वेवल योजना एवं शिमला सम्मेलन (1945) : प्रमुख प्रावधान, प्रतिक्रियाएँ एवं शिमला सम्मेलन की विफलता

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वेवल योजना एवं शिमला सम्मेलन (1945) : परिचय

➣ वेवल योजना ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत एक प्रस्ताव था, जिसकी घोषणा 14 जून, 1945 को लंदन और दिल्ली में की गई। लंदन में भारत सचिव लियो एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में इसकी घोषणा की, जबकि दिल्ली में वायसराय लॉर्ड वेवल ने रेडियो प्रसारण के माध्यम से योजना की जानकारी दी।

➣ इसका उद्देश्य नया संविधान बनाना नहीं, बल्कि भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत वायसराय की कार्यकारिणी परिषद को लगभग पूरी तरह भारतीय बनाकर राजनीतिक गतिरोध दूर करना था।

➣ इस योजना पर भारतीय नेताओं के साथ सहमति बनाने के लिए 25 जून से 14 जुलाई, 1945 तक शिमला स्थित वायसरीगल लॉज में शिमला सम्मेलन आयोजित किया गया।

➣ वेवल के विवरण के अनुसार, सम्मेलन में योजना के मूल सिद्धांतों पर सहमति बन गई थी, लेकिन नई कार्यकारिणी परिषद की संरचना और विशेष रूप से मुस्लिम सदस्यों के नामांकन के अधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति नहीं बन सकी, जिसके कारण 14 जुलाई, 1945 को वेवल ने सम्मेलन की विफलता की घोषणा कर दी।

वेवल योजना एवं शिमला सम्मेलन की पृष्ठभूमि

➣ क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता के बाद भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942) शुरू हुआ। कांग्रेस के प्रमुख नेता जेल में रहे और कई प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के हटने के बाद गवर्नर भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 93 के अंतर्गत शासन चला रहे थे। इस स्थिति में ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक संवाद लगभग समाप्त हो गया था।

➣ लॉर्ड वेवल अक्टूबर 1943 में भारत के वायसराय बने। वे इससे पहले भारत के कमांडर-इन-चीफ रह चुके थे। वे भारत के राजनीतिक गतिरोध को दूर करना चाहते थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने प्रारंभ में उन्हें उचित समय की प्रतीक्षा करने की सलाह दी।

➣ 1944–45 की असफल राजनीतिक पहलें: सी.आर. फार्मूला (1944) और गांधी–जिन्ना वार्ता (सितम्बर 1944) कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने में सफल नहीं हुईं।

➣ इसके बाद देसाई–लियाकत प्रस्ताव (जनवरी 1945) में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समान प्रतिनिधित्व के आधार पर अंतरिम सरकार बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन यह भी आगे नहीं बढ़ सका। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समान प्रतिनिधित्व का प्रश्न भारतीय राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

➣ वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के भारतीयकरण की प्रक्रिया पहले ही आगे बढ़ चुकी थी। इसके बावजूद परिषद के सदस्य प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि नहीं थे। वेवल की योजना का उद्देश्य इसी स्थिति में परिवर्तन लाकर कार्यकारिणी परिषद में प्रमुख भारतीय राजनीतिक पक्षों को अधिक प्रतिनिधित्व देना था।

➣ द्वितीय विश्वयुद्ध का अंतिम चरण: यूरोप में मई 1945 में युद्ध समाप्त हो चुका था, जबकि जापान के विरुद्ध युद्ध जारी था। ब्रिटिश सरकार भारत में राजनीतिक सहयोग और युद्धकालीन प्रशासन के लिए व्यापक भारतीय भागीदारी चाहती थी। मई 1945 में वेवल की लंदन यात्रा के दौरान उनकी योजना पर ब्रिटिश सरकार के साथ विचार-विमर्श हुआ और इसके बाद योजना को अंतिम रूप दिया गया।

➣ क्रिप्स प्रस्ताव का संबंध: वेवल योजना ने मार्च 1942 के क्रिप्स प्रस्ताव को समाप्त नहीं किया था। योजना की घोषणा में स्पष्ट किया गया कि क्रिप्स प्रस्ताव की मूल प्रतिबद्धताएँ यथावत रहेंगी। इस दृष्टि से वेवल योजना को क्रिप्स प्रस्ताव के स्थान पर नई संवैधानिक योजना के बजाय अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक अतिरिक्त पहल के रूप में देखा जा सकता है।

➣ वेवल की अपनी मंशा: 8 जून 1945 को पंजाब के गवर्नर सर बर्ट्रेंड ग्लैंसी को भेजे संदेश में वेवल ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केंद्रीय सरकार किसी एक राजनीतिक दल को सौंपना नहीं था।

➣ इसी संदेश में उन्होंने यह भी लिखा कि प्रस्तावित अंतरिम सरकार की व्यवस्था संभवतः मुसलमानों को पाकिस्तान के लक्ष्य से दूर करने की दिशा में उपयोगी हो सकती है। यह वेवल की व्यक्तिगत राजनीतिक सोच को दर्शाता है।

वेवल योजना (1945) की प्रमुख सिफारिशें

➣ कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन एवं चयन-विधि:- वायसराय अपनी कार्यकारिणी परिषद के लिए केंद्र और प्रांतों के प्रमुख भारतीय राजनीतिक नेताओं में से सदस्यों का चयन करते और उनके नाम सम्राट के अनुमोदन के लिए भेजते।

➣ इसके लिए प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं, पूर्व प्रांतीय प्रधानमंत्रियों तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों का सम्मेलन बुलाकर नामों की सूची माँगी जानी थी। हालांकि अंतिम चयन की जिम्मेदारी वायसराय की ही रहती और उनकी स्वतंत्रता अप्रतिबंधित थी। चुने गए सदस्य जापान के विरुद्ध युद्ध को विजयी अंत तक जारी रखने में सहयोग के आधार पर पद स्वीकार करते।

➣ वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय:- प्रस्तावित कार्यकारिणी परिषद में वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होने थे। कमांडर-इन-चीफ परिषद में युद्ध सदस्य के रूप में बने रहते, क्योंकि भारत की रक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार के पास रहने तक इसे आवश्यक माना गया था।

➣ समुदायों का संतुलित प्रतिनिधित्व:- कार्यकारिणी परिषद में प्रमुख समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाना था। इसमें मुसलमानों और सवर्ण हिंदुओं की संख्या बराबर रखने का प्रस्ताव था।

➣ इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों, सिखों और अन्य विशेष हितों को भी प्रतिनिधित्व देने की संभावना थी। आधिकारिक प्रस्ताव में मुस्लिम और सवर्ण हिंदुओं के लिए समान अनुपात को प्रमुख आधार बनाया गया था।

➣ भारतीयों को महत्वपूर्ण विभागों का हस्तांतरण:- कमांडर-इन-चीफ के अधीन युद्ध विभाग को छोड़कर कार्यकारिणी के सभी विभाग भारतीय सदस्यों को दिए जाने थे।

➣ इसमें गृह और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों के साथ विदेश विभाग भी शामिल था, जो पहले वायसराय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था। विदेशों में भारत के प्रतिनिधित्व के लिए भारतीय प्रतिनिधियों की नियुक्ति का भी प्रावधान था।

➣ ब्रिटिश उच्चायुक्त की नियुक्ति:- भारत के वायसराय को एक साथ भारत के हितों की रक्षा करने और ब्रिटिश आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करने की दोहरी भूमिका से मुक्त करने के लिए भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव था।

➣ यह व्यवस्था ब्रिटिश डोमिनियनों में प्रचलित व्यवस्था के अनुरूप होनी थी। यह प्रावधान मूल घोषणा के अतिरिक्त भारत सचिव लियो एमरी द्वारा संसद में स्पष्ट किया गया था।

➣ वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के भीतर:- नई कार्यकारिणी परिषद संसदीय अर्थ में केंद्रीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार वायसराय की विशेष एवं आरक्षित शक्तियाँ बनी रहतीं, विशेषकर भारत की सुरक्षा, शांति और हितों से जुड़े मामलों में। ब्रिटिश सरकार ने इन शक्तियों को अंतरिम व्यवस्था में अल्पसंख्यकों और अन्य हितों की सुरक्षा से भी जोड़ा था।

➣ प्रांतों में लोकप्रिय सरकारों की पुनर्स्थापना:- यदि केंद्र में राजनीतिक सहयोग स्थापित हो जाता, तो उन प्रांतों में फिर से लोकप्रिय सरकारों के गठन की संभावना थी जहाँ 1935 के अधिनियम की धारा 93 के अंतर्गत शासन चल रहा था। यह भी अपेक्षा की गई थी कि इन प्रांतीय सरकारों में केंद्र की तरह गठबंधन का आधार अपनाया जा सकता है।

➣ रियासतों एवं भावी संविधान के संबंध में स्थिति:- भारतीय रियासतों के साथ सम्राट के संबंधों में कोई परिवर्तन नहीं किया जाना था। इन संबंधों को वायसराय सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में बनाए रखते। साथ ही, योजना ने भारत के भावी स्थायी संविधान के स्वरूप को पहले से निर्धारित नहीं किया था।

➣ योजना स्वीकार न होने की स्थिति:- योजना की सफलता के लिए भारतीय राजनीतिक नेताओं की स्वीकृति और सहयोग आवश्यक माना गया था। व्यापक सहमति न बनने की स्थिति में वर्तमान संवैधानिक व्यवस्थाएँ ही जारी रहने वाली थीं।

समान प्रतिनिधित्व का अर्थ भारत की कुल जनसंख्या के आधार पर समानता नहीं था और न ही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच समानता। इसका अर्थ कार्यकारिणी परिषद में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को बराबर प्रतिनिधित्व देना था।

➣ यही व्यवस्था बाद में शिमला सम्मेलन में महत्वपूर्ण विवाद का विषय बनी, क्योंकि कांग्रेस मुस्लिम सदस्यों के चयन में अपना अधिकार बनाए रखना चाहती थी, जबकि मुस्लिम लीग सभी मुस्लिम सदस्यों के मनोनयन का अधिकार अपने पास चाहती थी।

यहाँ सवर्ण हिंदू शब्द का प्रयोग अनुसूचित जातियों को अलग प्रतिनिधित्व देने की योजना के संदर्भ में किया गया था।

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योजना की सीमाएँ एवं तत्काल प्रतिक्रियाएँ

➣ वास्तविक सत्ता पर सीमित प्रभाव:- वायसराय की विशेष शक्तियाँ बनी रहनी थीं, रक्षा पर ब्रिटिश नियंत्रण जारी रहना था और कार्यकारिणी परिषद विधायिका के प्रति संसदीय रूप से उत्तरदायी नहीं होती।

➣ साथ ही, योजना ने भारत के अंतिम संवैधानिक दर्जे के संबंध में कोई नया स्पष्ट वादा नहीं किया था। इन सीमाओं के कारण योजना को पूर्ण उत्तरदायी शासन की दिशा में अंतिम व्यवस्था नहीं माना जा सकता था।

➣ मौजूदा कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्यों की प्रतिक्रिया:- वेवल के विवरण के अनुसार, मौजूदा कार्यकारिणी परिषद के कुछ भारतीय सदस्यों ने तत्काल डोमिनियन स्टेटस की माँग की और परिषद की बैठकों से संबंधित बातें प्रेस तक पहुँचीं।

➣ हालांकि इन सदस्यों ने अपने पद इस समझ के साथ स्वीकार किए थे कि राजनीतिक नेताओं के लिए नई व्यवस्था बनने पर उन्हें हटना पड़ सकता है। बाद में उन्होंने योजना के प्रति समर्थन व्यक्त किया।

➣ सामान्य जन-प्रतिक्रिया:- वेवल के अनुसार, शिक्षित भारतीयों के एक बड़े वर्ग में योजना को स्वीकार करने की प्रवृत्ति थी। विशेष रूप से विदेश विभाग का भारतीय सदस्य को दिया जाना महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखा गया।

कैबिनेट मिशन से तुलना: क्रिप्स (1942) → वेवल (1945) → कैबिनेट मिशन (1946)

आधारक्रिप्स प्रस्ताव (1942)वेवल योजना (1945)कैबिनेट मिशन (1946)
मूल उद्देश्ययुद्धोपरांत नया संविधान एवं डोमिनियनयुद्धकाल में अंतरिम परिषद् का पुनर्गठनसंविधान सभा एवं अंतरिम सरकार दोनों
संविधान निर्माणसंविधान सभा का पहला विस्तृत प्रस्तावकोई प्रस्ताव नहींसंविधान सभा का गठन (9 दिसम्बर 1946 को पहली बैठक)
वर्तमान संविधानयुद्ध-काल में परिवर्तन नहीं1935 का अधिनियम यथावत (केवल नौवीं अनुसूची में संशोधन)अंतरिम सरकार के लिए वही ढाँचा
सांप्रदायिक सूत्रप्रांतों को अलग रहने का अधिकारसवर्ण हिंदू-मुस्लिम समानतासमूहन (groups) की त्रि-स्तरीय योजना
स्वीकृतिकांग्रेस एवं लीग ने अस्वीकार कियासिद्धांत मान्य, पर नामांकन पर विफलयोजना पर दोनों की सशर्त प्रारम्भिक स्वीकृति, बाद में मतभेद

ध्यान रहे-जिन तीनों में क्रिप्स 1942 और वेवल 1945 को एक जैसा समझ लेने की भूल होती है, उनका फ़र्क यह है कि क्रिप्स प्रस्ताव भविष्य के संविधान पर था और वेवल योजना वर्तमान (अंतरिम) शासन की संरचना पर।

शिमला सम्मेलन (1945)

➣ वेवल योजना की घोषणा के बाद वायसराय ने भारत के प्रमुख राजनीतिक नेताओं को शिमला आमंत्रित किया, ताकि प्रस्तावित नई कार्यकारिणी परिषद के सदस्यों के चयन पर सहमति बनाई जा सके। सम्मेलन के लिए आमंत्रण 14 जून, 1945 को ही जारी कर दिए गए थे।

➣ सम्मेलन की प्रारंभिक बैठकों के बाद भी राजनीतिक दलों के बीच कार्यकारिणी परिषद की संरचना और प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद बने रहे। अंततः 14 जुलाई, 1945 को सम्मेलन किसी समझौते पर पहुँचे बिना समाप्त हो गया।

➣ इसे मुख्यतः तीन चरणों में समझा जा सकता है-पहले योजना के मूल सिद्धांतों पर सहमति, फिर कार्यकारिणी परिषद की संरचना पर मतभेद और अंत में मुस्लिम सदस्यों के नामांकन के अधिकार को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच टकराव।

आमंत्रित प्रतिनिधि एवं तैयारी

➣ सम्मेलन के लिए 14 जून, 1945 को ही प्रमुख भारतीय राजनीतिक नेताओं को आमंत्रित किया गया। आमंत्रित व्यक्तियों में प्रांतीय प्रधानमंत्रियों तथा उन प्रांतों के पूर्व प्रधानमंत्रियों को शामिल किया गया जहाँ धारा 93 लागू थी।

➣ इसके अलावा केंद्रीय विधायिका में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रमुख नेताओं, काउंसिल ऑफ स्टेट के दोनों दलों के नेताओं तथा नेशनलिस्ट पार्टी और यूरोपीय समूह के नेताओं को भी बुलाया गया।

➣ महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के मान्य नेताओं के रूप में आमंत्रित किया गया। अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि के रूप में राय बहादुर एन. शिवराज और सिखों के प्रतिनिधि के रूप में मास्टर तारा सिंह को आमंत्रित किया गया था।

वर्गआमंत्रित प्रतिनिधि
प्रांतीय प्रधानमंत्रीपद पर कार्यरत प्रांतीय प्रधानमंत्री तथा धारा 93 के अंतर्गत शासित प्रांतों के अंतिम प्रधानमंत्री। इनमें पंजाब के ख़िज़र हयात ख़ान तिवाना, संयुक्त प्रांत के गोविंद बल्लभ पंत और मद्रास के सी. राजगोपालाचारी जैसे नेता शामिल थे।
केंद्रीय विधायिकाकेंद्रीय विधानसभा में कांग्रेस के नेता और मुस्लिम लीग के उपनेता; काउंसिल ऑफ स्टेट में दोनों दलों के नेता; तथा विधानसभा में नेशनलिस्ट पार्टी और यूरोपीय समूह के नेता।
प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्वमहात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना, दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के मान्य नेताओं के रूप में।
अनुसूचित जातियाँराय बहादुर एन. शिवराज
सिखमास्टर तारा सिंह

➣ सम्मेलन से पहले वेवल को गांधी और जिन्ना को लेकर विशेष सावधानी बरतनी पड़ी। गांधी ने सवर्ण हिंदू शब्द के प्रयोग पर आपत्ति व्यक्त की।

➣ वे कांग्रेस के औपचारिक प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में शामिल होने के बजाय शिमला में रहकर कांग्रेस के नेताओं से संपर्क बनाए रखने और वेवल से अलग-अलग बातचीत करने की स्थिति में रहे। औपचारिक सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व उसके अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया।

➣ दूसरी प्रमुख चिंता जिन्ना को लेकर थी। मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व और सम्मेलन में उसकी भागीदारी को लेकर प्रारंभ से ही अनिश्चितता बनी हुई थी। आगे चलकर यही प्रश्न कार्यकारिणी परिषद में मुस्लिम सदस्यों के नामांकन के अधिकार से जुड़े विवाद का केंद्र बना।

ध्यान रहे: शिमला सम्मेलन में अनुसूचित जातियों के आमंत्रित प्रतिनिधि डॉ. भीमराव आंबेडकर नहीं, राय बहादुर एन. शिवराज थे। डॉ. आंबेडकर उस समय वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम सदस्य थे। 14 जून, 1945 की ब्रिटिश सरकार की घोषणा में उन्हें अनुसूचित जातियों का मान्य नेता बताया गया था, लेकिन सम्मेलन के लिए अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि के रूप में राय बहादुर शिवराज को आमंत्रित किया गया था।

पहला चरण (25–29 जून): सिद्धांत स्वीकृत, संरचना पर गतिरोध

➣ 25 जून को शिमला सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हुई और वायसराय लॉर्ड वेवल ने इसकी अध्यक्षता की। प्रारंभिक चर्चाओं में मौलाना आजाद और जिन्ना के बीच राजनीतिक अविश्वास स्पष्ट दिखाई दिया।

➣ वेवल ने चर्चा को पहले इस प्रश्न पर केंद्रित किया कि वेवल योजना के मूल सिद्धांत स्वीकार्य हैं या नहीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम सफलता कार्यकारिणी परिषद की संख्या और संरचना पर राजनीतिक दलों की सहमति पर निर्भर करेगी।

➣ वेवल के अपने विवरण के अनुसार, थोड़ी चर्चा के बाद योजना के मूल सिद्धांतों को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। आजाद ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में जापान के कब्जे वाले क्षेत्रों के भविष्य से संबंधित आश्वासन की आवश्यकता का संकेत दिया था, लेकिन योजना के सिद्धांतों को स्वीकार करते समय कांग्रेस ने कोई औपचारिक शर्त नहीं रखी।

➣ जिन्ना ने भी स्पष्ट किया कि योजना से न तो कांग्रेस की स्वतंत्रता की माँग प्रभावित होती है और न ही मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग। उन्होंने गृह, वित्त, यातायात और विदेश जैसे महत्वपूर्ण विभागों में मुस्लिम लीग को उचित प्रतिनिधित्व देने की माँग की, जिस पर वेवल ने विचार करने का आश्वासन दिया।

➣ वास्तविक कठिनाई तब सामने आई जब कार्यकारिणी परिषद की संख्या और सदस्यों के चयन पर चर्चा शुरू हुई। जिन्ना ने आजाद से सीधे मिलने से इनकार किया, जिसके बाद कांग्रेस की ओर से गोविंद बल्लभ पंत ने उनसे अनौपचारिक बातचीत की।

➣ यह प्रयास किसी समझौते तक नहीं पहुँच सका। 26 और 27 जून की चर्चाओं में आजाद ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या जिन्ना कांग्रेस के किसी अधिकृत प्रतिनिधि से बातचीत करना चाहेंगे। यह तय हुआ कि पंत किसी भी प्रकार का आश्वासन देने से पहले आजाद से परामर्श करेंगे।

➣ वेवल ने विभिन्न नेताओं को शामिल करके एक समिति बनाने का सुझाव भी दिया, लेकिन लगभग तीन-चौथाई घंटे की चर्चा के बाद यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच परिषद की संरचना पर सहमति बनना कठिन है। इसके बाद सम्मेलन को 29 जून तक स्थगित कर दिया गया।

➣ 29 जून को वेवल ने वार्ता का तरीका बदलने का प्रयास किया। उन्होंने राजनीतिक दलों से परिषद की संरचना पर सीधे समझौता करने के बजाय अपनी-अपनी नामों की सूची देने को कहा। वेवल इन सूचियों के आधार पर कुछ नाम स्वयं जोड़कर ऐसी परिषद बनाने वाले थे जिसे विभिन्न राजनीतिक पक्ष स्वीकार कर सकें।

➣ उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें तीन बातों का ध्यान रखना था-हिंदू-मुस्लिम समानता बनाए रखना, अंतिम चयन अपने विवेक से करना और ऐसी कार्यकारिणी बनाना जो सामूहिक रूप से काम कर सके।

➣ ख़िज़र हयात ख़ान तिवाना के आग्रह पर नामों को गोपनीय रखने की व्यवस्था की गई। राजनीतिक दलों को अपनी कार्यसमितियों से परामर्श के लिए समय चाहिए था, इसलिए सम्मेलन को 14 जुलाई तक स्थगित कर दिया गया।

बीच का समय (30 जून–10 जुलाई): सूचियाँ और परदे के पीछे की कोशिशें

➣ 30 जून को वेवल ने ब्रिटिश सरकार और प्रांतीय गवर्नरों से गोपनीय संदेशों के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया कि यदि जिन्ना परिषद में शामिल होने के लिए तैयार न हों, तो क्या मुस्लिम लीग के बिना नई कार्यकारिणी परिषद बनाई जा सकती है।

➣ बंगाल और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण मुस्लिम-बहुल प्रांतों के गवर्नरों ने इस संभावना का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार की ओर से भी लीग को अलग रखकर परिषद बनाने के प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला।

➣ मौलाना आजाद यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि नई परिषद में कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी मुसलमानों को भी प्रतिनिधित्व मिले। इसी संदर्भ में कांग्रेस ने कुछ राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं से संपर्क किया।

➣ दूसरी ओर, वेवल के अनुसार जिन्ना को मुस्लिम लीग के भीतर तथा प्रांतीय नेताओं की ओर से भी विभिन्न प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ रहा था। मुस्लिम लीग को छोड़कर अन्य प्रमुख पक्षों ने अपनी-अपनी नामों की सूचियाँ प्रस्तुत कर दीं, जबकि यूरोपीय समूह ने सूची न देने का निर्णय किया।

➣ कांग्रेस की सूची में मुस्लिम नाम भी शामिल थे और उसने प्रस्तावित पाँच मुस्लिम सदस्यों में से दो स्थानों पर अपना दावा रखा।

➣ मुस्लिम लीग की कार्यसमिति 6 से 14 जुलाई तक शिमला में विचार-विमर्श करती रही। 7 जुलाई को जिन्ना ने वेवल को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि लीग अपनी सूची प्रस्तुत नहीं करेगी।

➣ उन्होंने प्रस्ताव दिया कि मुस्लिम सदस्यों के चयन पर उनके और वायसराय के बीच सीधे विचार-विमर्श हो तथा कार्यकारिणी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य मुस्लिम लीग की ओर से लिए जाएँ।

➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था की माँग की। इस संदर्भ में उन्होंने 1940 में लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया। 8 जुलाई को जिन्ना और वेवल के बीच लंबी बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका।

➣ इसके बाद 9 जुलाई को वेवल ने जिन्ना को स्पष्ट किया कि वे किसी अन्य राजनीतिक दल की तरह मुस्लिम लीग को भी यह आश्वासन नहीं दे सकते कि कार्यकारिणी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य केवल उसकी सूची से लिए जाएँगे। इस प्रकार मुस्लिम सदस्यों के चयन के अधिकार का प्रश्न सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बाधा बन गया।

➣ जिन्ना की सहमति के बिना भी वेवल ने कार्यकारिणी परिषद के लिए एक अस्थायी चयन-सूची तैयार की और उसे लंदन भेजा।

➣ इस प्रस्तावित सूची में वायसराय और कमांडर-इन-चीफ के अतिरिक्त 14 सदस्य थे-पाँच सवर्ण हिंदू, जिनमें दो गैर-कांग्रेसी थे; पाँच मुसलमान, जिनमें चार मुस्लिम लीग से और एक पंजाब के प्रधानमंत्री की ओर से सुझाया गया पंजाबी मुसलमान था। तथा एक सिख, दो अनुसूचित जाति के सदस्य और एक भारतीय ईसाई। यह वेवल की अपनी अस्थायी चयन-सूची थी, न कि वेवल योजना में पहले से निर्धारित सदस्यों की सूची।

अंतिम चरण (11–14 जुलाई): सम्मेलन का अंत

➣ ब्रिटिश सरकार से आवश्यक अनुमति मिलने के बाद वेवल ने 11 जुलाई को जिन्ना से फिर भेंट की। उन्होंने उन्हें प्रस्तावित परिषद की संख्या और संरचना के बारे में बताया, लेकिन मुस्लिम सदस्यों के सभी नाम प्रकट नहीं किए।

➣ जिन्ना ने स्पष्ट किया कि जब तक दो बातों पर आश्वासन नहीं मिलता, मुस्लिम लीग सहयोग नहीं करेगी-(1) सभी मुस्लिम सदस्य मुस्लिम लीग की ओर से लिए जाएँ और (2) जिस निर्णय का मुस्लिम सदस्य विरोध करें, उसे परिषद में केवल दो-तिहाई बहुमत से ही पारित किया जा सके।

➣ उपलब्ध विवरणों के अनुसार, दूसरी माँग इस चरण में औपचारिक रूप से सामने आई। वेवल ने दोनों शर्तों को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार, यदि मुसलमानों को इस प्रकार का सामुदायिक वीटो दिया जाता, तो अन्य समुदाय भी इसी प्रकार की सुरक्षा की माँग कर सकते थे और परिषद का सामान्य कामकाज कठिन हो जाता।

➣ इसी दिन वेवल ने प्रांतीय गवर्नरों को सूचित कर दिया कि वे 14 जुलाई को सम्मेलन की विफलता की घोषणा करेंगे।

➣ 14 जुलाई की अंतिम बैठक में वेवल ने सम्मेलन की अब तक की कार्यवाही का संक्षेप प्रस्तुत किया और संकेत दिया कि अब उन्हें आगे की स्थिति पर विचार करना होगा। इसके बाद विभिन्न नेताओं ने अपने-अपने विचार रखे:-

नेता14 जुलाई को क्या कहा
आज़ाद (कांग्रेस)उन्होंने संयमित भाषा में सम्मेलन की विफलता पर अपनी बात रखी और संकेत किया कि अब ब्रिटिश सरकार को ही राजनीतिक दलों तथा विभिन्न समुदायों के बीच उत्पन्न गतिरोध का समाधान करना होगा।
राजाजीउन्होंने सुझाव दिया कि अंतरिम परिषद का गठन केवल सांप्रदायिक आधार पर करने के बजाय क्षेत्रीय या प्रशासनिक आधार पर किया जा सकता है।
जिन्ना (मुस्लिम लीग)वेवल के विवरण के अनुसार, जिन्ना ने लंबे वक्तव्य में कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों से मुसलमानों में उत्पन्न भय का उल्लेख किया तथा मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व संबंधी दावे को दोहराया। उन्होंने सभी मुस्लिम सदस्यों के लीग द्वारा नामित किए जाने और मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था पर जोर दिया।
ख़िज़र हयात ख़ान तिवाना (यूनियनिस्ट)उन्होंने भी वेवल से आग्रह किया कि मुस्लिम लीग की सहमति के बिना ही कार्यकारिणी परिषद का गठन किया जाए। वेवल ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया।
मास्टर तारा सिंह (सिख)उन्होंने कहा कि यदि पाकिस्तान की स्थापना होती है, तो सिखों के लिए भी अलग राज्य की माँग उठ सकती है।
शिवराज (अनुसूचित जातियाँ)उन्होंने अनुसूचित जातियों को एक पृथक और महत्वपूर्ण समुदाय के रूप में मान्यता देने तथा उनके लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर जोर दिया।

➣ इसके बाद वेवल ने शिमला सम्मेलन की विफलता की घोषणा कर दी। सम्मेलन की असफलता का तत्काल कारण कार्यकारिणी परिषद में मुस्लिम सदस्यों के नामांकन के अधिकार को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहमति न बन पाना था।

➣ वेवल मुस्लिम लीग को सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का एकाधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे, जबकि जिन्ना इस अधिकार से पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

➣ 17 जुलाई को आजाद ने शिमला से एक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने कहा कि यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में भारतीय समस्या का समाधान चाहती थी, तो उसे सांप्रदायिक कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगाकर ऐसी स्थिति नहीं बनानी चाहिए थी जिसमें किसी एक समूह को देश की राजनीतिक प्रगति रोकने का अधिकार मिल जाए।

➣ सम्मेलन की विफलता के बाद गांधी और वेवल के बीच भी बातचीत हुई। वेवल के विवरण के अनुसार, गांधी ने इस स्थिति को कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गहरे मतभेद के रूप में देखा और संकेत किया कि ब्रिटिश सरकार को अंततः यह तय करना होगा कि वह किस राजनीतिक पक्ष के साथ आगे बढ़ सकती है।

भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

➣ वेवल योजना पर प्रतिक्रियाएँ केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग तक सीमित नहीं थीं। सिख, अनुसूचित जातियाँ, पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी, हिंदू महासभा, राष्ट्रवादी मुस्लिम तथा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्यों ने भी योजना के विभिन्न पक्षों पर अपनी चिंताएँ और माँगें रखीं। सम्मेलन के घटनाक्रम का विवरण ऊपर दिया जा चुका है; यहाँ विभिन्न पक्षों की प्रमुख प्रतिक्रियाओं और राजनीतिक चिंताओं का संक्षिप्त सार प्रस्तुत है।

प्रतिक्रियाओं का सार-मानचित्र

पक्षमुख्य रुखप्रमुख चिंता / माँग
कांग्रेसयोजना के मूल सिद्धांतों पर सहमति, लेकिन प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद“सवर्ण हिंदू” शब्द पर आपत्ति; अपने प्रतिनिधियों में मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का अधिकार; मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मानने से असहमति।
मुस्लिम लीगसमान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर सहमति, लेकिन मुस्लिम प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर असहमतिसभी मुस्लिम सदस्यों का चयन मुस्लिम लीग की ओर से; मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान; महत्वपूर्ण विभागों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व।
यूनियनिस्ट पार्टी (ख़िज़र हयात)मुस्लिम लीग के एकाधिकार से असहमतिपंजाब के गैर-लीगी मुसलमानों को भी प्रतिनिधित्व; एक पंजाबी मुस्लिम को परिषद में शामिल करने की माँग।
सिख (मास्टर तारा सिंह)अलग राजनीतिक हितों के लिए प्रतिनिधित्व की माँगकार्यकारिणी परिषद में कम से कम एक सिख प्रतिनिधि; पाकिस्तान की स्थिति में सिखों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग।
अनुसूचित जातियाँ (शिवराज)अलग राजनीतिक पहचान और प्रतिनिधित्व पर जोरअनुसूचित जातियों को एक पृथक प्रमुख समुदाय के रूप में मान्यता तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व।
हिंदू महासभा एवं अन्य विरोधी वर्गसमान प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर आपत्तिसवर्ण हिंदू और मुसलमानों की समान संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व किए जाने का विरोध।
मौजूदा कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्ययोजना को लेकर असंतोष, बाद में सीमित समर्थनतत्काल डोमिनियन स्टेटस की माँग तथा राजनीतिक गतिरोध के शीघ्र समाधान की अपेक्षा।
यूरोपीय समूहसम्मेलन में अलग स्थिति बनाए रखीकार्यकारिणी परिषद के लिए अपनी नामों की सूची प्रस्तुत नहीं की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया

➣ कांग्रेस ने वेवल योजना को पूरी तरह अस्वीकार करने के बजाय उसके आधार पर अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था में भाग लेने की तैयारी दिखाई। योजना की घोषणा के बाद कांग्रेस कार्यसमिति के शेष बंदी सदस्यों की रिहाई हुई और कांग्रेस के नेता शिमला पहुँचे।

➣ गांधी की प्रमुख आपत्तियों में भारत की स्वतंत्रता के संबंध में स्पष्ट आश्वासन का अभाव तथा “सवर्ण हिंदू” शब्द का प्रयोग शामिल था। इस शब्द पर उनकी आपत्ति और वेवल का स्पष्टीकरण ऊपर दिया जा चुका है।

➣ समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर कांग्रेस की मुख्य आपत्ति नहीं थी। चावला के अनुसार, राजाजी, भूलाभाई देसाई और तेज बहादुर सप्रू सम्मेलन से पहले ही समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को स्वीकार कर चुके थे और गांधी ने भी शिमला में इसे स्वीकार किया।

➣ कांग्रेस की मुख्य आपत्ति यह थी कि प्रतिनिधित्व को धार्मिक आधार पर निश्चित किया जा रहा था। कांग्रेस स्वयं को किसी एक समुदाय का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरे भारत का राजनीतिक संगठन मानती थी। इसलिए उसका तर्क था कि अपने हिस्से के सदस्यों का चयन करते समय वह मुसलमानों सहित किसी भी समुदाय के प्रतिनिधि को नामित कर सकती है।

➣ कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि होने के दावे को भी स्वीकार नहीं किया। उसका तर्क था कि कई मुस्लिम-बहुल प्रांतों में गैर-लीगी मुसलमान राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे।

➣ उदाहरण के लिए, पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में कांग्रेस समर्थित सरकार का अस्तित्व मुस्लिम लीग के सर्व-मुस्लिम प्रतिनिधित्व के दावे को चुनौती देता था। दूसरी ओर, चावला के अनुसार, उपचुनावों में मुस्लिम लीग की बढ़ती सफलता उसके बढ़ते राजनीतिक प्रभाव की ओर संकेत कर रही थी।

➣ कांग्रेस की अपेक्षाएँ केवल कार्यकारिणी परिषद के पुनर्गठन तक सीमित नहीं थीं। चावला के अनुसार, मौलाना आजाद को उम्मीद थी कि युद्ध की समाप्ति तक भारत की स्वतंत्रता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, जबकि वेवल ऐसी अपेक्षा को कम करना चाहते थे।

➣ इस प्रकार कांग्रेस वेवल योजना को व्यापक संवैधानिक परिवर्तन की दिशा में एक अवसर के रूप में देख रही थी, जबकि वेवल इसे मुख्यतः अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था के रूप में देखते थे।

➣ वेवल का आकलन: वेवल ने कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत नामों को लेकर यह मत व्यक्त किया कि कांग्रेस ऐसी कार्यकारिणी चाहती थी जिसमें उसका प्रभाव प्रमुख रहे। उनके अनुसार, कांग्रेस की सूची को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि उसे हिंदू प्रेस में कांग्रेस की उदारता के उदाहरण के रूप में देखा जाए। यह वेवल का व्यक्तिगत आकलन था।

➣ सम्मेलन की विफलता के बाद 17 जुलाई, 1945 को आजाद ने शिमला से वक्तव्य जारी किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पहले भी प्रशासन की जिम्मेदारी स्वीकार करने की अपनी तत्परता स्पष्ट कर चुकी थी और अब भी वह देश के शासन की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार थी।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ मुस्लिम लीग ने कार्यकारिणी परिषद में समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन उसके व्यावहारिक स्वरूप को लेकर उसकी आपत्तियाँ बनी रहीं।

➣ उसे आशंका थी कि परिषद में सिख और अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि कई मामलों में मुस्लिम सदस्यों के विरुद्ध मतदान कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में संख्या की समानता के बावजूद मुसलमान व्यवहार में अल्पमत में पड़ सकते थे।

➣ जिन्ना ने यह भी स्पष्ट किया कि वेवल योजना से न तो कांग्रेस की स्वतंत्रता की माँग प्रभावित होती है और न ही मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग।

➣ मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर एकाधिकार का दावा: जिन्ना का दावा था कि मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि है। इसके समर्थन में वे चुनावों और उपचुनावों में लीग की सफलता का उल्लेख करते थे।

➣ उन्होंने 1940 में लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा दिए गए आश्वासन का भी हवाला दिया, जिसकी उनकी व्याख्या के अनुसार मुस्लिम प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर लीग की सहमति आवश्यक थी।

➣ वेवल इस व्याख्या से सहमत नहीं थे। चावला के अनुसार, जिन्ना कांग्रेस द्वारा नामित मुस्लिम सदस्यों, विशेषकर मौलाना आजाद, तथा गैर-लीगी पंजाबी मुस्लिम नेताओं को मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

➣ लीग के भीतर समर्थन: मुस्लिम लीग की कार्यसमिति सम्मेलन के दौरान जिन्ना की स्थिति के साथ रही। बाद में लीग के नेताओं, जैसे ख़लीकुज़्ज़मान और ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन, ने एक ब्रिटिश अधिकारी से बातचीत में राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं को शिमला बुलाए जाने पर असंतोष व्यक्त किया। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस द्वारा गैर-लीगी मुस्लिम नेताओं को प्रतिनिधित्व दिलाने की कोशिश को लीग अपने राजनीतिक दावे के लिए चुनौती के रूप में देख रही थी।

➣ समझौते की संभावनाएँ: चावला के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच समझौते की कुछ संभावनाएँ बनी हुई थीं। नाज़िमुद्दीन ने बंगाल के गवर्नर से संकेत दिया था कि जिन्ना एक ऐसे पंजाबी मुसलमान को स्वीकार कर सकते हैं जो न मुस्लिम लीग से संबंधित हो और न कांग्रेस से, बशर्ते उसका चयन जिन्ना और पंजाब के प्रधानमंत्री की सहमति से हो।

➣ इस संदर्भ में फ़िरोज़ ख़ान नून का नाम भी सामने आया था। एक अन्य संभावना यह थी कि जिन्ना ख़िज़र की सहमति से किसी पंजाबी मुसलमान को नामित करें, लेकिन ख़िज़र मुस्लिम लीग के नामांकन-अधिकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

➣ सम्मेलन की विफलता के बाद पत्रकारों से बातचीत में जिन्ना ने गांधी और कांग्रेस, वेवल तथा पंजाब के ग्लैंसी–ख़िज़र पक्ष पर मुस्लिम लीग को कमजोर करने का प्रयास करने का आरोप लगाया।

➣ उन्होंने वेवल योजना को स्वीकार करना “मृत्यु-पत्र पर हस्ताक्षर” करने के समान बताया। यह जिन्ना की अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया थी, इसलिए इसे उनके दृष्टिकोण के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।

अन्य दलों, समूहों एवं ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

➣ यूनियनिस्ट पार्टी (ख़िज़र हयात ख़ान): ख़िज़र ने वेवल योजना को प्रारंभ में असमय माना। उन्हें आशंका थी कि यदि केंद्र में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ, तो पंजाब में यूनियनिस्ट मंत्रिमंडल की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

➣ इसलिए उन्होंने पंजाब के एक गैर-लीगी पंजाबी मुसलमान को कार्यकारिणी परिषद में स्थान देने की माँग की और आवश्यकता पड़ने पर पंजाब मंत्रिमंडल के इस्तीफ़े की चेतावनी भी दी। वेवल के लिए पंजाब का राजनीतिक और सैन्य महत्व महत्वपूर्ण था, क्योंकि पंजाब ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए प्रमुख भर्ती क्षेत्रों में से एक था। जिन्ना ने अप्रैल 1944 में ख़िज़र को मुस्लिम लीग से निष्कासित कर दिया था।

➣ 15 जुलाई के अपने वक्तव्य में ख़िज़र ने जिन्ना की माँग को मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास बताया और सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण कांग्रेस तथा जिन्ना के बीच मूल राजनीतिक मतभेदों को माना।

➣ सिख (मास्टर तारा सिंह): सिखों की तत्काल माँग कार्यकारिणी परिषद में एक सिख प्रतिनिधि के लिए थी। वेवल के अनुसार, सिख प्रतिनिधित्व के लिए नाम तय करने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं हुई।

➣ उनकी व्यापक चिंता भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ी थी, विशेषकर इस संभावना से कि पाकिस्तान बनने की स्थिति में सिखों का राजनीतिक भविष्य क्या होगा।

➣ वेवल की एक गुप्तचर रिपोर्ट में यह उल्लेख मिलता है कि आजाद ने तारा सिंह को कांग्रेस के समर्थन से सिख प्रतिनिधि नामित करने का प्रस्ताव दिया था, यदि नाम कांग्रेस के माध्यम से भेजा जाए।

➣ यह विवरण एक गुप्तचर रिपोर्ट पर आधारित है, इसलिए इसे पुष्ट राजनीतिक निर्णय के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जिन्ना ने भी तारा सिंह को सिखों और शिवराज को अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार किया था।

➣ अनुसूचित जातियाँ (शिवराज): राय बहादुर एन. शिवराज ने अनुसूचित जातियों को एक अलग प्रमुख समुदाय के रूप में मान्यता देने और उनके लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व की माँग की। वेवल की 11 जुलाई की अस्थायी चयन-सूची में अनुसूचित जातियों के लिए दो स्थान रखे गए थे।

➣ हिंदू महासभा एवं रूढ़िवादी वर्ग: हिंदू महासभा के सदस्यों ने कार्यकारिणी परिषद में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों की समान संख्या के सिद्धांत का विरोध किया।

➣ वेवल के अनुसार, कुछ ज़मींदार और संपन्न वर्ग भी राजनीतिक परिवर्तन को लेकर आशंकित थे। इन वर्गों का एक हिस्सा अब तक ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग की नीति अपनाता रहा था और व्यापक राजनीतिक परिवर्तन से सावधान था।

➣ ब्रिटिश संसद एवं सरकार: भारत संबंधी नीति की घोषणा करते हुए लियो एमरी ने स्पष्ट किया कि ये प्रस्ताव ब्रिटेन की विजय की स्थिति में प्रस्तुत किए जा रहे थे, न कि किसी कमजोरी या दबाव के कारण।

➣ क्लेमेंट एटली ने इसे भारत की राजनीतिक समस्या के समाधान की दिशा में व्यावहारिक मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया। हाउस ऑफ लॉर्ड्स में लेबर पार्टी की ओर से भी इस नीति के निर्माण में अपनी भागीदारी का उल्लेख किया गया।

➣ दूसरी ओर, लेबर सांसद स्टीफन सोरेनसन सहित कुछ सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया कि क्रिप्स प्रस्तावों की तुलना में वेवल योजना से भारतीयों को वास्तविक सत्ता का कितना अतिरिक्त हस्तांतरण हो रहा था।

➣ फिर भी उन्होंने योजना के राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व को स्वीकार किया तथा वायसराय की विशेष शक्तियाँ और वीटो बनाए रखने पर भी प्रश्न उठाए।

वेवल की नज़र में प्रमुख नेता (15 जुलाई का गोपनीय निजी नोट): वेवल ने सम्मेलन के बाद विभिन्न भारतीय नेताओं के बारे में अपने व्यक्तिगत आकलन दर्ज किए।
▪ उन्होंने गांधी और कांग्रेस के संबंध में यह राय व्यक्त की कि कांग्रेस के बाहर के मुसलमानों के साथ वास्तविक राजनीतिक सहयोग की उसकी क्षमता सीमित है।
▪ जिन्ना के संबंध में वेवल ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को भय और अविश्वास से प्रभावित तथा उन्हें संकीर्ण और अहंकारी माना। मौलाना आजाद के बारे में उन्होंने उन्हें एक शिष्ट और विद्वान व्यक्ति माना, लेकिन यह भी लिखा कि उनके राजनीतिक उद्देश्य में जिन्ना और मुस्लिम लीग के प्रति विरोध का तत्व प्रमुख था।
▪ जवाहरलाल नेहरू को उन्होंने आदर्शवादी, स्पष्टवादी और ईमानदार बताया तथा अन्य कुछ हिंदू नेताओं की तुलना में मुसलमानों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की उनमें अधिक संभावना देखी।
ये सभी टिप्पणियाँ वेवल के निजी आकलन थे; इसलिए इन्हें ऐतिहासिक तथ्य या संबंधित नेताओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन न मानकर वेवल के दृष्टिकोण के रूप में हैं।

शिमला सम्मेलन की असफलता के कारण

➣ शिमला सम्मेलन की विफलता किसी एक कारण से नहीं हुई। इसे समझने के लिए कारणों को चार वर्गों में बाँटना उपयोगी है-तात्कालिक कारण, गहरे राजनीतिक कारण, योजना एवं वार्ता-प्रक्रिया से जुड़े कारण और ब्रिटिश पक्ष की सीमाएँ।

➣ वेवल ने अपने गोपनीय विवरण में पहले दो प्रकार के कारणों पर विशेष रूप से विचार किया था, जबकि अन्य कारण सम्मेलन की प्रक्रिया और उपलब्ध दस्तावेजों के अध्ययन से स्पष्ट होते हैं।

तात्कालिक कारण

➣ मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का विवाद:- कार्यकारिणी परिषद के मुस्लिम सदस्यों का चयन कौन करेगा, यही सम्मेलन के टूटने का सबसे प्रत्यक्ष कारण बना। मुस्लिम लीग चाहती थी कि परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य उसी की ओर से नामित किए जाएँ।

➣ दूसरी ओर, कांग्रेस अपने हिस्से के सदस्यों में मुस्लिम प्रतिनिधियों को शामिल करने के अधिकार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। वेवल भी किसी एक राजनीतिक दल को सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे। वेवल के अपने निष्कर्ष में भी जिन्ना की इस माँग को सम्मेलन की विफलता का प्रमुख कारण बताया गया है।

➣ जिन्ना की दूसरी शर्त: दो-तिहाई बहुमत:- वेवल के 11 जुलाई के विवरण के अनुसार, जिन्ना ने यह भी माँग रखी कि जिस निर्णय का मुस्लिम सदस्य विरोध करें, उसे परिषद में केवल दो-तिहाई बहुमत से ही पारित किया जाए।

➣ इससे मुस्लिम सदस्यों को महत्वपूर्ण मामलों में प्रभावी सामुदायिक सुरक्षा या वीटो जैसी स्थिति प्राप्त हो सकती थी। वेवल ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया।

➣ यूनियनिस्ट सीट का प्रश्न:- पंजाब के प्रधानमंत्री ख़िज़र हयात ख़ान तिवाना गैर-लीगी पंजाबी मुसलमान को कार्यकारिणी परिषद में स्थान देने के पक्ष में थे। इससे मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर मुस्लिम लीग के दावे का प्रश्न और जटिल हो गया।

➣ हालांकि इस मुद्दे के महत्व की व्याख्या इतिहासकारों में एक जैसी नहीं है। चावला इसे महत्वपूर्ण विवाद-बिंदु मानती हैं, जबकि ख़िज़र और वेवल के अपने विवरणों में इसे सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण नहीं माना गया।

गहरे राजनीतिक कारण

➣ मुस्लिम लीग का कांग्रेस के प्रति अविश्वास:- वेवल ने अपने विवरण में लिखा कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रश्न से अलग, मुस्लिम राजनीति के एक बड़े हिस्से में कांग्रेस और हिंदू राजनीतिक नेतृत्व के प्रति अविश्वास वास्तविक था।

➣ उन्हें आशंका थी कि कांग्रेस अपने राष्ट्रीय संगठन के स्वरूप और मुस्लिम सदस्यों को साथ लेकर केंद्रीय प्रशासन में अपना प्रभाव बढ़ा सकती है। वेवल के अनुसार, इस आशंका को केवल जिन्ना या उनके निकट सहयोगियों की व्यक्तिगत सोच मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता था।

➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के परस्पर विरोधी प्रतिनिधित्व-दावे:- कांग्रेस स्वयं को सभी भारतीयों और सभी समुदायों का प्रतिनिधि राजनीतिक संगठन मानती थी, जबकि मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों की एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि होने का दावा कर रही थी।

➣ कांग्रेस के लिए मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार छोड़ना उसके सर्वभारतीय प्रतिनिधित्व के दावे को सीमित करता, जबकि लीग के लिए अन्य दलों को मुस्लिम सदस्यों के चयन का अधिकार देना उसके प्रतिनिधित्व संबंधी दावे को कमजोर करता। इस मूलभूत मतभेद के कारण कार्यकारिणी परिषद की संरचना पर समझौता कठिन हो गया।

➣ भावी संवैधानिक व्यवस्था पर अस्पष्टता:- वेवल योजना मुख्यतः एक अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था से संबंधित थी और उसने भारत के भावी संविधान या पाकिस्तान के प्रश्न पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।

➣ मुस्लिम लीग को आशंका थी कि अंतरिम परिषद में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने से भविष्य की संवैधानिक वार्ताओं में उसका प्रभाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस इस व्यवस्था को आगे व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक परिवर्तन की दिशा में एक अवसर के रूप में देख रही थी।

➣ प्रमुख राजनीतिक नेताओं का प्रशासनिक अनुभव सीमित होना:- वेवल ने अपने गोपनीय विवरण में यह टिप्पणी की कि जिन राजनीतिक नेताओं को वह भारत की भविष्य की शासन-व्यवस्था में महत्वपूर्ण मानते थे, उनमें से कई ने उच्च प्रशासनिक पदों पर प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं किया था।

➣ उनके अनुसार, इससे कार्यकारिणी परिषद और सरकारी प्रशासन के व्यावहारिक संचालन को लेकर राजनीतिक नेताओं और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच अलग-अलग धारणाएँ बनी हुई थीं।

योजना एवं वार्ता-प्रक्रिया से जुड़े कारण

➣ परिषद की वास्तविक संरचना का प्रश्न सम्मेलन पर छोड़ना:- वेवल योजना ने कार्यकारिणी परिषद के पुनर्गठन के व्यापक सिद्धांत निर्धारित किए, लेकिन सदस्यों की वास्तविक सूची और संरचना पर अंतिम सहमति सम्मेलन में बनाई जानी थी। इसलिए प्रारंभिक चरण में योजना के सिद्धांतों पर सहमति बनने के बाद विवाद का केंद्र परिषद के वास्तविक सदस्यों के चयन पर आ गया।

➣ चयन-विधि को लेकर टकराव:- योजना में राजनीतिक पक्षों से नामों की सूची माँगी जानी थी, लेकिन अंतिम चयन का अधिकार वायसराय के पास रहना था। वेवल ने अपने अधिकार को स्वतंत्र रखा था।

➣ मुस्लिम लीग के लिए समस्या केवल मुस्लिम सदस्यों की संख्या की नहीं, बल्कि इस बात की थी कि उन सदस्यों का चयन किस राजनीतिक संगठन की ओर से माना जाएगा। इसलिए लीग वायसराय के विवेकाधिकार के साथ अपने नामांकन-अधिकार को साझा करने के लिए तैयार नहीं थी।

➣ सीधी बातचीत का अभाव:- 29 जून के बाद लगभग दो सप्ताह तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच परिषद की वास्तविक संरचना पर कोई निर्णायक सीधी बातचीत नहीं हो सकी।

➣ दूसरी ओर, वेवल द्वारा तैयार की गई अस्थायी सूची भी सभी राजनीतिक नेताओं के सामने पूरी तरह नहीं रखी गई। इससे प्रस्तावित नामों पर प्रत्यक्ष बातचीत और संभावित समझौते की गुंजाइश सीमित रही। चावला के अध्ययन के अनुसार, वेवल ने बाद में सम्मेलन की विफलता की जिम्मेदारी का एक हिस्सा स्वयं भी स्वीकार किया।

➣ पर्दे के पीछे की राजनीतिक गतिविधियाँ:- मौलाना आजाद द्वारा राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं से संपर्क और सिख प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कांग्रेस की सक्रियता को मुस्लिम लीग ने अपने राजनीतिक प्रभाव को सीमित करने के प्रयास के रूप में देखा।

➣ दूसरी ओर, कांग्रेस इसे अपने राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व के दावे का हिस्सा मानती थी। इन अलग-अलग धारणाओं ने दोनों पक्षों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और बढ़ाया।

ब्रिटिश पक्ष की सीमाएँ

➣ मुस्लिम लीग के बिना आगे बढ़ने की सीमित संभावना:- 30 जून को वेवल ने ब्रिटिश सरकार और प्रांतीय गवर्नरों से यह जानने का प्रयास किया कि यदि जिन्ना परिषद में शामिल होने के लिए तैयार न हों, तो क्या मुस्लिम लीग के बिना नई कार्यकारिणी परिषद बनाई जा सकती है।

➣ बंगाल और पंजाब के गवर्नरों ने इस विकल्प के प्रति गंभीर आपत्ति व्यक्त की। उनके अनुसार, मुस्लिम लीग को अलग रखकर बनाई गई परिषद को मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक समर्थन प्राप्त करना कठिन होगा। ब्रिटिश सरकार भी इस विकल्प के समर्थन में नहीं थी। इस स्थिति ने व्यवहार में मुस्लिम लीग की सहमति को परिषद के गठन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया।

➣ कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश सरकार का अविश्वास:- चावला के अनुसार, ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र में कांग्रेस के प्रति अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। कांग्रेस के नेताओं की हाल ही में जेल से रिहाई हुई थी और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की स्मृति अभी ताजा थी।

➣ इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों के एक वर्ग के लिए युद्ध के अंतिम चरण में ऐसी अंतरिम परिषद बनाना, जिसमें कांग्रेस का प्रभाव बहुत अधिक हो, प्रशासनिक और राजनीतिक जोखिम से जुड़ा हुआ था।

➣ ब्रिटिश सरकार की युद्धकालीन प्राथमिकताएँ:- द्वितीय विश्वयुद्ध अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था और जापान के विरुद्ध युद्ध जारी था।

➣ इसलिए ब्रिटिश सरकार ऐसी अंतरिम व्यवस्था चाहती थी जिसमें भारतीय राजनीतिक सहयोग तो मिले, लेकिन रक्षा और युद्ध संचालन से संबंधित ब्रिटिश नियंत्रण भी बना रहे। यही कारण था कि वेवल योजना में वायसराय की विशेष शक्तियाँ और कमांडर-इन-चीफ की स्थिति बनाए रखी गई थी।

इतिहासलेखन: असफलता के लिए कौन उत्तरदायी?

➣ शिमला सम्मेलन की विफलता के लिए इतिहासकारों ने अलग-अलग कारणों पर जोर दिया है। एम. इक़बाल चावला के वर्गीकरण के अनुसार, प्रमुख व्याख्याओं को तीन धाराओं में रखा जा सकता है-जिन्ना की अड़चन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बुनियादी मतभेद तथा वेवल की राजनीतिक भूमिका।

➣ चावला इन तीनों व्याख्याओं को पर्याप्त नहीं मानते और पंजाब के यूनियनिस्ट प्रश्न को अधिक महत्वपूर्ण कारण के रूप में सामने रखते हैं। शिमला सम्मेलन के अध्ययन में वेवल के अपने विवरण, ब्रिटिश सरकार के अभिलेख और सम्मेलन से संबंधित समकालीन दस्तावेज महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं।

➣ इनके अतिरिक्त बाद के इतिहासकारों ने सम्मेलन की विफलता की अलग-अलग व्याख्याएँ की हैं। इस अध्याय में एम. इक़बाल चावला के शोध का उपयोग विशेष रूप से उन बिंदुओं पर किया गया है जहाँ वे प्रचलित व्याख्या से अलग तर्क देते हैं।

प्रमुख व्याख्याएँ

➣ जिन्ना की अड़चन: इस व्याख्या के अनुसार सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण जिन्ना द्वारा कार्यकारिणी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार मुस्लिम लीग के लिए सुरक्षित रखने पर जोर देना था।

➣ वेवल के अपने विवरण में भी यही प्रश्न सम्मेलन के अंतिम गतिरोध का प्रमुख कारण बनकर सामने आता है। बाद के कुछ इतिहासकारों ने भी इसी आधार पर सम्मेलन की विफलता की व्याख्या की है।

➣ आलोचना: इस दृष्टिकोण से यह प्रश्न उठता है कि मुस्लिम लीग की इस माँग के पीछे मौजूद कांग्रेस-विरोधी अविश्वास और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर वास्तविक राजनीतिक संघर्ष को कितना महत्व दिया जाए।

➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बुनियादी मतभेद: इस व्याख्या में विफलता को किसी एक व्यक्ति की भूमिका के बजाय दोनों प्रमुख राजनीतिक संगठनों के परस्पर विरोधी दावों का परिणाम माना जाता है।

➣ कांग्रेस स्वयं को सभी भारतीयों का प्रतिनिधि मानती थी, जबकि मुस्लिम लीग मुसलमानों की एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि होने का दावा कर रही थी। पंजाब के प्रधानमंत्री ख़िज़र हयात ख़ान ने भी सम्मेलन की विफलता को कांग्रेस और जिन्ना के बीच मौजूद मूल राजनीतिक मतभेदों से जोड़ा था। इस दृष्टिकोण से शिमला सम्मेलन को उन मतभेदों की निरंतरता के रूप में देखा जाता है जो क्रिप्स मिशन और गांधी–जिन्ना वार्ता में भी सामने आए थे।

➣ कांग्रेस की भूमिका पर मतभेद: कुछ लेखकों ने कांग्रेस की भूमिका को भी सम्मेलन की विफलता से जोड़ा है। चावला के उद्धृत डब्ल्यू. सी. स्मिथ के अनुसार, कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह आशा थी कि मुस्लिम लीग को राजनीतिक रूप से कमजोर या अलग-थलग किया जा सकता है।

➣ दूसरी ओर, पेंडरेल मून ने भारत छोड़ो आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर ब्रिटिश सरकार के साथ राजनीतिक सहयोग की इच्छा की ओर संकेत किया है। इन दोनों दृष्टिकोणों से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस की भूमिका का मूल्यांकन इतिहासकारों में एक जैसा नहीं है।

➣ वेवल की व्यक्तिगत भूमिका: कुछ इतिहासकारों ने वेवल की सैनिक पृष्ठभूमि और सीमित राजनीतिक अनुभव को सम्मेलन की विफलता से जोड़ा है। इस दृष्टिकोण के अनुसार वेवल भारतीय राजनीतिक दलों के बीच जटिल राजनीतिक दावों और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को पर्याप्त राजनीतिक दृष्टि से नहीं संभाल सके। हालांकि चावला इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते।

➣ उनके अनुसार वेवल में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव नहीं था, बल्कि वे भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में बनाए रखने और पंजाब के गैर-लीगी मुस्लिम नेतृत्व को महत्व देने की दिशा में सोच रहे थे। चावला के अनुसार, जिन्ना इस दृष्टिकोण से परिचित थे और इसी कारण वे वेवल की निष्पक्षता को लेकर आशंकित थे।

➣ लीग-केंद्रित दृष्टिकोण: मुस्लिम लीग के दृष्टिकोण से सम्मेलन की समस्या यह थी कि वायसराय ने मुस्लिम सदस्यों के चयन का अंतिम अधिकार अपने पास रखा और गैर-लीगी मुसलमानों को भी परिषद में शामिल करने की संभावना बनाए रखी।

➣ जिन्ना के लिए यह केवल कुछ सदस्यों के नाम का प्रश्न नहीं था, बल्कि मुस्लिम लीग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और दर्जे का प्रश्न था। चावला के अनुसार, 1945 के उपचुनावों में लीग की सफलता को देखते हुए जिन्ना का यह दावा पूरी तरह निराधार नहीं था कि लीग मुसलमानों के बीच सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संगठन बन चुकी थी।

➣ आलोचना: दूसरी ओर, वेवल की दृष्टि से सभी मुस्लिम सदस्यों को लीग के नामांकन पर निर्भर करना और परिषद में दो-तिहाई बहुमत की शर्त स्वीकार करना कार्यकारिणी के सामान्य कामकाज को कठिन बना सकता था।

➣ यूनियनिस्ट एवं पंजाब कारक-चावला की वैकल्पिक व्याख्या: चावला सम्मेलन की विफलता में पंजाब के यूनियनिस्ट प्रश्न को विशेष महत्व देते हैं। उनके अनुसार, ख़िज़र हयात ख़ान का एक पंजाबी मुसलमान को कार्यकारिणी परिषद में शामिल कराने का आग्रह वेवल के लिए गंभीर समस्या बन गया था।

➣ वेवल पंजाब की राजनीतिक स्थिति और उसके सैन्य महत्व को देखते हुए यूनियनिस्ट नेतृत्व की माँग को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करना चाहते थे। चावला का निष्कर्ष है कि इस पंजाब कारक ने वेवल को ऐसी स्थिति में डाल दिया जिसमें वे मुस्लिम लीग की सभी माँगें स्वीकार नहीं कर सकते थे। यह चावला की विशिष्ट व्याख्या है और इसे सर्वसम्मत इतिहासलेखन नहीं माना जाता।

➣ सरकारी विवरण और विफलता की व्याख्या: चावला यह प्रश्न भी उठाते हैं कि सम्मेलन की विफलता के बाद तैयार किए गए आधिकारिक विवरणों में जिन्ना की भूमिका को कितना प्रमुख स्थान दिया गया। उनके अनुसार, पंजाब के गवर्नर सर बर्ट्रेंड ग्लैंसी की भूमिका और ख़िज़र की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए प्रांतीय हितों का भी प्रभाव हो सकता था।

➣ चावला का तर्क है कि विफलता का पूरा भार जिन्ना की अड़चन पर डालने से पंजाब के इस पहलू की उपेक्षा होती है। यह एक इतिहासलेखन संबंधी तर्क है; इसलिए इसे चावला की व्याख्या के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।

➣ निष्कर्ष: शिमला सम्मेलन की विफलता को केवल किसी एक नेता की व्यक्तिगत जिद से समझना पर्याप्त नहीं है। मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के विरोधी दावे सम्मेलन के केंद्र में थे; जिन्ना द्वारा सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन के अधिकार पर जोर देना तत्काल गतिरोध का प्रमुख कारण बना।

➣ साथ ही, कांग्रेस–लीग के व्यापक राजनीतिक मतभेद, वायसराय की भूमिका और पंजाब के यूनियनिस्ट प्रश्न ने समझौते की संभावनाओं को और जटिल बनाया। इसलिए इतिहासलेखन में विभिन्न व्याख्याओं को उनके संबंधित स्रोत और दृष्टिकोण के संदर्भ में पढ़ना अधिक उचित है।

किसने किसे उत्तरदायी ठहराया: सार-सारणी

व्यक्ति / दृष्टिकोणमुख्य कारण या उत्तरदायित्वआधार
वेवलतात्कालिक रूप से जिन्ना की मुस्लिम प्रतिनिधित्व संबंधी माँग; गहरे स्तर पर कांग्रेस और हिंदुओं के प्रति मुस्लिम अविश्वास15 जुलाई का गोपनीय विवरण
आज़ाद / कांग्रेसमुस्लिम लीग को विशेष राजनीतिक अधिकार देने तथा एक समूह को प्रभावी वीटो देने वाली ब्रिटिश नीति14 जुलाई की बैठक और 17 जुलाई का वक्तव्य
गांधीकांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गहरा राजनीतिक मतभेद; अंततः ब्रिटिश सरकार को यह तय करना होगा कि वह किस राजनीतिक पक्ष के साथ आगे बढ़ सकती हैवेवल से अंतिम बातचीत का विवरण
जिन्ना / मुस्लिम लीगवायसराय द्वारा मुस्लिम सदस्यों के चयन का अधिकार अपने पास रखना और गैर-लीगी मुसलमानों को शामिल करने की संभावना14 जुलाई की पत्रकार-वार्ता
ख़िज़र हयात ख़ानकांग्रेस और जिन्ना के बीच मौजूद मूल राजनीतिक मतभेदसम्मेलन के बाद का वक्तव्य
चावलापंजाब का यूनियनिस्ट प्रश्न तथा वेवल की भारत और पंजाब संबंधी राजनीतिक सोचWavell Papers और Transfer of Power पर आधारित अध्ययन
वी. पी. मेननवेवल की व्यक्तिगत भूमिका से अधिक ब्रिटिश सरकार का मुस्लिम लीग के बिना परिषद बनाने के लिए तैयार न होनाThe Transfer of Power in India
एच. वी. हॉडसनवेवल का जिन्ना के दबाव के बावजूद अपनी योजना पर दृढ़ न रहनाThe Great Divide

पाठ्यपुस्तकीय एवं परीक्षा-उन्मुख रूप: मानक विवरण

➣ प्रतियोगी परीक्षाओं में वेवल योजना का जो संक्षिप्त रूप प्रचलित है, उसमें योजना के कुछ प्रमुख बिंदुओं को सरल और निश्चित रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह विवरण मूल ब्रिटिश अभिलेखों की अपेक्षा अधिक संक्षिप्त है। इसलिए नीचे पहले पाठ्यपुस्तकीय एवं परीक्षा-उन्मुख रूप दिया गया है और उसके बाद मूल अभिलेखों से दिखाई देने वाले प्रमुख अंतर स्पष्ट किए गए हैं।

योजना के मुख्य बिंदु

➣ गवर्नर-जनरल और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के सभी सदस्य भारतीय होने थे।

➣ कार्यकारिणी परिषद में सवर्ण हिंदुओं (Caste Hindus) और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाना था। अन्य प्रमुख समुदायों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाना था।

➣ पुनर्गठित कार्यकारिणी परिषद भारत शासन अधिनियम, 1935 के मौजूदा संवैधानिक ढाँचे के भीतर अंतरिम सरकार की तरह कार्य करती। यह केंद्रीय विधायिका के प्रति संसदीय अर्थ में उत्तरदायी नहीं होती।

➣ गवर्नर-जनरल की वीटो तथा अन्य आरक्षित शक्तियाँ बनी रहतीं। पाठ्यपुस्तकीय विवरणों में इनके सामान्यतः संयमित प्रयोग की बात कही जाती है, जबकि मूल संवैधानिक व्यवस्था में सुरक्षा, शांति और ब्रिटिश भारत के हितों से जुड़े मामलों में वायसराय की विशेष शक्तियाँ बनी हुई थीं।

➣ विभिन्न राजनीतिक दलों और समूहों से कार्यकारिणी परिषद के लिए नामों की सूची प्राप्त की जानी थी। सहमति से संयुक्त सूची न बनने पर अलग-अलग सूचियों के आधार पर चयन किया जा सकता था।

➣ योजना ने भारत के भावी स्थायी संविधान के स्वरूप को पहले से निर्धारित नहीं किया था। इसलिए युद्ध समाप्त होने के बाद नए संविधान पर आगे बातचीत की संभावना खुली रखी गई थी।

➣ विदेश विभाग का उत्तरदायित्व एक भारतीय सदस्य को दिया जाना था, जबकि रक्षा विभाग कमांडर-इन-चीफ के अधीन रहता।

➣ वेवल ने ब्रिटिश सरकार से योजना पर विचार-विमर्श के लिए मई 1945 में लंदन की यात्रा की। इसके बाद योजना को 14 जून 1945 को भारत और ब्रिटेन में एक साथ सार्वजनिक किया गया। ब्रिटेन में इसकी घोषणा भारत सचिव लियो एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में की, जबकि वेवल ने भारत में रेडियो प्रसारण के माध्यम से इसकी जानकारी दी।

प्रतिक्रियाओं का मानक वर्णन

➣ कांग्रेस: कांग्रेस ने इस व्यवस्था में उसे केवल सवर्ण हिंदू प्रतिनिधित्व तक सीमित करने की संभावना पर आपत्ति की। उसका तर्क था कि कांग्रेस स्वयं को सभी भारतीयों का प्रतिनिधि राजनीतिक संगठन मानती है और इसलिए वह अपने नामांकित सदस्यों में मुसलमानों सहित विभिन्न समुदायों के व्यक्तियों को शामिल करने का अधिकार रखती है।

➣ शिमला में कांग्रेस का औपचारिक प्रतिनिधित्व मौलाना अबुल कलाम आजाद के नेतृत्व में था और कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय एवं धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर बल दिया।

➣ मुस्लिम लीग: मुस्लिम लीग चाहती थी कि कार्यकारिणी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य उसी की ओर से नामित किए जाएँ। जिन्ना का तर्क था कि केवल संख्या में समानता पर्याप्त नहीं होगी, क्योंकि अनुसूचित जातियों, सिखों और अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों के कांग्रेस के साथ राजनीतिक रूप से निकट होने की स्थिति में मुस्लिम सदस्य व्यवहार में अल्पमत में रह सकते हैं। जिन्ना ने मुस्लिम हितों की सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था की भी माँग की जिसमें मुस्लिम सदस्य के विरोध वाले महत्वपूर्ण निर्णय के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक हो।

➣ वेवल का निर्णय: जिन्ना सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार मुस्लिम लीग को देने की अपनी माँग पर कायम रहे और वेवल इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद नई कार्यकारिणी परिषद के गठन पर सहमति नहीं बन सकी और 14 जुलाई 1945 को वेवल ने शिमला सम्मेलन की विफलता की घोषणा कर दी।

पाठ्यपुस्तकीय निष्कर्ष और उसकी सीमा

➣ परीक्षा-उन्मुख पुस्तकों में शिमला सम्मेलन की विफलता को कई बार वेवल की भूल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस व्याख्या के अनुसार, वार्ता समाप्त करके वेवल ने मुस्लिम लीग को आभासी वीटो जैसी राजनीतिक स्थिति दे दी, क्योंकि इसके बाद किसी व्यापक अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था के लिए लीग की सहमति व्यवहार में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।

➣ इस व्याख्या के अनुसार, सम्मेलन की विफलता से मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति मजबूत हुई और 1945-46 के चुनावों में उसके प्रभाव का प्रदर्शन हुआ। हालांकि इसे सम्मेलन की विफलता का बाद का राजनीतिक प्रभाव समझना चाहिए, न कि मूल योजना में लीग को दिया गया कोई औपचारिक अधिकार।

➣ दूसरी ओर, मूल अभिलेख बताते हैं कि लीग के बिना आगे बढ़ने का प्रश्न केवल वेवल के व्यक्तिगत निर्णय तक सीमित नहीं था। 30 जून 1945 को वेवल ने ब्रिटिश सरकार और प्रांतीय गवर्नरों से इस विकल्प पर विचार किया था, लेकिन ब्रिटिश सरकार तथा बंगाल और पंजाब के गवर्नरों ने इसके प्रति समर्थन नहीं दिया। इसलिए “वेवल ने अकेले लीग को वीटो दे दिया” कहना मूल दस्तावेजों की तुलना में अधिक सरलीकृत निष्कर्ष होगा।

➣ इसी कारण पाठ्यपुस्तकीय निष्कर्ष और मूल अभिलेखों के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। पाठ्यपुस्तकीय विवरण परीक्षा के लिए उपयोगी संक्षिप्त रूप देता है, जबकि मूल दस्तावेज सम्मेलन की विफलता में जिन्ना की माँग, कांग्रेस-लीग के प्रतिनिधित्व संबंधी विवाद और ब्रिटिश सरकार की अपनी सीमाओं को साथ में दिखाते हैं।

पाठ्यपुस्तक बनाम मूल दस्तावेज़: जहाँ अंतर दिखता है

बिंदुपाठ्यपुस्तकीय रूपमूल अभिलेखों से स्थिति
गवर्नर-जनरल का वीटोमंत्रियों की सलाह पर प्रयोग तथा सामान्यतः संयमित उपयोग।मूल संवैधानिक व्यवस्था में वायसराय की आरक्षित शक्तियाँ बनी रहीं। हाउस ऑफ लॉर्ड्स में दिए गए विवरण के अनुसार, सुरक्षा, शांति या ब्रिटिश भारत के हितों पर गंभीर प्रभाव पड़ने की स्थिति में वे परिषद के बहुमत को पलट सकते थे।
मुस्लिम सदस्यों की संख्याकई परीक्षा-सारांशों में 14 में से 6 मुस्लिम बताए जाते हैं।14 जून की आधिकारिक घोषणा में मुस्लिम सदस्यों की निश्चित संख्या निर्धारित नहीं की गई थी। वेवल की 11 जुलाई की अस्थायी सूची में 5 मुस्लिम थे-4 मुस्लिम लीग से और 1 पंजाब का गैर-लीगी मुसलमान।
“वेवल ने वीटो दिया”सम्मेलन समाप्त करके वेवल ने मुस्लिम लीग को आभासी वीटो दे दिया।यह बाद की राजनीतिक व्याख्या है। मूल अभिलेखों में 30 जून को लीग के बिना आगे बढ़ने के विकल्प पर ब्रिटिश सरकार और प्रांतीय गवर्नरों का समर्थन नहीं मिला। इसलिए इसे केवल वेवल के व्यक्तिगत निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
लंदन यात्रामई 1945 में वेवल ने लंदन जाकर योजना पर चर्चा की।14 जून की आधिकारिक घोषणा में वेवल की “हाल की यात्रा” का उल्लेख है और अन्य समकालीन स्रोत मई 1945 की लंदन यात्रा को दर्ज करते हैं। इसलिए मई 1945 को परीक्षा-उन्मुख विवरण में रखना उचित है।
अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्वकुछ बाद के परीक्षा-सारांशों में डॉ. आंबेडकर का नाम दिया जाता है।शिमला सम्मेलन की आमंत्रण-सूची में राय बहादुर एन. शिवराज अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल थे। वेवल की 11 जुलाई की अस्थायी सूची के विवरण में अनुसूचित जातियों के लिए दो स्थान बताए गए हैं। इसलिए आमंत्रण-सूची और बाद की अस्थायी चयन-सूची को अलग-अलग समझना चाहिए।

शिमला के बाद: चुनाव, कैबिनेट मिशन और वेवल की ब्रेकडाउन योजना

➣ ब्रिटेन में सत्ता-परिवर्तन: वेवल योजना की घोषणा 14 जून 1945 को उस समय हुई जब ब्रिटेन में आम चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी। 26 जुलाई 1945 को चुनाव परिणाम आने के बाद क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर सरकार सत्ता में आई और लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस भारत सचिव बने।

➣ शिमला सम्मेलन के बाद वेवल द्वारा तैयार किया गया 15 जुलाई 1945 का गोपनीय विवरण नई ब्रिटिश सरकार के समक्ष भारत की राजनीतिक स्थिति पर विचार के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बना।

➣ भारत में चुनावों की घोषणा: ब्रिटिश सरकार ने भारत में केंद्रीय और प्रांतीय चुनाव कराने तथा उनके बाद नई कार्यकारिणी परिषद के गठन और संविधान-निर्मात्री निकाय की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की घोषणा की।

➣ चुनावों की प्रक्रिया की घोषणा अगस्त 1945 में की गई और वेवल ने 19 सितंबर 1945 के प्रसारण में भी इसकी जानकारी दी। शिमला सम्मेलन के दौरान बंगाल के गवर्नर आर. जी. केसी ने भी यह विचार व्यक्त किया था कि चुनाव कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व संबंधी दावों की वास्तविक राजनीतिक स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।

➣ 1945-46 के चुनावों का परिणाम: दिसंबर 1945 के केंद्रीय चुनावों में निर्वाचित 102 सीटों में कांग्रेस ने 57 और मुस्लिम लीग ने 30 सीटें जीतीं। लीग ने सभी 30 मुस्लिम आरक्षित सीटें जीत लीं।

➣ इसके बाद 1946 के प्रांतीय चुनावों में कुल 1585 सीटों में कांग्रेस ने लगभग 923 सीटें जीतीं, जबकि मुस्लिम लीग ने आरक्षित 492 मुस्लिम सीटों में 429 सीटें, अर्थात लगभग 87 प्रतिशत, प्राप्त कीं।

➣ इन परिणामों ने एक ओर कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक आधार और दूसरी ओर मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम लीग की मजबूत स्थिति को स्पष्ट किया। इससे जिन्ना के मुस्लिम लीग को भारतीय मुसलमानों का प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि मानने के दावे को महत्वपूर्ण चुनावी आधार मिला।

➣ कैबिनेट मिशन: चुनावों के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने के लिए मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भेजा। इसके तीन सदस्य लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्जेंडर थे।

➣ मिशन की वार्ताओं में संविधान-निर्माण के साथ-साथ अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व तथा मुस्लिम सदस्यों के चयन का प्रश्न भी महत्वपूर्ण बना रहा। इस प्रकार शिमला सम्मेलन में सामने आया प्रतिनिधित्व का विवाद नई राजनीतिक परिस्थितियों में फिर उभरा।

वेवल की ब्रेकडाउन योजना (1945-47)

➣ योजना का विकास: वेवल की ब्रेकडाउन योजना शिमला सम्मेलन की कोई औपचारिक योजना नहीं थी और न ही यह कैबिनेट मिशन के बाद अचानक बनी। शिमला सम्मेलन की विफलता के बाद ही वेवल और उनके सलाहकारों ने ब्रिटिश सत्ता की संभावित वापसी की वैकल्पिक योजना पर विचार शुरू कर दिया था।

➣ एवन जेनकिंस, वी. पी. मेनन, बी. एन. राउ और एबेल जैसे अधिकारियों के साथ इस विषय पर विचार-विमर्श हुआ। 5 दिसंबर 1945 को वेवल ने पेथिक-लॉरेंस को संकेत दिया कि ऐसी योजना पर काम चल रहा था। इसका अधिक विकसित रूप 1946 में सामने आया।

➣ इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति के लिए तैयारी करना था जिसमें भारतीय राजनीतिक दलों के बीच संवैधानिक समझौता न हो सके और ब्रिटिश सरकार को सुरक्षित तथा व्यवस्थित ढंग से भारत से पीछे हटना पड़े।

➣ वेवल की सोच में ब्रिटिश वापसी को ऐसी परिस्थिति से बचाना भी शामिल था जिसमें प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था अचानक टूट जाए। योजना का एक पक्ष यह भी था कि जहाँ संभव हो, प्रशासन भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को क्रमिक रूप से सौंपा जाए और ब्रिटिश सैन्य तथा प्रशासनिक उपस्थिति धीरे-धीरे कम की जाए।

➣ प्रस्तावित योजना के प्रारंभिक रूपों में बंबई, मद्रास, उड़ीसा और मध्य प्रांत जैसे अपेक्षाकृत हिंदू-बहुल प्रांतों से ब्रिटिश सेना, अधिकारियों और यूरोपीय नागरिकों की क्रमिक वापसी तथा वहाँ प्रशासन भारतीय हाथों में सौंपने की संभावना पर विचार किया गया।

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➣ प्रारंभिक विचारों में बिहार और संयुक्त प्रांत को भी इस चरण में शामिल करने की संभावना थी। इसके बाद मुस्लिम-बहुल उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों से ब्रिटिश वापसी की जानी थी। इस प्रकार योजना का एक संभावित क्रम दक्षिण से उत्तर की ओर ब्रिटिश वापसी का था।

➣ सत्ता-हस्तांतरण की समय-सीमा: वेवल का विचार था कि यदि ब्रिटिश सरकार सत्ता-हस्तांतरण की कोई स्पष्ट समय-सीमा घोषित करे, तो इससे भारतीय राजनीतिक दलों पर आपसी समझौता करने का दबाव बढ़ सकता है। 1946 के अंत में 31 मार्च 1948 तक ब्रिटिश वापसी की संभावना पर भी विचार किया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार ने वेवल की निश्चित समय-सीमा वाली वापसी योजना को स्वीकार नहीं किया। 1946 के दौरान इस प्रश्न पर मंत्रिमंडल और भारत संबंधी समिति में विचार हुआ तथा वर्ष के अंत में वेवल को लंदन बुलाकर भारत की स्थिति पर चर्चा की गई।

➣ 3 जनवरी 1947 को भारत और बर्मा समिति ने वेवल की योजना को आगे न बढ़ाने का निर्णय किया और 8 जनवरी 1947 को एटली ने यह निर्णय वेवल को बताया।

➣ इसके पीछे संसद से आवश्यक कानूनी अधिकार प्राप्त करने की आवश्यकता, दक्षिणी प्रांतों को पहले अलग-अलग रूप में हस्तांतरित करने से उत्पन्न संभावित राजनीतिक प्रभाव, सेना के विभाजन की आशंका और ब्रिटिश वापसी को केवल सैन्य वापसी की तरह न दिखाने की चिंता जैसे कारण थे।

➣ 1946 के अंत तक वेवल और ब्रिटिश मंत्रिमंडल के बीच भारत की राजनीतिक दिशा को लेकर मतभेद स्पष्ट हो चुके थे। विदेश सचिव अर्नेस्ट बेविन सहित कुछ ब्रिटिश नेताओं ने वेवल की नीति और उनके दृष्टिकोण की आलोचना की।

➣ अंततः 20 फरवरी 1947 को एटली ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत में सत्ता भारतीय हाथों में हस्तांतरित करेगी। इसी घोषणा के साथ वेवल के स्थान पर लॉर्ड लुई माउंटबेटन को नया वायसराय नियुक्त किए जाने की जानकारी दी गई।

वेवल योजना एवं शिमला सम्मेलन का महत्व

➣ वेवल योजना लागू नहीं हो सकी और शिमला सम्मेलन भी किसी समझौते पर समाप्त नहीं हुआ। फिर भी इन घटनाओं का महत्व 1945-46 के संवैधानिक और राजनीतिक संक्रमण को समझने में है। इसका महत्व मुख्यतः संवैधानिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर देखा जा सकता है।

संवैधानिक महत्व

➣ भारतीयकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम:- वेवल योजना ने वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के सभी सदस्यों को भारतीय बनाने का प्रस्ताव रखा। साथ ही गृह और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों सहित विदेश विभाग भी भारतीय सदस्य को देने की बात कही गई थी।

➣ इस प्रकार योजना ने केंद्रीय प्रशासन में भारतीय भागीदारी को उस समय की संवैधानिक व्यवस्था के भीतर एक महत्वपूर्ण स्तर तक बढ़ाने का प्रयास किया। ब्रिटिश सरकार ने इसे वर्तमान संविधान के भीतर संभव अधिकतम प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया था।

➣ विदेश विभाग का भारतीयकरण:- योजना में विदेश विभाग को एक भारतीय सदस्य के अधीन रखने तथा विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भारतीय प्रतिनिधियों की नियुक्ति का प्रस्ताव था। यह केंद्रीय शासन में भारतीयों को पहले की तुलना में अधिक व्यापक जिम्मेदारी देने का संकेत था।

➣ हालांकि इसे पूर्ण स्वशासन या डोमिनियन स्टेटस की प्राप्ति नहीं माना जा सकता, क्योंकि वायसराय की विशेष शक्तियाँ और रक्षा पर ब्रिटिश नियंत्रण बने रहने वाले थे।

➣ सामुदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को केंद्रीय स्थान:- शिमला सम्मेलन में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व का प्रश्न कार्यकारिणी परिषद की संरचना का प्रमुख आधार बना।

➣ इससे स्पष्ट हुआ कि अंतरिम शासन की रचना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का प्रश्न नहीं रह गई थी, बल्कि विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से सीधे जुड़ गई थी। यही प्रश्न आगे 1946 में अंतरिम सरकार के गठन की वार्ताओं में भी महत्वपूर्ण रहा।

➣ राजनीतिक संवाद की पुनर्बहाली:- भारत छोड़ो आंदोलन के बाद लंबे राजनीतिक गतिरोध के बीच वेवल ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य प्रमुख राजनीतिक समूहों के नेताओं को एक साथ बातचीत के लिए बुलाया। यद्यपि सम्मेलन सफल नहीं हुआ, फिर भी इसने ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के बीच उच्च स्तर की संवैधानिक वार्ता को पुनः सक्रिय किया।

राजनीतिक परिणाम

➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व-विवाद की स्पष्टता:- शिमला सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरिम सरकार का गठन केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं था। मुख्य विवाद यह था कि मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किसके माध्यम से होगा।

➣ कांग्रेस अपने सर्वभारतीय प्रतिनिधित्व के दावे के आधार पर मुस्लिम सदस्यों को भी नामित करने का अधिकार चाहती थी, जबकि मुस्लिम लीग सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार अपने पास रखना चाहती थी। यह मतभेद आगे की संवैधानिक वार्ताओं में भी बना रहा।

➣ मुस्लिम लीग के प्रतिनिधित्व संबंधी दावे को चुनावी आधार मिला:- 1945-46 के चुनावों में कांग्रेस ने व्यापक राजनीतिक आधार प्रदर्शित किया, जबकि मुस्लिम लीग ने मुस्लिम आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में सीटें जीतीं।

➣ इस परिणाम ने मुस्लिम लीग के इस दावे को महत्वपूर्ण चुनावी आधार दिया कि वह भारतीय मुसलमानों के बीच प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि है। इस प्रकार शिमला सम्मेलन में उठे प्रतिनिधित्व के प्रश्न को चुनावों के बाद एक नया राजनीतिक संदर्भ मिला।

➣ पंजाब की राजनीति में परिवर्तन:- शिमला सम्मेलन के दौरान ख़िज़र हयात ख़ान और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व का विवाद विशेष रूप से सामने आया। 1946 के प्रांतीय चुनावों के बाद पंजाब में मुस्लिम लीग की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई और यूनियनिस्ट नेतृत्व पर दबाव बढ़ा।

➣ हालांकि शिमला सम्मेलन को सीधे यूनियनिस्ट पार्टी के पतन का कारण मानना उचित नहीं होगा; यह परिवर्तन 1946 के चुनावों और उसके बाद पंजाब की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों से भी जुड़ा था।

➣ सिख प्रश्न का संवैधानिक महत्व बढ़ा:- शिमला सम्मेलन में सिख प्रतिनिधित्व और पंजाब के भावी राजनीतिक स्वरूप का प्रश्न सामने आया।

➣ पाकिस्तान की संभावना को लेकर सिख नेतृत्व की चिंता आगे कैबिनेट मिशन और 1947 की संवैधानिक वार्ताओं में भी बनी रही। इस प्रकार शिमला सम्मेलन ने पंजाब से जुड़े सामुदायिक और क्षेत्रीय प्रश्नों को व्यापक संवैधानिक समस्या के साथ जोड़ दिया।

➣ कैबिनेट मिशन की पृष्ठभूमि:- शिमला सम्मेलन में अंतरिम सरकार और प्रतिनिधित्व का प्रश्न हल न होने के बाद ब्रिटिश सरकार को अधिक व्यापक संवैधानिक पहल करनी पड़ी। 1946 में कैबिनेट मिशन ने इसी व्यापक समस्या के समाधान के लिए भारत के भावी संविधान और अंतरिम सरकार दोनों पर बातचीत की। मिशन ने भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व तथा अंतरिम सरकार में दोनों की भागीदारी के प्रश्न पर अलग-अलग प्रस्तावों पर विचार किया।

➣ अंतरिम सरकार की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण:- 1946 में कैबिनेट मिशन की वार्ताओं के दौरान छह कांग्रेस प्रतिनिधियों, पाँच मुस्लिम लीग प्रतिनिधियों और तीन अन्य अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों वाली अंतरिम सरकार की संरचना पर विचार किया गया।

➣ हालांकि यह व्यवस्था वेवल योजना की समान प्रतिनिधित्व व्यवस्था की हूबहू निरंतरता नहीं थी, फिर भी इससे स्पष्ट होता है कि सामुदायिक संतुलन और प्रमुख दलों के बीच प्रतिनिधित्व का प्रश्न अंतरिम सरकार के गठन में बना रहा।

योजना की सीमाएँ

➣ सामुदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व की जटिलता:- कार्यकारिणी परिषद की संरचना में समुदायों के आधार पर प्रतिनिधित्व निर्धारित करने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न और जटिल हो गया।

➣ विशेष रूप से सवर्ण हिंदू और मुस्लिम जैसी श्रेणियों के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने से कांग्रेस के सर्वभारतीय प्रतिनिधित्व के दावे और मुस्लिम लीग के पृथक मुस्लिम प्रतिनिधित्व के दावे के बीच टकराव बढ़ा।

➣ मूल राजनीतिक समस्या का समाधान नहीं:- वेवल योजना का उद्देश्य अंतरिम प्रशासन में भारतीय भागीदारी बढ़ाना था, लेकिन उसने भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था और कांग्रेस-लीग के मूल राजनीतिक मतभेदों का समाधान नहीं किया। योजना स्वयं भी भारत के स्थायी संविधान के स्वरूप को पहले से निर्धारित नहीं करती थी।

➣ वायसराय की विशेष शक्तियाँ बनी रहीं:- योजना में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने के बावजूद वायसराय की संवैधानिक स्थिति और विशेष शक्तियाँ समाप्त नहीं की गई थीं। इसलिए यह व्यवस्था पूर्ण उत्तरदायी केंद्रीय सरकार की स्थापना नहीं थी।

➣ मुस्लिम लीग की सहमति का प्रश्न:- ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम लीग के बिना आगे बढ़ने का विकल्प स्वीकार नहीं किया। इससे व्यवहार में लीग की सहमति अंतरिम राजनीतिक व्यवस्था के गठन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।

➣ बाद की पाठ्यपुस्तकीय व्याख्याओं में इसे कभी-कभी आभासी वीटो कहा गया है, लेकिन इसे कोई औपचारिक संवैधानिक वीटो नहीं समझना चाहिए।

महत्वपूर्ण तथ्य

➣ लॉर्ड वेवल अक्टूबर 1943 में लॉर्ड लिनलिथगो के बाद भारत के वायसराय बने। इससे पहले वे भारत के कमांडर-इन-चीफ थे।

➣ वेवल योजना की घोषणा 14 जून 1945 को भारत सचिव लियो एमरी ने ब्रिटिश संसद में की, जबकि वेवल ने भारत में रेडियो प्रसारण के माध्यम से इसकी घोषणा की।

➣ वेवल योजना में वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के सभी सदस्यों को भारतीय बनाने तथा सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव था।

➣ योजना में क्रिप्स प्रस्ताव (1942) की मूल प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने की बात कही गई थी। इसके साथ ही कांग्रेस कार्यसमिति के शेष बंदी सदस्यों की रिहाई की घोषणा की गई।

➣ वेवल योजना में भारत की स्वतंत्रता की निश्चित समय-सीमा या संविधान सभा के गठन की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिम व्यवस्था के रूप में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन करना था।

➣ शिमला सम्मेलन (25 जून–14 जुलाई 1945) की अध्यक्षता लॉर्ड वेवल ने की। महात्मा गांधी सम्मेलन के औपचारिक प्रतिनिधि नहीं थे, जबकि कांग्रेस का प्रतिनिधित्व उसके अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया।

➣ कांग्रेस ने इस आधार पर आपत्ति की कि उसे केवल सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता और उसे अन्य समुदायों, जिनमें मुसलमान भी शामिल थे, के सदस्यों को नामित करने का अधिकार होना चाहिए।

➣ मुहम्मद अली जिन्ना की माँग थी कि कार्यकारिणी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्यों को मुस्लिम लीग नामित करे। वेवल द्वारा यह माँग स्वीकार न किए जाने से सम्मेलन विफल हो गया।

➣ 1945 के ब्रिटिश आम चुनाव में लेबर पार्टी की विजय के बाद क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने और लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस भारत सचिव नियुक्त हुए।

➣ 1945 के केंद्रीय चुनावों में कांग्रेस ने 102 निर्वाचित सीटों में से 57 सीटें जीतीं, जबकि मुस्लिम लीग ने सभी 30 मुस्लिम सीटें जीतीं। 1946 के प्रांतीय चुनावों में लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित 492 सीटों में से 429 सीटें प्राप्त कीं।

➣ वेवल की ब्रेकडाउन योजना ब्रिटिश भारत से चरणबद्ध वापसी की एक वैकल्पिक योजना थी। ब्रिटिश सरकार ने इसे आगे नहीं बढ़ाया और अंततः 20 फरवरी 1947 को एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की।

➣ लॉर्ड लुई माउंटबेटन को वेवल के स्थान पर नया वायसराय नियुक्त किया गया। वे भारत के अंतिम वायसराय बने।

वेवल योजना: एक नज़र में

बिंदुविवरण
घोषणा14 जून 1945 को लंदन में भारत सचिव लियो एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में और दिल्ली में लॉर्ड वेवल ने रेडियो प्रसारण के माध्यम से एक साथ योजना की घोषणा की।
प्रमुख व्यक्तिवायसराय लॉर्ड वेवल और भारत सचिव लियो एमरी योजना के प्रमुख व्यक्ति थे। योजना पर वेवल ने मई 1945 में लंदन में ब्रिटिश सरकार से विचार-विमर्श किया था।
संवैधानिक आधारभारत शासन अधिनियम, 1935 के मौजूदा ढाँचे के भीतर कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन किया जाना था। इसके लिए उसकी नौवीं अनुसूची में एक संशोधन आवश्यक था, जिससे कार्यकारिणी के सदस्यों के लिए भारत में दस वर्ष की ताज-सेवा की शर्त हटाई जा सके।
मुख्य प्रस्ताववायसराय एवं कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के सभी सदस्य भारतीय होने थे। सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाना था तथा सिखों, अनुसूचित जातियों और अन्य विशेष हितों को भी प्रतिनिधित्व मिलना था। विदेश विभाग भारतीय सदस्य को सौंपने का प्रस्ताव था।
सम्मेलन25 जून–14 जुलाई 1945 तक शिमला के वायसरीगल लॉज में सम्मेलन हुआ। लगभग 22 प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया गया था।
प्रमुख प्रतिनिधिकांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम आजाद, मुस्लिम लीग की ओर से मुहम्मद अली जिन्ना, सिखों की ओर से मास्टर तारा सिंह और अनुसूचित जातियों की ओर से राय बहादुर एन. शिवराज प्रमुख प्रतिनिधियों में थे। महात्मा गांधी शिमला में मौजूद थे, लेकिन सम्मेलन के औपचारिक प्रतिनिधि नहीं थे।
मुख्य विवादमुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार मुख्य विवाद बना। मुस्लिम लीग सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार अपने पास चाहती थी, जबकि कांग्रेस इस अधिकार को केवल लीग तक सीमित करने के पक्ष में नहीं थी।
जिन्ना की प्रमुख माँगेंजिन्ना चाहते थे कि सभी मुस्लिम सदस्य मुस्लिम लीग द्वारा नामित किए जाएँ। साथ ही उन्होंने मुस्लिम सदस्यों के विरुद्ध किसी निर्णय को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की व्यवस्था की माँग की।
परिणाम14 जुलाई 1945 को वेवल ने शिमला सम्मेलन की विफलता की घोषणा की।
बाद की कड़ीब्रिटेन में लेबर सरकार (जुलाई 1945) → 1945–46 के चुनाव → कैबिनेट मिशन (1946)।

घटनाक्रम (Timeline)

तिथिघटना
अक्टूबर 1943लॉर्ड वेवल लिनलिथगो के उत्तराधिकारी के रूप में भारत के वायसराय बने।
9–27 सितम्बर 1944गांधी-जिन्ना वार्ता राजाजी सूत्र के आधार पर हुई, लेकिन किसी समझौते पर सहमति नहीं बन सकी।
जनवरी 1945देसाई-लियाकत प्रस्ताव के माध्यम से अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समान प्रतिनिधित्व का विचार सामने आया, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ सका।
मई 1945वेवल की लंदन यात्रा के दौरान उन्होंने प्रस्तावित योजना पर ब्रिटिश सरकार से विचार-विमर्श किया और भारत लौटने के बाद इसे आगे बढ़ाया।
14 जून 1945लंदन और दिल्ली में वेवल योजना की घोषणा की गई। इसी के साथ कांग्रेस कार्यसमिति के शेष बंदी सदस्यों की रिहाई की घोषणा भी की गई।
25 जून 1945शिमला सम्मेलन का आरंभ हुआ। प्रारंभिक चरण में योजना के मूल सिद्धांतों पर व्यापक सहमति बनी।
26–27 जूनजिन्ना-पंत वार्ता से कोई समझौता नहीं निकला। जिन्ना और कांग्रेस के बीच मुस्लिम प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर मतभेद बने रहे।
29 जूनवेवल ने राजनीतिक दलों से कार्यकारिणी परिषद के लिए नामों की सूची देने को कहा और सम्मेलन की औपचारिक कार्यवाही में विराम आया।
30 जूनवेवल ने ब्रिटिश सरकार और प्रांतीय गवर्नरों से पूछा कि क्या मुस्लिम लीग के बिना नई कार्यकारिणी परिषद बनाई जा सकती है। ब्रिटिश सरकार ने इस विकल्प का समर्थन नहीं किया।
7–11 जुलाईजिन्ना ने सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार मुस्लिम लीग को देने की माँग की। 8 जुलाई को जिन्ना और वेवल की भेंट हुई तथा 11 जुलाई को वेवल ने अपनी प्रस्तावित सूची बताई। जिन्ना की प्रमुख माँगों पर सहमति नहीं बन सकी।
14 जुलाई 1945वेवल ने शिमला सम्मेलन की विफलता की घोषणा की।
15 जुलाई 1945वेवल ने सम्मेलन पर अपना गोपनीय निजी नोट तैयार किया, जिसमें उन्होंने सम्मेलन की विफलता और प्रमुख नेताओं के संबंध में अपने आकलन दर्ज किए।
26 जुलाई 1945ब्रिटेन में आम चुनाव के परिणाम आए और क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर सरकार सत्ता में आई।
दिसम्बर 1945–फ़रवरी 1946भारत में केंद्रीय एवं प्रांतीय चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट हुई।
24 मार्च 1946कैबिनेट मिशन दिल्ली पहुँचा और भारत के संवैधानिक भविष्य तथा अंतरिम सरकार के गठन पर वार्ता शुरू हुई।
20 फ़रवरी 1947एटली ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत में सत्ता हस्तांतरित कर देगी। इसी अवसर पर लॉर्ड माउंटबेटन को वेवल के स्थान पर नया वायसराय नियुक्त करने की घोषणा की गई।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु

➣ वेवल योजना और शिमला सम्मेलन अलग-अलग घटनाएँ थीं। वेवल योजना की घोषणा 14 जून, 1945 ई. को हुई थी, जबकि इस पर भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श के लिए 25 जून से 14 जुलाई, 1945 ई. तक शिमला सम्मेलन आयोजित किया गया था।

➣ वेवल योजना का उद्देश्य भारत का नया या स्थायी संविधान बनाना नहीं, बल्कि भारत शासन अधिनियम, 1935 के मौजूदा ढाँचे के भीतर वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन करना था। इसके विपरीत, कैबिनेट मिशन योजना (1946) में भारत के भावी संविधान, संविधान सभा और अंतरिम सरकार से संबंधित व्यापक प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए थे।

➣ क्रिप्स प्रस्ताव (1942) और वेवल योजना (1945) की प्रकृति अलग थी। क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस और संविधान निर्माण की प्रक्रिया का प्रस्ताव था, जबकि वेवल योजना का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन करना था। वेवल योजना की घोषणा में क्रिप्स प्रस्ताव की मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने की बात कही गई थी।

➣ वेवल योजना में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व (Parity) देने का प्रस्ताव था। यह समानता पूरे भारत की जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के गठन के संदर्भ में थी।

➣ कार्यकारिणी परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता या सत्ता का हस्तांतरण नहीं था। वायसराय की विशेष शक्तियाँ बनी रहतीं और परिषद केंद्रीय विधायिका के प्रति संसदीय रूप से उत्तरदायी नहीं होती। इसी प्रकार, विदेश विभाग किसी भारतीय सदस्य को सौंपने का प्रस्ताव भी भारत को पूर्ण स्वतंत्र विदेश नीति का अधिकार देना नहीं था। भारत में ब्रिटिश हितों के प्रतिनिधित्व के लिए उच्चायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव था, लेकिन इससे वायसराय का पद समाप्त नहीं होता।

➣ शिमला सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण केवल समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत नहीं, बल्कि कार्यकारिणी परिषद के मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार था। जिन्ना चाहते थे कि सभी मुस्लिम सदस्य मुस्लिम लीग द्वारा नामित हों, जबकि कांग्रेस को केवल सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधि मानने और उसके मुस्लिम सदस्यों को नामित करने के अधिकार को सीमित करने पर आपत्ति थी।

➣ मुस्लिम लीग ने शिमला सम्मेलन का बहिष्कार नहीं किया था। जिन्ना ने इसमें भाग लिया और वेवल से बातचीत की। लीग को कोई औपचारिक संवैधानिक वीटो-अधिकार भी नहीं दिया गया था। हालाँकि, ब्रिटिश सरकार द्वारा लीग के सहयोग के बिना आगे बढ़ने का विकल्प स्वीकार न करने के कारण उसकी सहमति व्यवहार में निर्णायक बन गई थी। इसे कुछ व्याख्याओं में आभासी वीटो कहा जाता है।

➣ महात्मा गांधी शिमला में उपस्थित थे, लेकिन सम्मेलन के औपचारिक प्रतिनिधि नहीं थे। कांग्रेस का प्रतिनिधित्व उसके तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया था। इसी प्रकार, अनुसूचित जातियों के आमंत्रित प्रतिनिधि राय बहादुर एन. शिवराज थे, डॉ. बी. आर. आंबेडकर नहीं।

➣ ख़िज़र हयात ख़ान पंजाब के प्रधानमंत्री और यूनियनिस्ट नेता थे, मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि नहीं। पंजाब के गैर-लीगी मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने का प्रश्न भी शिमला सम्मेलन के विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू था। इसलिए पूरे गतिरोध को केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा।

➣ शिमला सम्मेलन की विफलता के बाद भारत का विभाजन तुरंत तय नहीं हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने इसके बाद भी भारत की एकता बनाए रखते हुए संवैधानिक समाधान खोजने का प्रयास किया। कैबिनेट मिशन योजना (1946) इसका प्रमुख उदाहरण थी।

➣ वेवल की ब्रेकडाउन योजना और माउंटबेटन योजना अलग-अलग थीं। ब्रेकडाउन योजना राजनीतिक समझौता न होने की स्थिति में ब्रिटिश सत्ता की संभावित चरणबद्ध वापसी से संबंधित थी। इसे 3 जून, 1947 ई. की माउंटबेटन योजना का दूसरा नाम या उसका औपचारिक प्रारंभिक रूप नहीं समझना चाहिए। दोनों के बीच संभावित विचारगत समानताओं के बावजूद वे अलग योजनाएँ थीं।

➣ शिमला सम्मेलन की विफलता के तुरंत बाद लॉर्ड माउंटबेटन नियुक्त नहीं हुए थे। सम्मेलन जुलाई 1945 में विफल हुआ, लेकिन लॉर्ड वेवल फरवरी 1947 तक वायसराय बने रहे। इसके बाद माउंटबेटन को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया।

➣ 1945 का शिमला सम्मेलन और 1946 की शिमला वार्ता अलग-अलग घटनाएँ थीं। 1945 में वेवल योजना पर सम्मेलन हुआ था, जबकि मई 1946 में कैबिनेट मिशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ शिमला में अलग दौर की वार्ता की थी।

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