मौर्य साम्राज्य MCQ प्रश्न | UPSC

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत मौर्य साम्राज्य MCQ प्रश्न
1.चाणक्य अपने बचपन में किस नाम से जाने जाते थे?
(a) अजय
(b) चाणक्य
(c) विष्णुगुप्त
(d) देवगुप्त
U.P.P.C.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
चाणक्य का बचपन का नाम विष्णुगुप्त था। उनके पिता ऋषि चणक थे, जिनके नाम पर इन्हें ‘चाणक्य’ कहा गया। अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ के रचनाकार के रूप में इन्हें ‘कौटिल्य’ भी कहा जाता है, जो संभवतः इनके गोत्र से संबंधित नाम है। इस प्रकार इनके तीन नाम प्रचलित हैं — विष्णुगुप्त (जन्म नाम), चाणक्य (पितृ-नाम) और कौटिल्य (गोत्र नाम)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी और वहीं वे अध्यापक भी रहे। उनका ‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ 15 अधिकरणों और 180 प्रकरणों में विभाजित है, जो राजनीति, अर्थव्यवस्था, सैन्य रणनीति और कूटनीति का विस्तृत विवेचन करता है।
2.सैंड्रोकोट्स से चंद्रगुप्त मौर्य की पहचान किसने की?
(a) विलियम जॉस
(b) वी. स्मिथ
(c) आर.के. मुखर्जी
(d) डी.आर. भंडारकर
48th to 52s B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(a)
सर विलियम जोन्स (William Jones) वह पहले विद्वान थे जिन्होंने यूनानी स्रोतों में उल्लिखित ‘सैंड्रोकोट्स’ की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से की। यह पहचान भारतीय इतिहास की कालगणना (Chronology) की नींव बनी, जिसे ‘भारतीय इतिहास की आधारशिला’ कहा जाता है। एरियन और प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त को ‘एंड्रोकोट्स’ लिखा है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस पहचान के आधार पर ही भारत के प्राचीन इतिहास को यूनानी इतिहास से जोड़कर एक निश्चित तिथि-क्रम स्थापित किया जा सका। चंद्रगुप्त मौर्य और सिकंदर की भेंट लगभग 326 ई.पू. में हुई मानी जाती है, जब सिकंदर पंजाब में था।
3.प्रथम भारतीय साम्राज्य स्थापित किया गया था-
(a) कनिष्क द्वारा
(b) हर्ष द्वारा
(c) चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा
(d) समुद्रगुप्त द्वारा
U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
उत्तर-(c)
चंद्रगुप्त मौर्य ने 321 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, जो भारत का पहला विशाल केंद्रीकृत साम्राज्य था। उन्होंने चाणक्य की सहायता से नंद वंश को उखाड़ फेंका और पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया। उनका साम्राज्य पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक फैला था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त मौर्य ने जीवन के अंतिम वर्षों में जैन धर्म स्वीकार किया और श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में जाकर संलेखना (उपवास द्वारा देह त्याग) की विधि से अपना जीवन समाप्त किया। उनके साम्राज्य का विस्तार लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर था।
4.चाणक्य का अन्य नाम था-
(a) भट्टस्वामी
(b) विष्णुगुप्त
(c) राजशेखर
(d) विशाखदत्त
I.A.S. (Pre) 1993
उत्तर-(b)
चाणक्य इतिहास में तीन नामों से विख्यात हैं — चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त। ‘विष्णुगुप्त’ उनका वास्तविक व्यक्तिगत नाम था। ‘कौटिल्य’ उनके गोत्र से निकला नाम माना जाता है, जबकि ‘चाणक्य’ उनके पिता चणक के नाम पर पड़ा। अर्थशास्त्र में ग्रंथकार ने स्वयं को ‘कौटिल्य’ और ‘विष्णुगुप्त’ दोनों नामों से संबोधित किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ की पांडुलिपि को 1905 में मैसूर के पुस्तकालयाध्यक्ष आर. शामाशास्त्री ने खोजा और 1909 में इसका प्रकाशन किया। इससे पहले यह ग्रंथ लगभग एक हजार वर्षों से लुप्त माना जाता था।
5.निम्न में से किसने ‘सैंड्रोकोट्स’ (चंद्रगुप्त मौर्य) और सिकंदर महान की भेंट का उल्लेख किया है?
(a) प्लिनी
(b) जस्टिन
(c) स्ट्रैबो
(d) मेगस्थनीज
U.P. Lower Sub. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
रोमन इतिहासकार जस्टिन ने अपने ग्रंथ में ‘सेंद्राकोट्स’ (चंद्रगुप्त मौर्य) और सिकंदर महान की भेंट का उल्लेख किया है। जस्टिन के अनुसार, उस समय युवा चंद्रगुप्त ने सिकंदर को साम्राज्य विस्तार हेतु नंद राज्य पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास भी किया था। एरियन और प्लूटार्क ने भी चंद्रगुप्त का उल्लेख किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में पाटलिपुत्र आया था। उसने ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ की रचना की जो मौर्यकालीन भारत की शासन-व्यवस्था, समाज और भूगोल की महत्वपूर्ण जानकारी देता है, यद्यपि यह ग्रंथ अब केवल अंशों में उपलब्ध है।
6.भारत में पहले साम्राज्य की स्थापना किस शासक के द्वारा की गई थी ?
(a) चंद्रगुप्त मौर्य
(b) अशोक
(c) कनिष्क
(d) चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
(e) उपर्युक्त में से कोई नहीं / उपर्युक्त में से एक से अधिक
66th B.P.S.C. Re-Exam 2020
उत्तर-(a)
चंद्रगुप्त मौर्य ने 321 ई.पू. में भारत के पहले विशाल एकीकृत साम्राज्य की स्थापना की। इससे पूर्व भारत में अनेक छोटे-छोटे जनपद और महाजनपद थे, परंतु किसी एक केंद्रीय सत्ता के अधीन समस्त भारत को लाने का कार्य सर्वप्रथम चंद्रगुप्त मौर्य ने किया। उन्होंने सेल्यूकस को पराजित कर काबुल, हेरात, कंधार और बलूचिस्तान भी साम्राज्य में मिलाए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच 305 ई.पू. में संधि हुई, जिसके तहत सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चंद्रगुप्त से किया और बदले में चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए।
7.जिसके ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य का विशिष्ट रूप से वर्णन हुआ है.
(a) भास
(b) शूद्रक
(c) विशाखदत्त
(d) अश्वघोष
46th B.P.S.C. (Pre) 2003
उत्तर-(c)
विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षस’ चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में सर्वाधिक विस्तृत साहित्यिक जानकारी देता है। इस ग्रंथ में चंद्रगुप्त को ‘वृषल’ (कुलहीन) भी कहा गया है और नंद राजा के पुत्र के रूप में चित्रित किया गया है। नाटक मुख्यतः चाणक्य की कूटनीति और राक्षस (नंद वंश के मंत्री) को अपने पक्ष में करने की कहानी पर आधारित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विशाखदत्त का एक अन्य प्रसिद्ध नाटक ‘देवीचंद्रगुप्त’ है जो चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) पर आधारित है। ‘मुद्राराक्षस’ में ‘मुद्रा’ का अर्थ है — राक्षस (मंत्री) की मुहर (अंगूठी), जो नाटक के कथानक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
8.निम्नलिखित में कौन-सा सबसे पुराना राजवंश है ?
(a) गुप्त
(b) मौर्य
(c) वर्धन
(d) कुषाण
Uttarakhand Lower Sub. (Pre) 2010
उत्तर-(b)
दिए गए चारों विकल्पों में मौर्य वंश (लगभग 321–184 ई.पू.) सबसे प्राचीन है। इसके बाद कुषाण वंश (लगभग प्रथम-तृतीय शताब्दी ई.), फिर गुप्त वंश (लगभग 275–550 ई.) और अंत में वर्धन वंश (लगभग 606–647 ई.) का शासन रहा। मौर्य वंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी और यह वंश अशोक के काल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था, जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में की और शुंग वंश की नींव रखी। मौर्य साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारियों का आना और साम्राज्य का विखंडन माना जाता है।
9.यूनानी लेखक जस्टिन द्वारा किसे ‘सैंड्रोकोट्स’ कहा गया था?
(a) चंद्रगुप्त मौर्य
(b) चंद्रगुप्त प्रथम
(c) चंद्रगुप्त द्वितीय
(d) समुद्रगुप्त
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2016
उत्तर-(a)
यूनानी-रोमन स्रोतों में चंद्रगुप्त मौर्य को विभिन्न नामों से पुकारा गया है — जस्टिन ने ‘सेंद्राकोट्स’, एरियन तथा प्लूटार्क ने ‘एंड्रोकोट्स’ लिखा है। इन सभी नामों की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से की जाती है। जस्टिन के अनुसार, चंद्रगुप्त साधारण कुल में उत्पन्न हुए थे परंतु अपनी प्रतिभा और पराक्रम से सम्राट बने।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘सैंड्रोकोट्स’ की पहचान भारतीय इतिहास का एक निर्णायक ‘Anchor Point’ है। इसी के आधार पर भारत का प्राचीन इतिहास यूनानी कालगणना से जोड़ा गया। सिकंदर के भारत अभियान की तिथि (326 ई.पू.) और चंद्रगुप्त के राज्यारोहण (321 ई.पू.) के बीच यह संबंध स्थापित करके भारतीय इतिहास की संपूर्ण कालरेखा निश्चित की गई।
10. कौटिल्य प्रधानमंत्री थे-
(a) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के
(b) अशोक के
(c) चंद्रगुप्त मौर्य के
(d) राजा जनक के
U.P.P.C.S. (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2002
उत्तर-(c)
कौटिल्य (चाणक्य / विष्णुगुप्त) चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री, महामंत्री एवं प्रधान पुरोहित तीनों पदों पर एक साथ आसीन थे। उन्होंने ही नंद वंश के विरुद्ध चंद्रगुप्त की सहायता करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना संभव बनाई। उनका ‘अर्थशास्त्र’ राजनीति, कूटनीति और प्रशासन पर भारत में लिखा गया सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में ‘सप्तांग सिद्धांत’ का वर्णन है, जिसके अनुसार राज्य के सात अंग होते हैं — राजा, अमात्य (मंत्री), जनपद (भूमि), दुर्ग, कोश (खजाना), दण्ड (सेना) और मित्र। यह सिद्धांत भारतीय राजनीतिक चिंतन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
11. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में किस पहलू पर प्रकाश डाला गया है?
(a) आर्थिक जीवन
(b) राजनीतिक नीतियां
(c) धार्मिक जीवन
(d) सामाजिक जीवन
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ एक राजनीति शास्त्र का अनुपम ग्रंथ है। इसमें मुख्य रूप से राजनीतिक नीतियों, शासन के सिद्धांतों और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। यह ग्रंथ एक ऐतिहासिक दस्तावेज न होकर राजनीतिशास्त्र का मानक ग्रंथ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्थशास्त्र को 1904-05 में पंडित रुद्रपट्टणम शामाशास्त्री ने मैसूर के एक पुस्तकालय में पुनः खोजा था और 1909 में इसका प्रकाशन किया। इस ग्रंथ में 15 अधिकरण, 150 अध्याय और 6000 श्लोक हैं।
12. बुलंदीबाग प्राचीन स्थान था –
(a) कपिलवस्तु का
(b) पाटलिपुत्र का
(c) श्रावस्ती का
(d) वाराणसी
U.P.P.C.S. (Spl) (Mains) 2008
उत्तर-(b)
बुलंदीबाग पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) का एक प्राचीन स्थल है। यहाँ की गई खुदाई में मौर्यकालीन नगर परकोटे (नगर की रक्षा दीवार) के लकड़ी के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार पास के कुम्रहार स्थल से चंद्रगुप्त के राजप्रासाद के अवशेष मिले हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बुलंदीबाग से प्राप्त लकड़ी की दीवार को ‘पलिसेड वाल’ (Palisade Wall) कहा जाता है। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र की इस लकड़ी की दीवार का वर्णन अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में किया है — उन्होंने इस नगर की प्रशंसा करते हुए इसे तत्कालीन विश्व के सर्वश्रेष्ठ नगरों में गिना था।
13. निम्नांकित में से किसकी तुलना मैक्यावेली के ‘प्रिंस’ से की जा सकती है?
(a) कालिदास का मालविकाग्निमित्रम
(b) कौटिल्य का अर्थशास्त्र
(c) वात्स्यायन का कामसूत्र
(d) तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
उत्तर-(b)
कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ की तुलना इटली के राजनीतिक विचारक मैक्यावेली की प्रसिद्ध कृति ‘द प्रिंस’ (The Prince, 1532) से की जाती है। दोनों ही ग्रंथ राजनीतिक यथार्थवाद पर आधारित हैं और दोनों में राज्य की सुरक्षा और शासक की सत्ता को नैतिकता से ऊपर रखा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुछ इतिहासकार अर्थशास्त्र को मैक्यावेली के ‘द प्रिंस’ से भी अधिक व्यापक मानते हैं, क्योंकि इसमें कूटनीति के साथ-साथ कृषि, व्यापार, खनन और न्याय व्यवस्था पर भी विस्तार से चर्चा है। कौटिल्य का काल (लगभग 350-275 ईसा पूर्व) मैक्यावेली से करीब 1800 वर्ष पहले का है।
14. पाटलिपुत्र में स्थित चंद्रगुप्त का महल मुख्यतः बना था –
(a) ईंटों का
(b) पत्थर का
(c) लकड़ी का
(d) मिट्टी का
41st B.P.S.C. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार पाटलिपुत्र में स्थित चंद्रगुप्त मौर्य का राजप्रासाद मुख्यतः लकड़ी से निर्मित था। कुम्रहार स्थल पर डी.बी. स्पूनर के नेतृत्व में हुई खुदाई (1912-13) में इस लकड़ी के विशाल महल के अवशेष प्रकाश में आए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुम्रहार से प्राप्त 80 स्तंभों वाला विशाल सभागार (Audience Hall) पर्सेपोलिस के अचमेनिद स्थापत्य से प्रभावित माना जाता है। यूनानी दूत मेगस्थनीज ने इस महल की भव्यता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यह सूसा और एकबताना के फारसी महलों से भी अधिक शानदार था।
15. कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र किस विषय पर आधारित है?
(a) आर्थिक संबंध
(b) शासनकला के सिद्धांत और अभ्यास
(c) विदेश नीति
(d) धन संचय
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(b)
कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ शासनकला के सिद्धांतों और व्यवहार पर आधारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें सप्तांग सिद्धांत (राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र) और मंडल सिद्धांत (विदेश नीति) जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाएं प्रस्तुत की गई हैं। साथ ही प्रशासन, कृषि, व्यापार और शिल्प की विस्तृत जानकारी भी दी गई है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्थशास्त्र में जासूसी व्यवस्था (गुप्तचर तंत्र) का अत्यंत विस्तृत विवरण मिलता है — कौटिल्य ने महिला गुप्तचरों (विषकन्याओं) के उपयोग का भी उल्लेख किया है। इस ग्रंथ में ‘चतुरंग सेना’ (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल) के संगठन का भी वर्णन है।
16. कौटिल्य का अर्थशास्त्र है, एक
(a) चंद्रगुप्त मौर्य के संबंध में नाटक
(b) आत्मकथा
(c) चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास
(d) शासन के सिद्धांतों की पुस्तक
U.P. P.C.S. (Mains) 2012
उत्तर-(d)
कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ न तो कोई नाटक है, न आत्मकथा और न ही इतिहास — यह शासन के सिद्धांतों और राजनीति की एक सुव्यवस्थित पुस्तक है। इसमें राजा के कर्तव्यों, मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली, कर-व्यवस्था और युद्धनीति आदि का विस्तृत विवरण मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘अर्थशास्त्र’ संस्कृत में रचित है और इसे ‘नीतिशास्त्र’ की परंपरा का सर्वोच्च ग्रंथ माना जाता है। इसमें राजा के लिए दैनिक दिनचर्या (Time Management) का भी उल्लेख है — कौटिल्य के अनुसार राजा को दिन को 16 भागों में बांटकर राजकाज चलाना चाहिए।
17. निम्नलिखित में से राज्य के सप्तांग सिद्धांत के अनुसार, राज्य का सातवां अंग कौन-सा था?
(a) जनपद
(b) दुर्ग
(c) मित्र
(d) कोश
U.P.P.C.S. (Pre) (Re-Exam) 2015
उत्तर-(c)
कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत में राज्य के सात अंग हैं — राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड और मित्र (सुहृद)। इनमें ‘मित्र’ सातवाँ और अंतिम अंग है। कौटिल्य के अनुसार मित्र राजा के लिए कान के समान हैं जो शांति और युद्ध दोनों में सहायक होते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य ने मित्रों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया है — ‘सहज मित्र’ (वंश-परंपरा से प्राप्त) और ‘कृत्रिम मित्र’ (स्वार्थ से जुड़े)। इनमें सहज मित्र अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं। सप्तांग सिद्धांत के इन सात तत्वों को आधुनिक राजनीति विज्ञान में राज्य के आवश्यक तत्वों की पहली व्यवस्थित अवधारणा माना जाता है।
18. किसके शासनकाल में डीमेकस भारत आया था?
(a) चंद्रगुप्त मौर्य
(b) बिंदुसार
(c) अशोक
(d) कनिष्क
U.P. Lower Sub. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
डीमेकस (Deimachus) सीरिया के सेल्यूसिड राजा एंटियोकस प्रथम का राजदूत था जो मेगस्थनीज के बाद बिंदुसार की राजसभा में पाटलिपुत्र आया था। स्ट्रैबो ने अपने भूगोल ग्रंथ में इसका उल्लेख किया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बिंदुसार के दरबार में एक अन्य यूनानी राजदूत डायोनीसियस (Dionysius) भी आया था, जिसे मिस्र के राजा टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने भेजा था। बिंदुसार ने स्वयं सेल्यूकस के उत्तराधिकारी एंटियोकस से तीन वस्तुएं मंगाई थीं — मीठी शराब, अंजीर और एक दार्शनिक, जिस पर एंटियोकस ने मजाक करते हुए कहा कि दार्शनिक बेचे नहीं जाते।
19. बिंदुसार के शासनकाल में अशोक ने अवंति महाजनपद जीतकर मौर्य साम्राज्य में मिला लिया था। इसका उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
(a) बुद्ध घोष की समंत पासादिका
(b) कौटिल्य का अर्थशास्त्र
(c) पाणिनि की अष्टाध्यायी
(d) पतंजलि का महाभाष्य
M.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
बुद्धघोष द्वारा रचित ‘समंत पासादिका’ (Samantapāsādikā) एक बौद्ध पालि ग्रंथ है जिसमें उल्लेख है कि बिंदुसार के शासनकाल में अशोक उज्जयिनी (अवंति) का उपराजा (वायसराय) था और उसने अवंति को मौर्य साम्राज्य में मिलाया। ‘दिव्यावदान’ से भी इसकी पुष्टि होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अवंति महाजनपद को उज्जयिनी और माहिष्मती — दो भागों में बांटा जाता था। अशोक के उज्जयिनी में रहने के दौरान ही उसने विदिशा की एक व्यापारी पुत्री देवी (शाक्यकुमारी) से विवाह किया, जिससे उसके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ — ये दोनों बाद में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु श्रीलंका गए।
20. किस प्राचीन नगर के अवशेष कुम्रहार स्थल से प्राप्त हुए हैं?
(a) वैशाली
(b) पाटलिपुत्र
(c) कपिलवस्तु
(d) श्रावस्ती
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(b)
कुम्रहार पटना (बिहार) में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है जहाँ से प्राचीन पाटलिपुत्र के राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ D.B. स्पूनर (1912-13) और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनन किया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कुम्रहार से 80 पॉलिशदार बलुआ पत्थर के स्तंभों वाला एक विशाल सभा भवन मिला है जिसे ‘अशोक का सभा भवन’ या ‘मौर्यकालीन अष्टशाला’ कहते हैं। इन स्तंभों पर की गई ‘मौर्य पॉलिश’ अत्यंत चमकदार है — इस तकनीक का रहस्य आधुनिक विज्ञान अभी तक पूरी तरह सुलझा नहीं पाया है।
21. किसने सहिष्णुता, उदारता और करुणा के त्रिविध आधार पर राजधर्म की स्थापना की?
(a) अशोक
(b) अकबर
(c) रणजीत सिंह
(d) शिवाजी
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(a)
सम्राट अशोक ने ‘धम्म’ नामक एक विशेष नैतिक आचार संहिता का प्रतिपादन किया, जिसका मूल आधार सहिष्णुता, उदारता और करुणा था। यह किसी एक धर्म या संप्रदाय से बंधा हुआ नहीं था, बल्कि संपूर्ण मानवजाति के कल्याण के लिए था। अशोक ने इसे अपने शिलालेखों और स्तंभलेखों के माध्यम से साम्राज्य के कोने-कोने तक फैलाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के ‘धम्म’ का प्रचार केवल भारत तक सीमित नहीं था — उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भेजा था। इसके अलावा अशोक ने ‘धम्म महामात्र’ नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की थी, जिनका कार्य धम्म के सिद्धांतों को जनसाधारण तक पहुँचाना था।
22. सेल्यूकस, जिनको अलेक्जेंडर द्वारा सिंध एवं अफगानिस्तान का प्रशासक नियुक्त किया गया था, को किस भारतीय राजा ने हराया था?
(a) समुद्रगुप्त
(b) अशोक
(c) बिंदुसार
(d) चंद्रगुप्त
M.P.P.C.S. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने 305 ई.पू. में सेल्यूकस निकेटर की आक्रमणकारी सेना को निर्णायक रूप से परास्त किया था। सेल्यूकस सिकंदर के साम्राज्य के पूर्वी भाग का उत्तराधिकारी था। इस पराजय के बाद सेल्यूकस को संधि करनी पड़ी, जिसके अंतर्गत उसने अरिया, अराकोसिया, जेड्रोसिया और पेरोपेमिसाडे जैसे क्षेत्र चंद्रगुप्त को सौंप दिए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संधि के तहत सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से किया था तथा मेगस्थनीज को अपना राजदूत मौर्य दरबार में भेजा था। मेगस्थनीज ने ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ में मौर्यकालीन प्रशासन और समाज का विस्तृत वर्णन किया है, जो उस काल का एक महत्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है।
23. निम्न में से कौन-सा क्षेत्र अशोक के साम्राज्य में सम्मिलित नहीं था ?
(a) अफगानिस्तान
(b) बिहार
(c) श्रीलंका
(d) कलिंग
42nd B.P.S.C. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
श्रीलंका (तत्कालीन ताम्रपर्णी) अशोक के साम्राज्य का भाग नहीं था। अशोक के द्वितीय शिलालेख में चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त और ताम्रपर्णी को ‘प्रत्यंत राज्य’ अर्थात् सीमावर्ती स्वतंत्र राज्य कहा गया है। असम (प्राग्ज्योतिष) भी अशोक के साम्राज्य से बाहर था। शेष लगभग समस्त भारतीय उपमहाद्वीप उसके अधीन था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यद्यपि श्रीलंका अशोक के साम्राज्य में नहीं था, तथापि अशोक का श्रीलंका पर सांस्कृतिक प्रभाव गहरा था। उनके पुत्र महेंद्र ने वहाँ के राजा देवानांपिय तिस्स को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। साथ ही, अशोक के अभिलेख अफगानिस्तान (शाहबाजगढ़ी और मान्सेहरा) में भी पाए गए हैं, जो उनके साम्राज्य की पश्चिमी सीमा को प्रमाणित करते हैं।
24. चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को किस वर्ष में पराजित किया था ?
(a) 317 ई.पू.
(b) 315 ई.पू.
(c) 305 ई.पू.
(d) 300 ई.पू.
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2014
उत्तर-(c)
चंद्रगुप्त मौर्य ने 305 ई.पू. में सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया था। यह युद्ध उस समय हुआ जब सेल्यूकस ने सिकंदर के पूर्वी प्रदेशों को पुनः जीतने का प्रयास किया। चंद्रगुप्त की विजय इतनी निर्णायक थी कि सेल्यूकस को न केवल विशाल क्षेत्र देने पड़े, बल्कि संधि की शर्तों के रूप में वैवाहिक संबंध भी स्थापित करना पड़ा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस संधि में चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए थे, जिनका सेल्यूकस ने बाद में इप्सस के युद्ध (301 ई.पू.) में उपयोग किया। इन हाथियों ने उस युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई, जिसमें उसके प्रतिद्वंद्वी एंटिगोनस की पराजय हुई।
25. निम्नलिखित में से किस मौर्य राजा ने दक्कन की विजय प्राप्त की थी ?
(a) अशोक
(b) चंद्रगुप्त
(c) बिंदुसार
(d) कुणाल
46th B.P.S.C. (Pre) 2003
उत्तर-(b)
दक्षिण भारत की विजय का श्रेय मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य को दिया जाता है। जैन साहित्य और तमिल साक्ष्य दोनों इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। अशोक के कई अभिलेख दक्षिण भारत में पाए गए हैं, परंतु अशोक ने केवल कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) लड़ा था। बिंदुसार की विजयों के ऐतिहासिक प्रमाण अत्यंत अनिश्चित हैं, अतः दक्षिण विजय चंद्रगुप्त मौर्य की ही मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जैन परंपरा के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम दिनों में जैन धर्म अपना लिया था और अपने गुरु भद्रबाहु के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला चले गए थे, जहाँ उन्होंने सल्लेखना (उपवास द्वारा मृत्यु) व्रत ग्रहण किया। यह स्थान आज भी जैन तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है।
26. मालवा, गुजरात एवं महाराष्ट्र किस शासक ने पहली बार जीता ?
(a) हर्ष
(b) स्कंदगुप्त
(c) विक्रमादित्य
(d) चंद्रगुप्त मौर्य
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(d)
चंद्रगुप्त मौर्य पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने मालवा, गुजरात और महाराष्ट्र को अपने साम्राज्य में शामिल किया। उनके समय तक साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में हिंदुकुश से पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक और उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक था। रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख तथा जैन ग्रंथों से सौराष्ट्र और अवंति पर उनके अधिकार की पुष्टि होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना लगभग 321 ई.पू. में की थी। उनके गुरु और प्रधानमंत्री चाणक्य (कौटिल्य) ने ‘अर्थशास्त्र’ नामक ग्रंथ लिखा, जो प्रशासन, अर्थव्यवस्था और कूटनीति का अद्वितीय ग्रंथ है तथा आज भी राजनीतिशास्त्र में अत्यंत प्रासंगिक माना जाता है।
27. अभिलेख, जिससे यह प्रमाणित होता है कि चंद्रगुप्त का प्रभाव पश्चिम भारत पर था, है-
(a) कलिंग शिलालेख
(b) अशोक का गिरनार शिलालेख
(c) रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख
(d) अशोक का सोपारा शिलालेख
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(c)
लगभग 150 ई. में उत्कीर्ण रुद्रदामन के जूनागढ़ (गिरनार) शिलालेख में यह उल्लेख है कि आनर्त और सौराष्ट्र क्षेत्र में चंद्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल ‘पुष्यगुप्त वैश्य’ ने एक सिंचाई बाँध (सुदर्शन झील) का निर्माण करवाया था। इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान गुजरात का यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य का अंग था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यही जूनागढ़ शिलालेख यह भी बताता है कि अशोक के काल में उनके राज्यपाल तुषास्प ने उस सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी, और बाद में रुद्रदामन ने भी उसका पुनरुद्धार किया। इस प्रकार यह एक ही अभिलेख मौर्य और शक दोनों युगों की जानकारी देता है — भारतीय इतिहास का यह एक अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है।
28. गुजरात चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में सम्मिलित था, यह प्रमाणित
(a) ग्रीक विवरणों से
(b) रुद्रदामन के जूनागढ़ शिला अभिलेख से
(c) जैन परंपरा से
(d) अशोक के स्तंभलेख II से
U.P.U.D.A./L.D.A. (Mains) 2010
उत्तर-(b)
गुजरात के मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित होने का प्रमाण रुद्रदामन के जूनागढ़ शिला अभिलेख से मिलता है। इस अभिलेख में स्पष्ट उल्लेख है कि चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने सौराष्ट्र प्रदेश में सुदर्शन झील का निर्माण कराया था, जो यह सिद्ध करता है कि यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के अधीन था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जूनागढ़ शिलालेख शक महाक्षत्रप रुद्रदामन प्रथम द्वारा संस्कृत भाषा में लिखवाया गया था और यह प्रशस्ति साहित्य के आरंभिक उदाहरणों में से एक है। यह अभिलेख इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह एकमात्र ऐसा अभिलेख है जो मौर्य, शुंग और शक — तीनों कालखंडों की जानकारी एक साथ देता है।
29. उस मानचित्र में — जो किसी एक शासक के साम्राज्य की सबसे बड़ी सीमा दर्शाता है — निम्नलिखित में से क्या प्रदर्शित होगा?
(a) कनिष्क से उसकी मृत्यु के समय
(b) समुद्रगुप्त से, उसके दक्षिण भारत अभियान के उपरांत
(c) अशोक से, उसके शासनकाल के अंतिम समय
(d) हर्ष के राज्यारोहण के अवसर पर थानेश्वर के साम्राज्य से
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(c)
अशोक के शासनकाल के अंतिम समय में उनका साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वाधिक विस्तृत था। असम और सुदूर दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर संपूर्ण भारतवर्ष उनके साम्राज्य के अंतर्गत था। उनके शिलालेखों और स्तंभलेखों की व्यापक भौगोलिक उपस्थिति उनके साम्राज्य की विशालता की सटीक जानकारी देती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के अभिलेख भारत के अतिरिक्त अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी पाए गए हैं — शाहबाजगढ़ी, मान्सेहरा, कंधार आदि प्रमुख स्थल हैं। कंधार से अशोक का एक द्विभाषीय (ग्रीक-अरामाइक) अभिलेख मिला है, जो उनके साम्राज्य की बहुभाषीय और बहुसांस्कृतिक प्रकृति को दर्शाता है।
30. अशोक के निम्नलिखित अभिलेखों में से किसमें दक्षिण भारतीय राज्यों का उल्लेख हुआ है?
(a) तृतीय मुख्य शिलालेख
(b) द्वितीय मुख्य शिलालेख
(c) नवां मुख्य शिलालेख
(d) प्रथम स्तंभ अभिलेख
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(b)
अशोक के द्वितीय मुख्य शिलालेख में दक्षिण भारतीय राज्यों — चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त और ताम्रपर्णी (श्रीलंका) — का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस अभिलेख में इन्हें ‘प्रत्यंत राज्य’ कहा गया है, अर्थात् ये मौर्य साम्राज्य की सीमा पर स्थित स्वतंत्र राज्य थे। इस अभिलेख में यह भी उल्लेख है कि अशोक ने इन क्षेत्रों में मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराईं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के चौदह मुख्य शिलालेखों में से द्वितीय और तेरहवाँ शिलालेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं — द्वितीय में सामाजिक कल्याण कार्यों और पड़ोसी राज्यों का वर्णन है, जबकि तेरहवें शिलालेख में कलिंग युद्ध की विभीषिका और उससे उत्पन्न अशोक के हृदय-परिवर्तन का मार्मिक वर्णन मिलता है।
31. सांची का स्तूप किस राज्य में स्थित है?
(a) अमरावती
(b) भरहुत
(c) सांची
(d) सारनाथ
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
उत्तर-(c)
स्थापत्य कला की दृष्टि से सांची के महास्तूप को सर्वश्रेष्ठ स्तूप माना जाता है। यह मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में एक पहाड़ी पर स्थित है। इसका प्रारंभिक निर्माण सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। बाद के काल में शुंग और सातवाहन शासकों ने इसका विस्तार किया। भरहुत का स्तूप म.प्र. के सतना जिले में है, जबकि अमरावती का स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के दाहिने तट पर स्थित है। सारनाथ का धमेख स्तूप गुप्तकाल में निर्मित है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांची के स्तूप को यूनेस्को ने 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। सांची के स्तूप के चार तोरण द्वार (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) हैं, जिन पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं — ये मौर्योत्तर कालीन शिल्प कला का अद्भुत उदाहरण हैं।
32. भारत का प्रथम अस्पताल एवं औषधि-बाग निर्माण करवाया था-
(a) अशोक ने
(b) चंद्रगुप्त मौर्य ने
(c) भगवान महावीर ने
(d) धन्वंतरि ने
U.P. Lower Sub. (Mains) 2015
उत्तर-(a)
सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए औषधालय (अस्पताल) एवं औषधि-बागों का निर्माण करवाया — यह भारत का प्रथम ज्ञात चिकित्सा-संस्थान माना जाता है। अशोक ने पशु-पक्षियों के वध पर प्रतिबंध लगाया, छायादार वृक्ष लगवाए, धर्मशालाएं और कुएं भी बनवाए। वह युद्ध विजेता से अधिक ‘धम्म विजेता’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के द्वितीय शिलालेख में स्पष्ट उल्लेख है कि उसने मनुष्यों तथा पशुओं की चिकित्सा के लिए सड़कों के किनारे औषधियाँ उगवाईं और कुएं खुदवाए। इसके अतिरिक्त, अशोक ने श्रीलंका में भी अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रसार करवाया, जो उसके लोककल्याणकारी स्वभाव को दर्शाता है।
33. रज्जुक थे-
(a) चोल राज्य में व्यापारी
(b) मौर्य शासन में अधिकारी
(c) गुप्त साम्राज्य में सामंत वर्ग
(d) शक सेना में अधिकारी
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
अशोक के अभिलेखों में ‘रज्जुक’ नामक प्रशासनिक पदाधिकारी का उल्लेख मिलता है। ये मौर्य प्रशासन में जिला स्तर के अधिकारी थे जिन्हें राजस्व एवं न्याय दोनों क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त थे — आधुनिक जिलाधिकारी के समकक्ष। अपने चतुर्थ स्तंभ लेख में अशोक ने रज्जुकों की तुलना उस विश्वसनीय धात्री से की है जिसे माता-पिता अपने बच्चे की देखभाल के लिए नियुक्त करते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य प्रशासन में रज्जुक के ऊपर ‘प्रादेशिक’ (मंडल स्तर के प्रमुख) और उनके नीचे ‘युक्त’ (ग्राम-स्तरीय राजस्व अधिकारी) होते थे। अशोक ने प्रशासनिक दौरे के लिए ‘महामात्र’ नामक विशेष अधिकारी भी नियुक्त किए थे, जो धम्म के प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण करते थे।
34. “अशोक ने बौद्ध होते हुए भी हिंदू धर्म में आस्था नहीं छोड़ी” इसका प्रमाण है-
(a) तीर्थयात्रा
(b) मोक्ष में विश्वास
(c) ‘देवनामप्रिय’ की उपाधि
(d) पशु चिकित्सालय खोले
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1999
उत्तर-(c)
अशोक के सभी अभिलेखों में उसे ‘देवानामपिय’ (देवताओं का प्रिय) तथा ‘पियदसि’ (देखने में प्रिय/सुंदर) कहा गया है। ‘देवानामपिय’ की उपाधि हिंदू परंपरा से जुड़ी है और यह इस बात का संकेत देती है कि अशोक बौद्ध होते हुए भी हिंदू धर्म की कुछ परंपराओं और विश्वासों से पूरी तरह अलग नहीं हुआ। अशोक का राज्याभिषेक लगभग 269 ई.पू. में हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक ने कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के भयंकर रक्तपात के बाद बौद्ध धर्म अपनाया था। उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु को उसका धर्म-गुरु माना जाता है। उल्लेखनीय है कि अशोक ने बौद्ध धर्म को राज्यधर्म घोषित नहीं किया; उसकी ‘धम्म’ नीति सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता पर आधारित थी।
35. सार्थवाह किसे कहते थे?
(a) दलालों को
(b) व्यापारियों के काफिले को
(c) महाजनों को
(d) तीर्थयात्रियों को
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
उत्तर-(b)
मौर्यकाल में व्यापारियों के संगठित काफिले (कारवां) को ‘सार्थवाह’ कहा जाता था। इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी मिलता है। ये व्यापारी समूह लंबी दूरी के व्यापार के लिए एक साथ यात्रा करते थे, जिससे सुरक्षा और संसाधनों की साझेदारी होती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में व्यापार को सुगम बनाने के लिए ‘अध्यक्ष’ नामक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी थी। उस काल में ‘पण’ मुख्य मुद्रा थी और व्यापार में तौल एवं माप की एकरूपता बनाए रखने के लिए विशेष अधिकारी होते थे।
36. निम्नलिखित में से किस स्रोत में अशोक के राज्यकाल में तृतीय बौद्ध समिति होने का उल्लेख मिलता है ?
1.अशोक के अभिलेख
2.दीपवंश
3.महावंश
4.दिव्यावदान
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए-
(a) 1, 2
(b) 2, 3
(c) 3,4
(d) 1,4
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
सिंहली ग्रंथों दीपवंश और महावंश के अनुसार अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तृतीय महासंगीति का आयोजन हुआ था। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ‘मोग्गलिपुत्त तिस्स’ ने की। अशोक के स्वयं के अभिलेखों में इस संगीति का उल्लेख नहीं मिलता।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह में महाकश्यप की अध्यक्षता में (483 ई.पू.), द्वितीय वैशाली में सब्बकामी की अध्यक्षता में (383 ई.पू.) और चतुर्थ संगीति कश्मीर के कुंडलवन में कनिष्क के शासनकाल में वसुमित्र की अध्यक्षता में हुई। तृतीय संगीति में थेरवाद मत को अधिकृत रूप से मान्यता दी गई और अभिधम्मपिटक का संकलन पूर्ण हुआ।
37. अशोक के शासनकाल में बौद्ध सभा किस नगर में आयोजित की गई थी?
(a) मगध
(b) पाटलिपुत्र
(c) समस्तीपुर
(d) राजगृह
45th B.P.S.C. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
अशोक के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) में आयोजित हुई थी। पाटलिपुत्र मौर्य साम्राज्य की राजधानी थी और उस काल का सबसे प्रमुख नगर था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में पाटलिपुत्र को उस युग का सबसे भव्य नगर बताया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पाटलिपुत्र की स्थापना मूलतः उदयिन (अजातशत्रु के पुत्र) ने लगभग 490 ई.पू. में की थी। मौर्यकाल में इसे लकड़ी की विशाल प्राचीर से घेरा गया था जिसमें 570 मीनारें और 64 द्वार थे — यह विवरण मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ से प्राप्त होता है।
38. निम्नलिखित मौर्य शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे-
1.चंद्रगुप्त
अशोक
3.बिंदुसार
4.दशरथ
सही उत्तर चुनिए-
(a) 1 एवं 2
(b) 2 एवं 3
(c) 3 एवं 4
(d) 2 एवं 4
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(d)
मौर्य वंश में अशोक और उसका पौत्र दशरथ बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। दशरथ ने भी अशोक की भांति ‘देवानांपिय’ की उपाधि धारण की। चंद्रगुप्त मौर्य ने वृद्धावस्था में जैन धर्म स्वीकार किया था और बिंदुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दशरथ मौर्य ने गया के निकट नागार्जुनी पहाड़ियों में आजीवक भिक्षुओं को गुफाएं दान में दी थीं। उल्लेखनीय है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम दिनों में जैन संत भद्रबाहु के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में जाकर सल्लेखना (उपवास द्वारा मृत्यु वरण) ग्रहण की थी।
39. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकारी मौर्य प्रशासन का भाग नहीं था?
(a) अग्रहारिक
(b) युक्त
(c) प्रादेशिक
(d) राजुक
R.A.S./R.T.S. (Pre) (Re-Exam) 2013
उत्तर-(a)
अशोक के तृतीय शिलालेख में मौर्य प्रशासन के तीन प्रमुख पदाधिकारियों का उल्लेख मिलता है — युक्त (जिला स्तर पर राजस्व वसूली), राजुक (राजस्व एवं न्याय अधिकारी), और प्रादेशिक (मंडल प्रमुख, संभागीय आयुक्त के समकक्ष)। ‘अग्रहारिक’ मौर्य प्रशासन का अंग नहीं था; यह पद मौर्य-प्रशासन में प्रमाणित नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य प्रशासन में ‘महामात्र’ धम्म के प्रचार के लिए विशेष रूप से नियुक्त अधिकारी थे, जिनका उल्लेख अशोक के पाँचवें शिलालेख में मिलता है। इसके अलावा ‘अंतमहामात्र’ सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए नियुक्त होते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 18 प्रकार के ‘अध्यक्षों’ (विभागीय प्रमुखों) का उल्लेख है जो विभिन्न विभागों का प्रबंधन करते थे।
40. सारनाथ स्तंभ का निर्माण किया था-
(a) हर्षवर्धन ने
(b) अशोक ने
(c) गौतम बुद्ध ने
(d) कनिष्क ने
U.P. Lower Sub. (Spl.) Pre 2008
उत्तर-(b)
सारनाथ स्तंभ का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। इस स्तंभ के शीर्ष पर चार सिंहों की आकृति है जो शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और अभय का प्रतीक है। भारत सरकार ने 26 जनवरी 1950 को इस सिंह-शीर्ष को अपने राजकीय चिह्न के रूप में अपनाया। मौर्यकाल के सभी स्तंभ चुनार (उत्तर प्रदेश) के बलुआ पत्थर से बने हैं और इनकी पॉलिश आज भी चमकदार है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सारनाथ वह पवित्र स्थान है जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश (धम्मचक्कपवत्तन) दिया था — इसे ‘प्रथम धर्मोपदेश’ या ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहते हैं। अशोक के स्तंभों पर जो लिपि उत्कीर्ण है वह मुख्यतः ब्राह्मी है; इन्हें 19वीं सदी में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ने में सफलता प्राप्त की।
41. अशोक के शिलालेखों को सर्वप्रथम किसने पढ़ा था?
(a) बूहलर
(b) रॉबर्ट सेबेल
(c) जेम्स प्रिंसेप
(d) कॉड्रिगटन
I.A.S. (Pre) 1993
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(c)
ब्रिटिश पुरालेखशास्त्री जेम्स प्रिंसेप ने सन् 1837 में अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम पढ़ने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियों की वर्णमाला का सफलतापूर्वक उद्वाचन किया, जो भारतीय इतिहास की पुनर्रचना में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रिंसेप को प्रारंभ में अभिलेखों में उल्लिखित ‘देवानांपिय पियदसि’ नाम के राजा की पहचान नहीं हो पाई थी; बाद में श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ महावंश की सहायता से यह स्पष्ट हुआ कि यह अशोक ही थे। जेम्स प्रिंसेप उस समय कलकत्ता टकसाल (Calcutta Mint) में कार्यरत थे और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के सचिव भी रहे।
42. सांची का स्तूप किस शासक ने बनवाया था?
(a) बिंबिसार
(b) अशोक
(c) हर्षवर्धन
(d) पुष्यमित्र
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(b)
सांची के स्तूपों का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विदिशा नगर के समीप एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ कुल तीन प्रमुख स्तूप हैं — स्तूप संख्या 1 (महास्तूप) सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण है, जिसका व्यास लगभग 36.6 मीटर और ऊँचाई लगभग 16.4 मीटर है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शुंग काल (185–73 ईसा पूर्व) में पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में इस ईंट निर्मित स्तूप को पत्थर से आच्छादित करके विस्तारित किया गया। सांची के स्तूप को UNESCO ने 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। अशोक की पत्नी देवी, जो विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं, का संबंध भी इसी क्षेत्र से था।
43. ब्राह्मी लिपि का प्रथम उवाचन किस पर उत्कीर्ण अक्षरों से किया गया ?
(a) पत्थर की पट्टियों पर
(b) मुहरों पर
(c) स्तंभों पर
(d) सिक्कों पर
U.P.P.C.S. (Mains) 2008
उत्तर-(a)
ब्राह्मी लिपि का प्रथम उवाचन (decipherment) जेम्स प्रिंसेप द्वारा पत्थर की पट्टियों अर्थात् शिलालेखों पर उत्कीर्ण अक्षरों के आधार पर किया गया था। ब्राह्मी लिपि बाईं से दाईं ओर लिखी जाती है और इसे भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों जैसे देवनागरी, बंगाली, गुजराती आदि की जननी माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ब्राह्मी लिपि के सबसे प्राचीन साक्ष्य अशोककालीन अभिलेखों से प्राप्त होते हैं, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। उल्लेखनीय है कि ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है — कुछ इसे सेमेटिक लिपि से व्युत्पन्न मानते हैं, जबकि अन्य इसे स्वदेशी उद्भव की लिपि मानते हैं।
44. सांची का स्तूप किसने बनवाया था?
(a) चंद्रगुप्त
(b) कौटिल्य
(c) गौतम बुद्ध
(d) अशोक
M.P.P.C.S. (Pre) 2006
M.P.P.C.S. (Pre) 1995
M.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(d)
सांची का स्तूप सम्राट अशोक ने बनवाया था। बौद्ध धर्म अपनाने के पश्चात् अशोक ने देशभर में 84,000 स्तूपों के निर्माण का श्रेय बौद्ध परंपरा में लिया जाता है, जिनमें से सांची का महास्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सांची के चार तोरण द्वार (उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम) विशेष रूप से सातवाहन काल में निर्मित हुए और इन पर बुद्ध के जीवन तथा जातक कथाओं के दृश्य उत्कीर्ण हैं। तोरण द्वारों पर बुद्ध को प्रतीकात्मक रूप से (पदचिह्न, छत्र, धर्मचक्र आदि के रूप में) दर्शाया गया है, मानवीय रूप में नहीं — यह प्रारंभिक बौद्ध कला की विशेषता है।
45. निम्नांकित में से कौन-सा अशोक कालीन अभिलेख ‘खरोष्ठी’ लिपि में है?
(a) कालसी
(b) गिरनार
(c) शाहबाजगढ़ी
(d) मेरठ
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(c)
अशोक के अभिलेखों में से शाहबाजगढ़ी (पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में) और मानसेहरा (पाकिस्तान) के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं। खरोष्ठी लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है और इसका प्रचलन मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत एवं मध्य एशिया में था। शेष सभी अभिलेख सामान्यतः ब्राह्मी लिपि में हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि खरोष्ठी लिपि का उद्वाचन सर्वप्रथम नॉरिस (Norris) ने किया था, न कि जेम्स प्रिंसेप ने — हालाँकि प्रिंसेप ने भी इसमें योगदान दिया। तक्षशिला से आरमेइक (Aramaic) लिपि में लिखा गया अशोक का एक भग्न अभिलेख भी प्राप्त हुआ है, जो उसकी बहुभाषीय प्रशासनिक नीति का प्रमाण है।
46. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही
सूची-I (स्थान) सूची-II (स्मारक / भग्नावशेष)
A. कौशाम्बी – 1. धमेख स्तूप
B. कुशीनगर – 2. घोषिताराम मठ
C. सारनाथ – 3. रानाभर स्तूप
D. श्रावस्ती – 4. सहेत-महेत
कूट :
A B C D
(a) 2 1 3 4
(b) 4 3 2 1
(c) 2 3 1 4
(d) 4 2 1 3 उत्तर चुनिए –
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(c)
दिए गए स्थानों और उनसे संबद्ध स्मारकों का सही सुमेलन इस प्रकार है — कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश) में घोषिताराम मठ स्थित है, जो बुद्ध के एक प्रमुख दानी अनुयायी घोषित श्रेष्ठी द्वारा निर्मित था; कुशीनगर में रानाभर स्तूप है, जो बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल पर उनका अंतिम संस्कार किए जाने की स्मृति में बनाया गया था; सारनाथ में धमेख स्तूप है, जो उस स्थान को इंगित करता है जहाँ बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था; और श्रावस्ती को सहेत-महेत पुरातात्त्विक स्थल से पहचाना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सारनाथ का धमेख स्तूप गुप्तकाल (5वीं शताब्दी ईस्वी) में पुनर्निर्मित हुआ और इसकी ऊँचाई लगभग 28.35 मीटर है। सहेत-महेत में ‘सहेत’ जेतवन विहार को और ‘महेत’ प्राचीन श्रावस्ती नगर को इंगित करता है।
47. विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सांची का प्राचीन नाम यह भी था-
(a) काकणाम
(b) वेत्रवती
(c) बेसनगरी
(d) दशपुर
M.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
सांची का प्राचीन नाम ‘काकणाम’ (काकनाड) था, जो चौथी शताब्दी के गुप्तकालीन अभिलेखों में ‘काकणाम महाविहार’ के रूप में उल्लिखित है। महावंश ग्रंथ में इसे ‘चेतियगिरि’ (स्तूपों का पर्वत) कहा गया है, क्योंकि यहाँ पर्वत की चोटी पर अनेक स्तूपों का निर्माण हुआ था। सांची के निकट विदिशा (प्राचीन नाम — वेत्रवती) स्थित है जो मौर्यकाल में एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अतिरिक्त तथ्य के रूप में यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि सांची को 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर ने पुनः खोजा था, और इसके बाद पुरातत्त्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ विस्तृत उत्खनन कार्य किया।
48. अशोक के शिलालेखों (Inscriptions) में प्रयुक्त भाषा है-
(a) संस्कृत
(b) प्राकृत
(c) पाली
(d) हिंदी
44th B.P.S.C. (Pre) 2000
उत्तर-(b)
अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं। प्राकृत उस काल की जनसामान्य की भाषा थी, जिसे अशोक ने इसलिए अपनाया ताकि उनके धम्म संदेश जनता तक सुगमता से पहुँच सकें। उनके अभिलेखों को कई वर्गों में बाँटा जा सकता है — 14 प्रमुख शिलालेख, लघु शिलालेख, स्तम्भलेख और गुहालेख। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (शाहबाजगढ़ी और मानसेहरा) में खरोष्ठी लिपि का उपयोग हुआ, जबकि अफगानिस्तान के कंदहार में यूनानी (Greek) और आरमेइक भाषाओं में द्विभाषीय अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अशोक के अभिलेखों में वे स्वयं को ‘देवानांपिय’ (देवताओं के प्रिय) और ‘पियदसि’ (प्रिय दर्शन वाले) कहते हैं — किसी भी अभिलेख में ‘अशोक’ नाम मात्र कुछ ही स्थानों पर मिलता है।
49. पत्थर पर प्राचीनतम शिलालेख किस भाषा में थे?
(a) पालि
(b) संस्कृत
(d) ब्राह्मी
(c) प्राकृत
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
उत्तर-(c)
पत्थर पर उत्कीर्ण प्राचीनतम शिलालेख प्राकृत भाषा में हैं, जो अशोक के अभिलेखों के रूप में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। प्राकृत भाषा, संस्कृत की ही एक लोकप्रिय और सरलीकृत शाखा थी जो जनसामान्य द्वारा बोली जाती थी। ब्राह्मी यहाँ भाषा नहीं बल्कि लिपि है — अतः विकल्प (d) गलत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भारत में संस्कृत भाषा में प्रथम अभिलेख गुप्तकाल से प्राप्त होते हैं, जो लगभग चौथी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के हैं। इस प्रकार प्राकृत शिलालेख, संस्कृत शिलालेखों से कई शताब्दी पुराने हैं।
50. तीर्थयात्रा के समय सम्राट अशोक निम्नलिखित स्थानों पर गए। उन्होंने किस मार्ग का अनुगमन किया?
नीचे दिए गए कूट से सही
1. गया 2. कपिलवस्तु
3. कुशीनगर 4. लुम्बिनी
5. सारनाथ 6. श्रावस्ती कूट : उत्तर चुनिए-
(a) 1, 2, 3, 4, 5 तथा 6
(c) 4, 5, 6, 3, 2 तथा 1
(b) 1, 3, 4, 2, 5 तथा 6
(d) 4, 2, 1, 5, 3 तथा 6
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(d)
इतिहासकार विंसेट आर्थर स्मिथ के अनुसार अशोक ने बौद्ध गुरु उपगुप्त के साथ बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थलों की धम्म यात्रा इस क्रम में की — लुम्बिनी (जन्मस्थान), कपिलवस्तु (बाल्यकाल), बोधगया/गया (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ (प्रथम उपदेश), कुशीनगर (महापरिनिर्वाण) और श्रावस्ती (दीर्घकालीन प्रवास)। यह क्रम जीवन-यात्रा के कालक्रम से मेल खाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के आठवें शिलालेख में स्वयं उन्होंने उल्लेख किया है कि राज्याभिषेक के दसवें वर्ष वे संबोधि (बोधगया) गए। रुम्मिनदेई अभिलेख (नेपाल में स्थित लुम्बिनी का प्रमाण) के अनुसार राज्याभिषेक के 20वें वर्ष अशोक लुम्बिनी पहुँचे और वहाँ के ग्रामवासियों को कर में छूट प्रदान की — यह किसी भारतीय शासक द्वारा कर-राहत का प्राचीनतम अभिलेखीय उदाहरण है।
51. प्राचीन भारत में निम्नलिखित में से कौन-सी एक लिपि दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी ?
(a) ब्राह्मी
(b) नंदनागरी
(c) शारदा
(d) खरोष्ठी
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
खरोष्ठी लिपि प्राचीन भारत की एकमात्र प्रमुख लिपि थी जो दाएँ से बाएँ की दिशा में लिखी जाती थी — ठीक उसी प्रकार जैसे अरबी और फ़ारसी लिखी जाती हैं। यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत (वर्तमान पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान) में प्रचलित थी। इसे पढ़ने का श्रेय मैसन, जेम्स प्रिंसेप, नोरिस, लैसेन और कनिंघम जैसे विद्वानों को जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खरोष्ठी लिपि का उद्भव अरामाइक लिपि से हुआ माना जाता है जो ईरानी अचमेनिद साम्राज्य की राजकीय लिपि थी। यह लिपि कुषाण काल (लगभग पहली-तीसरी शताब्दी ई.) तक प्रयोग में रही, जिसके बाद यह धीरे-धीरे लुप्त हो गई।
52. अशोक का अपने शिलालेखों में सामान्यतः जिस नाम से उल्लेख हुआ है, वह है-
(a) चक्रवर्ती
(b) धर्मदेव
(c) धर्मकीर्ति
(d) प्रियदर्शी
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
अशोक के शिलालेखों में उन्हें “देवानांपिय” (देवताओं का प्रिय) और “देवानांपियदसि” (प्रियदर्शी) की उपाधियों से संबोधित किया गया है। स्वयं “अशोक” नाम केवल कुछ ही अभिलेखों जैसे मास्की, गुर्जरा, नेत्तुर और उडेगोलम में उल्लिखित है। पुराणों में उन्हें “अशोकवर्द्धन” कहा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: “मास्की अभिलेख” (कर्नाटक) की खोज 1915 में हुई और यह पहला अभिलेख था जिसमें “अशोक” नाम स्पष्ट रूप से मिला, जिससे इन अभिलेखों को निश्चित रूप से अशोक से जोड़ा जा सका। इससे पहले “देवानांपियदसि” की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद था।
53. मौर्य साम्राज्य के पेशावर के निकट उत्तर पश्चिम भाग में अशोक के शिलालेख थे-
(a) ब्राह्मी लिपि में
(b) आरमेइक लिपि में
(c) देवनागरी लिपि में
(d) खरोष्ठी लिपि में
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2021
उत्तर-(d)
मौर्य साम्राज्य के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, विशेषकर पेशावर के निकट, अशोक के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं। इस श्रेणी में “शाहबाजगढ़ी” (खैबर पख्तूनख्वा) और “मानसेहरा” (पाकिस्तान) के अभिलेख आते हैं। अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं — केवल ये दो ही खरोष्ठी लिपि में हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अफगानिस्तान में कंधार (शर-ए-कुना) से प्राप्त अशोक के अभिलेख यूनानी (Greek) और अरामाइक दोनों लिपियों में मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अशोक ने अपने साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय भाषा और लिपि के अनुसार अभिलेख उत्कीर्ण कराए।
54. ब्राह्मी लिपि को सर्वप्रथम किसने पढ़ा?
(a) ए. कनिंघम
(b) ए.एच. दानी
(c) व्यूलर
(d) जेम्स प्रिंसेप
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
ब्राह्मी लिपि को सर्वप्रथम सन् 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा। प्रिंसेप ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी और प्रतिभाशाली भाषाविद् थे। उन्होंने सिक्कों और शिलालेखों की तुलनात्मक विधि का उपयोग कर ब्राह्मी वर्णमाला को समझने में सफलता प्राप्त की। इसी सफलता के आधार पर वे अशोक के शिलालेखों को भी पढ़ने में सक्षम हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जेम्स प्रिंसेप ने एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की पत्रिका में अपनी खोज प्रकाशित की थी। ब्राह्मी विश्व की अधिकांश दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई लिपियों जैसे देवनागरी, बंगाली, तमिल, थाई, तिब्बती आदि की जननी लिपि मानी जाती है।
55. अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम पढ़ा था-
(a) जेम्स प्रिंसेप ने
(b) जॉर्ज व्यूलर ने
(c) विसेंट स्मिथ ने
(d) अहमद हसन दानी ने
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(a)
अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा। उन्होंने ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला को व्यवस्थित रूप से समझकर इन अभिलेखों का अर्थ उद्घाटित किया। उनकी इस खोज ने प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में एक नई क्रांति ला दी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: प्रिंसेप से पूर्व टी. फैनथेलर (1796) और कोल ब्रुक (1801) ने भी ब्राह्मी को पढ़ने के प्रयास किए थे किंतु पूर्ण सफलता नहीं मिली। प्रिंसेप की उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मौर्यकालीन इतिहास की प्रामाणिक जानकारी पहली बार संभव हुई।
56. निम्नलिखित में से प्राचीन भारत की कौन-सी लिपि दाहिने से बाईं ओर लिखी जाती थी ?
(a) ब्राह्मी
(b) शारदा
(c) खरोष्ठी
(d) नन्दनागरी
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(c)
खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। इसके विपरीत ब्राह्मी, शारदा और नंदनागरी आदि लिपियाँ बाएँ से दाएँ लिखी जाती थीं। खरोष्ठी मुख्यतः गांधार क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान) की लिपि थी और इसका प्रसार मध्य एशिया तक हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: खरोष्ठी लिपि में लिखे गए ग्रंथ मध्य एशिया (चीनी तुर्केस्तान) में भी पाए गए हैं, जो प्रारंभिक बौद्ध धर्म के प्रसार के साक्ष्य हैं। इस लिपि में लिखी गई प्राकृत-खरोष्ठी पांडुलिपियाँ विश्व की सबसे प्राचीन बौद्ध पांडुलिपियों में गिनी जाती हैं।
57. सम्राट अशोक के राजादेशों का सबसे पहले विकूटन (डिसाइफर) किसने किया था ?
(a) जॉर्ज व्यूलर
(b) जेम्स प्रिंसेप
(c) मैक्स मुलर
(d) विलियम जोन्स
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(b)
अशोक के राजादेशों को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने 1837 ई. में पढ़ा और उनका विकूटन (decipher) किया। उन्होंने ब्राह्मी वर्णमाला की कुंजी खोलकर इन शिलालेखों की भाषा को समझा जो प्राकृत थी। यह उपलब्धि भारतीय पुरालेख विद्या (Epigraphy) के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: जेम्स प्रिंसेप कोलकाता टकसाल (Calcutta Mint) के अधीक्षक थे। उनकी असामयिक मृत्यु मात्र 40 वर्ष की आयु में 1840 ई. में हुई। उनके सम्मान में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने “प्रिंसेप मेमोरियल” की स्थापना कोलकाता में की जो आज भी विद्यमान है।
58. अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला प्रथम अंग्रेज कौन था?
(a) जॉन टॉवर
(b) हैरी स्मिथ
(c) चार्ल्स मेटकॉफ
(d) जेम्स प्रिंसेप
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
जेम्स प्रिंसेप वह प्रथम अंग्रेज थे जिन्होंने अशोक के शिलालेखों को सफलतापूर्वक पढ़ा। उन्होंने 1837 ई. में यह ऐतिहासिक कार्य संपन्न किया। उनसे पहले कई विद्वानों ने प्रयास किए थे किंतु पूर्ण सफलता नहीं मिली। प्रिंसेप की इस उपलब्धि ने अशोक के इतिहास और मौर्य साम्राज्य की नीतियों को समझने का मार्ग प्रशस्त किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के शिलालेखों की खोज का श्रेय टी. फैनथेलर को है जिन्होंने 1750 ई. के लगभग दिल्ली-टोपरा स्तंभ का उल्लेख किया था। बाद में 1834 ई. में जॉर्ज टर्नर ने इन अभिलेखों के कुछ अक्षरों की पहचान की, किंतु संपूर्ण विकूटन प्रिंसेप ने ही किया।
59. वह स्थान, जहां प्राक् अशोक ब्राह्मी लिपि का पता चला है –
(a) नागार्जुनकोंडा
(b) अनुराधापुर
(c) ब्रह्मगिरि
(d) मास्की
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(b)
प्राक्-अशोक ब्राह्मी लिपि (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से भी पहले की) के साक्ष्य श्रीलंका के अनुराधापुर से प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त पिपरहवा (उत्तर प्रदेश), सोहगौरा (उत्तर प्रदेश) और महास्थान (बांग्लादेश) से भी प्राक्-अशोक काल के ब्राह्मी अभिलेखों के साक्ष्य मिले हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अनुराधापुर (श्रीलंका) में ब्राह्मी लिपि के ये प्रारंभिक साक्ष्य व्यापार चिह्नों (potter’s marks) के रूप में मिले हैं जो लगभग 600-500 ईसा पूर्व के बताए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मी लिपि अशोक से बहुत पहले ही अस्तित्व में आ गई थी।
60. अपने शिलालेखों में अशोक सामान्यतः किस नाम से जाने जाते है?
(a) चक्रवर्ती
(b) प्रियदर्शी
(c) धर्मदेव
(d) धर्मकीर्ति
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(b)
अशोक के शिलालेखों में उन्हें प्रायः “देवानांपियदसि” अर्थात् “प्रियदर्शी” के नाम से संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है “देवताओं का प्रिय, सुंदर दृष्टि वाला”। यह उपाधि अशोक की राजकीय पहचान थी। “अशोक” नाम स्वयं केवल कुछ विशेष अभिलेखों में ही मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: श्रीलंकाई ग्रंथ “महावंश” में भी अशोक को “पियदस्सी” (प्रियदर्शी) कहा गया है। यही कारण था कि 1837 में प्रिंसेप द्वारा अभिलेख पढ़े जाने के बाद भी लंबे समय तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि “देवानांपियदसि” वास्तव में अशोक ही हैं — यह स्पष्टता मास्की अभिलेख की खोज (1915) के बाद हुई।
61. कालसी प्रसिद्ध है-
(a) बौद्ध चैत्यों हेतु
(b) फारसी सिक्कों के कारण
(c) अशोक के शिलालेख के कारण
(d) गुप्तकालीन मंदिरों हेतु
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(c)
कालसी उत्तराखंड के देहरादून जिले में यमुना नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ अशोक का चौदहवाँ वृहत शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो पहाड़ी पत्थर पर उत्कीर्ण है। यह उत्तर भारत में प्राप्त अशोक के सबसे महत्वपूर्ण शिलालेखों में से एक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कालसी का यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखा गया है। इसमें अशोक की धम्म नीति, पशु हत्या निषेध और पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का उल्लेख है। यह शिलालेख 1860 ई. में ब्रिटिश अधिकारी फॉरेस्ट द्वारा खोजा गया था।
62. केवल वह स्तंभ, जिसमें अशोक ने स्वयं को मगध का सम्राट बताया है-
(a) मास्की का लघु स्तंभ
(b) रुम्मिनदेई स्तंभ
(c) क्वीन स्तंभ
(d) भाब्रू स्तंभ
39th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
भाब्रू (बैराट) स्तंभ लेख अशोक के अभिलेखों में विशेष स्थान रखता है। इसमें अशोक ने स्वयं को ‘मागध सम्राट’ (मगध का सम्राट) कहा है और बौद्ध संघ के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की है। यह एकमात्र अभिलेख है जो अशोक को प्रमाणित रूप से बौद्ध धर्मावलंबी सिद्ध करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भाब्रू अभिलेख राजस्थान के जयपुर के निकट बैराट में मिला था। इसमें अशोक ने बौद्ध धर्म के सात विशेष ग्रंथों की सूची दी है और भिक्षुओं व गृहस्थों को उन्हें पढ़ने की प्रेरणा दी है — यह बौद्ध साहित्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
63. अभिलेखों में किस शासक का उल्लेख ‘पियदस्सी’ एवं ‘देवानामप्रिय’ के रूप में किया गया है?
(a) चंद्रगुप्त मौर्य
(b) अशोक
(c) समुद्रगुप्त
(d) हर्षवर्धन
M.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
अशोक के अधिकांश अभिलेखों में उसे ‘देवानामप्रिय’ (देवताओं का प्रिय) और ‘पियदस्सी’ (प्रियदर्शी — जो सबका कल्याण देखता है) की उपाधियों से संबोधित किया गया है। व्यक्तिगत नाम ‘अशोक’ केवल मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर और उडेगोलम के लघु शिलालेखों में ही मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘देवानामप्रिय’ उपाधि केवल अशोक को नहीं, बल्कि श्रीलंकाई शासक तिस्स को भी दी गई थी। अशोक ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को भेजा था।
64. निम्नलिखित वक्तव्यों में कौन-सा एक वक्तव्य अशोक के प्रस्तर स्तंभों के बारे में गलत है?
(a) इन पर बढ़िया पॉलिश है।
(b) ये अखंड हैं।
(c) स्तंभों का शैफ्ट शुंडाकार है।
(d) ये स्थापत्य संरचना के भाग हैं।
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
अशोक के प्रस्तर स्तंभ किसी भवन या स्थापत्य संरचना का हिस्सा नहीं हैं — वे स्वतंत्र रूप से स्थापित पृथक रचनाएँ हैं। ये स्तंभ एकाश्म (अखंड पत्थर से निर्मित) हैं, इन पर मौर्यकालीन चमकदार पॉलिश है और इनका शैफ्ट ऊपर की ओर क्रमशः पतला होता जाता है (शुंडाकार)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ये स्तंभ मुख्यतः चुनार (उत्तर प्रदेश) के बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। इनकी औसत ऊँचाई लगभग 40-50 फुट और वजन 50 टन तक होता था। मौर्यकालीन पॉलिश की चमक आज भी अद्वितीय मानी जाती है और इसे पुनः प्राप्त करना आधुनिक तकनीक के लिए भी दुष्कर है।
65. निम्नलिखित में से किस उभारदार मूर्तिशिल्प (रिलीफ स्कल्प्चर) शिलालेख में अशोक के प्रस्तर रूप चित्र के साथ ‘राण्यो अशोक’ (राजा अशोक) उल्लिखित है?
(a) कंगनहल्ली
(b) सांची
(c) शाहबाजगढ़ी
(d) सोहगौरा
I.A.S. (Pre) 2019
उत्तर-(a)
कर्नाटक के कलबुर्गी (गुलबर्गा) जिले में भीमा नदी के तट पर स्थित कंगनहल्ली में एक प्राचीन बौद्ध स्तूप है। यहाँ पाषाण पर उत्कीर्ण अशोक के रूप चित्र के नीचे ‘राण्यो अशोक’ (राजा अशोक) अभिलेख अंकित है। यह अशोक का एकमात्र प्राप्त प्रस्तर रूप चित्र माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कंगनहल्ली स्थल की खुदाई 1994 से 2004 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की गई थी। यहाँ प्राप्त शिल्पकृतियाँ सातवाहन काल (लगभग पहली-दूसरी शताब्दी ईसवी) की हैं और इनमें बुद्ध के जीवन से संबंधित अनेक दृश्य चित्रित हैं।
66. निम्नलिखित में से किस एक अभिलेख में अशोक के व्यक्तिगत नाम का उल्लेख मिलता है?
(a) कालसी
(b) रुम्मिनदेई
(c) विशिष्ट कलिंग राजादेश
(d) मास्की
I.A.S. (Pre) 1997
उत्तर-(d)
अशोक के अधिकांश अभिलेखों में उसे केवल ‘देवानामप्रिय पियदस्सी’ कहा गया है। किंतु मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर और उडेगोलम के लघु शिलालेखों में ‘अशोक’ नाम स्पष्ट रूप से अंकित है। मास्की (कर्नाटक) के अभिलेख की खोज 1915 ई. में हुई थी, जिसने पहली बार ‘देवानामप्रिय’ को निश्चित रूप से अशोक से जोड़ा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इससे पहले विद्वान ‘देवानामप्रिय’ की पहचान को लेकर अनिश्चित थे। मास्की अभिलेख की खोज से पहले जेम्स प्रिंसेप ने 1837 ई. में ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता पाई थी, जो अशोक के अभिलेखों को समझने में मील का पत्थर साबित हुई।
67. निम्नलिखित अभिलेखों में से किस लेख में ‘अशोक’ नाम उल्लिखित है?
(a) भाब्रू अभिलेख
(b) तेरहवां शिलालेख
(c) रुम्मिनदेई स्तंभ लेख
(d) मास्की का लघु शिलालेख
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 2007
उत्तर-(d)
मास्की (कर्नाटक के रायचूर जिले में स्थित) का लघु शिलालेख उन चुनिंदा अभिलेखों में से एक है जिनमें ‘अशोक’ नाम सीधे उल्लिखित है। शेष अधिकांश अभिलेखों में केवल ‘देवानामप्रिय पियदस्सी’ उपाधि का प्रयोग हुआ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के व्यक्तिगत नाम का उल्लेख करने वाले चार स्थल हैं — मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर और उडेगोलम। इनमें से नेत्तूर और उडेगोलम भी कर्नाटक में ही स्थित हैं, जो दर्शाता है कि दक्षिण भारत में अशोक की पहचान स्पष्ट रूप से नाम सहित की जाती थी।
68. निम्नलिखित अभिलेखों में से किसमें अशोक का नामोल्लेख हुआ है?
(a) गुर्जरा में
(b) अहरौरा में
(c) ब्रह्मगिरि में
(d) सारनाथ में
U.P. P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
गुर्जरा (मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित) के लघु शिलालेख में अशोक का नाम स्पष्टतः अंकित है। यह उन चार अभिलेखों में से एक है जिनमें ‘अशोक’ नाम प्रत्यक्ष रूप से मिलता है — शेष हैं मास्की, नेत्तूर और उडेगोलम।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुर्जरा अभिलेख की खोज 1954 ई. में हुई थी। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में लिखा गया है और इसमें अशोक की धम्म प्रचार की नीति का उल्लेख है। दतिया जिले में इस अभिलेख की उपस्थिति यह भी सिद्ध करती है कि मध्य भारत तक मौर्य साम्राज्य का विस्तार था।
69. गुर्जरा लघु शिलालेख, जिसमें अशोक का नामोल्लेख किया गया है, कहां स्थित है?
(a) उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में
(b) मध्य प्रदेश के दतिया जिले में
(c) राजस्थान के जयपुर जिले में
(d) बिहार के चंपारन जिले में
U.P. Lower Sub. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
गुर्जरा लघु शिलालेख मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित है। इसमें अशोक का नाम प्रत्यक्ष रूप से उल्लिखित है, जो इसे ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्य साम्राज्य में दतिया क्षेत्र ‘दशार्ण’ जनपद का हिस्सा था। गुर्जरा का यह अभिलेख इस बात का प्रमाण है कि मध्य भारत के आंतरिक क्षेत्रों तक अशोक की धम्म नीति का प्रचार-प्रसार हुआ था। यह अभिलेख छोटे आकार का होने के बावजूद ऐतिहासिक महत्व में अग्रणी है।
70. अशोक का रुम्मिनदेई स्तंभ संबंधित है-
(a) बुद्ध के जन्म से
(b) बुद्ध के ज्ञान-प्राप्ति से
(c) बुद्ध के प्रथम उपदेश से
(d) बुद्ध के शरीर-त्याग से
U.P.P.C.S.(SpL) (Mains) 2008
उत्तर-(a)
रुम्मिनदेई (वर्तमान नेपाल में लुम्बिनी) का स्तंभ लेख बुद्ध की जन्मभूमि की यात्रा के उपलक्ष्य में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष स्थापित किया था। इस अभिलेख में उसने लुम्बिनी ग्राम का भू-राजस्व 1/8 भाग (पहले 1/6 था) कर दिया और बलि (धार्मिक कर) को पूर्णतः माफ कर दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लुम्बिनी में अशोक के स्तंभ के अलावा एक प्रसिद्ध मायादेवी मंदिर भी है, जहाँ बुद्ध की माता महामाया ने उन्हें जन्म दिया था। 1896 ई. में जर्मन पुरातत्वविद् डॉ. फ्यूहरर ने इस स्तंभ की खोज की थी, जिसने लुम्बिनी को बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में पुनः स्थापित किया।
71. अशोक के निम्न अभिलेखों में से पूर्णरूपेण धार्मिक सहिष्णुता के प्रति समर्पित कौन-सा अभिलेख है ?
(a) शिलालेख XIII
(b) शिलालेख XII
(c) स्तंभलेख VII
(d) भाब्रू लघु शिलालेख
U.P. Lower Sub. (Pre) 2008
उत्तर-(b)
अशोक का बारहवाँ दीर्घ शिलालेख (Rock Edict XII) विशेष रूप से धार्मिक सहिष्णुता को समर्पित है। इसमें अशोक ने सभी धार्मिक संप्रदायों के प्रति आदर और उनके सार की वृद्धि की कामना व्यक्त की है। उन्होंने “धम्म महामात्रों” (Dhamma Mahamatras) नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की थी जो विभिन्न संप्रदायों के बीच सौहार्द बनाए रखते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसी शिलालेख में अशोक ने कहा है कि दूसरे संप्रदायों की निंदा न करके उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए — यह विचार आधुनिक पंथनिरपेक्षता की आधारशिला माना जाता है।
72. निम्नलिखित में से किस शासक ने अपनी प्रजा को इस अभिलेख के माध्यम से परामर्श दिया? “कोई भी व्यक्ति जो अपने संप्रदाय को महिमा-मंडित करने की दृष्टि से अपने धार्मिक संप्रदाय की प्रशंसा करता है या अपने संप्रदाय के प्रति अत्यधिक भक्ति के कारण अन्य संप्रदायों की निंदा करता है, वह अपितु अपने संप्रदाय को गंभीर रूप से हानि पहुंचाता है।”
(a) अशोक
(b) समुद्रगुप्त
(c) हर्षवर्धन
(d) कृष्णदेव राय
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(a)
प्रस्तुत उद्धरण मौर्य सम्राट अशोक के बारहवें शिलालेख (Rock Edict XII) से लिया गया है, जो धार्मिक सहिष्णुता का संदेश देता है। अशोक ने स्पष्ट किया कि दूसरे संप्रदायों की निंदा करना अंततः अपने ही पंथ को कमज़ोर करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:उल्लेखनीय है कि अशोक के अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे, जो उस काल की जनसामान्य की भाषा थी — इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके संदेश सीधे आम जनता तक पहुँचाने के उद्देश्य से लिखे जाते थे। पश्चिमोत्तर भारत (आधुनिक पाकिस्तान-अफगानिस्तान क्षेत्र) में अशोक के अभिलेख खरोष्ठी और अरामाइक लिपि में भी मिले हैं।
73. उत्तराखंड में, सम्राट अशोक के शिलालेखों की एक प्रति कहां मिली थी?
(a) नैनीताल
(b) पौड़ी
(c) टिहरी
(d) कालसी
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(d)
उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित कालसी (Kalsi) नामक स्थान पर अशोक के चौदह दीर्घ शिलालेखों का एक पूर्ण सेट प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख यमुना नदी के किनारे एक विशाल शिला पर उत्कीर्ण है। यह स्थान मौर्य साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा का प्रतिनिधित्व करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कालसी के शिलालेख में यवन राजाओं (ग्रीक शासकों) का उल्लेख मिलता है, जो अशोक के अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संबंधों का प्रमाण है। इसकी खोज सर्वप्रथम 1860 में ब्रिटिश अधिकारी फॉरेस्ट ने की थी।
74. निम्नलिखित में से किस दक्षिणी राज्य का उल्लेख अशोक के अभिलेखों में नहीं है?
(a) चोल
(b) पाण्ड्य
(c) सतियपुत्त
(d) सातवाहन
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(d)
अशोक के दूसरे और तेरहवें शिलालेख में जिन दक्षिणी राज्यों का उल्लेख मिलता है, वे हैं — चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त और ताम्रपर्णी (श्रीलंका)। इनमें सातवाहन राज्य का कोई उल्लेख नहीं है क्योंकि सातवाहन वंश का उदय मौर्यों के पतन के बाद लगभग 230 ई.पू. के आसपास हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उल्लेखनीय है कि “सतियपुत्त” की पहचान आधुनिक कर्नाटक के “सत्यपुत्र” जनजाति या क्षेत्र से की जाती है, और यह अशोक के अभिलेखों में उल्लिखित सबसे कम चर्चित दक्षिणी राज्य है।
75. कलिंग युद्ध की विजय तथा क्षतियों का वर्णन अशोक के किस शिलालेख (Rock Edict) में है?
(a) शिलालेख I
(b) शिलालेख II
(c) शिलालेख XII
(d) शिलालेख XIII
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
अशोक के तेरहवें शिलालेख (Rock Edict XIII) में कलिंग युद्ध का विस्तृत विवरण मिलता है। यह युद्ध 261 ई.पू. में हुआ, जो अशोक के राज्याभिषेक के लगभग 8 वर्ष बाद था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इस शिलालेख में उल्लेख है कि युद्ध में लगभग 1 लाख लोग मारे गए, 1.5 लाख बंदी बनाए गए और उससे भी अधिक लोग अन्य कारणों से काल-कवलित हुए। इस भीषण नरसंहार से व्यथित होकर अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और “भेरीघोष” (युद्ध की नगाड़ेबाजी) की जगह “धम्मघोष” (धर्म का प्रचार) को अपनी नीति बनाया। यह शिलालेख प्राचीन भारत में युद्ध के परिणामस्वरूप किसी शासक के हृदय-परिवर्तन का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है।
76. कलिंग युद्ध का विवरण हमें ज्ञात होता है-
(a) 13वें शिलालेख द्वारा
(b) रुम्मिनदेई स्तंभ लेख द्वारा
(c) ह्वेनसांग के विवरण द्वारा
(d) प्रथम लघु शिलालेख द्वारा
U.P.P.C.S (Pre) 2016
उत्तर-(a)
कलिंग युद्ध का प्रामाणिक विवरण अशोक के तेरहवें (XIII) शिलालेख से प्राप्त होता है। रुम्मिनदेई स्तंभलेख में बुद्ध के जन्मस्थान लुंबिनी की यात्रा का उल्लेख है, ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी ई. का चीनी यात्री था जिसका कालिंग युद्ध से कोई संबंध नहीं, और प्रथम लघु शिलालेख में अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने का संदर्भ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कलिंग (वर्तमान ओडिशा) की विजय के बाद यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य में मिला लिया गया और तोशाली इसकी राजधानी बनाई गई, जहाँ एक कुमार (राजकुमार) को प्रशासक नियुक्त किया गया।
77. अशोक के जो प्रमुख शिलालेख (Rock Edicts) संगम राज्य के विषय में हमें बताते हैं, उनमें सम्मिलित हैं-
(a) I और X शिलालेख
(b) I और XI शिलालेख
(c) II और XIII शिलालेख
(d) II और XIV शिलालेख
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(c)
अशोक के द्वितीय (II) और त्रयोदश (XIII) शिलालेखों में संगम राज्यों — चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त तथा ताम्रपर्णी (श्रीलंका) — का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। दूसरे शिलालेख में इन राज्यों में पशु-चिकित्सा और मानव-चिकित्सा की व्यवस्था का वर्णन है, जो अशोक की प्रजा-कल्याण नीति को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ये संगम राज्य मौर्य साम्राज्य के अधीन नहीं थे, बल्कि अशोक के पड़ोसी मित्र-राज्य थे — यह दक्षिण भारत में मौर्य साम्राज्य की दक्षिणी सीमा निर्धारित करने में भी सहायक है।
78. अशोक का समकालीन तुरमय कहां का राजा था?
(a) मिस्र
(b) कोरिंथ
(c) मेसीडोनिया
(d) सीरिया
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
उत्तर-(a)
अशोक के तेरहवें शिलालेख में उल्लिखित “तुरमय” या “तुरमाय” की पहचान टालेमी II फिलाडेल्फस से की जाती है, जो मिस्र (Egypt) का शासक था और उसने 285-246 ई.पू. तक शासन किया। अशोक ने उसके पास धम्म-दूत भेजे थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसी शिलालेख में पाँच यवन राजाओं का उल्लेख है: अंतियोक (सीरिया), तुरमय (मिस्र), अंतकिनी (मकदूनिया), मग (साइरीन) और अलिक सुंदर (एपीरस)। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि टालेमी II फिलाडेल्फस अलेक्जेंड्रिया के प्रसिद्ध पुस्तकालय का महान संरक्षक था और उसके काल में ही ग्रीक-मिस्री संस्कृति का अद्भुत समन्वय हुआ था।
79. टालेमी फिलाडेल्फस, जिसके साथ अशोक के राजनय संबंध थे, कहां का शासक था?
(a) साइरोन
(b) मिस्र
(c) मकदूनिया
(d) सीरिया
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(b)
टालेमी II फिलाडेल्फस मिस्र का शासक था। अशोक के तेरहवें शिलालेख में उसे “तुरमय” नाम से संबोधित किया गया है। अशोक ने उसके दरबार में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु दूत भेजे थे। उल्लेखनीय है कि अशोक और टालेमी II दोनों लगभग एक ही काल में शासन कर रहे थे — यह प्राचीन भारत और भूमध्यसागरीय सभ्यता के बीच राजनयिक संपर्क का दुर्लभ प्रमाण है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य:इसके अतिरिक्त, अशोक के दूतों के मिस्र जाने का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि मौर्य साम्राज्य की राजनयिक पहुँच केवल एशिया तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह अफ्रीका महाद्वीप तक भी विस्तृत थी।
80. निम्नलिखित में से किस राजवंश के शासकों के सुदूर देशों जैसे सीरिया एवं मिस्र के साथ राजकीय संबंध थे?
(a) चोल
(b) गुप्त
(c) मौर्य
(d) पल्लव
U.P.P.S.C. (GIC) 2010
उत्तर-(c)
मौर्य वंश, विशेषतः सम्राट अशोक, के सीरिया, मिस्र, मकदूनिया, साइरीन और एपीरस जैसे सुदूर देशों के साथ राजनयिक संबंधों का विस्तृत प्रमाण तेरहवें शिलालेख में मिलता है। चंद्रगुप्त मौर्य ने भी सेल्यूकस निकेटर (सीरिया के यूनानी शासक) के साथ संधि की थी और उसके राजदूत मेगस्थनीज को पाटलिपुत्र में रहने की अनुमति दी थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह भी उल्लेखनीय है कि इन राजनयिक संबंधों के साक्ष्य के रूप में मौर्यकालीन पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में खुदाई में ग्रीक शैली के खंभों के अवशेष और विदेशी मूल की कलाकृतियाँ भी मिली हैं।
81. मेगस्थनीज दूत था –
(a) सेल्यूकस का
(b) सिकंदर का
(c) डेरियस का
(d) यूनानियों का
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(a)
मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जिसे उसने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था। सेल्यूकस यूनानी सेनापति सिकंदर के उत्तराधिकारियों में से एक था जिसने सीरिया पर शासन किया। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र में कई वर्षों तक निवास किया और वहाँ की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया। उसने अपने अनुभवों को ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ में संकलित किया, जो यद्यपि मूल रूप में अब उपलब्ध नहीं है, किंतु परवर्ती यूनानी लेखकों के उद्धरणों के माध्यम से ज्ञात है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज से पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में एक अन्य यूनानी दूत भी आ चुका था जिसका नाम डेमेकोस था। इसके अतिरिक्त, मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक में पाटलिपुत्र को उस काल का सबसे बड़ा और समृद्ध नगर बताया था, जो गंगा और सोन नदियों के संगम पर स्थित था।
82. मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया ?
(a) चार
(b) पांच
(c) छः
(d) सात
46th B.P.S.C. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
मेगस्थनीज ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘इंडिका’ में मौर्यकालीन भारतीय समाज को सात श्रेणियों में वर्गीकृत किया है— (1) दार्शनिक/ब्राह्मण, (2) कृषक, (3) पशुपालक व आखेटक, (4) कारीगर व शिल्पी, (5) योद्धा, (6) निरीक्षक और (7) सभासद/मंत्री। उसने यह भी उल्लेख किया कि कोई भी व्यक्ति अपनी श्रेणी से बाहर विवाह नहीं कर सकता था और न ही दूसरी श्रेणी का व्यवसाय अपना सकता था। उल्लेखनीय रूप से मेगस्थनीज ने भारत में दास प्रथा के अस्तित्व का उल्लेख नहीं किया, जो कि विवादास्पद है क्योंकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दासों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज का यह वर्गीकरण जाति-आधारित नहीं बल्कि व्यवसाय-आधारित था। उसने यह भी लिखा कि भारतीय लोग ईमानदार होते हैं और उनमें चोरी की प्रवृत्ति बहुत कम है — उसके अनुसार मौर्यकालीन भारत में घरों में ताले नहीं लगाए जाते थे।
83. कथन (a) : मौर्यकालीन शासकों ने धार्मिक आधार पर भू-अनुदान नहीं दिया था।
कारण (R) : भू-अनुदान के विरुद्ध कृषकों ने विद्रोह किया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए
(a) (a) तथा (R) दोनों सही हैं तथा (R), (a) की सही व्याख्या है।
(b) (a) तथा (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (a) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(c)
मौर्य शासकों ने धार्मिक उद्देश्यों से भूमि दान करने की परंपरा नहीं अपनाई थी। धार्मिक आधार पर भूमिदान का सबसे प्राचीन प्रमाण सातवाहन काल के अभिलेखों से मिलता है, जो मौर्योत्तर काल में आते हैं। अतः कथन (A) पूर्णतः सही है। किंतु कारण (R) असत्य है, क्योंकि इतिहास में ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो यह बताता हो कि भू-अनुदान के विरोध में किसानों ने कोई संगठित विद्रोह किया हो। मौर्यकाल में भूमि पर राज्य का स्वामित्व होता था और राज्य ही कृषि की देख-रेख करता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में सीताध्यक्ष नामक अधिकारी राजकीय भूमि (सीता भूमि) की देखरेख करता था। भूमि का वर्गीकरण कई श्रेणियों में होता था जैसे — क्षेत्र (कृषि भूमि), वन, खान आदि, और इन सब पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण था।
84. अशोक के ‘धम्म’ का मूल संदेश क्या है?
(a) राजा के प्रति वफादारी
(b) शांति एवं अहिंसा
(c) बड़ों का सम्मान
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं/उपर्युक्त में से एक से अधिक
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(d)
अशोक का ‘धम्म’ किसी एक धर्म विशेष से नहीं, बल्कि एक व्यापक नैतिक आचार संहिता से संबंधित था। अशोक के द्वितीय और सप्तम शिलालेखों में धम्म के मूल तत्त्वों का उल्लेख है — जिनमें पाप से बचना, दया करना, दान देना, सत्य बोलना, मन की पवित्रता, व्यवहार में मधुरता और साधुता शामिल हैं। इस प्रकार अशोक के धम्म में शांति, अहिंसा, बड़ों का सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता — सभी तत्त्व एक साथ समाहित हैं। इसीलिए सही उत्तर विकल्प (d) है, क्योंकि धम्म का संदेश किसी एक बिंदु तक सीमित नहीं था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक ने ‘धम्म महामात्र’ नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की थी, जिनका कार्य धम्म के प्रचार-प्रसार की देखरेख करना था। इसके अलावा, अशोक ने श्रीलंका, सीरिया, मिस्र, मकदूनिया और साइरीन जैसे देशों में भी धम्म प्रचारक भेजे थे।
85. निम्न में से अशोक के किस अभिलेख में पारंपरिक अवसरों पर पशु बलि पर रोक लगाई गई है, ऐसा लगता है कि यह पाबंदी पशुओं के वध पर थी ?
(a) शिला अभिलेख I
(b) स्तंभ अभिलेख V
(c) शिला अभिलेख IX
(d) शिला अभिलेख XI
R.A. S./R.T.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
अशोक के पाँचवें स्तंभ लेख में विस्तारपूर्वक उन जीव-जंतुओं की सूची दी गई है जिनके वध पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसमें तोते, मैना, जंगली बत्तख, चमगादड़, मछली, कछुआ, साही, बैल, कबूतर आदि अनेक जीव शामिल थे। साथ ही यह भी निर्देश था कि पर्व और त्योहार के विशेष दिनों जैसे तिष्य, पुनर्वसु और ऋतुओं की पूर्णिमा को पशुओं को बधिया न किया जाए। प्रथम शिलालेख में भी पशु बलि के विरुद्ध उल्लेख मिलता है, किंतु परंपरागत अवसरों पर विस्तृत पाबंदी का विशेष विवरण पाँचवें स्तंभ लेख में ही मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के प्रथम शिलालेख में उल्लेख है कि पूर्व में राजमहल की रसोई में प्रतिदिन सैकड़ों पशु मारे जाते थे, किंतु अभिलेख लिखे जाने के समय केवल तीन पशु — दो मोर और एक मृग — मारे जाते थे। अशोक ने राज्याभिषेक के 26वें वर्ष यह आदेश जारी किया था।
86. निम्नलिखित प्राचीन भारतीय अभिलेखों में से कौन-सा एक खाद्यान्न को देश में संकटकाल में उपयोग हेतु सुरक्षित रखने के बारे में प्राचीनतम शाही आदेश है?
(a) सोहगौरा ताम्रपत्र
(b) अशोक का रुम्मिनदेई स्तंभलेख
(c) प्रयाग प्रशस्ति
(d) चंद्र का मेहरौली स्तंभ शिलालेख
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(a)
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख तथा बांग्लादेश के बोगरा जिले से प्राप्त महास्थान अभिलेख — ये दोनों मौर्यकालीन प्राकृत भाषा में रचित हैं और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं। सोहगौरा ताम्रपत्र में अकाल जैसी आपदा की स्थिति में अन्न भंडारण और राहत वितरण से संबंधित निर्देश हैं, जो इसे प्राचीनतम ज्ञात शाही आदेश बनाते हैं। इस अकाल की ऐतिहासिक पुष्टि जैन ग्रंथों से भी होती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सोहगौरा ताम्रपत्र में ‘धान्यागार’ यानी अन्न भंडार गृहों के निर्माण का उल्लेख है। यह अभिलेख इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि यह प्राचीन भारत में राज्य द्वारा आपदा प्रबंधन की व्यवस्था का प्रथम दस्तावेजी प्रमाण है।
87. कथन (a) : अशोक ने कलिंग को मौर्य साम्राज्य में जोड़ लिया था।
कारण (R) : कलिंग दक्षिण भारत को जाने वाले स्थलीय एवं समुद्री मार्गों को नियंत्रित करता था।
सही
कूट :
उत्तर का चुनाव, नीचे दिए गए कूट के प्रयोग से करें-
(a) (a) और (R) दोनों सही हैं और (R), (a) का सही स्पष्टीकरण है।
(b) (a) और (R) दोनों सही हैं और (R), (a) का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
(c) (a) सही है, परंतु (R) गलत है।
(d) (a) गलत है, परंतु (R) सही है।
U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
उत्तर-(a)
अशोक ने अपने राज्याभिषेक के लगभग 8 वर्ष पश्चात (261 ई.पू. के आसपास) कलिंग पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और उसे मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। कलिंग का भौगोलिक स्थान अत्यंत सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था — वह दक्षिण भारत को जोड़ने वाले स्थल मार्गों के साथ-साथ बंगाल की खाड़ी के समुद्री व्यापार मार्गों को भी नियंत्रित करता था। यदि कलिंग स्वतंत्र रहता, तो मगध साम्राज्य के लिए दक्षिण से व्यापारिक संपर्क बनाना कठिन होता। अतः दोनों — कथन और कारण — सत्य हैं, और कारण, कथन की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कलिंग युद्ध में लगभग 1 लाख लोग मारे गए और डेढ़ लाख से अधिक लोग बंदी बनाए गए। इस भीषण नरसंहार से व्यथित होकर अशोक ने युद्ध नीति का त्याग कर ‘धम्म विजय’ की नीति अपनाई — यह परिवर्तन विश्व इतिहास में एक अद्वितीय घटना मानी जाती है।
88. प्रसिद्ध यूनानी राजदूत मेगस्थनीज भारत में किसके दरबार में आए थे?
(a) अशोक
(b) हर्षवर्धन
(c) चंद्रगुप्त मौर्य
(d) हेमू
R.A.S. / R.T.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज को सेल्यूकस निकेटर ने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा था। यह नियुक्ति 305 ई.पू. के आसपास हुए उस संधि समझौते के बाद हुई जिसमें सेल्यूकस को पश्चिमोत्तर भारत के कुछ प्रदेश चंद्रगुप्त को सौंपने पड़े और बदले में 500 हाथी प्राप्त हुए। मेगस्थनीज ने मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र में निवास किया और वहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य शक्ति एवं सामाजिक जीवन का विस्तृत विवरण ‘इंडिका’ में लिखा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र नगर की तुलना तत्कालीन विश्व के महानतम नगरों से की थी। उसके अनुसार पाटलिपुत्र में एक विशाल राज-प्रासाद था जो ईरान के पर्सेपोलिस से भी अधिक भव्य था — यद्यपि यह उसका व्यक्तिगत मत था।
89. किसके शासनकाल में मेगस्थनीज भारत आया?
(a) अशोक
(b) हर्षवर्धन
(c) चंद्रगुप्त मौर्य
(d) कुमारगुप्त
U.P.P.C.S. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत आया था। चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. से 297 ई.पू. तक शासन किया। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में निवास करते हुए मौर्य प्रशासन, नगर व्यवस्था और समाज का अध्ययन किया। उसकी रचना ‘इंडिका’ बाद के लेखकों जैसे डायोडोरस, स्ट्रेबो और एरियन के उद्धरणों के माध्यम से आज आंशिक रूप में उपलब्ध है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज के उत्तराधिकारी के रूप में डेमेकोस, बिंदुसार के दरबार में यूनानी राजदूत बनकर आए थे। इसी प्रकार डायोनिसस नामक एक अन्य यूनानी दूत अशोक के काल में भारत आया था — इस प्रकार तीनों प्रमुख मौर्य शासकों के दरबार में यूनानी राजदूत आए।
90. मौर्य समाज का सात वर्गों में विभाजन का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है –
(a) कौटिल्य के अर्थशास्त्र में
(b) अशोक के शिलालेखों में
(c) पुराणों में
(d) मेगस्थनीज की पुस्तक ‘इंडिका’ में
63rd B.P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(d)
मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मौर्यकालीन समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है — (1) दार्शनिक, (2) कृषक, (3) पशुपालक एवं आखेटक, (4) कारीगर एवं शिल्पी, (5) योद्धा, (6) निरीक्षक, और (7) सभासद। इसमें से कृषक सबसे बड़ा वर्ग था। यह वर्गीकरण भारतीय वर्ण व्यवस्था से भिन्न था क्योंकि यह व्यवसाय पर आधारित था, जन्म पर नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज ने यह भी लिखा कि भारत में अकाल कभी नहीं पड़ता क्योंकि यहाँ दो फसलें होती हैं। यह अतिरंजित विवरण अवश्य है, परंतु इससे मौर्यकालीन कृषि की समृद्धि का पता चलता है। उल्लेखनीय है कि मेगस्थनीज ने कौटिल्य का कोई उल्लेख नहीं किया, जो इतिहासकारों के लिए एक रहस्य बना हुआ है।
91. मेगस्थनीज की पुस्तक का नाम क्या है?
(a) अर्थशास्त्र
(b) ऋग्वेद
(c) पुराण
(d) इंडिका
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
Uttarakhand U.D.A./ L.D.A. (Mains) 2007
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
M.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
मेगस्थनीज एक यूनानी राजदूत था जिसे सेल्यूकस निकेटर ने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था। उसने पाटलिपुत्र में रहकर मौर्य साम्राज्य का प्रत्यक्ष अवलोकन किया और अपने अनुभवों को ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ में लिपिबद्ध किया। यह ग्रंथ मौर्यकालीन भारत के इतिहास का एक अमूल्य विदेशी स्रोत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज की मूल ‘इंडिका’ अब उपलब्ध नहीं है — यह ग्रंथ खंडित हो चुका है और इसके अंश केवल बाद के यूनानी लेखकों जैसे स्ट्रैबो, डियोडोरस और एरियन की रचनाओं में उद्धरण के रूप में मिलते हैं। मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक में चंद्रगुप्त मौर्य की शक्तिशाली सेना का उल्लेख किया है, जिसमें 6 लाख पैदल सैनिक, 30,000 घुड़सवार और 9,000 हाथी थे।
92. निम्नलिखित में से किस स्रोत में उल्लिखित है कि प्राचीन भारत में दासता नहीं थी?
(a) अर्थशास्त्र
(b) मुद्राराक्षस
(c) मेगस्थनीज की इंडिका
(d) वायुपुराण
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत में दासता की प्रथा नहीं थी और सभी भारतीय स्वतंत्र थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है क्योंकि उसी काल में यूनान और रोम में दास प्रथा बहुत प्रचलित थी। हालाँकि, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दासों के प्रकार और उनके अधिकारों का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जो मेगस्थनीज के कथन से भिन्न है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दासों की 9 श्रेणियाँ बताई गई हैं, जैसे — युद्धबंदी, ऋण न चुकाने वाले, जन्मजात दास आदि। इससे स्पष्ट होता है कि मेगस्थनीज का यह कथन या तो उसकी सीमित जानकारी पर आधारित था या भारतीय दासता यूनानी दासता से गुणात्मक रूप से भिन्न थी।
93. वह स्रोत जिसमें पाटलिपुत्र के प्रशासन का वर्णन उपलब्ध है-
(a) दिव्यावदान
(b) अर्थशास्त्र
(c) इंडिका
(d) अशोक शिलालेख
46th B.P.S.C. (Pre) 2003
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ में मौर्यकालीन राजधानी पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का विस्तृत एवं व्यवस्थित विवरण मिलता है। उसके अनुसार, पाटलिपुत्र का प्रशासन 30 सदस्यों वाली एक समिति द्वारा संचालित होता था, जो 6 उप-समितियों में विभाजित थी और प्रत्येक में 5-5 सदस्य थे। इन समितियों के कार्यों में उद्योग-धंधों की देखरेख, विदेशियों की व्यवस्था, जन्म-मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार नियंत्रण, निर्मित वस्तुओं की जाँच और बिक्री कर वसूली शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पाटलिपुत्र गंगा और सोन नदियों के संगम पर स्थित था और मेगस्थनीज ने इसे विश्व के सबसे बड़े और सुंदर नगरों में से एक बताया। उसके अनुसार नगर की लंबाई 80 स्टेडिया (लगभग 14.8 किमी) और चौड़ाई 15 स्टेडिया (लगभग 2.8 किमी) थी, जो चारों ओर से एक गहरी खाई से घिरी थी।
94. निम्नलिखित में से कौन स्रोत मौर्यों के नगर प्रशासन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है?
(a) कौटिल्य का अर्थशास्त्र
(b) मेगस्थनीज की इंडिका
(c) विशाखदत्त का मुद्राराक्षस
(d) अशोक का अभिलेख
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(b)
मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ मौर्य नगर प्रशासन के बारे में सर्वाधिक विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने वाला स्रोत है। इसमें पाटलिपुत्र की 6 समितियों की कार्यप्रणाली का सुस्पष्ट विवरण है। यद्यपि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रशासन के सैद्धांतिक पहलुओं का वर्णन मिलता है, किंतु नगर प्रशासन का प्रत्यक्षदर्शी विवरण केवल ‘इंडिका’ में ही उपलब्ध है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज द्वारा वर्णित छठी समिति बिक्री कर (Sales Tax) वसूलती थी, जो मूल्य का दसवाँ भाग (10%) होता था। इसके अतिरिक्त, तीसरी समिति जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन करती थी — यह प्राचीन भारत में नागरिक पंजीकरण की एक अत्यंत उन्नत व्यवस्था का प्रमाण है।
95. मौर्यकाल में टैक्स को छुपाने (चोरी) के लिए इनमें से क्या दण्ड दिया जाता था?
(a) मृत्युदण्ड
(b) सामानों की कुर्की (जब्ती)
(c) कारावास
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(a)
मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ के अनुसार, पाटलिपुत्र में बिक्री कर वसूलने का कार्य छठी नगर-समिति करती थी। विक्रय वस्तु के मूल्य का दसवाँ भाग (1/10) कर के रूप में लिया जाता था। यदि कोई व्यापारी इस कर की चोरी करते हुए पकड़ा जाता था, तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाता था — यह दंड-व्यवस्था की अत्यंत कठोर प्रकृति को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार भी कर-चोरी को गंभीर अपराध माना जाता था। अर्थशास्त्र में ‘शुल्काध्यक्ष’ (सीमा शुल्क अधिकारी) का उल्लेख है जो व्यापार पर निगरानी रखता था। मौर्य काल में राजस्व का मुख्य स्रोत ‘भाग’ (भूमि कर), ‘बलि’ (धार्मिक कर), ‘शुल्क’ (व्यापार कर) और ‘कर’ (विशेष उपकर) थे।
96. मौर्य समाज का विभाजन सात वर्गों में विशेष तौर पर उल्लिखित
(a) कौटिल्य के अर्थशास्त्र में
(b) अशोक के शिलालेख में
(c) पुराणों में
(d) मेगस्थनीज की इंडिका में
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(d)
मेगस्थनीज ने ‘इंडिका’ में मौर्यकालीन समाज को सात वर्गों में विभाजित बताया है। यह विभाजन वर्ण-व्यवस्था पर आधारित नहीं था, बल्कि व्यवसाय और सामाजिक कार्य पर आधारित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज ने यह भी उल्लेख किया कि ये सात वर्ग परस्पर अंतर्विवाह नहीं करते थे और न ही एक वर्ग का व्यक्ति दूसरे वर्ग का व्यवसाय अपना सकता था। उसने किसान वर्ग को सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण वर्ग बताया, जो युद्ध के समय भी खेती करता रहता था और किसी पक्ष द्वारा नहीं सताया जाता था।
100. मौर्य काल में ‘सीता’ से तात्पर्य है-
(a) एक देवी
(b) एक धार्मिक संप्रदाय
(c) राजकीय भूमि से प्राप्त आय
(d) ऊसर भूमि
U.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
मौर्यकाल में राजकीय स्वामित्व वाली भूमि को ‘सीता भूमि’ कहा जाता था और उससे प्राप्त होने वाली आय को ‘सीता’ कहते थे। इसकी देखरेख एवं प्रबंधन के लिए ‘सीताध्यक्ष’ नामक अधिकारी नियुक्त होता था, जो कृषि विभाग का प्रमुख था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सीता भूमि पर राज्य द्वारा दास, बंदी एवं मजदूरों से खेती करवाने का उल्लेख मिलता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्थशास्त्र के अनुसार, सीताध्यक्ष की जिम्मेदारी थी कि वह बीज, उपकरण और सिंचाई का प्रबंध भी करे, जिससे राज्य की कृषि आय अधिकतम हो सके। इसके अतिरिक्त, मौर्यकाल में ‘भाग’ के रूप में उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था, जबकि ‘सीता’ भूमि की आय पूरी तरह राजकोष में जाती थी।
101. मौर्य काल में भूमि कर, जो कि राज्य की आय का मुख्य स्रोत था, किस अधिकारी द्वारा एकत्रित किया जाता था?
(a) अग्रोनोमोई
(b) शुल्काध्यक्ष
(c) सीताध्यक्ष
(d) अक्राध्यक्ष
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
मौर्यकाल में भूमि कर एकत्र करने का कार्य ‘सीताध्यक्ष’ करता था, जो कृषि एवं राजकीय भूमि के प्रबंधन का प्रमुख अधिकारी था। ‘शुल्काध्यक्ष’ व्यापार एवं वाणिज्य पर कर संग्रह करता था, ‘अक्राध्यक्ष’ (आकाराध्यक्ष) खानों की देखरेख करता था, तथा ‘अग्रोनोमोई’ सड़कों के रख-रखाव और माप से संबंधित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार मौर्यकाल में भूमि कर (भाग) सामान्यतः उपज का 1/6 भाग होता था, परंतु विशेष परिस्थितियों में यह 1/4 या 1/3 भाग तक भी हो सकता था। ‘समाहर्ता’ केंद्र स्तर पर समस्त राजस्व के संग्रह का सर्वोच्च अधिकारी होता था।
102. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार, मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था में निम्नलिखित न्यायालय अस्तित्व में थे-
1.धर्ममहामात्र
2.धर्मस्थ
3.रज्जुक
4.कंटकशोधन
सही उत्तर चुनिए-
(a) 1 एवं 2
(b) 2 एवं 3
(c) 1 एवं 3
(d) 2 एवं 4
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था के अंतर्गत दो प्रमुख न्यायालयों का वर्णन है — ‘धर्मस्थीय’ (दीवानी न्यायालय) और ‘कंटकशोधन’ (फौजदारी न्यायालय)। धर्मस्थीय न्यायालय में ‘व्यावहारिक’ न्यायाधीश होता था, जबकि कंटकशोधन न्यायालय में ‘प्रदेष्टा’ न्यायाधीश का कार्य करता था। ‘धर्ममहामात्र’ अशोक द्वारा नियुक्त धार्मिक अधिकारी थे, न कि न्यायालय।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कंटकशोधन न्यायालय मुख्यतः बाजार में होने वाली धोखाधड़ी, मिलावट और अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई करता था। अशोक के काल में ‘रज्जुक’ नामक अधिकारियों को भी न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए थे, जो ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय का कार्य देखते थे।
103. मौर्य मंत्रिपरिषद में निम्न में से कौन राजस्व इकठ्ठा करने से संबंधित था ?
(a) समाहर्ता
(b) व्यभारिका
(c) अंतपाल
(d) प्रदेष्टा
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(a)
मौर्य मंत्रिपरिषद में ‘समाहर्ता’ राजस्व संग्रह का सर्वोच्च अधिकारी था, जो पूरे साम्राज्य में करों की वसूली और राजकोष में जमा करने की व्यवस्था देखता था। ‘अंतपाल’ सीमावर्ती दुर्गों और क्षेत्रों की रक्षा करता था, जबकि ‘प्रदेष्टा’ विषयों (कमिश्नरियों) का प्रशासनिक अधिकारी था। ‘सन्निधाता’ राजकोष एवं भंडार का संरक्षक होता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समाहर्ता और सन्निधाता मौर्यकाल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अमात्यों में गिने जाते थे। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में इन दोनों पदों के कार्यों और दायित्वों का विस्तार से वर्णन किया है। समाहर्ता 40 प्रकार के विभिन्न करों की देखरेख करता था।
104. ‘भाग’ एवं ‘बलि’ थे-
(a) सैनिक विभाग
(b) राजस्व के स्रोत
(c) धार्मिक अनुष्ठान
(d) प्रशासकीय विभाग
U.P.P.C.S. (Pre) 1996
उत्तर-(b)
प्राचीन भारत में ‘भाग’ और ‘बलि’ दोनों राजस्व के महत्वपूर्ण स्रोत थे। ‘भाग’ भूमि से उत्पन्न उपज का वह हिस्सा था जो राजा को कर के रूप में दिया जाता था — सामान्यतः यह उपज का 1/6 भाग होता था। ‘बलि’ एक अन्य प्रकार का कर था जो प्रजा से स्वैच्छिक अथवा अनिवार्य रूप से लिया जाता था। वैदिक काल में ‘बलि’ स्वैच्छिक भेंट थी, किंतु बाद के काल में यह अनिवार्य कर बन गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में ‘हिरण्य’ (नकद कर) और ‘कर’ (व्यापारिक कर) भी राजस्व के अन्य प्रमुख स्रोत थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की आय के लगभग 40 विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया गया है।
105. मौर्य काल में ‘एग्रोनोमोई’ अधिकारी निम्नलिखित में से किस क्षेत्र से संबंधित थे ?
(a) माप और तौल
(b) प्रशासन प्रबंधन
(c) मार्ग निर्माण
(d) राजस्व प्रबंधन
U.P.P.C.S. (Pre) 2020
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज द्वारा उल्लिखित ‘एग्रोनोमोई’ (Agronamoi) अधिकारी मार्ग निर्माण एवं रख-रखाव से मुख्यतः संबंधित थे। ये अधिकारी सड़कों पर प्रत्येक 10 स्टेडिया (लगभग 1.85 किमी) की दूरी पर पत्थर के मील-स्तंभ लगवाते थे। इसके अलावा वे सिंचाई सुविधाओं के पर्यवेक्षण, भूमि की माप और स्थानीय न्यायिक कार्य भी करते थे। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न का उत्तर विकल्प (c) माना है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: एग्रोनोमोई का उल्लेख मेगस्थनीज की पुस्तक ‘इंडिका’ में मिलता है। ये अधिकारी नगर के बाहरी क्षेत्र में कार्य करते थे, जबकि नगर के भीतर ‘एस्टीनोमोई’ (Astynomoi) छह समितियों के माध्यम से नगर प्रशासन का कार्य देखते थे।
106. निम्नलिखित में से कौन मौर्ययुगीन अधिकारी तौल-माप का प्रभारी था?
(a) पौतवाध्यक्ष
(b) पण्याध्यक्ष
(c) सीताध्यक्ष
(d) सूनाध्यक्ष
U.P.P.C.S. (Mains) 2012
उत्तर-(a)
मौर्यकाल में ‘पौतवाध्यक्ष’ तौल-माप (Weights and Measures) विभाग का प्रमुख अधिकारी था। वह यह सुनिश्चित करता था कि बाजारों में प्रयुक्त बाट और माप मानक एवं सही हों। ‘पण्याध्यक्ष’ वाणिज्य एवं व्यापार विभाग का प्रभारी था, ‘सूनाध्यक्ष’ बूचड़खाने और पशु-वध से संबंधित था, तथा ‘सीताध्यक्ष’ कृषि भूमि का अधिकारी था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार पौतवाध्यक्ष को यह अधिकार था कि वह गलत तराजू या बाट का उपयोग करने वाले व्यापारियों पर भारी जुर्माना लगाए। मानक बाटों और मापों को प्रत्येक 4 महीने में एक बार जाँचा और प्रमाणित किया जाता था।
107. ‘पंकोदकसन्निरोधे’ मौर्य प्रशासन द्वारा लिया जाने वाला जुर्माना था-
(a) पीने के पानी को गंदा करने पर
(b) सड़क पर कीचड़ फैलाने पर
(c) कूड़ा फेंकने पर
(d) मंदिर को गंदा करने पर
R.A.S. / R.T.S. (Pre) (Re-Exam) 2013
उत्तर-(b)
‘पंकोदकसन्निरोधे’ मौर्य प्रशासन में सड़क पर जल और कीचड़ एकत्र करने अथवा फेंकने पर लगाया जाने वाला दंड (जुर्माना) था। यह दर्शाता है कि मौर्यकाल में नगर स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति प्रशासन बहुत सचेत था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस प्रकार के अनेक जुर्मानों का उल्लेख है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्थशास्त्र में नगर सफाई के लिए विस्तृत नियम दिए गए हैं — घर के सामने गंदगी फेंकने पर 1/8 पण, श्मशान के पास गंदगी करने पर अधिक दंड का प्रावधान था। नगर प्रशासन की छह समितियों में से एक समिति विशेष रूप से विदेशियों की देखभाल और नगर के भ्रमण की व्यवस्था करती थी, जो मौर्यकाल के सुव्यवस्थित नगर प्रशासन का प्रमाण है।
108. मौर्य काल में शिक्षा का सर्वाधिक प्रसिद्ध केंद्र था-
(a) वैशाली
(b) नालंदा
(c) तक्षशिला
(d) उज्जैन
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2010
उत्तर-(c)
मौर्यकाल में तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी के निकट) शिक्षा का सर्वाधिक प्रसिद्ध केंद्र था। यहाँ वेद, व्याकरण, दर्शन, चिकित्साशास्त्र, राजनीति एवं धनुर्विद्या आदि की शिक्षा दी जाती थी। स्वयं कौटिल्य (चाणक्य) तक्षशिला में अध्ययन कर चुके थे। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्तकाल में हुई थी, अतः वह मौर्यकाल की संस्था नहीं थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तक्षशिला विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में गिना जाता है। यहाँ 16 वर्ष की आयु के बाद प्रवेश मिलता था और एक विद्यार्थी औसतन 8 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करता था। यहाँ एक साथ हजारों की संख्या में छात्र अध्ययन करते थे और यूनान, चीन, बेबीलोन आदि देशों से भी विद्यार्थी आते थे।
109. मौर्य नरेशों के बारे में निम्न में से कौन-सा कथन सही है? उन्होंने विकास किया था-
A. संस्कृति, कला व साहित्य B. सोने के सिक्के
C. प्रांतीय विभाजन D. हिंदुकुश तक साम्राज्य
(a) केवल A
(b) केवल B
(c) केवल A, B, C
(d) केवल A, C, D
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(d)
मौर्य सम्राटों ने संस्कृति, कला एवं साहित्य (A), प्रांतीय विभाजन (C) और हिंदुकुश तक साम्राज्य विस्तार (D) — इन तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। अशोक के अभिलेखों में साम्राज्य के 5 प्रांत — उत्तरापथ, अवंतिरट्ठ, कलिंग, दक्षिणापथ और प्राच्य — वर्णित हैं। स्वर्ण सिक्के प्रचलित करने का श्रेय हिंद-यवन (इंडो-ग्रीक) शासकों को है, मौर्यों को नहीं। अतः कथन B असत्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मौर्यकाल में चांदी के पंचमार्क सिक्के (आहत मुद्राएँ) प्रचलित थे, जिन्हें ‘कार्षापण’ कहा जाता था। चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस निकेटर को पराजित करके हिंदुकुश से परे का क्षेत्र भी प्राप्त किया था और बदले में 500 हाथी दिए थे।
110. वर्तमान नगरपालिका प्रशासन का कौन-सा कार्य मौर्य काल से जारी है?
(a) नाप-तौल के बांटों का निरीक्षण
(b) वस्तुओं की कीमतें निर्धारित करना
(c) जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण
(d) शिल्पकारों का संरक्षण
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1992
उत्तर-(c)
मेगस्थनीज के विवरण के अनुसार पाटलिपुत्र की नगर परिषद में 5-5 सदस्यों वाली 6 समितियाँ थीं। इनमें से तीसरी समिति जन्म एवं मृत्यु के पंजीकरण का कार्य करती थी। यह व्यवस्था आज भी नगरपालिका प्रशासन द्वारा जारी है। नगर का प्रमुख ‘नागरक’ या ‘पुरमुख्य’ कहलाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मेगस्थनीज की इन छह समितियों में से पहली समिति उद्योग-धंधों की, दूसरी विदेशियों की देखभाल की, चौथी व्यापार एवं वाणिज्य की, पाँचवीं निर्मित वस्तुओं की बिक्री की और छठी बिक्री कर वसूलने की जिम्मेदारी निभाती थी। उल्लेखनीय है कि ये छह समितियाँ नगर प्रशासन की सामूहिक रूप से जिम्मेदार थीं, कोई भी समिति अकेले निर्णय नहीं ले सकती थी।
111. विदेशियों को भारतीय समाज में मनु द्वारा दिया गया सामाजिक स्तर था-
(a) क्षत्रियों का
(b) व्रात्य क्षत्रियों का
(c) वैश्यों का
(d) शूद्रों का
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(b)
मनुस्मृति के अनुसार यवन, शक, पह्लव, चीन आदि विदेशी जातियों को “व्रात्य क्षत्रिय” की श्रेणी में रखा गया था — अर्थात ऐसे क्षत्रिय जो संस्कारों से भ्रष्ट हो गए। इससे स्पष्ट होता है कि मनु ने विदेशियों को सामाजिक व्यवस्था में पूरी तरह बाहर नहीं किया, बल्कि एक निम्नतर क्षत्रिय दर्जा दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मनुस्मृति में यह भी कहा गया है कि जो क्षत्रिय ब्राह्मणों की सेवा नहीं करते और वैदिक संस्कारों का पालन नहीं करते, वे धीरे-धीरे शूद्रता को प्राप्त होते हैं — इसी आधार पर विदेशी जातियों की व्याख्या की गई। इसके अलावा, चाणक्य के अर्थशास्त्र में विदेशी व्यापारियों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का भी उल्लेख है, जो दर्शाता है कि प्राचीन भारत में विदेशियों को सीमित नागरिक दर्जा प्राप्त था।
112. ईस्वी सन के पूर्व की कुछ शताब्दियों में निम्नलिखित में से किन शासकों ने गिरनार क्षेत्र में जल संसाधन व्यवस्था की ओर ध्यान दिया ?
1.महापद्मनंद
2.चंद्रगुप्त मौर्य
3.अशोक
4.रुद्रदामन
नीचे के कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए –
(a) 1, 2
(b) 2, 3
(c) 3, 4
(d) 2, 3, 4
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2006
उत्तर-(b)
गिरनार (जूनागढ़, गुजरात) क्षेत्र में जल प्रबंधन की दिशा में चंद्रगुप्त मौर्य ने प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। तत्पश्चात अशोक ने इस झील से सिंचाई नहरें निकलवाईं। यह जानकारी शक क्षत्रप रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख (लगभग 150 ई.) से प्राप्त होती है — यद्यपि रुद्रदामन का कार्य ईस्वी सन के बाद का है, इसलिए वह इस प्रश्न के दायरे में नहीं आता।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुदर्शन झील का पुनरुद्धार गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के समय (लगभग 455-467 ई.) में भी हुआ था — इसका उल्लेख जूनागढ़ से प्राप्त स्कंदगुप्त के शिलालेख में मिलता है। यह झील प्राचीन भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण कृत्रिम जलाशय परियोजनाओं में से एक मानी जाती है।
113. निम्नलिखित व्यक्ति भारत में किसी-न-किसी समय आए-
1.फाह्यान
2.इत्सिंग
3.मेगस्थनीज
4.ह्वेनसांग
उनके आगमन का सही कालानुक्रम है-
(a) 3, 1, 2, 4
(b) 3, 1, 4, 2
(c) 1, 3, 2, 4
(d) 1, 3, 4, 2
I.A.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
इन चार विदेशी यात्रियों के भारत आगमन का सही कालक्रम इस प्रकार है — मेगस्थनीज (लगभग 302 ई.पू., चंद्रगुप्त मौर्य का काल) → फाह्यान (399-414 ई., चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का काल) → ह्वेनसांग (629-645 ई., हर्षवर्धन का काल) → इत्सिंग (671-695 ई.)। मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मौर्य साम्राज्य का विस्तृत विवरण दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: फाह्यान पहला चीनी यात्री था जिसने विशेष रूप से बौद्ध धर्म के तीर्थस्थलों की यात्रा के उद्देश्य से भारत आया और बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ लेकर गया। ह्वेनसांग ने नालंदा विश्वविद्यालय में लगभग 5 वर्षों तक अध्ययन किया और वहाँ के आचार्य शीलभद्र से शिक्षा ग्रहण की।
114. अंतिम मौर्य सम्राट था?
(a) जालौक
(b) अवंति वर्मा
(c) नंदी वर्धन
(d) बृहद्रथ
48th to 52nd B.P.S.C. (Pre) 2008
उत्तर-(d)
मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था, जिसकी हत्या 184 ई.पू. में उसके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सैनिकों की परेड के दौरान की थी। इस हत्या के बाद पुष्यमित्र ने शुंग वंश की स्थापना की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बृहद्रथ एक निर्बल एवं अयोग्य शासक था जिसके काल में मौर्य साम्राज्य काफी सिकुड़ चुका था। पुष्यमित्र शुंग एक ब्राह्मण था और उसे परंपरागत रूप से बौद्ध धर्म विरोधी माना गया है — कुछ बौद्ध ग्रंथों में उस पर बौद्ध विहारों को नष्ट करने का आरोप भी लगाया गया है, हालांकि इतिहासकारों में इस पर मतभेद है।
115. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में इतिवृत्तों, राजवंशीय इतिहासों तथा वीरगाथाओं को कंठस्थ करना निम्नलिखित में से किसका व्यवसाय था?
(a) श्रमण
(b) परिव्राजक
(c) अग्रहारिक
(d) मागध
I.A.S. (Pre) 2016
उत्तर-(d)
प्राचीन भारत में “मागध” और “सूत” वर्ग के लोगों का मुख्य व्यवसाय राजवंशीय इतिहासों, वीरगाथाओं तथा इतिवृत्तों को कंठस्थ कर राज दरबारों में सुनाना था। ये लोग मौखिक परंपरा के संरक्षक थे और राजाओं की वंशावली एवं शौर्यगाथाओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुँचाते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: महाभारत एवं पुराणों में सूत-मागधों का उल्लेख राजाओं के स्तुतिपाठक के रूप में मिलता है। वे प्रायः युद्धभूमि में भी राजाओं के साथ जाते थे और उनके पराक्रम का वर्णन करते थे। इनकी परंपरा को ही आधुनिक “चारण” एवं “भाट” परंपरा का पूर्वज माना जाता है।
116. निम्न कथनों पर विचार कीजिए-
1. अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या उसके प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की थी।
2. अंतिम शुंग राजा देवभूति की हत्या उसके ब्राह्मण मंत्री वासुदेव कण्व ने की और उसने राजसिंहासन हथिया लिया।
3. आंध्र ने कण्व राजवंश के अंतिम शासक को पद वंचित किया था।
इन कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
I.A.S. (Pre) 2003
उत्तर-(d)
तीनों कथन ऐतिहासिक दृष्टि से सही हैं। पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में बृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की स्थापना की। शुंग वंश के अंतिम राजा देवभूति को उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने मारकर कण्व वंश की नींव रखी। तत्पश्चात वायु पुराण के अनुसार, सातवाहन (आंध्र) शासक सिमुक ने अंतिम कण्व शासक सुशर्मा को पदच्युत कर मार डाला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कण्व वंश लगभग 75-30 ई.पू. तक शासन में रहा और इसके केवल चार शासक हुए — वासुदेव, भूमित्र, नारायण और सुशर्मा। सातवाहन वंश (जिसे आंध्र वंश भी कहा जाता है) दक्षिण भारत का पहला महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है, जिसने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया।
117. गांवों के शासन को स्वायत्तशासी पंचायतों के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था का सूत्रपात किसने किया?
(a) कुषाणों ने
(b) द्रविड़ों ने
(c) आर्यों ने
(d) मौर्यों ने
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
ग्राम स्वशासन की परंपरा का सूत्रपात मुख्यतः द्रविड़ों, विशेषकर चोल शासकों द्वारा किया गया। चोल काल में “उर”, “सभा” और “नगरम” जैसी ग्राम परिषदें अत्यंत सुगठित एवं स्वायत्त रूप से कार्य करती थीं। उत्तरमेरूर (तमिलनाडु) से प्राप्त शिलालेख इन परिषदों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चोल काल में ग्राम सभाओं के सदस्यों के चुनाव के लिए “कुड़वोलई” पद्धति अपनाई जाती थी, जिसमें नारियल के पत्तों पर नाम लिखकर उन्हें पात्र में डाला जाता था और फिर एक बच्चे से निकलवाया जाता था — यह प्राचीन भारत की लॉटरी आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानी जाती है।
118. प्राचीन भारत के निम्नलिखित ग्रंथों में से किसमें पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए विवाह विच्छेद की अनुमति दी गई है?
(a) कामसूत्र
(b) मानवधर्मशास्त्र
(d) अर्थशास्त्र
(c) शुक्र नीतिसार
I.A.S. (Pre) 1996
उत्तर-(d)
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विवाह विच्छेद (तलाक) का स्पष्ट प्रावधान मिलता है। यदि पति लंबे समय तक विदेश में रहे, शरीर से दोषपूर्ण हो, या पत्नी को त्याग दे — तो स्त्री को विवाह विच्छेद का अधिकार दिया गया था। इसी प्रकार पत्नी के चारित्रिक दोष की स्थिति में पति भी यह अधिकार रखता था। यह मौर्यकालीन समाज की अपेक्षाकृत उदार विधिक व्यवस्था को दर्शाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अर्थशास्त्र में विवाह के आठ प्रकारों का उल्लेख है और इसमें स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता का भी समर्थन किया गया है — स्त्रियों को अपनी “स्त्रीधन” संपत्ति रखने का अधिकार था। यह दृष्टिकोण मनुस्मृति से भिन्न था, जो स्त्री स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगाती है।
119. निम्नलिखित में से किसमें पुनर्विवाह वर्जित (Prohibits) है?
(a) जातक
(b) मनुस्मृति
(c) याज्ञवल्क्य
(d) अर्थशास्त्र
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P.P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(b)
मनुस्मृति में स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह का निषेध स्पष्ट रूप से किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार विधवा स्त्री को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी, जबकि विधुर पुरुष पुनर्विवाह कर सकता था। यह व्यवस्था प्राचीन भारतीय समाज में लैंगिक असमानता की प्रतीक थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मनुस्मृति के विपरीत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र एवं नारद स्मृति में विधवा पुनर्विवाह की अनुमति दी गई थी। आधुनिक भारत में विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता “हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856” द्वारा मिली, जिसे ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों से पारित करवाया गया।
120. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही
सूची-I सूची-II
A. चंद्रगुप्त – 1. पियदसि
B. बिंदुसार – 2. सैंड्रोकोट्टस
C. अशोक – 3. अमित्रघात
D. चाणक्य – 4. विष्णुगुप्त कूट : A B C D उत्तर का चयन कीजिए-
(a) 2 3 4 1
(b) 1 3 2 4
(c) 2 3 1 4
(d) 3 4 2 1
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2001
उत्तर-(c)
सही सुमेलन इस प्रकार है — चंद्रगुप्त मौर्य को यूनानी लेखकों ने “सैंड्रोकोट्टस” कहा; बिंदुसार को “अमित्रघात” (शत्रुओं का नाश करने वाला) कहा गया; अशोक के शिलालेखों में उन्हें “पियदसि” (प्रियदर्शी) कहा गया है; और चाणक्य का वास्तविक नाम “विष्णुगुप्त” था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: “पियदसि” (प्रियदर्शी) नाम अशोक के स्वयं के शिलालेखों में मिलता है, और यही नाम श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ “दीपवंश” एवं “महावंश” में भी आता है। चाणक्य को “कौटिल्य” नाम उनकी चाल-चलन की कुटिलता के कारण मिला, जबकि “विष्णुगुप्त” उनका गोत्र-नाम था।
121. बराबर पहाड़ी की गुफाओं के विषय में निम्न में से कौन एक सही नहीं है?
(a) बराबर पहाड़ी पर कुल चार गुफाएं हैं।
(b) तीन गुफाओं की दीवार पर अशोक के अभिलेख उत्कीर्ण हैं।
(c) ये अभिलेख इन गुफाओं को आजीविकाओं को समर्पित होने का उल्लेख करते हैं।
(d) ये अभिलेख ईसा पूर्व छठीं शताब्दी के हैं।
U.P.P.C.S. (Pre) 2017
उत्तर-(d)
बिहार के गया जिले में स्थित बराबर पहाड़ी पर कुल चार गुफाएं हैं — कर्ण चौपड़, सुदामा, विश्वझोपड़ी और लोमस ऋषि। इनमें से पहली तीन गुफाओं की दीवारों पर सम्राट अशोक के लेख उत्कीर्ण हैं, जिनमें इन्हें आजीवक संप्रदाय के साधुओं को दान में देने का उल्लेख है। ये अभिलेख तीसरी शताब्दी ई.पू. (मौर्यकाल) के हैं, न कि छठी शताब्दी ई.पू. के — इसीलिए विकल्प (d) असत्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चौथी गुफा ‘लोमस ऋषि’ स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है — इसका प्रवेशद्वार हाथियों की नक्काशी से अलंकृत है और यह भारत की प्राचीनतम अर्धवृत्ताकार (Chaitya arch) वाली गुफाओं में से एक मानी जाती है। आजीवक संप्रदाय के प्रवर्तक मक्खलि गोशाल थे, जो भगवान महावीर के समकालीन थे।
122. निम्नलिखित में से किस अभिलेख में चंद्रगुप्त और अशोक दोनों का उल्लेख किया गया है ?
(a) गौतमीपुत्र शातकर्णि की नासिक प्रशस्ति
(b) महाक्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख
(c) अशोक का गिरनार अभिलेख
(d) स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख
U.P. Lower Sub. (Pre) 2004
उत्तर-(b)
महाक्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख शक संवत् 72 (लगभग 150 ई.) का है। यह एकमात्र ऐसा अभिलेख है जिसमें चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक — दोनों का नामोल्लेख एक साथ मिलता है। इस अभिलेख में सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का विस्तृत विवरण दिया गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत गद्य में लिखित प्राचीनतम दीर्घ अभिलेखों में से एक है — इससे पहले अधिकांश शाही अभिलेख प्राकृत भाषा में होते थे। यह अभिलेख रुद्रदामन की विजयों — मालव, अपरांत, आनर्त, सुराष्ट्र आदि — का भी प्रमाण देता है, जिससे शक शासकों की शक्ति का अंदाज़ा लगता है।
123. मौर्यकालीन मूर्तियों में, मणिभद्र (यक्ष) नाम से अंकित मूर्ति किस स्थान से प्राप्त हुई है?
(a) झींग-का-नगरा
(b) नोह ग्राम
(c) बेसनगर
(d) परखम
R.A.S./R.T.S (Pre) 2021
उत्तर-(d)
मथुरा के निकट ‘परखम’ ग्राम से प्राप्त ‘मणिभद्र यक्ष’ की विशाल मूर्ति मौर्यकालीन लोक कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मूर्ति लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इस पर ‘मणिभद्र’ नाम उत्कीर्ण है, जिससे इसकी पहचान सुनिश्चित होती है। मौर्यकाल में यक्ष पूजा एक प्रमुख लोक धर्म था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मणिभद्र को जैन धर्म में भी एक महत्त्वपूर्ण यक्ष देवता माना जाता है — वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ के शासन देवता (शासनदेव) के रूप में पूजित हैं। मथुरा कला शैली की विशेषता यह है कि यहाँ की मूर्तियाँ स्थानीय लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर से बनाई जाती थीं, जो गांधार कला शैली की विदेशी प्रभाव वाली मूर्तियों से भिन्न हैं।
124. जल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, जिस प्रथम शासक ने गिरनार क्षेत्र में एक झील का निर्माण करवाया, वह था-
(a) चंद्रगुप्त मौर्य
(b) अशोक
(c) रुद्रदामन
(d) स्कंदगुप्त
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(a)
गुजरात के गिरनार (जूनागढ़) क्षेत्र में प्रसिद्ध ‘सुदर्शन झील’ का निर्माण सर्वप्रथम चंद्रगुप्त मौर्य के काल में उनके राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने करवाया था। बाद में अशोक के शासनकाल में उनके प्रांतीय गवर्नर यवनराज तुषास्फ ने इस झील में नहरें खुदवाईं। लगभग 150 ई. में शक महाक्षत्रप रुद्रदामन ने भारी वर्षा से टूटे बाँध का पुनर्निर्माण करवाया और पाँचवीं शताब्दी ई. में गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त ने भी इसकी मरम्मत करवाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सुदर्शन झील भारत की प्राचीनतम कृत्रिम जलाशयों में से एक है। इसका विवरण रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में विस्तार से मिलता है, जो इसे सिंचाई व पेयजल दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी बताता है — यह मौर्यकालीन जल-प्रबंधन की उन्नत तकनीक का प्रमाण है।
125. निम्नलिखित अभिलेखों में से किसमें अशोक का अभिलेख भी पाया गया है?
(a) महाक्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख
(b) गौतमीपुत्र सातकर्णी से संबंधित नासिक प्रशस्ति
(c) खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख
(d) उपर्युक्त में से किसी में नहीं
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(a)
जूनागढ़ (गिरनार, गुजरात) की एक ही शिला पर कई कालखंडों के अभिलेख उत्कीर्ण हैं। इस शिला पर अशोक के 14 शिलालेखों के साथ-साथ रुद्रदामन (लगभग 150 ई.) और स्कंदगुप्त (लगभग 457-58 ई.) के अभिलेख भी मिलते हैं। 1822 ई. में कर्नल टाड ने इस शिलालेख को सर्वप्रथम खोजा था। रुद्रदामन का यह अभिलेख शुद्ध संस्कृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अशोक के गिरनार शिलालेख को सबसे पहले 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा और ब्राह्मी लिपि का सफलतापूर्वक अर्थ निकाला — यह उपलब्धि भारतीय पुरालेख विज्ञान (Epigraphy) की आधारशिला बनी। गिरनार का यह स्थल UNESCO की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है।
126. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?
1. लोथल – एनसिएंट डाकयार्ड
2.सारनाथ – फर्स्ट सरमन ऑफ बुद्ध
3.राजगिरि – लॉयन कैपिटल ऑफ अशोक
4. नालंदा – ग्रेट सीट ऑफ बुद्धिस्ट लर्निंग
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए –
(a) 1, 2, 3, 4
(b) 3 तथा 4
(c) 1, 2 तथा 4
(d) 1 तथा 2
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(c)
युग्म 1 (लोथल – एनसिएंट डाकयार्ड), युग्म 2 (सारनाथ – फर्स्ट सरमन ऑफ बुद्ध) और युग्म 4 (नालंदा – ग्रेट सीट ऑफ बुद्धिस्ट लर्निंग) — तीनों सही हैं। युग्म 3 गलत है क्योंकि ‘लॉयन कैपिटल ऑफ अशोक’ (अशोक का सिंह स्तंभशीर्ष) राजगिरि में नहीं, बल्कि सारनाथ में मिला है, जो वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय चिह्न है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लोथल (गुजरात) में मिला डॉकयार्ड विश्व का प्राचीनतम ज्ञात बंदरगाह माना जाता है, जो लगभग 2400 ई.पू. का है — यह सिंधु सभ्यता के समुद्री व्यापार की उन्नत दशा को दर्शाता है। सारनाथ का अशोक स्तंभ जहाँ बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था — इस स्थल को ‘ऋषिपत्तन’ या ‘मृगदाव’ भी कहा जाता था।

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