❑ गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी सदी के अन्त में, प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। इस वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था।
❑ गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम (319-330 ई. तक) को माना जाता है।
❑ चन्द्रगुप्त प्रथम ने उस समय के प्रसिद्ध लिच्छवि कुल की कुमारदेवी से विवाह किया था।
❑ 319-320 ई. में चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत् चलाया था।
❑ सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
❑ समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बाद चन्द्रगुप्त ने संन्यास ग्रहण कर लिया।
❑ समुद्रगुप्त 330 ई. में राजगद्दी पर बैठा। अनेक विद्वान समुद्रगुप्त की तिथि 335-380 ई. मानते हैं।
❑ अनेक विद्वान समुद्रगुप्त की तिथि 335-380 ई. मानते हैं। समुद्रगुप्त सम्राट अशोक के विपरीत आक्रमणकारी एवं साम्राज्यवादी शासक था।
❑ समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था।
❑ इलाहाबाद में स्थित प्रयाग प्रशस्ति की रचना हरिषेण ने की थी।
❑ प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्त के विषय में जानकारी मिलती है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया, धरणिबन्ध (पृथ्वी को बाँधना) अपना लक्ष्य बनाया।
❑ समुद्रगुप्त ने गरुड़, व्याघ्रहन्ता, धनुर्धर, परशु, अश्वमेध एवं वीणाधारी 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्रायें जारी करवाई।
❑ समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के नौ शासकों को पराजित किया।
❑ विन्सेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा था।
❑ समुद्रगुप्त के सिक्कों पर उसे वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया है तथा कविराज की उपाधि प्रदान की गई है।
❑ श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से गया में एक बौद्ध मन्दिर बनाने की अनुमति मांगी थी।
❑ समुद्रगुप्त के बाद राजगद्दी पर चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-415 ई.) बैठा था।
❑ भारतीय इतिहास में 14 विक्रमादित्य हुए जिनमे से सबसे विख्यात चन्द्रगुप्त द्वितीय (चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य) हैं।
❑ शकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विशेष चाँदी के सिक्के जारी किये तथा शाकारि उपाधि धारण किये।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन से किया।
❑ रुद्रसेन की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी दूसरी राजधानी उज्जैन में बनाई।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देवगुप्त, देवराज, देवश्री तथा उपाधियाँ विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत थी।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय का सन्धिविग्रहिक वीरसेन शैव था।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415-455 ई.) राजगद्दी पर बैठा।
❑ कुमारगुप्त की 623 मुद्रायें बयाना-मृद्भाण्ड से मिली हैं।
❑ कुमारगुप्त की मयूर मुद्रा विशेष शैली की थी। कुमार गुप्त के सिक्कों से पता चलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया था।
❑ कुमार गुप्त ने श्री महेन्द्र, महेन्द्रादित्य तथा अश्वमेध महेन्द्र की उपाधियाँ, धारण की।
❑ ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा बौद्ध विहार का निर्माण शक्रादित्य ने कराया। जिसकी पहचान कुमारगुप्त से की गई है।
❑ पुष्यमित्र जातियों के विद्रोह की जानकारी स्कन्दगुप्त के भितरी स्तम्भ लेख (गाजीपुर) से मिलती है।
❑ नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी। इस विश्वविद्यालय को ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध कहा जाता है।
❑ कुमारगुप्त बाद स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) राजगद्दी पर बैठा। स्कन्दगुप्त को गद्दी पर बैठते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा।
❑ जूनागढ़ अभिलेख में हूणों को म्लेच्छ कहा गया है।
❑ गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण स्कन्दगुप्त ने करवाया।
❑ स्कन्दगुप्त को शक्रापम, देवराय एवं श्रीपरिक्षिप्तवृक्षा नाम के सम्बोधनों से सम्बोधित किया गया है।
❑ कहौम अभिलेख से विदित है कि स्कंदगुप्त की उपाधि शक्रादित्य था।
❑ स्कन्दगुप्त की स्वर्ण मुद्राओं पर क्रमादित्य उपाधि मिलती है।
❑ स्कन्दगुप्त ने सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का कार्य गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपा था।
❑ सुदर्शन झील के किनारे विष्णु मन्दिर चक्रपालित ने बनवाया।
❑ हूणों का महत्त्वपूर्ण शासक तोरमाण था। तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल था।
❑ मिहिरकुल को यशोधर्मन ने 532 ई. में पराजित किया था।
❑ गुप्तवंश का अन्तिम शासक विष्णुगुप्त था।
❑ प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर शासन करने वाला ईश्वर का प्रतिनिधि कहा गया है।
❑ पदाधिकारियों के सर्वश्रेष्ठ वर्ग को कुमारामात्य कहा जाता था।
❑ वेतन की अदायगी भूमि अनुदान के रूप में होती थी।
❑ गुप्तकाल में भू-राजस्व से 1/4 से 1/6 भाग लिया जाता था।
❑ नगर का मुख्य अधिकारी पुरपाल होता था।
❑ मंदसौर अभिलेख से रेशम बुनकरों की श्रेणी द्वारा विशाल सूर्यमन्दिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है।
❑ सभी व्यापारिक मार्ग उज्जैन में आकर मिलते थे।
❑ सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के गुप्तों ने ही जारी किये। इन सिक्कों को दीनार कहा जाता था। उल्लेखनीय है सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों के थे।
❑ गुप्तकाल में वस्त्र उद्योग सबसे महत्त्वपूर्ण था। घोड़ों का आयात बैक्ट्रिया से होता था।
❑ गुप्तकाल में आय-व्यय, लेखन कार्य करने वालों को कायस्थ कहा गया। जिसका सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य ने किया है।
❑ प्रथम सती होने का प्रमाण 510 ई. के एरण अभिलेख से मिलता है।
❑ गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था।
❑ गुप्त वंश का राजकीय चिह्न गरुड़ था।
❑ वैष्णव एवं शैव धर्म के मध्य समन्वय गुप्तकाल में स्थापित हुआ।
❑ गुप्त राजाओं ने परमभागवत धार्मिक उपाधि धारण की।
❑ स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख एवं बुद्धगुप्त का एरण अभिलेख विष्णु स्तुति से शुरू हुआ है।
❑ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना की।
❑ वैष्णव धर्म का प्रधान अंग अवतारवाद था।
❑ शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की मूर्तियाँ गुप्तकाल में बनाई गई।
❑ गुप्तकाल में ही त्रिमूर्ति के अन्तर्गत ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा आरंभ हुई।
❑ गुप्तकालीन मन्दिर कला का सर्वोत्तम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मन्दिर (सर्वप्रथम शिखर का प्रयोग) है।
❑ अजन्ता की गुफाएँ गुप्तकाल की हैं।
❑ गुप्तकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इसी काल में कालिदास एवं अन्य संस्कृत विद्वानों ने अधिकांश संस्कृत साहित्य की रचना की।
❑ आर्यभट्ट गुप्तकाल के सबसे बड़े गणितज्ञ थे। उनकी रचना का नाम आर्यभट्टीयम है।
❑ सर्वाधिक भूमि अनुदान गुप्तकाल में दिया गया।
❑ गुप्त काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का काल माना जाता है।
❑ रामायण तथा महाभारत के अंतिम रूप का संपादन गुप्त काल में ही हुआ था।
❑ गुप्त काल में दास प्रथा विद्यमान थी।
❑ नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है, जबकि मनु ने 7 प्रकार के।
❑ मंदसौर अभिलेख से कुमारगुप्त-I के शासन का वर्णन प्राप्त होता है।
❑ तुमुन अभिलेख में कुमारगुप्त-I को शरदकालीन सूर्य कहा गया है।
❑ सबसे अधिक अभिलेख (18) कुमारगुप्त-I के मिले हैं।
❑ स्कन्दगुप्त का भितरी अभिलेख (गाजीपुर) हूणों द्वारा आक्रमण की जानकारी देता है।
❑ तोरमण, मिहिरकुल प्रसिद्ध हूण राजा थे।
❑ कहौम स्तम्भलेख में स्कन्दगुप्त को शक्रोपम तथा जूनागढ़ अभिलेख में श्रीपरिक्षिप्तवृक्षा कहा गया है।
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