परिचय
| जन्म | 563 ई.पू. |
| जन्मस्थल | लुम्बिनी वन (कपिलवस्तु, नेपाल) |
| पिता | शुद्धोधन (शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक |
| माता | महामाया देवी (कोलिय वंश) |
| बचपन का नाम | सिद्धार्थ |
| कुल | क्षत्रिय |
| गोत्र | गौतम |
| पालन पोषण | विमाता प्रजापति गौतमी |
| पत्नी | यशोधरा (कोलिय गणराज्य की राजकुमारी) |
| पुत्र | राहुल |
| सारथी | चन्ना |
| घोड़ा | कथक |
| प्रथम गुरू | आलारकलाम |
| ज्ञान प्राप्ति स्थल | गया (बोधगया, बिहार) निरंजना नदी का तट |
| प्रथम उपदेश स्थल | ऋषि पत्तन (सारनाथ) |
| धर्म-प्रचार | वैशाली, मगध, अंग, काशी, मल्ल, वज्जि |
| प्रथम शिष्य | आनंद व उपालि |
| प्रथम महिला शिष्य | प्रजापति गौतमी |
| प्रिय शिष्य | आनंद |
| अंतिम उपदेश | सुभध नामक व्यक्ति |
| मृत्यु | 483 ई.पू., आयु-80 वर्ष, वैशाख पूर्णिमा, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) |
बौद्ध धर्म : गौतम बुद्ध
➣ गौतम बुद्ध (563-583 ईसा.पू) के समकालीन मगध पर हर्यक वंश (544-412 ईसा.पू) का शासन था।
➣ बुद्ध का काल मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा. पू.) के उदय और सिकंदर के आक्रमण (326 ईसा. पू.) से भी पहले का है।
| संप्रदाय | संस्थापक |
|---|---|
| आजीवक संप्रदाय (भाग्यवादी) | मक्खलि गोशाल |
| घोर अक्रियावादी | पूरन कस्सप |
| उच्छेदवादी (भौतिकवादी) | अजित केस कंबलि |
| नित्यवादी | पकुध कच्चायन |
| संदेहवादी (अज्ञेयवादी, अनिश्चयवादी) | संजय वेलदुपुत्त |
➣ गौतम बुद्ध को एशिया के ज्योति पुंज के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुद्ध के जीवन पर एडविन अर्नाल्ड ने लाइट ऑफ़ एशिया नामक काव्य पुस्तक की रचना की है।
प्रारंभिक जीवन
➣ बौर्द्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। बुद्ध का अर्थ प्रकाशमान अथवा जाग्रत होता है।
➣ गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी ग्राम में आम्रकुंज में शाल वृक्ष के नीचे क्षत्रिय कुल में हुआ।
अशोक का रूम्मिनदेई (लुम्बिनी) अभिलेख बुद्ध के जन्म का अभिलेखीय प्रमाण प्रस्तुत करता है।
➣ महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति व निर्वाण तीनों वैशाख पूर्णिमा को हुए थे जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। इसीलिए बौद्धों का सबसे पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण त्योहार वैशाख पूर्णिमा / बुद्ध पूर्णिमा है।
➣ महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन था जो शाक्य गण के मुखिया थे और माता का नाम महामाया था जो कोसल राज्य (कोलिय वंश) की राजकुमारी थी।
➣ बुद्ध के जन्म के सातवें दिन उनकी माता का देहांत हो गया। अतः इनका लालन-पालन इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था।
➣ कालदेवल, कौण्डिन्य एवं ऋषि अतिश ने भविष्यवाणी की, कि सिद्धार्थ चक्रवर्ती राजा या फिर संन्यासी होगा।
➣ महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इसके अलावा इन्हें तथागत, शाक्यमुनि, बोधिसत्व, सुगाता, अरहंत, प्रछन्न, चक्रवर्तिन, सम्मा, सम्बुद्धस्सा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
➣ 16 वर्ष की आयु में बुद्ध का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ। उत्तरकालीन बौद्ध ग्रंथों में यशोधरा के अन्य नाम गोपा, बिम्बा, भद्कच्छना आदि मिलते हैं।
गृहत्याग / महाभिनिष्क्रमण
➣ 28वें वर्ष में सिद्धार्थ को यशोधरा से राहुल नामक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन सांसारिक दुःखों से द्रवित होकर उन्होंने 29वें वर्ष में गृहत्याग कर दिया। इस गृहत्याग की घटना को बौद्ध मतावलम्बी महाभिनिष्क्रमण कहते हैं।
➣ कहा जाता है जब बुद्ध ने सन्यास लेने का सकंल्प ले लिया था तभी उन्हें पुत्र के जन्म का समाचार मिला उन्होंने पुत्र को बाधा के रूप में देखते हुए उसे राहु कहा फलत : पुत्र का नाम राहुल रखा गया।
➣ सिद्धार्थ के मन में वैराग्य उत्पन्न करने वाले चार दृश्य क्रमश:- वृद्ध व्यक्ति, रोगी व्यक्ति, मृत व्यक्ति व सन्यासी। ये चार दृश्य मज्झिम निकाय में है।
➣ महात्मा बुद्ध का सारथी चन्ना अथवा छन्दक और घोड़ा कंथक था।
➣ बुद्ध ने गृहत्याग के पश्चात अनोमा नदी के किनारे अनुवैया स्थान पर पहुँचकर सिर मुंडवाकर भिक्षु वस्त्र धारण किए तथा कन्थक एवं छन्दक को वापस भेजा। कालान्तर में इस स्थान पर चूड़ामणि एवं कंथकराम विहार का निर्माण हुआ।
➣ तत्पश्चात गौतम ने वैशाली के समीप अपने पहले गुरू अलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ली आलार कालाम ने महात्मा बुद्ध को आकिंचन्यायतन तथा अरूपसमापत्ति की शिक्षा दी।
आलारकालाम सांख्य दर्शन के आचार्य थे। इसी कारण बौद्ध धर्म पर सांख्य दर्शन का प्रभाव है।
➣ अलार कालाम के बाद राजगृह के उद्रक (रूद्रक) रामपुत्त सिद्धार्थ के दुसरे गुरु बने, रूद्रक ने बुद्ध को नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन नामक योग का उपदेश दिया। ललित विस्तार में उद्रक रामपुत्त का आश्रम भी राजगृह में बताया है।
➣ सुत्तनिपात के पब्बज्ज सुत्त और ललित विस्तार के अनुसार राजगृह में सिद्धार्थ मगधराज बिम्बिसार से भी मिले। इसके पश्चात सिद्धार्थ उरुवेला (बोधगया) पहुंचे।
➣ बुद्ध जब उरूवेला (बोधगया) गये, तब वहाँ उन्हें कौंडिन्य एवं चार अन्य ब्राह्मण साधक मिले। सिद्धार्थ ने कठोर साधना छोड़कर निरंजना नदी के किनारे सेनानी गांव की सुजाता के हाथों से भोजन (खीर) ग्रहण किया।
➣ वर्तमान में सेनानी गाँव का नाम बकरौर है। बकरौर गाँव में दूसरी शताब्दी ई.पू. का सुजाता का स्तूप भी मिला है।
ज्ञान प्राप्ति / सम्बोधि
➣ 35 वर्ष की आयु में उरूवेला में एक अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के नीचे समाधि की अवस्था में 49वें दिन वैशाख पूर्णिमा की रात सेनानी ग्राम में निरंजना (फल्गु/लिलाजन) नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ।
➣ ज्ञान प्राप्ति की इस घटना को सम्बोधि कहा जाता है। महावग्ग में सम्बोधि का वर्णन तथा सम्बोधि के बाद कुछ समय का क्रमबद्ध इतिवृत दिया गया है।
➣ ज्ञान प्राप्ति की घटना के दो दिन बाद ही सिद्धार्थ तथागत (सत्य का ज्ञान प्राप्त करने वाला) हो गये एवं गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुये।
➣ 6 वर्ष तक बुद्ध द्वारा सत्य की खोज का प्रयास आर्य पर्येषणा कहलाता है।
प्रथम उपदेश / धर्मचक्रप्रवर्तन
➣ उरुवेला से बुद्ध सारनाथ (ऋषिपत्तनम एवं मृगदाव) आये। जहाँ उन्होंने प्रथम उपदेश जनसाधारण भाषा पालि में दिए। जिसे बौद्ध परम्परा में धर्म चक्रप्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।
➣ प्रथम उपदेश का उल्लेख संयुक्त निकाय (सुत्त पिटक) में है एवं प्रथम उपेदश में ही बुद्ध ने चार आर्य सत्यों के बारे में बताया।
➣ महावग्ग के अनुसार बुद्ध ने सर्वप्रथम तपस्सु (तपुस्स) एवं भल्लि (भल्लिक) नामक दो बनजारों (शूद्र) को गया में बौद्ध धर्म का अनुयायी बनाया।
➣ उरूवेला से बुद्ध वाराणसी के पास स्थित सारनाथ आये तथा यहाँ के ऋषिपत्तनम (उषावदन) एवं मृगदाव आश्रम में पाँच ब्राह्मण संन्यासियों को पालि भाषा में प्रथम उपदेश दिया। ये पाँच शिष्य थे-
- आंज (असंग)
- कौंडिन्य
- अस्सजि वप्प
- महानाम
- भद्दिय
➣ बुद्ध ने बनारस (वाराणसी) के यश नामक श्रेष्ठि को भी संघ का सदस्य बनाया।
बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार
➣ बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोशल राज्य में हुआ। कोशल में ही बुद्ध के सर्वाधिक अनुयायी बने तथा कोशल की राजधानी श्रावस्ती में ही बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिये तथा श्रावस्ती में ही सर्वाधिक वर्षाकाल (20 वर्षाकाल) व्यतीत किया।
➣ श्रावस्ती के बाद क्रमशः राजगृह, वैशाली और कपिलवस्तु में सर्वाधिक वर्षाकाल बिताया। कपिलवस्तु भी कोशल राज्य के अधीन था।
➣ सर्वप्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन के उपरांत बुद्ध काशी होते हुए मगध की राजधानी राजगृह गये, जहाँ बिम्बिसार ने उनका स्वागत किया और वेणुवन विहार दान में दिया। उल्लेखनीय है यह बुद्ध को दिया गया पहला विहार था।
➣ मगध शासक बिम्बिसार (हर्यक वंश) एंव उसकी पत्नी क्षेमा, पुत्र अभय बुद्ध के शिष्य बने। राजगृह में ही सारिपुत्र, महामोद्गलायन, उपालि, अभय आदि इनके शिष्य बने।
➣ सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन अस्सजि वप्प नामक बौद्ध भिक्षु से प्रभावित होकर राजगृह आये थे। सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन का निधन बुद्ध के जीवनकाल में ही हो गया था। सारिपुत्र की मृत्यु पर तो बुद्ध शोक से अत्यधिक व्याकुल हो गये थे।
➣ राजगृह से चलकर बुद्ध लिच्छवियों की राजधानी वैशाली पहुंचे। जहां उन्होंने पांचवां वर्षाकाल व्यतीत किया। लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कुटाग्रशाला का निर्माण करवाया।
➣ वैशाली की प्रसिद्ध नगर-वधू आम्रपाली उनकी शिष्या बनी तथा भिक्षु-संघ के निवास के लिए उसने अपनी आम्रवाटिका प्रदान की।
➣ बुद्ध ने कपिलवस्तु में शाक्यों के संस्थागार का उद्घाटन किया एवं कपिलवस्तु से लौटते समय अनुपिय नामक स्थान पर शाक्य नरेश भद्रिक को अपना शिष्य बनाया।
➣ ज्ञान प्राप्ति के 8वें वर्ष गौतम बुद्ध ने वैशाली में अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमति दी। इस प्रकार बुद्ध की माता प्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला हुई।
➣ देवदत्त, बुद्ध का चचेरा भाई था। यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौद्ध संघ से बुद्ध को हटाकर स्वंय संघ का प्रधान बनना चाहता था, किंतु उसे इसमें सफलता नहीं मिली।
➣ बुद्ध ने कोशल राज्य में सर्वाधिक वास किया। यहाँ के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने उनकी शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए जेतवन विहार प्रदान किया।
➣ भरहुत से प्राप्त एक शिल्प के ऊपर इस दान का उल्लेख है। इसमें जेतवन अनाथपेन्डिकों देति कोटिसम्थतेनकेता लेख उत्कीर्ण मिलता है।
➣ कोशल नरेश प्रसेनजित ने भी अपने परिवार के साथ बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए पुब्बाराम (पूर्वा-राम) नामक विहार बनवाया।
➣ ज्ञान प्राप्ति के 20वें वर्ष बुद्ध श्रावस्ती (कोशल) पहुँचे तथा वहाँ अंगुलिमाल नामक डाकू को अपना शिष्य बनाया।
मृत्यु/महापरिनिर्वाण
➣ अपने दिनों में बुद्ध अपना प्रचार करते हुए वे मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे, जहाँ वे चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका में ठहरे।
➣ चुंद ने बुद्ध को सूकर मछव खाने को दिया, इससे उन्हें रक्तातिसार हो गया। इस वेदना के बाद भी वे कुशीनारा (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुँचे।
➣ 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनारा अथवा कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में बुद्ध की मृत्यु हो गयी।
बौद्ध परंपरा में गौतम बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण नाम से जाना जाता है।
➣ कुशीनगर के रामसंभार नदी तट पर मल्लों ने बुद्ध का अन्तिम संस्कार किया और द्रोण नामक ब्राह्मण की अध्यक्षता में अस्थि अवशेष को 8 जगह भेजा गया। इन्हीं आठ क्षेत्रों में स्तूप बनाये गए-
- मगध नरेश अजातशत्रु
- कपिलवस्तु के शाक्य
- रामग्राम के कोलिय
- पावा एवं कुशीनगर के मल्ल
- पिप्पलिवन के मौर्य (अंगारा स्तूप)
➣ दीघनिकाय में वर्णित है कि क्षत्रिय होने के आधार पर अजातशत्रु ने बुद्ध के अस्थि अवशेषों में हिस्सेदारी का दावा करते हुए कहा था कि, बुद्ध भी खतिय (क्षत्रिय), मैं भी खतिय।
- सबसे पहले बौद्ध स्तूप की स्थापना सारनाथ में हुई।
- सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती में दिये गए।
- सर्वाधिक प्रचार कोशल राज्य में हुआ।
- प्रथम वर्षावास सारनाथ (वाराणसी) के मूलगन्ध कुट्टि विहार में किया गया।
- अन्तिम वर्षावास वैशाली के वेलुग्राम विहार में किया था।
➣ बौद्ध धर्म अपनाने वाले शासक- अजातशत्रु, उदायिन, कनिष्क, प्रसेन्नजित, हर्षवर्धन, पाल शासक व अशोक आदि। सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म काफी उन्नत अवस्था में था।
बुद्ध के जीवन से संबंधित प्रतीक
| घटना | प्रतीक |
|---|---|
| जन्म | कमल एवं हाथी |
| गृहत्याग | घोड़ा |
| यौवन | सांड |
| ज्ञान | पीपल (बोधि वृक्ष) |
| प्रथम उपदेश | चक्र |
| समृद्धि | शेर |
| स्तूप | निर्वाण |
| मृत्यु | पद-चिह्न |
बौद्ध शिक्षाएँ एवं सिद्धांत
➣ बौद्ध धर्म को तीन महत्त्वपूर्ण अवधारणाएं अनित्यता, अनात्मा, अनीश्वरवाद हैं।
➣ महात्मा बुद्ध ने सभी उपदेश जनसाधारण भाषा पालि में दिए।
➣ बुद्ध ने मध्यम मार्ग अथवा मध्यम प्रतिपदा का उपदेश देते हुए कहा कि- मनुष्य को सभी प्रकार के आकर्षण एवं कायाक्लेश से बचना चाहिए अर्थात न तो अत्यधिक इच्छाएं करनी चाहिए और न ही अत्यधिक तप (दमन) करना चाहिए। बल्कि इनके बीच का मार्ग अपना कर दुःख निरोध का प्रयास करना चाहिए।
➣ बुद्ध ने क्षणिकवाद का प्रतिपादन किया। क्षणिकवाद के अनुसार, इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है, कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है।
➣ बौद्ध धर्म मूलतः अनीश्वरवादी है। वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर ही बल दिया।
➣ वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया। इसलिए उनको अज्ञेयवादी कहा जाता है।
➣ बौद्ध धर्म अनात्मवादी है। इसमें आत्मा की परिकल्पना नहीं की गई है। यह पुनर्जन्म में विश्वास करता है। अनात्मवाद को नैरात्मवाद भी कहा जाता है।
➣ बुद्ध के अनुसार चूंकि विश्व को प्रत्येक वस्तु अनित्य है, अतः नित्य आत्मा की परिकल्पना नहीं की जा सकती।
➣ बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा का घोर विरोध किया। वे अपौरुपेय वेद की सत्ता को अस्वीकार करते हैं।
➣ जिस प्रकार दुःख समुदाय का कारण जन्म है, उसी तरह जन्म का कारण अज्ञानता का चक्र है। इस अज्ञान रूपी चक्र को प्रतीत्य समुत्पाद कहा जाता है।
➣ प्रतीत्यसमुत्पाद ही बुद्ध के उपदेशों का सार एवं उनकी सम्पूर्ण शिक्षा का आधार स्तम्भ है। प्रतीत्य समुत्पाद का शाब्दिक अर्थ है प्रतीत्य (किसी वस्तु के होने पर) समुत्पाद (किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति।
➣ बुद्ध ने पुनर्जन्म तथा जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण अविद्या बतलाया है।
➣ बौद्ध ने निर्वाण प्राप्त करने को कहा अर्थात् इच्छाओं और तृष्णाओं से छुटकारा, जिससे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिले। निर्वाण का अर्थ है दीपक का बुझ जाना अर्थात् जीवन-मरण के चक्र मुक्त हो जाना।
➣ बौद्ध धर्म के तीन रत्न- बुद्ध, धम्म और संघ
पंचशील तथा दसशील
➣ दीघ निकाय के भाग सिंगालोवाद में पंचशील एवं दसशील का वर्णन है।
➣ बौद्ध धर्म में पंचशील का सिद्धान्त छान्दोग्य उपनिषद् से लिया गया है।
➣ बौद्ध धर्म में निर्वाण प्राप्ति के लिये सदाचार तथा नैतिक जीवन पर दस शीलों पर अत्यधिक बल दिया गया है। इन दस शीलों को शिक्षापद भी कहा गया है, ये हैं-
- अहिंसा
- सत्य
- अस्तेय (चोरी न करना)
- अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति न रखना)
- मद्य सेवन न करना
- असमय भोजन न करना
- सुखप्रद विस्तर पर न सोना
- आभूषणों का त्याग
- स्त्रियों से दूर रहना (ब्रह्मचर्य)
- व्यभिचार आदि से दूर रहना
➣ इनमे से गृहस्थों के लिये केवल 5 शील तथा भिक्षुओं के लिये 10 शील मानना अनिवार्य था।
अष्टांगिक मार्ग
➣ दुखों के निवारण के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही जिसमें आठ मार्ग बताए गये है । सांसारिक दुःखों से मुक्ति हेतु बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग पर चलने की बात कही है।
➣ अष्टांगिक मार्ग के अनुशीलन से मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट होने लगती है और वह निर्वाण की ओर अग्रसर हो जाता है। अष्टांगिक मार्ग के साधन हैं-
| सम्यक दृष्टि | वस्तुओं के वास्तविक रूप का ध्यान करना सम्यक दृष्टि है। |
| सम्यक संकल्प | आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना। |
| सम्यक वाक | अप्रिय वचनों का परित्याग। |
| सम्यक कर्मान्त | दान, दया, सत्य, अहिंसा आदि सत्कर्मों का अनुसरण करना। |
| सम्यक आजीव | सदाचार के नियमों के अनुकूल जीवन व्यतीत करना। |
| सम्यक व्यायाम | विवेकपूर्ण प्रयत्न करना। |
| सम्यक स्मृति | सभी प्रकार की मिथ्या धारणाओं का परित्याग करना। |
| सम्यक समाधि | निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना। |
➣ अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र, देवयान एवं ब्रह्मयान भी कहा जाता है।
➣ अष्टांगिक मार्ग को मध्यम मार्ग या मज्झिम प्रतिपदा भी कहते हैं।
➣ अष्टांगिक मार्ग के साधनों को तीन स्कन्धों में बांटा गया है-
| प्रज्ञा | सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक |
| शील | सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम |
| समाधि | सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि |
➣ बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत तैत्तिरीय उपनिषद् है।
चार आर्य सत्य
➣ बुद्ध ने चार आर्य सत्य भी प्रस्तुत किये हैं-
- दुःख — संसार में दुःख है।
- समुदय — दुःख के कारण हैं।
- निरोध — दुःख के निवारण हैं।
- मार्ग — निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं।
➣ चारों आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग एवं प्रथम उपदेश का वर्णन धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र में मिलता है।
- अनीश्वरवाद – ईश्वरीय सत्ता में विश्वास नहीं।
- शून्यतावाद – संसार की समस्त वस्तुएँ या पदार्थ सत्ताहीन है।
- अनात्मवाद – आत्मचेतना पर सर्वाधिक बल।
- क्षणिकवाद – संसार में कोई भी चीज स्थिर नहीं।
बौद्ध धर्म की संगीतियां
➣ बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों (विनय पिटक तथा सुत्त पिटक) में संकलित करने के उद्देश्य से अजातशत्रु (हर्यक वंश) के शासनकाल में 483 ई.पू. में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन महाकश्यप की अध्यक्षता में राजगृह (सप्तपर्णी गुफा) में हुआ ।
➣ प्रथम संगीति हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु के संरक्षण में हुयी जिसमें सुतपिटक व विनय पिटक का संकलन हुआ।
➣ द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. में कालाशोक (शिशुनागवंश) के शासनकाल में साबकमीर (सर्वकामनी) की अध्यक्षता में वैशाली आयोजित किया गया। इसी बौद्ध संगीति के दौरान अनुशासन को लेकर मतभेद के समाधान के लिए बौद्ध धर्म दो भागों- स्थविर एवं महासांघिक में बंट गया था ।
➣ मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में अशोक (मौर्य वंश) के शासनकाल में 251 ई.पू. में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन पाटलिपुत्र में किया गया। इसमें अभिधम्म पिटक का संकलन हुआ जिसमें बौद्ध दर्शन का वर्णन 7 भागों किया गया है
➣ तृतीय बौद्ध संगीति के दौरान संघ भेद के विरुद्ध कठोर नियमों का प्रतिपादन करके बौद्ध धर्म को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयत्न किया गया।
➣ कनिष्क (कुषाण वंश) के शासनकाल में कश्मीर के कुण्डलवन में लगभग ईसा की प्रथम शताब्दी में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष क्रमशः वसुमित्र एवं अश्वघोष थे।
➣ चतुर्थ संगीति में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान व महायान में हो गया, आगे चलकर सातंवी शताब्दी में बौद्ध धर्म की वजयान शाखा भी बनी।
| संगीति | समय | स्थान | अध्यक्ष | शासनकाल |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 483 ई. पूर्व | राजगृह | महाकश्यप | अजातशत्रु |
| द्वितीय | 383 ई. पूर्व | वैशाली | सबाकामी | कालाशोक |
| तृतीय | 255 इ. पूर्व | पाटलिपुत्र | मोग्गलिपुत्त | तिस्स अशोक |
| चतुर्थ | प्रथम शताब्दी | कुण्डलवन | वसुमित्र/अश्वघोष | कनिष्क |
- प्रथम : बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों विनय एवं सुत्त में संकलित किया गया।
- द्वितीय : अनुशासन को लेकर मतभेद के कारण बौद्ध धर्म स्थविर एवं महासांघिक में बंट गया।
- तृतीय : तीसरा पिटक अभिधम्म जोड़ा गया।
- चतुर्थ : बौद्ध धर्म का दो सम्प्रदायों हीनयान एवं महायान में विभाजन हुआ।
➣ सम्राट हर्षवर्धन ने 643 ई. में कन्नौज में एक विशाल धार्मिक सभा, का आयोजन किया था। जिसमे बौद्ध की महायान शाखा की श्रेठता सिद्ध हुई। इसकी अध्यक्षता चीनी यात्री ह्वेनसांग ने की थी।
बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय
हीनयान : निम्न वर्ग (भिक्षुक जीवन)
➣ जिन अनुयायियों ने बिना किसी परिवर्तन के बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार किया, वे हीनयानी कहलाए।
➣ हीनयानी निम्नमार्गी एवं रूढ़िवादी थे। यह व्यक्तिवादी धर्म था। इसमें व्यक्ति स्वयं के निर्वाण हेतु ही प्रयासरत रहता है, अन्य के कल्याण हेतु प्रयास नहीं करता था।
➣ इस पंथ के अनुयायी बुद्ध की मौलिक शिक्षाओं में विश्वास करते थे तथा वे बुद्ध की नहीं, बल्कि उनके प्रतीक चिन्हों की पूजा करते थे।
➣ हीनयान का आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है। हीनयान को श्रावकयान भी कहते हैं।
➣ हीनयान साहित्य मुख्यतः पालि भाषा में है।
➣ हीनयान भी समय के साथ दो धाराओं में विभाजित हो गया – वैभाषिक सम्प्रदाय और सौत्रांतिक सम्प्रदाय ( प्रवर्तक – कुमार लाट)।
➣ वैभाषिक मत के प्रमुख आचार्य हैं-धर्मत्रात, घोषक, बुद्धदेव, वसुमित्र आदि थे जबकि सौत्रांतिक संप्रदाय के मुख्य विद्वान – चंद्रकीर्ति, शांतिदेव, शांतिरक्षित, आर्यदेव आदि हुए।
➣ वैभाषिक मत की उत्पत्ति कश्मीर में हुई जबकि पाश्चात्य वैभाषिक का केन्द्र गांधार था।
➣ सौत्रान्तिक मत की स्थापना कुमारलब्ध ने दूसरी शताब्दी ई. में की। सौत्रान्तिक मत का मुख्य आधार सुत्त पिटक है। अतः इसे सौत्रान्तिक कहा जाता है। श्रीलाभ एवं यशोमित्र इस मत के आचार्य थे।
➣ वसुबन्धु द्वारा लिखित अभिधम्मकोश (आधार ग्रंथ- विभाषशास्त्र) वैभाषिक सम्प्रदाय का प्रसिद्ध ग्रंथ है तथा सौत्रांतिक सम्प्रदाय का आधार ग्रंथ सुत्तपिटक है।
➣ वसुबंधु ने अपने जीवन के अन्तिम चरण में वैभाषिक मत को छोड़ योगाचार मत (विज्ञानवाद) अपना लिया और महायान का वज्रछेदिका ग्रन्थ लिखा।
➣ भारत में हीनयान की लोकप्रियता धीरे-धीरे समाप्त हो गयी, किन्तु आज भी यह श्रीलंका, बर्मा, कंबोडिया, थाईलैंड, लाओस में जीवित है।
महायान : उच्च वर्ग (गृहस्थ जीवन)
➣ बौद्ध नियमों के विपरीत महायान ने दरिद्रता अथवा भिक्षुक जीवन को त्याग कर भोग-विलास को ग्रहण किया। महायान का त्रिकार्य सिद्धान्त है- सम्भोगकार्य, धर्मकार्य एवं निर्माण कार्य।➣ महायानी बोधिसत्व की मूर्ति तथा संस्कृत भाषा आदि के प्रयोग में विश्वास करते थे। उन्होंने बुद्ध को अवतार मानकर उनकी मूर्ति बनाकर उपासना करना आरम्भ कर दिया।
उल्लेखनीय है बुद्ध की मूर्ति को भारत में सर्वप्रथम पूजा गया।
➣ महायान साहित्य मुख्यतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। दूसरी से छठीं सदी ई. के मध्य का काल महायान क्लासिकी ग्रंथों के लेखन एवं अनुवाद कार्यों का काल माना जाता है।
➣ यह संप्रदाय तिब्बत, चीन, कोरिया, मंगोलिया और जापान में फैला। जापान, चीन जैसे देशों में महायान सम्प्रदाय का वर्चस्व है। वसुमित्र, अश्वघोष, कनिष्क व नागार्जुन इसके प्रमुख प्रवर्तक थे।
➣ कालान्तर में महायान सम्प्रदाय दो भागों में बंट गया- शून्यवाद (माध्यमिक) और विज्ञानवाद (योगाचार)। शून्यवाद के प्रवर्तक नागार्जुन तथा विज्ञानवाद के प्रवर्तक मैत्रेयनाथ थे।
मैत्रेय को बौद्ध परंपरा में भावी बुद्ध कहा गया है। एकमात्र इसी विषय पर दोनों संप्रदाय एकमत हैं।
➣ नागार्जुन को बौद्ध धर्म का संतपाल / भारत का आइन्स्टाईन एवं प्राचीन भारत का लूथर भी कहा जाता है। नागार्जुन के शून्यवाद ने शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को प्रभावित किया।
➣ आर्यदेव (चतुःशतक के लेखक), बुद्धपालित (5वीं सदी), चन्द्र कीर्ति (6ठी शताब्दी), शांतिदेव, कमलशील एवं शांतरक्षित ( 7वीं- 8वीं सदी) आदि शून्यवाद के प्रमुख विद्वान हैं।
➣ विज्ञानवाद (योगाचार) की स्थापना तीसरी शताब्दी ई. में मैत्रेयनाथ ने की। पेशावर के असंग तथा वसुबंधु ने इसका विकास किया।
➣ स्थिरमति, दिङ् नाग और धर्मकीर्ति भी योगाचार मत के थे। योगाचार का गुप्तकाल में अत्यधिक विकास हुआ।
➣ महायान संप्रदाय का सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ प्रज्ञापारमितासूत्र (बौधिसत्वों के आध्यात्मिक सिद्धान्त) है। इसके लेखक नागार्जुन थे।
➣ मातृकासिद्धि महायान शाखा से सम्बन्धित टीका है।
➣ दिङ् नाग ने पाँचवीं सदी में बौद्ध न्याय-दर्शन का प्रतिपादन किया और प्रमाण समुच्चय नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। दिङ् नाग को मध्यकालीन न्याय/तर्क का जनक कहा जाता है।
महायान गृहस्थ तथा हीनयान सन्यास पर जोर देते थे।
| हीनयान | महायान |
|---|---|
| हीनयान का शाब्दिक अर्थ है- निम्न मार्ग। | महायान का शाब्दिक अर्थ है- उत्कृष्ट मार्ग। |
| इसमें महात्मा बुद्ध को एक महापुरुष माना जाता है। | इसमें उन्हें देवता माना जाता है। |
| यह व्यक्तिवादी धर्म है। इसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिए। | इसमें परोपकार एवं परसेवा पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण है। |
| यह मूर्तिपूजा एवं भक्ति में विश्वास नहीं करता है। | यह आत्मा एवं पुनर्जन्म में विश्वास करता है। |
| इसकी साधना पद्धति अत्यंत कठोर है तथा यह भिक्षु जीवन का समर्थक है। | इनके सिद्धांत सरल एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। इसमें भिक्षु के साथ-साथ सामान्य उपासकों को भी महत्व दिया गया है। |
| इसका आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है। | इसका आदर्श बोधिसत्व है। |
| इसके प्रमुख संप्रदाय हैं- वैभाषिक तथा सौत्रांतिका | इसके प्रमुख संप्रदाय हैं- शून्यवाद (माध्यमिक) तथा विज्ञानवाद (योगाचार) | |
➣ महावस्तु एवं ललित विस्तार बुद्ध की पौराणिक जीवनियाँ हैं। ललितविस्तार महायान संप्रदाय का प्राचीनतम् ग्रंथ है तथा महावस्तु को हीनयान एवं महायान के मध्य पुल माना जाता है।
वज्रयान : नीच वर्ग (तंत्रवाद)
➣ सातवीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म का एक नया रूप सामने आया, जिसे वज्रयान कहते हैं। यह संप्रदाय तंत्र-मन्त्र से प्रभावित था।
➣ वज्रयान का सर्वाधिक विकास आठवीं शताब्दी में हुआ। इसके सिद्धांत आर्य मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्यसमाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं। इसने भारत में बौद्ध धर्म के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ इस सम्प्रदाय के अनुयायियों ने बुद्ध को अलौकिक सिद्धियों वाला पुरुष माना। इसमें मंत्र, हठयोग और तांत्रिक आचारों की प्रधानता थी।
➣ इस संप्रदाय के सिद्धांत मंजुश्री मूल कल्प तथा गुहा समाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं।
➣ इसमें तंत्र-मंत्र पर वल दिया गया और बुद्ध को देवी तारा से जोड़ दिया गया। साधु, गुह्य साधना का प्रयोग करने लगे और पंचमकार (मद्य, माँस, मैथुन, मत्स्य, मुद्रा) की साधना करने लगे।
➣ वज्रयान की प्रधान देवता ताराएं ( मातंगी, पिशाची, योगिनी, डाकिनी आदि) थीं, जो मुक्ति प्रदात्री देवियां थीं। ये बुद्ध एवं बोधिसत्वों की पलियां थीं।
➣ वज्रयान की परिधि में ही नौवीं-दसवीं शताब्दी में कालचक्रयान नाम से एक नये सम्प्रदाय का उदय हुआ, इसमें सर्वोच्च देवता श्री कालचक्र का माना गया।-
➣ कालचक्रयान मत का प्रमुख ग्रंथ कालचक्रतंत्र एवं विमलप्रभा ( सुचन्द्र रचित) थे। इस सम्प्रदाय के प्रमुख देवताभगवान श्रीकालचक्र थे।
➣ कालचक्रयान संप्रदाय तिव्बत एवं चीन में विशेष रूप से प्रचलित हुआ।
बौद्ध साहित्य
➣ बौद्ध मत के तीन प्रमुख अंग थे-बौद्ध, संघ एवं धम्म। बौद्ध धर्म में धम्मपद का वही स्थान है, जो हिन्दू धर्म में गीता का है।
➣ बौद्ध धर्म के आरंभिक ग्रंथों को त्रिपिटक कहा जाता है। त्रिपिटक सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ हैं, यह पाली भाषा में रचित है।
➣ बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बांटा गया, इन्हीं को त्रिपिटक कहते हैं। त्रिपिटक हैं- विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।
| सुत्तपिटक | यह बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का संग्रह है। |
| विनयपिटक | इसमें बौद्ध संघ के नियमों का वर्णन है। |
| अभिधम्मपिटक | इसमें बौद्ध दर्शन की चर्चा है। |
➣ अढकथा ग्रंथ को त्रिपिटक के महाभाष्य के रूप में लिखा गया था। सुत्तपिटक की अट्ठ कथा महा अट्ठक तथा विनयपिटक की कुरुन्दी तथा *अभिधम्मपिटक की अट्ठ कथा मूल रूप से सिंहली भाषा में महा पच्चरी है।
➣ सुत्त पिटक के पांच निकाय (संग्रह) हैं- दोघ निकाय, मज्झिम निकाय, अंगुत्तर निकाय,संयुक्त निकाय तथा खुद्दक निकाय। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण निकाय खुद्दक निकाय है, जिसमें बौद्ध धर्मदर्शन से संबंधित 15 ग्रंथ हैं।
➣ अभिधम्म पिटक में बुद्ध की शिक्षाओं का दार्शनिक विवेचन एवं आध्यात्मिक विचारों का पाण्डित्यपूर्ण शैली में संकलन किया गया है । अभिधम्म पिटक का महत्वपूर्ण भाग कथावस्तु है।
➣ अभिधम्म पिटक से संबंधित ग्रंथों की संख्या सात है, जिनमें चित्त, नैतिक धर्म और निर्वाण का उल्लेख है। इनकी रचना अशोक के धर्मगुरु ने की थी। उनका नाम मोग्गालिपुत्त तिस्स था।
➣ जातक में गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म से संबंधित लगभग 550 कहानियाँ हैं तथा बौद्ध ग्रंथ थेरीगाथा में बौद्ध भिक्षुणियों के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। यह पालि भाषा में है।
➣ महावस्तु में बुद्ध के पूर्व जीवन की कथाएं हैं तथा ललितविस्तार में बुद्ध का जीवन चरित वर्णित है। ललितविस्तार मूलत: एक महायान ग्रंथ है।
➣ पालि भाषा में रचित प्रसिद्ध ग्रंथ मिलिन्दपन्हो की रचना प्रथम शताब्दी ई. पू. में आचार्य नागसेन की थी । जिसमे ग्रीक नरेश मिनांडर (मिलिंद) के बीच हुए प्रश्नोत्तरों को संकलित किया गया है। ‘
➣ कनिष्क के दरबारी कवि, नाटककार, संगीतकार, विद्वान एवं तर्कशास्त्री अश्वघोष ने’बुद्धचरित् नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें बुद्ध का जीवन चरित वर्णित है।
➣ बुद्धचरितम की रचना संस्कृत भाषा में अश्वघोष ने की जिसे बौद्धों का रामायण कहा जाता है।
➣ विशुद्धिमार्ग की रचना बुद्धघोष ने की जो हीनयान धर्म का प्रमुख ग्रंथ है।
➣ नागार्जुन बौद्धाचार्य ने शून्यवाद का प्रतिपादन किया जो माध्यमिक दर्शन से सम्बन्धित है।
बुद्धघोष द्वारा रचित ग्रंथ विसुद्धमग्ग ( विशुद्ध मार्ग ) को बौद्धों का विश्व कोश माना जाता है।
➣ पालि भाषा में रचित दीपवंश (लेखक अज्ञात) और महावंश (लेखक- महानामा) में बौद्ध धर्म के श्रीलंका में प्रवेश करने का और प्रथम दो बौद्ध संगीतियों का वर्णन है ।
➣ भारत में लिखित सबसे बाद वाला बौद्ध धर्म ग्रंथवामसाथपाकसिनी है।
बुद्ध की प्रमुख मुद्राएँ
➣ धर्मचक्र मुवा – बुद्ध की यह मुद्रा उनके जीवनकाल के उन महत्त्वपूर्ण क्षणों के ऊपर केंद्रित है, जब वे प्रबोधन के पश्चात् सारनाथ के कुरंग उपवन में पहली बार धर्मोपदेश दे रहे थे।
➣ अभय मुद्रा – महात्मा बुद्ध की यह मुद्रा शांति, सुरक्षा, दयालुता एवं भयमुक्तता का प्रतीक है।
➣ भूमिस्पर्श मुद्रा – बुद्ध की यह भाव-भंगिमा बोधगया में उनके ज्ञान प्राप्ति (प्रबोधन) की संकेतक है।
➣ ज्ञान मुद्रा – बुद्ध के अंगूठे के स्पर्श से चक्र के निर्माण और हथेली से सीने को स्पर्श, ज्ञान मुद्रा को प्रदर्शित करती है।
➣ वरद मुद्रा – यह मुद्रा ऊर्जा की प्राप्ति के लिये पूर्णतः समर्पित होने का गुण सिखाती है।
बौद्ध वास्तु कला
➣ बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा से तात्पर्य अपने तप की शुचिता और निरंतरता को बनाए रखने से है। भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ की बुद्ध मूर्ति गुप्तकाल से संबंधित है।
➣ महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुद्ध की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 6.10 मीटर ऊंची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है।
➣ यह मूर्ति उस काल को दर्शाती है, जब 80 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध ने अपने पार्थिव शरीर को छोड़ दिया और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए अर्थात निर्वाण की प्राप्ति हो गई।
शिक्षा केंद्र
➣ प्राचीन काल में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रमुख केंद्र थे – (1) नालंदा,(2) वल्लभी और (3) विक्रमशिला।
➣ नालंदा महायान बौद्ध धर्म की तथा वल्लभी हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
➣ विक्रमशिला महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाए थे।
➣ पांचवीं शताब्दी के मध्य, गुप्तों के समय में नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। सर्वप्रथम कुमारगुप्त-I ने नालंदा बौद्ध विहार को दान दिया और बाद में बुधगुप्त, तथागतगुप्त तथा बालादित्य नामक गुप्त शासकों ने भी इस विहार को दान दिए।
➣ नव नालंदा महाविहार बौद्ध अध्ययन का आधुनिक केंद्र है, जिसे बिहार सरकार ने वर्ष 1951 में नालंदा में स्थापित किया था।
बौद्ध धर्म के संरक्षक
| बिम्बिसार/अजातशत्रु | हर्यकवंश का मगध नरेश |
| प्रसेनजित | कोशल नरेश |
| उदयन | वत्स नरेश |
| प्रद्यात | अवन्ति नरेश |
| अशोक व दशरथ | मौर्यवंशीय मगध नरेश |
| कनिष्क | कुषाण सम्राट |
| हर्षवर्द्धन | पुष्यभूति वंशी सम्राट |
| सहसी वंश | सिंध नरेश |
| पालवंश का सम्राट | बंगाल, वज़यान सम्प्रदाय को मानने वाले, बौद्ध धर्म के अन्तिम महान संरक्षक । |
बौद्ध धर्म के पतन के कारण
ईसा की बारहवीं सदी तक बौद्ध धर्म भारत से लगभग लुप्त हो चुका था। इसके कई कारण थे जैसे-
- भागवत सम्प्रदाय का उदय एवं ब्राह्मण धर्म में सुधार आंदोलन।
- पालि के स्थान पर संस्कृत का प्रयोग।
- मठों में धन एवं भ्रष्टाचार का बोल-बाला।
- मूर्ति-पूजा, दान आदि कारणों ने नैतिक मानकों में कमी ला दी।
- पांचवीं-छठीं सदी में हूणों एवं 12वीं सदी में तुर्कों के आक्रमण।
➣ बौद्ध धर्म में भी ब्राह्मण धर्म की वे बुराइयाँ घुस गईं जिनके विरुद्ध इसने आरंभ में लड़ाई छेड़ी थी। बौद्ध धर्म की चुनौती का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुधारा।
➣ उन्होंने गोधन की रक्षा पर बल दिया तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ दूसरी और बौद्ध भिक्षु जनजीवन की मुख्य धारा से अलग थलग हो गए। विदेशी प्रभाव के कारण कनिष्क के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति में बौद्ध दो भागों (हीनयान व महायान ) में विभाजित हो गया।
➣ जहाँ हीनयान ने बौद्ध के नियमों का अनुसरण करना उचित समझा वहीँ महायान ने दरिद्रता को त्याग कर भोग-विलास को ग्रहण कर लिया।
➣ महायान ने जनसामान्य की भाषा पालि को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया जो उस समय केवल विद्वानों की भाषा थी।
➣ ईसा की पहली सदी से वे बडी मात्रा में प्रतिमा-पूजन करने लगे और उपासकों से खूब चढ़ावा लेने लगे। इस चढ़ावे के अतिरिक्त बौद्ध विहारों को राजाओं से भी भारी-भारी संपत्ति के दान मिलने लगे।
➣ इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन सुख का जीवन बन गया। सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहार विलासी लोगों के प्रभुत्व में आ गए और कुकर्मों के केंद्र बन गए और बौद्ध धर्म का यह नया रूप वज्रयान नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➣ विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों के प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी। बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे।
➣ विहारों में अपार संपत्ति को देखकर तुर्की हमलावरों की ललचाई नज़र उन पर पड़ी। ये विहार उन लोभी हमलावरों के विशेष लक्ष्य हो गए।
➣ तुर्कों ने विहार में अनेक बौद्ध भिक्षुओं का संहार किया यद्यपि कुछ भिक्षु जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भाग गए।
➣ इस प्रकार बारहवीं सदी तक बौद्ध धर्म अपनी जन्मभूमि से लगभग गायब हो चुका था।
शासकों का योगदान
➣ किसी देश अथवा राज्य में धर्म को बढ़ावा अथवा उसके प्रचार प्रसार के लिए वहां का राजधर्म का विशेष योगदान होता है।
➣ बौद्ध धर्म के संरक्षण में मौर्य वंश , सातवाहन वंश (ब्राह्मण), गुप्त साम्राज्य के उत्तराधिकारीयों का योगदान रहा, हर्षवर्धन ने भी महायान सम्प्रदाय को आश्रय दिया था।
➣ मौर्य शासक चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म और सम्राट अशोक ने बौद्ध को अपनाया जिसके कारण मौर्य काल में बौद्ध धर्म अपने सर्वोच्च शिखर पर रहा। अशोक ने बौद्ध धर्म को प्रचार प्रसार दुसरे देशों तक भी किया था।
➣ किन्तु बाद में मगध पर नए राजवंशो की नींव स्थापित हुई जो की ब्राह्मण थे इन्होने बौद्ध धर्म पर सीधे प्रहार किया।
➣ 184 ई . पू. में पुष्यंमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक ब्रह्द्रथ की हत्या कर दी और मगध पर एक नए वंश , शुंग वंश की नींव डाली जोकि एक ब्राह्मण था ।
➣ कहा जाता है कि ब्राह्मण शासक पुष्यंमित्र शुंग ने बौद्धों को सताया। इतिहासकारों के अनुसार पुष्यंमित्र शुंग एक कट्टर ब्राह्मणवादी था जिसने अशोक द्वारा निर्मित 84 हजार स्तूपों को नष्ट कर दिया।
➣ पुष्यंमित्र के शासन काल में भारत पर यवनों का आक्रमण हुआ। ग्रीक नरेश मिनांडर (मिलिंद) ने आचार्य नागसेन से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपना लिया। यह पहला विदेशी था जिसने बौद्ध धर्म को अपनाया था। ‘
➣ मौर्यत्तर काल में दक्षिण में सातवाहन राजा भी ब्राह्मण थे किन्तु उन्होंने सभी धर्मों को आश्रय दिया,इनके शासनकाल में नागार्जुन कोंडा एंव अमरवाली बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र रहे।
➣ सातवाहन शासकों ने ब्राहम्ण की तुलना में बौद्ध भिक्षुओं को ज्यादा भूमि दान दी थी इसलिए सातवाहन शासक के समय बौद्ध धर्म को संरक्षण मिला। इस समय महायान संप्रदाय उन्नत अवस्था में था।
➣ दूसरी ओर यूनानियो के प्रभाव से बौद्ध धर्म (कनिष्क के शासनकाल में तृतीय बौद्ध संगीति में) दो भागों हीनयान व महायान में विभाजित हो गया। हीनयान बौद्ध नियमों के अनुकूल जबकि महायान बुद्ध के नियमों के विपरीत आचरण करने लगे।
➣ सातवाहन साम्राज्य के पश्चात गुप्त साम्राज्य अस्तित्व में आया जिसने वैष्णव धर्म को संरक्षण दिया था कालांतर में पूर्वर्ती उत्तराधिकारियों ने बौद्ध धर्म अपनाया लिया था। गुप्त शासक नरसिंह बालादित्य बौद्ध अनुयायी था।
➣ बौद्ध एंव जैन धर्म को सताए जाने के कई उदाहरण ईसा की छठी-सातवीं सदियों में मिलते हैं। मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत में शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के लोगों ने जैनों और बौद्धों का कड़ा विरोध किया।
➣ गुप्त साम्राज्य के अंत में भारत पर हूणों का आक्रमण हुआ। शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतारा।
➣ व्हेनसांग ने लिखा है कि 1600 स्तूप और विहार तोड़ डाले गए और हज़ारों भिक्षुओं और उपासकों को मार डाला गया।
➣ आगे चलकर गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोधगया में उस बोधिवृक्ष को काट डाला जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वर्तमान समय में जो बोधिवृक्ष है वह अपनी पीढ़ी का चौथा वृक्ष है। जिसे श्रीलंका से लाया गया था।
➣ उल्लेखनीय है सम्राट अशोक ने जब श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करवाया था तो बोधिवर्क्ष की एक शाखा भी साथ भेजी थी। कालांतर में भारत में इसी शाखा से नए वृक्ष का जन्म हुआ।
➣ इस पर बौद्धों की प्रतिक्रिया कई देवमालाओं में देखी जा सकती हैं जहाँ बोधिसत्वों को हिंदू देवताओं के ऊपर खड़ा दिखाया गया है।
➣ गुप्त साम्राज्य के पश्चात उत्तर-भारत का शासक हर्ष वर्धन (पुष्यभूति वंश ) था जिसने बौद्ध की महायान की शाखा को संरक्षण दिया था जो भोग-विलासी थे।
➣ इसके पश्चात भारत के पश्चिमोत्तर सीमा पर तुर्की एंव अरबी मुस्लिमों का आक्रमण होने लगे और मुस्लिम धर्म भारत में पैर पसारने लगा।
समाज पर बौद्ध धर्म का प्रभाव
➣ बौद्ध धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों के लिए अपना द्वार खोलकर समाज पर गहरा प्रभाव जमाया।
➣ जहाँ ब्राह्मण धर्म ने स्त्रियों और शूद्रों को एक ही दर्जे में रखा था और उनके लिए न यज्ञोपवीत संस्कार का विधान किया और न ही वेदाध्ययन का। वहीँ बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर उन्हें इस अधिकारहीनता से मुक्ति मिल गई।
➣ बौद्ध धर्म ने अहिंसा और जीवमात्र के प्रति दया की भावना जगाकर देश में पशुधन की वृद्धि की।
➣ प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ सुत्तनिपात में गाय को भोजन, रूप और सुख देने वाली (अन्नदा वन्नदा सुखदा) कहा गया है और इस कारण उसकी रक्षा करने का उपदेश दिया गया है।
➣ यह उपदेश उस मौके पर आया जब आर्येतर लोग माँस के लिए और आर्य लोग धर्म के लिए पशुधन का संहार करते जा रहे थे।
➣ ब्राह्मण धर्म में गाय की पूजनीयता और अहिंसा पर ज़ोर पड़ने का कारण स्पष्टत: बौद्ध धर्म के उपदेशों का प्रभाव था।
➣ बौद्ध धर्म के अनुसार धन संचित नहीं करना चाहिये, क्योंकि धन दरिद्रता, घृणा, क्रूरता और हिंसा की जननी है। परिणामतः धन लोलुपता में कमी आई।
➣ सांस्कृतिक क्षेत्र में प्राचीन भारत की कला पर बौद्ध धर्म का प्रभाव परिलक्षित हुआ। उपासकों ने बुद्ध के जीवन की अनेक घटनाओं को पत्थर पर उकेरा। जैसे-साँची, भरहुत, सारनाथ, कौशांबी आदि स्थानों पर।
➣ कई देशी-विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और अपनी नीति में अहिंसा को एक नई नीति के रूप में लागू किया, जैसे-अशोक द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर धम्म नीति का अनुसरण किया करना एंव विदेशी शासक मिनान्दर का बौद्ध धर्म ग्रहण करना।
बौद्ध धर्म का योगदान
➣ भारतीय दर्शन में तर्कशास्त्र की प्रगति बौद्ध धर्म के प्रभाव से हुई।
➣ बौद्ध दर्शन में शून्यवाद तथा विज्ञानवाद की जिन दार्शनिक पद्धतियों का उदय हुआ, उसका प्रभाव शंकराचार्य के दर्शन पर पड़ा। यही कारण है कि शंकराचार्य को कभी-कभी प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा जाता है।
➣ बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन भारतीय कला एवं स्थापत्य के विकास में रही। साँची, भरहुत, अमरावती के स्तूपों तथा अशोक के शिला स्तम्भों, कार्ले की बौद्ध गुफाएँ, अजन्ता, ऐलोरा, बाघ तथा बराबर की गुफाएँ बौद्ध कालीन स्थापत्य कला एवं चित्रकला का श्रेष्ठतम आदर्श है।
➣ बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर भटिट् ( द. भारत) निर्मित प्राचीनतम् स्तूप को महास्तूप की संज्ञा दी गई है।
➣ गान्धार शैली के अन्तर्गत ही सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किया गया। सम्भवतः प्रथम बुद्ध मूर्ति मथुराकला के अन्तर्गत बनी।
भारत से बाहर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार
➣ भारत से बाहर सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार मौर्य सम्राट अशोक ने किया था। जिसमे श्रीलंका का उल्लेख महत्वपूर्ण है।
➣ अशोक के धर्म प्रचार की बदौलत श्रीलंकावासियों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। श्रीलंका में ही त्रिपिटकों को पहली बार लिपिबद्ध किया गया।
➣ श्रीलंका के अलावा बर्मा, मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा (यवद्वीप), स्याम (थाइलैंड), कम्बुज (कम्बोडिया) और अन्नाम में भी बौद्ध धर्म एवं भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ। कम्बोडिया को चीनी भाषा में फूनान कहा जाता था।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में जावा (इंडोनेशिया) का बोरोबुदूर स्थित बौद्ध स्तूप विश्व का सबसे विशाल स्तूप है। इसका निर्माण शैलेन्द्र राजाओं करवाया था। पीगु (बर्मा) में बुद्ध का आनन्द मन्दिर है।
➣ कुषाणों के शासन काल में बौद्ध धर्म का प्रचार मध्य एशिया में हुआ और ताशकंद, खोतान, यारकंद इसके प्रमुख केन्द्र बन गये। गोमती विहार और कूची नगर भारतीय संस्कृति के प्रमुख केन्द्र थे।
➣ भारी संख्या में बौद्ध भिक्षु चीन गये। सबसे पहले कश्यप मतंग और धर्मरत्न 67 ई. के लगभग चीन के हानवंश के शासक मिगं-ती के दरबार में गये। चीनी सम्राट ने इनके रहने के लिए श्वेताश्व विहार का निर्माण करवाया।
➣ कालांतर में धर्मरत्न, कुमारजीव, बोधि धर्म, गुणवर्मा नामक विद्वान 5वीं एवं 6ठी शताब्दी में चीन गये। अमोघवज्र (746-774 ई.) नामक भिक्षु भी चीन गया।
➣ शांतरक्षित, पद्मसम्भव, कमलशील, स्थिरमति नामक विद्वान नालन्दा से तिब्बत गये। 11वीं शताब्दी में दीपंकर श्रीज्ञान, जिन्हें अतिशा भी कहा जाता है, तिब्बत गये।
➣ शांतरक्षित को तिब्बत का महापुरोहित बनाया गया। इसने ही बौद्ध धर्म को तिब्बत का राजधर्म बनाया तथा तिब्बत में प्रथम बौद्ध मठ बनवाया।
➣ आठवीं शताब्दी में भारतीय बौद्ध पद्मसंभव ने चीन में लामा धर्म (वज्रयान) की स्थापना की।
➣ आचार्य वसुबंधु ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चौथी सदी में नेपाल की यात्रा की।
➣ 1989 ई. में कम्बोडिया ने बौद्ध धर्म को अपना राष्ट्रीय धर्म घोषित किया।
भारत के महत्वपूर्ण बौद्ध मठ
| मठ | स्थान | राज्य |
|---|---|---|
| टाबो मठ | तबो गाँव (स्पीति घाटी) | हिमाचल प्रदेश |
| नामग्याल मठ | धर्मशाला | हिमाचल प्रदेश |
| हेमिस मठ | लद्दाख | जम्मू कश्मीर |
| थिकसे मठ | लद्दाख | जम्मू कश्मीर |
| मिड्रालिंग मठ | देहरादून | उत्तराखंड |
| रूमटेक मठ | गंगटोक | सिक्कम |
| शासुर मठ | लाहुल स्पीति | हिमाचल प्रदेश |
| तवांग मठ | अरुणाचल प्रदेश | अरुणाचल प्रदेश |
| नामड्रोलिंग मठ | मैसूर | कर्नाटक |
| बोधिमंडा मठ | बोधगया | बिहार |
निष्कर्ष
➣ गौतम बुद्ध के साथ एक ऐसे धर्म-युग का आरम्भ हुआ जिसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक था। जैसे विज्ञान का समग्र आधार है युक्ति, तर्क और प्रमाण इसी प्रकार भगवान बुद्ध ने भी एक ऐसे धर्म की नींव रखी जिसको मात्र अंध विश्वास से मान लेने की आवश्यकता नहीं थी
➣ बुद्ध के धर्म को वैज्ञानिक इसलिए भी कहा जा सकता है क्यूँकि यह किसी भी काल में और किसी भी क्षेत्र के लोगों को मान्य हो सकता है।
➣ जैसे विज्ञान के सिद्धांत को किसी भी काल-क्षेत्र की मर्यादा में नहीं बांधा जा सकता उसी प्रकार भगवान बुद्ध द्वारा प्रारूपित चार आर्य सत्य को किसी जाति, काल, क्षेत्र आदि की मर्यादित सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता।
संविधान का भाग -05 संघ कार्यपालिका से सम्बंधित है इसकी शुरुआत गौतम बुद्ध के चित्र से हुई है।
सम्बंधित अन्य तथ्य
➣ राहुल को सारिपुत्र ने दीक्षित किया था जो स्वंय बुद्ध के शिष्यों में ऐसे एक थे।
➣ हीनयान, महायान एवं वज्रयान बौद्ध के सम्प्रदाय हैं। हीनयान का अर्थ है-निकृष्ट या निम्न मार्ग।
➣ बिम्बिसार, उदयन एवं प्रसेनजीत बुद्ध के प्रमुख अनुयायी थे।
➣ बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को बुद्ध की सेवा में भेजा था।
राजा प्रसेनजीत को स्वस्थ करने के उपहार स्वरुप जीवक को अति उत्तम कपडे से बना वस्त्र भेजा गया। तब जीवक ने कहा यह परिधान या तो राजा बिंबसार पहन सकते हैं या बुद्ध। जिसे उन्होंने बुद्ध को उपहार दिया।
➣ महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम उरुवेला में तपस्या की थी।
➣ बौद्ध धर्म की पवित्र दिशा दक्षिण है।
➣ बौद्ध धर्म का प्रचार पालि भाषा में किया गया।
➣ कुषाण काल में बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों हीनयान एवं महायान में विभाजित हो गया।
➣ महायान संप्रदाय के ग्रन्थ संस्कृत तथा हीनयान के ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे गए थे ।
➣ बौद्ध ग्रंथों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से प्रारम्भ होता है। यह महायान संप्रदाय का ग्रन्थ है ।
➣ बुद्ध को तथागत एवं शाक्यमुनि नामों से भी जाना जाता है।
➣ बुद्ध वर्षाकाल में वेलुवन तथा जेतवन में निवास करते थे।
➣ बौद्ध भिक्षुओं के निवास स्थान को विहार कहा जाता है।
➣ बुद्ध की मृत्यु को बौद्ध ग्रन्थों में महापरिनिर्वाण के नाम से जाना जाता है।
➣ गौतम बुद्ध ने प्रथम उपदेश सारनाथ में बोलचाल की भाषा पालि में दिये जिसे बौद्ध धर्म में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा गया है
➣ गौतम बुद्ध ने वैशाली, मगध, अंग, काशी, मल्ल, वज्जि में धर्म का प्रचार-प्रसार किया ।
➣ बुद्ध का शिष्य उसका चचेरा भाई देवदत्त उनका विरोधी था देवदत बुद्ध के जीवनकाल में ही संघ का प्रमुख होना चाहता था ।
➣ महात्मा बुद्ध का प्रियतम शिष्य आनंद था जिसके कहने पर बुद्ध ने संघ में स्त्रियों का प्रवेश कराया ।
➣ बौद्ध संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला बुद्ध की सौतेली माता गौतमी प्रजापति थी।
➣ महात्मा बुद्ध ने अंतिम उपदेश सुभध नामक व्यक्ति को दिये ।
➣ सूतपिटक को प्रारंभिक बौद्ध धर्म का इनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।
➣ बुद्ध के ‘पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।
➣ वर्तमान में बोधगया में बोधि वृक्ष अपने वंश की चतुर्थ पीढ़ी का है । इसकी एक शाखा श्रीलंका में भी है जो अशोक के काल में ले जाया गया ।
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