधिकारी: मीर-ए-आतिश

✓ उस्ताद अली कुली एवं मुस्तफा रूमी किससे संबंधित हैं? मुगल तोपखाना

✓ मनुष्य द्वारा ले जाई जाने वाली तोप: नरनाल

✓ ऊँट पर रखी जाने वाली तोप: शुतरनाल

✓ भारी तोपें: जिन्सी

✓ हल्की तोपें: दस्ती

✓ हाथियों का विभाग: पीलखाना

✓ नौसेना का प्रमुख अधिकारी: मीर-ए-बहर

✓ नवाड़ा विभाग किसने स्थापित किया? अकबर

मनसबदारी व्यवस्था

➣ मुगलकालीन प्रशासन एवं सैन्य संगठन का मूल आधार मनसबदारी व्यवस्था थी। इसे अकबर ने अपने शासन के 19वें वर्ष (1575 ई.) में प्रारम्भ किया।

➣ मनसब शब्द अरबी भाषा का है, जिसका अर्थ पद, श्रेणी अथवा रैंक होता है। इस प्रकार मनसबदार वह अधिकारी होता था जिसे राज्य द्वारा कोई निश्चित पद एवं श्रेणी प्रदान की जाती थी।

➣ मनसबदारी व्यवस्था प्रशासनिक एवं सैन्य दोनों प्रकार के अधिकारियों के संगठन की आधारशिला थी। इस व्यवस्था के माध्यम से अधिकारियों का पद, वेतन, प्रतिष्ठा तथा सैन्य दायित्व निर्धारित किए जाते थे।

मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति

➣ मनसबदारी व्यवस्था पर मध्य एशिया की दशमलव पद्धति का स्पष्ट प्रभाव था। इसकी प्रेरणा चंगेज़ ख़ाँ, तैमूर तथा अब्बासी खलीफाओं की सैन्य संगठन प्रणाली से प्राप्त हुई थी।

प्रभावयोगदान
चंगेज़ ख़ाँदशमलव आधारित सैन्य संगठन
तैमूरमध्य एशियाई सैन्य परम्परा
अब्बासी खलीफाप्रशासनिक एवं सैन्य संगठन
अकबरभारत में व्यवस्थित मनसबदारी व्यवस्था का विकास

मनसबदारी व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ

विशेषताविवरण
आधारयोग्यता एवं सम्राट की कृपा
आनुवंशिकतामनसब वंशानुगत नहीं था।
समाप्तिमनसबदार की मृत्यु अथवा पदच्युति पर मनसब समाप्त हो जाता था।
मुख्य उद्देश्यप्रशासन एवं सेना का संगठित नियंत्रण।

मनसबदार

➣ मनसबदारों की नियुक्ति योग्यता, निष्ठा एवं प्रशासनिक क्षमता के आधार पर की जाती थी।

➣ मनसबदार सीधे मीर बख्शी के अधीन होते थे तथा उनका परिचय भी बादशाह से मीर बख्शी के माध्यम से कराया जाता था।

➣ मनसबदारों का मुख्य दायित्व आवश्यकता पड़ने पर निश्चित संख्या में सैनिक एवं घुड़सवार उपलब्ध कराना था।

तजवीज एवं नकदी

शब्दअर्थ
तजवीजमनसब प्रदान करने हेतु प्रस्तुत की जाने वाली अनुशंसा / याचिका।
नकदीवे मनसबदार जिन्हें जागीर के स्थान पर नकद वेतन दिया जाता था।

मनसबदारों का वेतन

➣ अधिकांश मनसबदारों को वेतन जागीर के रूप में दिया जाता था।

➣ कुछ अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में नकद वेतन भी दिया जाता था, जिन्हें नकदी कहा जाता था।

मनसब की श्रेणियाँ

➣ अकबर ने समस्त राजपत्रित अधिकारियों को सैद्धान्तिक रूप से 66 श्रेणियों में विभाजित किया था, किन्तु व्यवहार में केवल 33 श्रेणियाँ ही प्रचलित थीं।

➣ अबुल फ़ज़ल ने भी आइने-अकबरी में 33 श्रेणियों का ही उल्लेख किया है।

श्रेणीस्थिति
66 श्रेणियाँसैद्धान्तिक व्यवस्था
33 श्रेणियाँव्यावहारिक रूप से प्रचलित

मनसबदारी व्यवस्था का महत्व

क्षेत्रमहत्व
प्रशासनअधिकारियों की श्रेणी एवं उत्तरदायित्व निर्धारित करना।
सैन्य संगठनसैनिकों की संख्या एवं सैन्य शक्ति का नियंत्रण।
वेतन व्यवस्थाजागीर अथवा नकद वेतन का निर्धारण।
केंद्रीय नियंत्रणसम्राट के प्रति अधिकारियों की निष्ठा सुनिश्चित करना।

🧠 याद रखें:

✓ मनसबदारी व्यवस्था किसने प्रारम्भ की? अकबर

✓ मनसब का अर्थ: पद / श्रेणी

✓ मनसबदार किसके अधीन होता था? मीर बख्शी

✓ मनसबदारी व्यवस्था किस पद्धति से प्रभावित थी? मध्य एशियाई दशमलव पद्धति

✓ तजवीज क्या थी? मनसब हेतु अनुशंसा / याचिका

✓ नकदी किसे कहा जाता था? नकद वेतन पाने वाले मनसबदार

✓ सैद्धान्तिक श्रेणियाँ: 66

✓ व्यावहारिक श्रेणियाँ: 33

मनसब की सीमा

विवरणमनसब
अकबर के समय न्यूनतम मनसब10
अकबर के समय अधिकतम मनसब10,000
बाद में अधिकतम12,000

➣ प्रारम्भ में 5,000 से अधिक का मनसब केवल राजकुमारों को दिया जाता था।

➣ बाद में अकबर ने राजा मानसिंह तथा मिर्जा अज़ीज़ कोका को भी 7,000 का मनसब प्रदान किया।

➣ सम्पूर्ण मुगलकाल में सबसे बड़ा मनसब शाहजहाँ ने अपने पुत्र दारा शिकोह को 60,000 जात एवं 40,000 सवार का प्रदान किया था।

प्रमुख मनसबदार

व्यक्तिमनसबविशेष तथ्य
राजा मानसिंह7,000राजकुमारों के अतिरिक्त इतना उच्च मनसब पाने वाले प्रमुख राजपूत।
मिर्जा अज़ीज़ कोका7,000अकबर के पालक भाई एवं उच्च मनसबदार।
दारा शिकोह60,000 जात / 40,000 सवारसम्पूर्ण मुगलकाल का सर्वाधिक मनसब।
मिर्जा राजा जयसिंह7,000आमेर के प्रसिद्ध कछवाहा शासक।
महाराजा जसवंत सिंह7,000मारवाड़ के प्रमुख राजपूत मनसबदार।

दु-अस्पा एवं सिह-अस्पा

➣ जहाँगीर ने मनसबदारी व्यवस्था में दु-अस्पा एवं सिह-अस्पा प्रणाली प्रारम्भ की। इससे मनसबदारों को जात बढ़ाए बिना अधिक घुड़सवार रखने की अनुमति मिलती थी।

प्रणालीविशेषता
दु-अस्पाप्रत्येक सवार के लिए दो घोड़े रखने की व्यवस्था।
सिह-अस्पाप्रत्येक सवार के लिए तीन घोड़े रखने की व्यवस्था।

शाहजहाँ का 1/3 एवं 1/4 नियम

➣ शाहजहाँ ने मनसबदारों द्वारा वास्तविक सैनिक संख्या बनाए रखने के लिए 1/3 एवं 1/4 का नियम लागू किया।

क्षेत्रनियम
भारत में नियुक्त मनसबदारकम-से-कम अपने सवार पद का 1/3 सैनिक रखना आवश्यक।
दूरस्थ क्षेत्रों में नियुक्त मनसबदारकम-से-कम 1/4 सैनिक रखना आवश्यक।

जागीरदारी संकट (बेजागीरी)

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में मनसबदारों की संख्या अत्यधिक बढ़ गई, जबकि उनके वेतन के लिए पर्याप्त जागीरें उपलब्ध नहीं थीं।

➣ इस स्थिति को बेजागीरी अथवा जागीरदारी संकट कहा जाता है।

➣ अनेक इतिहासकारों ने इसे मुगल साम्राज्य के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण माना है।

इतिहासकारमत
डब्ल्यू. एच. मोरलैण्डजागीर संकट का सर्वप्रथम व्यवस्थित प्रतिपादन किया।
सतीश चन्द्रजागीरदारी संकट को मुगल साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण माना।

हिन्दू मनसबदार

शासकहिन्दू मनसबदार
अकबरलगभग 16%
शाहजहाँलगभग 24%
औरंगज़ेबलगभग 33%

➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों में विशेष रूप से मराठा सरदारों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

जात एवं सवार प्रणाली

➣ अकबर ने अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में मनसबदारी व्यवस्था में जात एवं सवार नामक द्वैध मनसब प्रणाली (Dual Rank System) प्रारम्भ की।

➣ इस व्यवस्था का उद्देश्य मनसबदार के व्यक्तिगत पद एवं प्रतिष्ठा तथा उसके अधीन रखे जाने वाले घुड़सवार सैनिकों की संख्या को अलग-अलग निर्धारित करना था।

आधारजातसवार
अर्थमनसबदार का पद एवं प्रतिष्ठाघुड़सवार सैनिकों की संख्या
निर्धारणवेतन एवं सामाजिक स्तरसैनिक दायित्व
मुख्य उद्देश्यव्यक्तिगत रैंक निर्धारित करनासैन्य शक्ति निर्धारित करना

➣ अकबर के समय सामान्यतः किसी मनसबदार का सवार पद उसके जात पद से अधिक नहीं होता था।

🧠 याद रखें:

✓ द्वैध मनसब प्रणाली किसने प्रारम्भ की? अकबर

✓ जात से क्या ज्ञात होता है? पद, प्रतिष्ठा एवं वेतन

✓ सवार से क्या ज्ञात होता है? घुड़सवार सैनिकों की संख्या

✓ दु-अस्पा एवं सिह-अस्पा किसने प्रारम्भ किए? जहाँगीर

✓ 1/3 एवं 1/4 नियम किसने लागू किया? शाहजहाँ

✓ सम्पूर्ण मुगलकाल का सबसे बड़ा मनसब किसे मिला? दारा शिकोह (60,000 जात / 40,000 सवार)

✓ जागीरदारी संकट किसके समय उत्पन्न हुआ? औरंगज़ेब

✓ जागीर संकट का प्रतिपादन सर्वप्रथम किसने किया? डब्ल्यू. एच. मोरलैण्ड

मुगलकालीन शब्दावलियाँ

शब्दअर्थ
अबवाबराजकीय अफसरों और जमींदारों की ओर से लगाए जाने वाले तरह-तरह के अतिरिक्त कर
अलतमगाजहाँगीर के समय शुरू हुई एक खास किस्म की सरकारी भूमि-अनुदान व्यवस्था
आमिलआमतौर पर गाँवों में भूमि-कर वसूलने वाला अधिकारी
बंजाराअनाज या पशुओं का व्यापार करने वाली, हिंदुओं की एक घुमंतू जनजाति
बटाईखेती करने वाले किसान और भूस्वामी या सरकार के बीच फसल की उपज का बँटवारा
दस्तूरअकबर व उसके बाद के दौर में नकद रूप में तय की गई राजस्व दरों की सूची
दीवानराजस्व का काम देखने वाला अधिकारी
दामअकबर के समय चलाया गया ताँबे का सिक्का
गंजएक स्थायी छोटे आकार का बाज़ार
गुमाश्ताअधीनस्थ या सहयोगी कर्मचारी
हासिलअसल में प्राप्त हुई आय
हुण्डीदेशी बैंकरों द्वारा जारी भुगतान-पत्र, जिससे एक शहर के व्यापारी को पैसे देकर दूसरे शहर के व्यापारी से रकम वसूली जाती थी
इजाराठेका, खासकर भूमि-राजस्व वसूली का ठेका
इजारादारभूमि-राजस्व वसूलने का ठेका लेने वाला व्यक्ति
इनामउपहार, या परोपकारी कार्यों हेतु दिया गया दान
जागीरमुस्लिम शासन काल में वह भूभाग जिसका राजस्व किसी सरकारी सेवक को उसकी सेवा के बदले एक तय समय के लिए वेतन-स्वरूप दिया जाता था
जमाराज्य द्वारा तय किसी क्षेत्र या जागीर की कुल राजस्व राशि
जरीबभूमि मापने का यंत्र, जिससे ज़मीन के क्षेत्रफल की गणना (पैमाइश) की जाती थी
जज़ियागैर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला व्यक्तिगत कर
कानूनगोभूमि से जुड़े हक-हुकूक, नियम और राजस्व वसूली का रिकॉर्ड रखने वाला अधिकारी, जिसका दर्जा पटवारी से ऊपर होता था
खालिसावह भूमि जो सीधे राज्य के अधीन और प्रबंधन में रहती थी
खराजगैर-मुस्लिम किसानों पर लगाया जाने वाला भूमि-कर
खिदमतीअधीनस्थ कर्मचारी द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारी को दी जाने वाली भेंट
खुदकाश्तभूस्वामी का अपनी ही ज़मीन पर स्वयं खेती करना; इसके उलट पाहीकाश्त कहलाता था
करोड़ीखालिसा भूमि से राजस्व वसूल करने वाला अधिकारी
मदद-ए-माशविद्वानों या धार्मिक व्यक्तियों की सहायता हेतु सरकार द्वारा नियत राजस्व, यानी एक परोपकारी व्यवस्था
महलअकबर के शासन में राजस्व का एक छोटा उपविभाग
मालिकानाजमींदार या भूस्वामी को दिया जाने वाला एक निश्चित भत्ता
मण्डीनियमित रूप से लगने वाला बड़ा बाज़ार
मौजाराजस्व संबंधी दस्तावेज़ों में गाँव के लिए प्रयुक्त शब्द
मोहर/मुहरमुगलकाल का सोने का सिक्का, जो नौ रुपये के बराबर मूल्य का होता था और उस समय का सबसे प्रचलित सिक्का था
मुतालबाराजस्व की माँग या बकाया राजस्व की वसूली
नजरानावफादारी दिखाने के लिए दिया गया उपहार, या सत्ता के प्रति दिया जाने वाला कर
पैबाकीकिसी और को हस्तांतरित किए जाने के लिए सुरक्षित रखी गई भूमि, जिसे तब तक सरकारी कर्मचारी संभालते थे
पाहीकाश्तकिसान का अपने गाँव के बाहर, किसी दूसरे की भूमि पर स्वेच्छा से खेती करना
परगनाकई गाँवों का समूह
पटेलगाँव का मुखिया
पट्टाराजस्व अधिकारी द्वारा करदाता को दिया गया दस्तावेज़, जिसमें देय राशि दर्ज होती थी
कबूलियतराजस्व चुकाने के लिए दिया गया लिखित वचन-पत्र, जो पट्टे की प्रतिलिपि होता था
पटवारीगाँव का लेखा-जोखा रखने वाला अधिकारी
रे, राईराजस्व आकलन और अगली उपज का लक्ष्य तय करने के लिए इस्तेमाल होने वाली तालिका, जो दस्तूर (नकद दरों की तालिका) से अलग अर्थ में प्रयुक्त होती थी
सर्राफदेशी साहूकार या उधार देने वाला व्यक्ति
सुयूरगालमुगल बादशाह द्वारा दिया जाने वाला भत्ता
तालुकाकिसी बड़े क्षेत्र के अधीन आने वाला छोटा राज्य
तकावीसरकार की ओर से किसानों को दी गई पेशगी (अग्रिम) रकम
तुयूलराजस्व की निर्धारित रकम, जो जागीर और रक्ता के समान अर्थ रखती है
उश्रइस्लामी नियमों के तहत उपज के दसवें हिस्से के बराबर लगाया गया धार्मिक कर
वजीफाबादशाह द्वारा दान या सहानुभूतिवश दी गई नकद सहायता
जब्तअकबर द्वारा लागू की गई भूमि-मापन आधारित राजस्व प्रणाली, जिस इलाके में यह लागू थी उसे ‘जब्ती’ क्षेत्र कहा जाता था
जमींदार-एजोरतलबवे जमींदार जो सिर्फ ज़ोर-ज़बरदस्ती से ही राजस्व चुकाते थे
अलतमगापुरस्कार के तौर पर दिया गया मुगलकालीन भूमि-अनुदान
कनकूतफसल की अनुमानित उपज के आधार पर लगान तय करने की विधि
खुम्सयुद्ध में शत्रु से हासिल की गई संपत्ति
आमिलगाँवों से भू-राजस्व एकत्र करने वाला अधिकारी
अतायेकनाबालिग शासकों के अभिभावकों को दी जाने वाली एक तुर्की उपाधि
बेगऊँचे पद या प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होने वाला तुर्की/मध्य एशियाई संबोधन
दंडगाँव या मौजा के लिए प्रयुक्त एक और नाम
देसाईज़िले का शीर्ष राजस्व अधिकारी
दीवानराजस्व विभाग का प्रमुख मंत्री
फौजदारप्रांत के प्रशासन का ज़िम्मा संभालने वाला अधिकारी
गाजीजिहाद के आदर्श में विश्वास रखने वाला सैनिक/योद्धा
खानजादाकुलीन (उमरा) वर्ग के पुत्र
कोतवालशहर की कानून-व्यवस्था संभालने वाला अधिकारी
कुलकर्णीगाँव के हिसाब-किताब रखने वाला लेखपाल
मुकद्दमगाँव का मुखिया
शेखजादाभारतीय मूल के मुसलमान
अमीनशेरशाह के शासन में परगने-स्तर पर लगान वसूलने वाला अधिकारी
अमीरुल मोमिनीनखलीफा को दी जाने वाली उपाधि, अर्थात मुसलमानों का सर्वोच्च नेता
आईनराजकीय कानून या नियम
करोड़ीअकबर के समय लगान इकट्ठा करने वाला अधिकारी
कारकुनलगान का लेखा-जोखा रखने वाला लिपिक/मुंशी
गुमाश्ताकारोबारी या प्रशासनिक प्रतिनिधि
नबीसंदादस्तावेज़ लिखने वाला लिपिक
मुतसद्दीबंदरगाहों का प्रबंधन देखने वाला मुगल अधिकारी
लश्करसेना या फौज
वज़ीरे मुतलकअसीमित अधिकार वाला प्रधानमंत्री
वलीअहदगद्दी का उत्तराधिकारी राजकुमार
तौहीदअल्लाह की एकता में आस्था रखने का सिद्धांत
बलाहारआम/साधारण किसान
मकतबइस्लामी शिक्षा की प्रारंभिक पाठशाला
मदरसाइस्लामी शिक्षा की उच्च संस्था
शकरध्वजव्यापारियों का प्रतीक-चिह्न या पताका
हिसारकिला
सावनिह-निगारजागीरदारों पर निगरानी रखने वाली एक अहम व्यवस्था
पेशकशमुगल दरबार में विभिन्न मौकों पर अमीरों की ओर से बादशाह को दी जाने वाली भेंट

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