इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग (1928)
➣ इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना 1928 ई. में जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा अन्य युवा राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा की गई।
➣ इसकी पृष्ठभूमि मद्रास अधिवेशन (दिसंबर 1927) में ही तैयार हो चुकी थी, जहाँ साइमन कमीशन के बहिष्कार के प्रस्ताव के साथ-साथ नेहरू ने पहली बार सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित करने वाला प्रस्ताव भी पारित करवाया था।
ध्यान रहे, इस प्रस्ताव में शब्दशः पूर्ण स्वराज पद प्रयुक्त नहीं हुआ था। यह शब्दावली आगे चलकर लाहौर अधिवेशन (1929) में गांधीजी के प्रस्ताव से जुड़ी, जिसमें घोषित किया गया कि कांग्रेस संविधान की धारा-1 में स्वराज शब्द का अर्थ अब पूर्ण स्वतंत्रता होगा।
➣ किन्तु आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट (1928) में पार्टी ने अपेक्षाकृत नरम डोमिनियन स्टेटस की माँग अपनाई, जिससे असंतुष्ट होकर नेहरू, बोस तथा अन्य युवा नेताओं ने मद्रास के संकल्प को जीवित रखने के उद्देश्य से इस संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्ष्य बनाना था।
➣ उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भारत के भविष्य को लेकर दो मत उभर चुके थे। एक पक्ष डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य) को स्वीकार करने के पक्ष में था, जबकि दूसरा पक्ष ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्णतः अलग होकर पूर्ण स्वतंत्रता चाहता था। इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग इसी दूसरे विचार का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन था, जो मद्रास अधिवेशन में स्वीकृत सिद्धांत की व्यावहारिक निरंतरता थी।
➣ यद्यपि यह संगठन अधिक समय तक सक्रिय नहीं रहा, फिर भी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा बदलने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ इसने कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को सशक्त बनाया, और इस प्रकार मद्रास अधिवेशन (1927) में उठे विचार को लाहौर अधिवेशन (1929) में पारित पूर्ण स्वराज्य प्रस्ताव तक पहुँचाने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुआ।
जवाहरलाल नेहरू ने (सुभाषचंद्र बोस तथा के.एन. जोगलेकर के समर्थन से) कांग्रेस के इतिहास में पहली बार “सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता” (Complete National Independence) को दल का अंतिम लक्ष्य घोषित करने वाला प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करवाया — ध्यान रहे, इस प्रस्ताव में शब्दशः “पूर्ण स्वराज” पद प्रयुक्त नहीं हुआ था; यह शब्दावली आगे चलकर लाहौर अधिवेशन (1929) में गांधीजी के प्रस्ताव से जुड़ी, जिसमें घोषित किया गया कि कांग्रेस संविधान की धारा-1 में ‘स्वराज’ शब्द का अर्थ अब ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ होगा।”स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ 1927 ई. में ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस आयोग में कोई भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था, जिसके कारण पूरे देश में इसका व्यापक विरोध हुआ।
➣ इसी विरोध की पृष्ठभूमि में दिसंबर 1927 में हुए कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने (सुभाषचंद्र बोस तथा वर्कर्स एंड पीज़ेंट्स पार्टी के के.एन. जोगलेकर के समर्थन से) कांग्रेस के इतिहास में पहली बार सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता को दल का अंतिम लक्ष्य घोषित करने वाला प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करवाया। यही वैचारिक संकल्प आगे चलकर इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग के गठन का आधार बना।
➣ साइमन कमीशन के विरोध के बीच भारत के नेताओं ने स्वयं एक संवैधानिक प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया। इसके लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई, जिसने अगस्त 1928 में लखनऊ में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की।
➣ नेहरू रिपोर्ट में भारत के लिए मद्रास संकल्प के विपरीत डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य) का प्रस्ताव रखा गया था। कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेता इसे तत्कालीन परिस्थितियों में व्यावहारिक समाधान मानते थे, किन्तु युवा राष्ट्रवादी नेताओं का एक वर्ग इससे असंतुष्ट था, क्योंकि यह मद्रास अधिवेशन में स्वीकृत पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य से पीछे हटना प्रतीत होता था।
➣ जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस तथा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एस. श्रीनिवास आयंगर जैसे नेताओं का मत था कि भारत का लक्ष्य केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिए। उनका तर्क था कि ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन किसी भी प्रकार की स्वायत्त स्थिति वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मानी जा सकती।
➣ इसी वैचारिक मतभेद के तत्काल परिणामस्वरूप, नेहरू रिपोर्ट के विरोध में, अगस्त 1928 में लखनऊ में -उसी अवसर पर जब सर्वदलीय सम्मेलन चल रहा था – इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग की स्थापना की गई।
इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना की पृष्ठभूमि:- मद्रास प्रस्ताव (1927) → नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस का प्रस्ताव (1928) → कलकत्ता अधिवेशन में मतभेद(1928) → इंडिया लीग की स्थापना (1928) → लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का औपचारिक संकल्प (1929)
इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना (1928)
➣ 1928 ई. में जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा अन्य युवा राष्ट्रवादी नेताओं ने इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना की। इसका उद्देश्य भारत की पूर्ण स्वतंत्रता को राष्ट्रीय आन्दोलन का स्पष्ट लक्ष्य बनाना था।
➣ यह संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग कोई प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि कांग्रेस के भीतर कार्य करने वाला एक वैचारिक मंच था। इसके माध्यम से युवा नेताओं ने कांग्रेस पर पूर्ण स्वतंत्रता को आधिकारिक लक्ष्य घोषित करने के लिए दबाव बनाया।
➣ इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग का मानना था कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि बिना किसी समझौते के पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करनी चाहिए।
➣ यद्यपि इस संगठन का जीवनकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, फिर भी इसने कांग्रेस के भीतर चल रही वैचारिक बहस को नई दिशा दी। आगे चलकर 1929 ई. में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किए जाने में इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
▪ इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना-तिथि को लेकर विभिन्न स्रोतों में मतभेद मिलता है। अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं तथा प्रचलित इतिहास पुस्तकों में इसकी स्थापना अप्रैल 1928 ई. मानी जाती है, जिसमें एस. श्रीनिवास अयंगार अध्यक्ष तथा जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाषचन्द्र बोस सचिव बताए गए हैं।
▪ वहीं कुछ शोध स्रोत और नेहरू आर्काइव इसे अगस्त 1928 ई. में लखनऊ में आयोजित ऑल पार्टीज़ कॉन्फ्रेंस के समय औपचारिक रूप से संगठित मानते हैं। परीक्षा की दृष्टि से अप्रैल 1928 अधिक प्रचलित उत्तर है।
प्रमुख संस्थापक एवं नेता
| नेता | भूमिका / योगदान |
|---|---|
| जवाहरलाल नेहरू | इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग के प्रमुख संस्थापकों में से एक। कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के सबसे प्रमुख समर्थक। |
| सुभाषचन्द्र बोस | लीग के सह-संस्थापक एवं प्रमुख नेता। पूर्ण स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक तथा युवा राष्ट्रवादियों के प्रमुख प्रतिनिधि। |
| एस. श्रीनिवास अयंगार | कांग्रेस के वरिष्ठ नेता। लीग के गठन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया तथा पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का समर्थन किया। |
| बुलुसु सांबामूर्ति | आंध्र प्रदेश के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता। लीग के संगठनात्मक विस्तार में सहयोग दिया। |
| डॉ. सैफुद्दीन किचलू | प्रमुख राष्ट्रवादी नेता। पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का समर्थन किया तथा लीग की गतिविधियों से जुड़े। |
कलकत्ता अधिवेशन (1928) एवं पूर्ण स्वतंत्रता की माँग
➣ दिसम्बर 1928 ई. में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में नेहरू रिपोर्ट पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। यह रिपोर्ट इससे पूर्व अगस्त 1928 ई. में सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत की जा चुकी थी।
➣ अधिवेशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि भारत को डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status) की माँग करनी चाहिए या सीधे पूर्ण स्वतंत्रता को राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित करना चाहिए।
पूर्ण स्वतंत्रता की माँग पहली बार मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस के समक्ष रखी थी, किन्तु वह स्वीकार नहीं की गई।
➣ जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, एस. सत्यमूर्ति तथा अन्य युवा राष्ट्रवादी नेताओं ने डोमिनियन स्टेटस का विरोध किया।
➣ उनका मत था कि ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन किसी भी प्रकार का संवैधानिक दर्जा भारत की वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसलिए कांग्रेस को तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता को अपना राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित करना चाहिए।
➣ दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, विशेषकर मोतीलाल नेहरू तथा महात्मा गांधी का मत था कि नेहरू रिपोर्ट को तत्काल अस्वीकार करना उचित नहीं होगा।
➣ गांधीजी ने एक समझौता प्रस्ताव रखा, जिसके अनुसार यदि ब्रिटिश सरकार 31 दिसम्बर 1929 ई. तक भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान नहीं करती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित करेगी। अंततः अधिवेशन ने इसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की भूमिका
➣ कलकत्ता अधिवेशन (1928) के बाद इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग ने कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में अपना वैचारिक अभियान और अधिक तेज कर दिया।
➣ लीग से जुड़े नेताओं ने विभिन्न सभाओं, सम्मेलनों तथा लेखों के माध्यम से यह प्रचार किया कि भारत का लक्ष्य केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन से पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता होना चाहिए।
➣ लीग ने विशेष रूप से कांग्रेस के युवा नेताओं, विद्यार्थियों तथा राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के बीच पूर्ण स्वराज्य के विचार को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया। यद्यपि कलकत्ता अधिवेशन में उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ, फिर भी अगले एक वर्ष तक उसने कांग्रेस के भीतर इस विषय पर लगातार जनमत तैयार किया।
लाहौर अधिवेशन (1929) एवं पूर्ण स्वराज्य की घोषणा
➣ कलकत्ता अधिवेशन (1928) में कांग्रेस ने यह निर्णय लिया था कि यदि ब्रिटिश सरकार 31 दिसम्बर 1929 ई. तक भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान नहीं करती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य को अपना राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित करेगी। किन्तु निर्धारित अवधि के भीतर ब्रिटिश सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
➣ ऐसी परिस्थितियों में दिसम्बर 1929 ई. में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। यह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
➣ अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित कर दिया। इसके साथ ही डोमिनियन स्टेटस की नीति को त्याग दिया गया और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना निर्धारित हो गया।
➣ इसी अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 ई. को पूरे देश में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा तथा भारतीय जनता से पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा दिलाई जाएगी। आगे चलकर इसी निर्णय ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930) की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य स्वीकार किए जाने के साथ ही इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग का मूल उद्देश्य पूरा हो गया। इसके बाद इसकी स्वतंत्र गतिविधियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं और इसके अधिकांश नेता पुनः कांग्रेस की मुख्यधारा में सक्रिय हो गए।
▪ इस प्रकार भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को संगठित रूप से आगे बढ़ाने का श्रेय मुख्यतः जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग (1928) को दिया जाता है।
▪ कांग्रेस ने इसे तत्काल स्वीकार नहीं किया। कलकत्ता अधिवेशन (1928) में एक वर्ष की समय-सीमा निर्धारित की गई और अंततः लाहौर अधिवेशन (1929) में पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया गया।
इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग का पतन
➣ दिसम्बर 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित किए जाने के बाद इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग का मूल उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो गया। जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इस संगठन का गठन किया गया था, उसे अब स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया था।
➣ इसके परिणामस्वरूप एक अलग वैचारिक मंच के रूप में लीग की आवश्यकता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। इसके अधिकांश नेता पुनः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मुख्यधारा में सक्रिय हो गए और आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों में कांग्रेस के माध्यम से भाग लेने लगे।
➣ 1930 ई. में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ होने के बाद देश का राजनीतिक वातावरण व्यापक जनआन्दोलन की ओर बढ़ गया। ऐसे में इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्वतंत्र संगठनात्मक गतिविधियाँ लगभग समाप्त हो गईं और यह धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गई।
➣ यद्यपि इस संगठन का जीवनकाल बहुत लंबा नहीं था, फिर भी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में इसका ऐतिहासिक महत्व बना रहा। इसने कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को संगठित स्वर दिया और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
समयरेखा
| वर्ष / तिथि | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1927 ई. | ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन की नियुक्ति की, जिसके विरोध ने भारतीय नेताओं को अपना संवैधानिक प्रारूप तैयार करने के लिए प्रेरित किया। |
| अगस्त 1928 ई. | सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference) में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। |
| 1928 ई. | इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना हुई। इसके प्रमुख नेताओं में जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा एस. श्रीनिवास अयंगार शामिल थे। |
| दिसम्बर 1928 ई. | कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन आयोजित हुआ। यहाँ डोमिनियन स्टेटस और पूर्ण स्वतंत्रता को लेकर व्यापक बहस हुई तथा गांधीजी का समझौता प्रस्ताव स्वीकार किया गया। |
| 31 दिसम्बर 1929 ई. | ब्रिटिश सरकार द्वारा डोमिनियन स्टेटस न दिए जाने पर कांग्रेस ने अपने पूर्व निर्णय के अनुसार आगे की नीति तय करने की तैयारी की। |
| दिसम्बर 1929 ई. | कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया गया। |
| 26 जनवरी 1930 ई. | देशभर में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया तथा पूर्ण स्वराज्य प्रतिज्ञा दिलाई गई। |
| 1930 ई. | सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ होने के साथ इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्वतंत्र गतिविधियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं। |
सारांश
- इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग (Independence for India League) की स्थापना 1928 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के युवा राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता को राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्ष्य बनाना था।
- इस संगठन की स्थापना की पृष्ठभूमि में साइमन कमीशन (1927), नेहरू रिपोर्ट (1928) तथा डोमिनियन स्टेटस को लेकर कांग्रेस के भीतर उत्पन्न वैचारिक मतभेद प्रमुख कारण थे।
- जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा एस. श्रीनिवास अयंगार इस संगठन के प्रमुख नेताओं में थे। लीग ने कांग्रेस के भीतर एक वैचारिक दबाव-समूह (Pressure Group) के रूप में कार्य किया।
- दिसम्बर 1928 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता और डोमिनियन स्टेटस को लेकर व्यापक बहस हुई। अंततः कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि यदि 31 दिसम्बर 1929 ई. तक ब्रिटिश सरकार डोमिनियन स्टेटस नहीं देती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित करेगी।
- कलकत्ता अधिवेशन के बाद इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग ने देशभर में पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में जनमत तैयार करने का अभियान जारी रखा और कांग्रेस के युवा वर्ग में इस विचार को मजबूत बनाया।
- दिसम्बर 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित कर दिया।
- इसी अधिवेशन में 26 जनवरी 1930 ई. को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने तथा पूर्ण स्वराज्य की प्रतिज्ञा लेने का निर्णय किया गया।
- कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य को अपनाए जाने के बाद इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग का मूल उद्देश्य पूरा हो गया और इसकी स्वतंत्र गतिविधियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।
- यद्यपि इस संगठन का अस्तित्व अल्पकालिक रहा, फिर भी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को डोमिनियन स्टेटस की माँग से आगे बढ़ाकर पूर्ण स्वराज्य की दिशा में ले जाने में इसका महत्वपूर्ण वैचारिक योगदान माना जाता है।
अक्सर होने वाले भ्रम
➣ अनेक विद्यार्थी मानते हैं कि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग एक स्वतंत्र राजनीतिक दल था। वास्तव में यह कांग्रेस के भीतर कार्य करने वाला एक वैचारिक दबाव-समूह (Pressure Group) था, जिसका उद्देश्य कांग्रेस को पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में प्रेरित करना था।
➣ यह मानना भी सही नहीं है कि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना लाहौर अधिवेशन (1929) के बाद हुई थी। इसकी स्थापना 1928 ई. में नेहरू रिपोर्ट के बाद उत्पन्न वैचारिक मतभेदों की पृष्ठभूमि में हुई थी।
➣ कई बार यह भ्रम हो जाता है कि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग और ऑल इंडिया होमरूल लीग एक ही संगठन थे। वास्तव में दोनों अलग-अलग संगठन थे। होमरूल लीग की स्थापना 1916 ई. में हुई थी, जबकि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग की स्थापना 1928 ई. में हुई।
➣ कुछ विद्यार्थी यह समझते हैं कि नेहरू रिपोर्ट (1928) में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग की गई थी। यह सही नहीं है। नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस का प्रस्ताव रखा गया था, जबकि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग ने पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन किया।
➣ भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को संगठित रूप से आगे बढ़ाने का श्रेय मुख्यतः जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग (1928) को दिया जाता है। हालाँकि, कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वराज की माँग पहले से मौजूद थी। इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग ने कांग्रेस के सामने पूर्ण स्वराज के लक्ष्य को रखने और उसे अपनाने के लिए दबाव बनाने का काम किया। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पूर्ण स्वराज का विचार पहली बार इसी लीग ने दिया था।
➣ यह भी ध्यान रखें कि कलकत्ता अधिवेशन (1928) में कांग्रेस ने तत्काल पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित नहीं किया था। अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था कि यदि 31 दिसम्बर 1929 ई. तक ब्रिटिश सरकार डोमिनियन स्टेटस प्रदान नहीं करती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित करेगी।
➣ कई बार यह प्रश्न पूछा जाता है कि पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य किस अधिवेशन में स्वीकार किया गया। सही उत्तर है—कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन (1929), जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
➣ यह कहना भी सही नहीं होगा कि इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग ने कोई व्यापक जनआन्दोलन चलाया था। इसका मुख्य कार्य कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में वैचारिक समर्थन तैयार करना और जनमत को प्रभावित करना था।
➣ अनेक विद्यार्थी यह मानते हैं कि लाहौर अधिवेशन (1929) के बाद भी इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग स्वतंत्र रूप से लंबे समय तक सक्रिय रही। वास्तव में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य को अपना आधिकारिक लक्ष्य स्वीकार कर लेने के बाद इस संगठन का मूल उद्देश्य पूरा हो गया और इसकी स्वतंत्र गतिविधियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।
➣ यह भी ध्यान रखें कि जवाहरलाल नेहरू केवल कांग्रेस के नेता ही नहीं थे, बल्कि वे इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग के प्रमुख नेताओं में भी शामिल थे और कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के सबसे प्रमुख समर्थकों में गिने जाते हैं।
Leave a Reply