भारत शासन अधिनियम, 1858 : परिचय
➣ भारत शासन अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858), जिसे भारत के बेहतर शासन हेतु अधिनियम भी कहा जाता है, ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था।
➣ इसके द्वारा भारत में लगभग एक शताब्दी पुराने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का औपचारिक अंत कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
➣ यह अधिनियम मुख्यतः 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की शासन-व्यवस्था में किए गए व्यापक पुनर्गठन का परिणाम था।
➣ इसके बाद भारत के शासन की जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार के एक नए पद भारत सचिव को सौंप दी गई, जिसकी सहायता के लिए भारत परिषद (Council of India) की स्थापना की गई।
➣ इस प्रकार इस अधिनियम ने भारत की शासन-व्यवस्था में कंपनी शासन से क्राउन शासन में संक्रमण को औपचारिक रूप दिया – यह ब्रिटिश भारत के संवैधानिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था, जिसकी नींव पर 1858 से 1947 तक की संपूर्ण औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हुई। इसीलिए यह अधिनियम आधुनिक भारत के संवैधानिक विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत शासन अधिनियम, 1858 की पृष्ठभूमि
1857 का विद्रोह – तात्कालिक कारण
➣ 10 मई, 1857 को मेरठ में भारतीय सिपाहियों द्वारा शुरू हुआ विद्रोह शीघ्र ही दिल्ली सहित उत्तर भारत के विस्तृत भाग में फैल गया। इसे स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें सैनिकों के साथ-साथ किसान, कारीगर, अपदस्थ शासक तथा आम नागरिक भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।
➣ यद्यपि विद्रोह को अंततः ब्रिटिश सेना द्वारा दबा दिया गया, परंतु इसने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया – ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर शासन करने की नैतिक तथा प्रशासनिक वैधता खो दी थी।
➣ विद्रोह के विशाल पैमाने ने ब्रिटिश क्राउन तथा संसद को यह स्वीकार करने पर विवश कर दिया कि भारत के शासन हेतु एक नई, अधिक प्रत्यक्ष तथा केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है।
कंपनी-शासन के प्रति बढ़ता असंतोष तथा दीर्घकालिक गिरावट
➣ 1857 का विद्रोह अकेला कारण नहीं था, बल्कि यह एक लंबी प्रक्रिया की अंतिम कड़ी था। रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 से ही ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी की सत्ता पर क्रमिक नियंत्रण बढ़ाया जाता रहा था – पिट्स इंडिया एक्ट (1784), चार्टर एक्ट 1793, 1813 तथा 1833 – इन सभी अधिनियमों ने चरण-दर-चरण कंपनी की स्वतंत्र शक्ति को सीमित करते हुए उसे ब्रिटिश सरकार के अधीन करते जाना जारी रखा।
➣ चार्टर एक्ट, 1833 तक आते-आते कंपनी अपने व्यापारिक अधिकार लगभग पूर्णतः खो चुकी थी और मुख्यतः एक प्रशासनिक एजेंसी मात्र रह गई थी।
➣ इसके साथ ही कंपनी की विस्तारवादी नीतियों – विशेषकर लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति – ने अनेक भारतीय शासक परिवारों, जमींदारों तथा सैनिकों को कंपनी के विरुद्ध कर दिया था।
➣ 19वीं शताब्दी के मध्य तक यह धारणा मजबूत हो चुकी थी कि मूलतः एक व्यापारिक संस्था रही कंपनी भारत जैसे विशाल साम्राज्य का प्रभावी शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं रह गई है।
➣ इस प्रकार दीर्घकालिक संसदीय नियंत्रण, प्रशासनिक आलोचना तथा देशी नीतियों के प्रति असंतोष – इन सबने मिलकर 1857 के पश्चात संसद के लिए भारत के शासन को पूर्ण रूप से अपने हाथ में लेने का निर्णय अपेक्षाकृत सहज बना दिया। 1858 का अधिनियम इसी क्रमिक प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति था।
ब्रिटिश संसद में विधायी प्रक्रिया
➣ भारत के शासन को कंपनी से लेकर सीधे क्राउन को सौंपने का प्रस्ताव सर्वप्रथम तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड पामर्स्टन द्वारा रखा गया था।
➣ ब्रिटेन में राजनीतिक परिवर्तन तथा पामर्स्टन के त्यागपत्र के पश्चात, एडवर्ड स्टेनली (बाद में लॉर्ड डर्बी के मंत्रिमंडल में) ने संशोधित विधेयक को पुनः संसद में प्रस्तुत किया, जिसका शीर्षक An Act for the Better Government of India रखा गया।
➣ यह विधेयक ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया और 2 अगस्त, 1858 को इसे राजकीय स्वीकृति प्राप्त हुई। इसी के साथ कंपनी के शासन का औपचारिक एवं कानूनी अंत हो गया तथा एडवर्ड स्टेनली भारत के प्रथम भारत सचिव बने।
| 1857 का विद्रोह प्रारंभ | 10 मई, 1857 (मेरठ से) |
| भारत शासन अधिनियम, 1858 | राजकीय स्वीकृति 2 अगस्त, 1858 |
| मूल प्रस्तावक | लॉर्ड पामर्स्टन |
| संशोधित विधेयक प्रस्तुतकर्ता व प्रथम भारत सचिव | एडवर्ड स्टेनली |
| पृष्ठभूमि | 1857 का विद्रोह + 1773 से जारी क्रमिक संसदीय नियंत्रण + हड़प नीति जैसी नीतियों के प्रति असंतोष |
| प्रभाव | ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त, भारत पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन (ब्रिटिश राज) स्थापित |
भारत शासन अधिनियम, 1858 के प्रमुख प्रावधान
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति एवं क्राउन का प्रत्यक्ष शासन
➣ अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत था। 1600 में एक व्यापारिक संस्था के रूप में स्थापित कंपनी लगभग ढाई शताब्दियों बाद भारत की राजनीतिक सत्ता से पूरी तरह अलग कर दी गई और उसका राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया। भारत के क्षेत्र एवं शासनाधिकार अब ब्रिटिश क्राउन के नाम पर संचालित होने लगे।
➣ इससे पहले भारत का प्रशासन औपचारिक रूप से कंपनी के माध्यम से चलता था, जबकि ब्रिटिश सरकार बोर्ड ऑफ कंट्रोल के माध्यम से उस पर निगरानी रखती थी। 1858 के अधिनियम ने इस दोहरी शासन-व्यवस्था को पूर्णतः समाप्त कर भारत के शासन की जिम्मेदारी सीधे ब्रिटिश सरकार के हाथों में सौंप दी।
➣ कंपनी की समस्त संपत्ति, अधिकार, दायित्व तथा उससे संबंधित सभी संधियां व अनुबंध स्वतः ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित हो गए। कंपनी के पूर्व ऋणों तथा वित्तीय दायित्वों का उत्तरदायित्व भी नई क्राउन-व्यवस्था ने अपने ऊपर ले लिया, ताकि सत्ता-हस्तांतरण की प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी अथवा वित्तीय अनिश्चितता न रहे।
➣ हालांकि इस परिवर्तन के साथ भारत में तत्काल कोई लोकतांत्रिक या प्रतिनिधि शासन स्थापित नहीं हुआ। प्रशासन अब भी उन्हीं ब्रिटिश अधिकारियों के माध्यम से संचालित होता रहा, लेकिन अब उनकी सर्वोच्च संवैधानिक सत्ता कंपनी के बजाय ब्रिटिश क्राउन से प्राप्त होती थी।
➣ इसी कारण अनेक इतिहासकार इस परिवर्तन को केवल मालिक का परिवर्तन कहकर इसकी सीमाओं की ओर भी संकेत करते हैं (विस्तार हेतु आगे सीमाएँ अनुभाग देखें)।
➣ इस प्रकार 1858 से भारत के प्रशासनिक इतिहास में एक बिल्कुल नया अध्याय आरंभ हुआ, जिसमें कंपनी के व्यापारिक हितों तथा शासकीय दायित्वों के बीच व्याप्त पुरानी अस्पष्टता समाप्त होकर भारत का शासन पूर्ण रूप से एक संप्रभु राजनीतिक सत्ता – ब्रिटिश क्राउन – के अधीन आ गया।
भारत सचिव एवं भारत परिषद की स्थापना
➣ अधिनियम ने कंपनी की पुरानी बोर्ड ऑफ कंट्रोल तथा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की द्वैध व्यवस्था को समाप्त करके भारत के शासन पर ब्रिटेन में नियंत्रण रखने के लिए एक नया, एकल पद – भारत सचिव – सृजित किया।
➣ भारत सचिव ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था और उसे कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कंट्रोल दोनों की पूर्व शक्तियाँ प्राप्त हुईं। वह ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था तथा भारत सरकार और ब्रिटेन के बीच संपर्क का प्रमुख माध्यम भी बना।
➣ भारत सचिव की सहायता के लिए भारत परिषद की स्थापना की गई, जिसमें कुल 15 सदस्य रखे गए – इनमें से 7 सदस्य ईस्ट इंडिया कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा निर्वाचित तथा 8 सदस्य ब्रिटिश क्राउन द्वारा नियुक्त किए गए।
➣ यह सुनिश्चित करने के लिए कि परिषद् में भारतीय प्रशासन का व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोग रहें, अधिनियम में प्रावधान किया गया कि कम-से-कम 9 सदस्य ऐसे हों जिन्होंने भारत में कम-से-कम 10 वर्ष सेवा/निवास किया हो और नियुक्ति के समय भारत से लगातार 10 वर्ष से अधिक समय से बाहर न रहे हों।
➣ ध्यान देने योग्य है कि लंदन में बैठने वाले इन सभी सदस्यों का वेतन भी भारत के ही राजस्व से दिया जाता था, न कि ब्रिटिश राजकोष से – यह उसी व्यावहारिक आर्थिक भार का प्रारंभिक उदाहरण था, जिसकी विस्तृत चर्चा आगे बिंदु 4 में की गई है।
➣ भारत परिषद मुख्यतः एक सलाहकारी संस्था थी। भारत सचिव स्वयं परिषद् का अध्यक्ष होता था और उसे मतदान का तथा मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत देने का अधिकार प्राप्त था।
➣ सामान्य मामलों में अंतिम निर्णयकारी शक्ति भारत सचिव के पास ही केंद्रित थी, तथा वह परिषद् की राय से असहमत होने पर भी अपने निर्णय के कारण दर्ज कर आगे बढ़ सकता था। इसके अतिरिक्त, आपातकालीन या गोपनीय मामलों में भारत सचिव को परिषद् से परामर्श किए बिना ही सीधे गुप्त निर्देश भेजने की विशेष शक्ति भी प्राप्त थी।
➣ फिर भी परिषद् की शक्ति पूर्णतः औपचारिक नहीं थी – भारत के राजस्व के विनियोजन एवं व्यय से जुड़े मामलों में परिषद् के बहुमत की सहमति आवश्यक होती थी, और इस विशिष्ट क्षेत्र में भारत सचिव परिषद् के निर्णय को एकतरफा नहीं बदल सकता था। परिषद् की बैठकें नियमित रूप से (सामान्यतः सप्ताह में एक से दो बार) आयोजित होती थीं।
➣ इस प्रकार 1858 की नई व्यवस्था में भारत सचिव वास्तविक केंद्रीय प्राधिकारी बन गया, जबकि भारत परिषद् मुख्यतः सहायक व सलाहकारी संस्था के रूप में कार्यरत रही – सिवाय राजस्व-व्यय जैसे कुछ विशिष्ट मामलों के, जहाँ उसकी सहमति बाध्यकारी थी।
▪ समाप्त – बोर्ड ऑफ कंट्रोल एवं कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (द्वैध शासन व्यवस्था)
▪ नया पद – भारत सचिव, प्रथम भारत सचिव – एडवर्ड स्टेनली (लॉर्ड स्टेनली)
▪ भारत परिषद – कुल 15 सदस्य (7 कंपनी द्वारा निर्वाचित + 8 क्राउन द्वारा नियुक्त)
▪ कम-से-कम 9 सदस्यों को भारत में 10 वर्ष की सेवा/निवास का अनुभव आवश्यक
▪ परिषद् का अध्यक्ष – भारत सचिव (मत व निर्णायक मत सहित)। सामान्यतः सलाहकारी भूमिका
▪ अपवाद – राजस्व-व्यय संबंधी मामलों में परिषद् के बहुमत की सहमति आवश्यक
▪ विशेष शक्ति – आपातकाल/गोपनीय मामलों में भारत सचिव द्वारा परिषद् से परामर्श के बिना निर्देश भेजना
गवर्नर-जनरल का वायसराय में रूपांतरण
➣ भारत के शासन की सर्वोच्च सत्ता क्राउन के अधीन आने के साथ भारत में कार्यरत गवर्नर-जनरल की संवैधानिक स्थिति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
➣ वह अब कंपनी का प्रतिनिधि न रहकर ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि बन गया और उसे सामान्यतः वायसराय कहा जाने लगा। ध्यान रहे कि गवर्नर-जनरल का पद 1858 में नया नहीं बनाया गया – यह पद पहले से अस्तित्व में था। 1858 के बाद इसमें केवल क्राउन-प्रतिनिधित्व का नया आयाम जुड़ा।
➣ वायसराय भारत में ब्रिटिश क्राउन के अधिकार व सत्ता का प्रतिनिधित्व करता था तथा भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी था।
➣ गवर्नर-जनरल तथा वायसराय – ये दोनों उपाधियां अब एक ही व्यक्ति में निहित हो गईं। गवर्नर-जनरल पदनाम मुख्यतः उसकी घरेलू प्रशासनिक भूमिका (भारत सरकार का प्रमुख) को दर्शाता था, जबकि वायसराय उपाधि क्राउन के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में उसकी भूमिका को इंगित करती थी।
➣ इस परिवर्तन का व्यावहारिक महत्व यह था कि अब गवर्नर-जनरल केवल कंपनी की ओर से नियुक्त एक प्रशासनिक अधिकारी मात्र नहीं रहा, बल्कि वह स्वयं महारानी की प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा एवं संप्रभुता का प्रतीक बन गया। इससे भारत में गवर्नर-जनरल के पद की औपचारिक गरिमा तथा राजनीतिक प्रतिष्ठा पहले की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई।
➣ लॉर्ड कैनिंग इस परिवर्तन के समय गवर्नर-जनरल थे, इसलिए उन्हें भारत का अंतिम गवर्नर-जनरल तथा प्रथम वायसराय माना जाता है। उन्हीं के कार्यकाल में 1 नवंबर, 1858 को इलाहाबाद के ऐतिहासिक दरबार में महारानी विक्टोरिया की घोषणा भी पढ़ी गई।
भारत के राजस्व एवं वित्त पर नियंत्रण
➣ भारत के प्रशासन के साथ-साथ उसके राजस्व एवं वित्तीय मामलों पर भी ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
➣ भारत से प्राप्त आय अब कंपनी के नियंत्रण में न रहकर क्राउन के अधीन प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बन गई, और व्यय, ऋण तथा वित्तीय लेन-देन पर अंतिम नियंत्रण भारत सचिव के पास केंद्रित हो गया (जिसमें, जैसा ऊपर बताया गया, राजस्व-व्यय संबंधी निर्णयों पर भारत परिषद् की सहमति भी आवश्यक थी)।
➣ अधिनियम ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का राजस्व मूलतः भारत के ही प्रशासन, सेना, लोक निर्माण तथा अन्य सरकारी आवश्यकताओं पर व्यय किया जाना था – अर्थात भारतीय राजस्व को ब्रिटेन के सामान्य राजकोष में मिलाया नहीं जाना था, बल्कि इसका पृथक लेखा-जोखा रखा जाता था।
➣ फिर भी इस राजस्व के उपयोग की अंतिम स्वीकृति व निगरानी की शक्ति लंदन में बैठे भारत सचिव के पास ही केंद्रित रही, जिससे भारत की अपनी आय पर भी भारत में स्थित किसी स्वतंत्र संस्था का कोई निर्णायक नियंत्रण नहीं रह गया।
➣ इस व्यवस्था का दूरगामी महत्व यह था कि इसने भारत के वित्तीय प्रशासन को कंपनी की अपेक्षाकृत स्वायत्त वित्तीय प्रणाली से निकालकर ब्रिटिश संसदीय एवं मंत्रिमंडलीय जवाबदेही के दायरे में ला दिया –
➣ यद्यपि यह जवाबदेही औपचारिक रूप से केवल ब्रिटिश संसद के प्रति थी, भारतीय जनता के प्रति नहीं, क्योंकि उस समय भारत में कोई ऐसी विधायी अथवा प्रतिनिधि संस्था अस्तित्व में ही नहीं थी जिसके समक्ष भारत सचिव को उत्तरदायी ठहराया जा सके।
➣ परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है – जवाबदेही औपचारिक रूप से ब्रिटिश संसद के प्रति थी, जबकि वास्तविक आर्थिक भार व्यावहारिक रूप से भारतीय जनता पर ही पड़ता था।
➣ भारत सचिव, भारत परिषद्, इंडिया ऑफिस के प्रशासनिक व्यय, लेखा-परीक्षक का वेतन, पेंशन तथा सेना पर होने वाला व्यय – यह सब कुछ ब्रिटिश करदाताओं के धन से नहीं, बल्कि भारत के ही राजस्व से वहन किया जाता था।
इस प्रकार निर्णय लेने की शक्ति लंदन में केंद्रित थी, जबकि उसका आर्थिक बोझ भारत में उठाया जाता था – अर्थात निर्णय बिना उत्तरदायित्व, व्यय बिना प्रतिनिधित्व जैसी स्थिति उत्पन्न हुई।➣ ब्रिटेन में होने वाले इन्हीं भारत-संबंधी व्ययों को आगे चलकर होम चार्जेज के नाम से जाना गया, जिसमें इंडिया ऑफिस का प्रशासनिक व्यय, सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, ऋणों पर ब्याज, रेलवे कंपनियों को दी जाने वाली गारंटीड-रिटर्न राशि तथा सेना पर होने वाला व्यय शामिल था – ये सभी मदें भारतीय राजस्व से ही चुकाई जाती थीं।
➣ प्रख्यात राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री दादाभाई नौरोजी ने आगे चलकर अपने धन-निष्कासन सिद्धांत में इसी व्यवस्था की गहन आलोचना की, यह तर्क देते हुए कि भारत का धन भारत के विकास पर व्यय होने के बजाय ब्रिटेन के हित में बाहर जा रहा था, जबकि उस व्यय पर निर्णय लेने का अधिकार भारतीयों के पास नहीं, बल्कि पूर्णतः लंदन स्थित भारत सचिव के पास था।
कंपनी की सेना का क्राउन को हस्तांतरण
➣ कंपनी के शासन की समाप्ति के साथ उसकी सैन्य व्यवस्था भी ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दी गई। कंपनी के अधीन कार्यरत भारतीय एवं यूरोपीय सैनिकों तथा अधिकारियों को क्राउन की सेवा में स्थानांतरित कर दिया गया।
➣ इस परिवर्तन का एक प्रमुख कारण 1857 के विद्रोह का अनुभव भी था, जिसमें कंपनी की सेना के बड़े हिस्से ने भाग लिया था – इसने भारतीय सेना के पुनर्गठन तथा उस पर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण की आवश्यकता को रेखांकित किया।
➣ सेना के हस्तांतरण के समय कंपनी के यूरोपीय सैनिकों के एक भाग ने यह तर्क देकर विरोध भी किया कि उनकी सेवा-शर्तें कंपनी के साथ हुए अनुबंध पर आधारित थीं, क्राउन के साथ नहीं (जिसे इतिहास में श्वेत विद्रोह अथवा व्हाइट म्यूटिनी के एक प्रारंभिक व सीमित प्रसंग के रूप में भी देखा जाता है, हालांकि यह 1883 के इल्बर्ट बिल वाली प्रसिद्ध घटना से भिन्न था)। सरकार ने उन्हें उनकी पूर्व सुविधाओं के समान लाभ देकर इस असंतोष को शांत किया।
➣ सेना के पुनर्गठन हेतु गठित पील आयोग (1859) ने अपनी सिफारिशों में यूरोपीय एवं भारतीय सैनिकों के अनुपात को बंगाल सेना में 1:2 तथा मद्रास एवं बंबई सेनाओं में लगभग 2:5 रखने का सुझाव दिया, तोपखाने (आर्टिलरी) को
➣ पूर्णतः यूरोपीय अधिकारियों के नियंत्रण में रखने की सिफारिश की, तथा भर्ती में युद्धप्रिय जातियो” (जैसे सिख, गोरखा, पंजाबी मुस्लिम) को प्राथमिकता देने तथा किसी एक क्षेत्र/समुदाय के सैनिकों को एक ही टुकड़ी में एकत्रित न करने (फूट डालो और राज करो की सैन्य नीति) की नीति अपनाई।
1857 के विद्रोह के बाद सेना-पुनर्गठन हेतु पील आयोग (1859) गठित किया गया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर यूरोपीय-भारतीय सैनिकों का अनुपात काफी बढ़ाया गया, आर्टिलरी को यूरोपीय नियंत्रण में रखा गया, तथा मार्शल रेस सिद्धांत एवं मिश्रित भर्ती नीति (विभिन्न जातियों/समुदायों को एक टुकड़ी में मिलाना) अपनाई गई, ताकि भविष्य में इस प्रकार का संगठित विद्रोह पुनः न हो सके।
➣ यहाँ भी वही व्यावहारिक आर्थिक पहलू लागू होता था जिसकी चर्चा बिंदु 4 में की गई – यूरोपीय सैनिकों की बढ़ी हुई संख्या तथा उनके ऊंचे वेतन-भत्तों का समस्त व्यय भारतीय राजस्व से ही वहन किया जाता था, जबकि सेना के पुनर्गठन तथा उसके आकार-निर्धारण का निर्णय पूर्णतः लंदन में भारत सचिव के स्तर पर लिया जाता था। सैन्य व्यय, आगे चलकर होम चार्जेज की सबसे बड़ी मदों में से एक बना।
सरकारी नियुक्तियों एवं सिविल सेवा पर नियंत्रण
➣ कंपनी के संरक्षण-आधारित नियुक्ति-अधिकारों को समाप्त कर उन्हें क्राउन तथा भारत सचिव की नई व्यवस्था के अधीन कर दिया गया।
ध्यान देने योग्य है कि 1853 में शुरू हुई सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था 1858 के अधिनियम से पहले ही स्थापित हो चुकी थी – इसे समाप्त नहीं किया गया, बल्कि 1858 के अधिनियम ने उसके संचालन एवं नियम-निर्धारण का अधिकार भारत सचिव-इन-काउंसिल को सौंप दिया। सैन्य/नौसैनिक कैडेटशिप जैसी कुछ अन्य नियुक्तियाँ भी क्राउन से जोड़ दी गईं।➣ व्यवहार में यह प्रतियोगी परीक्षा तब भी केवल इंग्लैंड (लंदन) में ही आयोजित होती थी और उसमें ग्रीक-लैटिन जैसे पश्चिमी शास्त्रीय विषयों का ज्ञान अनिवार्य था, जिससे भारतीय उम्मीदवारों के लिए इसमें भाग लेना अत्यंत कठिन तथा महंगा था।
फिर भी यह व्यवस्था सैद्धांतिक रूप से किसी भी ब्रिटिश प्रजा – चाहे वह भारतीय हो या यूरोपीय – के लिए खुली थी, जो पहले पूर्णतः संरक्षण/सिफारिश पर आधारित नियुक्ति-प्रणाली से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।इसी खुली प्रतियोगी परीक्षा-प्रणाली के अंतर्गत सत्येंद्रनाथ टैगोर (कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई) 1863 में परीक्षा उत्तीर्ण कर पहले भारतीय सिविल सेवा (ICS) अधिकारी बने – उन्हें बंबई प्रेसीडेंसी में नियुक्ति मिली। यह भारतीयों की प्रशासनिक सेवा में सहभागिता की दिशा में पहला बड़ा प्रतीकात्मक कदम माना जाता है, यद्यपि इसके बाद भी दशकों तक भारतीय उम्मीदवारों की संख्या नगण्य ही रही।
महारानी विक्टोरिया की घोषणा, 1858 और भारतीयों के प्रति नई नीति
➣ भारत का शासन क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद 1 नवंबर, 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा जारी की गई, जिसे लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद के एक भव्य दरबार में पढ़कर सुनाया। यह घोषणा क्राउन शासन की नई नीति की सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख आश्वासन दिए गए –
➣ देशी राज्यों के प्रति नीति: भारतीय शासकों के साथ कंपनी द्वारा की गई संधियों व समझौतों का सम्मान करने, उनके क्षेत्रों के अनावश्यक विस्तार की नीति न अपनाने, तथा उनके अधिकार, सम्मान एवं प्रतिष्ठा का सम्मान करने का आश्वासन दिया गया।
➣ इसी नीति के अनुरूप विवादास्पद हड़प नीति को व्यावहारिक रूप से त्याग दिया गया और देशी शासकों को उत्तराधिकार हेतु दत्तक (गोद लिए) पुत्र स्वीकार करने का अधिकार बहाल किया गया।
➣ धार्मिक नीति: भारतीयों के धार्मिक विश्वासों, रीति-रिवाजों तथा सामाजिक प्रथाओं में हस्तक्षेप न करने का स्पष्ट आश्वासन दिया गया।
➣ सरकारी सेवा में समानता: भारतीयों को उनकी जाति, धर्म या वंश के आधार पर सरकारी सेवा से अनुचित रूप से वंचित न करने तथा योग्यता के आधार पर अवसर देने का सिद्धांत व्यक्त किया गया।
➣ घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रजा के प्रति न्याय, शांति और कल्याण की नीति अपनाने की बात कही, जिसका उद्देश्य 1857 के विद्रोह के बाद भारतीयों में विश्वास पैदा करना तथा नई क्राउन शासन-व्यवस्था को अधिक स्वीकार्य बनाना था।
➣ महत्वपूर्ण है कि महारानी की घोषणा और भारत शासन अधिनियम, 1858 एक ही दस्तावेज़ नहीं हैं – अधिनियम संसद द्वारा पारित कानून था, जबकि घोषणा उसके बाद जारी नीतिगत वक्तव्य थी (विस्तार हेतु आगे “भ्रम बिंदु” देखें)।
➣ इस घोषणा का दीर्घकालिक ऐतिहासिक महत्व यह था कि इसने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन को भी एक नैतिक/संवैधानिक आधार प्रदान किया – भारतीय नेता बाद के दशकों में बार-बार इसी घोषणा में दिए गए समानता और योग्यता-आधारित सेवा के वादों का हवाला देकर सरकार से उनके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करते रहे (उदाहरणस्वरूप, आगे इल्बर्ट बिल विवाद तथा कांग्रेस की प्रारंभिक मांगें इसी संदर्भ से जुड़ी थीं)।
| महारानी की घोषणा | 1 नवंबर, 1858, इलाहाबाद दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ी गई |
| देशी राज्यों की नीति | संधियों-अधिकारों का सम्मान + हड़प नीति का व्यावहारिक अंत |
| धार्मिक नीति | गैर-हस्तक्षेप का आश्वासन |
| सरकारी सेवा | जाति/धर्म से निरपेक्ष, योग्यता आधारित अवसर |
आगे के संवैधानिक विकास की आधारभूमि
➣ 1858 के बाद भारत में ब्रिटिश शासन सीधे क्राउन के अधीन रहा। इसके बाद भारतीय परिषद अधिनियम, 1861, भारतीय परिषद अधिनियम, 1892, मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1909, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919 और भारत शासन अधिनियम, 1935 जैसे संवैधानिक परिवर्तन इसी क्राउन शासन के ढांचे के भीतर विकसित हुए।
➣ इस प्रकार 1858 का अधिनियम केवल कंपनी शासन को समाप्त करने वाला अधिनियम नहीं था, बल्कि इसने भारत में ब्रिटिश शासन की एक नई संवैधानिक संरचना स्थापित की, जो 1858 से 1947 तक विकसित होती रही।
कंपनी शासन बनाम क्राउन शासन – तुलनात्मक तालिका
| पहलू | 1858 से पहले (कंपनी शासन) | 1858 के बाद (क्राउन शासन) |
|---|---|---|
| सर्वोच्च सत्ता | ईस्ट इंडिया कंपनी (न्यास के रूप में) | ब्रिटिश क्राउन (सीधे) |
| ब्रिटेन में नियंत्रक संस्था | बोर्ड ऑफ कंट्रोल + कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (द्वैध व्यवस्था) | भारत सचिव (एकल, मंत्रिमंडलीय पद) |
| सलाहकारी निकाय | कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स/प्रोपराइटर्स | भारत परिषद (15 सदस्य, मुख्यतः सलाहकारी) |
| भारत में प्रमुख अधिकारी | गवर्नर-जनरल (कंपनी का प्रतिनिधि) | गवर्नर-जनरल-सह-वायसराय (क्राउन का प्रतिनिधि) |
| सेना | कंपनी की पृथक सेना | क्राउन की सेना में विलय |
| देशी राज्यों की नीति | विस्तारवादी (हड़प नीति आदि) | अपेक्षाकृत संरक्षणवादी (संधियों का सम्मान) |
| वैधानिक स्रोत | चार्टर एक्ट्स (व्यापारिक विशेषाधिकार आधारित) | संसदीय अधिनियम (प्रत्यक्ष राजकीय शासन) |
भारत शासन अधिनियम, 1858 की सीमाएँ/कमियाँ
➣ अधिनियम ने केवल शासन का स्वामी (Master) बदला, शासन-व्यवस्था की बुनियादी संरचना नहीं। भारत में कार्यरत वही अधिकारी, वही कानून और वही प्रशासनिक तंत्र क्राउन के अधीन आगे भी जारी रहा – इसीलिए आलोचकों ने इसे मालिक बदला, व्यवस्था नहीं कहा।
➣ इस अधिनियम ने भारतीयों को शासन में कोई वास्तविक राजनीतिक भागीदारी या प्रतिनिधित्व नहीं दिया। यह पूर्णतः निरंकुश शाही नियंत्रण के सिद्धांत पर आधारित था, जिसमें भारतीय जनता की कोई सहभागिता नहीं थी।
➣ शासन-सत्ता लंदन में अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई, जिससे भारत में स्थानीय स्वायत्तता या शीघ्र निर्णय-क्षमता सीमित रही।
➣ महारानी की घोषणा में देशी राज्यों के अनावश्यक विस्तार को न अपनाने का जो आश्वासन दिया गया था, वह व्यवहार में पूर्णतः निभाया नहीं गया – इसके बाद भी ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न तरीकों से अपने क्षेत्रीय एवं सामरिक प्रभाव का विस्तार जारी रखा।
➣ अधिनियम ने 1857 के विद्रोह के मूल आर्थिक व सामाजिक कारणों (जैसे भू-राजस्व नीति, आर्थिक शोषण) का समाधान नहीं किया, बल्कि केवल प्रशासनिक एवं संस्थागत पुनर्गठन तक ही सीमित रहा।
➣ भारत सचिव तथा भारत परिषद् की जवाबदेही औपचारिक रूप से केवल ब्रिटिश संसद के प्रति थी, जबकि इंडिया ऑफिस, भारत परिषद् के सदस्यों तथा सेना पर होने वाला संपूर्ण वास्तविक आर्थिक व्यय भारतीय राजस्व से वहन किया जाता था। इस प्रकार निर्णय-शक्ति और आर्थिक भार के बीच स्पष्ट असंतुलन बना रहा – भारतीय जनता, जिस पर यह भार सबसे अधिक पड़ता था, उसकी इन खर्चों को निर्धारित करने में कोई भूमिका नहीं थी। आगे चलकर यही असंतुलन दादाभाई नौरोजी के धन-निष्कासन सिद्धांत जैसी राष्ट्रवादी आर्थिक आलोचनाओं का प्रमुख आधार बना।
भारत शासन अधिनियम, 1858 का महत्व
➣ भारत शासन अधिनियम, 1858 भारत के संवैधानिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत करके भारत में ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष शासन की स्थापना की और भारत के प्रशासनिक-संवैधानिक इतिहास में एक नए चरण की शुरुआत की।
➣ इसने ब्रिटेन में बोर्ड ऑफ कंट्रोल तथा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की पुरानी द्वैध व्यवस्था को समाप्त कर भारत सचिव के नए, स्पष्ट एवं जवाबदेह पद के अंतर्गत भारत के शासन को एक केंद्रीकृत ढांचे में लाया।
➣ इसने आगे के संवैधानिक सुधारों – भारतीय परिषद अधिनियम 1861/1892, मॉर्ले-मिंटो सुधार, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार तथा भारत शासन अधिनियम 1935 – के लिए वह क्राउन-आधारित संवैधानिक ढांचा प्रदान किया, जिसके भीतर 1947 तक भारत का शासन संचालित होता रहा।
भारत शासन अधिनियम, 1858 – भ्रम बिंदु
➣ अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त किया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया – इसके बाद ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन शुरू हुआ।
➣ 1857 का विद्रोह और 1858 का अधिनियम एक ही घटना नहीं हैं – पहले विद्रोह हुआ, उसके बाद कंपनी शासन समाप्त करने के लिए अधिनियम पारित किया गया।
➣ भारत सचिव को गवर्नर-जनरल नहीं समझना चाहिए। भारत सचिव ब्रिटेन में बैठकर भारत के प्रशासन पर नियंत्रण रखता था, जबकि गवर्नर-जनरल/वायसराय भारत में क्राउन का प्रतिनिधि था।
➣ यह न समझें कि भारत सचिव की संसद के प्रति जवाबदेही का अर्थ यह है कि वित्तीय भार भी ब्रिटेन पर पड़ता था। जवाबदेही केवल औपचारिक रूप से ब्रिटिश संसद के प्रति थी। वास्तविक आर्थिक भार – इंडिया ऑफिस, भारत परिषद् व सेना का व्यय (होम चार्जेज) – व्यावहारिक रूप से भारतीय राजस्व से ही वहन किया जाता था।
➣ भारत परिषद कोई स्वतंत्र विधायिका नहीं थी – यह मुख्यतः भारत सचिव को सलाह देने वाली संस्था थी, यद्यपि राजस्व-व्यय संबंधी मामलों में उसकी सहमति बाध्यकारी थी।
➣ गवर्नर-जनरल का पद 1858 में नया नहीं बनाया गया। यह पहले से अस्तित्व में था। 1858 के बाद वह ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि भी बना और वायसराय कहलाने लगा। लॉर्ड कैनिंग – अंतिम गवर्नर-जनरल और प्रथम वायसराय – दोनों उपाधियों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं समझना चाहिए।
➣ महारानी की घोषणा (1 नवंबर, 1858) और भारत शासन अधिनियम, 1858 (2 अगस्त, 1858) एक ही दस्तावेज़ नहीं हैं। अधिनियम संसद द्वारा पारित कानून था, जबकि घोषणा उसके बाद जारी नीतिगत वक्तव्य था। घोषणा में वर्णित सिद्धांत (धार्मिक गैर-हस्तक्षेप, हड़प नीति का अंत, देशी राज्यों की संधियों का सम्मान) अधिनियम की प्रत्यक्ष धाराएँ नहीं थे।
➣ सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता 1853 में ही शुरू हो चुकी थी। इसे 1858 के अधिनियम की नई शुरुआत नहीं मानना चाहिए। 1858 के बाद यह व्यवस्था नई क्राउन-शासन संरचना (भारत सचिव-इन-काउंसिल) के अधीन जारी रही।
➣ 1858 में भारत को कोई स्वतंत्र या स्वशासी शासन नहीं मिला, बल्कि इसके विपरीत भारत पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन स्थापित हुआ।
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