अरबों की सिंध विजय (712 ई.) : मुहम्मद-बिन-कासिम

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत अरबों की सिंध विजय (712 ई.)
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सिंध विजय की पृष्ठभूमि

अरब एवं तुकों का भारत पर आक्रमण भारतीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं। अरबों द्वारा धन की लूट एंव ईस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए सर्वप्रथम सिंध पर आक्रमण हुआ। उस समय सिंध पर दाहिर का शासन था।

➣ इसमें अरब पहले मुसलमान आक्रमणकारी थे, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया। मकरान के मरुप्रदेश के समतली मार्ग से ही वे सिन्ध में प्रवेश करने में सफल हुए।

➣ हालाँकि सिंध विजय के बावजूद अरब आक्रमणकारी भारत में उस प्रकार का साम्राज्य नहीं बना पाए जैसा कि उस समय उन्होंने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न भागों में बनाया था। इस प्रकार भारत पर अरबों का कोई स्थायी प्रभाव स्थापित नहीं हो सका।

➣ भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ, स्थानीय शासकों का प्रतिरोध तथा भौगोलिक कठिनाइयाँ इसके प्रमुख कारण थे। इसलिए भारत पर अरबों का प्रभाव सीमित रहा और उनका शासन मुख्यतः सिंध तक ही सीमित रहा।

➣ भारत में एक स्थायी व सुदृढ़ शासन स्थापित करने वाले तुर्क थे। अरबों के प्रारम्भ किए हुए कार्य को तुर्कों ने पूर्ण किया था।

➣ इस प्रकार भारत में मुस्लिम शासन के विस्तार में अरबों और तुर्कों दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, परन्तु स्थायी राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का श्रेय मुख्यतः तुर्कों को जाता है।

सिंध : एक परिचय

सिंध भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक प्रदेश था, जो सिंधु नदी के निचले मैदानों में स्थित था। वर्तमान में इसका अधिकांश भाग Pakistan के सिंध प्रांत में आता है।

सिंध को विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक, सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ स्थित मोहनजादारो इस सभ्यता की उन्नत नगर व्यवस्था और समृद्ध संस्कृति का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

सम्राट हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल में सिंध पर विजय प्राप्त की थी, किन्तु उसकी मृत्यु के बाद सिंध पुनः स्वतंत्र हो गया।

➣ प्रारम्भिक मध्यकाल में सिंध पर रायवंश का शासन था। जब चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया, तब उसने सिंध में एक शूद्र शासक का उल्लेख किया।

रायवंश का अंतिम शासक राय साहसी द्वितीय था। उसके ब्राह्मण मंत्री चाच ने सत्ता पर अधिकार कर ब्राह्मण वंश की स्थापना की और राज्य का विस्तार किया।

चाच के पश्चात उसका भाई चंदर शासक बना तथा उसके बाद दाहिर गद्दी पर बैठा।

➣ राजा दाहिर सेन ब्राह्मण पिता चच और क्षत्रिय माता सोहन्दी का पुत्र था। इसी सिंध के राजा दाहिर ने सिंध आक्रमण के समय अरबों का सामना किया।

1621 ई. में थट्टा के मीर ताहिर मुहम्मद नासियानी ने तारीख-ए-ताहिरी लिखी और 1634 ई. में युसूफ मिराक ने मजहर-ए-शाहजहानी लिखी, जिससे सिंध के इतिहास की जानकारी मिलती है।

सिंध आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध प्रदेश था और भारत, अरब तथा मध्य एशिया के बीच व्यापारिक संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। धार्मिक दृष्टि से भी सिंध विविधताओं का केंद्र था, जहाँ हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों का प्रभाव दिखाई देता है।

भारत में मुस्लिम सत्ता की स्थापना
636-38 ई.
पहला असफल अरबी आक्रमण

मुहम्मद बिन कासिम (712-720ई.)
पहला सफल अरबी आक्रमण, राजा दाहिर के विरुद्ध

सुबुक्तगीन (977-997ई.)
पहला तुर्की आक्रमण, सिंध शासक जयपाल के विरुद्ध

महमूद गजनवी (998-1030 ई.)
17 बार आक्रमण

मुहम्मद गौरी (998-1030 ई.)
भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210-1236 ई.)
भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक

अरब आक्रमण के स्रोत

चचनामा सिन्ध पर अरब आक्रमण का सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत है। मूलतः यह पुस्तक मुहम्मद बिन कासिम के किसी अज्ञात सैनिक/ सेवक द्वारा अरबी में लिखी गई।

➣ बाद में चचनामा को मुहम्मद अली बिन अबु बक्र कुफी ने नासिरूद्दीन कुबाचा के समय फारसी में अनुदित किया।

➣ बिलादूरी की पुस्तक किताब-फुतूल-अल-बलदान जो कि 9वीं शताब्दी की रचना है, में सिन्ध पर अरब आक्रमण की जानकारी मिलती है।

मीर मोहम्मद मासूम (अकबर के दरबार में) की तारीख-ए-सिंध से भी अरब आक्रमण की जानकारी मिलती है।

भारत में अरबों का प्रथम आगमन मालाबार तट (केरल) में व्यापारियों के रूप में हुआ था। अतः भारत में इस्लाम का प्रथम आगमन केरल में हुआ न कि सिंध में।

राम वर्मा कुलशेखर के आदेश पर मलिक बिन देनार (भारत का पहला मुसलमान) ने भारत में प्रथम मस्जिद का निर्माण 629 ई. में कोडुंगालूर, केरल में किया था।

सिंध विजय से पूर्व अरबों के असफल आक्रमण

➣ अरबों का सर्वप्रथम आक्रमण लगभग 636-38 ई. में हुआ था, जब खलीफा उमर के शासनकाल के दौरान बम्बई के समीप स्थित थाना को अपने अधिकार में लेने का प्रयास किया गया, किन्तु यह अभियान सफलता प्राप्त नहीं कर सका।

➣ आठवीं शताब्दी के शुरुआती दशक में इब्न-अल-अरीहल विहट्री द्वारा मकरान पर चढ़ाई करके वहाँ कुछ समय के लिए अधिपत्य स्थापित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप सिन्ध पर विजय प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

➣ तत्पश्चात् 711 ई. में उबेदुल्ला की अगुवाई में अरबों ने पुनः आक्रमण का प्रयास किया, परन्तु यह चढ़ाई भी विफल ही सिद्ध हुई। उबेदुल्ला के उपरान्त उसी वर्ष 711 ई. में बुदेल की सेनापतित्व में एक और अभियान छेड़ा गया, किन्तु वह भी सफलता से वंचित रहा।

➣ हज्जाज के इन दोनों सेनानायकों को क्रमशः दाहिर तथा उसके पुत्र जयसिंह ने पराजित कर मृत्युदण्ड दे दिया। इसके उपरान्त अल-हज्जाज के दामाद एवं भतीजे मुहम्मद बिन कासिम द्वारा किया गया आक्रमण अन्ततः सफल रहा।

अरबों की सिंध विजय

उमैयद खलीफा (उमर खलीफा) के सेनापति, मोहम्मद बिन कासिम, भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम अरब मुस्लिम था। कासिम, इराक के शासक अल हज्जाज का दामाद और एक कुशल सेनानायक था।

➣ कासिम ने 17 वर्ष की उम्र में सिन्धमुल्तान को जीत लिया।


मुहम्मद-बिन-कासिम (712-715 ई.)

➣ मुहम्मद बिन कासिम को अल हज्जाज, जो कि इराक का गवर्नर था, ने सिन्ध पर आक्रमण हेतु भेजा। इस समय खलीफा वालिद था। इस समय कासिम की उम्र 17 वर्ष थी।

देवल अभियान

712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम देवल के बंदरगाह पर पहुँचा और उसे घेर लिया। देवल में दाहिर के भतीजे ने उसका डटकर सामना किया,

➣ परंतु छली ब्राह्मणों द्वारा कासिम का साथ दिये जाने के कारण देवल में जल्द ही मुहम्मद बिन कासिम को विजय प्राप्त हुई।

➣ कासिम ने सर्वप्रथम देवल (बन्दरगाह) के मन्दिर को मंजानिक (मेंगोनेल्स/पत्थर फैंकने का अस्त्र) तथा नाफथा (आग के गोले) से गिराया।

मोका नामक देशद्रोही ने कासिम की मदद की थी।

आम्भि को भारत का पहला देशद्रोही कहा गया है। आम्भी ने सिकंदर की सहायता की थी।

निरून अभियान

➣ देवल से मुहम्मद बिन कासिम निरून की ओर बढ़ा, जहाँ बौद्ध भिक्षुओं ने बिना युद्ध किये उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

सेहवन अभियान

➣ सेहवन में दाहिर का चचेरा भाई माझरा शासन करता था। यहाँ भी थोड़े- बहुत विरोध के बाद कासिम की अधीनता स्वीकार कर ली गई।

रावर अभियान

सेहवन विजय के पश्चात् मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध नदी कर राजां दाहिर पर आक्रमण किया। दाहिर इस अचानक हमले से घबरा गया और उसने अपनी सेना के साथ रावर में शरण ली,

➣ तत्पश्चात रावर में दाहिर और कासिम की सेना के बीच 20 जून, 712 ई. को भीषण युद्ध हुआ। अंततः युद्ध के दौरान दाहिर की मृत्यु हुई। 712 ई. के युद्ध को रावर का युद्ध भी कहा जाता है।

➣ दाहिर की मृत्यु के बाद उसकी विधवा रानीबाई/मैनाबाई/रानी लादी/लाडी देवी ने रावर के दुर्ग की रक्षा की। कड़े प्रतिरोध के बाद रानी ने जौहर किया। यह भारतीय इतिहास में वर्णित जौहर का पहला साक्ष्य है।

भारत का पहला जौहर मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के समय हुआ था जो सिंध के राजा दाहिर की पत्नी महारानी मैनाबाई एंव रानी लाडी/लादी के नेतृत्व में हुआ था।

ब्राह्मनाबाद अभियान

➣ रावर के बाद कासिम ने ब्राह्मणवाद पर आक्रमण किया। यहाँ मुहम्मद बिन कासिम और जयसिंह की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें लगभग 20,000 लोगों की मृत्यु हुई। अंततः परास्त होकर जयसिंह युद्ध भूमि से भाग गया।

➣ ब्राह्मनाबाद के पतन के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने दाहिर की दो पुत्रियां सूर्या देवी और परमल देवी को बंदी बनाया। दोनों पुत्रियों को खलीफा वालिद के पास भेज दिया गया।

चचनामा के अनुसार दाहिर की पुत्रियों की शिकायत पर खलीफा वालिद ने कासिम को मृत्युदण्ड दे दिया था।

आरोर/अलोर अभियान

सिंध की राजधानी आरोर/अलोर की रक्षा का कार्य दाहिर के एक अन्य बेटे के हाथ में था। मुहम्मद बिन कासिम ने आरोर/अलोर पर आक्रमण कर इसे विजित कर लिया।

मुल्तान अभियान

➣ सिन्ध के बाद कासिम ने 713 ई. में मुल्तान को जीता। 713 ई. के आरंभ में मुहम्मद बिन कासिम ऊपरी सिंध के मुख्य नगर मुल्तान की ओर बढ़ा।

➣ मुल्तान की जीत में अरबों को इतना सोना मिला कि मुल्तान का नाम सोने का नगर रख दिया। मुल्तान कासिम की अन्तिम विजय थी।

कन्नौज अभियान

➣ सिंध और मुल्तान विजय के पश्चात् मुहम्मद बिन कासिम शेष भारत को जीतने की योजनाएँ बनाने लगा। ऐसा माना जाता है कि मुहम्मद बिन कासिम ने कन्नौज विजय करने के लिये अबु-हकीम के अधीन एक विशाल अश्वारोही सेना भेजी।

➣ हालाँकि मुहम्मद बिन कासिम सिंध और मुल्तान के अलावा किसी और क्षेत्र को जीतता, इससे पहले हो उसकी मृत्यु (20 वर्ष की अवस्था में) हो गई।

➣ नए खलीफा सुलेमान बिन अब्दुल मलिक ने उसे वापस बुलाकर बंदी बना लिया था। इसी कारण कन्नौज अभियान बीच में ही रुक गया।

कासिम की मृत्यु के उपरांत की स्थिति

714 ई. में ख़लीफ़ा की मृत्यु के बाद दमिश्क में आंतरिक अशांति के कारण अरवों के अधीन क्षेत्रों में नियुक्त राज्यपाल और सरदार धीरे-धीरे स्वतंत्र होते गए।

➣ यद्दपि सन 725 ई. में अरबों जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया था।

ख़लीफ़ा हिशाम (724-743 ई.) के समय जुनैद की नियुक्ति सिंध के गवर्नर के रूप में हुई। कालांतर में सिंध के अलावा उसने अन्य भारतीय राज्यों में अभियान करना चाहा किन्तु नागभाट प्रथम ने उसे विफल कर दिया।

➣ जिस समय अरबी आधुनिक भारत में साम्राज्य विस्तार करने में तत्पर थे ऐसे समय में दो राजपूती शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक गुर्जर-प्रतिहार एंव दूसरा गोहलोत।

➣ प्रतिहार शासक नागभाट प्रथम ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली और बप्पा रायडे (गहलौत वंश के संस्थापक) ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया।

➣ नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पश्चिमी राजस्थान और मालवा से खदेड़ दिया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश से किया। दोनों राजपूती वंशो ने अरबी आक्रमणों को सिंध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ने दिया।

➣ 9वीं शताब्दी के अंत तक सिंध से ख़लीफ़ाओं का नियंत्रण पूर्णतः समाप्त हो गया। सिंध में केवल दो छोटी रियासतें-मंसूरा और मुल्तान ही अरवों के नियंत्रण में शेष रह गई।

➣ भोज के ग्वालियर प्रशस्ति में प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम को म्लेच्छों अथवा अरबों को परास्त करने का श्रेय दिया जाता है।

गुर्जर प्रतिहारों ने विदेशियों के आक्रमण के समय भारत के द्वारपाल की भूमिका निभाई थी। ह्वेनसांग ने गुर्जर राज्य को पश्चिमी भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य कहा है।

गोहलोत वंश से एक शाखा सिसोदिया वंश निकला जिसके संस्थापक हम्मीरदेव थे इसी शाखा से कालांतर में महाराणा सांगा एंव महाराणा प्रताप जैसे योद्धा हुए थे।

अरवों द्वारा सिंध आक्रमण के कारण

➣ लंका के तत्कालीन शासक ने उमय्यद ख़लीफ़ात के उत्तरी प्रांतों के गवर्नर हज्जाज बिन युसुफ को एक संदेश भिजवाया। इसमें उन मुस्लिम व्यापारियों की अनाथ पुत्रियों का उल्लेख था जो उसके राज्य में रहते हुए मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

➣ इन कन्याओं को जब जहाज़ से भेजा जा रहा था, तब सिंध के समुद्री तट के निकट समुद्री डाकुओं ने जहाज़ लूट लिया और उन्हें अपने कब्ज़े में ले लिया।

➣ एक अन्य विवरण यह भी मिलता है कि लंका के राजा ने स्वयं इस्लाम ग्रहण कर लिया था और वे ख़लीफ़ा को सैनिकों सहित बहुमूल्य उपहार भेज रहे थे। परंतु यह काफ़िला भी सिंध तट के समीप लुटेरों का शिकार हो गया।

➣ इसके अतिरिक्त, ख़लीफ़ा ने अपने दूतों को भारत से दासियाँ एवं व्यापारिक सामग्री क्रय करने हेतु भेजा था। जब ये दूत सिंध के प्रमुख बंदरगाह देवल (वर्तमान कराची के निकट स्थित) पहुँचे, तो वहाँ भी उन्हें समुद्री लुटेरों ने लूट लिया।

➣ इन घटनाओं के पश्चात् ख़लीफ़ा ने सिंध के राजा दाहिर से क्षतिपूर्ति की माँग की। दाहिर ने यह तर्क देते हुए माँग अस्वीकार कर दी कि वे समुद्री लुटेरे उनके अधीन नहीं हैं और उनका उन पर कोई नियंत्रण नहीं है।

➣ इस इनकार के बाद ख़लीफ़ा ने सिंध पर सैन्य आक्रमण का निर्णय लिया। हज्जाज ने पहले दो अभियान — उबैदुल्लाह और बुदैल के नेतृत्व में — भेजे, जो असफल रहे। अंततः 712 ई. में मुहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व में तीसरा और निर्णायक अभियान भेजा गया।

➣ वस्तुतः अरबों द्वारा सिंध विजय के पीछे इस्लाम के प्रसार की आकांक्षा और संपत्ति अर्जन की महत्त्वाकांक्षा – दोनों प्रमुख कारण थे। यह इसलिए भी स्पष्ट होता है क्योंकि भारत अभियान से पूर्व अरब अफ्रीका और यूरोप के विशाल भू-भागों को पहले ही अपने साम्राज्य में मिला चुके थे।

सिंघ विजय के प्रभाव

➣ सिंध विजय के प्रभाव के संबंध में लेनपूल ने कहा है कि “सिंध को अरबों ने विजित तो किया, किंतु यह विजय ऐतिहासिक और इस्लाम धर्म की घटना मात्र ही रही। यह एक प्रभावरहित विजय थी। ”

➣ अरबों ने अपने सिंध निवास के दौरान यह अनुभव किया कि भारतीय अद्भुत योग्यता रखते हैं। भारतीयों को प्रभावित करने के स्थान पर अरब निवासी खुद उनसे प्रभावित हुए।

➣ अरब विद्वानों ने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं से दर्शन, ज्योतिष, गणित, चिकित्सा, रसायन शास्त्र आदि की शिक्षा ग्रहण की और उसे आत्मसात् किया।

➣ माना जाता है कि आठवीं शताब्दी में खलीफा मसूर के अरब विद्वान अपने साथ ब्रह्मगुप्त द्वारा रचित ब्रह्मसिद्धात और हर्ष द्वारा रचित खंडनखंडखाद्य अरब ले गए, जहाँ भारतीय की सहायता से उनका अरबी भाषा में अनुवाद कराया गया।

पंचतन्त्र का अनुवाद अरबी भाषा में कलिलावादिम्ना नाम से हुआ जिनका उल्लेख अल्बरूनी ने किया है। पंचतंत्र का फारसी अनुवाद अनवार-ए-सुहैली नाम से किया गया।

ज्योतिष ज्ञान का अरबों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। खगोलशास्त्र भी अरबों ने रूचि ली।

शून्य और दाशमिक पद्धति का ज्ञान सीखकर अरबों ने इसे रोमन साम्राज्य में प्रसारित किया। वस्तुत: 9वीं सदी में गणितज्ञ अलवारिय ने इसे अरब में लोकप्रिय बनाया और 12वीं सदी में ईसाई मठवासी एबेलार्ड द्वारा यह ज्ञान यूरोप पहुँचा और इसे अरब अक पद्धति नाम से जाना गया।

➣ भारत-अरव व्यापारिक संबंधों में वृद्धि हुई और इसे तब और बढ़ाव मिला जब अब्बासी ख़लीफ़ा ने बगदाद की स्थापना की।

मुल्तानसिंध में अरबी लोग स्थाई रूप से रहने लगे और करमतिया नामक एक नए संप्रदाय का उदय हुआ।

अरबों को यह श्रेय दिया जाता है कि उसने चीन द्वारा आविष्कृत कागज, कंपास (कुतुबनुमा/दिक्सूचक). छपाई खाना, वारूद आदि के ज्ञान को यूरोप पहुंचाया।

➣ मंदिरों के मंडप के बुजं को उन्होंने मस्जिदों और मकवर्ग का बुई बनाकर भारत की कला का अनुसरण किया। मस्जिदों में प्रार्थना के गलीचे के नुकीले घुमाव और मेहराव हिंदुओं और बौद्धों के धर्मस्थलों के चिह्न थे।

➣ मस्जिदें, विष्णु मंदिर की भाँति थीं। मस्जिदों के प्रवेश द्वार मंदिरों के गोपुरम और भारतीय गाँवों के द्वारों से मिलते-जुलते थे। मस्जिदों की मीनारें भारत के विजयस्तंभों की नकल थीं।

➣ सिंध आक्रमण के समय जाटों एवं बौद्धों ने कासिम की सहायता की थी।

➣ मुहम्मद बिन कासिम ने अपनी बहुजातीय सेना में हिन्दुओं को भी नियुक्त किया।

➣ सिंध विजय में अरबों को मुल्तान से इतना सोना प्राप्त हुआ था कि उन्होंने इसे स्वर्ण नगरी कहा।

➣ सिन्धु क्षेत्रों में अरबों ने सर्वप्रथम दिरहम नामक सिक्का, खजूर की खेतीऊँट पालन प्रारम्भ किया था।

➣ अरबों ने सिन्धु नदी के तट पर महफूजा नामक नगर भी स्थापित किया।

➣ 731 ई. में अरबों ने सिन्धु नदी के तट पर मन्सूरा नगर स्थापित किया था।

हिन्दू शब्द का प्रथम बार प्रयोग अरबों ने किया था।

➣ प्रथम बार सिन्धुवासियों से जजिया कर (एक गैर-धार्मिक कर) 712 ई. में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा लगाया गया था।

भारत में जजिया कर

➣ भारत में पहली बार जजिया कर 712 ई. के युद्ध के पश्चात मुहम्मद बिन कासिम ने लगाया था यह क्षेत्र देवल (सिंध प्रान्त) था।

फ़िरोज़ तुग़लक़ के शासनकाल में पहली बार ब्राह्मणों से भी जज़िया कर वसूला गया।

➣ कश्मीर में जजिया कर सर्वप्रथम जजिया कर सिकंदर शाह द्वारा लगाया गया। जबकि उसके पुत्र जैनुल आबदीन (1420-70 ईo) ने इसे समाप्त कर दिया इसीलिए इसे कश्मीर का अकबर कहा गया है।

गुजरात में जजिया कर सर्वप्रथम अहमदशाह (1411-42ई.) के समय लगाया गया।

➣ दिल्ली का पहला शासक अकबर था जिसने सन 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया था लेकिन 1575 ई. में पुन: लगा दिया था। इसके बाद 1579-80 ई. में पुनः समाप्त कर दिया।

जफर खाँ/अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (1347 -1358 ई.) पहला मुस्लिम शासक था जिसने जजिया माफ कर दिया। यह बहमनी वंश का संस्थापक था।

➣ मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने जजिया कर पुन 1679 में लगाया दिया।

➣ 1712ई.में मुग़ल बादशाह जहांदार शाह ने जुल्फिकार खां एंव असद खां के कहने पर जजिया को विधिवत रूप से समाप्त कर दिया।

➣ मुग़ल बादशाह फरुख्शियर ने 1713 ई. में जजिया कर हटा दिया था किन्तु पुन: 1717 ई. में लगा दिया।

➣ अन्तत: मुग़ल मयूर सिहांसन (तख़्त-ए-ताऊत) पर बैठने वाला अंतिम मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह/रौशनअख्तर/ रंगीला (1719-48 ई.) ने जजिया कर को सदा के लिए समाप्त कर दिया था।

➣ भारत में हुए इस मुस्लिम आक्रमण का उद्देश्य अरब राज्य का विस्तारइस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करना था।

➣ सिंध पर नियंत्रण पा लेने के बाद अरबों ने विस्तार की जोरदार नीति आरम्भ की और खलीफा हाशिम (724-43 ई.) के अधीन उसका राज्यपाल जुनैद ने पश्चिमी भारत के बहुत से क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। जिसे प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने पराजित किया।

➣ प्रतिहार राजा अरबों के सबसे बड़े शत्रु बने। फलस्वरूप अरबों को राष्ट्रकूट वंश, मान्यखेत से से संधि करनी पड़ी।

➣ अरबों की सिंध विजय के बारे में अलीअहमद द्वारा लिखित पुस्तक चचनामा से पता चलता है।

मुल्तान विजय अरबी मुसलमानो का अंतिम आक्रमण था। इसके बाद तुर्की मुसलमानों का आक्रमण हुआ। जिसने भारत साम्राज्य में इस्लाम धर्म की नींव रखी।

➣ अरब के लोग भारतीय कला और ज्ञान से भी बहुत प्रभावित हुए। अब्बासी खलीफाओं के काल में हिन्दू विद्वानों को बगदाद में बुलाकर चिकित्सा, दर्शन और ज्योतिष विद्या की संस्कृत भाषा की पुस्तकों का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया गया।

भारत में कुरान का सर्वप्रथम अनुवाद सिंधि भाषा में हुआ।

चचनामा

चचनामा (जिसे फतहनामा-ए-सिन्ध या तारीख-ए-हिन्द व सिंध भी कहा जाता है) अरबों द्वारा सिंध की विजय का प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ है। इसका मूल नाम फतहनामा था और यह मूल रूप से अरबी भाषा में लिखा गया था।

➣ इसकी रचना मुहम्मद बिन कासिम के किसी अज्ञात सैनिक या समकालीन व्यक्ति द्वारा की गई मानी जाती है। कुछ विद्वानों के अनुसार अली इब्न हमीद से इसका संबंध जोड़ा जाता है। यह 8वीं शताब्दी (712 ई.) की घटनाओं का वर्णन करता है।

मुहम्मद अली बिन अबू बक्र कुफी (या अली बिन हमीद कुफी) ने नासिरुद्दीन कुबाचा (Nasiruddin Qabacha) के शासनकाल में (लगभग 1216–1226 ई. / 613 हिजरी) चचनामा का फारसी भाषा में अनुवाद किया।

➣ कुफी ने दावा किया कि उन्होंने अलोर (आरोर) के काजी इस्माइल बिन अली के पास से अरबी मूल पांडुलिपि प्राप्त की थी। यह अनुवाद उच (Uch, सिंध) में लिखा गया था।

ग्रंथ दो मुख्य भागों में विभाजित है-

  1. चाच वंश का इतिहासब्राह्मण राजा चाच (Chach) का उदय, राय वंश का अंत, चाच का सिंध पर शासन तथा उनके पुत्र दाहिर (Dahir) का राज।
  2. अरब विजयउमय्यद खलीफा अल-वलिद के आदेश पर मुहम्मद बिन कासिम द्वारा 712 ई. में सिंध पर आक्रमण, देवल (Debal) की विजय, दाहिर से युद्ध तथा सिंध में इस्लामी शासन की स्थापना।

➣ इसमें युद्धों, रणनीतियों, स्थानीय राजाओं से संबंध और शासन नीतियों का विस्तृत वर्णन है।

➣ यह सिंध (और व्यापक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप) में इस्लाम के आगमन का सबसे प्राचीन और विस्तृत वर्णन माना जाता है।

➣ बाद के कई मुस्लिम इतिहासकारों (जैसे फिरिश्ता, मासूम शाह आदि) ने इससे जानकारी प्राप्त की।

1900 ई. में मिर्ज़ा कलिच बेग ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया, जिससे यह ग्रंथ आधुनिक इतिहासकारों तक पहुँचा।

तारीखे सिन्ध

➣ इसे तारीखे मासूमी भी कहा जाता है। यह सिंध का एक प्रमुख और विस्तृत इतिहास ग्रंथ है।

➣ इसकी रचना 1600 ई. के आसपास भक्कर ( सिंध) के मीर मुहम्मद मासूम ने की। वे मुगल सम्राट अकबर के विश्वसनीय सेनापति और प्रशासक थे।

➣ ग्रंथ अरब विजय (712 ई.) तथा मुहम्मद बिन कासिम से प्रारम्भ होकर मुगल सम्राट अकबर के काल तक (लगभग 1590–1600 ई.) सिंध के पूर्ण इतिहास को कवर करता है।

➣ इसमें चाचनामा जैसे प्राचीन स्रोतों का उपयोग करते हुए सिंध के विभिन्न शासक वंशों – राय वंश, ब्राह्मण वंश, उमय्यद, अब्बासी, समा, सुमरा, अरग़ून, तर्काण तथा मुगल काल – का वर्णन किया गया है।

मासूम ने स्वयं मुगल सेना का नेतृत्व किया था (जैसे सिबी पर विजय) और बाद में सिंध के गवर्नर भी नियुक्त हुए। इसलिए ग्रंथ के अंतिम भाग में समकालीन घटनाओं तथा प्रशासनिक विवरणों का अधिक प्रामाणिक वर्णन मिलता है।

➣ यह मुगल काल का पहला प्रमुख फारसी इतिहास ग्रंथ है जो विशेष रूप से सिंध पर केंद्रित है।

सिंध के इतिहास को समझने के लिए इसे चाचनामा के बाद का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

➣ इसमें राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक घटनाओं के साथ-साथ स्थानीय रीति-रिवाजों तथा शासकों के चरित्र का भी उल्लेख मिलता है।

1938 ई. में भांडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे से इसका प्रकाशन हुआ।

मीर मुहम्मद मासूम केवल इतिहासकार ही नहीं थे, बल्कि कवि (उपनाम “नामी”), चिकित्सक तथा मुगल साम्राज्य के उच्च अधिकारी भी थे।

➣ उन्होंने अकबर की सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बलूचिस्तान के सिबी क्षेत्र पर विजय प्राप्त की।

➣ उनकी मीनार (Minaret of Masum Shah) आज भी सुक्कुर, सिंध में एक प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक के रूप में विद्यमान है।

भारत पर विदेशी आक्रमण

➣ भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने का प्रयास 550 ई.पू. में ईरानी सम्राट साइरस (हखामनी साम्राज्य) द्वारा किया गया था

➣ हालांकि 516 ई पू में सबसे पहले सफलता दारा प्रथम/डेरियस ने प्राप्त की जिसके फलस्वरूप गांधार (पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान) फारसी साम्राज्य में मिल गया।

➣ डेरियस प्रथम के बहिस्तान अभिलेख 519 ई. पू. में गंधार के लोगों को उसकी प्रजा बताया गया है। ज्ञातव्य हो यह समय सिकंदर तथा चन्द्रगुप्त मौर्य से भी पहला का था।

ईरानी सम्राट साइरस (हखामनी साम्राज्य) 550 ई.पू. में एक असफल आक्रमण
दारा प्रथम/डेरियस (हखामनी साम्राज्य) 516 ई पू भारत पर एक सफल आक्रमण साबित हुआ।
सिकन्दर (मकदूनिया/मैसीडोनिया राज्य) 326 ई.पू. में बैक्ट्यिा (अफगानिस्तान) को जीतने के बाद काबुल होता हुआ हिन्दुकुश पर्वत को पार किया।
डेमेट्रियस (हिंद-यवन) 190 ई.पू.में उत्तर-पश्चिमी भारत के विशाल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। जो क्षेत्र सिकंदर के जीते क्षेत्र से भी विशाल था।
नहपान (शक) 90 ई.पू. में भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों में, गौतमी पुत्र सतकर्णी व अन्य शासकों द्वारा खदेड़े गए।
माउस (पार्थियाई या पहलव) 1 सदी ई.पू.का अन्त उत्तर-पश्चिमी भारत के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
कडफिसेस प्रथम (कुषाण या यूची) 15 ई. उत्तर-अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर हिन्दू कुश पर्वत को पार कर गांधार
तोरमाण (हूण जाति)गुप्त शासक स्कंदगुप्त (455-467 ई.) के शासनकाल में, 485 ई. तक हूणों ने पूर्वी मालवा और मध्य भारत के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया, मालवा के यशोधर्मन द्वारा खदेड़े गए।
मुहम्मद बिन कासिम अल हज्जाज(इराक) का दामाद और एक कुशल सेनानायक, 712ई. में भारत पर आक्रमण, भारत में जजिया कर लगाने वाला प्रथम मुस्लिम शासक ।
सुबुक्तगीन अलप्तगीन का ग़ुलाम व दामाद, 986 ई. में भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम तुर्क शासक।
महमूद गजनी सुल्तान की उपाधि धारण करने वाला प्रथम तुर्क शासक , सुबुक्तगीन का पुत्र, 1001 ई. में भारत पर पहला आक्रमण।
मुहम्मद गौरी 1175 ई. भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक।
तैमूर लंग(तैमूरी राजवंश) मेसोपोटामिया, फ़ारस और अफ़ग़ानिस्तान को विजित कर 1398ई. में भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली तक बढ़ आया।
बाबर (तैमूर तथा चंग़ेज़ ख़ाँ का वंश) 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के अंतिम वंश (लोदी वंश) के सुल्तान इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना हो गई थी।
नादिरशाह( फारस का शासक) 1739 ई. में करनाल का युद्ध मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह से जिसमे बादशाह परास्त हुआ,जिसके नादिरशाह लगभग डेढ़ महीने तक दिल्ली में रहा और लूटमार करता रहा। वापस जाते समय वह कोहिनूर हीरे के साथ शाहजहां द्वारा बनवाया गया तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन ) भी ले गया। (कोहुनुर हीरे को आगे चलाकर नादिरशाह के उत्तराधिकारी ने महाराजा रणजीत सिंह को भेंट कर दिया था)
अहमद शाह अब्दाली (अफगान का शासक एंव नाद्रिशाह का सेनापति) मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह के समय , 1761 ई. में पानीपत का तृतीय युद्ध मराठा एंव अहमद शाह अब्दाली के मध्य हुआ जिसमे मराठों की हार हुई, मराठों का नेतृत्व सदाशिव राव (मारा गया) ने किया था। अब्दाली वापस चला गया
यूरोपीय कंपनियों का आगमन पुर्तगीज- डच-अंग्रेज- डेन-फ्रांसीसी

ज्ञातव्य हो चंगेज खां (तिमूचिन) ने भारत पर आक्रमण नहीं किया था। यद्यपि वह दुश्मन का पीछा करते हुए भारत की सीमा पर आया जरुरु था। परन्तु सिन्धु नदी से वापस लौट गया। इस समय दिल्ली पर इल्तुतमिश का शासन था।

➣ भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मुहम्मद गौरी जबकि तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश (कुतुबुद्दीन का ग़ुलाम) था।

➣ भारत में प्रथम अफगान शासक बहलोल लोदी तथा मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर था।

➣ 15-16सदी के मध्य भारत में कई यूरोपियों (पुर्तगाली , स्वीडिश , फ्रांसीसी , अंग्रेज , डच ) का आगमन हुआ। परन्तु यह कोई आक्रमण नहीं था। इनका उद्देश्य व्यापार करना था।

➣ कालान्तर में भारत की अशान्तिजनक व अव्यवस्थित स्थिति के चलते अंग्रेज अंतिम विदेशी शक्ति बनकर उभरे जिसने आगे चलकर भारत में 1947 ई. तक शासन किया।

जिम्मी

जिम्मी का दर्जा इस्लामी शासन व्यवस्था में गैर-मुस्लिमों (जैसे हिंदू, बौद्ध, ईसाई आदि) को दिया जाने वाला विशेष संरक्षण का दर्जा था।

➣ जिसके अंतर्गत राज्य उनकी जान-माल की सुरक्षा और अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता था, लेकिन इसके बदले उन्हें जजिया नामक विशेष कर देना अनिवार्य होता था।

मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के हिंदुओं और बौद्धों को जिम्मी का दर्जा देकर उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक बनाया, जिसमें उन्हें मंदिरों में पूजा करने की अनुमति मिली। मुल्तान के सूर्य मंदिर की रक्षा का उदाहरण प्रसिद्ध है।

➣ लेकिन उन्हें अन्य नागरिकों के समान पूर्ण अधिकार नहीं दिए गए, जैसे उच्च पदों पर नियुक्ति, हथियार रखने या घोड़े पर सवार होने पर प्रतिबंध लगाए जा सकते थे।

➣ यह व्यवस्था धार्मिक सहिष्णुता की नीति पर आधारित थी, जिससे स्थानीय लोगों का विरोध कम हुआ और इस्लामी शासन को स्थिरता मिली, हालांकि यह दर्जा उन्हें मुसलमानों से कमतर ही माना जाता था।

सम्बंधित तथ्य

  • मुहम्मद बिन कासिम ने 712 ई. में सिंध के किस राजा को पराजित किया जिसमें वे वीरगति को प्राप्त हुए – राजा दाहिर
  • जब ह्वेनसांग भारत की यात्रा कर रहा था (629–645 ई.), तब सिंध पर किस जाति के बौद्ध राजा का शासन था – शूद्र जाति का
  • इस वंश के अंतिम शासक की मृत्यु के बाद उसके किस ब्राह्मण प्रधानमंत्री ने विधवा रानी से विवाह कर लिया और स्वयं गद्दी पर बैठ गया – चाच ने
  • अरब आक्रमणों के समय सिंध पर किसके द्वारा स्थापित किए गए राजवंश का शासन था – ब्राह्मण चाच
  • सन् 715 ई. में किसने मुहम्मद बिन कासिम की हत्या करवा दी – खलीफा सुलेमान
  • मुहम्मद बिन कासिम की अगुवाई में अरब सेना द्वारा सिंध पर विजय प्राप्त करने के बाद सिंध उमय्यद खलीफा का कौन-सा प्रांत बन गया – पूर्वी प्रांत
  • सिंध और मुल्तान के प्रांत खलीफा के साम्राज्य के अंतर्गत रहे। अरबों ने दो स्वतंत्र राज्य क्रमशः सिंधु नदी के तट पर और मुल्तान में स्थापित किए – अरोर और मनसूराह

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