अवध : परिचय
➣ अवध उत्तर भारत का एक अत्यंत समृद्ध, उपजाऊ एवं रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था। इसका विस्तार पश्चिम में कन्नौज से लेकर पूर्व में कर्मनासा नदी तक माना जाता था।
➣ गंगा–घाघरा दोआब की उपजाऊ भूमि तथा व्यापारिक मार्गों पर स्थित होने के कारण यह मुग़ल साम्राज्य के सबसे संपन्न सूबों में गिना जाता था।
➣ अकबर द्वारा स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत अवध एक प्रमुख मुग़ल सूबा था। यहाँ का सूबेदार सम्राट द्वारा नियुक्त किया जाता था और उसका मुख्य कार्य प्रशासन, राजस्व वसूली तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
➣ औरंगज़ेब (1707 ई.) की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य में उत्तराधिकार संघर्ष, प्रांतीय सरदारों की बढ़ती शक्ति तथा केन्द्रीय सत्ता की कमजोरी के कारण साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया।
इसी परिस्थिति में हैदराबाद, बंगाल और अवध जैसे शक्तिशाली प्रांत धीरे-धीरे व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र हो गए।➣ मुहम्मद शाह (1719–1748 ई.) के शासनकाल में अवध के सूबेदार सआदत ख़ाँ ‘बुरहान-उल-मुल्क’ ने अपनी प्रशासनिक एवं सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया।
उसने मुग़ल सम्राट के प्रति औपचारिक निष्ठा बनाए रखी, किंतु प्रांत का शासन स्वतंत्र रूप से संचालित करना प्रारम्भ कर दिया। इसी कारण उसे अवध के नवाबी शासन का संस्थापक माना जाता है।➣ 1722 ई. में सआदत ख़ाँ को अवध का सूबेदार नियुक्त किया गया और उसके नेतृत्व में अवध एक शक्तिशाली एवं लगभग स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित हुआ। आगे चलकर सफ़दरजंग, शुजाउद्दौला, आसफ़ुद्दौला तथा अन्य नवाबों के शासनकाल में अवध उत्तर भारत की राजनीति का प्रमुख केन्द्र बन गया।
सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क (1722–1739 ई.)
➣ सआदत ख़ाँ (मूल नाम मीर मुहम्मद अमीन) अवध के स्वतंत्र नवाबी राज्य का संस्थापक था। उसने बुरहान-उल-मुल्क की उपाधि धारण की थी। वह मूलतः ईरान के निशापुर का निवासी तथा शिया मुसलमान था।
➣ भारत आने के बाद उसने मुग़ल सेवा में प्रवेश किया और अपनी योग्यता, सैन्य क्षमता तथा राजनीतिक सूझबूझ के बल पर शीघ्र ही उच्च पद प्राप्त किए। 1720–1722 ई. के दौरान वह आगरा का सूबेदार भी रहा।
➣ 1722 ई. में मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त किया। उस समय मुग़ल साम्राज्य की केन्द्रीय सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी, जिसका लाभ उठाकर सआदत ख़ाँ ने 1724 ई. में अवध को व्यावहारिक रूप से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित कर लिया। यद्यपि औपचारिक रूप से वह मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार करता रहा।
➣ उसने फैज़ाबाद (अयोध्या) को अवध की राजधानी बनाया तथा प्रशासन को सुदृढ़ करने, राज्य की आय बढ़ाने और स्थानीय शक्तियों को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। (बाद में आसफ़-उद-दौला ने राजधानी लखनऊ स्थानांतरित की।)
➣ सआदत ख़ाँ ने सैय्यद बंधुओं के प्रभाव को समाप्त करने के लिए चलाए गए षड़यंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके पुरस्कारस्वरूप उसे पहले पंचहज़ारी तथा बाद में सप्तहज़ारी मनसब प्रदान किया गया।
➣ 1723 ई. में उसने नई राजस्व बन्दोबस्त (Revenue Settlement) व्यवस्था लागू की तथा इज़ारेदारी (राजस्व ठेका) प्रणाली को प्रोत्साहित किया। इससे राज्य की आय में वृद्धि हुई, किन्तु किसानों पर करों का बोझ भी बढ़ गया।
➣ उसने शक्तिशाली ज़मींदारों और तालुकेदारों की स्वायत्तता पर नियंत्रण स्थापित कर प्रशासन को अधिक संगठित बनाया। इन्हीं सुधारों के कारण अवध उत्तर भारत के सबसे सुदृढ़ क्षेत्रीय राज्यों में से एक बन गया।
नादिरशाह के आक्रमण में सआदत ख़ाँ की भूमिका (1739 ई.)
➣ 1739 ई. में नादिरशाह के भारत आक्रमण के समय मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने सआदत ख़ाँ को दिल्ली बुलाया। करनाल के युद्ध में उसने मुग़ल सेना की ओर से युद्ध किया, किन्तु पराजित होकर नादिरशाह का बंदी बन गया।
➣ बंदी बनाए जाने के बाद सआदत ख़ाँ ने नादिरशाह को विश्वास दिलाया कि दिल्ली में अपार धन-संपत्ति है तथा वहाँ से लगभग 20 करोड़ रुपये प्राप्त किए जा सकते हैं। उसके इस आश्वासन के बाद नादिरशाह ने दिल्ली की ओर कूच किया।
➣ नादिरशाह ने दिल्ली में व्यापक लूटपाट तथा नरसंहार कराया। लूट के बाद भी तत्काल 20 करोड़ रुपये एकत्र नहीं हो सके। इससे नादिरशाह सआदत ख़ाँ से अत्यन्त नाराज़ हो गया और सार्वजनिक रूप से उसका अपमान किया।
➣ इस अपमान तथा अपने वचन को पूरा न कर पाने से आहत होकर सआदत ख़ाँ ने 19 मार्च, 1739 ई. को विषपान कर आत्महत्या कर ली।
➣ सआदत ख़ाँ की मृत्यु के बाद मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने उसके भांजे एवं दामाद सफ़दरजंग को अवध का नवाब नियुक्त किया, जिसने आगे चलकर अवध राज्य को और अधिक सुदृढ़ बनाया।
▪ अवध के स्वतंत्र नवाबी राज्य का संस्थापक :- सआदत ख़ाँ (बुरहान-उल-मुल्क)
▪ मूल नाम :- मीर मुहम्मद अमीन
▪ मूल निवास :- निशापुर (ईरान)
▪ अवध का सूबेदार नियुक्त :- 1722 ई.
▪ अवध की व्यावहारिक स्वतंत्रता :- 1724 ई.
▪ राजधानी :- फैज़ाबाद
▪ नई राजस्व व्यवस्था :- 1723 ई.
▪ करनाल का युद्ध :- 1739 ई.
▪ मृत्यु :- 19 मार्च, 1739 ई. (विषपान)
सफ़दरजंग (1739–1754 ई.)
➣ 1739 ई. में सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क की मृत्यु के बाद उसका भांजा एवं दामाद सफ़दरजंग (मूल नाम मिर्ज़ा मुक़ीम अबुल मंसूर ख़ाँ) अवध का नवाब बना।
➣ वह भी मूलतः ईरानी शिया था तथा अपनी प्रशासनिक क्षमता और सैन्य कौशल के कारण शीघ्र ही एक प्रभावशाली शासक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
➣ सफ़दरजंग की उपाधि उसे मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने प्रदान की थी। आगे चलकर यही उसकी स्थायी पहचान बन गई।
➣ नवाब बनने के बाद उसने फैज़ाबाद को अवध की राजधानी बनाए रखा तथा अपने पूर्ववर्ती सआदत ख़ाँ की प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया। उसने राज्य की आय बढ़ाने, प्रशासन को सुदृढ़ करने तथा स्थानीय सरदारों एवं ज़मींदारों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ इसके साथ ही उसने रुहेलखण्ड एवं उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में अवध का प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। उसके शासनकाल तक अवध मुग़ल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली प्रान्त बन चुका था और व्यवहार में एक स्वतंत्र राज्य की तरह कार्य कर रहा था।
मुग़ल साम्राज्य का वज़ीर (1748–1753 ई.)
➣ 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के प्रथम भारत आक्रमण के समय मानुपुर (मनूपुर) के युद्ध में सफ़दरजंग ने मुग़ल सेना की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में अब्दाली को पंजाब छोड़कर वापस लौटना पड़ा।
➣ इस सफलता से प्रभावित होकर नव-नियुक्त मुग़ल सम्राट अहमदशाह बहादुर ने 1748 ई. में सफ़दरजंग को मुग़ल साम्राज्य का वज़ीर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। 1748 से 1753 ई. तक वह इस पद पर बना रहा।
दिल्ली दरबार की राजनीति एवं वज़ीर पद
➣ मुग़ल साम्राज्य का वज़ीर बनने के बाद सफ़दरजंग ने दिल्ली दरबार में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उसने प्रशासन में योग्यता को प्राथमिकता दी तथा हिन्दू और मुस्लिम अधिकारियों के प्रति समान व्यवहार की नीति अपनाई। उसके शासनकाल में महाराजा नवाब राय जैसे हिन्दू अधिकारी भी उच्च पदों पर नियुक्त थे, जो उसकी व्यावहारिक एवं उदार प्रशासनिक नीति का परिचायक है।
➣ इसी समय दिल्ली दरबार में विभिन्न कुलीन गुटों के बीच सत्ता-संघर्ष तीव्र हो गया। सफ़दरजंग का सबसे पहले प्रभावशाली दरबारी जाविद ख़ाँ (जो सम्राट अहमदशाह बहादुर की माता उधमबाई का कृपापात्र था) से विवाद उत्पन्न हुआ।
➣ जाविद ख़ाँ के बढ़ते प्रभाव को अपने अधिकार के लिए चुनौती मानते हुए सफ़दरजंग ने 1752 ई. में उसकी हत्या करवा दी। इस घटना के बाद दिल्ली दरबार में उसके अनेक विरोधी सक्रिय हो गए और उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर होने लगी।
➣ इसी दौरान उसका शक्तिशाली तुरानी सरदार ग़ाज़ीउद्दीन (इमाद-उल-मुल्क) से भी सत्ता-संघर्ष प्रारम्भ हो गया। दोनों दिल्ली दरबार के प्रतिद्वंद्वी गुटों का नेतृत्व कर रहे थे, जिससे मुग़ल दरबार की राजनीतिक अस्थिरता और अधिक बढ़ गई।
➣ 1753 ई. में ग़ाज़ीउद्दीन ने मराठों की सहायता से सफ़दरजंग को पराजित कर दिया। परिणामस्वरूप उसे वज़ीर के पद से हटा दिया गया और दिल्ली छोड़कर पुनः अवध लौटना पड़ा।
➣ 1754 ई. में सफ़दरजंग की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना, जिसने आगे चलकर 1764 ई. के बक्सर के युद्ध में अंग्रेज़ों के विरुद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
▪ मूल नाम :- मिर्ज़ा मुक़ीम अबुल मंसूर ख़ाँ
▪ उपाधि :- सफ़दरजंग
▪ शासनकाल :- 1739–1754 ई.
▪ राजधानी :- फैज़ाबाद
▪ मानुपुर (मनूपुर) का युद्ध :- 1748 ई.
▪ मुग़ल वज़ीर :- 1748–1753 ई.
▪ जाविद ख़ाँ की हत्या :- 1752 ई.
▪ वज़ीर पद से हटाया गया :- 1753 ई.
▪ मृत्यु :- 1754 ई.
शुजाउद्दौला (1754–1775 ई.)
➣ सफ़दरजंग की मृत्यु के बाद 1754 ई. में उसका पुत्र शुजाउद्दौला अवध का नवाब बना। वह अवध के सबसे प्रभावशाली नवाबों में से एक था तथा उत्तर भारत की समकालीन राजनीति में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ नवाब बनने के बाद शुजाउद्दौला ने अपने पिता की प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखा तथा सेना, वित्त और प्रशासन को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उसके शासनकाल में अवध उत्तर भारत का एक शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य बन गया।
➣ यद्यपि बक्सर के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ गया था, फिर भी शुजाउद्दौला ने कूटनीतिक नीति अपनाकर अवध की राजनीतिक पहचान और स्वायत्तता को यथासंभव सुरक्षित रखा।
➣ उसी वर्ष मुग़ल सम्राट आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.) ने उसे मुग़ल साम्राज्य का वज़ीर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। बाद में शाहआलम द्वितीय (1759–1806 ई.) ने भी उसे इसी पद पर बनाए रखा, जिससे दिल्ली दरबार में उसका प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
➣ शुजाउद्दौला के समय 1759 ई. में मुग़ल सम्राट आलमगीर द्वितीय की हत्या के बाद शाहआलम द्वितीय सम्राट बना, किन्तु दिल्ली पर वास्तविक अधिकार न होने के कारण वह प्रारम्भिक वर्षों में बिहार एवं पूर्वी भारत में रहा।
शाहआलम द्वितीय बिहार में क्यों रहा?
▪ शाहआलम द्वितीय (मूल नाम अली गौहर) मुग़ल सम्राट आलमगीर द्वितीय का पुत्र था। उसने 1758 ई. में शक्तिशाली वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन (इमाद-उल-मुल्क) से अपने प्राणों के भय के कारण दिल्ली छोड़ दी थी।
▪ उस समय यद्यपि आलमगीर द्वितीय मुग़ल सम्राट था, किन्तु दिल्ली दरबार और शासन की वास्तविक सत्ता ग़ाज़ीउद्दीन (इमाद-उल-मुल्क) के हाथों में थी। 1759 ई. में उसी ने आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी।
▪ पिता की हत्या के बाद अली गौहर ने शाहआलम द्वितीय की उपाधि धारण कर स्वयं को मुग़ल सम्राट घोषित किया, किन्तु दिल्ली पर ग़ाज़ीउद्दीन तथा बाद में अहमदशाह अब्दाली के प्रभाव के कारण वह राजधानी पर अधिकार नहीं कर सका।
▪ परिणामस्वरूप 1759–1765 ई. के बीच वह बिहार एवं पूर्वी भारत में रहकर अपने समर्थकों की सहायता से मुग़ल सम्राट होने का दावा करता रहा।
▪ 1765 ई. की इलाहाबाद की संधि के बाद अंग्रेज़ों ने उसे कड़ा और इलाहाबाद प्रदान किए, जहाँ उसने अपना दरबार स्थापित किया।
बाद में 1772 ई. में मराठों की सहायता से वह पुनः दिल्ली पहुँचा और वहाँ अपना शासन स्थापित किया।
➣ इन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच शुजाउद्दौला ने अवध की स्वायत्तता को बनाए रखा। यद्यपि वह औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट का अधीनस्थ एवं वज़ीर था, किन्तु व्यवहार में वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति शासन कर रहा था।
➣ इसी समय उत्तर भारत में अहमदशाह अब्दाली, मराठों, मुग़ल साम्राज्य तथा अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी के मध्य प्रभुत्व के लिए संघर्ष तेज़ हो गया।
➣ इस संघर्ष की पहली प्रमुख घटना 1761 ई. का पानीपत का तृतीय युद्ध था, जिसमें शुजाउद्दौला ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.)
➣ 14 जनवरी, 1761 ई. को पानीपत का तृतीय युद्ध अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के मध्य लड़ा गया। प्रारम्भ में शुजाउद्दौला तटस्थ रहना चाहता था, किन्तु राजनीतिक परिस्थितियों, धार्मिक नेताओं के दबाव तथा उत्तर भारत में मराठों के बढ़ते प्रभाव की आशंका के कारण अंततः वह अहमदशाह अब्दाली के पक्ष में शामिल हो गया।
➣ इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई और उत्तर भारत में उनका प्रभाव कुछ समय के लिए समाप्त हो गया। इससे शुजाउद्दौला की स्थिति भी सुदृढ़ हुई, किन्तु शीघ्र ही उत्तर भारत की राजनीति में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी एक नई एवं शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरने लगी।
➣ प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद अंग्रेज़ पहले ही बंगाल में अपना प्रभाव स्थापित कर चुके थे। पानीपत के युद्ध के पश्चात् मराठों के कमजोर पड़ने से उन्हें उत्तर भारत में अपने प्रभाव का विस्तार करने का और अधिक अवसर मिला।
बक्सर का युद्ध (1764 ई.)
➣ इसी बीच बंगाल में मीर क़ासिम और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष तीव्र हो गया। 1763 ई. में अंग्रेज़ों ने मीर क़ासिम को पराजित कर बंगाल से निष्कासित कर दिया।
➣ इसके बाद उसने अवध पहुँचकर शुजाउद्दौला से शरण एवं सैन्य सहायता माँगी। अंग्रेज़ों के बढ़ते प्रभाव को रोकने तथा अपने-अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से शुजाउद्दौला ने मीर क़ासिम का समर्थन किया।
➣ इसी समय मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय भी अपनी खोई हुई शक्ति एवं प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करना चाहता था। परिणामस्वरूप इन तीनों ने अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना लिया।
➣ 23 अक्टूबर, 1764 ई. को बक्सर का युद्ध अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा शुजाउद्दौला, शाहआलम द्वितीय एवं मीर क़ासिम की संयुक्त सेना के मध्य लड़ा गया। अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
➣ इस युद्ध में संयुक्त सेना पराजित हुई। बक्सर की विजय ने अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी की राजनीतिक शक्ति को निर्णायक रूप से स्थापित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों का प्रभाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया।
➣ साथ ही अवध तथा मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय भी अंग्रेज़ों के प्रभाव में आ गए।
इलाहाबाद की संधि (1765 ई.)
➣ बक्सर के युद्ध (23 अक्टूबर, 1764 ई.) में पराजित होने के बाद 12 अगस्त, 1765 ई. को रॉबर्ट क्लाइव और शुजाउद्दौला के मध्य इलाहाबाद की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि द्वारा अंग्रेज़ों ने शुजाउद्दौला को पुनः अवध का नवाब स्वीकार कर लिया।
➣ संधि की शर्तों के अनुसार शुजाउद्दौला को 50 लाख रुपये युद्ध-क्षतिपूर्ति (हर्जाना) के रूप में अंग्रेज़ों को देने पड़े तथा कड़ा एवं इलाहाबाद के जिले अंग्रेज़ों को सौंपने पड़े।
➣ इसके बाद रॉबर्ट क्लाइव ने कड़ा और इलाहाबाद के जिले मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय को दे दिए।
➣ उस समय शाहआलम द्वितीय दिल्ली पर अधिकार न होने के कारण इलाहाबाद क्षेत्र से ही अपना शासन संचालित कर रहा था।
▪ इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के बाद अंग्रेज़ों ने अवध को अपने साम्राज्य और मराठों के बीच एक बफ़र राज्य के रूप में बनाए रखने की नीति अपनाई।
बनारस की संधि (1773 ई.)
➣ इलाहाबाद की संधि के कुछ वर्षों बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गईं। शाहआलम द्वितीय अंग्रेज़ों का संरक्षण छोड़कर मराठों के सहयोग से दिल्ली लौट गया। फलस्वरूप कड़ा और इलाहाबाद पर उसका अधिकार समाप्त हो गया।
➣ इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए वारेन हेस्टिंग्स ने इन दोनों जिलों को अपने पास रखने के बजाय अवध के नवाब शुजाउद्दौला को सौंपना अधिक लाभदायक समझा। इससे अंग्रेज़ों को आर्थिक लाभ भी मिला और अवध मराठों के विरुद्ध एक सुदृढ़ बफ़र राज्य बना रहा।
➣ इसी उद्देश्य से 1773 ई. में वारेन हेस्टिंग्स और शुजाउद्दौला के मध्य बनारस की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के अंतर्गत कड़ा और इलाहाबाद के जिले शुजाउद्दौला को वापस कर दिए गए।
➣ इसके बदले शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ों को 50 लाख रुपये का भुगतान किया तथा दोनों पक्षों के मध्य राजनीतिक एवं सैन्य सहयोग और अधिक सुदृढ़ हो गया।
प्रथम रुहेला युद्ध (1774 ई.)
➣ 1772 ई. में नजीबुद्दौला की मृत्यु के बाद रुहेलखण्ड की स्थिति कमजोर हो गई। इसका लाभ उठाते हुए मराठों ने उत्तर भारत में अपना प्रभाव पुनः स्थापित करने तथा रुहेलों से पूर्व निर्धारित धनराशि (चौथ/क्षतिपूर्ति) वसूलने के उद्देश्य से रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया।
➣ इस संकट के समय रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत ख़ाँ ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सैन्य सहायता माँगी तथा बदले में 40 लाख रुपये देने का वचन दिया। शुजाउद्दौला के हस्तक्षेप के बाद मराठे वापस लौट गए।
➣ मराठों के लौट जाने के बाद रुहेला सरदारों ने वचनानुसार 40 लाख रुपये देने से इंकार कर दिया। इसी बीच बनारस की संधि (1773 ई.) के कारण अंग्रेज़ और अवध सहयोगी बन चुके थे। इसलिए शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ों की सैन्य सहायता प्राप्त कर 1774 ई. में रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया।
➣ इस युद्ध में रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत ख़ाँ मारा गया और रुहेलों की राजनीतिक शक्ति का अंत हो गया। परिणामस्वरूप रुहेलखण्ड पर अवध का प्रभाव स्थापित हो गया तथा उत्तर भारत में शुजाउद्दौला की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई।
अंग्रेज़ों से सम्बन्ध
➣ बक्सर के युद्ध (1764 ई.) तथा इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के बाद अवध और अंग्रेज़ों के सम्बन्धों में एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। यद्यपि शुजाउद्दौला अंग्रेज़ों से पराजित हो चुका था, फिर भी अंग्रेज़ों ने उसे पदच्युत करने के स्थान पर अवध का नवाब बनाए रखा।
➣ अंग्रेज़ों का उद्देश्य अवध को अपने प्रत्यक्ष शासन में मिलाना नहीं था, बल्कि उसे मराठों तथा अफ़ग़ान आक्रमणों के विरुद्ध एक बफ़र राज्य के रूप में बनाए रखना था। इसी कारण अंग्रेज़ों ने शुजाउद्दौला के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे।
अवध अंग्रेज़ों के लिए कामधेनु क्यों था?
➣ अवध गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब से लगा एक समृद्ध कृषि प्रदेश था। यहाँ से अंग्रेज़ों को समय-समय पर युद्ध-क्षतिपूर्ति, ऋण तथा सैनिक सहायता के बदले बड़ी धनराशि प्राप्त होती रही।
➣ इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी सेना के रख-रखाव का व्यय भी अनेक अवसरों पर अवध से ही वसूला जाता था। इसी कारण इतिहासकारों ने अवध को अंग्रेज़ों की कामधेनु (अर्थात् निरन्तर धन देने वाली) की संज्ञा दी है।
मृत्यु एवं उत्तराधिकारी
➣ 26 जनवरी, 1775 ई. को शुजाउद्दौला की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र आसफ़उद्दौला अवध का अगला नवाब बना, जिसके शासनकाल में 1775 ई. में अवध की राजधानी फैज़ाबाद से लखनऊ स्थानांतरित की गई।
आसफ़-उद-दौला (1775–1797 ई.)
➣ आसफ़-उद-दौला (वास्तविक नाम मुहम्मद याह्या मिर्ज़ा अमानी) शुजाउद्दौला का पुत्र था। 26 जनवरी, 1775 ई. को शुजाउद्दौला की मृत्यु के बाद वह अवध का नवाब बना।
➣ उसके शासनकाल तक आते-आते अवध की राजनीति में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव पहले की अपेक्षा काफी बढ़ चुका था। परिणामस्वरूप नवाब को अपने शासन के प्रारम्भ से ही अंग्रेज़ों के हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा।
फ़ैज़ाबाद की संधि (1775 ई.)
➣ नवाब बनने के तुरंत बाद वारेन हेस्टिंग्स ने आसफ़-उद-दौला पर एक नई संधि स्वीकार करने का दबाव डाला। फलस्वरूप 1775 ई. में दोनों के मध्य फ़ैज़ाबाद की संधि सम्पन्न हुई।
➣ इस संधि के अनुसार नवाब ने अवध में तैनात अंग्रेज़ी सेना के व्यय के लिए 74 लाख रुपये वार्षिक कम्पनी को देने तथा अंग्रेज़ों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को स्वीकार करने पर सहमति व्यक्त की।
➣ इस संधि के बाद अवध की अंग्रेज़ों पर निर्भरता और अधिक बढ़ गई तथा कम्पनी को उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अवसर प्राप्त हुआ। आगे चलकर इसी हस्तक्षेप का परिणाम अवध की बेगमों की लूट जैसी घटनाओं के रूप में सामने आया।
अवध की बेगमों की लूट
➣ फ़ैज़ाबाद की संधि (1775 ई.) के बाद अंग्रेज़ी सेना के बढ़ते व्यय और कम्पनी की आर्थिक माँगों के कारण आसफ़-उद-दौला पर भारी वित्तीय दबाव पड़ने लगा। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए वारेन हेस्टिंग्स ने उस पर अवध की बेगमों की संपत्ति से धन प्राप्त करने का दबाव डाला।
➣ उस समय फ़ैज़ाबाद में शुजाउद्दौला की विधवा बहू बेगम तथा उसकी माता सदरुन्निसा बेगम के पास अपार धन-संपत्ति थी। अंग्रेज़ों का आरोप था कि बेगमों ने चैत सिंह तथा कम्पनी-विरोधी शक्तियों को गुप्त रूप से आर्थिक सहायता प्रदान की थी।
➣ परिणामस्वरूप वारेन हेस्टिंग्स और आसफ़-उद-दौला के आदेश पर बेगमों की जागीरें जब्त कर ली गईं तथा उनसे धन एवं बहुमूल्य आभूषण बलपूर्वक प्राप्त किए गए। इतिहास में यह घटना अवध की बेगमों की लूट के नाम से प्रसिद्ध है।
➣ इस घटना की इंग्लैंड में भी तीखी आलोचना हुई। बाद में एडमंड बर्क सहित अनेक नेताओं ने इसे वारेन हेस्टिंग्स के विरुद्ध चलाए गए महाभियोग के प्रमुख आरोपों में सम्मिलित किया।
▪ वारेन हेस्टिंग्स पर महाभियोग :- 1788–1795 ई.
▪ महाभियोग का प्रमुख नेता :- एडमंड बर्क
▪ उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री :- विलियम पिट (कनिष्ठ)
▪ निर्णय :- 1795 ई. में वारेन हेस्टिंग्स सभी आरोपों से बरी हो गया।
राजधानी का स्थानान्तरण (1775 ई.)
➣ 1775 ई. में आसफ़-उद-दौला ने अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद से लखनऊ स्थानांतरित कर दी। इसके बाद लखनऊ अवध की राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक राजधानी बन गया और नवाबी संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बनकर उभरा।
लखनऊ का विकास एवं बड़ा इमामबाड़ा
➣ राजधानी को लखनऊ स्थानांतरित करने के बाद आसफ़-उद-दौला ने नगर के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उसके शासनकाल में लखनऊ उत्तर भारत का प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा स्थापत्य केन्द्र बनकर उभरा।
➣ 1784 ई. में अवध में भीषण अकाल पड़ा। अकाल से प्रभावित लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आसफ़-उद-दौला ने लखनऊ में प्रसिद्ध बड़ा इमामबाड़ा (आसफ़ी इमामबाड़ा) का निर्माण प्रारम्भ कराया।
➣ इस भवन के मुख्य वास्तुकार किफ़ायतुल्लाह थे। इसका विशाल केंद्रीय सभागार बिना किसी सहारे के बने विश्व के सबसे बड़े मेहराबी कक्षों में से एक माना जाता है। इसी परिसर में स्थित भूल-भुलैया भी अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
▪ लोकप्रिय कहावत :- “जिसको न दे मौला, उसको दे आसफ़-उद-दौला।” अकाल के समय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के कारण यह कहावत प्रचलित हुई।
अन्य उत्तराधिकारी
वज़ीर अली ख़ाँ (21 सितम्बर, 1797 – 21 जनवरी, 1798 ई.)
➣ आसफ़-उद-दौला की मृत्यु के बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल सर जॉन शोर ने वज़ीर अली ख़ाँ को अवध का नवाब नियुक्त किया। प्रारम्भ में अंग्रेज़ों ने उसे उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था।
➣ वज़ीर अली ख़ाँ लगभग चार महीने (21 सितम्बर, 1797 – 21 जनवरी, 1798 ई.) तक ही अवध का नवाब रहा।
➣ इसके बाद अंग्रेज़ों ने उसके उत्तराधिकार की वैधता पर संदेह व्यक्त करते हुए उसे पदच्युत कर दिया तथा 21 जनवरी, 1798 ई. को सआदत अली ख़ाँ द्वितीय को अवध का नवाब बना दिया।
➣ पदच्युत किए जाने के बाद 1799 ई. में वज़ीर अली ख़ाँ ने बनारस में अंग्रेज़ रेज़िडेंट जार्ज फ़्रेडरिक चेरी की हत्या कर अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह का प्रयास किया, किन्तु वह असफल रहा।
➣ बाद में उसे गिरफ्तार कर चुनार के क़िले में कैद कर दिया गया, जहाँ उसने अपना शेष जीवन व्यतीत किया।
सआदत अली ख़ाँ द्वितीय (21 जनवरी, 1798 – 11 जुलाई, 1814 ई.)
➣ सआदत अली ख़ाँ द्वितीय को अंग्रेज़ों के समर्थन से अवध का नवाब बनाया गया। उसके शासनकाल में अवध पर अंग्रेज़ों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया तथा नवाब की स्वतंत्रता लगातार सीमित होती चली गई।
➣ आगे चलकर 1801 ई. में लॉर्ड वेलेजली के साथ हुई लखनऊ की संधि के परिणामस्वरूप अवध को अपना लगभग आधा राज्य अंग्रेज़ों को सौंपना पड़ा तथा अंग्रेज़ी सेना के रख-रखाव की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी पड़ी। इस संधि ने अवध की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
सआदत अली ख़ाँ द्वितीय (1798–1814 ई.)
➣ सआदत अली ख़ाँ द्वितीय अवध के नवाब आसफ़-उद-दौला का सौतेला भाई था। वज़ीर अली ख़ाँ के पदच्युत होने के बाद 21 जनवरी, 1798 ई. को अंग्रेज़ों के समर्थन से उसे अवध का नवाब बनाया गया।
➣ नवाब बनने के बाद उसने अवध के राजा की उपाधि धारण की तथा यामीन-उद्-दौला की उपाधि से भी सम्मानित हुआ।
➣ उसके शासनकाल के प्रारम्भ में सर जॉन शोर भारत के गवर्नर-जनरल थे। अंग्रेज़ों के समर्थन से नवाब बनने के कारण सआदत अली ख़ाँ अंग्रेज़ों पर पहले की अपेक्षा अधिक निर्भर हो गया।
➣ 1798 ई. में उसने अंग्रेज़ों को 76 लाख रुपये का भुगतान किया तथा इलाहाबाद का किला उनके अधीन कर दिया। इससे अवध में अंग्रेज़ों का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
सहायक संधि (1801 ई.)
➣ 1798 ई. में लॉर्ड वैलेजली भारत का गवर्नर-जनरल बना। उसने भारतीय राज्यों पर अंग्रेज़ी प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से सहायक संधि की नीति अपनाई।
➣ अंग्रेज़ों के बढ़ते दबाव तथा अंग्रेज़ी सेना के व्यय का भार वहन करने में कठिनाई के कारण 1801 ई. में सआदत अली ख़ाँ द्वितीय ने लॉर्ड वैलेजली के साथ सहायक संधि स्वीकार कर ली।
➣ इस संधि के अनुसार सआदत अली ख़ाँ द्वितीय ने रुहेलखण्ड, गंगा-यमुना के दोआब का दक्षिणी भाग तथा अवध के कुछ अन्य क्षेत्रों को अंग्रेज़ों को सौंप दिया। बदले में अंग्रेज़ों ने अवध की रक्षा का दायित्व अपने ऊपर ले लिया।
➣ संधि के बाद अवध में एक स्थायी अंग्रेज़ी सेना रखी गई, जिसका व्यय अप्रत्यक्ष रूप से नवाब को वहन करना पड़ता था। साथ ही नवाब की स्वतंत्र विदेश नीति समाप्त हो गई और वह अंग्रेज़ों के संरक्षण में एक आश्रित शासक बनकर रह गया।
अंग्रेज़ों से सम्बन्ध
➣ 1801 ई. की सहायक संधि के बाद अवध पर अंग्रेज़ों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। नवाब की स्वतंत्र विदेश नीति समाप्त हो गई तथा वह अंग्रेज़ों के संरक्षण में एक आश्रित शासक बनकर रह गया।
➣ अंग्रेज़ों ने अवध को प्रत्यक्ष रूप से अपने साम्राज्य में मिलाने के बजाय मराठों तथा उत्तर-पश्चिम से होने वाले संभावित आक्रमणों के विरुद्ध एक बफ़र राज्य के रूप में बनाए रखा। इससे उन्हें सामरिक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता रहा।
➣ परिणामस्वरूप अवध की राजनीतिक स्वतंत्रता निरंतर सीमित होती गई और राज्य के आंतरिक मामलों में भी अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ता चला गया।
प्रशासन
➣ सआदत अली ख़ाँ द्वितीय ने प्रशासनिक सुधारों पर विशेष ध्यान दिया। उसने राजस्व व्यवस्था को अधिक संगठित बनाने, सरकारी आय बढ़ाने तथा प्रशासन में अनुशासन स्थापित करने का प्रयास किया।
➣ यद्यपि उसने शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए कई कदम उठाए, किन्तु 1801 ई. की सहायक संधि के बाद अंग्रेज़ों का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता गया।
➣ परिणामस्वरूप उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित होती गई और प्रशासनिक निर्णयों पर भी अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ने लगा।
मृत्यु एवं उत्तराधिकारी
➣ 11 जुलाई, 1814 ई. को सआदत अली ख़ाँ द्वितीय की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र ग़ाज़ीउद्दीन हैदर अवध का नवाब बना, जिसने आगे चलकर 1819 ई. में अंग्रेज़ों की अनुमति से स्वयं को अवध का बादशाह घोषित किया।
ग़ाज़ीउद्दीन हैदर (1814–1827 ई.)
➣ 11 जुलाई, 1814 ई. को सआदत अली ख़ाँ द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ग़ाज़ीउद्दीन हैदर अवध का नवाब बना। उसके शासनकाल में अवध पर अंग्रेज़ों का प्रभाव पहले से कहीं अधिक बढ़ गया था।
➣ उस समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813–1823 ई.) थे। 1819 ई. में उनके समर्थन से ग़ाज़ीउद्दीन हैदर ने स्वयं को अवध का बादशाह घोषित कर दिया। इसके साथ ही उसने औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट की अधीनता समाप्त कर दी।
➣ अंग्रेज़ों ने भी उसे किंग ऑफ़ अवध (King of Oudh) के रूप में मान्यता दी। इसके पीछे कम्पनी का उद्देश्य मुग़ल सम्राट की प्रतिष्ठा को और कमज़ोर करना तथा अवध को दिल्ली से पूर्णतः अलग करना था।
➣ यद्यपि ग़ाज़ीउद्दीन हैदर ने बादशाह की उपाधि धारण कर ली थी, किन्तु वास्तविक रूप से अवध की राजनीतिक स्वतंत्रता लगातार घटती गई और अंग्रेज़ों का हस्तक्षेप बढ़ता गया।
➣ 19 अक्टूबर, 1827 ई. को लखनऊ स्थित फ़रहत बख्श महल में ग़ाज़ीउद्दीन हैदर का निधन हो गया। उसके बाद उसका पुत्र नासिरुद्दीन हैदर अवध का अगला बादशाह बना।
नासिरुद्दीन हैदर (1827–1837 ई.)
➣ 19 अक्टूबर, 1827 ई. को ग़ाज़ीउद्दीन हैदर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नासिरुद्दीन हैदर अवध का बादशाह बना। उसके शासनकाल में भी अवध पर अंग्रेज़ों का प्रभाव लगातार बढ़ता रहा।
➣ नासिरुद्दीन हैदर विलासी प्रवृत्ति का शासक माना जाता है। उसने शासन-प्रशासन की अपेक्षा ऐश्वर्य, दरबारी जीवन तथा कला-संस्कृति को अधिक संरक्षण दिया, जिसके कारण प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षाकृत कमजोर होती चली गई।
➣ उसके शासनकाल में अंग्रेज़ रेज़िडेंट का प्रभाव अवध के प्रशासन में और अधिक बढ़ गया। परिणामस्वरूप राज्य के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों पर अंग्रेज़ों का अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
➣ लखनऊ के प्रसिद्ध छतर मंज़िल का निर्माण ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के शासनकाल में प्रारम्भ हुआ था, जिसे नासिरुद्दीन हैदर के काल में पूर्ण कराया गया। यह भवन अपनी विशिष्ट यूरोपीय एवं मुग़ल स्थापत्य शैली के समन्वय तथा छत पर बने छत्राकार गुम्बद के कारण प्रसिद्ध है।
➣ 7 जुलाई, 1837 ई. को नासिरुद्दीन हैदर की मृत्यु हो गई। उसकी कोई वैध संतान न होने के कारण उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हुआ, जिसमें अंग्रेज़ों ने हस्तक्षेप कर मुहम्मद अली शाह को अवध का अगला बादशाह बनाया।
▪ छतर मंज़िल का निर्माण ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के समय प्रारम्भ तथा नासिरुद्दीन हैदर के समय पूर्ण हुआ था।
मुहम्मद अली शाह (1837–1842 ई.)
➣ नासिरुद्दीन हैदर की मृत्यु के बाद उत्पन्न उत्तराधिकार विवाद में अंग्रेज़ों ने हस्तक्षेप किया और 1837 ई. में मुहम्मद अली शाह को अवध का बादशाह बनाया।
➣ मुहम्मद अली शाह के शासनकाल में अंग्रेज़ों का प्रभाव अवध की राजनीति पर बना रहा, फिर भी उसने धार्मिक एवं स्थापत्य कार्यों को संरक्षण दिया।
➣ 1838 ई. में उसने लखनऊ में प्रसिद्ध छोटा इमामबाड़ा (हुसैनाबाद इमामबाड़ा) का निर्माण कराया। यह अवध की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक है तथा अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
➣ 7 मई, 1842 ई. को मुहम्मद अली शाह की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र अमजद अली शाह अवध का अगला बादशाह बना।
अमजद अली शाह (1842–1847 ई.)
➣ 1842 ई. में अपने पिता मुहम्मद अली शाह की मृत्यु के बाद अमजद अली शाह अवध का बादशाह बना। उसके शासनकाल में भी अंग्रेज़ों का प्रभाव निरंतर बढ़ता रहा।
➣ 13 फ़रवरी, 1847 ई. को 48 वर्ष की आयु में कैंसर के कारण उसका निधन हो गया। उसके बाद उसका पुत्र वाजिद अली शाह अवध का अंतिम बादशाह बना।
वाजिद अली शाह (1847–1856 ई.)
➣ 13 फ़रवरी, 1847 ई. को अमजद अली शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वाजिद अली शाह अवध का अंतिम स्वतंत्र बादशाह बना। वह कला, साहित्य, संगीत एवं नृत्य का महान संरक्षक था।
➣ वाजिद अली शाह का वास्तविक नाम अबुल मंसूर मिर्ज़ा था। वह रंगीला शाह तथा अख्तर पिया के नाम से भी प्रसिद्ध था। उसने उर्दू साहित्य, संगीत और विशेष रूप से ठुमरी के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ उसके शासनकाल में लखनऊ भारतीय संगीत, नृत्य, रंगमंच और नवाबी संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बन गया। उसने कथक नृत्य को विशेष संरक्षण प्रदान किया तथा पंडित बिरजू महाराज के पूर्वजों सहित अनेक कलाकारों को राजकीय संरक्षण दिया।
अवध का विलय (1856 ई.)
➣ वाजिद अली शाह के शासनकाल में भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के प्रशासन की जाँच के लिए जेम्स आउट्रम को नियुक्त किया। आउट्रम की रिपोर्ट के आधार पर अवध पर कुशासन का आरोप लगाया गया।
➣ इसी आधार पर 7 फ़रवरी, 1856 ई. को लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। यह विलय Doctrine of Lapse के आधार पर नहीं, बल्कि कुशासन के आरोप के आधार पर किया गया था।
➣ अवध के विलय के बाद जेम्स आउट्रम को अवध (लखनऊ) का प्रथम चीफ कमिश्नर नियुक्त किया गया। वहीं वाजिद अली शाह को 12 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कलकत्ता (मटियाबुर्ज) भेज दिया गया।
➣ अधिकांश इतिहासकार अवध के विलय को लॉर्ड डलहौज़ी की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल मानते हैं, क्योंकि इसी निर्णय ने 1857 के विद्रोह के लिए व्यापक असंतोष पैदा किया।
1857 का विद्रोह एवं अवध
➣ 1856 ई. में अवध के विलय के बाद वहाँ के सैनिकों, तालुकेदारों, किसानों तथा आम जनता में अंग्रेज़ों के प्रति व्यापक असंतोष फैल गया। यही असंतोष आगे चलकर 1857 ई. के विद्रोह का एक प्रमुख कारण बना।
➣ विद्रोह के समय वाजिद अली शाह अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता (मटियाबुर्ज) में नज़रबंद था, इसलिए वह विद्रोह का प्रत्यक्ष नेतृत्व नहीं कर सका।
➣ वाजिद अली शाह की अनुपस्थिति में उसकी बेगम बेगम हज़रत महल ने लखनऊ में अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया तथा अपने पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का शासक घोषित किया। अवध 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया।
वाजिद अली शाह ने 1857 के विद्रोह का प्रत्यक्ष नेतृत्व नहीं किया था। उस समय वे कलकत्ता (मटियाबुर्ज) में नज़रबंद थे।
▪ अवध में विद्रोह का नेतृत्व मुख्यतः बेगम हज़रत महल ने किया तथा बिरजिस क़द्र को अवध का शासक घोषित किया गया।
साहित्य एवं संस्कृति में योगदान
➣ वाजिद अली शाह कला, संगीत, साहित्य तथा नृत्य का महान संरक्षक था। उसके शासनकाल में लखनऊ भारतीय संगीत एवं नवाबी संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बन गया।
➣ उसने कथक नृत्य को विशेष संरक्षण प्रदान किया तथा पंडित बिरजू महाराज के पूर्वजों सहित अनेक कलाकारों को आश्रय दिया।
➣ वाजिद अली शाह स्वयं भी कवि एवं संगीतकार था। वह अख्तर पिया उपनाम से रचनाएँ करता था। उसके शासनकाल में ठुमरी शैली का विशेष विकास हुआ तथा दस्तूर-ए-वाजिदी जैसे ग्रंथों में तत्कालीन प्रशासन एवं सांस्कृतिक जीवन का उल्लेख मिलता है।
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