चार्टर एक्ट (1853) : पृष्ठभूमि, प्रमुख प्रावधान, महत्त्व, सीमाएं एवं दोष

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चार्टर एक्ट, 1853 का परिचय

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित यह अधिनियम कंपनी के चार्टर से संबंधित अंतिम अधिनियम था और इसके माध्यम से कंपनी के प्रशासनिक ढांचे में ऐसे बदलाव किए गए, जिन्होंने आगे चलकर भारत के शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इसे ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम, 1853 अथवा गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1853 भी कहा जाता है (आधिकारिक उद्धरण: 16 & 17 Vict., c. 95)। यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास की उस शृंखला का अंतिम चार्टर एक्ट था, जो 1793 से आरंभ हुई थी।

➣ चार्टर एक्ट, 1853 की एक विशेषता यह थी कि इस बार कंपनी के चार्टर को पहले की तरह किसी निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया। इसके बजाय कंपनी को भारत का शासन ब्रिटिश संसद के निर्णय तक जारी रखने की अनुमति दी गई।

➣ इस अधिनियम का विशेष महत्व सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता, विधायी एवं कार्यकारी कार्यों के पृथक्करण तथा केंद्रीय विधायी परिषद के विस्तार जैसे परिवर्तनों के कारण था। इन प्रावधानों ने भारत की प्रशासनिक एवं संवैधानिक व्यवस्था को 1833 की तुलना में एक नए चरण में प्रवेश कराया।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 को कंपनी शासन के अंतिम संवैधानिक चरण का महत्वपूर्ण अधिनियम माना जाता है। इसके बाद 1858 में 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।

चार्टर एक्ट, 1853 की पृष्ठभूमि

1833 के बाद बदली परिस्थितियाँ और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

➣ चार्टर एक्ट, 1833 के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में शासन जारी रखने की अनुमति दी गई थी। लेकिन 1853 तक यह प्रश्न फिर सामने आया कि कंपनी के शासन को किस प्रकार आगे जारी रखा जाए और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था में क्या परिवर्तन किए जाएँ।

➣ इस बार परिस्थिति पहले के चार्टर अधिनियमों से अलग थी। कंपनी का व्यापारिक स्वरूप 1833 में ही समाप्त हो चुका था और वह अब मुख्यतः भारत के प्रशासन का संचालन कर रही थी। इसलिए 1853 में चर्चा का केंद्र कंपनी के व्यापारिक अधिकारों के बजाय उसकी प्रशासनिक एवं संवैधानिक व्यवस्था बन गया।

➣ 1833 के बाद ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों का विस्तार लगातार जारी रहा। नए क्षेत्रों के प्रशासन, कानून-व्यवस्था, राजस्व-वसूली तथा न्यायिक कार्यों के लिए एक अधिक संगठित एवं प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस होने लगी।

सिविल सेवा और विधायी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता

➣ 19वीं शताब्दी के मध्य तक ब्रिटेन में प्रतियोगिता और योग्यता के आधार पर सरकारी नियुक्तियों की विचारधारा मजबूत हो रही थी। भारत की उच्च सिविल सेवा में भी नियुक्ति की ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जाने लगी, जिसमें केवल कंपनी के संरक्षण के आधार पर नियुक्ति न होकर योग्यता को अधिक महत्व दिया जाए।

➣ इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1853 ने कंपनी की पुरानी संरक्षण-आधारित नियुक्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए खुली प्रतियोगिता के आधार पर सिविल सेवा में भर्ती की दिशा में कदम उठाया।

➣ भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार तथा प्रशासनिक कार्यों की बढ़ती जटिलता के कारण केंद्रीय स्तर पर कानून बनाने का कार्य भी लगातार बढ़ रहा था। गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल पर कार्यपालिका और विधायी दोनों प्रकार के कार्यों का भार था।

➣ इसलिए यह आवश्यकता महसूस की गई कि परिषद के विधायी कार्यों को अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व और स्वतंत्रता प्रदान की जाए तथा कार्यपालिका एवं विधायी कार्यों के बीच अधिक स्पष्ट अंतर स्थापित किया जाए।

चार्टर एक्ट, 1892 के प्रमुख प्रावधान

सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता की शुरुआत

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सिविल सेवाओं में नियुक्ति की पुरानी Patronage (संरक्षण) व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इससे पहले कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को कंपनी के उच्च सिविल अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार प्राप्त था और वे अपनी पसंद के व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त कर सकते थे।

➣ 1853 तक यह महसूस किया जाने लगा था कि भारत जैसे विशाल प्रशासन के लिए उच्च पदों पर नियुक्ति केवल व्यक्तिगत संरक्षण या सिफारिश के आधार पर नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को अधिक योग्य, प्रशिक्षित एवं सक्षम अधिकारियों की आवश्यकता थी। इसी विचार के आधार पर नियुक्ति-व्यवस्था में परिवर्तन किया गया।

➣ अधिनियम ने यह प्रावधान किया कि कंपनी की सिविल सेवा में नियुक्तियाँ खुली प्रतियोगिता के आधार पर की जाएँगी। इस प्रकार पहली बार कंपनी के संरक्षण-आधारित नियुक्ति अधिकार को समाप्त कर योग्यता एवं प्रतियोगिता को नियुक्ति का आधार बनाने की दिशा में कदम उठाया गया।

➣ इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा नामांकन के स्थान पर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से उम्मीदवारों का चयन किया जाना था। इससे सिविल सेवा में प्रवेश व्यक्तिगत संबंधों की अपेक्षा प्रतिभा और योग्यता पर अधिक निर्भर होने लगा।

➣ इस परिवर्तन को लागू करने के लिए मैकॉले की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा आगे चलकर सिविल सेवा परीक्षा की व्यवस्था और उसके स्वरूप पर विचार किया गया। प्रतियोगी परीक्षा की पहली व्यवस्था 1855 से प्रभावी हुई और इसके माध्यम से भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश का नया मार्ग विकसित हुआ।

➣ हालांकि प्रतियोगिता के सिद्धांत की शुरुआत 1853 में हुई, लेकिन व्यवहार में परीक्षा इंग्लैंड में आयोजित होने के कारण भारतीयों के लिए इसमें भाग लेना कठिन था। इसके बावजूद यह व्यवस्था आगे चलकर भारतीयों के लिए उच्च प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश की संवैधानिक एवं वैधानिक आधारभूमि बनी।

➣ इस प्रावधान का दीर्घकालिक महत्व बहुत अधिक था। इससे कंपनी की पुरानी Patronage व्यवस्था कमजोर हुई और सरकारी सेवा में योग्यता-आधारित भर्ती की दिशा मजबूत हुई। आगे चलकर भारतीयों ने भी इस परीक्षा में प्रवेश प्राप्त किया और उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीय प्रतिनिधित्व का मार्ग खुला।

पुरानी व्यवस्था कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का Patronage
नया सिद्धांत खुली प्रतियोगिता के आधार पर भर्ती
परिवर्तन चार्टर एक्ट, 1853
प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत 1855
परीक्षा प्रारंभ में इंग्लैंड में
प्रमुख महत्व सिविल सेवा में योग्यता-आधारित भर्ती की शुरुआत

इसी खुली प्रतियोगी परीक्षा-प्रणाली के अंतर्गत सत्येंद्रनाथ टैगोर (कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई) 1863 में परीक्षा उत्तीर्ण कर पहले भारतीय सिविल सेवा (ICS) अधिकारी बने – उन्हें बंबई प्रेसीडेंसी में नियुक्ति मिली।

विधायी परिषद का विस्तार एवं कार्यपालिका से पृथक्करण

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने भारत की केंद्रीय विधायी व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इससे पहले गवर्नर-जनरल की परिषद् मुख्यतः कार्यपालिका के रूप में कार्य करती थी और उसी परिषद् के सदस्य विधायी कार्यों में भी भाग लेते थे। प्रशासनिक कार्यों के बढ़ते विस्तार के कारण इस व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस होने लगी थी।

➣ अधिनियम द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद् के विधायी एवं कार्यकारी कार्यों को पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से अलग किया गया। इस प्रकार पहली बार गवर्नर-जनरल की कार्यकारी शक्तियों और विधायी शक्तियों को संस्थागत रूप से पृथक किया गया। विधायी कार्यों के लिए परिषद् को 6 सदस्य और जोड़कर उसकी विधायी क्षमता वाली इकाई को 6 से 12 सदस्यों तक विस्तृत किया गया।

➣ विस्तारित विधान परिषद् (Legislative Council) की संरचना इस प्रकार थी – गवर्नर-जनरल (1), गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् के 4 सदस्य, कमांडर-इन-चीफ (1), कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (1), सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश (1) (गवर्नर-जनरल द्वारा नामित), तथा बंगाल, मद्रास, बंबई एवं उत्तर-पश्चिमी प्रांतों से एक-एक प्रतिनिधि सदस्य (4) – इस प्रकार कुल 12 सदस्य। प्रांतीय प्रतिनिधि कंपनी के ऐसे सिविल सेवक होते थे, जिन्हें कम से कम 10 वर्ष की सेवा का अनुभव हो।

➣ विधान परिषद् की कार्यवाही ब्रिटिश संसद की तर्ज़ पर संचालित होती थी – सदस्य कार्यकारी परिषद् की नीतियों पर प्रश्न पूछ सकते थे और चर्चा कर सकते थे, तथा चर्चा अब लिखित के बजाय मौखिक रूप में होने लगी। इसी कारण इसे प्रायः भारत की लघु संसद’ कहा जाता है।

➣ सभी विधायी प्रस्तावों के लिए गवर्नर-जनरल की सहमति (Assent) आवश्यक थी और गवर्नर-जनरल को विधान परिषद् द्वारा पारित किसी भी विधेयक को वीटो (Veto) करने का अधिकार प्राप्त था। परंतु इसके विपरीत, गवर्नर-जनरल को यह अधिकार नहीं था कि वह परिषद् के बहुमत के विरुद्ध जाकर किसी कानून को स्वयं पारित करा सके – अर्थात कार्यकारी परिषद् के पास विधान परिषद् के विधेयक को अस्वीकार करने की शक्ति तो बनी रही, लेकिन विधान परिषद् की सहमति के बिना कानून बनाना गवर्नर-जनरल के लिए भी संभव नहीं था।

➣ इस विस्तारित परिषद में सिविल प्रशासन तथा विभिन्न प्रांतों से जुड़े अधिकारियों को शामिल किया गया। इससे केंद्रीय स्तर पर कानून बनाते समय विभिन्न क्षेत्रों की प्रशासनिक परिस्थितियों को ध्यान में रखने की संभावना बढ़ी, और भारत के केंद्रीय विधान-निर्माण में स्थानीय प्रतिनिधित्व पहली बार शामिल हुआ।

➣ हालांकि यह परिषद् आधुनिक अर्थों में पूर्णतः स्वतंत्र या निर्वाचित विधायिका नहीं थी। इसके सभी सदस्य कंपनी अथवा सरकार के अधिकारी थे, कोई भी भारतीय सदस्य इसमें शामिल नहीं था, और अंतिम सत्ता गवर्नर-जनरल तथा कार्यकारी परिषद् के पास ही बनी रही। इसलिए इसे भारत में प्रतिनिधि शासन की शुरुआत के रूप में नहीं, बल्कि विधायी संस्थाओं के क्रमिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में समझना चाहिए।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने भारत में पहली बार विधायी कार्यों को कार्यपालिका से अधिक स्पष्ट रूप से अलग करने, केंद्रीय विधायी परिषद् को विस्तृत करने तथा उसमें प्रांतीय प्रतिनिधित्व शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। आगे चलकर इसी प्रक्रिया ने भारत में विधायी संस्थाओं के विकास और प्रतिनिधित्व के विस्तार का आधार तैयार किया।

विधायी परिषद का विस्तार एवं कार्यपालिका से पृथक्करण

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने भारत की केंद्रीय विधायी व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इससे पहले गवर्नर-जनरल की परिषद् मुख्यतः कार्यपालिका के रूप में कार्य करती थी और उसी परिषद् के सदस्य विधायी कार्यों में भी भाग लेते थे। अधिनियम ने इन दोनों कार्यों को पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से अलग किया और विधायी कार्यों के लिए परिषद् में 6 अतिरिक्त सदस्य जोड़कर उसकी संख्या 6 से 12 सदस्यों तक बढ़ाई।

➣ विस्तारित विधान परिषद् की संरचना इस प्रकार थी – गवर्नर-जनरल (1), गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् के 4 सदस्य, कमांडर-इन-चीफ (1), कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (1), सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश (1) (गवर्नर-जनरल द्वारा नामित), तथा बंगाल, मद्रास, बंबई एवं उत्तर-पश्चिमी प्रांतों से एक-एक प्रतिनिधि सदस्य (4) – इस प्रकार कुल 12 सदस्य। प्रांतीय प्रतिनिधि कंपनी के ऐसे सिविल सेवक होते थे, जिन्हें कम से कम 10 वर्ष की सेवा का अनुभव हो।

➣ विधान परिषद् की कार्यवाही पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित रूप से होने लगी। सदस्य कार्यकारी परिषद् की नीतियों पर प्रश्न पूछ सकते थे और चर्चा कर सकते थे, तथा विधायी चर्चा अब लिखित के बजाय मौखिक रूप में होने लगी।

इसी कारण इसे प्रायः भारत की लघु संसद कहा जाता है।

➣ सभी विधायी प्रस्तावों के लिए गवर्नर-जनरल की सहमति आवश्यक थी और गवर्नर-जनरल को विधान परिषद् द्वारा पारित किसी विधेयक को वीटो करने का अधिकार प्राप्त था। परंतु इसके विपरीत, गवर्नर-जनरल को यह अधिकार नहीं था कि वह परिषद् के बहुमत के विरुद्ध जाकर किसी सामान्य कानून को स्वयं पारित करा सके। अर्थात सामान्य विधायी प्रक्रिया में विधान परिषद् द्वारा विधेयक का पारित होना आवश्यक था और उसके बाद उसे कानून बनने के लिए गवर्नर-जनरल की सहमति भी आवश्यक थी। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में गवर्नर-जनरल को विधान परिषद् की सामान्य प्रक्रिया से अलग होकर विशेष विधायी शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार भी था।

➣ यह परिषद् आधुनिक अर्थों में पूर्णतः स्वतंत्र या निर्वाचित विधायिका नहीं थी। इसके सदस्य कंपनी अथवा सरकार के अधिकारी थे और इसमें कोई निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। इसलिए इसे भारत में प्रतिनिधि शासन की शुरुआत के रूप में नहीं, बल्कि विधायी संस्थाओं के क्रमिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में समझना चाहिए।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने केंद्रीय विधायी परिषद् का विस्तार करने, विधायी और कार्यकारी कार्यों को अधिक स्पष्ट रूप से अलग करने तथा विभिन्न प्रांतों से प्रतिनिधि सदस्यों को शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इससे भारत में आगे होने वाले विधायी संस्थाओं के विकास और प्रतिनिधित्व के विस्तार का आधार तैयार हुआ।

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स में परिवर्तन

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने इंग्लैंड में स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इससे पहले कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स में कुल 24 सदस्य होते थे, जिनका चुनाव कंपनी के शेयरधारकों द्वारा किया जाता था।

➣ 1853 के अधिनियम द्वारा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई। इनमें से 6 सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश क्राउन द्वारा की जानी थी, जबकि शेष 12 सदस्य कंपनी की पुरानी व्यवस्था के अनुसार चुने जाने थे।

➣ इस परिवर्तन का उद्देश्य कंपनी के आंतरिक प्रशासन पर ब्रिटिश क्राउन के प्रभाव को बढ़ाना था। इससे कंपनी के उच्च प्रशासनिक ढांचे में ब्रिटिश सरकार की भूमिका पहले की तुलना में बढ़ गई और कंपनी की प्रशासनिक स्वायत्तता सीमित होने लगी।

➣ यह परिवर्तन उस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के बाद से ईस्ट इंडिया कंपनी पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा था। 1853 तक यह नियंत्रण कंपनी के प्रशासनिक ढांचे में भी अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा था।

➣ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स में क्राउन द्वारा नियुक्त सदस्यों को शामिल करना इसी बढ़ते सरकारी नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण संकेत था और आगे चलकर कंपनी शासन की समाप्ति की दिशा में हुए परिवर्तनों की पृष्ठभूमि से जुड़ा था।

➣ इसके साथ ही अधिनियम ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को नई प्रेसीडेंसी बनाने तथा मौजूदा प्रेसीडेंसियों की सीमाओं में परिवर्तन करने की शक्ति भी प्रदान की। इससे भारत में बढ़ते हुए ब्रिटिश क्षेत्रों के प्रशासनिक पुनर्गठन को अधिक लचीला बनाने का प्रयास किया गया।

इसी शक्ति के प्रयोग से आगे चलकर सिंध) तथा पंजाब – जो 1833 के बाद सिख साम्राज्य के पतन से ब्रिटिश क्षेत्र में जुड़े थे – को अलग प्रांतों के रूप में संगठित किया गया। पंजाब को 1859 में अपना पहला लेफ्टिनेंट-गवर्नर मिला। आगे चलकर इसी प्रावधान के आधार पर असम, बर्मा तथा मध्य प्रांत जैसे नए प्रशासनिक क्षेत्रों का भी गठन किया गया।

बोर्ड ऑफ कंट्रोल के वेतन संबंधी प्रावधान

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने यह भी स्पष्ट प्रावधान किया कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों, उसके सचिव तथा अन्य अधिकारियों का वेतन ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा, परंतु इसका वास्तविक भुगतान कंपनी द्वारा ही किया जाता रहेगा।

➣ इस प्रावधान से यह और स्पष्ट हो गया कि यद्यपि बोर्ड ऑफ कंट्रोल ब्रिटिश सरकार का अंग था, फिर भी उसके संचालन का वित्तीय भार कंपनी (अर्थात परोक्ष रूप से भारतीय राजस्व) पर ही डाला गया।

➣ यह उसी प्रवृत्ति की निरंतरता थी जो 1793 के चार्टर एक्ट से चली आ रही थी, जिसमें बोर्ड ऑफ कंट्रोल के प्रशासनिक खर्चों को भारतीय राजस्व से वहन करने की परंपरा स्थापित हुई थी।

बोर्ड ऑफ कंट्रोल के वेतन का निर्धारण – ब्रिटिश सरकार द्वारा, परंतु भुगतान – कंपनी (भारतीय राजस्व) द्वारा।

बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था

➣ चार्टर एक्ट, 1853 से पहले बंगाल का गवर्नर ही भारत का गवर्नर-जनरल भी होता था। 1833 के बाद गवर्नर-जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत के व्यापक प्रशासन की जिम्मेदारी मिलने के कारण उसके कार्यों का भार लगातार बढ़ता जा रहा था।

➣ एक ही व्यक्ति के पास भारत के गवर्नर-जनरल तथा बंगाल के प्रशासन की जिम्मेदारी होने से उसके ऊपर अत्यधिक प्रशासनिक कार्यभार पड़ता था। इसलिए 1853 के अधिनियम ने बंगाल के प्रशासन को गवर्नर-जनरल के पद से अलग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

➣ अधिनियम ने बंगाल के लिए एक अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने का प्रावधान किया। इसके बाद गवर्नर-जनरल को केवल बंगाल के प्रशासन का प्रत्यक्ष प्रमुख बने रहने के बजाय पूरे ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रशासन पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिला।

➣ इस व्यवस्था का उद्देश्य भारत के केंद्रीय शासन और बंगाल के स्थानीय प्रशासन के बीच कार्यभार का विभाजन करना था। इससे गवर्नर-जनरल के प्रशासनिक दायित्वों को कम करने तथा केंद्रीय शासन को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिली।

➣ यह प्रावधान आगे चलकर भारत में प्रांतीय प्रशासन के क्रमिक विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण था। हालांकि उस समय प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त नहीं हुई थी, फिर भी बंगाल के लिए अलग प्रशासनिक प्रमुख की व्यवस्था ने केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन के बीच अंतर को अधिक स्पष्ट किया।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने बंगाल के प्रशासन को गवर्नर-जनरल के प्रत्यक्ष दायित्व से अलग करने तथा उसके लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने की व्यवस्था करके भारत के प्रशासनिक ढांचे को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया।

बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था

➣ चार्टर एक्ट, 1853 से पहले बंगाल का गवर्नर ही भारत का गवर्नर-जनरल भी होता था। 1833 के बाद गवर्नर-जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत के व्यापक प्रशासन की जिम्मेदारी मिलने के कारण उसके कार्यों का भार लगातार बढ़ता जा रहा था।

➣ एक ही व्यक्ति के पास भारत के गवर्नर-जनरल तथा बंगाल के प्रशासन की जिम्मेदारी होने से उसके ऊपर अत्यधिक प्रशासनिक कार्यभार पड़ता था। इसलिए 1853 के अधिनियम ने बंगाल के प्रशासन को गवर्नर-जनरल के पद से अलग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

➣ अधिनियम ने बंगाल के लिए एक अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने का प्रावधान किया। इसके बाद गवर्नर-जनरल को बंगाल के प्रशासन के प्रत्यक्ष दायित्व से मुक्त होकर पूरे ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रशासन पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिला।

➣ यह प्रावधान आगे चलकर भारत में प्रांतीय प्रशासन के क्रमिक विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण था। हालांकि उस समय प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त नहीं हुई थी, फिर भी बंगाल के लिए अलग प्रशासनिक प्रमुख की व्यवस्था ने केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन के बीच अंतर को अधिक स्पष्ट किया।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने बंगाल के प्रशासन के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था करके केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन के कार्यों को अधिक स्पष्ट रूप से अलग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

इसी प्रावधान (धारा 56) के अंतर्गत सर फ्रेडरिक जेम्स हैलिडे को 1 मई, 1854 को बंगाल का प्रथम लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त किया गया – इस नियुक्ति की सिफारिश स्वयं गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने की थी।
एक रोचक तथ्य यह भी है कि बंगाल को पूर्ण गवर्नर (लेफ्टिनेंट-गवर्नर से ऊँचा पद) केवल 1912 में मिला, जब राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की गई – अर्थात बंगाल लगभग 58 वर्षों तक केवल लेफ्टिनेंट-गवर्नर के अधीन ही रहा।

विधि सदस्य को कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाया जाना

➣ चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद् में एक विधि सदस्य जोड़ा गया था। लेकिन उसकी भूमिका मुख्यतः विधायी कार्यों तक सीमित थी और वह परिषद् के सामान्य कार्यकारी कार्यों में पूर्ण सदस्य के रूप में भाग नहीं लेता था।

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इसके द्वारा विधि सदस्य को गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बना दिया गया। अब उसे परिषद् की कार्यकारी बैठकों में भी मतदान का अधिकार प्राप्त हो गया।

➣ इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप विधि सदस्य की भूमिका केवल कानूनों के निर्माण और विधायी मामलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह सरकार के सामान्य कार्यकारी निर्णयों में भी अन्य सदस्यों के समान भाग लेने लगा। इससे परिषद् में विधिक विशेषज्ञता को प्रशासनिक निर्णयों के साथ अधिक प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया।

➣ इस व्यवस्था का महत्व इसलिए भी था कि भारत में प्रशासनिक कार्यों की जटिलता लगातार बढ़ रही थी और सरकार के सामने बड़ी संख्या में कानूनी एवं प्रशासनिक प्रश्न आने लगे थे। ऐसे मामलों में विधि विशेषज्ञ की सक्रिय भागीदारी कार्यपालिका के लिए उपयोगी मानी गई।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने 1833 में बनाए गए विधि सदस्य के पद को अधिक प्रभावशाली बनाया। अब वह केवल विधायी परिषद् का विशेष सदस्य न रहकर गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बन गया।

विधि सदस्य को कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाया जाना

➣ चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद् में एक विधि सदस्य जोड़ा गया था। लेकिन उसकी भूमिका मुख्यतः विधायी कार्यों तक सीमित थी और वह परिषद् के सामान्य कार्यकारी कार्यों में पूर्ण सदस्य के रूप में भाग नहीं लेता था।

➣ चार्टर एक्ट, 1853 ने इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इसके द्वारा विधि सदस्य को गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बना दिया गया और उसे परिषद् की कार्यकारी बैठकों में भी मतदान का अधिकार प्राप्त हो गया। इस प्रकार उसकी भूमिका केवल कानूनों के निर्माण और विधायी मामलों तक सीमित न रहकर सरकार के सामान्य कार्यकारी निर्णयों तक विस्तृत हो गई।

➣ इस व्यवस्था का महत्व इसलिए भी था कि भारत में प्रशासनिक कार्यों की जटिलता लगातार बढ़ रही थी और सरकार के सामने बड़ी संख्या में कानूनी एवं प्रशासनिक प्रश्न आने लगे थे। विधि सदस्य की सक्रिय भागीदारी से परिषद् के प्रशासनिक निर्णयों में विधिक विशेषज्ञता को अधिक प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया।

➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1853 ने 1833 में बनाए गए विधि सदस्य के पद को अधिक प्रभावशाली बनाया और उसे गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाकर कार्यपालिका में उसकी भूमिका को विस्तृत किया।

सर बार्न्स पीकॉक – जिन्हें 1852 में विधि सदस्य नियुक्त किया गया था – इसी नए ढांचे के अंतर्गत लॉर्ड डलहौज़ी तथा बाद में लॉर्ड कैनिंग के अधीन कार्यरत रहे और नवगठित विधान परिषद् के उपाध्यक्ष के रूप में इसकी अध्यक्षता करते थे। इसी अवधि में तैयार किया गया भारतीय दंड संहिता का प्रारूप बाद में विधि बना – जिसे विधिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत तार्किक एवं व्यवस्थित संहिता माना जाता है।

चार्टर एक्ट, 1853 की सीमाएँ एवं दोष

➣ विस्तारित विधान परिषद् में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं किया गया। परिषद् के सभी 12 सदस्य ब्रिटिश अधिकारी अथवा कंपनी के यूरोपीय सिविल सेवक थे। इसलिए भारतीयों को केंद्रीय विधान-निर्माण की प्रक्रिया में कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं मिली।

➣ विधान परिषद् में प्रांतीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत तो हुई, परंतु वास्तविक निर्णायक शक्ति अब भी गवर्नर-जनरल और उसकी कार्यकारी परिषद् के पास केंद्रित रही। गवर्नर-जनरल के पास विधेयकों को वीटो करने का अधिकार था, इसलिए केंद्रीकरण की प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई।

➣ सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता का सिद्धांत स्थापित तो हुआ, लेकिन व्यवहार में प्रतियोगी परीक्षा केवल इंग्लैंड में आयोजित होती थी। इस कारण अधिकांश भारतीयों के लिए इसमें भाग लेना अत्यंत कठिन था, और वास्तविक लाभ मुख्यतः ब्रिटिश उम्मीदवारों को ही मिलता रहा।

➣ अधिनियम ने कंपनी के चार्टर को किसी निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत नहीं किया, बल्कि उसे ब्रिटिश संसद के अगले निर्णय तक जारी रखने की अनुमति दी। इससे कंपनी के प्रशासन के भविष्य को लेकर एक प्रकार की अनिश्चितता बनी रही, जिसका सीधा समाधान अधिनियम में नहीं दिया गया था।

➣ विधान परिषद् को प्रायः भारत की लघु संसद कहा जाता है, लेकिन यह वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं थी – इसके सभी सदस्य या तो सरकारी अधिकारी थे या कंपनी द्वारा नामित। इस कारण विधायी शाखा और कार्यपालिका के बीच वास्तविक संतुलन के बजाय कार्यपालिका की श्रेष्ठता बनी रही, और दोनों के बीच व्यावहारिक टकराव की स्थितियाँ भी सामने आईं।

➣ बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था के बावजूद प्रांतों को कोई वास्तविक प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त नहीं हुई। समग्र प्रशासनिक ढांचा अब भी अत्यधिक केंद्रीकृत बना रहा।

➣ इन सीमाओं के बावजूद, 1853 का अधिनियम भारत में विधायी एवं प्रशासनिक संस्थाओं के क्रमिक विकास की दिशा में एक आवश्यक कदम था, भले ही यह तत्काल भारतीयों को सत्ता में सार्थक भागीदारी न दे सका हो।

चार्टर एक्ट, 1853 का महत्व

➣ चार्टर एक्ट, 1853 भारत के संवैधानिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था। यह ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित अंतिम चार्टर एक्ट था और इसके माध्यम से कंपनी के प्रशासनिक ढांचे में ऐसे परिवर्तन किए गए, जिन्होंने आगे चलकर भारत की आधुनिक प्रशासनिक एवं विधायी संस्थाओं के विकास को प्रभावित किया।

1. कंपनी शासन के अंतिम चरण की शुरुआत

➣ 1853 का अधिनियम कंपनी के शासन को पहले की तरह किसी निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत नहीं करता था। इससे कंपनी के शासन का भविष्य ब्रिटिश संसद के निर्णय पर निर्भर हो गया। इसने संकेत दिया कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन अब स्थायी व्यवस्था नहीं माना जा रहा था।

2. सिविल सेवा में योग्यता-आधारित भर्ती की शुरुआत

➣ अधिनियम ने कंपनी की पुरानी Patronage व्यवस्था को कमजोर करते हुए सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता के सिद्धांत को स्थापित किया। इससे उच्च प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति को व्यक्तिगत संरक्षण के बजाय योग्यता एवं प्रतियोगिता से जोड़ने की दिशा मिली।

3. विधायी संस्थाओं का विकास एवं क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व

➣ विधायी परिषद के विस्तार (6 से 12 सदस्य) तथा विधायी कार्यों को कार्यपालिका के दैनिक कार्यों से अधिक स्पष्ट रूप से अलग करने से भारत में विधायी संस्थाओं के विकास को नई दिशा मिली, और कार्यपालिका-विधायिका के बीच संस्थागत अंतर पहले से अधिक स्पष्ट हुआ। इसके साथ ही बंगाल, मद्रास, बंबई तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांतों से प्रतिनिधि सदस्यों को शामिल किए जाने से केंद्रीय विधायी व्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों की भागीदारी भी बढ़ी। यद्यपि यह व्यवस्था आधुनिक अर्थों में निर्वाचित प्रतिनिधित्व नहीं थी, फिर भी इसने आगे चलकर विधायी प्रतिनिधित्व एवं संसदीय संस्थाओं के क्रमिक विस्तार की आधारभूमि तैयार की।

4. प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम

➣ बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था ने केंद्रीय गवर्नर-जनरल के प्रशासनिक कार्यभार को कम करने और प्रांतीय प्रशासन को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इससे केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासन के बीच अंतर अधिक स्पष्ट हुआ।

5. कंपनी पर ब्रिटिश सरकारी नियंत्रण में वृद्धि

➣ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की संरचना में परिवर्तन तथा उसमें क्राउन द्वारा नियुक्त सदस्यों को शामिल करने से कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार का प्रभाव और मजबूत हुआ। इससे कंपनी की स्वतंत्र प्रशासनिक भूमिका लगातार सीमित होती गई।

6. 1858 के संवैधानिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि

➣ 1853 के अधिनियम ने कंपनी शासन की कई पुरानी व्यवस्थाओं को बदल दिया और उसके भविष्य को ब्रिटिश संसद के निर्णय से जोड़ दिया। इसके कुछ ही वर्षों बाद 1857 का विद्रोह हुआ और भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया। इस दृष्टि से 1853 का अधिनियम कंपनी शासन के अंतिम संवैधानिक चरण की महत्वपूर्ण कड़ी था।

एक नजर में

बिंदु मुख्य तथ्य
अंतिम चार्टर एक्ट 1853
आधिकारिक उद्धरण 16 & 17 Vict., c. 95
कंपनी शासन की अवधि निश्चित 20 वर्ष के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया; शासन ब्रिटिश संसद के अगले निर्णय तक जारी रहना था।
सिविल सेवा खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था; पहली प्रतियोगी परीक्षा 1855 में हुई।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 की गई; इनमें 6 सदस्य क्राउन द्वारा नियुक्त किए जाने थे।
विधायी परिषद् विस्तार किया गया तथा प्रांतीय प्रतिनिधियों को शामिल किया गया।
विधि सदस्य गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाया गया।
केंद्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन केंद्रीय और प्रांतीय कार्यों के अधिक स्पष्ट विभाजन की दिशा में कदम उठाया गया।
भारतीय प्रतिनिधित्व विधान परिषद् में कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
प्रांतीय स्वायत्तता प्रांतों को वास्तविक स्वायत्तता प्राप्त नहीं थी; केंद्रीय नियंत्रण बना रहा।
ऐतिहासिक परिणाम कंपनी शासन का भविष्य ब्रिटिश संसद के निर्णय पर निर्भर हो गया और अंततः 1858 में कंपनी शासन समाप्त हुआ।

चार्टर एक्ट, 1833 बनाम चार्टर एक्ट, 1853 – तुलनात्मक तालिका

चूंकि दोनों अधिनियमों में विधि सदस्य, विधायी परिषद तथा गवर्नर-जनरल जैसे कई विषय परस्पर जुड़े हुए हैं, इसलिए इन दोनों के बीच confusion होना बहुत आम है। नीचे दी गई तालिका मुख्य अंतर स्पष्ट करती है:

विषयचार्टर एक्ट, 1833चार्टर एक्ट, 1853
प्रकृतिकंपनी का व्यापारिक अंत; प्रशासनिक संस्था में परिवर्तनकंपनी शासन का अंतिम संवैधानिक चरण; प्रशासनिक-संस्थागत सुधार
चार्टर की अवधिभारतीय क्षेत्र/राजस्व 30 अप्रैल 1854 तक कंपनी के पास रखने का निश्चित प्रावधानकोई निश्चित अवधि नहीं – ब्रिटिश संसद के अगले निर्णय तक
गवर्नर-जनरल का पदगवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया पद स्थापित; प्रथम – लॉर्ड विलियम बेंटिकपद यथावत; परंतु बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर देकर कार्यभार कम किया
विधि सदस्य (Law Member)पद की स्थापना; केवल विधायी बैठकों तक सीमित भूमिका; प्रथम – लॉर्ड मैकालेविधि सदस्य को कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाया; कार्यकारी बैठकों में भी मतदान अधिकार
विधायी शक्तिसर्वोच्च शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल (धारा 43) में केंद्रित; मद्रास-बंबई की स्वतंत्र शक्ति समाप्तविधायी कार्यों हेतु परिषद् को 6 से 12 सदस्यों तक विस्तृत; कार्यकारी व विधायी कार्यों में संस्थागत भेद स्पष्ट
प्रांतीय प्रतिनिधित्वकोई प्रावधान नहींबंगाल, मद्रास, बंबई व उत्तर-पश्चिमी प्रांत से 4 प्रतिनिधि सदस्य विधान परिषद् में शामिल
कानूनों का संहिताकरणप्रथम विधि आयोग (1834) की स्थापनाकोई नया विधि आयोग नहीं; पहले से चल रही संहिताकरण-प्रक्रिया जारी रही
सिविल सेवाखुली प्रतियोगिता का प्रस्ताव, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध से निष्प्रभावीखुली प्रतियोगिता वास्तविक रूप से लागू; प्रथम परीक्षा 1855 में
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्सकोई संरचनात्मक परिवर्तन नहींसदस्य संख्या 24 से घटाकर 18; 6 सदस्य क्राउन-नियुक्त; नई प्रेसीडेंसी बनाने की शक्ति
सरकारी सेवाओं में समानताधारा 87 – धर्म/जन्मस्थान/वंश/रंग के आधार पर भेदभाव न करने का सिद्धांतकोई नया प्रावधान नहीं; 1833 का सिद्धांत यथावत जारी
भारतीय प्रतिनिधित्वकोई प्रावधान नहींकोई भारतीय सदस्य विधान परिषद् में शामिल नहीं किया गया

1833 = संरचना का निर्माण – गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया, विधि सदस्य का पद, विधायी केंद्रीकरण की नींव।
1853 = उसी संरचना का परिष्करण – विधि सदस्य को पूर्ण अधिकार, विधान परिषद् का वास्तविक विस्तार (मिनी-पार्लियामेंट), खुली प्रतियोगिता का वास्तविक क्रियान्वयन, तथा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स पर क्राउन का बढ़ता नियंत्रण।

चार्टर एक्ट, 1853 – भ्रम बिंदु

➣ चार्टर एक्ट, 1853 को कंपनी का अंतिम चार्टर एक्ट कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि 1853 में कंपनी का शासन समाप्त हो गया था। कंपनी का शासन 1858 में समाप्त हुआ।

➣ 1833 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी व्यापारिक अधिकार समाप्त हुए थे। 1853 में कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त करने का कोई नया प्रावधान नहीं था, क्योंकि कंपनी पहले से ही व्यापारिक संस्था के रूप में समाप्त हो चुकी थी।

➣ सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता का सिद्धांत/प्रावधान 1853 के अधिनियम से जुड़ा है, लेकिन पहली प्रतियोगी परीक्षा 1855 में आयोजित हुई। इसलिए 1853 = सिद्धांत/प्रावधान और 1855 = पहली परीक्षा – इन दोनों वर्षों को अलग-अलग याद रखना उपयोगी है।

➣ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की संख्या 1853 में 24 से घटाकर 18 की गई। इनमें 6 सदस्यों की नियुक्ति क्राउन द्वारा तथा शेष 12 सदस्यों का चुनाव कंपनी की व्यवस्था के अनुसार होना था।

➣ विधि सदस्य (Law Member) का पद 1853 में नहीं बनाया गया था। यह पद चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा बनाया गया था। 1853 में विधि सदस्य को कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बनाया गया।

➣ प्रथम विधि आयोग की स्थापना का प्रावधान भी 1853 में नहीं, बल्कि चार्टर एक्ट, 1833 से संबंधित था। इसलिए इसे 1853 की उपलब्धि नहीं मानना चाहिए।

➣ भारत का गवर्नर-जनरल बनाने का प्रावधान 1853 में नहीं हुआ था। यह परिवर्तन चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा किया गया था और लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।

➣ 1853 में विधायी परिषद का विस्तार हुआ, लेकिन इसे आधुनिक अर्थों में निर्वाचित विधानमंडल नहीं समझना चाहिए। सदस्यों का चयन मुख्यतः नामांकन एवं सरकारी व्यवस्था के माध्यम से होता था।

➣ कार्यपालिका और विधायिका का पृथक्करण 1853 में अधिक स्पष्ट हुआ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत में पूर्णतः स्वतंत्र विधायिका स्थापित हो गई थी। अंतिम सत्ता अभी भी गवर्नर-जनरल और ब्रिटिश सरकार के पास थी।

➣ बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर की व्यवस्था को 1853 के प्रशासनिक सुधार के रूप में याद किया जाता है। इसका उद्देश्य गवर्नर-जनरल के बढ़ते प्रशासनिक कार्यभार को कम करना था।

➣ 1853 को भारत में पूर्ण प्रतिनिधि शासन की शुरुआत नहीं माना जाना चाहिए। यह केवल विधायी प्रतिनिधित्व और संस्थागत विकास की दिशा में एक प्रारंभिक कदम था।

चार्टर एक्ट, 1853 – महत्वपूर्ण तथ्य

➣ चार्टर एक्ट, 1853 – ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित अंतिम चार्टर एक्ट।

➣ 1853 में कंपनी के चार्टर को पहले की तरह 20 वर्षों की निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया। कंपनी को भारत का शासन ब्रिटिश संसद के अगले निर्णय तक जारी रखने की अनुमति दी गई।

➣ कंपनी का व्यापारिक स्वरूप पहले ही चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा समाप्त किया जा चुका था; इसलिए 1853 का मुख्य जोर प्रशासनिक एवं संवैधानिक सुधारों पर था।

➣ कंपनी की सिविल सेवा में नियुक्ति के लिए खुली प्रतियोगिता के सिद्धांत को स्वीकार किया गया और पुरानी Patronage व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया गया।

➣ सिविल सेवा की पहली प्रतियोगी परीक्षा 1855 में आयोजित हुई।

➣ सिविल सेवा की प्रतियोगी परीक्षा के लिए आगे चलकर मैकाले समिति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ विधायी एवं कार्यकारी कार्यों को पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से अलग किया गया और केंद्रीय विधायी परिषद का विस्तार किया गया।

➣ केंद्रीय विधान परिषद् को 6 से बढ़ाकर 12 सदस्यों तक विस्तृत किया गया – गवर्नर-जनरल, कार्यकारी परिषद् के 4 सदस्य, कमांडर-इन-चीफ, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, एक अन्य न्यायाधीश तथा बंगाल, मद्रास, बंबई एवं उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के 4 प्रतिनिधि।

➣ विधान परिषद में बंगाल, मद्रास, बंबई तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांतों से प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई, परंतु इसमें कोई भारतीय सदस्य शामिल नहीं था।

➣ गवर्नर-जनरल को विधान परिषद् के किसी भी विधेयक को वीटो करने का अधिकार था, परंतु वह परिषद् के बहुमत के विरुद्ध जाकर कानून पारित नहीं करा सकता था।

➣ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को नई प्रेसीडेंसी बनाने तथा मौजूदा प्रेसीडेंसियों की सीमाएँ बदलने की शक्ति भी दी गई।

➣ 1853 में विधायी परिषद का विस्तार हुआ, लेकिन यह अभी निर्वाचित प्रतिनिधि विधानमंडल नहीं था।

➣ विधि सदस्य का पद 1833 में बनाया गया था; 1853 में विधि सदस्य को गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् का पूर्ण सदस्य बना दिया गया।

➣ कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई। इनमें 6 सदस्यों की नियुक्ति क्राउन द्वारा की जानी थी, जबकि शेष 12 सदस्य चुने जाने थे।

➣ बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने का प्रावधान किया गया, जिससे गवर्नर-जनरल के प्रशासनिक कार्यभार को कम करने का प्रयास हुआ।

➣ 1853 के अधिनियम ने कंपनी शासन को समाप्त नहीं किया। कंपनी का शासन अंततः भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा समाप्त हुआ।

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