महत्वपूर्ण तथ्य, बौद्ध संगीति और परीक्षा उपयोगी नोट्स

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत गौतम बुद्ध महत्वपूर्ण तथ्य, बौद्ध संगीति और परीक्षा उपयोगी नोट्स
📚 विषय सूची

बौर्द्ध धर्म से सम्बंधित स्थल

➣ बुद्ध के जीवन से जुड़े हुए आठ स्थानों को बौद्ध ग्रन्थों में अष्टमहास्थान कहा गया है। ये हैं –

  1. लुम्बिनी
  2. बोधगया
  3. सारनाथ
  4. कुशीनगर
  5. श्रावस्ती
  6. संकास्य
  7. राजगृह
  8. वैशाली
gautam-bauddh

लुम्बिनी

➣ यह स्थल गोरखपुर जिले के नौगढ़ रेलवे स्टेशन से 35 किमी. दूरी पर स्थित है।

महारानी महामाया ने शाल वृक्षों के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम) को जन्म दिया था।

➣ अशोक का रूम्मिनदेई अभिलेख यहाँ से प्राप्त हुआ इसमें भी लुम्बिनी नाम का उल्लेख मिलता है।

कपिलवस्तु

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले में स्थित पिपरहवा नामक स्थल से कपिलवस्तु की पहचान की गई।

➣ कपिल का शाब्दिक अर्थ कपिल का स्थल है। कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी थी, जहाँ के शासक गौतम के पिता शुद्धोधन थे। यह नगर कपिलमुनि कुटी के स्थल पर बसा हुआ था। राप्ती की सहायक रोहणी नदी के तट पर अवस्थित था।

धर्मचक्र परिवर्तन के उपरान्त गौतम बुद्ध ने यहाँ की यात्रा की थी तथा अपने, पिता, माता, पुत्र व भाई देवदत्त को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

श्रावस्ती

➣ यह कोसल महाजनपद की राजधानी थी। यह उत्तर प्रदेश में गोरखपुर से 195 किमी. दूरी पर अवस्थित है। वर्तमान में यह गोंडा जिले के सहेत-महेत गाँव के नाम से जाना जाता है।

➣ बुद्ध व उनके अनुयायी वर्षाकाल में श्रावस्ती में ही व्यतीत करते थे। उन्होंने अपने जीवन के 25 वर्षाकाल यहीं पर व्यतीत किये थे। प्रसिद्ध जेतवन विहार श्रावस्ती में ही था, जो समस्त बौद्ध धर्म के अनुयायियों को आकर्षित करता था।

➣ भगवान बुद्ध ने यहाँ पर त्रिपिटकों की व्याख्या की और अपने 6 विरोधियों को बौद्ध धर्म की दीक्षा भी दी थी।

➣ जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर स्वयंभूनाथ का जन्म श्रावस्ती में ही हुआ था।

सारनाथ

काशी महाजनपद का प्रमुख बौद्ध स्थल है जिसका अर्थ आध्यात्मिक प्रकाश की नगरी है।

➣ यह वाराणसी से 10 किमी. की दूरी पर अवस्थित है।

➣ गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम धर्मोपदेश 5 ब्राह्मण शिष्यों को दिया था जो धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।

➣ मौर्य शासक अशोक ने यहाँ पर प्रस्तर स्तम्भ का निर्माण कराया। स्तम्भ के शीर्ष पर स्थापित चतुर्मुखी सिंह था।

15 अगस्त, 1947 को देश के स्वतन्त्र होने पर स्तम्भशीर्ष को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया।

बोधगया

➣ मगध साम्राज्य के अन्तर्गत वर्तमान बिहार में फाल्गु नदी के तट पर स्थित एक बौद्ध स्थल है।

➣ गौतम बुद्ध ने (शाक्यमुनि) बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त (निर्वाण) किया था।

➣ यहाँ का महाबोधि मन्दिर भगवान बुद्ध की विभिन्न अवस्थाओं में ज्ञान प्राप्ति की प्रतिमाएँ प्राप्त होती हैं।

➣ मौर्य शासक अशोक ने यहाँ पर बौद्धस्तूप का निर्माण करवाया है।

कुशीनगर

➣ इसकी पहचान आधुनिक कसिया/कसया के नाम से की गई है जो वर्तमान उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला में है।

➣ यह गौतम बौद्ध के जीवन का स्थल है यहाँ बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।

बोधिवृक्ष : गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति का वृक्ष

➣ बोधिवृक्ष, पीपल का वह वृक्ष था जिसके नीच बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। यह वृक्ष बोधगया में स्थित था। वर्तमान बोधिवृक्ष अपनी पीढ़ी का चौथा वृक्ष है तथा लगभग 136 साल पुराना है।

➣ मौर्य काल में सम्राट अशोक ने अपने शासन काल में इसकी टहनियों को अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को देकर श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए भेजा था।

➣ ऐसा कहा जाता है कि सम्राट अशोक की अनुपस्थिति में एक वैश्य रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे वृक्ष समय कटवा दिया था।

➣ लेकिन कुछ ही वर्षो के बाद उस कटे हुऐ बोधिवृक्ष की जड़ से एक नया वृक्ष उग आया। यह दूसरी पीढ़ी का वृक्ष था और यह लगभग 800 सालों तक मौजूद रहा।

➣ इस दूसरे वृक्ष को बंगाल के गौड़ वंश के नरेश शशांक जोकि शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था और कट्टर बौद्ध विरोधी था, ने जड़ सहित उखड़वाने का प्रयास किया लेकिन जब वह इसमें असफल रहा तो उसने बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में आग लगवाकर नष्ट कर दिया।

➣ लेकिन इसकी जड़े पूर्ण रूप से नष्ट नहीं हो पायी और कालांतर में कुछ ही सालों के बाद उन्हीं जड़ों से तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष निकला। और यह लगभग 1250 सालों तक जीवित रहा।

➣ सन् 1876 में यह वृक्ष एक प्राकृतिक आपदा का शिकार होकर नष्ट हो गया। तब लार्ड कानिंघम ने सन् 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरम से बोधिवृक्ष की शाखा को मांगवाकर इसे बोधगया में पुनः स्थापित कराया जो इस पीढ़ी का चौथा बोधिवृक्ष हुआ।

➣ उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को बोधिवृक्ष की जिन टहनियों को देकर श्रीलंका में बौद्ध धम्म का प्रचार करने भेजा था। वह आज भी श्रीलंका के अनुराधापुरम में स्थित है तथा विश्व के लिखित इतिहास की दृष्टि से यह अब तक का ज्ञात सबसे प्राचीन वृक्ष (लगभग 2250 वर्ष पुराना) है।

बौद्ध धर्म के प्रमुख आचार्य या विद्वान

अश्वघोष

➣ ये कनिष्क के समकालीन एक प्रतिभा सम्पन्न कवि, नाटककार, संगीतकार, विद्वान एवं तर्कशास्त्री थे।

➣ संस्कृत में बौद्ध महाकाव्यों की रचना का सूत्रपात सर्वप्रथम महाकवि अश्वघोष ने ही किया था।

➣ उन्होंने भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र का वर्णन करने वाले प्रथम ग्रंथ बुद्धचरित नामक महाकाव्य की रचना की थी।

नागार्जुन

➣ ये आन्ध्र के सातवाहन राजा यज्ञ श्री गौतमी पुत्र (166-196 ई.) के मित्र एवं समकालीन थे।

➣ इन्होंने बौद्ध दर्शन के माध्यमिक विचार धारा का प्रतिपादन किया जिसे सामान्यतया: शून्यवाद के नाम से जाना जाता है।

➣ इन्होने पारा की खोज की थी। इन्हे भारत का आइन्सटीन भी कहा जाता है।

असंग व वसुबंधु

➣ ये दोनों भाई थे और प्रथम शताब्दी ई. के पंजाब के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु थे। असंग अपने गुरू मैत्रेयनाथ द्वारा स्थापित योगाचार या विज्ञानवाद सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण आचार्य थे।

➣ वसुबन्धु ने वैभाषिक सिद्धांतों का सम्यक प्रतिपादन करने के लिए अभिधर्मकोश नामक ग्रन्थ की रचना की थी, इस ग्रन्थ को बौद्ध धर्म का विश्वकोश माना जाता है।

नागसेन

➣ नागसेन एक प्रसिद्ध तथा प्रमुख बौद्ध भिक्षुक था, जिसने यवन सम्राट मिलिन्द (मिनांडर) से वाद-विवाद किया था। इस वाद-विवाद के फलस्वरूप ही मिलिन्द नागसेन से प्रभावित हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।

नागसेन और मिलिन्द के मध्य हुए वाद-विवाद का उल्लेख मिलिन्द प्रश्न (मिलिन्दपन्ह) नामक काव्य में मिलता है।

➣ उल्लेखनीय है मिनांडर पहला यवन शासक था जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।

बुद्धघोष

➣ 5वीं शताब्दी ई. के पाली भाषा के महान विद्वान थे। आचार्य बुद्धघोष का जीवन चरित्र गंधवंश, बुद्धघोसुपत्ति सद्धम्मसंग्रह आदि में मिलता है।

➣ इनकी लिखित पुस्तक विशुद्धिमार्ग (विसुद्धिमग्ग) हीनयान सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इस ग्रन्थ को बौद्ध धर्म का लघु विश्वकोश माना जाता है।

➣ उन्होंने त्रिपिटक की अट्ठकथा लिखना भी आरंभ किया। बुद्धघोष ने पालि में सर्वप्रथम अट्ठकथाओं की रचना की।

➣ बौद्ध धर्म में बुद्धघोष को भावी बुद्ध मैत्रेय का अवतार माना गया है।

दिग्डनाग

➣ 5वीं शताब्दी के यह बौद्ध धर्म के तर्क शास्त्र के प्रवर्तक के रूप में सुविख्यात हैं। उन्होंने तर्कशास्त्र पर लगभग 100 ग्रंथ लिखे उन्हें प्रायः मध्यकालीन न्याय के जनक के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है।

➣ धर्मकीर्ति द्वारा प्रणीत प्रमाणवार्तिक, प्रमाणविनिश्चय, न्यायबिन्दु, हेतुबिन्दु, सम्बन्धपरीक्षा, सन्तानन्तरसिद्धि और वादन्याय सातों प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रमाणसमुच्चय की टीका के रूप में उपनिबद्ध हैं।

➣ दिङ्नाग के बाद आचार्य धर्मकीर्ति ने दिङ्नाग के ग्रन्थों में छिपे हुए गूढ़ तथ्यों का प्रकाशन करते हुए सात ग्रन्थों (सप्त प्रमाणशास्त्र) की रचना की।

धर्मकीर्ति

➣ धर्मकीर्ति धर्मपाल और ईश्वरसेन के शिष्य थे। ये महायान संप्रदाय के योगाचार शाखा के दार्शनिक थे। इनको भारत का काण्ट कहा जाता है।

➣ वे 17वीं शताब्दी के महान बौद्ध न्यायिक रहे, उन्हें सूक्ष्म दार्शनिक, चिंतक तथा भाषा वैज्ञानिक थे उनकी रचनाएं परवर्ती बौद्ध धर्म के ज्ञान मीमांसात्मक चिंतन में शीर्षस्थ मानी जाती है।

➣ आचार्य धर्मकीर्ति के प्रमाणशास्त्र विषयक सात ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। ये हैं – प्रमाणवार्तिक, प्रमाणविनिश्चय,न्यायबिन्दु, हेतुबिन्दु, वादन्याय, सम्बन्धपरीक्षा,सन्तानान्तरसिद्धि।

कश्यप मतंग

➣ इनका जन्म मगध में हुआ था। ये चीन जाने वाले प्रथम बौद्ध भिक्षु थे।

कश्यप मतंग ने ही सर्वप्रथम चीन को बौद्ध धर्म से परिचय करवाया था।

मोगलिपुत तिस्स

➣ ये मौर्य सम्राट अशोक के समकालीन बौद्ध भिक्षु थे। इन्होने तृतीय बौद्ध महासंगीति की अध्यक्षता किया था।

वसुमित्र

➣ ये कनिष्क के दरबारी विद्वान थे। इन्होने कनिष्क के द्वारा कश्मीर के कुण्डलवन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता की थी।

➣ इन्होने संस्कृत भाषा में महाविभाष शास्त्र (त्रिपिटक पर टीका) की रचना की जिसे बौद्ध धर्म का महाकोश/विश्वकोश माना जाता है।

भारत के महत्वपूर्ण बौद्ध मठ

➣ यद्दपि बौद्ध धर्म जन्म भारत में हुआ किन्तु भारत में इसका उतना प्रभाव नहीं दिखता जितना की अन्य देशों में। किन्तु भारत में बौद्ध स्थापत्य का परवर्ती स्वरूप मठो के रूप में दिखाई पड़ता है। भारत के विभिन्न भागो में बौद्ध मठ स्थापित किए गए है। देश में सबसे ज्यादा मठ सिक्किम में है।

मठस्थानराज्य
टाबो मठतबो गाँव (स्पीति घाटी, हिमाचल प्रदेश)स्पीति नदी के तट पर स्थित इस मठ को 996 ई. में स्थापित किया गया था। इस मठ की दीवारो पर 10 वी सदी के भित्ति चित्र बने है, जिस कारण इसे हिमाचल की अजन्ता कहा जाता है।
नामग्याल मठधर्मशाला, हिमाचल प्रदेशयह मठ तिब्बती बौद्धो के सर्वोच्च धर्मगुरू दलाई लामा का आधिकारिक निवास है।
हेमिस मठलद्दाख, जम्मू कश्मीरद्रुकपा समुदाय का यह मठ 1630 ई. में निर्मित हुआ था। यहां पर प्रतिवर्ष जून में हेमिस महोत्सव (पद्मसम्भव का जन्म महोत्सव) मनाया जाता है जिसमें लामा छामनृत्य करते है।
थिकसे मठलद्दाख, जम्मू कश्मीरलेह में स्थित इस 12 मंजिले मठ मे प्रतिवर्ष थिकसे महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
रूमटेक मठगंगटोक, सिक्कमराज्य का सबसे बड़ा मठ है। इसे धर्म चक्र केन्द्र भी कहते है।
तवांग मठअरुणाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेशअरूणाचल प्रदेश के तबांग जिले में बोमडीला दर्रे के समीप यह मठ भारत का सबसे बड़ा तथा एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मठ है।
बोधिमंडा मठबोधगया, बिहारबुद्ध का ज्ञान प्राप्ति स्थल, महाबोधि मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
माथे मठलेह, जम्मू-कश्मीरसिन्धु नदी के तट पर स्थित यह मठ थंगका चित्रकारी तथा माथो नागरंग महोत्सव के लिए प्रसिद्ध है।
घूम मठदार्जिलिंग, पश्चिम बंगालगेलुकपा या पीला हैट संप्रदाय से संबंधित है। यह मैत्रेय बुद्ध की उच्च प्रतिमा (15 मीटर) के लिए प्रसिद्द है।

बौद्ध संघ : बौद्ध भिक्षुओं का संगठन

➣ बौद्ध संघ का संगठन गणतांत्रिक प्रणाली पर आधारित था। संघ में प्रवेश पाने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग व कम से कम 15 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था।

माता-पिता की आज्ञा के बिना कोई भी व्यक्ति इसमें प्रवेश नहीं पा सकता था। चोर, हत्यारों,अस्वस्थ, शारीरिक विकलांग, ऋणी, सैनिक और दासों का संघ में प्रवेश वर्जित था।

➣ वैशाली में भिक्षुणी संघ की स्थापना की गई तथा बुद्ध ने पहली बार प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं को संघ में शामिल होने की अनुमति वैशाली में दी।

➣ परन्तु साथ ही यह भी कहा कि महिलाओं के प्रवेश से बौद्ध धर्म एवं संघ का 500 वर्षों में ही पतन हो जायेगा।

➣ भिक्षुओं के वस्त्र चीवर एवं भिक्षुणियों के वस्त्र उद्दूकसाटि कहलाते थे। बुद्ध राजा बिम्बसार के राजवैद्य जीवक के अनुरोध पर ये वस्त्र लागू किये थे। जीवक को बौद्ध संघ का आभूषण कहा जाता है।

➣ संघ की सभा में प्रस्ताव को नत्ति या वृत्ति कहा जाता था, जबकि प्रस्ताव पाठ को अनुसावन कहते थें। बहुमत से पारित प्रस्ताव भूकस्किम कहा जाता था। किसी भी प्रस्ताव पर मतभेद को अधिकरण कहा जाता था।

➣ मतभेद पर मत विभाजन (मतदान) होता था। मतदान गुल्हक (गुप्त) तथा विवतक (प्रत्यक्ष) दोनों से होता था।

➣ सभा में बैठने की व्यवस्था करने वाला अधिकारी आसन प्रज्ञापक कहलाता था। इसकी बैठक के लिए न्यूनतम उपस्थिति (कोरम) 20 थी।

➣ प्रत्येक 15वें दिन पूर्णिमा या अमावस्या को सांयम उपोसथ नामक सभा होती थी, जिसमें पातिमोक्ख का पाठ किया जाता था। (पातिमोक्ख विनयपिटक की मठ संबंधी सूची है, जिसमें 226 प्रकार के अपराधों और उनके प्रायश्चित करने की सूची दी गई है।)

➣ इस सभा में प्रत्येक सदस्य इसके माध्यम से स्वयं नियमों के उल्लंघन को स्वीकार करता था। गंभीर अपराध पर वयस्कों एवं वृद्धों की समिति विचार करती थी और सदस्यों को प्रायश्चित करने या संघ से निकालने की आज्ञा देती थी।

➣ वर्षा ऋतु के दौरान मठों में प्रवास के समय भिक्षुओं द्वारा अपराध स्वीकारोक्ति समारोह पवरन कहलाता था।

➣ बौद्धों के लिये महीने के चार दिन-अमावस्या, पूर्णिमा और दो चतुर्थी दिवस उपवास के दिन होते थे।

➣ जब किसी विशेष अवसर पर सभी भिक्षु-भिक्षुणियां धर्मवार्ता के लिए एकत्रित होकर धर्मवार्ता करते थे तो उसे उपोसथ कहते थे।

➣ संघ में प्रविष्ट होने को उपसम्पदा कहा जाता था। गृहस्थ जीवन का त्याग प्रवज्या कहलाता था। प्रवज्या ग्रहण करने वाले को श्रामणेर कहते थे।

श्रामणेर किसी आचार्य से शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उपसम्पदा या भिक्षुपद का अधिकारी बन जाता था। इसके लिए उसे 20 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था।

➣ श्रामणेरों को 10 शिक्षाओं का पालन करना पड़ता था, जिसे शिक्षापद कहा जाता था।

➣ बौद्ध धर्म के अनुयायी दो वर्गों (1. भिक्षु/भिक्षुणी, 2. उपासक उपासिकाएं) में बंटे हुए थे। गृहस्थ जीवन में रहकर ही बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को उपासक कहा जाता था।

➣ बौद्ध संघ का प्रमुख विनयधर कहलाता था। बुद्ध समय-समय पर जो उपदेश देते थे, उसे उनके निरन्तर साथ रहने वाले शिष्य श्रवण करते थे और स्मरण करने का प्रयत्न करते थे। यही लोग कालान्तर में विनयधर कहलाने लगे थे।

➣ बौद्ध संघ का सबसे बड़ा दण्ड ब्रह्मदण्ड था। बुद्ध ने अपने सारथी छन्दक को ब्रह्मदण्ड दिया था।

➣ बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने बुद्ध को मारने का असफल प्रयास किया था। उसने बुद्ध को हटाकर बौद्ध संघ का प्रधान बनने की चेष्टा की थी।

➣ बुद्ध ने अपनी मृत्यु के समय संघ का प्रमुख किसी को भी नामित नहीं किया था।

➣ बौद्ध दैनिक प्रार्थनाओं में बुद्धशरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि का उच्चारण करते हैं।

स्तूप : बौद्ध स्थापत्य कला और महत्व

➣ स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व की है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है। चूंकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता था, अत: इसका एक नाम चैत्य भी हो गया।

➣ चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए, जिन्हें विहार कहा गया।

➣ मौलिक रूप में स्तूप का सम्बन्ध मृतक संस्कार से था। शव-दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढक देने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ।

➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को 8 भागों में बाँटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। सामान्यतः इन्हीं को स्तूप कहा जाता है।

➣ स्तूप का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहाँ अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया है बुद्ध के पहले ही स्तूप का सम्बन्ध महापुरुष के साथ जुड़ गया था।

➣ इसके अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयी संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है।

➣ कालान्तर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ-पद्धति में अपना लिया। इन स्तूपों में बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों धातु रखी जाती थी जो बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केन्द्र बन गये।

➣ स्तूप के 4 भेद हैं-1. शारीरिक स्तूप, 2. पारिभौगिक स्तूप, 3. उद्देशिका स्तूप तथा 4. पूजार्थक स्तूप।

➣ इनमें बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों की अस्थियों तथा उनके शरीर के विविध अंग (दंत, नख, केश ) रखे जाते थे।

पारिभौगिक

➣ इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लाई गयी वस्तुयें (भिक्षा पात्र, चरण-पादुका, आसन) रखी जाती थी।

उद्देशिका

➣ इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था।

➣ ऐसे स्थल बोधगया, लुम्बिनी, सारनाथ, कुशीनगर में है।

संकल्पित

➣ ये छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया जाता था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।

स्तूप के महत्त्वपूर्ण हिस्से

वेदिका (रेलिंग) – इसका निर्माण स्तूप की सुरक्षा के लिये होता था।

मेधि (कुर्सी)- वह चबूतरा था, जिसपर स्तूप का मुख्य हिस्सा आधारित होता था।

अंड- स्तूप का अर्द्धगोलाकार हिस्सा होता था।

हमिंका- स्तूप के शिखर पर अस्थि की रक्षा के लिये।

छत्र- धार्मिक चिह्न का प्रतीक।

सोपान- मेधि पर चढ़ने-उतरने हेतु सीढ़ी।

चैत्य- चैत्य का शाब्दिक अर्थ होता है-चिता संबंधी। एक चैत्य, बौद्ध मंदिर है जिसमें एक स्तूप समाहित होता है। पूजार्थक स्तूप को चैत्य कहा जाता है।

विहार : बौद्ध मठ और शिक्षा केंद्र

➣ बौद्ध चैत्यों के पास भिक्षुओं के रहने के लिये आवास बनाया जाता था, जिसे विहार कहा जाता था। चैत्यों के उपासना स्थल में परिवर्तित हो जाने के कारण उसके समीप ही विहार का निर्माण होने लगा।

प्रमुख विहार

➣ बिम्बिसार ने राजगृह में वेलुवन नामक विहार बनवाया। वेलुवन बौद्ध संघ को प्राप्त प्रथम विहार था ।

अनाथपिण्डक ने श्रावस्ती में बुद्ध के लिए जेतवन विहार बनवाया। अनाथपिण्डक ने 18 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं में जेतवन विहार को जेत राजकुमार से खरीदा था। इस दान का अंकन भरहुत स्तूप पर है।

➣ कोशल नरेश प्रसेनजीत ने भी बौद्ध संघ के लिए श्रावस्ती में पुब्बाराम (पूर्वाराम) नाम विहार बनवाया। इसके लिए अंग में श्रेष्ठि की पुत्री विशाखा ने धन दिया था।

➣ प्राचीन रत्नगिरि महाविहार राजगृह के पास स्थित था, जो गृद्धकूट के नाम से प्रसिद्ध था। रत्नगिरि विहार बुद्ध का प्रिय निवास स्थान था।

➣ बुद्ध के पांचवें वर्षाकाल में लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कुटाग्रशाला का निर्माण करवाया।

➣ वैशाली की प्रसिद्ध नगर-वधू आम्रपाली ने भिक्षु-संघ के निवास के लिए अपनी आम्रवाटिका प्रदान की थी।

त्रिपिटक : बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ

➣ महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपरांत आयोजित विभिन्न बौद्ध या संकलित किये गए त्रिपिटक सुभवत: सर्वाधिक प्राचीन धर्म त्रिषिटक सुत्तपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक के नाम में जान जाते है।

➣ त्रिपिटकों पर महाभाष्य के रूप में अट्ठकथा नामक पुस्तक लिखी गयी।

➣ सुत’ का शाब्दिक अर्थ है-धर्मोपदेश

➣ सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का उल्लेख है। इसे प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का एनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।

➣ यह पिटक पाँच निकायों में विभाजित है-

❑ 1. दीर्घ निकायः इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन के आखिरी समय, अंतिम उपदेशों, मृत्यु तथा अंत्येष्टि का वर्णन किया गया है।

❑ 2. मज्झिम निकायः इसमें महात्मा बुद्ध को कहीं साधारण मनुष्य कहीं अलौकिक शक्ति वाले देव के रूप में वर्णित किया गया है।

❑ 3. संयुक्त निकायः गद्य एवं पद्य दोनों शैलियों के प्रयोग वाला यह निकाय अनेक संयुक्तों का संकलन मात्र है। इसमें मन्झिम प्रतिपदा एवं आष्टांगिक मार्ग का उल्लेख मिलता है।

❑ 4. अंगुत्तर निकाय: इसमें महात्मा बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को उपदेश में कही जाने वाली बातों का वर्णन है। इसमें छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।

❑ 5. खुद्दक निकाय: भाषा व विषय-शैली की दृष्टि से सभी निकायों से अलग, लघु ग्रंथों के संकलन वाला यह निकाय अपने आप में स्वतंत्र एवं पूर्ण है।

➣ सुत्तपिटक की रचना आनंद ने की थी।

विनयपिटक : बौद्ध संघ के नियम और अनुशासन

➣ इसमें बौद्ध मठों में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के अनुशासन संबंधी नियम दिये गए हैं।

➣ बौद्ध संघ की कार्यप्रणाली की व्यवस्था भी इसी ग्रंथ में उल्लिखित है। यह सुत्तविभंग, खदक तथा परिवार में विभक्त है।

➣ इसकी रचना उपालि ने की थी।

अभिधम्मपिटक : बौद्ध दर्शन और सिद्धांत

➣ इसम महात्मा बुद्ध के उपदेशा एवं सिद्धांत तथा बोद्ध मत की दार्शनिक व्याख्या की गई है।

➣ एक मान्यता के अनुसार इस पिटक का संकलन अशोक के समय में संपन्न तृतीय बौद्ध संगीति में मांगलिपुत्ततिस्स ने किया।

बोधिसत्व : महायान बौद्ध धर्म में महत्व

➣ महायान का आदर्श बोधिसत्व है। बोधिसत्व करुणामय माने गए हैं, जो समस्त प्राणियों को प्रबोध के मार्ग पर चलने में सहायता करने के लिये स्वयं की निर्वाण प्राप्ति विलंबित करते हैं। ये मानव अथवा पशु किसी रूप में भी हो सकते हैं।

➣ महायान का आदर्श बोधिसत्व अवलोकितेश्वर था जिसे पद्मपाणि, अमिताभ, मंजूनाथ, मैत्रेय (भावी) आदि नामों से भी जाना जाता है।

हीनयान एंव महायान संप्रदाय

हीनयानमहायान
इसे श्रावकयान प्रत्येक बुद्धयान कहा जाता है।इसे बुद्धयान बोधिसत्वयान एकयान एव श्रेष्ठयान से सम्बोधित किया जाता है।
हीनयान का शाब्दिक अर्थ हीनयान है।इसका शाब्दिक अर्थ उत्कृष्ठ मार्ग है।
यह व्यक्तिवादी धर्म है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नो से मोक्ष प्राप्त करनी चाहिए।यह समस्तीवादी धर्म है जिसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण करना है।
हीनयानी महात्मा बुद्ध के अप्प दीपों भव को अपना मूलमंत्र मानते है। ये महात्मा बुद्ध को महापुरूष मानता है देवता नही।महायान में बुद्ध को देवता का दर्जा प्राप्त है। महायान में आत्मा एंव पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया है जबकि महात्मा बुद्ध अनात्मवादी थे।
हीनयान त्रिकाय की संकल्पना में विश्वास नही रखते थे।महायान त्रिकाय धर्मकाय निर्माणकाय एंव संभोगकाय की संकल्पना के समर्थक थे।
हीनयान में वृद्ध की मूर्तिपूजा नही अपितु बोधिवृक्ष धर्मचक्र स्तूप प्रतीको की पूजा विधान था।महायानी मूर्तिपूजक थे और इसमें तीर्थों को महत्व दिया जाता था।
हीनयान का आदर्श अर्हत पूज्य पद प्राप्त करना है। जो व्यक्ति अपनी साधना से निर्वाण प्राप्तकर्ता अर्हत कहलाते है जैसे यवन शासक मिनाण्डर।महायान का अर्थ बोधिसत्व प्राप्त करना है।
हीनयान का प्रमुख सम्प्रदाय वैभाषिक व सौत्रान्तिक है।महायान का प्रमुख सम्प्रदाय पूर्व शैल भदयानीय शून्यवाद विज्ञानवाद है।
हीनयान में केवल पुद्गल शून्यता का उल्लेख है।महायान में पुद्गल शून्यता एवं धर्म शून्यता दोनो का उल्लेख है।
हीनयान के ग्रन्थ सामान्यतः पालि भाषा में है।महायान के ग्रंथ समान्यत: संस्कृत भाषा में है।
हीनयान का प्रमुख साहित्य कथावस्तु विशुद्धि मग्ग, अवदान शतक है।महायान का अष्टसा हस्त्रिका प्रज्ञापारमिता प्राचीनतम ग्रन्थ है।
हीनयान के प्रमुख दार्शनिक वसुबन्धु, कुमारलात, इत्सिंग है।महायान के प्रमुख दार्शनिक नागार्जुन, असंग, ह्वेनसांग, मैत्रेय, वसुबन्धु है।

बौद्ध के शिष्यायें व शिष्य

बुद्ध के शिष्यायें (स्त्री शिष्या)

शिष्यायेंविवरण
महाप्रजापति गौतमी बुद्ध की मौसी व विमाता, बुद्ध की प्रथम शिष्या।
यशोधराबुद्ध की पत्नी
नन्दामहाप्रजापति की पुत्री व नन्द की बहन आम्रपाली वैशाली की नगरवधू, आम्रपाली वन का निर्माण।
विशाखाअंग जनपद के भछियग्राम के श्रेष्ठी की पुत्री, श्रावस्ती में पूर्वाराम बिहार का निर्माण और बुद्ध को प्रदान।
क्षेमाबिम्बिसार की पत्नी
मल्लिकाकोशल नरेश प्रसेनजित की पत्नी
सामावतीकौशाम्बी नरेश वत्सराज उदायिन की पत्नी

बुद्ध के शिष्य

शिष्यविवरण
तपस्सु व मल्लिक प्रथम अनुयायी
पंचवर्गीय ब्राह्मणकौण्डिन्य, बप्पा, भादिया, महानामा व असतागी
यशबनारस का धनाढ्य श्रेष्ठी
सारिपुत्रराजगृह का ब्राह्मण सारिपुत्र पहले संजय का अनुयायी था बाद में अपने गुरु के साथ बुद्ध से दीक्षित हुआ।
मौद्गललायनराजगृह का ब्राह्मण मौद्गललायन पहले संजय का अनुयायी बाद में बुद्ध से दीक्षित।
राहुलगौतम बुद्ध का पुत्र
नन्दगौतम बुद्ध का सौतेला भाई
उपालिशाक्य राज्य निवासी व नापित पुत्र
आनंदबुद्ध का निजी शरीर परिचारक व बुद्ध का परमप्रिय शिष्य
जीवकराजगृह की गणिका सालवती का पुत्र व प्रसिद्ध वैद्य,
सुनीतिभंगी जाति
मातंगचांडाल
मेण्डकगहीति
अंगुलिमालशावस्ती का क्रूर डाकू जो बुद्ध से सम्पर्क में जाकर बौद्ध भिक्षु बन गया।
अनुरूद्धधनाढ्य व्यापारी का पुत्र
अनाथपिण्डक सुदत्तश्रावस्ती का प्रसिद्ध श्रेष्ठी, जेतवन खरीद कर बुद्ध को प्रदान।
बिम्बिसारमगध का शासक बिम्बिसार द्वारा बुद्ध को वेणुवन प्रदान
अजातशत्रुमगध नरेश बिम्बिसार का पुत्र,
प्रसेनजितकोशल नरेश ( बुद्ध की माता का प्रदेश)
महाकस्सपमगध का ब्राह्मण, प्रथम बौद्ध महासंगीति के अध्यक्ष।
सुभछकुशीनारा निवासी, बुद्ध का अन्तिम शिष्य व अन्तिम उपदेश प्राप्तकर्ता।

➣ जीवक मगध नरेश का राज वैद्य था। जिसे बिम्बिसार ने बौद्ध की सेवा में भेजा था।

➣ बुद्ध के अधिकांश उपदेश आनंद को सम्बोधित थे। इसका सबसे बड़ा योगदान स्त्रियों को संघ की सदस्यता दिलवाना था।

अजातशत्रु आरम्भ में आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि गोशाल के सम्पर्क में तत्पश्चात् जैन महावीर के सम्पर्क में और अन्ततः गौतम बुद्ध के सम्पर्क में आकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुआ।

प्रमुख बौद्ध विश्वविद्यालय

विश्वविद्यालयअवस्थिति संस्थापक (वंश) शिक्षा
नालंदा विश्वविद्यालयबड़गांव, बिहारकुमारगुप्त-I (गुप्त वंश) बौद्ध शिक्षा
वल्लभी विश्वविद्यालयभावनगर, गुजरात भट्टार्क : 475-500ई. (मैत्रक वंश) हीनयान शिक्षा
ओदंतपुरी विश्वविद्यालयबिहारशरीफ, बिहार गोपाल : 750-810ई. (पाल वंश) शिक्षा महायान
विक्रमशिला विश्वविद्यालयअचिंतकगांव, बिहार धर्मपाल : 770-810 ई. (पाल वंश)वज्रयान शिक्षा
सोमपुर विश्वविद्यालयनवगांव, बांग्लादेशबौद्ध शिक्षा
जगदल्ल विश्वविद्यालयराजशाही, बांग्लादेश रामपाल : 1082-1124 ई. (पाल वंश) तंत्रयान शिक्षा

बौद्ध धर्म व जैन धर्म

समानताएं

➣ दोनों धर्म के प्रवर्तक क्षत्रिय कुल से थे।

➣ दोनों धर्म अनीश्वरवादी हैं। दूसरे शब्दों में दोनों धर्म संसार के स्रष्टा के रूप में ईश्वर (भगवान) को नहीं मानते।

➣ दोनों धर्म-कर्म का वैदिक सिद्धांत नहीं मानते।

➣ दोनों धर्म वैदिक यज्ञ-विधानकर्मकांड का विरोध करते हैं।

➣ दोनों धर्मों ने जाति-प्रथालिंग-भेद की निंदा की।

➣ दोनों धर्मों में उपदेश की भाषा जनभाषा (जैन धर्म-प्राकृत भाषा जबकि बौद्ध धर्म-पालि भाषा) है।

➣ दोनों धर्मों ने स्त्री एंव शूद्रों के लिए अपने द्वार खोले।

असमानताए

➣ जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया है। हालांकि बौद्ध धर्म भी अहिंसावादी लेकिन जैन धर्म की तुलना में कम है।

➣ जैन धर्म में कैवल्य (मोक्ष) का अर्थ सिद्धावस्था में शरीर का त्याग है। जबकि बौद्ध धर्म में निर्वाण (मोक्ष) का अर्थ अस्तित्व की समाप्ति जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति है।

➣ जैन धर्म आत्मा (जीव) को शाश्वत (आत्मवादी) मानता है जबकि बौद्ध धर्म ईश्वर के साथ आत्मा का भी निषेध (अनात्मवादी) करता है।

➣ जैन धर्म में कठोर तपस्या का विधान है जिसकी चरम परिणति काया कलेश के द्वारा आत्महत्या में होती है। जबकि बौद्ध धर्म में कठोर तपस्या को अमान्य कर मध्यम मार्ग (मध्यम प्रतिपदा) अपनाने का विधान है।

➣ जैन मंदिरों में ब्राह्मणों को स्थान मिला है। इसके विपरीत बौद्ध मंदिरों में ब्राह्मणों को अधिक प्रश्रय नहीं मिला है।

➣ जैन धर्म भारत की सीमा से बाहर नहीं फैला। जबकि बौद्ध धर्म विश्वव्यापी हो गया।

➣ जैन धर्म मूर्ति पूजक, नग्न मूर्तियों के है, हालांकि बौद्ध धर्म भी मूर्तिपूजक है लेकिन नग्न मूर्तियों के नहीं। उल्लेखनीय है सर्वप्रथम बुद्ध की प्रतिमा स्थापित कर पूजा आरंम्भ भारत में हुई थी।

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