रेगुलेटिंग एक्ट, 1773
➣ रेगुलेटिंग एक्ट (1773) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत का पहला महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था। इसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करना तथा भारत में उसके शासन को अधिक व्यवस्थित और उत्तरदायी बनाना था।
➣ प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के युद्धों के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक व्यापारिक संस्था न रहकर एक राजनीतिक एवं प्रशासनिक शक्ति बन गई थी।
➣ कंपनी के अधिकारियों में बढ़ते भ्रष्टाचार, आर्थिक अव्यवस्था तथा प्रशासनिक कमजोरियों के कारण ब्रिटिश संसद को उसके कार्यों में हस्तक्षेप करना पड़ा।
➣ इन्हीं परिस्थितियों में 1773 ई. में रेगुलेटिंग एक्ट पारित किया गया। यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास की शुरुआत माना जाता है, क्योंकि पहली बार ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को विनियमित करने के लिए कानून बनाया।
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के अंतर्गत बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर-जनरल बनाया गया, कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई तथा बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसियों को कुछ मामलों में बंगाल के अधीन कर दिया गया।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 की पृष्ठभूमि
➣ 18वीं शताब्दी के मध्य तक ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर भारत में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं प्रशासनिक शक्ति बन चुकी थी।
➣ एक ऐसी संस्था, जिसका मूल उद्देश्य व्यापार और लाभ कमाना था, अब राजस्व वसूली, न्याय, कानून-व्यवस्था, सैन्य शक्ति तथा क्षेत्रीय शासन से जुड़े कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी।
➣ कंपनी के इस राजनीतिक रूपांतरण के साथ एक मूलभूत समस्या सामने आई-उसके पास भारत में बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त उत्तरदायी और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी।
➣ कंपनी की वित्तीय कठिनाइयों, प्रशासनिक अव्यवस्था, अधिकारियों के भ्रष्टाचार तथा भारत में उसके बढ़ते राजनीतिक प्रभाव ने अंततः ब्रिटिश संसद के हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि तैयार की।
प्लासी से दीवानी तक कंपनी का राजनीतिक विस्तार
➣ 1757 के प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की पराजय के बाद बंगाल की राजनीति में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ गया।
➣ इसके बाद कंपनी ने बंगाल के नवाबों की नियुक्ति, उत्तराधिकार और शासन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। इस प्रकार एक व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता की निर्णायक शक्ति बनने लगी।
➣ 1764 के बक्सर के युद्ध में कंपनी ने मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को पराजित किया।
➣ इस विजय ने कंपनी की सैन्य एवं राजनीतिक स्थिति को और मजबूत कर दिया तथा बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्रों में उसकी स्थिति लगभग निर्णायक हो गई।
➣ 1765 में हुए इलाहाबाद समझौते के बाद 12 अगस्त 1765 को मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान की।
➣ इसके परिणामस्वरूप कंपनी को इन प्रांतों से राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ और वह भारत में केवल व्यापारिक संस्था न रहकर एक महत्वपूर्ण राजस्व एवं राजनीतिक शक्ति बन गई।
➣ दीवानी प्राप्त होने के बाद कंपनी के सामने एक नई चुनौती उत्पन्न हुई। उसके पास अब राजस्व के साधन और सैन्य शक्ति तो थी, लेकिन उस शक्ति के प्रयोग और प्रशासन के लिए ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी, जो सत्ता, उत्तरदायित्व और नियंत्रण के बीच संतुलन स्थापित कर सके। यही विरोधाभास आगे चलकर कंपनी के शासन की प्रमुख समस्या बना।
बंगाल में द्वैध शासन और प्रशासनिक संकट
➣ 1765 में रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में जिस व्यवस्था को विकसित किया, उसे सामान्यतः द्वैध शासन कहा जाता है। इसके अंतर्गत कंपनी के पास दीवानी अर्थात राजस्व से संबंधित वास्तविक अधिकार था, जबकि निजामत
➣ अर्थात कानून-व्यवस्था और फौजदारी प्रशासन की जिम्मेदारी नाममात्र रूप से बंगाल के नवाब के पास बनी रही।
➣ इस व्यवस्था की मूल समस्या यह थी कि वास्तविक सत्ता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व अलग-अलग दिखाई देते थे।
➣ कंपनी राजस्व और सैन्य शक्ति पर नियंत्रण रखती थी, लेकिन प्रशासन की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी पूरी तरह अपने ऊपर लेने से बचती रही।
➣ दूसरी ओर, नवाब के पास प्रशासनिक दायित्व तो था, लेकिन उसके पास पर्याप्त स्वतंत्र शक्ति और संसाधन नहीं थे।
➣ इस व्यवस्था ने शासन में उत्तरदायित्व के संकट को जन्म दिया। कंपनी का प्रमुख उद्देश्य अब राजस्व प्राप्त करना और अपने व्यापारिक हितों को मजबूत करना था, जबकि स्थानीय प्रशासन की आवश्यकताओं, न्याय और जनकल्याण के प्रश्नों के लिए स्पष्ट और उत्तरदायी संस्थागत व्यवस्था विकसित नहीं हुई।
➣ परिणामस्वरूप कंपनी के प्रशासन में राजस्व-संग्रह, न्याय और स्थानीय शासन से संबंधित अनेक समस्याएँ सामने आईं। बाद के वर्षों में कंपनी ने स्वयं इस व्यवस्था में परिवर्तन करना शुरू किया और 1772 में वारेन हेस्टिंग्स के प्रशासन के दौरान द्वैध शासन को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया गया।
बंगाल का भीषण अकाल, 1770
➣ 1769–1770 में बंगाल और बिहार के बड़े हिस्से में वर्षा की कमी और फसल की विफलता के कारण गंभीर अकाल पड़ा। इस अकाल से जनसंख्या, कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
➣ अकाल के समय राजस्व व्यवस्था और प्रशासन की कठोरता की आलोचना हुई। किसानों की आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर थी और फसल उत्पादन में भारी गिरावट ने संकट को और गंभीर बना दिया। इस परिस्थिति ने कंपनी की राजस्व नीति और प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्न खड़े किए।
➣ अकाल को अकेले रेगुलेटिंग एक्ट का कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इसने कंपनी के शासन की कमियों और उसके प्रशासनिक ढाँचे पर होने वाली आलोचना को अधिक तीव्र किया। इस प्रकार 1770 का अकाल कंपनी के शासन के विरुद्ध बढ़ती आलोचना की व्यापक पृष्ठभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
कंपनी का आर्थिक संकट
➣ भारत में राजनीतिक विस्तार के बावजूद ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती गई। युद्धों और प्रशासनिक विस्तार पर बढ़ते खर्च तथा कंपनी की कमजोर वित्तीय व्यवस्था के कारण वह गंभीर वित्तीय संकट में फँस गई।
➣ भारत में क्षेत्रीय विस्तार और दीवानी से राजस्व प्राप्त करने के बावजूद ईस्ट इंडिया कंपनी 1770 के दशक के आरंभ में गंभीर वित्तीय संकट में फँस गई। भारत में युद्धों, सैन्य व्यय और प्रशासनिक विस्तार की लागत बढ़ रही थी, जबकि कंपनी की वित्तीय स्थिति अपेक्षित रूप से मजबूत नहीं हो पा रही थी।
➣ 1772 में कंपनी की वित्तीय स्थिति इतनी खराब हो गई कि उसे ब्रिटिश सरकार से वित्तीय सहायता की आवश्यकता पड़ी। अंततः सरकार ने 1773 में कंपनी को लगभग £1.4 million का ऋण/वित्तीय सहायता प्रदान की।
➣ कंपनी के इस संकट ने ब्रिटिश संसद को यह सोचने पर मजबूर किया कि भारत में विशाल राजनीतिक शक्ति रखने वाली कंपनी के मामलों को केवल उसके निदेशकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
➣ कंपनी के व्यापारिक संकट का एक बड़ा उदाहरण चाय के विशाल भंडार के रूप में सामने आया। लंदन के गोदामों में लगभग 1.5 करोड़ पाउंड वजन (करीब 68 लाख किलोग्राम) चाय बिना बिके पड़ी थी।
➣ अमेरिकी बाजार में बिकने वाली कुल चाय का लगभग 85% हिस्सा डच तस्करी की चाय का था, जिसके बढ़ते प्रभाव के कारण कंपनी की अपनी चाय की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई थी।
➣ इसी समस्या को हल करने के लिए रेगुलेटिंग एक्ट के साथ-साथ टी एक्ट, 1773 (Tea Act 1773) भी पारित किया गया, जिसने कंपनी को अमेरिकी उपनिवेशों में सीधे और शुल्क-मुक्त चाय बेचने की अनुमति दी।
➣ इस प्रकार एक ओर कंपनी भारत से विशाल राजस्व प्राप्त कर रही थी, वहीं दूसरी ओर स्वयं गंभीर आर्थिक संकट में फँसी हुई थी। इसी आर्थिक संकट ने कंपनी को बहुत बड़ी परंतु दिवालिया संस्था बना दिया-इतनी बड़ी कि उसका पतन ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को भी हिला सकता था।
प्रशासनिक कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की समस्या
➣ कंपनी के अधिकारी मूलतः व्यापारिक गतिविधियों के लिए नियुक्त किए गए थे, लेकिन भारत में कंपनी की राजनीतिक शक्ति बढ़ने के साथ उन्हें राजस्व, प्रशासन और राजनीतिक मामलों में भी व्यापक अधिकार प्राप्त हो गए। इस परिवर्तन के अनुरूप पर्याप्त संस्थागत नियंत्रण विकसित नहीं हो पाया।
➣ कंपनी के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, निजी व्यापार और पद के दुरुपयोग के आरोप बढ़ने लगे। भारत में बड़ी संपत्ति अर्जित करके ब्रिटेन लौटने वाले कंपनी अधिकारियों का एक वर्ग सार्वजनिक आलोचना का विषय बना।
➣ उन्हें प्रायः Nabobs (नबॉब्स) कहा जाता था। ब्रिटिश जनमत में यह धारणा मजबूत हुई कि कंपनी के कुछ अधिकारी भारत की शक्ति और संसाधनों का उपयोग निजी संपत्ति अर्जित करने के लिए कर रहे थे।
➣ ब्रिटिश संसद और सार्वजनिक जीवन में यह चिंता भी बढ़ी कि भारत से अर्जित संपत्ति केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का प्रश्न नहीं है, बल्कि इससे ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। कंपनी के अधिकारियों की गतिविधियों तथा कंपनी प्रशासन के प्रति बढ़ते असंतोष ने संसदीय हस्तक्षेप के लिए राजनीतिक समर्थन तैयार किया।
ब्रिटिश संसद की जाँच और हस्तक्षेप
➣ कंपनी की वित्तीय कठिनाइयों, प्रशासनिक अव्यवस्था और उसके अधिकारियों के आचरण के कारण ब्रिटिश संसद ने कंपनी के भारतीय मामलों की जाँच शुरू की।
➣ यह प्रक्रिया केवल 1773 में अचानक शुरू नहीं हुई थी; कंपनी के प्रशासन और भारतीय मामलों की संसदीय जाँच इससे पहले भी हो चुकी थी, लेकिन 1772 के वित्तीय संकट ने इस प्रश्न को तत्काल राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
➣ 1772 में हाउस ऑफ कॉमन्स की एक प्रवर समिति ने कंपनी के भारतीय मामलों तथा उसके अधिकारियों के आचरण की जाँच शुरू की। कंपनी की वित्तीय स्थिति के गंभीर संकट में आने के बाद 26 नवंबर 1772 को एक गुप्त समिति गठित की गई, जिसने कंपनी के वित्तीय और प्रशासनिक मामलों की जाँच की।
➣ दोनों समितियों की कार्यवाही ने कंपनी के शासन और प्रबंधन से संबंधित समस्याओं को ब्रिटिश संसद के सामने अधिक स्पष्ट रूप से रखा।
➣ इन जाँचों और रिपोर्टों के बीच कंपनी के कुप्रशासन, भ्रष्टाचार, वित्तीय संकट और भारत में उसकी बढ़ती राजनीतिक शक्ति को लेकर ब्रिटेन में आलोचना तेज हुई। अब यह प्रश्न उठने लगा कि एक निजी व्यापारिक कंपनी को इतने बड़े भू-भाग में राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति प्रयोग करने की अनुमति किस सीमा तक दी जानी चाहिए।
➣ ब्रिटिश संसद के सामने इसलिए दोहरी चुनौती थी-एक ओर कंपनी को तत्काल वित्तीय संकट से बचाना और दूसरी ओर उसके भारतीय प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना।
➣ इसी परिस्थिति में कंपनी के प्रशासन में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता स्वीकार की गई। ब्रिटिश पुस्तकालय के अभिलेख भी 1772 के वित्तीय संकट, संसदीय समितियों और उसके बाद 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के बीच सीधे संबंध को रेखांकित करते हैं।
➣ अंततः लॉर्ड नॉर्थ के नेतृत्व वाली सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रशासन को नियंत्रित और पुनर्गठित करने के उद्देश्य से विधायी कदम उठाया। इसके परिणामस्वरूप रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 पारित हुआ।
➣ यह भारतीय प्रशासन में ब्रिटिश संसद के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का पहला महत्वपूर्ण वैधानिक प्रयास था और आगे चलकर ब्रिटिश भारत के संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना।
रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 के प्रमुख प्रावधान
बंगाल में केंद्रीय कार्यपालिका की स्थापना
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 भारत के संवैधानिक विकास में एक मील का पत्थर था। इसके माध्यम से ब्रिटिश संसद ने पहली बार कंपनी के भारतीय प्रशासन में केंद्रीय कार्यपालिका की स्थापना की और बंगाल को इस नई प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र बनाया।
➣ एक्ट, 1773 के तहत बंगाल के गवर्नर के पद को उच्चतर केंद्रीय पद में बदलकर उसे बंगाल का गवर्नर-जनरल बनाया गया। यह भारत में कंपनी के प्रशासन को अधिक केंद्रीकृत करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था।
➣ इस व्यवस्था के बाद बंगाल केवल एक प्रेसीडेंसी नहीं रहा, बल्कि उसे कंपनी के भारतीय प्रशासन में केंद्रीय स्थिति प्राप्त हो गई। बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को बंगाल में कंपनी के प्रशासन के साथ-साथ उसके क्षेत्रीय अधिकारों और उनसे प्राप्त राजस्व के नागरिक तथा सैन्य शासन की प्रमुख जिम्मेदारी दी गई।
➣ इस पद का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया था। हालांकि इस अवधि के भीतर भी ब्रिटिश सम्राट उसे पद से हटा सकता था, लेकिन इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल की सिफारिश आवश्यक थी। इस प्रकार उसके पद को निश्चित अवधि और अपेक्षाकृत सुरक्षित कार्यकाल प्रदान करने का प्रयास किया गया।
➣ वॉरेन हेस्टिंग्स बंगाल के पहले गवर्नर-जनरल बने। इस प्रकार उनका पद बंगाल के पुराने गवर्नर के पद से अधिक व्यापक और केंद्रीय स्वरूप वाला हो गया। आगे चलकर इसी पद ने भारत में ब्रिटिश केंद्रीय शासन के विकास का आधार तैयार किया।
➣ गवर्नर-जनरल की सहायता और उसके साथ मिलकर शासन चलाने के लिए चार सदस्यीय कार्यकारिणी परिषद बनाई गई। इस प्रकार गवर्नर-जनरल सहित कुल 5 सदस्य वाली केंद्रीय कार्यपालिका की व्यवस्था बनी। यह व्यवस्था केवल सलाह देने वाली परिषद नहीं थी, बल्कि शासन के महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी वास्तविक भूमिका थी।
➣ पहली परिषद के चारों सदस्यों – जनरल जॉन क्लेवरिंग, जॉर्ज मानसन, रिचर्ड बारवेल तथा फिलिप फ्रांसिस – के नाम स्वयं अधिनियम में ही निर्दिष्ट कर दिए गए थे। परिषद के चारों सदस्य सामूहिक रूप से काउंसिल ऑफ फोर कहलाए।
➣ इसके बाद परिषद के सदस्यों की नियुक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल द्वारा की जानी थी। इसने भारत की केंद्रीय कार्यपालिका की संरचना में पहली बार एक निश्चित परिषद को वैधानिक रूप से स्थापित किया गया।
➣ गवर्नर-जनरल अपनी परिषद से अलग होकर सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं ले सकता था। सामान्य मामलों में निर्णय परिषद के बहुमत से लिए जाने थे। इस व्यवस्था का अर्थ था कि गवर्नर-जनरल स्वयं को परिषद के निर्णय से ऊपर रखकर अकेले शासन नहीं कर सकता था।
➣ यदि परिषद में किसी प्रश्न पर मत बराबर हो जाते थे, तो गवर्नर-जनरल को निर्णायक मत प्राप्त था। लेकिन सामान्य स्थिति में उसे परिषद के बहुमत के निर्णय के अनुसार ही कार्य करना पड़ता था। इसलिए उसके पास परिषद के निर्णय को अकेले रोकने या निरस्त करने की स्वतंत्र वीटो शक्ति नहीं थी।
➣ इस व्यवस्था में परिषद केवल गवर्नर-जनरल की सहायता करने वाली संस्था नहीं थी, बल्कि वह उसके अधिकारों पर एक प्रकार का संवैधानिक नियंत्रण भी रखती थी। परिणामस्वरूप गवर्नर-जनरल और परिषद के बीच मतभेद होने पर शासन में गंभीर गतिरोध उत्पन्न हो सकता था।
➣ वास्तव में वॉरेन हेस्टिंग्स के कार्यकाल में यही समस्या सामने आई। जॉन क्लेवरिंग, जॉर्ज मानसन और फिलिप फ्रांसिस जैसे परिषद के सदस्य कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर हेस्टिंग्स से अलग मत रखते थे।
➣ बहुमत उनके साथ होने पर हेस्टिंग्स को परिषद के निर्णयों का पालन करना पड़ता था। इससे गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद के बीच लगातार राजनीतिक तथा प्रशासनिक संघर्ष हुआ।
➣ इस प्रकार रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने एक ओर गवर्नर-जनरल के पद के माध्यम से केंद्रीकरण की शुरुआत की, लेकिन दूसरी ओर उसके अधिकारों को परिषद के बहुमत से सीमित भी रखा।
➣ यही इसकी प्रशासनिक व्यवस्था का एक प्रमुख विरोधाभास था-केंद्रीय पद मजबूत बनाया गया, लेकिन उस पद को परिषद से स्वतंत्र नहीं बनाया गया।
| प्रथम गवर्नर-जनरल | वॉरेन हेस्टिंग्स |
| परिषद के सदस्य | 4 सदस्य |
| कुल सदस्य | गवर्नर-जनरल सहित 5 सदस्य |
| कार्यकाल | 5 वर्ष |
| निर्णय की पद्धति | बहुमत से |
| मत बराबर होने पर | गवर्नर-जनरल का निर्णायक मत |
| स्वतंत्र वीटो शक्ति | नहीं |
परिषद में केवल रिचर्ड बारवेल को पहले से भारत में कार्य करने का अनुभव था। क्लेवरिंग, मानसन और फ्रांसिस प्रायः एकजुट होकर हेस्टिंग्स को बहुमत से पराजित कर देते थे, जिससे प्रशासन में गतिरोध बना रहा। 1776 में मानसन की मृत्यु के बाद ही हेस्टिंग्स को परिषद में निर्णायक बहुमत प्राप्त हो सका।
बम्बई एवं मद्रास प्रेसीडेंसी पर नियंत्रण
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य कंपनी के अलग-अलग प्रेसीडेंसियों के बीच बढ़ते राजनीतिक मतभेदों और स्वतंत्र सैन्य निर्णयों पर नियंत्रण स्थापित करना था।
➣ इसके लिए बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसी को महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों में बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद के अधीन किया गया।
➣ इससे पहले बम्बई, मद्रास और बंगाल की प्रेसीडेंसियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में काफी हद तक स्वतंत्र रूप से राजनीतिक और सैन्य निर्णय लेती थीं। एक प्रेसीडेंसी द्वारा किसी भारतीय शासक के साथ किया गया समझौता या उसके विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई दूसरी प्रेसीडेंसी और कंपनी की व्यापक नीति को प्रभावित कर सकती थी।
➣ अब बम्बई और मद्रास की सरकारों को किसी भारतीय शासक के विरुद्ध युद्ध शुरू करने, युद्ध की घोषणा करने अथवा संधि करने जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम उठाने में बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद के निर्देशों का पालन करना था। इस प्रकार युद्ध और शांति से संबंधित नीति में बंगाल को अपेक्षाकृत केंद्रीय स्थिति प्राप्त हुई।
➣ हालांकि बम्बई और मद्रास को प्रत्येक प्रशासनिक विषय में बंगाल के अधीन नहीं किया गया था। उनका अपना स्थानीय प्रशासन बना रहा, लेकिन युद्ध, शांति और भारतीय राज्यों के साथ महत्वपूर्ण राजनीतिक संबंधों से जुड़े मामलों में उनकी स्वतंत्रता सीमित कर दी गई।
➣ यही कारण है कि इस व्यवस्था को तत्काल पूर्ण केंद्रीकरण के बजाय केंद्रीय नियंत्रण की शुरुआत कहना अधिक उचित है। बाद के पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 ने इस केंद्रीय नियंत्रण को और अधिक स्पष्ट तथा मजबूत किया।
➣ इस व्यवस्था का व्यावहारिक महत्व तब सामने आया, जब बम्बई सरकार ने मराठा राजनीति में अपने स्तर पर हस्तक्षेप किया। रघुनाथराव को पेशवा पद दिलाने के उद्देश्य से बम्बई सरकार ने 1775 में सूरत की संधि की।
➣ यह कदम कलकत्ता स्थित गवर्नर-जनरल की परिषद की स्वीकृति के बिना उठाया गया था। बाद में कलकत्ता परिषद ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और उसे निरस्त करने की दिशा में कदम उठाए। ऐतिहासिक अभिलेखों में 1775 में कलकत्ता परिषद द्वारा सूरत की संधि को निरस्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।
➣ इसके बाद बम्बई और कलकत्ता की नीतियों के बीच मतभेद जारी रहे और अंततः 1776 की पुरंदर की संधि के माध्यम से रघुनाथराव के प्रश्न पर एक नया समझौता किया गया। इस घटना से यह स्पष्ट हुआ कि प्रेसीडेंसियों की स्वतंत्र राजनीतिक कार्रवाई और केंद्रीय नियंत्रण के बीच व्यावहारिक टकराव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
➣ इस प्रकार रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने पहली बार बंगाल को अन्य प्रेसीडेंसियों पर राजनीतिक नियंत्रण के केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम उठाया। हालांकि यह नियंत्रण अभी पूर्ण नहीं था और उसकी सीमाएँ भी स्पष्ट थीं, फिर भी इससे भारत में कंपनी के शासन के केंद्रीकरण की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण गति मिली।
बम्बई और मद्रास की प्रेसीडेंसियों पर बंगाल के गवर्नर-जनरल का नियंत्रण मुख्यतः युद्ध, शांति और संधि जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों में था, पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण नहीं। दुसरे शब्दों में , तीनो प्रेसीडेंसियों का एकीकरण नहीं हुआ था।
सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 का एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रावधान फोर्ट विलियम, कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय स्थापित करने का था। इस व्यवस्था के माध्यम से कंपनी के प्रशासन से अलग एक ऐसी न्यायिक संस्था स्थापित करने की दिशा में कदम उठाया गया, जो ब्रिटिश सम्राट के अधिकार के अंतर्गत कार्य करे।
➣ ध्यान दें रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने स्वयं न्यायालय को तत्काल स्थापित नहीं किया था। इस अधिनियम ने ब्रिटिश सम्राट को राजकीय आज्ञापत्र जारी करके न्यायालय स्थापित करने का अधिकार दिया।
इसके बाद 1774 ई. में जारी राजकीय आज्ञापत्र के माध्यम से कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय वास्तव में स्थापित हुआ। इसलिए 1773 – प्रावधान और 1774 – वास्तविक स्थापना का अंतर महत्वपूर्ण है।➣ यह भारत में ब्रिटिश सम्राट के अधिकार के अंतर्गत स्थापित होने वाला पहला सर्वोच्च न्यायिक न्यायालय था। इसके गठन का उद्देश्य कंपनी के अधिकारियों तथा ब्रिटिश प्रजा से संबंधित मामलों में एक उच्च न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध कराना और न्याय प्रशासन को कंपनी की कार्यपालिका से अलग रूप देना था।
➣ न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश होते थे। सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की जाती थी। इस प्रकार न्यायालय के न्यायाधीश सीधे कंपनी के निदेशक मंडल के अधीन नहीं थे। न्यायालय के व्यय और न्यायाधीशों के वेतन का भार कंपनी के राजस्व पर डाला गया था।
➣ न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश होते थे। सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की जाती थी अर्थात वे कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन कार्य करने वाले न्यायिक अधिकारी नहीं थे। न्यायालय के व्यय और न्यायाधीशों के वेतन का भार कंपनी के राजस्व पर डाला गया था।
➣ कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजाह इम्पे थे। उनके साथ स्टीफन सीज़र ले मैस्ट्रे, जॉन हाइड और रॉबर्ट चेम्बर्स न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे। इस प्रकार न्यायालय में कुल चार न्यायाधीश थे।
➣ न्यायालय को दीवानी, फौजदारी, नौसैनिक तथा धार्मिक मामलों से संबंधित अधिकारिता प्रदान की गई। इसे अपने अधिकार क्षेत्र में मूल तथा अपीलीय अधिकारिता प्राप्त थी। न्यायालय को अभिलेख न्यायालय के रूप में भी स्थापित किया गया, इसलिए उसके निर्णय और न्यायिक कार्यवाही आधिकारिक अभिलेख का रूप रखते थे।
➣ न्यायालय को फोर्ट विलियम तथा उसके अधीन आने वाले क्षेत्रों में रहने वाले ऐसे ब्रिटिश प्रजा के मामलों की सुनवाई का अधिकार था जो उसकी अधिकारिता के अंतर्गत आते थे।
कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों से संबंधित मामलों में भी न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण थी। यही कारण था कि इसकी न्यायिक शक्ति और कंपनी की प्रशासनिक शक्ति के बीच सीमा का प्रश्न आगे चलकर अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया।➣ न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध निर्धारित परिस्थितियों में ब्रिटेन के सम्राट के समक्ष अपील की व्यवस्था भी थी। इस प्रकार कलकत्ता में स्थापित यह न्यायालय भारत में ब्रिटिश सम्राट की न्यायिक सत्ता का एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बन गया और कंपनी की प्रशासनिक व्यवस्था के ऊपर एक पृथक न्यायिक शक्ति के रूप में विकसित हुआ।
➣ इस प्रकार इसने भारत में कार्यपालिका और न्यायपालिका के पृथक्करण की प्रारंभिक दिशा प्रस्तुत की, लेकिन साथ ही दोनों के अधिकार-क्षेत्र की अस्पष्टता के कारण ऐसी समस्याएँ भी पैदा कीं, जिनका समाधान बाद के संवैधानिक सुधारों में करना पड़ा।
| अधिनियम | रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 |
| वास्तविक स्थापना | 1774 |
| स्थान | फोर्ट विलियम, कलकत्ता |
| प्रथम मुख्य न्यायाधीश | सर एलिजाह इम्पे |
| न्यायाधीशों की संख्या | कुल 4 |
| न्यायाधीशों की नियुक्ति | ब्रिटिश सम्राट द्वारा |
| मुख्य समस्या | सर्वोच्च न्यायालय और गवर्नर-जनरल की परिषद के बीच अधिकारिता का विवाद |
कंपनी के अधिकारियों पर नियंत्रण
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने कंपनी के अधिकारियों के निजी आचरण और आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकारियों द्वारा अपने प्रशासनिक पद का उपयोग करके निजी लाभ अर्जित करने की प्रवृत्ति को रोकना था।
➣ कंपनी के अधिकारियों को भारतीय शासकों, जमींदारों अथवा अन्य व्यक्तियों से उपहार, नजराना, रिश्वत, पारितोषिक या किसी प्रकार का निजी आर्थिक लाभ स्वीकार करने से प्रतिबंधित किया गया। इस प्रकार अधिकारियों के पद और निजी लाभ के बीच स्पष्ट सीमा निर्धारित करने का प्रयास किया गया।
➣ इसी क्रम में कंपनी के कुछ प्रमुख अधिकारियों और कर्मचारियों के निजी व्यापार पर भी रोक लगाई गई। उनका उद्देश्य यह था कि अधिकारी अपने प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग निजी व्यापारिक हितों को बढ़ाने के लिए न कर सकें।
➣ इस व्यवस्था के पीछे यह विचार था कि जो व्यक्ति राजस्व, न्याय और प्रशासन से संबंधित अधिकारों का प्रयोग करता है, उसे उसी क्षेत्र में निजी आर्थिक हित रखने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए। इससे प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता और उत्तरदायित्व बनाए रखने का प्रयास किया गया।
➣ अधिनियम में इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर आर्थिक दंड तथा अन्य दंडात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान था। कुछ मामलों में प्राप्त लाभ या धन की राशि का दोगुना तक वापस कराने तथा दोषी व्यक्ति के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान किया गया था।
➣ इन प्रावधानों के माध्यम से कंपनी के प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, निजी व्यापार और पद के दुरुपयोग पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की गई। हालांकि इन उपायों से भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, फिर भी यह कंपनी के अधिकारियों को कानूनी रूप से नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
इस अधिनियम में कंपनी के अधिकारियों के निजी व्यापार पर रोक लगाई गई थी, लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के अपने अधिकृत व्यापार पर यह प्रतिबंध लागू नहीं था। अतः निजी व्यापार और कंपनी के आधिकारिक व्यापार को अलग-अलग समझना चाहिए।
ऋण एवं लाभांश संबंधी वित्तीय प्रावधान
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के समय ईस्ट इंडिया कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में फँसी हुई थी। भारत में उसके बढ़ते सैन्य और प्रशासनिक खर्च तथा लंदन में उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण कंपनी को ब्रिटिश सरकार से वित्तीय सहायता माँगनी पड़ी।
➣ कंपनी की इस आर्थिक कठिनाई को देखते हुए उसी समय संसद ने एक अलग वित्तीय अधिनियम के माध्यम से कंपनी को 14 लाख पाउंड का ऋण देने की व्यवस्था की।
➣ यह ऋण 4 प्रतिशत ब्याज की दर पर दिया गया था। इसका उद्देश्य कंपनी को तत्काल आर्थिक संकट से बाहर निकालना और उसके व्यापार तथा प्रशासन को तत्काल ढहने से बचाना था।
➣ इस सहायता के बदले कंपनी पर कुछ वित्तीय प्रतिबंध लगाए गए। कंपनी जब तक इस ऋण को पूरी तरह चुका नहीं देती, तब तक वह अपने शेयरधारकों को 6 प्रतिशत से अधिक वार्षिक लाभांश नहीं दे सकती थी। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने कंपनी को वित्तीय सहायता देने के साथ-साथ उसके लाभांश वितरण पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया।
➣ कंपनी को ब्रिटिश सरकार को किया जाने वाला 4 लाख पाउंड का वार्षिक भुगतान भी ऋण चुकाए जाने तक स्थगित कर दिया गया। इससे कंपनी को अपनी तत्काल वित्तीय कठिनाइयों से निपटने के लिए अतिरिक्त धन उपलब्ध हुआ और उसके ऊपर तत्काल वित्तीय दबाव कुछ कम हुआ।
➣ कंपनी के वित्तीय प्रबंधन पर निगरानी बढ़ाने के लिए उसे अपने वित्तीय लेखे और विवरण नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार के संबंधित अधिकारियों को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रकार कंपनी की वित्तीय गतिविधियाँ पहले की तरह पूरी तरह उसके आंतरिक नियंत्रण का विषय नहीं रहीं, बल्कि उन पर सरकारी निगरानी बढ़ने लगी।
➣ कंपनी के भारत से संबंधित नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों से जुड़ी सूचनाएँ तथा आवश्यक विवरण ब्रिटिश सरकार तक पहुँचाने की व्यवस्था भी इसी व्यापक वित्तीय नियंत्रण का हिस्सा थी। इसका महत्व इसलिए अधिक था क्योंकि कंपनी अब केवल एक व्यापारिक संस्था नहीं रही थी, वह प्रशासनिक अधिकार भी रखती थी।
➣ इन वित्तीय प्रावधानों से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन सामने आया। ब्रिटिश सरकार ने पहली बार कंपनी को आर्थिक संकट से उबारने के लिए सार्वजनिक सहायता दी और उसके बदले कंपनी के वित्तीय व्यवहार पर अपनी निगरानी और नियंत्रण बढ़ाया।
➣ इस प्रकार कंपनी और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंध केवल व्यापारिक संरक्षण तक सीमित न रहकर आर्थिक उत्तरदायित्व और सरकारी नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ा।
➣ कंपनी की आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए इसी वर्ष एक अन्य महत्वपूर्ण कदम चाय अधिनियम, 1773 के रूप में उठाया गया। यह रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 से अलग एक स्वतंत्र अधिनियम था, लेकिन कंपनी की आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए उसी व्यापक संसदीय हस्तक्षेप का हिस्सा था।
➣ इसका उद्देश्य आर्थिक संकट से जूझ रही ईस्ट इंडिया कंपनी के पास जमा विशाल मात्रा में अविक्रीत चाय को अमेरिकी उपनिवेशों में बेचने का मार्ग आसान करना था। कंपनी को अमेरिकी उपनिवेशों में चाय सीधे भेजने और वहाँ बिक्री करने की विशेष सुविधा दी गई।
अमेरिकी उपनिवेशों में कंपनी को मिली इस विशेष व्यापारिक सुविधा (चाय अधिनियम) का तीखा विरोध हुआ था। उपनिवेशवासियों ने इसे ब्रिटिश संसद द्वारा अपने व्यापार पर अनुचित नियंत्रण और कराधान की नीति के रूप में देखा।
अंततः 16 दिसंबर 1773 को बोस्टन बंदरगाह में कंपनी की चाय की खेप को समुद्र में फेंक दिया गया। यह घटना बोस्टन टी पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुई और आगे चलकर अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा में महत्वपूर्ण घटना बनी।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 की सीमाएँ
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ने कंपनी के भारतीय प्रशासन को नियंत्रित करने के लिए पहली बार व्यापक वैधानिक व्यवस्था बनाई, लेकिन इसकी कई व्यवस्थाएँ पूरी तरह स्पष्ट नहीं थीं।
➣ विशेष रूप से गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद के संबंध, सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र तथा प्रेसीडेंसियों पर केंद्रीय नियंत्रण से जुड़ी समस्याएँ आगे चलकर गंभीर रूप में सामने आईं।
गवर्नर-जनरल और कार्यकारिणी परिषद के बीच मतभेद
➣ अधिनियम ने बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल बनाकर केंद्रीय प्रशासन को मजबूत करने का प्रयास तो किया, लेकिन उसके साथ चार सदस्यों वाली कार्यकारिणी परिषद भी बनाई। सामान्य मामलों में निर्णय बहुमत से लिए जाने थे और गवर्नर-जनरल को परिषद के बहुमत के निर्णय का पालन करना पड़ता था।
➣ इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि गवर्नर-जनरल को केंद्रीय प्रशासन का प्रमुख तो बनाया गया, लेकिन उसे अपनी परिषद से स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की पर्याप्त शक्ति नहीं दी गई। यदि परिषद के अधिकांश सदस्य उसके विरुद्ध होते, तो वह अपने मत के अनुसार प्रशासन चलाने में कठिनाई का सामना करता था।
➣ वॉरेन हेस्टिंग्स के कार्यकाल में यह समस्या प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दी। प्रारंभिक परिषद में जॉन क्लेवरिंग, जॉर्ज मानसन और फिलिप फ्रांसिस प्रायः हेस्टिंग्स के विरोध में रहते थे।
➣ बहुमत उनके पक्ष में होने के कारण हेस्टिंग्स को कई मामलों में परिषद के निर्णय को स्वीकार करना पड़ता था। इससे केंद्रीय प्रशासन में लगातार राजनीतिक मतभेद और निर्णयगत गतिरोध उत्पन्न होते रहे।
➣ विशेष रूप से फिलिप फ्रांसिस और वॉरेन हेस्टिंग्स के बीच मतभेद केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं थे, बल्कि कंपनी की प्रशासनिक और राजनीतिक नीति से जुड़े प्रश्नों तक फैल गए थे। इस प्रकार परिषद की बहुमत-व्यवस्था ने केंद्रीय प्रशासन को मजबूत करने के बजाय कई अवसरों पर उसे आंतरिक संघर्ष का केंद्र बना दिया।
➣ इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल एक केंद्रीय कार्यपालिका बना देना पर्याप्त नहीं था। उसके भीतर अधिकारों का स्पष्ट विभाजन और निर्णय लेने की प्रभावी व्यवस्था भी आवश्यक थी। रेगुलेटिंग एक्ट इस संतुलन को पूरी तरह स्थापित नहीं कर सका।
सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र की अस्पष्टता
➣ रेगुलेटिंग एक्ट तथा उसके आधार पर 1774 में स्थापित सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता और कंपनी की प्रशासनिक व्यवस्था के बीच स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं हो सकी। यही इस अधिनियम की सबसे गंभीर कमियों में से एक बनी।
➣ भारतीयों पर सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता का प्रश्न प्रारंभ से पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। न्यायालय की स्थापना के बाद यह विवाद उत्पन्न हुआ कि उसकी शक्ति कंपनी के भारतीय प्रजाजनों, राजस्व अधिकारियों, प्रांतीय प्रशासन तथा स्थानीय न्यायिक संस्थाओं तक किस सीमा तक पहुँचती है।
➣ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने कई मामलों में अपनी अधिकारिता की व्यापक व्याख्या की, जबकि कंपनी सरकार इसे अपने प्रशासनिक अधिकार में हस्तक्षेप मानती थी।
➣ इस विवाद की जड़ यह थी कि एक ओर सर्वोच्च न्यायालय ब्रिटिश सम्राट के अधिकार से स्थापित न्यायिक संस्था था, जबकि दूसरी ओर बंगाल का प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में था। इसलिए यह प्रश्न बार-बार उठता रहा कि जब दोनों संस्थाओं के अधिकार एक ही व्यक्ति या मामले पर पड़ें, तो अंतिम अधिकार किसका होगा।
➣ सर्वोच्च न्यायालय ने धीरे-धीरे भारतीय पक्षकारों और कंपनी के अधिकारियों से संबंधित मामलों में अपनी शक्ति का व्यापक प्रयोग करना शुरू किया। इसके विपरीत कंपनी के अधिकारी यह मानते थे कि राजस्व वसूली और प्रांतीय प्रशासन कंपनी के अपने अधिकार क्षेत्र में आते हैं तथा न्यायालय को इनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच गंभीर संघर्ष उत्पन्न हुआ।
➣ इस संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना कर देना पर्याप्त नहीं था; उसकी अधिकारिता की स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करना भी आवश्यक था।
➣ बाद की घटनाओं ने इस कमी को इतना गंभीर बना दिया कि ब्रिटिश संसद को 1781 में हस्तक्षेप करके न्यायालय और कंपनी प्रशासन के अधिकारों की सीमाएँ अधिक स्पष्ट करनी पड़ीं।
सर्वोच्च न्यायालय की व्यापक व्याख्या से उत्पन्न संघर्ष
➣ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने अपनी अधिकारिता को संकीर्ण अर्थ में न लेकर व्यापक रूप से समझने का प्रयास किया। इसके कारण न्यायालय का प्रभाव केवल कलकत्ता की सीमित न्यायिक व्यवस्था तक नहीं रहा, बल्कि कंपनी के अधीन क्षेत्रों में कार्यरत अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मामलों तक भी पहुँचने लगा।
➣ कंपनी के अधिकारियों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से कठिन थी, क्योंकि वे राजस्व वसूली और प्रशासनिक कार्यों में ऐसे निर्णय लेते थे जिन्हें वे सरकारी कार्य मानते थे, जबकि सर्वोच्च न्यायालय कभी-कभी उन्हीं कार्यों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाने का प्रयास करता था। इससे कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों में असुरक्षा और विरोध दोनों बढ़े।
➣ दूसरी ओर, भारतीय पक्षकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसा नया मार्ग बन गया जिसके माध्यम से वे कंपनी के अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन के विरुद्ध न्यायिक राहत प्राप्त करने का प्रयास कर सकते थे।
➣ इतिहासकारों ने ध्यान दिलाया है कि भारतीय पक्षकारों ने भी इस नई न्यायिक व्यवस्था का उपयोग अपने हितों के लिए किया और न्यायालय ने कई मामलों में उनकी याचिकाओं को स्वीकार किया।
न्यायिक विवादों के प्रमुख उदाहरण
➣ महाराजा नंदकुमार का मुकदमा (1775) सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक बना।
➣ नंदकुमार ने वॉरेन हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार और रिश्वत लेने के आरोप लगाए थे। इसके बाद उन पर जालसाजी का मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में चला और उन्हें 1775 में फाँसी दी गई।
➣ नंदकुमार को जिस कानून के अंतर्गत दोषी ठहराया गया तथा न्यायालय को उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने की अधिकारिता थी या नहीं-इन दोनों प्रश्नों को लेकर बाद में गंभीर विवाद हुआ।
➣ हेस्टिंग्स के विरुद्ध आरोप लगाने के तुरंत बाद नंदकुमार के मुकदमे और दंड ने इस घटना को और अधिक राजनीतिक रूप से विवादास्पद बना दिया। इसलिए आलोचकों ने इसे न्यायिक हत्या तक कहा, हालांकि इस निष्कर्ष की ऐतिहासिक व्याख्या पर विद्वानों में मतभेद रहा है।
➣ पटना मुकदमा (1777–1779) ने न्यायालय और कंपनी के प्रशासन के बीच अधिकार-क्षेत्र के विवाद को और स्पष्ट किया। इस मामले में नादिरा बेगम के संपत्ति संबंधी विवाद में पटना की प्रांतीय परिषद और उसके विधि अधिकारियों की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने विचार किया।
➣ सर्वोच्च न्यायालय ने उनके विरुद्ध निर्णय देते हुए नादिरा बेगम को भारी क्षतिपूर्ति प्रदान की। इससे यह प्रश्न उठा कि कंपनी की प्रांतीय परिषद और उसके न्यायिक अधिकारी अपने आधिकारिक कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष किस सीमा तक उत्तरदायी हैं।
➣ कोसीजुरा मुकदमा (1779–1780) में भी सर्वोच्च न्यायालय और गवर्नर-जनरल की परिषद के बीच टकराव तीव्र हो गया। जब न्यायालय ने कंपनी के राजस्व प्रशासन से जुड़े व्यक्ति के विरुद्ध अपनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तो परिषद ने इसे राजस्व प्रशासन और सरकारी कार्यों में अनुचित न्यायिक हस्तक्षेप माना। इस घटना ने दोनों संस्थाओं के बीच संघर्ष को चरम स्थिति तक पहुँचा दिया।
➣ इन मामलों ने एक व्यापक संवैधानिक समस्या को सामने ला दिया-क्या सर्वोच्च न्यायालय कंपनी की प्रशासनिक शक्ति के ऊपर भी न्यायिक नियंत्रण रखता है, और यदि रखता है तो उसकी सीमा क्या है? रेगुलेटिंग एक्ट इसका स्पष्ट उत्तर देने में असफल रहा था।
बम्बई और मद्रास पर सीमित केंद्रीय नियंत्रण
➣ रेगुलेटिंग एक्ट ने बम्बई और मद्रास पर बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद का प्रभाव बढ़ाया, लेकिन यह नियंत्रण मुख्यतः युद्ध, शांति और संधि जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों तक सीमित रहा। प्रेसीडेंसियों का पूरा प्रशासन बंगाल के अधीन नहीं किया गया था।
➣ इसलिए तीनों प्रेसीडेंसियों के बीच तत्काल पूर्ण प्रशासनिक केंद्रीकरण स्थापित नहीं हो सका। बम्बई और मद्रास की अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ बनी रहीं और उनके स्थानीय अधिकारियों के पास अनेक मामलों में निर्णय लेने की शक्ति जारी रही।
➣ बम्बई सरकार द्वारा 1775 की सूरत की संधि जैसे मामलों में स्वतंत्र राजनीतिक पहल करना यह दिखाता है कि 1773 का केंद्रीय नियंत्रण व्यवहार में अभी पूरी तरह प्रभावी नहीं हुआ था। इस प्रकार अधिनियम ने केंद्रीकरण की दिशा तो निर्धारित की, लेकिन उसे पूरी तरह लागू करने के लिए आगे और संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता बनी रही।
कंपनी पर ब्रिटिश संसद का अधूरा नियंत्रण
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 का सबसे व्यापक महत्व यह था कि ब्रिटिश संसद ने पहली बार कंपनी के भारतीय प्रशासन में प्रत्यक्ष वैधानिक हस्तक्षेप किया। लेकिन इसके बावजूद कंपनी की राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति पूरी तरह ब्रिटिश सरकार को हस्तांतरित नहीं हुई।
➣ कंपनी का निदेशक मंडल अभी भी उसके प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका रखता था और भारत में कंपनी का शासन मूलतः उसी के माध्यम से चलता रहा। ब्रिटिश संसद ने नियंत्रण के कुछ साधन तो स्थापित किए, लेकिन कंपनी और ब्रिटिश सरकार के बीच वास्तविक सत्ता-विभाजन को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया।
➣ परिणामस्वरूप रेगुलेटिंग एक्ट न तो कंपनी के प्रशासन की सभी समस्याओं को समाप्त कर सका और न ही ब्रिटिश सरकार को भारत के शासन पर पूर्ण प्रत्यक्ष नियंत्रण दे सका। कंपनी की राजनीतिक शक्ति बनी रही, जबकि संसद का नियंत्रण अभी आंशिक और अप्रत्यक्ष था। आगे के अनुभवों ने दिखाया कि अधिक स्पष्ट और प्रभावी सरकारी नियंत्रण की आवश्यकता है।
रेगुलेटिंग एक्ट में सुधार की आवश्यकता
➣ इस प्रकार रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 की सीमाएँ केवल कुछ प्रशासनिक कठिनाइयों तक सीमित नहीं थीं। इसके पीछे एक बड़ी संवैधानिक समस्या थी-कंपनी की शक्ति, ब्रिटिश संसद का नियंत्रण, गवर्नर-जनरल की शक्ति और सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता के बीच स्पष्ट सीमाएँ स्थापित नहीं की गई थीं।
➣ विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय और कंपनी प्रशासन के बीच उत्पन्न संघर्ष ने तत्काल सुधार की आवश्यकता को जन्म दिया। ब्रिटिश संसद ने बाद में 1781 के संशोधन अधिनियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता को अधिक स्पष्ट किया और कंपनी के राजस्व प्रशासन तथा अधिकारियों के आधिकारिक कार्यों को न्यायालय की व्यापक हस्तक्षेपकारी शक्ति से बचाने का प्रयास किया।
➣ इसलिए 1781 का संशोधन अधिनियम रेगुलेटिंग एक्ट की असफलताओं का प्रत्यक्ष उत्तर था। इसके बाद भी कंपनी के शासन और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंधों की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई और अंततः पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के माध्यम से भारत के प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण और अधिक मजबूत किया गया।
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