हेमू (हेमचन्द्र) : दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने वाला प्रथम और एकमात्र हिन्दू शासक
➣ मध्यकालीन भारत के इतिहास में हेमू प्रथम और एकमात्र हिन्दू शासक था जिसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था।
➣ उसका पूरा नाम हेमचन्द्र विक्रमादित्य था और वह रीवाड़ी (वर्तमान हरियाणा) के एक साधारण व्यापारी परिवार से सम्बन्ध रखता था।
➣ हेमू ने अपने जीवन की शुरुआत नमक के व्यापारी के रूप में की थी। बाद में उसने इस्लामशाह सूरी के शासनकाल में बाज़ारों के अधीक्षक (दीवान-ए-बाज़ार) के रूप में काम करना शुरू किया था।
उसने अपने सैनिक जीवन में बाईस लड़ाईयों में भाग लिया और एक भी नहीं हारी, जिससे उसकी वीरता और रणनीति-कुशलता प्रमाणित होती है।➣ उसकी लगातार सैन्य सफलताओं से प्रभावित होकर आदिलशाह सूरी ने उसे अपना वज़ीर (प्रधानमंत्री) तथा प्रधान सेनापति नियुक्त कर दिया।
➣ आदिलशाह ने हेमू को मुग़लों को भारत से खदेड़ने का उत्तरदायित्व सौंपा। हेमू ने पहले आगरा पर अधिकार किया, फिर बंगाल के मुग़ल सूबेदार को हराकर आगे बढ़ा और अन्ततः 50,000 घुड़सवार, 500 हाथी तथा एक विशाल तोपखाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया।
➣ दिल्ली के निकट तुगलकाबाद में हुए एक संघर्षपूर्ण युद्ध में हेमू ने मुग़ल सेनापति तर्दी बेग को पराजित किया और दिल्ली तथा आगरा दोनों पर अधिकार कर लिया।
➣ इस विजय के बाद उसका पुराने किले (दिल्ली) में राज्याभिषेक हुआ। उस समय उसने स्वतंत्र शासक के रूप में स्वयं को “विक्रमादित्य” की उपाधि से सुसज्जित किया। यह प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुरूप था, जिसमें विक्रमादित्य एक प्रतिष्ठित शाही उपनाम माना जाता था।
➣ पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556 ई.) हेमू और अकबर की सेना के बीच लड़ा गया, जिसमें हेमू की आँख में तीर लगने से वह बेहोश हो गया और मुग़ल सेना ने युद्ध जीत लिया।
➣ पानीपत के द्वितीय युद्ध में जब हेमू की आँख में तीर लगा और वह बेहोश होकर हाथी के हौदे से गिर पड़ा, तो उसके सैनिकों में अफरा-तफरी मच गई और मुग़ल सेना विजयी हुई।
➣ बेहोश हेमू को मुग़ल सैनिक बैरम खाँ के सामने अकबर के शिविर में लाए। बैरम खाँ ने अकबर से हेमू को “ग़ाज़ी” (काफिर-हन्ता) की उपाधि दिलाने हेतु स्वयं उसका सिर काटने का आग्रह किया।
➣ बेहोश हेमू को मुग़ल सैनिक बैरम ख़ाँ और अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बैरम ख़ाँ ने अकबर को “ग़ाज़ी” (काफ़िर-हन्ता) की उपाधि प्राप्त करने के लिए हेमू का वध करने की सलाह दी। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में हेमू की मृत्यु के संबंध में भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं, किन्तु अंततः उसका सिर काट दिया गया।
➣ इसके बाद हेमू का सिर काबुल भेज दिया गया, जबकि उसका धड़ दिल्ली के एक द्वार पर लटका दिया गया, ताकि विरोधियों में भय उत्पन्न हो।
इतिहासकार इसे प्राचीन भारत के प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा से जोड़ते हुए अंतिम हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य या 14वाँ विक्रमादित्य कहते हैं (प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय थे)।
रानी दुर्गावती
➣ रानी दुर्गावती गोंडवाना की शासक थी जो भारतीय इतिहास की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं वीरांगना रानियों में गिनी जाती हैं।
➣ उनके राज्य का केन्द्र जबलपुर (वर्तमान मध्यप्रदेश) था। वह न केवल एक कुशल प्रशासक थीं अपितु एक असाधारण योद्धा भी थीं जिन्होंने मुग़ल साम्राज्य की विशाल सेना के सामने झुकने से इनकार कर दिया।
➣ वीरांगना महारानी दुर्गावती का जन्म महोबा के राठ गाँव में 1524 ई. की दुर्गाष्टमी के पावन अवसर पर हुआ था। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण ही उनका नाम दुर्गावती रखा गया।
➣ वे कालिंजर के प्रतापी राजा कीर्तिसिंह चन्देल की एकमात्र सन्तान थीं। चन्देल वंश अपनी वीरता एवं शौर्य के लिए सुप्रसिद्ध था और दुर्गावती ने बचपन से ही इसी वीरतापूर्ण वातावरण में शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की।
➣ गोंडवाना के प्रतापी राजा संग्राम शाह ने अपने पुत्र दलपतशाह के साथ दुर्गावती का विवाह करके उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाया। यह विवाह दो शक्तिशाली राजवंशों के मध्य एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामाजिक गठबन्धन था।
➣ दुर्भाग्यवश विवाह के मात्र 4 वर्ष पश्चात ही राजा दलपतशाह का असमय निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में केवल 3 वर्षीय पुत्र नारायण ही था।
➣ ऐसी विकट परिस्थिति में भी रानी ने साहस नहीं खोया और स्वयं ही गढ़मण्डला का शासन सँभाल लिया। उन्होंने अपने अल्पवयस्क पुत्र को संरक्षण में रखते हुए राज्य की बागडोर दृढ़ता से थामी।
➣ रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्षों तक जिस कुशलता, दूरदर्शिता एवं न्यायप्रियता से गोंडवाना का शासन संचालित किया, उसकी प्रशंसा इतिहासकारों ने मुक्त कण्ठ से की है।
➣ आइन-ए-अकबरी में प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि दुर्गावती के शासनकाल में गोंडवाना इतना सुव्यवस्थित एवं समृद्ध था कि प्रजा लगान की अदायगी स्वर्णमुद्राओं और हाथियों से करती थी- यह उस काल की असाधारण आर्थिक समृद्धि का प्रमाण है।
➣ अकबर के कड़ा-मानिकपुर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खाँ, जो आसफ खाँ के नाम से जाना जाता था, ने रानी दुर्गावती के समृद्ध एवं वैभवशाली राज्य को देखकर लालच में अकबर को रानी के विरुद्ध उकसाया और गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। अकबर ने आसफ खाँ को एक विशाल सेना के साथ रानी के विरुद्ध भेजा।
➣ रानी दुर्गावती ने मुग़ल सेना का वीरतापूर्वक सामना किया। प्रारम्भ में उन्होंने नरई नाले के युद्ध में मुग़ल सेना को पराजित भी किया, किन्तु 1564 ई. में हुए निर्णायक युद्ध में मुग़लों की विशाल सेना एवं तोपखाने के समक्ष परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो गईं। युद्ध के दौरान रानी के कान के पास एक तीर आ लगा और दूसरे तीर से उनका गला घायल हो गया। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने युद्धभूमि नहीं छोड़ी।
➣ जब रानी को लगा कि अब शत्रु के हाथों पकड़े जाने का संकट उत्पन्न हो गया है, तो उन्होंने अपने वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दें, किन्तु वह इस कार्य के लिए तैयार नहीं हुआ।
➣ तब रानी ने अपनी ही कटार से स्वयं को घायल कर आत्म-बलिदान कर लिया और शत्रु के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा वीरगति को श्रेयस्कर समझा। उनका यह बलिदान भारतीय इतिहास में स्त्री-शौर्य का एक अमर उदाहरण है।
➣ रानी दुर्गावती की स्मृति को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जबलपुर में उनके नाम पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। प्रतिवर्ष 24 जून को उनके बलिदान दिवस पर मध्यप्रदेश में बलिदान दिवस के रूप में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
नूरजहाँ गुट
➣ इस गुट के प्रमुख सदस्य थे — एत्मादुद्दौला या मिर्ज़ा ग़ियास बेग (नूरजहाँ के पिता), अस्मत बेगम (नूरजहाँ की माँ), आसफ़ ख़ाँ (नूरजहाँ के भाई) तथा शाहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ)।
➣ नूरजहाँ के प्रभाव में रहे जहाँगीर के शासनकाल को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है — 1611-1622 ई. तथा 1622-1627 ई.
➣ पहले दौर में ख़ुर्रम नूरजहाँ गुट का हिस्सा था, परंतु दूसरे दौर में वह इस गुट से अलग हो गया।
➣ नूरजहाँ बेहद महत्वाकांक्षी स्वभाव की थी। कहा जाता है कि जहाँगीर ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसे केवल एक सेर शराब और थोड़े-से कबाब के अलावा और किसी चीज़ की चाह नहीं रही, क्योंकि सत्ता की बागडोर अब नूरजहाँ के हाथों में आ चुकी थी।
➣ नूरजहाँ ने नूरमहली नामक वस्त्र-शैली को डिज़ाइन किया था। यात्री पीटर मुंडी के विवरण के अनुसार उसने आगरा में नूरमहल सराय का निर्माण भी करवाया।
➣ नूरजहाँ जहाँगीर के साथ झरोखा दर्शन दिया करती थी, और सिक्कों पर जहाँगीर के नाम के साथ-साथ उसका नाम भी बादशाह बेगम के रूप में अंकित होता था।
➣ नूरजहाँ ने आगरा में अपने पिता की स्मृति में एत्मादुद्दौला का मक़बरा बनवाया, जो अपनी बारीक पच्चीकारी और सफ़ेद संगमरमर के प्रयोग के लिये प्रसिद्ध है। मुगलकाल में संगमरमर का यह सबसे पहला उल्लेखनीय प्रयोग माना जाता है, और भारत में पित्रा दूरा शैली का प्रयोग भी सबसे पहले इसी मक़बरे में देखा गया।
➣ इसके काफी समय बाद ताजमहल में पित्रा दूरा कला का बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। यह मक़बरा नूरजहाँ की सूक्ष्म कलात्मक सोच और स्त्री-दृष्टिकोण की झलक भी देता है।
➣ नूरजहाँ के व्यक्तित्व और प्रभाव का विस्तृत वर्णन इतिहासकार बेनी प्रसाद ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ़ जहाँगीर में किया है।
➣ राजकीय आदेशों (फ़रमानों) पर जहाँगीर के साथ-साथ नूरजहाँ की मुहर भी लगती थी और उसके हस्ताक्षर भी होते थे, जो उस युग में किसी मुगल महिला के लिये असाधारण बात थी।
➣ 1621 ई. में नूरजहाँ ने अपने पहले पति शेर अफ़गान से जन्मी अपनी पुत्री लाड़ली बेगम का विवाह शाहज़ादा शहरयार से करवाया।
➣ इसी दौरान नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ ने अपनी पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज़ महल) का विवाह शाहज़ादा ख़ुर्रम से करवा दिया। इस घटना से नूरजहाँ गुट में भीतरी दरार पड़ गई, क्योंकि बहन-भाई दोनों अब अपने-अपने दामाद को तख़्त पर बिठाने की राजनीति में जुट गये।
➣ नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम को गुलाब के इत्र बनाने की विधि खोजने का श्रेय दिया जाता है, जिसे रोगन-ए-जहाँगीरी नाम दिया गया।
➣ नूरजहाँ ने कपड़ों और गहनों के क्षेत्र में नये फैशन-चलन शुरू किये, और साथ ही वह फ़ारसी भाषा में कविताएँ भी लिखा करती थी।
➣ अपनी सूझबूझ और चतुराई से नूरजहाँ ने महावत ख़ाँ के विद्रोह को असफल करते हुए जहाँगीर को क़ैद से मुक्त करवाया था।
➣ जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात् नूरजहाँ को दो लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर लाहौर भेज दिया गया, जहाँ वह 1645 ई. में अपनी मृत्यु तक रही और उसे जहाँगीर की क़ब्र के पास ही दफ़नाया गया।
हुमायूँ का मकबरा
➣ हुमायूँ का मकबरा मुग़लकाल में अकबर के शासनकाल में निर्मित प्रथम प्रमुख इमारत है। यह दिल्ली के निज़ामुद्दीन क्षेत्र में स्थित है और मुग़ल स्थापत्य कला के विकास की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।
➣ इस भव्य मकबरे का निर्माण हुमायूँ की प्रिय पत्नी एवं अकबर की माँ हमीदा बानो बेगम ने अपने पति की मृत्यु के 8 वर्षों पश्चात 1564 ई. में आरम्भ करवाया था।
➣ यह हुमायूँ के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा एवं प्रेम का प्रतीक था। इसीलिए इस मकबरे को “हुमायूँ के प्रति श्रद्धांजलि का प्रतीक” कहा जाता है।
➣ इस मकबरे की नक्काशी एवं डिज़ाइन प्रसिद्ध फ़ारसी शिल्पकार मलिक मिर्ज़ा ग्यास ने तैयार किया था।
➣ यह मकबरा भारतीय रूप में ईरानी शैली पर आधारित स्थापत्य कला का सुन्दर एवं अनुपम उदाहरण है, जिसमें फ़ारसी एवं भारतीय स्थापत्य परम्पराओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
➣ हुमायूँ का मकबरा मुग़लकाल में दोहरी गुम्बद वाला प्रथम उदाहरण है। इससे पूर्व मुग़ल स्थापत्य में दोहरी गुम्बद का प्रयोग नहीं किया गया था।
➣ इसके गुम्बद पूर्णतः श्वेत संगमरमर से निर्मित हैं, जबकि शेष इमारत में सफेद एवं काले संगमरमर के साथ-साथ लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। इस इमारत में स्वतन्त्र रूप से निर्मित मीनारों का पूर्णतः अभाव है।
चारबाग पद्धति (चार भागों में विभाजित उद्यान-शैली) का मुग़ल स्थापत्य में प्रथम प्रयोग हुमायूँ के मकबरे में ही हुआ था।
➣ यह मकबरा ज्यामितीय चतुर्भुज आकार के सुव्यवस्थित उद्यान के मध्य एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है।
➣ चारबाग पद्धति में बाग को चार बराबर भागों में विभाजित किया जाता है जो फ़ारसी उद्यान परम्परा से प्रेरित है। इस पद्धति को बाद में ताजमहल में और अधिक परिष्कृत रूप में प्रयोग किया गया।
➣ हुमायूँ के मकबरे को “ताजमहल का पूर्वगामी” कहा जाता है क्योंकि इसमें वे समस्त स्थापत्य तत्त्व प्रयोग किए गए हैं जो बाद में ताजमहल में परिपूर्णता को प्राप्त हुए – जैसे दोहरी गुम्बद, चारबाग उद्यान, ऊँचा चबूतरा, सफेद संगमरमर का प्रयोग आदि। इसके गुम्बद की शैली ईरानी भाव की द्योतक है।
➣ हुमायूँ का मकबरा मुग़लवंश का एकमात्र ऐसा मकबरा है जिसमें सर्वाधिक मुग़ल वंशजों को दफनाया गया है। इसमें दफन प्रमुख व्यक्तित्व इस प्रकार हैं –हुमायूँ, बेगा बेगम, हमीदा बानो बेगम, हुमायूँ की छोटी बेगम, दाराशिकोह, जहाँदार शाह, फर्रुखसियर, रफ़ीउद्दाराजत, रफ़ी उद्दौला एवं आलमगीर द्वितीय। इस प्रकार यह मकबरा एक प्रकार से मुग़ल वंश का पारिवारिक कब्रिस्तान बन गया।
➣ 1857 के विद्रोह के समय अन्तिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने अंग्रेज़ों से बचकर इसी मकबरे में शरण ली थी, जहाँ से उन्हें अंग्रेज़ अधिकारी हडसन ने गिरफ्तार किया था। इस प्रकार यह मकबरा मुग़ल साम्राज्य के अन्त का भी साक्षी बना।
1993 ई. में यूनेस्को ने हुमायूँ के मकबरे को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया।
फतेहपुर सीकरी
➣ फतेहपुर सीकरी उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है जो आगरा से लगभग 35-36 किमी पश्चिम में स्थित है।
➣ यह मुग़ल स्थापत्य कला का एक अद्वितीय एवं सुरक्षित उदाहरण है जो आज भी उसी भव्यता के साथ खड़ा है।
➣ 1527 ई. में खानवा के युद्ध के दौरान मुग़ल सम्राट बाबर जब इस स्थल पर प्रथम बार आया और राजपूत राजा राणा सांगा के विरुद्ध युद्ध में विजय प्राप्त की, तो उसने इस स्थल को सीकरी नाम दिया। इस प्रकार इस स्थल का मुग़लों से सम्बन्ध बाबर के काल से ही स्थापित हो गया था।
➣ मुग़ल सम्राट अकबर ने 1569 ई. में इस स्थल पर एक नए नगर की स्थापना की। इसके पीछे मुख्य कारण यहाँ निवास करने वाले प्रसिद्ध सूफी सन्त शेख सलीम चिश्ती का आशीर्वाद था, जिनकी कृपा से अकबर को पुत्र-रत्न (जहाँगीर) की प्राप्ति हुई थी। अकबर ने इस खुशी में इस स्थल का नाम फतेहाबाद रखा जो कालान्तर में फतेहपुर सीकरी के नाम से विश्वप्रसिद्ध हुआ।
➣ अकबर ने 1571 ई. में फतेहपुर सीकरी को अपनी औपचारिक राजधानी घोषित किया। सीकरी को मुग़लों का प्रथम नियोजित (Planned) शहर माना जाता है अर्थात् यह पूर्व-योजना के अनुसार व्यवस्थित रूप से बसाया गया था। इस नगर के निर्माण का सम्पूर्ण ढाँचा एवं नक्शा प्रसिद्ध वास्तुकार बहाउद्दीन ने तैयार किया था।
➣ फतेहपुर सीकरी में अनेक भव्य एवं ऐतिहासिक इमारतें बनवाई गईं जो मुग़ल, हिन्दू एवं फ़ारसी स्थापत्य शैली के अद्भुत समन्वय का प्रतीक हैं।
➣ इनमें प्रमुख हैं – बुलन्द दरवाज़ा (जो गुजरात विजय की स्मृति में बनवाया गया और एशिया के सबसे ऊँचे प्रवेश द्वारों में से एक है), शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, जामा मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, पंचमहल, जोधाबाई महल, बीरबल का महल एवं अनूप तालाब आदि।
➣ राजधानी को आगरा से फतेहपुर सीकरी स्थानान्तरित करने का मुख्य उद्देश्य अकबर का सूफी सन्त शेख सलीम चिश्ती के प्रति गहरी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करना था।
➣ शेख सलीम चिश्ती की पवित्र कुटिया में ही जहाँगीर का जन्म हुआ था और उन्हीं के नाम पर उसका नाम पहले सलीम रखा गया था।
➣ 1580 ई. में फतेहपुर सीकरी में प्रथम जेसुइट मिशन (ईसाई धर्म-प्रचारक दल) आया, जिसका नेतृत्व फादर एकाबीवा ने किया था।
➣ अकबर ने इन्हें सम्मानपूर्वक अपने दरबार में स्थान दिया और ईसाई धर्म के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। यह अकबर की धार्मिक जिज्ञासा एवं सहिष्णुता का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
➣ लगभग 15 वर्षों तक फतेहपुर सीकरी अकबर की राजधानी रही, किन्तु जल की भीषण कमी के कारण अन्ततः इसे राजधानी के पद से हटाना पड़ा और राजधानी पुनः आगरा स्थानान्तरित कर दी गई।
➣ इसके अतिरिक्त उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बढ़ते खतरे भी राजधानी परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण कारण थे। तब से यह नगर लगभग वीरान हो गया और इसीलिए इसे भुतहा नगर भी कहा जाता है।
➣ आज यह भारत के सर्वाधिक पर्यटकों को आकर्षित करने वाले ऐतिहासिक स्थलों में से एक है और मुग़ल काल की स्थापत्य-कुशलता एवं सांस्कृतिक विविधता का जीवन्त प्रमाण है।
1986 ई. में यूनेस्को ने फतेहपुर सीकरी को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया।
पंचमहल (फतेहपुर सीकरी)
➣ पंचमहल फतेहपुर सीकरी के भव्य परिसर में स्थित एक अद्वितीय एवं विशिष्ट पाँच मंज़िला इमारत है, जिसे मुग़ल सम्राट अकबर ने बनवाया था।
➣ यह इमारत मुग़ल स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट एवं अनूठा उदाहरण है। इसे हवामहल भी कहा जाता है क्योंकि इसकी संरचना इस प्रकार बनाई गई है कि इसमें सदैव शीतल एवं सुखद वायु का प्रवाह बना रहता है।
➣ पंचमहल की स्थापत्य-शैली अत्यन्त विशिष्ट एवं पिरामिडनुमा है। इसकी पाँचों मंज़िलें क्रमशः छोटी होती जाती हैं- सबसे नीचे की मंज़िल सबसे बड़ी है और शीर्ष पर केवल एक छोटा-सा चतुर्दिक खुला कक्ष (कियोस्क) है।
➣ इसकी पहली मंज़िल में 84 स्तम्भ हैं तथा ऊपर की मंज़िलों में स्तम्भों की संख्या क्रमशः घटती जाती है। इन स्तम्भों पर हिन्दू, बौद्ध एवं जैन स्थापत्य शैली की नक्काशी देखी जा सकती है, जो अकबर की सुलह-कुल की नीति का प्रतीक है।
➣ पंचमहल विशेष रूप से किले की शाही महिलाओं, रानियों एवं दासियों के विश्राम, मनोरंजन एवं आमोद-प्रमोद के लिए बनवाया गया था। यह इमारत हरम-सरा (शाही महिलाओं के आवास-क्षेत्र) के निकट स्थित थी, इसीलिए यहाँ बाहरी पुरुषों का प्रवेश पूर्णतः वर्जित था।
➣ पंचमहल परिसर में ही प्रसिद्ध मीना बाज़ार लगाया जाता था, जो मुग़ल काल की एक अत्यन्त रोचक एवं विशिष्ट परम्परा थी। इस बाज़ार में केवल शाही परिवार की महिलाएँ ही क्रय-विक्रय करती थीं।
➣ विशेष अवसरों पर स्वयं अकबर एवं दरबार के उच्च अमीर भी यहाँ आते थे। कहा जाता है कि अकबर की मुलाकात अनारकली से भी इसी मीना बाज़ार में हुई थी।
➣ पंचमहल का निर्माण मुख्यतः लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इसमें किसी भी प्रकार की दीवारें या परदे नहीं हैं, केवल स्तम्भों पर टिकी छतें हैं, जिससे चारों दिशाओं से प्रकाश एवं वायु का निर्बाध प्रवाह बना रहता है। यह संरचना इसे फतेहपुर सीकरी की अन्य इमारतों से सर्वथा भिन्न एवं अनूठा बनाती है।
पंचमहल फतेहपुर सीकरी परिसर की उन प्रमुख इमारतों में से एक है जो 1983 ई. में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत सूची में सम्मिलित की गई हैं।
ताजमहल
➣ ताजमहल का निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी सर्वाधिक प्रिय पत्नी मुमताज महल (अर्जुमन्द बानू बेगम) की पवित्र स्मृति में कराया था।
➣ ऐसा कहा जाता है कि यह प्रेम, समर्पण और वियोग की वह अमर कहानी है जिसे पत्थरों में उकेरकर शाहजहाँ ने संसार को एक अद्वितीय उपहार दिया।
➣ मुमताज महल की मृत्यु 1631 ई. में अपने 14वें बच्चे के प्रसव के दौरान बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में हुई थी। उसी की स्मृति में शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया।
➣ ताजमहल को काव्यात्मक रूप में “संगमरमर में संवेदनशील शोकगीत” तथा “एक वफादार आशिक का खिराज (श्रद्धांजलि)” कहा जाता है।
➣ यह भव्य स्मारक आगरा में यमुना नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। इसके चारों ओर विशाल मुग़ल उद्यान (चारबाग शैली में) बने हुए हैं जो फ़ारसी बाग़बानी परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
➣ ताजमहल का मुख्य स्थापत्यकार (वास्तुकार) उस्ताद अहमद लाहौरी था, जिसे उसकी अद्वितीय प्रतिभा के कारण “नादिर-उल-असरार” (रहस्यों का चमत्कार) की उपाधि प्रदान की गई थी।
इसके अतिरिक्त मुख्य निर्माण-प्रभारी (कार्यकारी) के रूप में फारस (ईरान) के मुहम्मद ईसा खाँ को नियुक्त किया गया था। इस परियोजना में भारत, फारस, मध्य एशिया और यूरोप से कारीगर, शिल्पकार और रत्नकार बुलाए गए थे।➣ ताजमहल का निर्माण कार्य 1631 ई. में प्रारम्भ हुआ और लगभग 22 वर्षों के अथक परिश्रम के पश्चात 1653 ई. में पूर्ण हुआ। इसके निर्माण में प्रतिदिन लगभग 20,000 से अधिक कारीगर व श्रमिक कार्यरत रहे। निर्माण सामग्री को ढोने के लिए 1,000 से अधिक हाथियों का उपयोग किया गया था।
➣ इसके निर्माण में उस समय के हिसाब से लगभग ₹3 करोड़ की अनुमानित लागत आई थी। ताजमहल के मुख्य मक़बरे में राजस्थान के मकराना क्षेत्र के श्वेत संगमरमर का प्रयोग किया गया है, जो अपनी
➣ गुणवत्ता और चमक के लिए विश्वप्रसिद्ध है।
इसके अतिरिक्त मणि-रत्नों की जड़ाई (पित्रा-दूरा तकनीक) में तिब्बत का फ़िरोज़ा, अफ़गानिस्तान का लाजवर्त (लैपिस लाजुली), श्रीलंका का नीलम और अनेक अन्य देशों के बहुमूल्य पत्थरों का उपयोग हुआ।➣ ताजमहल के दोनों ओर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित दो मस्जिदें स्थित हैं — बायीं ओर की मस्जिद वास्तविक मस्जिद है (जो मक्के की दिशा में है), जबकि दायीं ओर की इमारत “मेहमानखाना” या “जवाब” कहलाती है, जो केवल वास्तुशिल्पीय संतुलन के लिए बनाई गई थी।
➣ ताजमहल के भीतर मुख्य कक्ष में मुमताज महल तथा शाहजहाँ दोनों की समाधियाँ स्थित हैं। शाहजहाँ की समाधि बाद में उसके पुत्र औरंगज़ेब द्वारा बनवाई गई थी। यह एकमात्र मुग़ल स्मारक है जिसमें दो समाधियाँ एक साथ हैं।
1983 ई. में यूनेस्को (UNESCO) ने ताजमहल को विश्व विरासत सूची (World Heritage List) में सम्मिलित किया।
➣ वर्ष 2007 में इसे विश्व के नए सात आश्चर्यों में भी स्थान प्राप्त हुआ। यह भारत के सर्वाधिक पर्यटकों को आकर्षित करने वाला स्मारक है।
लाल किला, दिल्ली
➣ मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने 1638 ई. में दिल्ली में अपने नाम पर शाहजहाँनाबाद नामक एक नए नगर की स्थापना की, जो दिल्ली का सातवाँ नगर था। इसे उसने अपने विशाल मुग़ल साम्राज्य की नई राजधानी बनाया। इससे पूर्व मुग़लों की राजधानी आगरा थी।
➣ शाहजहाँनाबाद के प्रमुख भवनों में लाल किला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं भव्य है। यह किला लगभग 9 वर्षों में बनकर तैयार हुआ। इसका निर्माण कार्य प्रसिद्ध शिल्पकारों हमीद और अहमद के संरक्षण एवं देखरेख में सम्पन्न हुआ।
➣ इस किले की विशाल प्राचीर (दीवार) लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है, इसीलिए यह “लाल किला” के नाम से विश्वविख्यात हुआ। शाहजहाँ और औरंगज़ेब के शासनकाल में इस किले का मूल नाम “किला-ए-मुबारक” (अर्थात् भाग्यवान दुर्ग) था। यह मुग़लों द्वारा निर्मित अन्तिम किला था, जो मुग़ल स्थापत्य कला की परिपक्वता का प्रतीक है।
➣ किले का मुख्य प्रवेश द्वार “लाहौरी दरवाज़ा” है जो पश्चिम दिशा की ओर खुलता है तथा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसके सामने चाँदनी चौक नामक विशाल एवं चौड़ा मार्ग स्थित है, जिसे शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम ने बनवाया था। किले में एक अन्य द्वार “दिल्ली दरवाज़ा” भी है जो दक्षिण दिशा की ओर है।
➣ लाल किले में अनेक भव्य एवं महत्त्वपूर्ण भवन स्थित हैं जो इस प्रकार हैं —
➣ दीवान-ए-आम — यह सार्वजनिक सभाओं एवं सुनवाई का स्थान था, जहाँ शाहजहाँ आम जनता की फ़रियाद सुनता था।
➣ दीवान-ए-खास — यह शाहजहाँ के शासनकाल में निर्मित समस्त भवनों में सर्वाधिक अलंकृत एवं भव्य है। यहाँ विश्वप्रसिद्ध तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) स्थापित था। इसी भवन में कालान्तर में फ़ारसी कवि की प्रसिद्ध पंक्ति अंकित की गई — “गर फिरदौस बर रू-ए-ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त” अर्थात् “अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।”
➣ मुमताज महल / खास महल — यह शाहजहाँ का निजी आवास था और अत्यन्त सुन्दर श्वेत संगमरमर से निर्मित है।
➣ रंग महल (इम्तियाज महल) — यह शाही हरम की महिलाओं के निवास हेतु बनाया गया था। रंग महल के मध्य में “नहर-ए-बहिश्त” (स्वर्ग की नहर) नामक एक कृत्रिम नहर प्रवाहित होती थी जो किले के समस्त भवनों को जल की आपूर्ति करती थी।
➣ हयात-बख्श उद्यान (जीवन प्रदान करने वाला उद्यान) — लाल किले के भवनों की पंक्ति के पीछे यह सुन्दर मुग़ल उद्यान स्थित है जो किले की शोभा को और अधिक बढ़ाता है।
➣ भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात से प्रतिवर्ष 15 अगस्त को प्रधानमन्त्री लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं और राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं, जिससे इसका ऐतिहासिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
2007 ई. में यूनेस्को (UNESCO) ने लाल किले को विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया। यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य प्रतीक है।
मुमताज
➣ मुमताज महल का जन्म 1593 ई. में आगरा में हुआ था। उसका वास्तविक नाम अर्जुमन्द बानू बेगम था। वह फ़ारसी मूल के कुलीन परिवार से सम्बन्ध रखती थी।
➣ उसके पिता आसफ खाँ सम्राट जहाँगीर के दरबार में एक प्रभावशाली अमीर एवं वज़ीर थे, तथा उसकी बुआ नूरजहाँ स्वयं जहाँगीर की पत्नी और साम्राज्ञी थी। इस प्रकार मुमताज, नूरजहाँ की भतीजी थी।
➣ शाहजहाँ (तब शहज़ादा खुर्रम) की सगाई अर्जुमन्द बानू से 1607 ई. में हुई थी, परन्तु विवाह पाँच वर्ष पश्चात 1612 ई. में सम्पन्न हुआ। यह शाहजहाँ का तीसरा विवाह था, परन्तु मुमताज उसकी सर्वाधिक प्रिय और प्रभावशाली पत्नी बनी।
➣ विवाह के पश्चात ही शाहजहाँ ने उसे “मुमताज महल” (महल की श्रेष्ठ/चयनित स्त्री) की उपाधि प्रदान की। इसके अतिरिक्त उसे “मलिक-ए-जमानी” (युग की स्वामिनी) की उपाधि भी प्राप्त थी।
➣ मुमताज न केवल शाहजहाँ की पत्नी अपितु उसकी अत्यन्त विश्वासपात्र सलाहकार भी थी। कहा जाता है कि शाहजहाँ राजकीय मुहर (मुहर उज़ुक़) भी उसे सौंप देता था और कई महत्त्वपूर्ण निर्णयों में उसकी सलाह ली जाती थी। वह सदैव शाहजहाँ के साथ उसके सैन्य अभियानों एवं यात्राओं में भी साथ रहती थी, यहाँ तक कि गर्भावस्था की दशा में भी।
➣ वह इतिहास में मुमताज महल के नाम से प्रसिद्ध हुई तथा आगरा का विश्वप्रसिद्ध ताजमहल शाहजहाँ ने उसी की याद में बनवाया था।
➣ इस मक़बरे के निर्माण में लगभग 22 वर्ष (1632-1653 ई. के लगभग) तथा हज़ारों कारीगरों व श्रमिकों का श्रम लगा। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है तथा इसे मुग़ल वास्तुकला की सर्वोत्तम कृति एवं विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। इसके वास्तुकार का नाम उस्ताद अहमद लाहौरी माना जाता है।
➣ 1631 ई. में शाहजहाँ के दक्षिण भारत अभियान (बुरहानपुर अभियान) के दौरान मुमताज भी उसके साथ थी। वहीं अपने 14वें बच्चे (पुत्री गौहर आरा) को जन्म देते समय प्रसव-सम्बन्धी जटिलताओं के कारण बुरहानपुर (वर्तमान मध्यप्रदेश) में उसकी मृत्यु हो गई।
➣ प्रारम्भ में उसे बुरहानपुर के ज़ैनाबाद उद्यान में अस्थायी रूप से दफनाया गया, बाद में लगभग छह माह पश्चात उसके अवशेषों को आगरा लाकर ताजमहल में स्थायी रूप से दफनाया गया। कहा जाता है कि उसकी मृत्यु से शाहजहाँ इतना शोकाकुल हुआ कि उसके बाल समय से पूर्व सफेद हो गए थे।
➣ मुमताज़ महल की 14 संतानों में से केवल चार पुत्र एवं तीन पुत्रियाँ ही वयस्कता तक जीवित रहीं, जबकि शेष संतानों की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो गई।
➣ जीवित संतानें थीं— जहाँआरा बेगम (1614 ई., शाहजहाँ की सबसे प्रिय पुत्री), दारा शिकोह (1615 ई., शाहजहाँ द्वारा उत्तराधिकारी घोषित), शाह शुजा (1616 ई.), रोशनआरा बेगम (1617 ई.), औरंगज़ेब (1618 ई., जो आगे चलकर मुगल सम्राट बना), मुराद बख्श (1624 ई.) तथा गौहरआरा बेगम (1631 ई., जिसके जन्म के समय ही मुमताज़ महल की मृत्यु हो गई)।
➣ मुमताज की जीवित 7 सन्तानें इस प्रकार थीं-
| सन्तान | जन्म तिथि | जन्म स्थान |
|---|---|---|
| जहाँआरा बेगम | 23 मार्च, 1614 | अजमेर |
| दाराशिकोह | 20 मार्च, 1615 | अजमेर |
| शाहशुजा | 23 जून, 1616 | अजमेर |
| रोशनआरा बेगम | 24 अगस्त, 1617 | बुरहानपुर |
| औरंगज़ेब | 3 नवम्बर, 1618 | दाहोद (गुजरात) |
| मुराद बख्श | 29 अगस्त, 1624 | रोहतास |
| गौहरआरा बेगम | 7 जून, 1631 | बुरहानपुर |
नूरजहाँ (मेहरुन्निसाँ)
➣ जहाँगीर की यशस्वी एवं प्रभावशाली रानी नूरजहाँ का मूल नाम मेहरुन्निसाँ था। उसके पिता फारस के प्रतिष्ठित अमीर ग़ियासबेग थे।
➣ ग़ियासबेग बाद में मुग़ल दरबार में उच्च पद पर आसीन हुए। मेहरुन्निसाँ का जन्म अत्यन्त विचित्र परिस्थितियों में कंधार के एक काफिले में हुआ था, जब उसका परिवार फारस से भारत आ रहा था।
➣ मात्र सत्रह वर्ष की आयु में मेहरुन्निसाँ का निकाह एक साहसी फारसी युवक अली कुली अस्तालु से हुआ, जिसे जहाँगीर ने “शेर अफ़गान” की उपाधि दी थी। अली कुली बंगाल में बर्दवान का जागीरदार था।
➣ 9 अप्रैल, 1607 ई. को एक विवाद के दौरान अली कुली (शेर अफ़गान) की हत्या कर दी गई। इसके पश्चात मेहरुन्निसाँ अपनी पुत्री लाडली बेगम को लेकर अपने पिता ग़ियासबेग के पास राजधानी आगरा आ गई और वहाँ अकबर की विधवा रानी की सेवा में रहने लगी।
➣ मार्च 1611 ई. में नौरोज़ के उत्सव के अवसर पर पहली बार जहाँगीर की दृष्टि मेहरुन्निसाँ पर पड़ी और वह उसकी सुन्दरता एवं बुद्धिमत्ता पर मुग्ध हो गया। तत्पश्चात मई 1611 ई. में जहाँगीर ने मेहरुन्निसाँ से विधिवत निकाह कर लिया।
➣ 1613 ई. में मेहरुन्निसाँ को “पादशाही बेगम” की उपाधि देकर राज्य की प्रथम महिला घोषित किया गया तथा उन्हें “नूरमहल” (महल का प्रकाश) का खिताब प्रदान किया गया।
➣ मार्च 1616 ई. में जहाँगीर ने उन्हें “नूरजहाँ” (संसार का प्रकाश) की पदवी प्रदान की, जिससे वे इतिहास में इसी नाम से प्रसिद्ध हुईं।
➣ जहाँगीर ने नूरजहाँ की कुशाग्र बुद्धि, कूटनीतिक दक्षता एवं प्रशासनिक योग्यता से प्रभावित होकर उसे शासन-प्रशासन में अपना सक्रिय भागीदार बना लिया।
➣ साम्राज्य के समस्त सिक्कों और शाही फ़रमानों पर जहाँगीर के नाम के साथ “रानी बेगम नूरजहाँ” का नाम अंकित होने लगा – यह सम्मान मुग़ल इतिहास में किसी महिला को पहली बार मिला था।
➣ नूरजहाँ के राज्यारोहण का काल दो चरणों में विभाजित है – 1611 से 1622 ई. तक (जब वह शाहज़ादा खुर्रम के साथ मिलकर शासन करती थी) और 1622 से 1627 ई. तक (जब उसने शहरयार का पक्ष लेते हुए खुर्रम का विरोध किया)।
➣ नूरजहाँ के नेतृत्व में एक शक्तिशाली राजनीतिक गुट बना जिसे “नूरजहाँ गुट” अथवा “जुन्ता गुट” कहा जाता है। इसमें नूरजहाँ, उसकी माँ अस्मत बेगम, पिता एत्मादुद्दौला, भाई आसफ खाँ, शाहज़ादा खुर्रम (कुछ समय के लिए शहरयार) आदि सम्मिलित थे।
➣ नूरजहाँ की भतीजी अर्जुमन्द बानू बेगम (आसफ खाँ की पुत्री, जो बाद में मुमताज महल कहलाई) का विवाह शाहज़ादा खुर्रम से होने पर खुर्रम जुन्ता गुट का महत्त्वपूर्ण सदस्य बन गया।
➣ किन्तु बाद में नूरजहाँ ने खुर्रम से मतभेद हो जाने पर अपनी पुत्री लाडली बेगम का विवाह जहाँगीर के पुत्र शहरयार से करा दिया और उसे खुर्रम के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में तैयार करने लगी।
➣ नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम को इत्र (अत्तर-ए-जहाँगीरी) के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। नूरजहाँ स्वयं फैशन और वस्त्र-विन्यास के क्षेत्र में अभिनव प्रयोगों के लिए विख्यात थी- उसने कई नए परिधान, आभूषण-शैलियाँ और सौन्दर्य-प्रसाधन प्रचलित किए जो मुग़ल दरबार में अत्यन्त लोकप्रिय हुए।
➣ नूरजहाँ एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी महिला थी। वह फ़ारसी भाषा की विदुषी थी तथा कविताएँ रचकर उन्हें अपने मधुर स्वर में गाती थी। इसके अतिरिक्त वह कुशल शिकारी भी थी और हाथी के हौदे पर बैठकर शेर का शिकार करने के लिए प्रसिद्ध थी।
➣ जहाँगीर की मृत्यु (1627 ई.) के पश्चात शाहजहाँ के सत्तारूढ़ होने पर नूरजहाँ का राजनीतिक प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया। उसने अपना शेष जीवन लाहौर में अपनी पुत्री लाडली बेगम के साथ एक साधारण पेंशनभोगी के रूप में व्यतीत किया।
➣ 1645 ई. में नूरजहाँ का निधन हो गया और उसे लाहौर के शाहदरा में अपने प्रिय पति जहाँगीर की कब्र के बगल में ही दफनाया गया। उसका मक़बरा आज भी लाहौर में स्थित है।
दीन-ए-ईलाही धर्म
➣ मुग़ल सम्राट अकबर ने 1582 ई. में तौहीद-ए-ईलाही (दैवी एकेश्वरवाद) की घोषणा की, जो कालान्तर में दीन-ए-ईलाही (ईश्वर का धर्म) के नाम से विख्यात हुआ। यह अकबर की धार्मिक उदारता और सर्वधर्म-समभाव की नीति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी।
➣ दीन-ए-ईलाही वास्तव में कोई नया धर्म नहीं था। यह उन व्यक्तियों का एक विशेष समूह था जो अकबर के धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों से पूर्णतः सहमत थे और उसे अपना धार्मिक गुरु मानते थे।
➣ साथ ही इसके लिए न कोई धर्मग्रन्थ था, न कोई मन्दिर-मस्जिद और न ही कोई विशेष पूजा-स्थल निर्धारित किया गया था।
➣ अकबर ने अपनी सुलह-कुल (सार्वभौमिक शान्ति एवं सौहार्द) की नीति को ध्यान में रखते हुए हिन्दू, इस्लाम, जैन, पारसी एवं ईसाई – समस्त धर्मों की श्रेष्ठ एवं सार्वभौमिक बातों का समावेश अपने इस धार्मिक
➣ दर्शन में किया।
वास्तव में दीन-ए-ईलाही सूफी सर्वेश्वरवाद पर आधारित एक विचार-पद्धति थी, जिसके प्रवर्तन की मुख्य प्रेरणा निज़ामुद्दीन औलिया के सुलह-कुल अथवा सार्वजनिक सौहार्द के सिद्धान्त से मिली थी।➣ इस नवीन सम्प्रदाय का प्रधान पुरोहित अबुल फ़ज़ल था, जो अकबर का अत्यन्त विश्वासपात्र एवं प्रतिभाशाली दरबारी था। आइने-अकबरी में कुल 18 व्यक्तियों के नाम मिलते हैं जिन्होंने दीन-ए-ईलाही को पूर्णतः ग्रहण किया था।
➣ हिन्दुओं में केवल बीरबल ने ही दीन-ए-ईलाही को स्वीकार किया था, जबकि प्रमुख राजपूत सरदारों राजा भगवान दास एवं मानसिंह ने इसकी सदस्यता ग्रहण करने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया था।
➣ दीन-ए-ईलाही की सदस्यता का द्वार सभी धर्मों के व्यक्तियों के लिए समान रूप से खुला था। शिष्यता ग्रहण करने का दिन रविवार निश्चित किया गया था।
➣ सदस्यता ग्रहण करने की प्रक्रिया अत्यन्त प्रतीकात्मक थी- नवागन्तुक अपने हाथ में पगड़ी लेकर बादशाह के चरणों में अपना शीश रख देता था, तत्पश्चात बादशाह उसे उठाकर अपने हाथों से उसकी पगड़ी उसके सिर पर रखता था और गुरु के रूप में उसे गुरु-मन्त्र प्रदान करता था।
➣ दीन-ए-ईलाही के सदस्य जब एक-दूसरे से मिलते थे तो अल्लाह-औ-अकबर (अल्लाह महान है) और जल्ले जलालूह (उसके यश में वृद्धि हो) कहकर एक-दूसरे को सम्बोधित करते थे। इसके अतिरिक्त सदस्यों को चहारगाना-ए-इखलास के चरणों को पूरा करना होता था।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार विन्सेण्ट स्मिथ ने दीन-ए-ईलाही को मूर्खता का स्मारक कहकर इसकी कटु आलोचना की थी।
➣ वहीं दूसरी ओर अनेक इतिहासकारों ने इसे अकबर की धार्मिक उदारता एवं बौद्धिक जिज्ञासा का प्रतीक माना है। जहाँगीर के शासनकाल में दीन-ए-ईलाही का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
दाराशिकोह (सूफी राजकुमार)
➣ दाराशिकोह शाहजहाँ के पुत्रों में सबसे बड़ा था तथा वह उदात्त चरित्र, विशाल हृदय एवं असाधारण ज्ञान का स्वामी था।
➣ उसने अपने धार्मिक विचारों और राजनीतिक दर्शन को अपने पूर्वज अकबर के वैचारिक ढाँचे में ढालने का प्रयास किया। वह हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की आध्यात्मिक परम्पराओं में गहरी रुचि रखता था और दोनों के बीच समन्वय स्थापित करना चाहता था।
➣ दारा का विवाह शाहज़ादा परवेज़ की पुत्री नादिरा बेगम से हुआ था, जिससे उसे अत्यन्त प्रेम था। नादिरा बेगम की मृत्यु दारा के साथ उत्तराधिकार युद्ध के दौरान भागते-भटकते हुई थी।
➣ शाहजहाँ अपने समस्त पुत्रों में दाराशिकोह को सर्वाधिक प्रेम करता था और उसे ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। शाहजहाँ ने दारा को “शाह बुलन्द इकबाल” (उच्च भाग्य का राजा) का खिताब प्रदान किया था।
➣ दारा को सूफियों की कादिरी परम्परा से अत्यन्त गहरा लगाव था। इस परम्परा के प्रसिद्ध सन्त मुल्लाशाह दारा के आध्यात्मिक गुरु थे।
➣ दारा ने हिन्दू दर्शन एवं वेदान्त का गहन अध्ययन किया तथा उपनिषदों का फ़ारसी में “सिर्र-ए-अकबर” (महान रहस्य) नाम से अनुवाद करवाया।
➣ उसने “मज्मउल-बहरैन” (दो समुद्रों का संगम) नामक ग्रन्थ की रचना भी की, जिसमें हिन्दू और इस्लामी रहस्यवाद की समानताओं को प्रतिपादित किया।
➣ दारा की इसी धार्मिक सहिष्णुता, उदारता एवं सर्वधर्म-समभाव की नीति के कारण प्रसिद्ध इतिहासकार लेनपूल ने उसे “लघु अकबर” की संज्ञा दी। वह मुग़ल साम्राज्य की उदार परम्परा का अन्तिम प्रतिनिधि माना जाता है।
➣ शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके चारों पुत्रों-दारा, शुजा, मुराद और औरंगज़ेब के बीच उत्तराधिकार का भीषण युद्ध छिड़ गया।
दारा इस युद्ध में औरंगज़ेब से पराजित हुआ और 30 अगस्त, 1659 ई. को औरंगज़ेब के आदेश पर उसकी निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गई। उसे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफनाया गया।➣ दारा के दो पुत्र थे — सुलेमान शिकोह तथा सिफिहर शिकोह। इनमें से सुलेमान शिकोह को औरंगज़ेब ने बन्दी बनाकर धीमा ज़हर देकर हत्या करवा दी, ताकि भविष्य में उत्तराधिकार का कोई दावेदार शेष न रहे।
| मज्म-उल-बहरीन | (दो महासागरों का मिलन) हिन्दू और इस्लाम धर्म को एक ही ईश्वर की प्राप्ति के दो मार्ग बताए गए हैं। |
| सकीनत-उल-औलिया | भारत की ‘कादिरी परम्परा’ के सूफियों की जीवनी |
| सफीमत-उल-औलिया | विभिन्न सिलसिलों के सूफियों की जीवनी |
| रिसाएल-हक-नुमा | सूफी परम्पराओं का उल्लेख |
| तरीकत-उल-हकीकत | आध्यात्मिक मार्ग के विभिन्न चरण |
| हसनात-उल-आरफीन | विभिन्न सन्तों के उपदेशों का संकलन |
| सिर्र-ए-अकबर | बावन उपनिषदों का फारसी में अनुवाद |
जजिया कर
➣ जजिया एक धार्मिक कर था जिसे “मुण्डकर” के नाम से भी जाना जाता था। इस्लामी कानून के अनुसार यह कर मूलतः यहूदियों एवं ईसाइयों से वसूला जाता था, किन्तु भारत में आए मुस्लिम शासकों ने इसे समस्त गैर-मुस्लिमों पर लागू कर दिया।
➣ इस्लामी कानून की व्याख्या के अनुसार गैर-मुस्लिमों को मुस्लिम राज्य में रहने का अधिकार नहीं था, अतः इस कर की अदायगी के बदले उन्हें शासक का संरक्षण एवं सुरक्षा प्राप्त होती थी।
➣ इस कर को देने वाले “जिम्मी” कहलाते थे। कुछ इतिहासकार इसे भूमि कर मानते हैं तो कुछ व्यक्ति कर — यह विद्वानों में आज भी विवादास्पद है।
➣ 712 ई. में सिन्ध पर आक्रमण करने वाले प्रथम अरब मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन कासिम ने भारत में पहली बार जजिया कर की वसूली की। इस प्रकार भारत में जजिया कर का इतिहास लगभग 1000 वर्षों से भी अधिक पुराना है।
➣ सल्तनतकालीन शासकों ने इस कर की वसूली समूचे भारत के हिन्दुओं से की। सल्तनत काल में फ़िरोज़ तुगलक ने पहली बार इस कर को ब्राह्मणों पर भी लागू किया, इससे पूर्व ब्राह्मण इस कर से मुक्त थे। यह एक अत्यन्त विवादास्पद निर्णय था क्योंकि ब्राह्मण परम्परागत रूप से कर से मुक्त माने जाते थे।
➣ मुग़ल सम्राट अकबर ने जजिया कर के सन्दर्भ में कई बार नीति परिवर्तन किए। सर्वप्रथम उसने 1562 ई. में कुछ क्षेत्रों में जजिया कर को हटाया, किन्तु कट्टरपन्थी उलेमाओं के दबाव में यह पुनः चालू हो गया।
➣ तत्पश्चात 1564 ई. में अकबर ने इसे पुनः समाप्त कर दिया, परन्तु कुछ समय बाद उलेमाओं एवं रूढ़िवादी दरबारियों के दबाव में यह फिर से लागू हो गया।
➣ अन्ततः अकबर ने 1579 ई. में “महजरनामा” (अचूक आज्ञापत्र) जारी करने के पश्चात अपनी स्थिति और अधिक सुदृढ़ होने पर जजिया कर को पूर्णतः एवं स्थायी रूप से समाप्त कर दिया।
➣ इस्लाम के कट्टर अनुयायी औरंगज़ेब ने 1679 ई. में इस कर को पुनः लागू कर दिया। औरंगज़ेब के इस निर्णय ने हिन्दुओं में व्यापक असन्तोष उत्पन्न किया और अनेक विद्रोहों को जन्म दिया।
➣ जयसिंह ने मेवाड़ पर जजिया कर हटाने के बदले में औरंगज़ेब को मादलपुर एवं बेदनूर का क्षेत्र दे दिया। यह इस बात का प्रमाण है कि जजिया कर हिन्दू राजाओं के लिए कितना अपमानजनक एवं पीड़ादायक था।
➣ उत्तरवर्ती मुग़ल शासकों में फर्रुखसियर ने 1713 ई. में जजिया कर को पुनः व्यवस्थित किया किन्तु 1719 ई. तक इसकी वसूली पुनः प्रारम्भ कर दी गई।
➣ अन्ततः मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह (1719-48 ई.) के शासनकाल में जजिया कर की वसूली अन्तिम रूप से बन्द की गई।
➣ जजिया कर की दरें आय के अनुसार निर्धारित की गई थीं – धनी वर्ग से 48 दिरहम (40 टका), मध्य वर्ग से 24 दिरहम (20 टका) तथा सामान्य वर्ग से 12 दिरहम (10 टका) वार्षिक वसूला जाता था।
➣ जजिया कर से स्त्रियाँ, बच्चे, भिखारी, पुजारी, साधु-सन्त, अपाहिज एवं वृद्ध आदि पूर्णतः मुक्त थे। इसके अतिरिक्त जो गैर-मुस्लिम मुग़ल सेना में सेवा करते थे उन्हें भी इस कर से छूट प्राप्त थी।
मुगलकालीन प्रमुख महिलाएँ
गुलबदन बेगमयह बाबर की पुत्री एवं हुमायूँ की बहन थी। यह अरबी-फ़ारसी भाषा की उच्चकोटि की विदुषी थी।
➣ इसने प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ “हुमायूँनामा” की रचना की, जो मुग़ल काल के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह एकमात्र मुग़ल महिला थी जिसने किसी ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना की।
अस्मत बेगमयह नूरजहाँ की माता एवं आसफ खाँ की पत्नी थी। इसे गुलाब के फूलों से इत्र (अत्तर) बनाने की विधि के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है।
➣ कहा जाता है कि एक बार स्नान के समय गुलाब-जल से भरे हौज़ में उसने तेल की परत देखी और इसी से इत्र बनाने की विधि का सूत्रपात हुआ। यह इत्र “अत्तर-ए-जहाँगीरी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
माहम अनगायह मुग़ल सम्राट अकबर की धाय माँ (दूध-माता) थी और अकबर पर इसका अत्यधिक प्रभाव था।
➣ अकबर के अल्पवयस्क होने के कारण इसने 1560-62 ई. तक वास्तविक सत्ता अपने हाथों में रखी, जिसे “पर्दा शासन” कहा जाता है।
➣ इसने हुमायूँ के साथ मिलकर दिल्ली में “मदरसा-ए-बेगम” की स्थापना की थी, जो उस काल का एक प्रमुख शिक्षण-संस्थान था।
नूरजहाँयह मुग़ल सम्राट जहाँगीर की सर्वाधिक प्रिय एवं प्रभावशाली पत्नी थी। इसने जुन्ता गुट (नूरजहाँ गुट) का कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया और शासन-कार्य में जहाँगीर के साथ बराबर का हिस्सा लिया।
➣ शाही सिक्कों और फ़रमानों पर इसका नाम जहाँगीर के नाम के साथ अंकित होता था। इसने अनेक श्रृंगार-प्रसाधनों, परिधानों एवं आभूषणों में विशेष एवं अभिनव परिवर्तन किए जो मुग़ल दरबार में अत्यन्त लोकप्रिय हुए।
मुमताज महलयह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की सर्वाधिक प्रिय पत्नी थी। इसका वास्तविक नाम अर्जुमन्द बानू बेगम था।
➣ यह श्रृंगार-प्रसाधनों और आभूषणों की विशेषज्ञ थी तथा शाहजहाँ की प्रशासनिक सलाहकार भी थी। 1631 ई. में बुरहानपुर में इसकी मृत्यु के पश्चात शाहजहाँ ने इसकी अमर स्मृति में आगरा में विश्वप्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण करवाया।
जहाँआरा बेगमयह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की सबसे बड़ी पुत्री थी और शाहजहाँ को इससे अत्यन्त स्नेह था। उत्तराधिकार के युद्ध में इसने अपने भाई दाराशिकोह का पक्ष लिया।
➣ यह सूफी मत की कादिरी सिलसिले से गहरे रूप में प्रभावित थी। शाहजहाँ के आगरा के किले में बन्दी बनाए जाने के बाद यह स्वेच्छा से उसके साथ रही और अन्त तक उसकी सेवा करती रही।
ज़ेबुन्निसायह मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की सबसे बड़ी पुत्री थी और असाधारण प्रतिभा की धनी थी। इसने दिल्ली में “बैतुल-उलूम” नामक एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की।
➣ यह “मख्फी” (छिपी हुई) उपनाम से फ़ारसी में कविताएँ लिखती थी और इसका काव्य-संग्रह “दीवान-ए-मख्फी” के नाम से प्रसिद्ध है। औरंगज़ेब ने इसे अपने भाई अकबर द्वितीय से कथित सम्पर्क के कारण जीवनपर्यन्त कारागार में बन्द रखा।
मुगल काल में आए विदेशी यात्री
राल्फ फिच (1583-91 ई.)➣ यह अकबर के शासनकाल में भारत आने वाला प्रथम अंग्रेज़ यात्री था। यह एक व्यापारी के रूप में भारत आया था।
➣ इसने फतेहपुर सीकरी एवं आगरा की तुलना तत्कालीन लंदन से की और लिखा कि ये नगर लंदन से भी बड़े एवं समृद्ध हैं। इसने मुग़ल साम्राज्य की व्यापारिक समृद्धि, बाज़ारों और नगरों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।
कैप्टन हॉकिन्स (1608-11 ई.)➣ यह ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में जहाँगीर के दरबार में पहुँचा था।
➣ यह तुर्की भाषा का अच्छा जानकार था, जिससे जहाँगीर प्रभावित हुआ और उसे 400 का मनसब प्रदान किया। इसने जहाँगीर के दरबार, उसकी जीवन-शैली तथा मुग़ल दरबार की आन्तरिक राजनीति का रोचक विवरण अपने यात्रा-वृत्तान्त में दिया है।
सर टॉमस रो (1615-18 ई.)➣ यह ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार में आया था। इसका मुख्य उद्देश्य मुग़ल साम्राज्य में ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए व्यापारिक सुविधाएँ एवं अनुमति प्राप्त करना था।
➣ इसने जहाँगीर के व्यक्तित्व, दरबार की भव्यता तथा मुग़ल प्रशासन का विस्तृत एवं प्रामाणिक विवरण दिया। इसके यात्रा-वृत्तान्त को “Embassy of Sir Thomas Roe” के नाम से जाना जाता है।
पित्रो-डेला वाले (1623-26 ई.)➣ यह इटली का यात्री था जो 1623 ई. में सूरत पहुँचा। उस समय जहाँगीर मुग़ल साम्राज्य का शासक था।
➣ इसने भारत की सामाजिक स्थिति, यहाँ की महिलाओं की दशा, रीति-रिवाज़ों तथा विभिन्न नगरों का विस्तृत विवरण दिया। यह अत्यन्त शिक्षित एवं जिज्ञासु यात्री था जिसने भारतीय संस्कृति को गहराई से समझने का प्रयास किया।
पीटर मुंडी (1630-34 ई.)➣ यह ब्रिटिश यात्री था जिसने शाहजहाँ के शासनकाल में भारत की यात्रा की। इसने शाहजहाँ के शासनकाल में पड़े भीषण अकाल का हृदयविदारक वर्णन किया है।
➣ इसने आगरा एवं सूरत के व्यापार तथा सामान्य जन-जीवन का भी विस्तृत विवरण दिया। इसका यात्रा-वृत्तान्त उस काल की सामाजिक-आर्थिक दशा को समझने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
ट्रैवर्नियर (1638-63 ई.)➣ यह फ्रांस का यात्री था (प्रायः इसे इटली का बताया जाता है, किन्तु यह फ्रेंच था)।
➣ इसने भारत की 6 बार यात्रा की, जो इसे अन्य यात्रियों से विशिष्ट बनाती है। यह पेशे से हीरे का व्यापारी था, इसीलिए इसने भारत के हीरा-व्यापार, खानों तथा रत्नों का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विशेषज्ञतापूर्ण विवरण दिया है। इसने प्रसिद्ध कोहिनूर हीरे तथा तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) का भी विस्तृत वर्णन किया है।
मनूची (1653-1708 ई.)➣ यह इटली का यात्री था जो भारत आकर यहीं का होकर रह गया। प्रारम्भ में इसने शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह की सेना में तोपची की नौकरी की और उत्तराधिकार के युद्धों में भाग लिया।
➣ बाद में इसने चिकित्सक का पेशा अपनाया और दक्षिण भारत में बस गया। इसने मुग़ल दरबार, उत्तराधिकार के युद्धों तथा औरंगज़ेब के शासनकाल का अत्यन्त जीवन्त एवं प्रत्यक्षदर्शी विवरण अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “स्टोरिया डो मोगोर” में दिया है।
बर्नियर (1656-1707 ई.)➣ यह फ्रांस का प्रसिद्ध चिकित्सक एवं यात्री था जो शाहजहाँ के अन्तिम काल में भारत आया। इसने शाहजहाँ के पुत्रों के बीच हुए उत्तराधिकार के युद्धों का अत्यन्त विस्तृत एवं प्रामाणिक वर्णन किया है। यह दाराशिकोह का चिकित्सक भी रहा।
➣ इसकी प्रसिद्ध पुस्तक “ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर” मुग़ल इतिहास का एक अमूल्य स्रोत मानी जाती है। इसने मुग़ल साम्राज्य की भूमि-व्यवस्था, आर्थिक दशा एवं जन-जीवन की कटु आलोचना भी की है।
मुगल काल में आए विदेशी यात्री
| विदेशी यात्री (काल) | समकालीन मुगल शासक | देश | प्रमुख विवरण |
|---|---|---|---|
| राल्फ फिच (1583–1591 ई.) | अकबर | इंग्लैंड | फतेहपुर सीकरी एवं आगरा की तुलना लंदन से की। |
| कैप्टन विलियम हॉकिन्स (1608–1611 ई.) | जहाँगीर | इंग्लैंड | ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में जहाँगीर के दरबार में आया। जहाँगीर ने इसे 400 का मनसब प्रदान किया। |
| सर टॉमस रो (1615–1619 ई.) | जहाँगीर | इंग्लैंड | ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार में आया। |
| पिएत्रो डेला वाले (1623–1624 ई.) | जहाँगीर | इटली | 1623 ई. में सूरत पहुँचा तथा भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का वर्णन किया। |
| पीटर मुंडी (1630–1634 ई.) | शाहजहाँ | इंग्लैंड | व्यापार, अकाल एवं भारतीय जीवन का विस्तृत वर्णन किया। |
| जाँ बैप्टिस्ट टैवर्नियर (1638–1663 ई.) | शाहजहाँ एवं औरंगज़ेब | फ्रांस | भारत की छह यात्राएँ कीं। हीरा एवं बहुमूल्य रत्नों के व्यापार का महत्वपूर्ण विवरण दिया। |
| निकोलाओ मनूची (1653–1708 ई.) | शाहजहाँ, औरंगज़ेब एवं उत्तरवर्ती मुगल | इटली | दाराशिकोह की सेना में तोपची रहा, बाद में चिकित्सक बना। स्टोरिया दो मोगोर का लेखक। |
| फ्राँस्वा बर्नियर (1656–1668 ई.) | शाहजहाँ एवं औरंगज़ेब | फ्रांस | उत्तराधिकार युद्धों तथा मुगल प्रशासन का विस्तृत वर्णन किया। |
मुगलकालीन प्रमुख युद्ध
| युद्ध | वर्ष | मध्य | विजय |
|---|---|---|---|
| पानीपत का प्रथम युद्ध | 1526 ई. | बाबर और इब्राहिम लोदी | बाबर |
| खानवा का युद्ध | 1527 ई. | बाबर व राणा सांगा | बाबर |
| चंदेरी का युद्ध | 1528 ई. | बाबर और मेदिनी राय | बाबर |
| घाघरा का युद्ध | 1529 ई. | बाबर व महमूद लोदी | बाबर |
| चौसा का युद्ध | 1539 ई. | हुमायूँ एवं शेरशाह सूरी | शेरशाह सूरी |
| कन्नौज या बिलग्राम का युद्ध | 1540 ई. | हुमायूँ व शेरशाह सूरी | शेरशाह सूरी |
| मच्छीवारा का युद्ध | 1555 ई. | हुमायूँ व अफगान सातार खाँ | हुमायूँ |
| सरहिन्द का युद्ध | 1555 ई. | हुमायूँ व सिकंदरशाह सूरी | हुमायूँ |
| पानीपत का द्वितीय युद्ध | 1556 ई. | अकबर व हेमू | अकबर |
| हल्दी घाटी का युद्ध | 1576 ई. | मानसिंह व राणा प्रताप | अकबर |
| अहमद नगर का युद्ध | 1600 ई. | अकबर की सेना व चाँद बीबी | अकबर |
| असीर गढ़ का युद्ध | 1601 ई. | अकबर व मियांबहादुर | अकबर विजयी |
मुगल शासकों के मकबरे
| शासक | मकबरा | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|---|
| बाबर | काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) | बाबर की पत्नी बीबी मुबारिका (बाद में जहाँगीर द्वारा जीर्णोद्धार) | पहाड़ी ढलान पर स्थित उद्यानयुक्त मकबरा; बाबर की इच्छा के अनुसार खुले वातावरण में बनाया गया। |
| हुमायूँ | दिल्ली | हाजी बेगम (बेगा बेगम) | भारत का पहला भव्य चारबाग शैली का मुगल मकबरा; ताजमहल की स्थापत्य शैली का अग्रदूत माना जाता है। |
| अकबर | सिकंदरा (आगरा) | निर्माण अकबर ने प्रारम्भ कराया, पूर्ण जहाँगीर ने कराया। | पाँच मंजिला पिरामिडनुमा संरचना; मुख्य गुंबद का अभाव तथा हिन्दू, बौद्ध, जैन और इस्लामी स्थापत्य का समन्वय। |
| जहाँगीर | लाहौर (पाकिस्तान) | नूरजहाँ (परंपरागत मत) | लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर से निर्मित; विशाल गुंबद नहीं है, चारों कोनों पर ऊँची मीनारें हैं। |
| शाहजहाँ | ताजमहल, आगरा | शाहजहाँ | श्वेत संगमरमर से निर्मित विश्वप्रसिद्ध स्मारक; मुमताज़ महल की स्मृति में निर्मित तथा UNESCO विश्व धरोहर स्थल। |
| औरंगज़ेब | खुलदाबाद, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) | औरंगज़ेब की इच्छा के अनुसार साधारण कब्र; बाद में पुत्र आज़म शाह ने व्यवस्था कराई। | अत्यंत सादा एवं बिना भव्य गुंबद का मकबरा; औरंगज़ेब की सादगीपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक। |
मुगलों की राजधानी
आगरा (1556-1569 ई.)➣ अकबर के शासनकाल के प्रारम्भिक वर्षों में आगरा मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। यह नगर यमुना नदी के तट पर स्थित था और व्यापार एवं प्रशासन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।
➣ अकबर ने यहाँ प्रसिद्ध आगरा का किला (लाल किला) बनवाया जो लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इस काल में आगरा मुग़ल सत्ता, संस्कृति और व्यापार का प्रमुख केन्द्र था।
फतेहपुर सीकरी (1569-1584 ई.)➣ अकबर ने 1569 ई. में आगरा से लगभग 35 किमी दूर फतेहपुर सीकरी नामक नए नगर की स्थापना की और इसे अपनी नई राजधानी बनाया।
➣ इस नगर की स्थापना के पीछे प्रमुख कारण सूफी सन्त शेख सलीम चिश्ती का आशीर्वाद था, जिनकी दरगाह यहीं स्थित थी और जिन्होंने अकबर को पुत्र-प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था।
➣ यहाँ बुलन्द दरवाज़ा, पंचमहल, दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम, जोधाबाई महल आदि भव्य इमारतें बनवाई गईं। किन्तु जल की भीषण कमी के कारण मात्र 15 वर्षों में ही इसे राजधानी के पद से हटाना पड़ा।
लाहौर (1585-1599 ई.)➣ उत्तर-पश्चिम सीमा पर बढ़ते खतरों विशेषतः काबुल एवं कंधार की समस्याओं तथा रोशनिया विद्रोह से निपटने के लिए अकबर ने 1585 ई. में लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।
➣ लाहौर रणनीतिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह उत्तर-पश्चिमी सीमा के निकट था।
➣ इस काल में अकबर ने लाहौर के किले का पुनर्निर्माण एवं विस्तार करवाया। लगभग 14 वर्षों तक लाहौर मुग़ल साम्राज्य का प्रशासनिक केन्द्र रहा।
आगरा (1600-1648 ई.)➣ उत्तर-पश्चिमी सीमा की समस्याओं के समाधान के पश्चात अकबर पुनः 1600 ई. में आगरा वापस आया और इसे पुनः राजधानी बनाया।
➣ जहाँगीर एवं शाहजहाँ के प्रारम्भिक शासनकाल में भी आगरा ही राजधानी रही। इसी काल में शाहजहाँ ने 1631-1653 ई. के मध्य यहाँ विश्वप्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण करवाया।
➣ आगरा का यह दूसरा काल मुग़ल स्थापत्य कला की दृष्टि से स्वर्णयुग माना जाता है।
शाहजहाँनाबाद — दिल्ली (1648 ई. से आगे)➣ शाहजहाँ ने 1638 ई. में दिल्ली में शाहजहाँनाबाद नामक नए नगर की स्थापना की जो दिल्ली का सातवाँ नगर था। 1648 ई. में यह नगर पूर्णतः तैयार होने पर इसे मुग़ल साम्राज्य की नई राजधानी घोषित किया गया।
➣ इस नगर में लाल किला, जामा मस्जिद एवं चाँदनी चौक जैसी भव्य इमारतें एवं मार्ग बनाए गए। शाहजहाँ के पश्चात औरंगज़ेब एवं परवर्ती मुग़ल शासकों के काल में भी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) ही मुग़ल साम्राज्य की राजधानी बनी रही और अन्ततः 1857 के विद्रोह तक यही अन्तिम मुग़ल राजधानी रही।
मुगलों की राजधानी
| राजधानी | काल | प्रमुख कारण / टिप्पणी |
|---|---|---|
| आगरा | 1556–1569 ई. | अकबर के शासन के प्रारम्भिक वर्षों की राजधानी। |
| फतेहपुर सीकरी | 1569–1585 ई. | सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के सम्मान में बसाया गया; जल संकट के कारण राजधानी बदली गई। |
| लाहौर | 1585–1598 ई. | उत्तर-पश्चिमी सीमाओं एवं अफ़ग़ान क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए राजधानी बनाई गई। |
| आगरा | 1598–1648 ई. | अकबर के उत्तरकाल से लेकर शाहजहाँ के शासन तक पुनः राजधानी रही। |
| शाहजहाँबाद (दिल्ली) | 1648 ई. से आगे | शाहजहाँ ने लाल किले के निर्माण के बाद राजधानी को स्थायी रूप से यहाँ स्थानांतरित किया। |
➣ दक्षिण में मुगलों की राजधानी बुरहानपुर थी।
मुगलकालीन उपाधियाँ
| व्यक्ति | उपाधि | टिप्पणी |
|---|---|---|
| मेहरून्निसा | नूरमहल, नूरजहाँ, बादशाह बेगम | जहाँगीर की पत्नी; ‘नूरमहल’ की उपाधि विवाह के समय तथा बाद में ‘नूरजहाँ’ की उपाधि मिली। |
| मानबाई | शाह बेगम | जहाँगीर (सलीम) की प्रथम पत्नी। |
| अर्जुमन्द बानो बेगम | मुमताज़ महल, मलिका-ए-जमानी | शाहजहाँ की प्रिय पत्नी। |
| गयास बेग | एतमाद-उद्-दौला | नूरजहाँ के पिता। |
| खुर्रम | शाहजहाँ, शाह सुल्तान | खुर्रम का शाही नाम शाहजहाँ था। |
| दारा शिकोह | शाह बुलन्द इकबाल | शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र। |
| आदिलशाह (बीजापुर) | फ़र्ज़न्द | जहाँगीर द्वारा प्रदान की गई उपाधि। |
| औरंगज़ेब | ज़िन्दा पीर, शाही दरवेश | धार्मिक एवं सादगीपूर्ण जीवन के कारण प्रसिद्ध। |
| फरीद | शेर ख़ाँ, शेरशाह | बाघ मारने के बाद ‘शेर ख़ाँ’ तथा शासक बनने पर ‘शेरशाह’ कहलाया। |
| अकबर | शहंशाह, ज़िल्ले-इलाही | मुगल सम्राट की सार्वभौमिक सत्ता का प्रतीक। |
| जमान बेग | महावत ख़ाँ | जहाँगीर का प्रसिद्ध सेनापति। |
सूफी सिलसिले से सम्बन्ध
बाबर➣ बाबर सूफी मत के नक्शबन्दी सिलसिले से सम्बन्धित था। यह सिलसिला मध्य एशिया में अत्यन्त प्रभावशाली था और बाबर के परिवार में पीढ़ियों से इस सिलसिले के प्रति श्रद्धा चली आ रही थी।
➣ बाबर नक्शबन्दी सिलसिले के प्रमुख गुरु ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का शिष्य था। ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार समरकन्द के अत्यन्त प्रतिष्ठित एवं प्रभावशाली सूफी सन्त थे जिनका मध्य एशिया की राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव था।
➣ नक्शबन्दी सिलसिले की विशेषता यह थी कि यह शरीयत (इस्लामी कानून) के कठोर पालन पर बल देता था।
हुमायूँ➣ हुमायूँ सूफियों के शत्तारी सिलसिले से सम्बन्धित था। वह इस सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी सन्त मुहम्मद गौस का शिष्य था।
➣ मुहम्मद गौस ग्वालियर के एक अत्यन्त प्रभावशाली सन्त थे जिनका मुग़ल दरबार पर गहरा प्रभाव था।
➣ शत्तारी सिलसिले की विशेषता यह थी कि यह योग एवं ध्यान की पद्धतियों को महत्त्व देता था तथा हिन्दू एवं इस्लामी रहस्यवाद के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता था।
अकबर➣ मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल में चिश्ती सिलसिले का विशेष महत्त्व था। इस सिलसिले के प्रमुख सन्त शेख सलीम चिश्ती फतेहपुर सीकरी में निवास करते थे। अकबर उनसे अत्यन्त प्रभावित था और उनके आशीर्वाद से ही उसे पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई थी।
➣ इसी शेख सलीम चिश्ती की पवित्र कुटिया में फतेहपुर सीकरी में जहाँगीर का जन्म हुआ था, इसीलिए जहाँगीर का नाम पहले सलीम रखा गया था।
➣ अकबर ने शेख सलीम चिश्ती के प्रति श्रद्धावश ही फतेहपुर सीकरी को अपनी नई राजधानी बनाया और वहाँ भव्य नगर का निर्माण करवाया।
➣ चिश्ती सिलसिले की प्रमुख विशेषता सुलह-कुल (सार्वभौमिक सौहार्द) की भावना तथा संगीत (समा) के माध्यम से ईश्वर की आराधना थी।
जहाँगीर➣ चिश्ती सिलसिला मुग़ल सम्राट जहाँगीर का चिश्ती सिलसिले से गहरा आध्यात्मिक सम्बन्ध था, जो उसे अपने पिता अकबर से विरासत में मिला था।
➣ जहाँगीर का जन्म ही चिश्ती सन्त शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में हुआ था, इसीलिए चिश्ती सिलसिले के प्रति उसकी श्रद्धा स्वाभाविक एवं गहरी थी।
➣ जहाँगीर प्रतिवर्ष अजमेर स्थित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाता था और वहाँ मन्नतें माँगता था। उसने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहाँगीरी में चिश्ती सन्तों के प्रति अपनी श्रद्धा का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया है।
दाराशिकोह➣ शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र एवं युवराज दाराशिकोह सूफी मत के कादिरी सिलसिले के अनुयायी थे। इस सिलसिले के सर्वाधिक प्रमुख एवं प्रतिष्ठित सन्त शेख मीर मुहम्मद अथवा मियाँ मीर थे जो लाहौर में निवास करते थे।
➣ दाराशिकोह इनका अत्यन्त श्रद्धालु शिष्य था। दारा ने कादिरी सिलसिले की शिक्षाओं से प्रेरित होकर हिन्दू और इस्लामी रहस्यवाद के बीच समन्वय स्थापित करने का अद्वितीय प्रयास किया।
➣ दाराशिकोह की इसी उदार धार्मिक दृष्टि के कारण उसे “लघु अकबर” की संज्ञा दी जाती है। शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम भी इसी कादिरी सिलसिले से गहरे रूप में प्रभावित थी।
औरंगज़ेब➣ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब सूफी मत के नक्शबन्दी सिलसिले से गहरे रूप में प्रभावित था। यह सिलसिला बाबर के काल से मुग़ल परिवार से जुड़ा था और नक्शबन्दी सिलसिले की शरीयत के कठोर पालन की विचारधारा औरंगज़ेब के कट्टर इस्लामी स्वभाव से पूर्णतः मेल खाती थी।
➣ इस सिलसिले के प्रमुख सन्त ख्वाजा बाकी बिल्लाह एवं उनके शिष्य शेख अहमद सरहिन्दी (मुजद्दिद अल्फसानी) का औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियों पर अत्यन्त गहरा प्रभाव था।
➣ शेख अहमद सरहिन्दी ने अकबर की उदार धार्मिक नीतियों का कड़ा विरोध किया था और इस्लाम को उसके मूल कट्टर स्वरूप में पुनः स्थापित करने का आह्वान किया था।
➣ औरंगज़ेब ने नक्शबन्दी विचारधारा से प्रेरित होकर जजिया कर पुनः लागू करना, संगीत पर प्रतिबन्ध, मन्दिरों का विध्वंस जैसी कट्टर धार्मिक नीतियाँ अपनाईं। इस प्रकार नक्शबन्दी सिलसिले का प्रभाव औरंगज़ेब की समस्त धार्मिक एवं राजनीतिक नीतियों की आधारशिला बना।
| व्यक्ति | सम्बन्धित सूफी सिलसिला |
|---|---|
| बाबर | नक्शबन्दी सिलसिला |
| हुमायूँ | शत्तारी सिलसिला |
| अकबर | चिश्ती सिलसिला |
| जहाँगीर | चिश्ती सिलसिले के प्रति श्रद्धा |
| दाराशिकोह | कादिरी सिलसिला |
| जहाँआरा बेगम | कादिरी सिलसिला |
| औरंगज़ेब | नक्शबन्दी सिलसिले से प्रभावित |
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