पंजाब
➣ पंजाब भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती प्रदेश था। प्राचीन काल से ही यह मध्य एशिया और भारत के बीच प्रवेश द्वार माना जाता था। इसी कारण अधिकांश विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले पंजाब का ही मार्ग अपनाया।
➣ पंजाब शब्द फ़ारसी भाषा के दो शब्दों पंज (पाँच) तथा आब (जल) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है पाँच नदियों की भूमि । ये पाँच नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, व्यास तथा सतलुज हैं।
➣ मुगलकाल में पंजाब साम्राज्य का सबसे समृद्ध, उपजाऊ तथा सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रान्त था। इसकी राजधानी लाहौर थी, जो उस समय उत्तर-पश्चिम भारत का प्रमुख प्रशासनिक, व्यापारिक एवं सैनिक केन्द्र माना जाता था।
➣ अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पंजाब सदैव राजनीतिक संघर्षों का केन्द्र बना रहा। उत्तर-पश्चिम से आने वाले विदेशी आक्रमणों का पहला प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ता था। यही कारण था कि यहाँ की जनता को लगातार युद्धों, सत्ता परिवर्तन तथा अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
➣ मुगल सम्राट अकबर ने अपने युवराज काल में कुछ समय तक पंजाब के सूबेदार के रूप में कार्य किया था। इससे स्पष्ट होता है कि मुगल शासक भी पंजाब के सामरिक एवं प्रशासनिक महत्व को भली-भाँति समझते थे।
पंजाब में सिख शक्ति का उदय
➣ सिक्ख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव (1469–1539 ई.) ने की थी। प्रारम्भ में यह एक धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, जिसका उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों, ऊँच-नीच तथा धार्मिक भेदभाव का विरोध करना था।
➣ समय के साथ मुगल शासन और सिक्ख गुरुओं के बीच तनाव बढ़ने लगा। विशेषकर गुरु अर्जुन देव तथा गुरु तेग बहादुर के बलिदान ने सिक्ख समुदाय को यह अनुभव कराया कि केवल धार्मिक उपदेशों से अपने अस्तित्व और धर्म की रक्षा करना संभव नहीं है।
➣ इसी पृष्ठभूमि में सिक्खों के छठे गुरु गुरु हरगोविन्द (1606–1644 ई.) ने पहली बार सिक्ख समुदाय को सैन्य स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सिक्खों को शस्त्र धारण करने, घुड़सवारी सीखने की प्रेरणा दी। यहीं से सिक्खों का सैन्य संगठन प्रारम्भ हुआ।
➣ इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की। इसका उद्देश्य सिक्खों को एक अनुशासित, संगठित और वीर समुदाय के रूप में तैयार करना था, जो आवश्यकता पड़ने पर धर्म और समाज की रक्षा के लिए शस्त्र उठा सके।
➣ गुरु गोविन्द सिंह ने व्यक्तिगत गुरु परम्परा का समापन करते हुए गुरु ग्रन्थ साहिब को सिक्खों का शाश्वत गुरु घोषित किया। इसके साथ ही मानव गुरु की परम्परा समाप्त हो गई और सम्पूर्ण सिक्ख समुदाय गुरु ग्रन्थ साहिब के नेतृत्व में संगठित हो गया।
➣ गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु के बाद उनके प्रमुख शिष्य बंदा सिंह बहादुर (बंदाबहादुर) ने सिक्खों का नेतृत्व संभाला। उन्होंने पंजाब के किसानों और सामान्य जनता को संगठित कर मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ किया तथा सिक्खों को एक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ लगभग 1708 से 1715 ई. तक बंदा सिंह बहादुर ने मुगलों के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया और अनेक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। उनके प्रयासों से पहली बार सिक्ख शक्ति केवल धार्मिक संगठन तक सीमित न रहकर राजनीतिक रूप से भी प्रभावशाली बनकर उभरी।
➣ 1716 ई. में मुगल बादशाह फर्रुखसियर के आदेश पर बंदा सिंह बहादुर और उनके पुत्र की हत्या कर दी गई। इसके बाद मुगल शासकों ने सिक्खों पर कठोर दमन आरम्भ किया, किन्तु यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।
दल खालसा एवं सिख मिसलों का गठन
दल खालसा का गठन
➣ बंदा सिंह बहादुर की मृत्यु के बाद सिक्खों को अपने प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों, पहाड़ों तथा दुर्गम क्षेत्रों में शरण लेनी पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा और अवसर मिलते ही पुनः संगठित होने लगे।
➣ सिक्खों की बढ़ती शक्ति और उनके लगातार प्रतिरोध को देखते हुए पंजाब के मुगल सूबेदार जकारिया खान ने उन्हें केवल सैन्य बल से दबाना कठिन समझा।
➣ उसने सिक्खों से समझौते का प्रयास किया तथा कपूर सिंह को नवाबी एवं जागीर प्रदान कर उन्हें अपने पक्ष में लाने की नीति अपनाई।
➣ समय के साथ विभिन्न स्थानों पर सक्रिय सिक्ख जत्थों को एकजुट करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी उद्देश्य से 1748 ई. में कपूर सिंह के नेतृत्व में दल खालसा का गठन किया गया।
➣ यह सिक्खों का एक संगठित सैन्य एवं राजनीतिक संगठन था, जिसने आगे चलकर पंजाब में सिक्ख शक्ति को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ कपूर सिंह के पश्चात जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दल खालसा का नेतृत्व संभाला। उनके नेतृत्व में सिक्ख संगठन और अधिक मजबूत हुआ तथा विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय जत्थों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ।
सिक्ख मिसलें एवं उनकी विशेषताएँ
➣ प्रशासनिक एवं सैन्य सुविधा की दृष्टि से दल खालसा को आगे चलकर 12 स्वतन्त्र मिसलों (जत्थों) में संगठित किया गया। प्रत्येक मिसल का अपना अलग क्षेत्र, सेना, झण्डा, निशान तथा सरदार होता था
➣ किन्तु बाहरी आक्रमण या संकट की स्थिति में सभी मिसलें मिलकर सामूहिक रूप से युद्ध करती थीं।
➣ सिक्ख मिसलें एवं उनके प्रमुख संस्थापक निम्नलिखित हैं-
| सिक्ख मिसल | संस्थापक |
|---|---|
| सिंहपुरिया मिसल | नवाब कपूर सिंह |
| अहलूवालिया मिसल | जस्सा सिंह अहलूवालिया |
| रामगढ़िया मिसल | जस्सा सिंह रामगढ़िया |
| फुलकियां मिसल | फूल सिंह |
| कन्हैया मिसल | जय सिंह |
| नकई मिसल | हीरा सिंह |
| शहीद (शहीदी) मिसल | बाबा दीप सिंह |
| भंगी मिसल | हरि सिंह |
| सुकरचकिया मिसल | चरत सिंह |
| निशानवालिया मिसल | सरदार संगत सिंह |
| करोड़सिंहिया मिसल | भगेल सिंह |
| ढल्लेवालिया (उल्लेवालिया) मिसल | गुलाब सिंह |
➣ प्रत्येक मिसल का अपना पृथक प्रशासन एवं सैन्य संगठन था। सभी मिसलों के प्रमुख समय-समय पर एकत्र होकर सामूहिक रूप से महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे, जिससे आवश्यकता पड़ने पर वे एक संयुक्त शक्ति के रूप में कार्य कर सकें।
सिक्ख शक्ति का विस्तार
➣ पंजाब में व्याप्त अव्यवस्था तथा अफगान आक्रमणकारियों एवं मुगल सूबेदारों के अत्याचारों से जनता को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से दल खालसा ने 1753 ई. में राखी प्रथा प्रारम्भ की।
➣ राखी प्रथा के अंतर्गत प्रत्येक गाँव से उपज का लगभग 1/5 भाग सुरक्षा-कर के रूप में लिया जाता था। इसके बदले दल खालसा उस क्षेत्र की रक्षा का उत्तरदायित्व निभाता था। इस व्यवस्था ने सिक्खों को एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राखी प्रथा को सिक्खों के राजनीतिक उत्थान का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
➣ उत्तरवर्ती मुगल शासकों द्वारा अहलूवालिया मिसल के संस्थापक जस्सा सिंह अहलूवालिया को सुल्तान-ए-कौम की उपाधि प्रदान की गई। बाद में उन्होंने अपने नाम के सिक्के भी जारी करवाए, जो सिक्ख प्रभुसत्ता के प्रतीक माने जाते हैं।
➣ फुलकियां मिसल ने पटियाला, नाभा तथा जींद जैसी प्रमुख रियासतों की स्थापना की। यह एकमात्र प्रमुख मिसल थी, जिसका क्षेत्र सतलुज नदी के दक्षिण में स्थित था।
➣ 1765 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने फुलकियां मिसल के सरदार आला सिंह को तलब-ओ-आलम, एक नगाड़ा तथा निशान भेंट कर सम्मानित किया।
➣ 17 अक्टूबर 1762 ई. (दीपावली) के अवसर पर अमृतसर में लगभग 60 हजार सिक्ख एकत्र हुए। इसे सिक्ख शक्ति के पुनरुत्थान की महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।
➣ 1764 ई. में सिक्खों ने अफगान आक्रमणकारियों का सामना करने के उद्देश्य से देग (दान), तेग (शक्ति) और फतेह (विजय) का नारा अपनाया तथा इन्हीं शब्दों से अंकित शुद्ध चाँदी के सिक्के जारी किए। इन्हें पंजाब में सिक्ख प्रभुसत्ता का प्रतीक माना जाता है।
➣ 1763 से 1773 ई. के बीच सिक्खों ने अपनी शक्ति का उल्लेखनीय विस्तार किया। इस अवधि में उनका प्रभाव पश्चिम में अटक, दक्षिण में मुल्तान, उत्तर में कांगड़ा तथा जम्मू तक फैल गया।
➣ आधुनिक सिक्ख साम्राज्य की नींव रखने का श्रेय सुकरचकिया मिसल को दिया जाता है। इसी मिसल में आगे चलकर महाराजा रणजीत सिंह का जन्म हुआ।
➣ सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह (महाराजा रणजीत सिंह के पिता) थे। इस मिसल का अधिकार मुख्यतः रावी और चिनाब नदियों के मध्य स्थित क्षेत्र पर था।
अठारहवीं शताब्दी में पंजाब की राजनीतिक स्थिति
नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण
➣ अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक मुगल साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो चुका था। इसका सबसे अधिक प्रभाव पंजाब पर पड़ा, क्योंकि यह उत्तर-पश्चिम से भारत आने वाले विदेशी आक्रमणकारियों का प्रमुख प्रवेश द्वार था।
➣ 1739 ई. में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली को लूट लिया। इस आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी को पूरी तरह उजागर कर दिया तथा पंजाब पर मुगलों का नियंत्रण भी निरन्तर कमजोर होने लगा।
➣ 1747 ई. में नादिरशाह की मृत्यु के बाद उसका सेनापति अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान का शासक बना। उसने 1748 से 1767 ई. के बीच भारत पर अनेक बार आक्रमण किए, जिनमें पंजाब उसका प्रमुख लक्ष्य रहा।
➣ 1758 ई. में मराठों ने पंजाब पर अधिकार कर अब्दाली के पुत्र तैमूर शाह को वहाँ के सूबेदार पद से हटा दिया। इससे कुछ समय के लिए पंजाब पर मराठों का प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ मराठों की बढ़ती शक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से अहमदशाह अब्दाली ने पुनः भारत पर आक्रमण किया। परिणामस्वरूप 1761 ई. में पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की पराजय हुई। इस युद्ध के बाद कुछ समय के लिए पंजाब और उत्तर भारत में अब्दाली का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया।
पंजाब में सिक्ख शक्ति का पुनरुत्थान
➣ यद्यपि पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद अब्दाली का प्रभाव बढ़ गया था, किन्तु उसके अफगानिस्तान लौटते ही सिक्ख मिसलें पुनः सक्रिय हो जाती थीं। वे अवसर का लाभ उठाकर पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करती रहीं।
➣ सिक्खों की गुरिल्ला युद्ध नीति तथा स्थानीय जनता के सहयोग के कारण अब्दाली पंजाब पर स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका। उसके प्रत्येक आक्रमण के बाद सिक्खों की शक्ति पहले की अपेक्षा अधिक संगठित होकर उभरती गई।
➣ 1765 ई. तक अधिकांश सिक्ख मिसलों ने लाहौर सहित पंजाब के बड़े भागों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। इसके साथ ही पंजाब में मुगल तथा अफगान सत्ता का प्रभाव तेजी से घटने लगा और सिक्ख शक्ति निर्णायक रूप से उभरकर सामने आई।
➣ अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक सुकरचकिया, भंगी, कन्हैया तथा अन्य प्रमुख मिसलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चल रही थी।
➣ इन्हीं परिस्थितियों में 1780 ई. को गुजरांवाला में सुकरचकिया मिसल के सरदार महासिंह के घर रणजीत सिंह का जन्म हुआ। आगे चलकर यही बालक पंजाब के इतिहास का सबसे महान शासक बना।
महाराजा रणजीत सिंह
➣ महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर 1780 ई. को गुजरांवाला (वर्तमान पाकिस्तान) में सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महासिंह के घर हुआ था। कुछ स्रोत में बदरूख़ाँ।
➣ रणजीत सिंह के पिता महासिंह तथा माता राज कौर थीं। 1792 ई. में उनके पिता महासिंह की मृत्यु हो गई।
➣ 12 वर्ष की आयु में रणजीत सिंह सुकरचकिया मिसल के प्रमुख बने। अल्पायु होने के कारण प्रारम्भिक वर्षों में शासन का संचालन उनकी माता राज कौर, उनकी भावी सास सदा कौर तथा विश्वस्त सरदारों की सहायता से किया गया।
➣ सदा कौर, जो कन्हैया मिसल की प्रभावशाली नेता थीं, ने रणजीत सिंह के राजनीतिक जीवन के प्रारम्भिक चरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पुत्री महताब कौर का विवाह रणजीत सिंह से हुआ, जिससे सुकरचकिया और कन्हैया मिसलों के बीच राजनीतिक सम्बन्ध और अधिक मजबूत हुए।
➣ 1797 ई. में रणजीत सिंह ने स्वयं शासन की बागडोर संभाली। उन्होंने अपने आपको खालसा का सेवक माना और शासन को व्यक्तिगत सत्ता के बजाय सिक्ख राष्ट्रमण्डल (खालसा) के नाम पर संचालित करने की नीति अपनाई।
➣ रणजीत सिंह सिक्खों की 12 प्रमुख मिसलों में से एक सुकरचकिया मिसल से सम्बन्धित थे। यह मिसल रावी और चिनाब नदियों के मध्य स्थित क्षेत्र पर अपना प्रभाव रखती थी तथा उस समय पंजाब की प्रमुख एवं शक्तिशाली मिसलों में गिनी जाती थी।
पंजाब में रणजीत सिंह का उदय
➣ 1797 ई. में स्वयं शासन की बागडोर संभालने के बाद रणजीत सिंह ने पंजाब की बिखरी हुई सिक्ख मिसलों को एकजुट करने तथा अपने राज्य का विस्तार करने की नीति अपनाई।
➣ उस समय पंजाब अनेक स्वतंत्र मिसलों में विभाजित था, जिनके बीच आपसी संघर्ष भी होता रहता था। रणजीत सिंह ने युद्ध, कूटनीति तथा वैवाहिक सम्बन्धों के माध्यम से धीरे-धीरे अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया।
➣ इसी समय अफगानिस्तान के शासक जमान शाह दुर्रानी ने भारत पर आक्रमण किया। 1798 ई. में भारत से लौटते समय उसकी कुछ तोपें चिनाब नदी में गिर गईं।
➣ रणजीत सिंह ने उन्हें निकलवाकर सुरक्षित वापस भिजवा दिया। इस सहायता से प्रसन्न होकर जमान शाह ने रणजीत सिंह को सम्मानित किया तथा पंजाब में उनके प्रभाव को स्वीकार किया।
➣ उस समय लाहौर पर भंगी मिसल का अधिकार था, किन्तु आन्तरिक कलह, कमजोर नेतृत्व तथा जनता में बढ़ते असंतोष के कारण उसकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी। रणजीत सिंह ने इस अवसर का लाभ उठाया और स्थानीय सरदारों तथा जनता का समर्थन प्राप्त कर लिया।
➣ 1799 ई. में रणजीत सिंह ने बिना अधिक रक्तपात के लाहौर पर अधिकार कर लिया। लाहौर उस समय पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामरिक केन्द्र था। इस विजय ने रणजीत सिंह को सम्पूर्ण पंजाब का सबसे प्रभावशाली सिक्ख सरदार बना दिया।
➣ लाहौर की विजय के बाद अनेक छोटे-बड़े सिक्ख सरदार स्वयं रणजीत सिंह के साथ आ मिले, जबकि कुछ ने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। इससे पंजाब में राजनीतिक एकता स्थापित होने लगी और एक शक्तिशाली सिक्ख राज्य की नींव मजबूत हुई।
➣ लाहौर पर अधिकार प्राप्त करने के बाद रणजीत सिंह ने प्रशासन को सुदृढ़ करने, सेना को संगठित करने तथा पंजाब में शांति और व्यवस्था स्थापित करने पर विशेष ध्यान दिया। इसी सुदृढ़ आधार पर आगे चलकर उन्होंने एक शक्तिशाली सिक्ख साम्राज्य की स्थापना की।
सिक्ख साम्राज्य की स्थापना एवं राज्याभिषेक
➣ 1799 ई. में लाहौर पर अधिकार करने के बाद रणजीत सिंह ने पंजाब की विभिन्न सिक्ख मिसलों को एक शक्तिशाली शासन के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास प्रारम्भ किया।
➣ उनका उद्देश्य केवल अपने राज्य का विस्तार करना नहीं था, बल्कि बिखरी हुई सिक्ख शक्ति को एक संगठित साम्राज्य के रूप में स्थापित करना भी था।
➣ इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए 12 अप्रैल 1801 ई. (बैसाखी) को रणजीत सिंह ने लाहौर में विधिवत् राज्याभिषेक कर महाराजा की उपाधि धारण की। उनका राज्याभिषेक साहिब सिंह बेदी ने सम्पन्न कराया, जो गुरु नानक देव के वंशज माने जाते थे।
➣ राज्याभिषेक के साथ ही पंजाब में एक संगठित सिक्ख साम्राज्य की स्थापना हुई। यद्यपि रणजीत सिंह महाराजा बने, फिर भी उन्होंने स्वयं को खालसा का सेवक माना और शासन को व्यक्तिगत सत्ता के बजाय सम्पूर्ण सिक्ख समुदाय का शासन बताया।
➣ रणजीत सिंह ने अपने शासन को धार्मिक सहिष्णुता तथा न्याय के सिद्धान्तों पर आधारित किया। उन्होंने प्रशासन में केवल सिक्खों को ही नहीं, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम तथा यूरोपीय अधिकारियों को भी उनकी योग्यता के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया।
➣ अपने शासन की वैधता एवं सिक्ख परम्परा को सम्मान देने के उद्देश्य से रणजीत सिंह ने गुरु नानक देव तथा गुरु गोविन्द सिंह के नाम से नानकशाही सिक्के जारी करवाए। इन सिक्कों पर उनका अपना नाम अंकित नहीं होता था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे स्वयं को खालसा का प्रतिनिधि मानते थे।
➣ राज्याभिषेक के बाद रणजीत सिंह ने लाहौर को अपनी राजनीतिक राजधानी के रूप में विकसित किया। 1805 ई. तक रणजीत सिंह ने अमृतसर सहित पंजाब के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।।
➣ इस प्रकार पंजाब की राजनीतिक राजधानी लाहौर तथा धार्मिक राजधानी अमृतसर दोनों उनके नियंत्रण में आ गईं, जिससे उनकी शक्ति और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
व्यक्तित्व एवं शासन नीति
➣ महाराजा रणजीत सिंह केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ तथा व्यवहार-कुशल शासक भी थे। उन्होंने बिखरी हुई सिक्ख मिसलों को एकजुट कर एक शक्तिशाली एवं संगठित सिक्ख साम्राज्य की स्थापना की।
➣ बचपन में चेचक होने के कारण उनकी बायीं आँख की दृष्टि चली गई थी तथा उनके चेहरे पर चेचक के दाग भी थे। इसके बावजूद उनकी नेतृत्व क्षमता, साहस और आत्मविश्वास में कभी कमी नहीं आई।
➣ रणजीत सिंह का स्वभाव अत्यन्त सरल था। वे प्रायः सामान्य वेशभूषा धारण करते थे और दरबार में भी अनावश्यक शाही आडम्बर से दूर रहते थे। यही कारण था कि सैनिकों तथा सामान्य जनता में वे अत्यन्त लोकप्रिय थे।
➣ वे स्वयं को राज्य का स्वामी नहीं, बल्कि खालसा का सेवक मानते थे। उनके शासनकाल में जारी अधिकांश सिक्कों पर उनका नाम अंकित नहीं होता था, बल्कि गुरु नानक देव एवं गुरु गोविन्द सिंह के सम्मान में सिक्के जारी किए जाते थे।
➣ रणजीत सिंह धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त उदार थे। यद्यपि वे सिक्ख शासक थे, फिर भी उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम तथा यूरोपीय अधिकारियों को अपनी सेना एवं प्रशासन में उच्च पद प्रदान किए। उनके शासन में सभी धर्मों के लोगों को समान संरक्षण प्राप्त था।
रणजीत सिंह का प्रसिद्ध कथन है कि ईश्वर की इच्छा थी कि मैं सभी धर्मों को एक ही दृष्टि से देखूँ, इसलिए उसने मेरी एक आँख की रोशनी ले ली। यद्यपि इस कथन की ऐतिहासिक प्रामाणिकता निश्चित नहीं मानी जाती, फिर भी यह उनके धार्मिक उदार दृष्टिकोण के संदर्भ में व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है।
➣ रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने लगभग चालीस वर्षों तक पंजाब को राजनीतिक स्थिरता प्रदान की और उत्तर-पश्चिम से होने वाले विदेशी आक्रमणों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।
➣ रणजीत सिंह भारत के उन विरले शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे, किन्तु अपने जीवनकाल में उन्हें कभी भी पंजाब के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं दिया। उनकी यही व्यावहारिक कूटनीति सिक्ख साम्राज्य की सबसे बड़ी शक्ति थी।
अंग्रेजों से प्रारम्भिक सम्बन्ध (1805–1808 ई.)
➣ 1801 ई. में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा सिक्ख साम्राज्य की स्थापना के बाद पंजाब की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदलने लगी। दूसरी ओर, अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी भी उत्तर भारत में अपना प्रभाव निरन्तर बढ़ा रही थी। परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों का आमना-सामना होना स्वाभाविक था।
➣ उस समय अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत में अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करना तथा मराठों की शक्ति को समाप्त करना था, जबकि रणजीत सिंह पंजाब की बिखरी हुई सिक्ख मिसलों को संगठित कर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना में लगे हुए थे।
➣ 1805 ई. में द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान मराठा सरदार जसवंतराव होल्कर अंग्रेजों से पराजित होकर पंजाब पहुँचे। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह से अंग्रेजों के विरुद्ध सैन्य सहायता की प्रार्थना की।
➣ यह रणजीत सिंह के सामने पहली ऐसी घटना थी, जिसमें उन्हें अंग्रेजों और मराठों में से किसी एक का पक्ष चुनना था।
➣ इस विषय पर विचार करने के लिए 1806 ई. में अकाल तख्त, अमृतसर में गुरुमता (सिक्खों की सर्वोच्च सभा) बुलाई गई।
➣ सभा में यह निर्णय लिया गया कि सिक्ख राज्य अंग्रेजों और मराठों के संघर्ष में किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करेगा। परिणामस्वरूप होल्कर को पंजाब छोड़ना पड़ा।
➣ इसी समय अंग्रेज सेनापति जनरल लेक तथा रणजीत सिंह के मध्य एक समझौता हुआ, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने पंजाब की सीमा से अपनी सेना हटा ली। इससे दोनों शक्तियों के बीच कुछ समय के लिए मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो गए।
➣ यद्यपि दोनों पक्षों के सम्बन्ध सामान्य थे, फिर भी अंग्रेज रणजीत सिंह की बढ़ती शक्ति पर लगातार नज़र रखे हुए थे। उन्हें आशंका थी कि यदि पंजाब की सभी सिक्ख मिसलें एक शक्तिशाली नेतृत्व के अधीन संगठित हो गईं, तो उत्तर भारत में कम्पनी की भावी योजनाओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
➣ दूसरी ओर, रणजीत सिंह भी अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति से भली-भाँति परिचित थे। वे समझते थे कि उस समय अंग्रेजों से प्रत्यक्ष युद्ध करना उचित नहीं होगा। इसलिए उन्होंने पहले पंजाब को आन्तरिक रूप से संगठित एवं सुदृढ़ बनाने की नीति अपनाई।
➣ 1808 ई. में रणजीत सिंह ने सतलज नदी पार कर फरीदकोट, मालेरकोटला, अम्बाला तथा अन्य सिक्ख रियासतों पर अपना प्रभाव स्थापित करना प्रारम्भ किया। इससे अंग्रेजों की चिंता बढ़ गई, क्योंकि ये क्षेत्र कम्पनी के प्रभाव क्षेत्र के निकट स्थित थे।
➣ इन परिस्थितियों को देखते हुए गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो ने चार्ल्स मेटकॉफ को लाहौर भेजा ताकि रणजीत सिंह से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए जा सकें और उन्हें सतलज के पूर्व की ओर विस्तार करने से रोका जा सके।
➣ साथ ही डेविड ऑक्टरलॉनी को सैनिक तैयारी के लिए नियुक्त किया गया, जिसने सतलज के पूर्व स्थित सिक्ख रियासतों को अंग्रेजी संरक्षण में लेने की घोषणा कर दी।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में दोनों पक्ष एक-दूसरे से सीधे संघर्ष करने के बजाय मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना चाहते थे। इस प्रकार 1805 से 1808 ई. के बीच अंग्रेजों और रणजीत सिंह के सम्बन्ध मैत्री, कूटनीति और पारस्परिक सावधानी पर आधारित रहे।
➣ किन्तु पंजाब में बढ़ते राजनीतिक हितों के कारण टकराव की स्थिति बनने लगी। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1809 ई. की अमृतसर की सन्धि का कारण बनीं।
अंग्रेजों और रणजीत सिंह के प्रारम्भिक सम्बन्धों का मुख्य कारण मराठा प्रश्न, नेपोलियन का संभावित खतरा तथा सतलज के पूर्व स्थित सिक्ख रियासतों पर प्रभाव स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा था।
अमृतसर की सन्धि (1809 ई.)
➣ 1808 ई. तक पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह का प्रभाव निरन्तर बढ़ रहा था। उन्होंने सतलज नदी के पूर्व स्थित अनेक सिक्ख रियासतों पर अपना अधिकार स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया था।
➣ दूसरी ओर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी भी उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगी थी। ऐसी स्थिति में दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष की संभावना बढ़ने लगी।
➣ इसी समय यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट की बढ़ती शक्ति से अंग्रेज चिंतित थे। उन्हें आशंका थी कि यदि फ्रांस अफगानिस्तान अथवा फारस के मार्ग से भारत पर आक्रमण करता है, तो महाराजा रणजीत सिंह उसके साथ मिल सकते हैं। इसलिए अंग्रेज पंजाब के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना चाहते थे।
➣ इस उद्देश्य से गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो ने चार्ल्स मेटकॉफ को लाहौर भेजकर रणजीत सिंह से वार्ता प्रारम्भ कराई।
➣ प्रारम्भिक वार्ताओं में दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहे, क्योंकि रणजीत सिंह स्वयं को समस्त सिक्खों का शासक मानते थे, जबकि अंग्रेज सतलज के पूर्व स्थित सिक्ख रियासतों को अपने संरक्षण में रखना चाहते थे।
➣ अन्ततः दोनों पक्षों ने युद्ध से बचने के उद्देश्य से 25 अप्रैल 1809 ई. को अमृतसर की सन्धि सम्पन्न की। यह सन्धि महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई और पंजाब के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ सिद्ध हुई।
अमृतसर की सन्धि की प्रमुख शर्तें
➣ सतलज नदी को अंग्रेजी राज्य तथा महाराजा रणजीत सिंह के राज्य की सीमा स्वीकार किया गया।
➣ रणजीत सिंह ने सतलज नदी के पूर्व स्थित सिक्ख रियासतों पर अपना दावा छोड़ दिया तथा भविष्य में वहाँ हस्तक्षेप न करने का वचन दिया।
➣ अंग्रेजों ने सतलज नदी के पश्चिम में रणजीत सिंह के अधिकार को स्वीकार कर लिया तथा उनके राज्य में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया।
➣ दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण गतिविधियों से दूर रहने तथा मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने पर सहमति व्यक्त की।
अमृतसर की सन्धि का प्रभाव
➣ इस सन्धि के परिणामस्वरूप रणजीत सिंह का पूर्व दिशा में विस्तार पूर्णतः रुक गया। सतलज के पूर्व स्थित सिक्ख रियासतें अंग्रेजों के संरक्षण में चली गईं।
➣ दूसरी ओर अंग्रेजों ने पंजाब में रणजीत सिंह की सर्वोच्च स्थिति को स्वीकार कर लिया। इससे उनके राज्य को वैधानिक मान्यता मिली तथा पंजाब में उनका राजनीतिक प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हो गया।
➣ पूर्व दिशा में विस्तार का मार्ग बंद होने के बाद रणजीत सिंह ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति उत्तर एवं उत्तर-पश्चिम की ओर केन्द्रित कर दी। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने आगे चलकर अटक, मुल्तान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्वपूर्ण प्रदेशों पर अधिकार स्थापित किया।
➣ इतिहासकारों का मत है कि अमृतसर की सन्धि दोनों पक्षों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। अंग्रेजों ने सतलज के पूर्व अपने प्रभाव को सुरक्षित कर लिया, जबकि रणजीत सिंह को पश्चिम दिशा में अपने साम्राज्य के विस्तार का अवसर मिल गया।
➣ यद्यपि कुछ सिक्ख सरदार इस सन्धि से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि इससे सतलज के पूर्व रहने वाले अनेक सिक्ख राज्य अंग्रेजों के प्रभाव में चले गए। इसलिए एक समकालीन सिक्ख सैनिक ने इस सन्धि पर टिप्पणी करते हुए कहा था— आज रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। यह कथन इस सन्धि से उत्पन्न निराशा का प्रतीक माना जाता है।
25 अप्रैल 1809 ई. की अमृतसर की सन्धि ने सतलज नदी को अंग्रेजों और महाराजा रणजीत सिंह के राज्यों की सीमा निर्धारित किया। इसके बाद रणजीत सिंह ने पूर्व के स्थान पर उत्तर-पश्चिम की ओर अपने साम्राज्य के विस्तार की नीति अपनाई।
अमृतसर की सन्धि के बाद रणजीत सिंह की नीति
➣ 1809 ई. की अमृतसर सन्धि के बाद महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच स्पष्ट रूप से प्रभाव-क्षेत्र निर्धारित हो गया। सतलज नदी के पूर्व की ओर विस्तार का मार्ग बंद हो जाने के कारण रणजीत सिंह ने अपनी राजनीतिक एवं सैन्य नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
➣ रणजीत सिंह यह भली-भाँति समझते थे कि उस समय अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन चुकी थी। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों से अनावश्यक सैन्य संघर्ष से बचते हुए अपनी शक्ति को संगठित करने और राज्य को सुदृढ़ बनाने की नीति अपनाई।
➣ अमृतसर की सन्धि के बाद रणजीत सिंह ने अपना सम्पूर्ण ध्यान उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम की ओर केन्द्रित कर दिया। उस समय इन क्षेत्रों में अफगान सरदारों का प्रभाव था तथा वहाँ कोई सुदृढ़ शासन व्यवस्था नहीं थी। रणजीत सिंह ने इसे भविष्य में साम्राज्य विस्तार के लिए उपयुक्त अवसर माना।
➣ उन्होंने सबसे पहले अपने राज्य की आन्तरिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया। प्रशासन में सुधार किए, सेना का पुनर्गठन किया तथा आधुनिक तोपखाने और घुड़सवार सेना को अधिक संगठित बनाया। यही सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था आगे चलकर उनकी विजय अभियानों की आधारशिला बनी।
➣ रणजीत सिंह की विदेश नीति अत्यन्त व्यावहारिक थी। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे, किन्तु अपने राज्य के आन्तरिक मामलों में किसी भी प्रकार का अंग्रेजी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया। यही कारण था कि उनके शासनकाल में अंग्रेज पंजाब की सीमा के भीतर अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर सके।
➣ उनका उद्देश्य केवल नए प्रदेशों पर अधिकार करना नहीं था, बल्कि एक ऐसे शक्तिशाली एवं संगठित राज्य का निर्माण करना था जो उत्तर-पश्चिम से होने वाले विदेशी आक्रमणों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके तथा पंजाब में स्थायी शान्ति और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखे।
➣ इतिहासकारों के अनुसार अमृतसर की सन्धि रणजीत सिंह की व्यावहारिक कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण थी। यद्यपि उन्हें सतलज के पूर्व विस्तार का अधिकार छोड़ना पड़ा, किन्तु इसके बदले उन्हें उत्तर-पश्चिम में अपने राज्य को सुदृढ़ करने तथा भविष्य के विजय अभियानों की तैयारी करने का पर्याप्त अवसर मिल गया।
अफगानिस्तान एवं अंग्रेजों के साथ सम्बन्ध
शाहशुजा एवं कोहिनूर हीरा
➣ महाराजा रणजीत सिंह की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य पंजाब की उत्तर-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित बनाना तथा अफगान आक्रमणों पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना था। इसी कारण उन्होंने अफगानिस्तान की आन्तरिक राजनीति पर भी गहरी दृष्टि बनाए रखी।
➣ 1809 ई. में अफगानिस्तान के शासक शाहशुजा को उसके प्रतिद्वन्द्वी महमूद शाह ने गद्दी से हटाकर बंदी बना लिया। बाद में शाहशुजा ने पंजाब आकर महाराजा रणजीत सिंह से सहायता की प्रार्थना की।
➣ रणजीत सिंह ने शाहशुजा को संरक्षण प्रदान किया तथा उसे पुनः अफगान राजनीति में स्थापित करने में सहायता की। इसके बदले शाहशुजा ने प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को भेंट किया।
➣ कोहिनूर हीरा मूलतः भारत का प्रसिद्ध हीरा था, जिसे 1739 ई. में नादिरशाह दिल्ली से लूटकर फारस ले गया था। बाद में यह अफगान शासकों के अधिकार में आया और अंततः शाहशुजा के माध्यम से रणजीत सिंह के पास पहुँचा।
➣ कोहिनूर की प्राप्ति केवल एक बहुमूल्य रत्न प्राप्त करना नहीं था, बल्कि यह रणजीत सिंह की बढ़ती राजनीतिक प्रतिष्ठा तथा अफगानिस्तान की राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव का भी प्रतीक माना जाता है।
अंग्रेजों से कूटनीतिक सम्बन्ध
➣ अमृतसर की सन्धि (1809 ई.) के बाद लगभग तीन दशकों तक महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे। दोनों पक्ष एक-दूसरे की शक्ति से परिचित थे और प्रत्यक्ष युद्ध से बचना चाहते थे।
➣ 1831 ई. में अंग्रेज अधिकारी एलेक्जेण्डर बर्न्स लाहौर दरबार पहुँचा। उसका घोषित उद्देश्य महाराजा रणजीत सिंह को इंग्लैण्ड के राजा विलियम चतुर्थ का उपहार भेंट करना था, किन्तु वास्तविक उद्देश्य सिंध तथा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की राजनीतिक एवं सामरिक जानकारी प्राप्त करना भी था।
➣ इसी वर्ष 1831 ई. में महाराजा रणजीत सिंह और गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक की ऐतिहासिक भेंट रोपड़ (रूपनगर) में हुई, जिसे रोपड़ सम्मेलन के नाम से जाना जाता है।
➣ रोपड़ सम्मेलन में दोनों शासकों ने मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने, व्यापार को प्रोत्साहित करने तथा उत्तर-पश्चिम की राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार-विमर्श किया। यद्यपि दोनों पक्षों ने औपचारिक मित्रता का प्रदर्शन किया, फिर भी प्रत्येक दूसरे की गतिविधियों पर सतर्क दृष्टि रखे हुए था।
त्रिपक्षीय सन्धि (1838 ई.)
➣ 1830 के दशक में मध्य एशिया में रूस के बढ़ते प्रभाव से अंग्रेज चिंतित थे। उन्हें आशंका थी कि रूस अफगानिस्तान के मार्ग से भारत की ओर बढ़ सकता है। इस कारण अंग्रेजों ने अफगानिस्तान में अपने अनुकूल शासन स्थापित करने की योजना बनाई।
➣ इसी उद्देश्य से 1838 ई. में अंग्रेजों, महाराजा रणजीत सिंह तथा अपदस्थ अफगान शासक शाहशुजा के बीच एक त्रिपक्षीय सन्धि सम्पन्न हुई।
➣ इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज शाहशुजा को पुनः अफगानिस्तान का शासक बनाने में सहायता करेंगे, जबकि महाराजा रणजीत सिंह अंग्रेजों के अभियान का विरोध नहीं करेंगे। साथ ही पंजाब की सीमाओं और रणजीत सिंह के अधिकारों को भी मान्यता दी गई।
➣ यद्यपि रणजीत सिंह ने इस सन्धि को स्वीकार किया, फिर भी उन्होंने अपनी सेना को अंग्रेजों के साथ अफगानिस्तान भेजने से परहेज़ किया। वे अंग्रेजों की शक्ति से परिचित थे, किन्तु पंजाब की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते थे।
➣ त्रिपक्षीय सन्धि महाराजा रणजीत सिंह के जीवन की अंतिम प्रमुख कूटनीतिक उपलब्धि मानी जाती है। इसके कुछ ही महीनों बाद 27 जून 1839 ई. को उनका निधन हो गया।
कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को शाहशुजा से प्राप्त हुआ था।
रणजीत सिंह का साम्राज्य विस्तार
प्रारम्भिक विजय अभियान
➣ 1809 ई. की अमृतसर सन्धि के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी विस्तारवादी नीति का केन्द्र उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम दिशा को बनाया।
➣ चूँकि सतलज नदी के पूर्व की ओर विस्तार पर अंग्रेजों की रोक लग चुकी थी, इसलिए उन्होंने अफगानों तथा स्थानीय सरदारों के अधीन क्षेत्रों को अपने राज्य में सम्मिलित करने का निर्णय लिया।
➣ इसी समय कांगड़ा के शासक संसार चन्द्र ने गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा के आक्रमण से बचने के लिए रणजीत सिंह से सहायता माँगी।
➣ रणजीत सिंह ने गोरखाओं को पराजित कर 1809 ई. में कांगड़ा दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इससे हिमालयी क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ा तथा उत्तर दिशा में विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
➣ इसके बाद 1813 ई. में रणजीत सिंह ने सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अटक पर अधिकार कर लिया। अटक सिंधु नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख दुर्ग था, जो अफगानिस्तान से भारत आने वाले मार्ग की सुरक्षा के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता था।
पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी विजय अभियान
➣ 1818 ई. में रणजीत सिंह ने अपने सेनापति मिसर दीवान चन्द के नेतृत्व में मुल्तान पर आक्रमण किया।
➣ मुल्तान के नवाब मुजफ्फर खाँ ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया, किन्तु अन्ततः वह पराजित हुआ और मुल्तान सिक्ख साम्राज्य का भाग बन गया। इस विजय से पंजाब के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र पर रणजीत सिंह का अधिकार स्थापित हो गया।
➣ 1819 ई. में रणजीत सिंह की सेना ने कश्मीर पर अधिकार कर लिया। उस समय कश्मीर अफगानों के अधीन था। कश्मीर की विजय न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी लाभदायक सिद्ध हुई, क्योंकि वहाँ का शॉल उद्योग एवं व्यापार अत्यन्त प्रसिद्ध था।
➣ 1823 ई. में नौशेरा के युद्ध में रणजीत सिंह ने अफगान सेनाओं को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय के फलस्वरूप पेशावर क्षेत्र पर सिक्खों का प्रभाव स्थापित हो गया तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अफगानों का प्रभुत्व काफी कमजोर पड़ गया।
➣ आगे चलकर 1834 ई. में रणजीत सिंह ने पेशावर पर स्थायी अधिकार स्थापित कर वहाँ अपने प्रतिनिधि की नियुक्ति की। इस विजय के साथ ही सिक्ख साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा अत्यन्त सुदृढ़ हो गई।
साम्राज्य का विस्तार एवं महत्व
➣ लगातार विजय अभियानों के परिणामस्वरूप रणजीत सिंह का साम्राज्य उत्तर में कश्मीर और लद्दाख, पश्चिम में पेशावर तथा अटक, दक्षिण में मुल्तान और पूर्व में सतलज नदी तक विस्तृत हो गया। उस समय यह भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे शक्तिशाली देशी राज्य था।
➣ रणजीत सिंह ने जीते हुए प्रदेशों में केवल सैन्य अधिकार स्थापित नहीं किया, बल्कि वहाँ सुदृढ़ प्रशासन, कर व्यवस्था तथा सुरक्षा प्रणाली भी विकसित की। इसी कारण उनके राज्य में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि दोनों का विकास हुआ।
➣ उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित कर रणजीत सिंह ने सदियों से होने वाले अफगान आक्रमणों पर प्रभावी रोक लगा दी। यही उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
रणजीत सिंह के प्रमुख विजय अभियान| वर्ष | विजय | महत्त्व |
|---|---|---|
| 1809 ई. | कांगड़ा दुर्ग | हिमालयी क्षेत्र में प्रभाव स्थापित। |
| 1813 ई. | अटक | उत्तर-पश्चिमी सीमा सुरक्षित हुई। |
| 1818 ई. | मुल्तान | दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र पर अधिकार। |
| 1819 ई. | कश्मीर | अफगान शासन का अंत। |
| 1823 ई. | नौशेरा का युद्ध | अफगानों पर निर्णायक विजय। |
| 1834 ई. | पेशावर | स्थायी अधिकार स्थापित हुआ। |
इतिहासकारों एवं समकालीन यात्री
➣ फ्रांसीसी यात्री विक्टर जैकमों ने रणजीत सिंह के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए लिखा कि मैंने पंजाब में रणजीत सिंह से अधिक कुरूप व्यक्ति नहीं देखा, किन्तु उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि उनसे दृष्टि हटाना कठिन था। यह टिप्पणी उनके असाधारण नेतृत्व और प्रभावशाली व्यक्तित्व को दर्शाती है।
➣ इतिहासकार जे. टी. व्हीलर के अनुसार— यदि रणजीत सिंह एक पीढ़ी पहले पैदा हुए होते, तो सम्भवतः वे पूरे हिन्दुस्तान को जीत लेते। यह कथन उनकी सैन्य प्रतिभा और राजनीतिक क्षमता का प्रमाण माना जाता है।
मृत्यु एवं विरासत
➣ महाराजा रणजीत सिंह का निधन 27 जून 1839 ई. को लाहौर में हुआ। वहीं उनकी स्मृति में भव्य समाधि (समाधि-ए-रणजीत सिंह) का निर्माण किया गया, जो आज भी ऐतिहासिक महत्व का प्रमुख स्मारक है।
➣ उनकी मृत्यु के बाद सिक्ख साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हो गया। कुछ ही वर्षों में साम्राज्य राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो गया, जिसका लाभ उठाकर अंग्रेजों ने पंजाब की राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।
➣ अन्ततः 1845–46 ई. के प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध तथा 1848–49 ई. के द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध के बाद 1849 ई. में पंजाब का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कर लिया गया। यदि रणजीत सिंह के समान सक्षम नेतृत्व कुछ और वर्षों तक बना रहता, तो सम्भवतः पंजाब का इतिहास भिन्न होता।
खड़ग सिंह (1839-1840 ई.)
➣ 27 जून 1839 ई. को महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के साथ ही सिक्ख साम्राज्य के इतिहास का एक नया और अशांत दौर प्रारम्भ हुआ। उनके निधन के बाद उत्तराधिकार का प्रश्न अत्यन्त जटिल बन गया।
➣ रणजीत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र खड़ग सिंह को परम्परा के अनुसार सिक्ख साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया और वे 1839 ई. में लाहौर की गद्दी पर बैठे। किन्तु उनमें अपने पिता जैसी नेतृत्व क्षमता, दृढ़ इच्छाशक्ति तथा राजनीतिक दूरदर्शिता का अभाव था।
➣ समकालीन स्रोतों के अनुसार खड़ग सिंह को अफीम सेवन की आदत थी तथा वे शासन-प्रशासन में विशेष रुचि नहीं लेते थे। परिणामस्वरूप वे दरबार के प्रभावशाली सरदारों पर निर्भर होते चले गए।
➣ खड़ग सिंह के शासनकाल में उनके शक्तिशाली वजीर राजा ध्यान सिंह डोगरा का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। शीघ्र ही राज्य के अधिकांश प्रशासनिक तथा सैन्य निर्णय उसी के परामर्श से लिए जाने लगे और महाराजा की भूमिका केवल औपचारिक शासक तक सीमित होकर रह गई।
➣ महाराजा रणजीत सिंह के समय जिस दृढ़ नेतृत्व ने विभिन्न सरदारों और मिसलों को एक सूत्र में बाँध रखा था, उसके अभाव में अब सत्ता संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने लगी। यही उत्तराधिकार संकट आगे चलकर लाहौर दरबार की गुटबाजी का प्रमुख कारण बना।
दरबारी गुटबाजी एवं सत्ता संघर्ष
➣ खड़ग सिंह की कमजोरी का लाभ उठाकर लाहौर दरबार के प्रभावशाली सरदारों ने वास्तविक सत्ता अपने हाथों में लेने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप दरबार शीघ्र ही दो शक्तिशाली गुटों में विभाजित हो गया।
➣ पहला गुट डोगरा सरदारों का था, जिसका नेतृत्व वजीर राजा ध्यान सिंह डोगरा कर रहा था। इस गुट में उसके भाई गुलाब सिंह तथा सुचेत सिंह भी शामिल थे। प्रशासन, सेना और राजकोष पर धीरे-धीरे इनका प्रभाव बढ़ता गया।
➣ दूसरा गुट संधावालिया सरदारों का था। इसमें अतर सिंह, लेहना सिंह, अजीत सिंह तथा चेत सिंह जैसे प्रभावशाली सरदार सम्मिलित थे। ये स्वयं को महाराजा रणजीत सिंह के परिवार का निकट संबंधी मानते थे और लाहौर दरबार में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे।
➣ दोनों गुटों के बीच संघर्ष का मुख्य उद्देश्य सिक्ख साम्राज्य की वास्तविक सत्ता पर अधिकार स्थापित करना था। इसी दौरान खड़ग सिंह के पुत्र नौनिहाल सिंह भी दरबार की राजनीति में सक्रिय हो गए और उनका झुकाव ध्यान सिंह डोगरा की ओर होने लगा। इससे खड़ग सिंह की स्थिति और अधिक कमजोर हो गई।
➣ दरबार की यह गुटबाजी केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सीधा प्रभाव सिक्ख साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, सेना और राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ा। साम्राज्य की एकता धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
➣ अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी इन घटनाओं पर लगातार नज़र रखे हुए थी। सिक्ख साम्राज्य की शक्ति के कारण उसने तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया, किन्तु लाहौर दरबार में बढ़ती अव्यवस्था को भविष्य के लिए एक अवसर के रूप में देखना प्रारम्भ कर दिया।
| दरबारी गुट | प्रमुख सदस्य |
|---|---|
| डोगरा गुट | ध्यान सिंह, गुलाब सिंह एवं सुचेत सिंह |
| संधावालिया गुट | अतर सिंह, लेहना सिंह, अजीत सिंह एवं चेत सिंह |
➣ इन्हीं दोनों गुटों की प्रतिद्वंद्विता आगे चलकर सिक्ख साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण बनी।
शासन का अंत
➣ दरबार में बढ़ती गुटबाजी तथा वजीर राजा ध्यान सिंह डोगरा के बढ़ते प्रभाव के कारण महाराजा खड़ग सिंह की स्थिति दिन-प्रतिदिन कमजोर होती गई। वास्तविक सत्ता पूरी तरह दरबार के शक्तिशाली सरदारों के हाथों में चली गई।
➣ अंततः वजीर ध्यान सिंह ने खड़ग सिंह को शासन से अलग कर दिया। उन्हें लाहौर किले में नज़रबंद कर दिया गया तथा राज्य का अधिकांश कार्य उनके पुत्र नौनिहाल सिंह के नाम से संचालित होने लगा।
➣ इस प्रकार खड़ग सिंह जीवित रहते हुए भी केवल नाममात्र के शासक बनकर रह गए। 5 नवम्बर 1840 ई. को खड़ग सिंह की कैद के दौरान मृत्यु हो गई।
➣ अनेक इतिहासकारों का मत है कि उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे विष देकर मार दिया गया। हालांकि इस संबंध में समकालीन स्रोतों में एकमत नहीं है, इसलिए इसे निश्चित रूप से सिद्ध नहीं माना जाता।
➣ खड़ग सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र नौनिहाल सिंह को सिक्ख साम्राज्य का उत्तराधिकारी माना गया। किन्तु उसी दिन अपने पिता के अंतिम संस्कार से लौटते समय लाहौर किले के प्रवेश द्वार का एक भाग गिरने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ समय बाद उनकी भी मृत्यु हो गई।
➣ एक ही दिन में पिता और पुत्र की मृत्यु ने सिक्ख साम्राज्य को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया। उत्तराधिकार को लेकर पुनः संघर्ष प्रारम्भ हो गया और लाहौर दरबार की गुटबाजी पहले से अधिक तीव्र हो गई।
➣ खड़ग सिंह का शासनकाल बहुत छोटा रहा, किन्तु इसी काल में सिक्ख साम्राज्य की आन्तरिक कमजोरी स्पष्ट रूप से सामने आ गई। साम्राज्य धीरे-धीरे राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ने लगा।
शेर सिंह (1841-1843 ई.)
➣ 5 नवम्बर 1840 ई. को खड़ग सिंह तथा उनके पुत्र नौनिहाल सिंह की मृत्यु के बाद सिक्ख साम्राज्य में उत्तराधिकार का नया संकट उत्पन्न हो गया। लाहौर दरबार दो विरोधी गुटों में विभाजित हो गया।
➣ संधावालिया सरदारों ने नौनिहाल सिंह की माता रानी चाँद कौर को महारानी घोषित कर उनके दावे का समर्थन किया, जबकि डोगरा सरदारों ने महाराजा रणजीत सिंह के अन्य पुत्र शेर सिंह को वैध उत्तराधिकारी माना।
➣ दोनों पक्षों के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हो गया। कुछ समय तक लाहौर में रानी चाँद कौर का प्रभाव बना रहा, किन्तु अधिकांश सिक्ख सेना तथा प्रभावशाली सरदार धीरे-धीरे शेर सिंह के पक्ष में आते गए।
➣ अंततः जनवरी 1841 ई. में शेर सिंह ने लाहौर पर अधिकार स्थापित कर स्वयं को सिक्ख साम्राज्य का महाराजा घोषित कर दिया। इसके बाद रानी चाँद कौर ने भी समझौता कर अपना दावा वापस ले लिया और उन्हें सम्मानपूर्वक अलग निवास तथा जागीर प्रदान की गई।
➣ इस प्रकार शेर सिंह सिक्ख साम्राज्य के तीसरे महाराजा बने। यद्यपि उन्होंने सत्ता प्राप्त कर ली थी, किन्तु दरबार की गुटबाजी समाप्त नहीं हुई। डोगरा सरदारों, संधावालिया परिवार तथा खालसा सेना के बीच सत्ता संघर्ष लगातार जारी रहा, जिससे उनके शासन की शुरुआत ही राजनीतिक अस्थिरता के वातावरण में हुई।
शासनकाल एवं दरबारी राजनीति
➣ शेर सिंह स्वभाव से उदार, मिलनसार तथा साहसी व्यक्ति थे, किन्तु वे भी अपने पिता महाराजा रणजीत सिंह की भाँति साम्राज्य पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर सके। उनके शासनकाल में लाहौर दरबार की गुटबाजी लगातार बनी रही।
➣ शेर सिंह के शासनकाल में वास्तविक सत्ता का अधिकांश भाग वजीर राजा ध्यान सिंह डोगरा के हाथों में था। ध्यान सिंह पहले से ही रणजीत सिंह तथा खड़ग सिंह के शासनकाल में अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति बन चुका था और अब भी वही राज्य का सबसे शक्तिशाली मंत्री बना रहा।
➣ राजा ध्यान सिंह डोगरा लगभग 1818 ई. से 1843 ई. तक लगातार लगभग 25 वर्षों तक सिक्ख साम्राज्य का वजीर रहा। यह सिक्ख साम्राज्य के इतिहास में किसी भी वजीर का सबसे लंबा कार्यकाल माना जाता है।
➣ दूसरी ओर संधावालिया सरदार शेर सिंह को वैध शासक मानने के लिए तैयार नहीं थे। वे अवसर मिलते ही पुनः सत्ता प्राप्त करना चाहते थे। परिणामस्वरूप लाहौर दरबार षड्यंत्रों, अविश्वास और राजनीतिक संघर्षों का केन्द्र बना रहा।
➣ इस समय तक खालसा सेना भी अत्यन्त शक्तिशाली हो चुकी थी। सैनिक केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे दरबार की राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगे थे। कई बार महत्वपूर्ण निर्णय सेना के दबाव में लिए जाते थे, जिससे महाराजा की स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती थी।
➣ सिक्ख साम्राज्य की आन्तरिक अस्थिरता पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी भी लगातार नज़र रखे हुए थी। यद्यपि अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया, किन्तु वे समझ चुके थे कि रणजीत सिंह के बाद पंजाब की राजनीतिक एकता धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
➣ इस प्रकार शेर सिंह के शासनकाल में बाहरी शत्रुओं की अपेक्षा आन्तरिक गुटबाजी और सत्ता संघर्ष सिक्ख साम्राज्य के लिए अधिक घातक सिद्ध हुए। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर शेर सिंह की हत्या तथा साम्राज्य में एक और उत्तराधिकार संकट का कारण बनीं।
शेर सिंह के शासनकाल में राजा ध्यान सिंह डोगरा सबसे प्रभावशाली वजीर था। इसी काल में खालसा सेना का राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा।
शासन का अंत
➣ शेर सिंह के शासनकाल में लाहौर दरबार की गुटबाजी समाप्त नहीं हुई। विशेषकर संधावालिया सरदार अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे ताकि पुनः सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित कर सकें।
➣ अंततः 15 सितम्बर 1843 ई. को संधावालिया सरदार अजीत सिंह ने सैन्य निरीक्षण के बहाने महाराजा शेर सिंह से भेंट की और निकट से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद उनका शव तलवार से क्षत-विक्षत कर दिया गया।
➣ उसी दिन वजीर राजा ध्यान सिंह डोगरा को भी छलपूर्वक बुलाकर उनकी हत्या कर दी गई। ध्यान सिंह लगभग 25 वर्षों तक सिक्ख साम्राज्य का सबसे प्रभावशाली वजीर रहा था। उसकी मृत्यु से लाहौर दरबार का शक्ति-संतुलन पूरी तरह बदल गया।
➣ शेर सिंह और ध्यान सिंह की हत्या के बाद लाहौर दरबार में पुनः अराजकता फैल गई। कुछ समय के लिए संधावालिया सरदारों का प्रभाव बढ़ा, किन्तु डोगरा पक्ष ने शीघ्र ही उनका प्रतिरोध किया। इस संघर्ष में हीरा सिंह डोगरा (ध्यान सिंह का पुत्र) ने सेना के सहयोग से स्थिति पर नियंत्रण स्थापित किया।
➣ शेर सिंह की हत्या के साथ ही सिक्ख साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और अधिक गहरी हो गई। लगातार बदलते शासकों, दरबारी षड्यंत्रों तथा सत्ता संघर्ष ने साम्राज्य को भीतर से कमजोर कर दिया। आगे चलकर यही परिस्थितियाँ अंग्रेजों को पंजाब के मामलों में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान करने लगीं।
➣ इसके पश्चात सितम्बर 1843 ई. में महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र दलीप सिंह को सिक्ख साम्राज्य का महाराजा घोषित किया गया। चूँकि उस समय उनकी आयु बहुत कम थी, इसलिए उनकी माता रानी जिंदन कौर को उनकी संरक्षिका (राजप्रतिनिधि) बनाया गया, जबकि राज्य के वास्तविक प्रशासन में दरबारी सरदारों का प्रभाव बना रहा।
दिलीप सिंह (1843–1849 ई.)
➣ सितम्बर 1843 ई. में महाराजा शेर सिंह की हत्या के बाद सिक्ख साम्राज्य एक बार फिर उत्तराधिकार संकट में घिर गया।
➣ ऐसी परिस्थिति में महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र दिलीप सिंह को सिक्ख साम्राज्य का महाराजा घोषित किया गया। उस समय उनकी आयु लगभग पाँच वर्ष थी।
➣ चूँकि दिलीप सिंह अल्पवयस्क थे, इसलिए उनकी माता रानी जिंदन कौर (झिंदाँ) को उनकी संरक्षिका बनाया गया। औपचारिक रूप से शासन महाराजा के नाम पर चलता था, किन्तु वास्तविक सत्ता दरबार के प्रभावशाली सरदारों और वजीरों के हाथों में बनी रही।
➣ दिलीप सिंह सिक्ख साम्राज्य के अंतिम महाराजा थे। उनके शासनकाल में लाहौर दरबार की आन्तरिक गुटबाजी, खालसा सेना का बढ़ता प्रभाव तथा अंग्रेजों की राजनीतिक गतिविधियाँ निरन्तर बढ़ती रहीं, जिससे साम्राज्य की स्थिति दिन-प्रतिदिन कमजोर होती गई।
दरबारी राजनीति एवं सत्ता संघर्ष
➣ शेर सिंह की मृत्यु के बाद हीरा सिंह डोगरा (वजीर ध्यान सिंह डोगरा का पुत्र) वजीर बना। उसने कुछ समय तक लाहौर दरबार पर अपना प्रभाव बनाए रखा, किन्तु दरबारी षड्यंत्रों और सेना के असंतोष के कारण उसका प्रभाव अधिक समय तक नहीं टिक सका।
➣ इसके बाद रानी जिंदन कौर के बड़े भाई जवाहर सिंह को वजीर बनाया गया। उन्होंने दरबार में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया, किन्तु उनके निर्णयों से खालसा सेना असंतुष्ट हो गई।
➣ 11 सितम्बर 1845 ई. को रणजीत सिंह के पुत्र पशौरा सिंह की हत्या करा देने के कारण जवाहर सिंह के विरुद्ध असंतोष और अधिक बढ़ गया। अंततः 21 सितम्बर 1845 ई. को खालसा सेना ने उनकी हत्या कर दी।
➣ जवाहर सिंह की मृत्यु के बाद लाल सिंह को वजीर तथा तेज सिंह को सिक्ख सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। आगे चलकर यही दोनों व्यक्ति प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध में सिक्ख सेना का नेतृत्व करते हुए दिखाई देते हैं।
शासनकाल की प्रमुख विशेषताएँ
➣ दिलीप सिंह के शासनकाल में लाहौर दरबार की आन्तरिक राजनीति अत्यन्त अस्थिर रही। दरबारी सरदारों के आपसी संघर्ष, वजीरों के लगातार परिवर्तन तथा खालसा सेना के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण केन्द्रीय शासन लगभग निष्प्रभावी हो गया।
➣ दूसरी ओर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियों पर लगातार नज़र रखे हुए थी। कम्पनी को यह स्पष्ट दिखाई देने लगा था कि रणजीत सिंह के बाद सिक्ख साम्राज्य आन्तरिक रूप से कमजोर हो चुका है।
➣ इन्हीं परिस्थितियों में अंग्रेजों और सिक्खों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया, जिसका परिणाम 1845 ई. में प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध के रूप में सामने आया। इस युद्ध ने सिक्ख साम्राज्य के भविष्य की दिशा पूरी तरह बदल दी।
प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1845–46 ई.)
➣ 1845 ई. तक पंजाब और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच सम्बन्ध अत्यन्त तनावपूर्ण हो चुके थे। दोनों पक्ष सतलज नदी के किनारे अपनी-अपनी सैन्य तैयारियाँ तेज कर रहे थे और सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति बनने लगी थी।
➣ इसी समय अंग्रेजों ने पंजाब की सीमा पर अपनी सैन्य तैयारियाँ तेज कर दीं। गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सतलज नदी के निकट बड़ी संख्या में सैनिक तैनात किए।
➣ साथ ही मेजर जॉर्ज ब्रोडफुट को पंजाब सीमा पर ब्रिटिश राजनीतिक एजेन्ट नियुक्त किया गया। ब्रोडफुट अपनी सिक्ख-विरोधी नीति के लिए प्रसिद्ध था, जिससे दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और अधिक बढ़ गया।
➣ दूसरी ओर लाहौर दरबार में रानी जिंदन कौर, वजीर लाल सिंह तथा सेनापति तेज सिंह के नेतृत्व में शासन चल रहा था। खालसा सेना स्वयं को साम्राज्य की सबसे बड़ी शक्ति मानती थी और अंग्रेजों की बढ़ती गतिविधियों को पंजाब की स्वतंत्रता के लिए खतरा समझ रही थी।
➣ बढ़ते तनाव के बीच दिसम्बर 1845 ई. में सिक्ख सेना ने सतलज नदी पार कर अंग्रेजों के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश किया। अंग्रेजों ने इसे 1809 ई. की अमृतसर सन्धि का उल्लंघन मानते हुए युद्ध की घोषणा कर दी। इसी के साथ प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1845–46 ई.) प्रारम्भ हुआ।
प्रमुख युद्ध➣ इस युद्ध के समय अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर ह्यू गफ कर रहे थे, जबकि गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग स्वयं भी सेना के साथ उपस्थित थे। सिक्ख सेना का नेतृत्व औपचारिक रूप से लाल सिंह तथा तेज सिंह के हाथों में था।
➣ इस युद्ध के दौरान पाँच प्रमुख युद्ध लड़े गए-| युद्ध | तिथि | परिणाम |
|---|---|---|
| मुदकी का युद्ध | 18 दिसम्बर 1845 ई. | अंग्रेजों की विजय |
| फिरोजशाह का युद्ध | 21–22 दिसम्बर 1845 ई. | अंग्रेजों की विजय |
| बदोवाल का युद्ध | 21 जनवरी 1846 ई. | सिक्खों की सामरिक सफलता |
| आलीवाल का युद्ध | 28 जनवरी 1846 ई. | अंग्रेजों की विजय |
| सबराओं (सुबरांव) का युद्ध | 10 फरवरी 1846 ई. | अंग्रेजों की निर्णायक विजय |
➣ सबराओं के युद्ध में सिक्ख सेना की निर्णायक पराजय हुई। इसके बाद अंग्रेजों ने सतलज नदी पार कर लाहौर की ओर बढ़ते हुए राजधानी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
युद्ध का परिणाम
➣ प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध में सिक्खों की पराजय का एक प्रमुख कारण वजीर लाल सिंह और सेनापति तेज सिंह का संदिग्ध आचरण माना जाता है। अनेक इतिहासकारों का मत है कि दोनों ने युद्ध के दौरान प्रभावी नेतृत्व नहीं किया, जिससे सिक्ख सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी।
➣ इस युद्ध के बाद सिक्ख साम्राज्य अंग्रेजों के साथ 8 मार्च 1846 ई. को लाहौर की सन्धि करने के लिए विवश हो गया। इस सन्धि ने पंजाब की स्वतंत्रता को गम्भीर रूप से प्रभावित किया और अंग्रेजों का प्रभाव लाहौर दरबार पर बढ़ गया।
प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध 1845–46 ई. में लॉर्ड हार्डिंग के समय लड़ा गया। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर ह्यू गफ ने किया। इस युद्ध की निर्णायक लड़ाई सबराओं (10 फरवरी 1846 ई.) थी, जिसके बाद सिक्खों को लाहौर की सन्धि (8 मार्च 1846 ई.) स्वीकार करनी पड़ी।
लाहौर की सन्धि (1846 ई.)
➣ सबराओं के युद्ध (1846 ई.) में सिक्ख सेना की निर्णायक पराजय के बाद अंग्रेजी सेना ने सतलज नदी पार कर लाहौर की ओर बढ़ना प्रारम्भ कर दिया। पराजित सिक्ख दरबार के सामने अंग्रेजों से सन्धि करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं बचा।
➣ परिणामस्वरूप 8 मार्च 1846 ई. को सिक्ख साम्राज्य और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच लाहौर की सन्धि सम्पन्न हुई। इस सन्धि ने सिक्ख साम्राज्य की राजनीतिक स्वतंत्रता को गम्भीर रूप से सीमित कर दिया तथा पंजाब में अंग्रेजों के प्रभाव की औपचारिक शुरुआत हुई।
सन्धि की प्रमुख शर्तें
➣ लाहौर की सन्धि के अनुसार सिक्ख राज्य ने सतलज नदी के दक्षिण स्थित अपने सभी प्रदेश अंग्रेजों को सौंप दिए।
➣ सिक्ख दरबार ने अंग्रेजों को डेढ़ करोड़ (1.5 करोड़) रुपये युद्ध क्षतिपूर्ति (हर्जाना) देने का वचन दिया। किन्तु तत्काल पूरी राशि न दे पाने के कारण बाद में कुछ प्रदेश अंग्रेजों को सौंपने पड़े।
➣ सन्धि के अंतर्गत दिलीप सिंह को सिक्ख साम्राज्य का महाराजा तथा उनकी माता रानी जिंदन कौर को उनकी संरक्षिका के रूप में मान्यता दी गई। साथ ही लाल सिंह को वजीर तथा तेज सिंह को सेनापति के पद पर बने रहने दिया गया।
➣ लाहौर दरबार में अंग्रेजों की ओर से एक ब्रिटिश रेजीडेन्ट नियुक्त करने का भी प्रावधान किया गया। इस पद पर सर हेनरी लॉरेन्स को प्रथम ब्रिटिश रेजीडेन्ट नियुक्त किया गया, जिसने आगे चलकर पंजाब के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ चूँकि सिक्ख दरबार डेढ़ करोड़ रुपये की पूरी क्षतिपूर्ति नहीं दे सका, इसलिए शेष राशि के बदले कश्मीर तथा हजारा का क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिया गया।
➣ बाद में अंग्रेजों ने कश्मीर को गुलाब सिंह डोगरा को एक करोड़ रुपये में बेच दिया, जिसके परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर में डोगरा शासन की स्थापना हुई।
➣ लाहौर की सन्धि स्थायी सिद्ध नहीं हुई। अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप और सिक्ख दरबार की कमजोर स्थिति के कारण उसी वर्ष 16 दिसम्बर 1846 ई. को भैरोंवाल की पूरक सन्धि करनी पड़ी, जिसने पंजाब की स्वतंत्रता को और अधिक सीमित कर दिया।
भैरोंवाल की पूरक सन्धि (1846 ई.)
➣ 8 मार्च 1846 ई. की लाहौर की सन्धि के बाद भी पंजाब की राजनीतिक स्थिति स्थिर नहीं हो सकी। लाहौर दरबार में दरबारी षड्यंत्र, खालसा सेना का असंतोष तथा अंग्रेजों का बढ़ता हस्तक्षेप लगातार जारी रहा।
➣ अंग्रेजों ने रानी जिंदन कौर और वजीर लाल सिंह पर कश्मीर में विद्रोह को प्रोत्साहित करने तथा अंग्रेज-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने पंजाब के प्रशासन पर और अधिक नियंत्रण स्थापित करने की योजना बनाई।
➣ परिणामस्वरूप 16 दिसम्बर 1846 ई. को सिक्ख दरबार और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच भैरोंवाल की पूरक सन्धि सम्पन्न हुई। यह सन्धि लाहौर की सन्धि से भी अधिक कठोर सिद्ध हुई।
सन्धि की प्रमुख शर्तें
➣ इस सन्धि के अनुसार महाराजा दिलीप सिंह के वयस्क होने तक पंजाब में एक संरक्षक परिषद के माध्यम से शासन चलाया जाएगा। इस परिषद में आठ प्रमुख सिक्ख सरदार शामिल किए गए, किन्तु इसका संचालन ब्रिटिश रेजीडेन्ट के नियंत्रण में होना था।
➣ सर हेनरी लॉरेन्स को लाहौर में ब्रिटिश रेजीडेन्ट के रूप में व्यापक प्रशासनिक अधिकार प्रदान किए गए। परिणामस्वरूप पंजाब के महत्वपूर्ण निर्णयों पर अंग्रेजों का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
➣ पंजाब में अंग्रेजी सेना को बनाए रखने का निर्णय लिया गया तथा उसके व्यय के लिए सिक्ख दरबार को प्रतिवर्ष लगभग 22 लाख रुपये देने पड़े। इससे पंजाब की आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
➣ रानी जिंदन कौर को संरक्षिका के पद से हटा दिया गया तथा उन्हें 48,000 रुपये वार्षिक पेंशन देकर पहले शेखूपुरा और बाद में बनारस भेज दिया गया। इसके साथ ही लाहौर दरबार में उनका राजनीतिक प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।
सन्धि का प्रभाव
➣ भैरोंवाल की पूरक सन्धि के बाद पंजाब का प्रशासन नाममात्र के लिए सिक्ख दरबार के अधीन रहा, जबकि वास्तविक सत्ता अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में चली गई।
➣ इस प्रकार भैरोंवाल की पूरक सन्धि ने सिक्ख साम्राज्य की स्वतंत्रता को लगभग समाप्त कर दिया और पंजाब में अंग्रेजी प्रभुत्व की नींव को और अधिक मजबूत बना दिया।
16 दिसम्बर 1846 ई. को हुई भैरोंवाल की पूरक सन्धि के तहत दिलीप सिंह के वयस्क होने तक शासन एक संरक्षक परिषद के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया गया।
सर हेनरी लॉरेन्स को व्यापक अधिकार प्राप्त हुए तथा रानी जिंदन कौर को संरक्षिका पद से हटाकर 48,000 रुपये वार्षिक पेंशन पर शेखूपुरा और बाद में बनारस भेज दिया गया।
द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1848–49 ई.)
➣ भैरोंवाल की पूरक सन्धि (1846 ई.) के बाद पंजाब का वास्तविक प्रशासन अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप से सिक्ख सरदारों, खालसा सेना तथा पंजाब की जनता में असंतोष लगातार बढ़ने लगा।
➣ 1848 ई. में मुल्तान के सूबेदार मूलराज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। अंग्रेजों ने उसके स्थान पर काहन सिंह को नया सूबेदार नियुक्त किया तथा कार्यभार ग्रहण कराने के लिए दो अंग्रेज अधिकारियों पैट्रिक एगन्यू और विलियम एंडरसन को मुल्तान भेजा।
➣ 19 अप्रैल 1848 ई. को मुल्तान में विद्रोहियों ने एगन्यू और एंडरसन की हत्या कर दी। यह घटना मुल्तान विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध हुई और यही द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध का तात्कालिक कारण बनी।
➣ उस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी थे। उन्होंने इस विद्रोह को पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का उपयुक्त अवसर माना और सिक्खों के विरुद्ध व्यापक सैन्य अभियान प्रारम्भ कर दिया।
प्रमुख युद्ध➣ द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व प्रारम्भ में सर ह्यू गफ ने किया, जबकि सिक्ख सेना का नेतृत्व प्रमुख रूप से शेर सिंह अटारीवाला ने किया।
| युद्ध | तिथि | परिणाम |
|---|---|---|
| रामनगर का युद्ध | 22 नवम्बर 1848 ई. | निर्णायक परिणाम नहीं, पर अंग्रेजों का सामरिक लाभ |
| चिलियाँवाला का युद्ध | 13 जनवरी 1849 ई. | अंग्रेज विजयी, किन्तु भारी क्षति |
| गुजरात का युद्ध | 21 फरवरी 1849 ई. | अंग्रेजों की निर्णायक विजय |
➣ चिलियाँवाला के युद्ध में अंग्रेजों को भारी जन-धन की हानि उठानी पड़ी। इसी कारण इसे अंग्रेजों की नाशकारी विजय भी कहा जाता है। इस युद्ध के बाद गवर्नर जनरल डलहौज़ी ने टिप्पणी की कि यह विजय हमें पराजय के समान महँगी पड़ी है।
➣ 21 फरवरी 1849 ई. को गुजरात के युद्ध में अंग्रेजों ने सिक्ख सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने अपनी शक्तिशाली तोपों का प्रभावी उपयोग किया, इसलिए इसे तोपों का युद्ध भी कहा जाता है।
युद्ध का परिणाम
➣ गुजरात के युद्ध में पराजय के बाद सिक्ख सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही सिक्ख साम्राज्य की सैन्य शक्ति लगभग समाप्त हो गई और अंग्रेजों का पंजाब पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
➣ 30 मार्च 1849 ई. को गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को औपचारिक रूप से अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। लगभग आधी शताब्दी तक अस्तित्व में रहने वाला सिक्ख साम्राज्य समाप्त हो गया।
➣ विलय के बाद सिक्ख साम्राज्य के अंतिम महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से हटा दिया गया। प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी अंग्रेजों के अधिकार में चला गया और बाद में ब्रिटेन भेज दिया गया।
➣ अंग्रेजों ने दलीप सिंह को वार्षिक पेंशन प्रदान कर पहले पंजाब से दूर रखा और बाद में उन्हें इंग्लैंड भेज दिया। वहीं उन्होंने आगे चलकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपना अधिकांश जीवन इंग्लैंड तथा यूरोप में व्यतीत किया।
➣ द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध केवल पंजाब की पराजय नहीं था, बल्कि यह भारत के अंतिम शक्तिशाली स्वतंत्र राज्यों में से एक के पतन का प्रतीक भी था। इसके बाद अंग्रेजों का सम्पूर्ण उत्तर-पश्चिम भारत पर अधिकार स्थापित हो गया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| समय | 1848–49 ई. (लॉर्ड डलहौज़ी) |
| तात्कालिक कारण | मुल्तान विद्रोह |
| प्रमुख युद्ध | रामनगर, चिलियाँवाला, गुजरात |
| परिणाम | 30 मार्च 1849 ई. को पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय |
पंजाब का विलय (1849 ई.) : लॉर्ड डलहौज़ी
➣ 30 मार्च 1849 ई. को पंजाब के अंग्रेजी साम्राज्य में विलय के बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नव-अधिग्रहित प्रदेश में एक स्थिर प्रशासन स्थापित करने की थी। इस उद्देश्य से अंग्रेजों ने पंजाब की शासन व्यवस्था का व्यापक पुनर्गठन किया।
➣ प्रारम्भ में पंजाब का प्रशासन किसी एक अधिकारी को न सौंपकर तीन कमिश्नरों के एक बोर्ड को सौंपा गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासन, राजस्व तथा न्यायिक कार्यों को अधिक व्यवस्थित ढंग से संचालित करना था।
तीन कमिश्नरों का बोर्ड
➣ हेनरी लॉरेंस को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। वे प्रशासनिक मामलों के प्रमुख अधिकारी थे और पंजाब में अंग्रेजी शासन की प्रारम्भिक नीतियों के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ जॉन लॉरेंस को भू-राजस्व विभाग का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने भूमि व्यवस्था, कर संग्रह तथा प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से पंजाब में अंग्रेजी राजस्व व्यवस्था को संगठित किया।
➣ चार्ल्स ग्रेनविल मैनसेल को न्याय विभाग का दायित्व दिया गया। वे न्यायिक व्यवस्था के संगठन तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे।
| अधिकारी | दायित्व |
|---|---|
| हेनरी लॉरेंस | बोर्ड के अध्यक्ष एवं प्रशासनिक विभाग |
| जॉन लॉरेंस | भू-राजस्व (Revenue) विभाग |
| चार्ल्स ग्रेनविल मैनसेल | न्याय विभाग |
बोर्ड का महत्व
➣ तीन कमिश्नरों की इस व्यवस्था ने पंजाब में अंग्रेजी शासन की प्रशासनिक नींव को मजबूत किया। भूमि व्यवस्था, न्यायिक सुधार, पुलिस व्यवस्था तथा संचार के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन इसी काल में प्रारम्भ हुए।
➣ यद्यपि यह बोर्ड प्रारम्भिक वर्षों में प्रभावी सिद्ध हुआ, किन्तु समय के साथ इसके सदस्यों के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे। विशेष रूप से हेनरी लॉरेंस और जॉन लॉरेंस के प्रशासनिक दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट दिखाई देने लगा।
➣ परिणामस्वरूप 1853 ई. में बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन को समाप्त कर दिया गया और पंजाब के प्रशासन की जिम्मेदारी एक चीफ कमिश्नर को सौंप दी गई।
पंजाब का चीफ कमिश्नर एवं लेफ्टिनेंट गवर्नर
चीफ कमिश्नर की व्यवस्था➣ 1853 ई. में बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन को समाप्त कर पंजाब का प्रशासन एक ही अधिकारी के अधीन कर दिया गया। इसके साथ ही चीफ कमिश्नर की नई व्यवस्था लागू की गई, जिससे प्रशासन अधिक केंद्रीकृत एवं प्रभावी बन सका।
➣ सर जॉन लॉरेंस को 1853 ई. में पंजाब का प्रथम चीफ कमिश्नर नियुक्त किया गया। उन्होंने 1853 से 1858 ई. तक इस पद पर रहते हुए पंजाब में राजस्व, सिंचाई, सड़क निर्माण तथा कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अनेक प्रशासनिक सुधार किए।
लेफ्टिनेंट गवर्नर की व्यवस्था➣ 1858 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त होने के बाद ब्रिटिश क्राउन ने भारत का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया। इसी क्रम में 1 जनवरी 1859 ई. से पंजाब में लेफ्टिनेंट गवर्नर की व्यवस्था लागू की गई।
➣ सर जॉन लॉरेंस पंजाब के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर बने। उनके कार्यकाल में प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ नहरों, सड़कों तथा सार्वजनिक संस्थाओं के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।
➣ 25 फरवरी 1859 ई. से जनवरी 1865 ई. तक सर रॉबर्ट मॉन्टगोमरी पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे। उन्होंने भी प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने तथा प्रांतीय शासन को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ सर एडवर्ड मैक्लेगन पंजाब के अंतिम लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। 1921 ई. में पंजाब को पूर्ण गवर्नर प्रान्त का दर्जा मिलने पर वे ही इसके प्रथम गवर्नर बने।
➣ ब्रिटिश शासन के अंतिम चरण में सर इवान मेरेडिथ जेनकिंस 1946 ई. से 15 अगस्त 1947 ई. तक पंजाब के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर रहे। भारत के विभाजन के समय पंजाब में कानून-व्यवस्था तथा प्रशासन की जिम्मेदारी उनके ही हाथों में थी।
| पद | अधिकारी |
|---|---|
| प्रथम चीफ कमिश्नर (1853 ई.) | सर जॉन लॉरेंस |
| प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर (1859 ई.) | सर जॉन लॉरेंस |
| उत्तराधिकारी लेफ्टिनेंट गवर्नर | सर रॉबर्ट मॉन्टगोमरी |
| अंतिम लेफ्टिनेंट गवर्नर एवं प्रथम गवर्नर | सर एडवर्ड मैक्लेगन |
| ब्रिटिश काल के अंतिम गवर्नर | सर इवान मेरेडिथ जेनकिंस |
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ महाराजा दिलीप सिंह सिक्ख साम्राज्य के अंतिम शासक थे। पंजाब के अंग्रेजी साम्राज्य में विलय (1849 ई.) के बाद उन्हें अंग्रेजों के संरक्षण में इंग्लैंड भेज दिया गया।
➣ इंग्लैंड में रहते हुए दिलीप सिंह ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। बाद के वर्षों में उन्होंने पुनः अपने मूल धर्म और मातृभूमि से जुड़ने का प्रयास भी किया, किन्तु अंग्रेज सरकार ने उन्हें भारत लौटने की अनुमति नहीं दी।
➣ प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो एक समय महाराजा रणजीत सिंह के खजाने की सबसे मूल्यवान धरोहर था, पंजाब के विलय के बाद अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। बाद में इसे ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को भेंट कर दिया गया।
➣ जीवन के अंतिम वर्षों में दिलीप सिंह यूरोप में ही रहे। उनका निधन 23 अक्टूबर 1893 ई. को पेरिस (फ्रांस) में हुआ।
➣ यद्यपि उनका निधन फ्रांस में हुआ, किन्तु उनकी अंत्येष्टि इंग्लैंड में की गई। इस प्रकार सिक्ख साम्राज्य के अंतिम महाराजा का जीवन अपने राज्य से दूर विदेश में ही समाप्त हुआ।
➣ पंजाब के अंग्रेजी साम्राज्य में विलय के साथ ही उत्तर-पश्चिम भारत का अंतिम शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य भी समाप्त हो गया और अंग्रेजों का सम्पूर्ण पंजाब पर स्थायी अधिकार स्थापित हो गया।
सम्पूर्ण घटनाक्रम
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1839 ई. | महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु; उत्तराधिकार संकट का प्रारम्भ। |
| 1841 ई. | शेर सिंह ने पंजाब की गद्दी प्राप्त की। |
| 1843 ई. | दिलीप सिंह सिक्ख साम्राज्य के अंतिम महाराजा बने तथा रानी जिंदन कौर उनकी संरक्षिका बनीं। |
| 1845–46 ई. | प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध लड़ा गया। |
| 8 मार्च 1846 ई. | लाहौर की सन्धि सम्पन्न हुई। |
| 16 दिसम्बर 1846 ई. | भैरोंवाल की पूरक सन्धि हुई, जिससे पंजाब का वास्तविक प्रशासन अंग्रेजों के नियंत्रण में चला गया। |
| 1848–49 ई. | द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध लड़ा गया। |
| 30 मार्च 1849 ई. | लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर दिया। |
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