शाहजहां : परिचय
➣ 1628 ई. में शाहजहां अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा। आगरा में उसका राज्याभिषेक हुआ। इसी ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की।
➣ शाहजहाँ का जन्म जोधपुर के शासक राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गोसाई (जोधाबाई) के गर्भ से 5 जनवरी, 1592 ई. को लाहौर में हुआ था।
➣ दक्षिण भारत में अहमदनगर के वजीर मलिक अंबर के विरुद्ध सफलता से खुश होकर जहाँगीर ने खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की थी।
➣ शाहजहाँ के बचपन का नाम खुर्रम था। खुर्रम जन्म के अवसर पर दरबारी कवियों ने उसे विश्व का विजेता कहा था।
➣ 1612 ई. में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के भाई आसफ ख़ाँ की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से हुआ। विवाह के पश्चात् शाहजहाँ ने उन्हें मुमताज़ महल की उपाधि प्रदान की। वो पादशाह बेगम, मलिका-ए-जहाँ एवं मलिका-उज़-ज़मानी जैसी शाही उपाधियों से भी सम्मानित हुईं।
➣ 1628 ई. में शाहजहाँ ने अबुल मुजफ्फर शिहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब-किरान-ए-सानी की शाही उपाधि धारण कर आगरा में मुगल सम्राट के रूप में राज्याभिषेक कराया।
➣ बाद में 1638 ई. में शाहजहाँ ने नई राजधानी शाहजहानाबाद (दिल्ली) की स्थापना कर मुगल राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित कर दी थी।
➣ शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 ई. को लाहौर में हुआ था। वह जहाँगीर तथा जोधपुर के शासक राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गोसाईं (जोधाबाई) का पुत्र था।
➣ शाहजहाँ का बचपन का नाम खुर्रम था। उसके जन्म के अवसर पर दरबारी कवियों ने उसे “विश्व का विजेता” कहकर संबोधित किया था।
➣ दक्षिण भारत में मलिक अंबर के विरुद्ध सफलता से प्रसन्न होकर जहाँगीर ने 1617 ई. में खुर्रम को “शाहजहाँ” की उपाधि प्रदान की।
➣ 1612 ई. में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के भाई आसफ ख़ाँ की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से हुआ। विवाह के बाद वह मुमताज महल के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सत्ता के लिए संघर्ष
➣ प्रारम्भ में शहज़ादा खुर्रम (शाहजहाँ) नूरजहाँ गुट का प्रमुख सदस्य तथा मुगल सिंहासन का सबसे प्रबल दावेदार था।
➣ किन्तु नूरजहाँ ने अपनी पुत्री लाडली बेगम का विवाह शहरयार से कर दिया और उसे उत्तराधिकारी बनाने का प्रयास करने लगी। इससे असंतुष्ट होकर शाहजहाँ ने 1622–23 ई. में विद्रोह कर दिया।
➣ 28 अक्टूबर 1627 ई. को जहाँगीर की मृत्यु के समय शाहजहाँ दक्षिण भारत में था। इस अवसर का लाभ उठाकर उसके ससुर आसफ ख़ाँ ने राजनीतिक चाल चलते हुए दावर बख्श (खुसरो का पुत्र) को अस्थायी रूप से मुगल सिंहासन पर बैठा दिया।
दावर बख्श केवल एक कार्यवाहक सम्राट था। इसी कारण समकालीन इतिहासकारों ने उसे “बलि का बकरा” कहा है।
➣ आसफ ख़ाँ ने तुरंत दूत के माध्यम से शाहजहाँ को दक्षिण से बुलाया। आगरा पहुँचने के बाद शाहजहाँ ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों—दावर बख्श, शहरयार तथा अन्य दावेदारों—का अंत कर 1628 ई. में मुगल सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ शाहजहाँ ने नूरजहाँ को दो लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर लाहौर भेज दिया। वहीं 1645 ई. में उसकी मृत्यु हुई और उसे शाहदरा (लाहौर) में जहाँगीर के मकबरे के निकट दफनाया गया।
➣ शाहजहाँ ने अपने ससुर आसफ ख़ाँ को वज़ीर नियुक्त किया। बाद के वर्षों में सादुल्ला ख़ाँ उसका सबसे विश्वसनीय वज़ीर एवं प्रमुख सलाहकार बना।
➣ शहज़ादा रहते हुए शाहजहाँ का प्रमुख सहयोगी अब्दुल्ला ख़ाँ था।
शाहजहाँकालीन प्रमुख विद्रोह
बुंदेला राजपूतों का विद्रोह (1628-1635)
➣ शाहजहाँ के शासनकाल का पहला प्रमुख विद्रोह बुन्देलखण्ड में हुआ। उस समय ओरछा का शासक वीरसिंह देव बुंदेला का पुत्र जुझार सिंह बुंदेला था। वीर सिंह देव बुंदेला ने जहाँगीर के आदेश पर अबुल फजल की हत्या करवाई थी।
➣ विद्रोह का प्रमुख कारण यह था कि जुझार सिंह के पुत्र विक्रमाजीत ने अत्यधिक कर लगाकर विशाल धन-संपत्ति एकत्र कर ली थी। शाहजहाँ ने इस संपत्ति की जाँच कराने का आदेश दिया।
➣ जाँच के आदेश से असंतुष्ट होकर जुझार सिंह मुगल दरबार छोड़कर ओरछा लौट आया और 1628 ई. में विद्रोह कर दिया।
➣ बुन्देलखण्ड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए शाहजहाँ ने विभिन्न दिशाओं से संयुक्त सैन्य अभियान चलाने का आदेश दिया।
➣ महावत ख़ाँ ने अब्दुल्ला ख़ाँ के सहयोग से विद्रोह का दमन किया। अंततः 1629 ई. में जुझार सिंह ने आत्मसमर्पण कर मुगल अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ अगले लगभग पाँच वर्षों तक जुझार सिंह मुगलों के प्रति वफादार रहा तथा दक्षिण के अभियानों में भी भाग लिया। 1634 ई. में वह पुनः ओरछा लौट आया।
➣ 1635 ई. में जुझार सिंह ने बिना शाही अनुमति के गोंडवाना पर आक्रमण कर उसकी राजधानी चौरागढ़ पर अधिकार कर लिया तथा गोंड शासक प्रेमनारायण की हत्या कर दी।
➣ मुगल नीति के अनुसार कोई अधीनस्थ शासक दूसरे अधीनस्थ शासक पर बादशाह की अनुमति के बिना आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिए शाहजहाँ ने जुझार सिंह को गोंडवाना के बदले समकक्ष जागीर स्वीकार करने का आदेश दिया, किन्तु उसने इसे अस्वीकार कर दिया।
➣ इसके बाद शाहजहाँ ने औरंगज़ेब सहित मुगल सेना को बुन्देलखण्ड भेजा। मुगल सेना के दबाव में जुझार सिंह भाग निकला, किन्तु 1635 ई. में गोंड आदिवासियों ने उसकी तथा उसके पुत्र विक्रमाजीत की हत्या कर दी। इसी के साथ यह विद्रोह समाप्त हो गया।
| क्र. सं. | महत्व |
|---|---|
| 1. | यह शाहजहाँ के शासनकाल का पहला प्रमुख विद्रोह था। |
| 2. | इस अभियान में औरंगज़ेब ने पहली बार महत्वपूर्ण सैन्य एवं राजनीतिक अनुभव प्राप्त किया। |
| 3. | ओरछा विजय के बाद अनेक मंदिरों को ध्वस्त कर मस्जिदों का निर्माण कराया गया, जिसे औरंगज़ेब के प्रारम्भिक धार्मिक-राजनीतिक अभियानों में गिना जाता है। |
औरंगजेब की यह पहली राजनैतिक विजय थी और पहली बार उसने यहाँ मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों का निर्माण करवाया।
खान-ए-जहाँ लोदी का विद्रोह (1628–1631 ई.)
➣ शाहजहाँ के शासनकाल का एक प्रमुख विद्रोह उसके योग्य एवं प्रभावशाली अफगान सरदार खान-ए-जहाँ लोदी द्वारा किया गया।
➣ खान-ए-जहाँ लोदी दक्कन का सूबेदार था। उसने प्रारम्भिक वर्षों में बुन्देला विद्रोह के दमन सहित अनेक अभियानों में शाहजहाँ की सहायता की थी।
➣ समय के साथ शाहजहाँ को खान-ए-जहाँ की निष्ठा पर संदेह होने लगा। इसलिए उसने उसे दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया।
➣ दरबार में पहुँचने पर खान-ए-जहाँ को वह सम्मान नहीं मिला, जो उसे जहाँगीर के शासनकाल में प्राप्त था। साथ ही उसे अपने विरुद्ध कठोर कार्रवाई की आशंका होने लगी।
➣ अपने प्राणों के भय से खान-ए-जहाँ बिना शाही अनुमति के दक्षिण की ओर भाग गया और अहमदनगर के निज़ामशाही शासकों से मिल गया।
➣ शाहजहाँ ने उसके विरुद्ध शाही सेना भेजी। पीछा करते समय चम्बल नदी के निकट संघर्ष हुआ, किन्तु वह बचकर अहमदनगर पहुँच गया।
➣ मुगल सेना ने उसका लगातार पीछा किया। अंततः 1631 ई. में सिहोंदा (वर्तमान बाँदा क्षेत्र के निकट) में वह मारा गया और उसके साथ ही यह विद्रोह समाप्त हो गया।
| क्र. सं. | महत्व |
|---|---|
| 1. | यह शाहजहाँ के शासनकाल का प्रमुख अफगान विद्रोह था। |
| 2. | इस विद्रोह के दमन से दक्कन में मुगल सत्ता और अधिक सुदृढ़ हुई। |
| 3. | इस घटना के बाद अफगान सरदारों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो गया तथा केंद्रीय सत्ता अधिक मजबूत हुई। |
खान-ए-जहाँ लोदी शाहजहाँ के शासनकाल में दक्कन का सूबेदार था। उसने 1628–31 ई. के बीच विद्रोह किया और 1631 ई. में उसकी मृत्यु के साथ यह विद्रोह समाप्त हो गया।
पुर्तगालियों का दमन (1632 ई.)
➣ पुर्तगाली बंगाल के हुगली बंदरगाह में लंबे समय से व्यापार कर रहे थे। उन्हें मुगल शासकों द्वारा अनेक व्यापारिक सुविधाएँ एवं विशेषाधिकार प्राप्त थे।
➣ समय के साथ पुर्तगालियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करना प्रारम्भ कर दिया। वे भारतीयों का अपहरण कर उन्हें दास बनाते थे, जबरन ईसाई धर्म स्वीकार कराते थे तथा तटीय क्षेत्रों में लूटपाट एवं अवैध गतिविधियों में संलग्न रहने लगे।
➣ इन गतिविधियों से असंतुष्ट होकर 1632 ई. में शाहजहाँ ने बंगाल के सूबेदार क़ासिम ख़ाँ को पुर्तगालियों के विरुद्ध अभियान चलाने का आदेश दिया।
➣ लगभग चार महीने तक चले घेराव के बाद मुगल सेना ने हुगली पर अधिकार कर लिया। बड़ी संख्या में पुर्तगाली बंदी बनाए गए तथा उनकी शक्ति का प्रभावी रूप से दमन कर दिया गया।
| क्र. सं. | महत्व |
|---|---|
| 1. | बंगाल में पुर्तगालियों की राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। |
| 2. | मुगल साम्राज्य ने हुगली बंदरगाह पर पुनः अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया। |
| 3. | पुर्तगालियों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण, दास-व्यापार एवं अवैध गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगी। |
1632 ई. में शाहजहाँ के आदेश पर बंगाल के सूबेदार क़ासिम ख़ाँ ने हुगली में पुर्तगालियों का दमन किया था।
सिखों के साथ संघर्ष (1628–1635 ई.)
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में सिखों और मुगलों के बीच तीन प्रमुख युद्ध हुए—अमृतसर (1628 ई.), लाहौर (1631 ई.) तथा कर्तारपुर (1635 ई.)।
➣ शाहजहाँ के शासन के प्रारम्भ में एक साधारण घटना से सिखों और मुगलों के संबंधों में कटुता उत्पन्न हो गई। कहा जाता है कि शाहजहाँ का प्रिय बाज़ उड़कर छठे सिख गुरु हरगोविंद के शिविर में चला गया, जिसे लौटाने से इंकार कर दिया गया।
➣ इसके बाद 1628 ई. में अमृतसर के निकट दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें मुगल सेना को पराजय का सामना करना पड़ा।
➣ दूसरा संघर्ष 1631 ई. में श्री हरगोबिंदपुर नगर के निर्माण को लेकर हुआ। मुगल अधिकारियों ने गुरु हरगोविंद को नगर-निर्माण रोकने का आदेश दिया, किन्तु उनके इंकार करने पर युद्ध हुआ और मुगल फौजदार अब्दुल्ला ख़ाँ पराजित हुआ।
➣ तीसरा संघर्ष 1635 ई. में कर्तारपुर के निकट हुआ। इसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि बिधी चंद (बोधीचंद्र), जो गुरु हरगोविंद का अनुयायी था, शाही अस्तबल से दो प्रसिद्ध घोड़े लाकर गुरु को भेंट कर गया।
➣ इस युद्ध में मुगल पक्ष की ओर से पाइन्दा ख़ाँ ने युद्ध किया, किन्तु वह मारा गया और मुगल सेना को पुनः पराजय का सामना करना पड़ा।
➣ जल्द ही गुरु हरगोविंद को युद्धों की निरर्थकता समझ में आ गई और अपने नए उभरते सिख धर्म के विकास व रक्षा के लिये कौरतपुर (शिवालिक पर्वत क्षेत्र) जाकर बस गए।
शाहजहाँ के समय हुए अन्य विद्रोह एवं संघर्ष
➣ इसके अतिरिक्त शाहजहाँ के शासनकाल में चम्पतराय बुंदेला, भागीरथ भील, छोटानागपुर के स्थानीय शासक तथा नूरपुर के जमींदार जगतसिंह ने भी समय-समय पर मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किए-
| क्र. सं. | विद्रोही | विवरण |
|---|---|---|
| 1. | चम्पतराय बुंदेला (महोबा) | महोबा के चम्पतराय ने मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया, किन्तु बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। |
| 2. | भागीरथ भील (खाताखेड़ी, मालवा) | मालवा क्षेत्र में भागीरथ भील ने मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसे अंततः दबा दिया गया। |
| 3. | छोटानागपुर के शासक | छोटानागपुर के स्थानीय शासक ने भी मुगल सत्ता का विरोध किया, किन्तु विद्रोह सफल नहीं हो सका। |
| 4. | जगतसिंह (नूरपुर) | नूरपुर के जमींदार जगतसिंह ने भी शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया। |
सैनिक अभियान
अहमदनगर का विलय (1633–1636 ई.)
➣ 1633 ई. में मुगलों ने अहमदनगर पर अधिकार कर उसे मुगल साम्राज्य में मिला लिया। अंतिम निजामशाही सुल्तान हुसैन शाह को बंदी बनाकर ग्वालियर किले में भेज दिया गया।
➣ अहमदनगर का शक्तिशाली वज़ीर फतेह ख़ाँ बाद में मुगलों से मिल गया और उसने मुगल विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इसके बाद निजामशाही के प्रमुख सरदार शाहजी भोंसले (छत्रपति शिवाजी के पिता) ने मुर्तज़ा तृतीय को निजामशाही का सुल्तान घोषित कर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
➣ अंततः 1636 ई. में शाहजहाँ के दक्कन अभियान तथा मुगल–बीजापुर संधि के बाद शाहजी ने मुर्तज़ा तृतीय तथा अनेक किले मुगलों को सौंप दिए।
➣ समझौते के पश्चात् शाहजी भोंसले ने निजामशाही की सेवा छोड़कर बीजापुर की सेवा स्वीकार कर ली, जहाँ उन्हें दक्षिण में विस्तृत जागीरें प्रदान की गईं।
➣ 1636 ई. के बाद शाहजहाँ की दक्कन नीति को बड़ी सफलता मिली। अहमदनगर का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया तथा बीजापुर और गोलकुंडा ने भी मुगल अधीनता स्वीकार कर ली।
1636 ई. में शाहजी भोंसले ने मुर्तज़ा तृतीय को मुगलों के हवाले कर बीजापुर की सेवा स्वीकार कर ली।➣ कुछ इतिहास पुस्तकों के अनुसार शहज़ादा मुराद के अनुरोध पर शाहजहाँ ने शाहजी भोंसले को 5000 का मनसब तथा पूना की जागीर प्रदान की।
गोलकुण्डा अभियान (1636 ई.)
➣ अहमदनगर के विलय के बाद शाहजहाँ ने गोलकुण्डा पर अपना दबाव बढ़ाया। अंततः 1636 ई. में गोलकुण्डा के शासक अब्दुल्ला क़ुतुबशाह ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करते हुए संधि कर ली।
➣ संधि के अनुसार गोलकुण्डा में ईरान के शाह के स्थान पर शाहजहाँ के नाम का ख़ुतबा पढ़ा जाने लगा तथा सिक्कों पर भी शाहजहाँ का नाम अंकित किया गया।
➣ गोलकुण्डा ने मुगल सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार की तथा नियमित वार्षिक कर (नज़राना) देने पर भी सहमति व्यक्त की।
➣ मीर जुमला (मुहम्मद सैय्यद) प्रारम्भ में एक फ़ारसी व्यापारी था, जो बाद में गोलकुण्डा का वज़ीर बना। बाद के वर्षों में उसने मुगल सेवा स्वीकार की और शाहजहाँ के शासनकाल में महत्वपूर्ण पद प्राप्त किया।
➣ परंपरागत विवरणों के अनुसार मीर जुमला ने शाहजहाँ को बहुमूल्य रत्न भेंट किए, जिनमें कोहिनूर हीरा का भी उल्लेख मिलता है। शाहजहाँ ने इसे अपने तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) में जड़वाया।
➣ गोलकुण्डा एवं बीजापुर के साथ संधियों के बाद शाहजहाँ ने 1636 ई. में औरंगज़ेब को पहली बार दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया।
बीजापुर अभियान (1631–1636 ई.)
➣ 1631 ई. में शाहजहाँ ने अपने वज़ीर आसफ ख़ाँ को बीजापुर पर आक्रमण करने का आदेश दिया। किन्तु बीजापुर को शाहजी भोंसले तथा दक्कनी सरदारों की सहायता मिलने के कारण मुगल सेना को घेरा उठाकर वापस लौटना पड़ा।
➣ प्रथम अभियान की असफलता के बाद भी शाहजहाँ ने दक्कन नीति जारी रखी और बीजापुर पर पुनः आक्रमण की तैयारी की।
औरंगज़ेब दो बार दक्कन का सूबेदार नियुक्त हुआ-
• प्रथम कार्यकाल : 1636–1644 ई.
• द्वितीय कार्यकाल : 1653–1658 ई. (सम्राट बनने तक)
➣ 1636 ई. में शाहजहाँ स्वयं दौलताबाद पहुँचा और बीजापुर के विरुद्ध दूसरा अभियान चलाया। उस समय बीजापुर के शासक मुहम्मद आदिलशाह का अपने सरदारों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं था।
➣ मुगल सैन्य दबाव के परिणामस्वरूप 1636 ई. में बीजापुर ने मुगल आधिपत्य स्वीकार कर लिया तथा संधि कर ली।
➣ इसी वर्ष गोलकुण्डा ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर संधि की। वहीं शाहजी भोंसले ने मुगलों से समझौता कर बीजापुर की सेवा स्वीकार कर ली।
बीजापुर अभियान का महत्व
| क्र.स. | महत्व |
|---|---|
| 1. | बीजापुर ने पहली बार औपचारिक रूप से मुगल अधीनता स्वीकार की। |
| 2. | दक्कन में मुगल प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। |
| 3. | 1636 ई. के बाद दक्कन में मुगल नीति को उल्लेखनीय सफलता मिली। |
| 4. | इसी वर्ष औरंगज़ेब को पहली बार दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया गया। |
1636 ई. : शाहजहाँ की दक्षिण (दक्कन) नीति का निर्णायक वर्ष
➣ अहमदनगर का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हुआ।
➣ बीजापुर ने मुगल आधिपत्य स्वीकार कर संधि की।
➣ गोलकुण्डा ने भी मुगल अधीनता स्वीकार कर संधि की।
➣ औरंगज़ेब पहली बार दक्षिण (दक्कन) का सूबेदार नियुक्त हुआ।
कंधार अभियान (1649–1653 ई.)
➣ कंधार अपने सामरिक एवं व्यापारिक महत्त्व के कारण मुगल साम्राज्य और ईरान (सफ़वी साम्राज्य) के बीच निरंतर संघर्ष का केंद्र बना रहा। यह मध्य एशिया से भारत आने वाले मार्ग का प्रमुख दुर्ग तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा का आधार था।
➣ 1622 ई. में जहाँगीर के शासनकाल में ईरान के शासक शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर अधिकार कर लिया था।
➣ 1638 ई. में कंधार के ईरानी गवर्नर अलीमर्दान ख़ाँ ने शाह सफ़ी के भय से कंधार का दुर्ग मुगलों को सौंप दिया। इस प्रकार कंधार पुनः मुगल साम्राज्य के अधिकार में आ गया।
➣ 1649 ई. में ईरान के शासक शाह अब्बास द्वितीय ने कंधार पर आक्रमण किया। उस समय कंधार का मुगल गवर्नर दौलत ख़ाँ था। काबुल से सहायता पहुँचने से पहले ही ईरानी सेना ने कंधार पर अधिकार कर लिया।
कंधार को पुनः प्राप्त करने के मुगल अभियान
| वर्ष | नेतृत्व | परिणाम |
|---|---|---|
| 1649 ई. | औरंगज़ेब | असफल |
| 1652 ई. | औरंगज़ेब | असफल |
| 1653 ई. | दाराशिकोह | असफल |
➣ लगातार तीन असफल अभियानों के बाद मुगल कंधार को पुनः प्राप्त नहीं कर सके। इसके बाद शाहजहाँ तथा उसके उत्तराधिकारियों ने कंधार को पुनः जीतने का कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया।
कंधार के खोने का महत्व
| क्र. सं. | महत्व |
|---|---|
| 1. | कंधार अंतिम रूप से मुगल साम्राज्य के हाथ से निकल गया। |
| 2. | मुगलों की उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा कमजोर हो गई। |
| 3. | मध्य एशिया एवं ईरान के साथ व्यापारिक तथा सामरिक मार्गों पर मुगलों का प्रभाव कम हो गया। |
| 4. | शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति को बड़ा आघात पहुँचा। |
1649, 1652 और 1653 ई. में मुगलों ने कंधार को पुनः प्राप्त करने के तीन अभियान चलाए, किन्तु तीनों असफल रहे। परिणामस्वरूप कंधार स्थायी रूप से ईरान के अधिकार में चला गया।
बल्ख अभियान (1646–1647 ई.)
➣ शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति के अंतर्गत 1646–47 ई. में बल्ख अभियान चलाया गया। इसका अभियान उद्देश्य बल्ख एवं बदख्शाँ में मुगल प्रभाव स्थापित करना, कंधार की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा मुगल साम्राज्य और उज़बेकों के बीच एक मित्र (बफ़र) राज्य स्थापित करना था।
➣ उस समय बुखारा एवं बल्ख पर उज़बेक शासक नज़र मुहम्मद का अधिकार था। उसके पुत्र अब्दुल अज़ीज़ ने विद्रोह कर बुखारा पर अधिकार कर लिया।
➣ विद्रोह के कारण नज़र मुहम्मद ने शाहजहाँ से सहायता की अपील की। इस अवसर का लाभ उठाकर शाहजहाँ ने 1646 ई. में शहज़ादा मुराद बख्श तथा अलीमर्दान ख़ाँ के नेतृत्व में सेना भेजी।
➣ मुगल सेना ने बल्ख पर अधिकार कर लिया, किन्तु नज़र मुहम्मद फ़ारस (ईरान) की ओर चला गया।
➣ शाहजहाँ ने मुराद बख्श को बल्ख एवं बदख्शाँ का गवर्नर नियुक्त किया, किन्तु उसने वहाँ रुकने में रुचि नहीं दिखाई और भारत लौट आया।
➣ इसके बाद 1647 ई. में शाहजहाँ ने औरंगज़ेब को बल्ख एवं बदख्शाँ का गवर्नर नियुक्त किया। औरंगज़ेब ने कठिन परिस्थितियों में कुछ समय तक मुगल अधिकार बनाए रखा।
➣ किन्तु स्थानीय विद्रोह, उज़बेकों के निरंतर आक्रमण, अत्यधिक व्यय तथा ईरान के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण शाहजहाँ ने अंततः बल्ख एवं बदख्शाँ खाली कर मुगल सेना को वापस बुला लिया।
शाहजहाँ की जहाँ दक्षिण-नीति सर्वाधिक सफल थी जबकि मध्य एशिया की नीति पूर्णत: असफल रही।
शाहजहाँ की धार्मिक नीति
➣ सम्राट अकबर की अपेक्षा शाहजहाँ की धार्मिक नीति अपेक्षाकृत अधिक रूढ़िवादी थी। यद्यपि वह औरंगज़ेब जितना कट्टर नहीं था, फिर भी उसने इस्लामी परम्पराओं को अधिक महत्त्व दिया।
➣ शाहजहाँ सुन्नी मुसलमान था। वह इस्लाम धर्म के प्रति आस्थावान था तथा प्रशासन में इस्लामी सिद्धान्तों एवं परम्पराओं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास करता था।
➣ समकालीन इतिहासकारों ने शाहजहाँ को ‘इस्लाम का मुजाहिद’ तथा ‘शरीयत का स्तम्भ’ जैसी उपाधियों से अलंकृत किया है, क्योंकि उसने अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में स्वयं को इस्लाम का संरक्षक घोषित किया था।
➣ शाहजहाँ सुन्नी मुसलमानों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहानुभूतिशील था, जबकि शिया मुसलमानों के प्रति उसका दृष्टिकोण उतना उदार नहीं था।
➣ हिन्दुओं के प्रति शाहजहाँ की नीति न तो अकबर जैसी पूर्णतः उदार थी और न ही औरंगज़ेब जैसी अत्यधिक कठोर। उसने सार्वजनिक रूप से हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया, किन्तु उसकी धार्मिक नीति में रूढ़िवादिता का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
➣ शासन के प्रारम्भिक वर्षों में शाहजहाँ धार्मिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक कट्टर था, किन्तु बाद में उसकी ज्येष्ठ पुत्री जहाँआरा बेगम तथा युवराज दारा शिकोह के प्रभाव से उसकी नीति में कुछ उदारता आई।
➣ इतिहासकारों के अनुसार शाहजहाँ की धार्मिक नीति अकबर की अपेक्षा अधिक रूढ़िवादी, किन्तु औरंगज़ेब की अपेक्षा अधिक उदार थी। इसलिए उसे इन दोनों मुगल सम्राटों के मध्यवर्ती धार्मिक दृष्टिकोण वाला शासक माना जाता है।हिन्दुओं के प्रति शाहजहाँ की नीति
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में हिन्दुओं के प्रति नीति अकबर की अपेक्षा अधिक कठोर थी। उसने अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में इस्लामी सिद्धान्तों को अधिक महत्त्व दिया तथा कुछ ऐसे आदेश जारी किए, जिनसे हिन्दू समुदाय प्रभावित हुआ।
➣ 1633 ई. में शाहजहाँ ने नवनिर्मित हिन्दू मन्दिरों को गिराने तथा नए मन्दिरों के निर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके परिणामस्वरूप बनारस, इलाहाबाद, गुजरात तथा कश्मीर में अनेक मंदिर ध्वस्त किए गए।
➣ शाहजहाँ ने कश्मीर में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच अन्तर्धार्मिक विवाह पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ 1634 ई. में उसने आदेश दिया कि यदि कोई मुस्लिम लड़की किसी हिन्दू से विवाह करना चाहती है, तो विवाह तभी मान्य होगा जब हिन्दू युवक इस्लाम धर्म स्वीकार करे।
➣ इसी वर्ष यह भी आदेश जारी किया गया कि जो व्यक्ति स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार करेगा, उसे अपने पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त होगा।
➣ शाहजहाँ ने हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार कराने के उद्देश्य से एक पृथक विभाग की स्थापना की।
➣ उसने हिन्दुओं द्वारा मुस्लिम गुलाम रखने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ शाहजहाँ की हिन्दू नीति उसके शासन के प्रारम्भिक वर्षों में अपेक्षाकृत कठोर रही। किन्तु बाद के वर्षों में उसकी नीति में कुछ उदारता दिखाई देती है, जिसके उदाहरण अगले भाग में दिए गए हैं।
धार्मिक सहिष्णुता के उदाहरण
➣ यद्यपि शाहजहाँ की धार्मिक नीति अकबर की अपेक्षा अधिक रूढ़िवादी थी, फिर भी उसने अनेक अवसरों पर धार्मिक सहिष्णुता एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय दिया।
➣ शाहजहाँ ने अहमदाबाद के प्रसिद्ध जौहरी एवं साहूकार शान्तिदास झावेरी को जैन साधुओं के विश्राम-स्थल (पोशाला) के निर्माण हेतु भूमि अनुदान दिया।
➣ उसने अहमदाबाद के चिन्तामणि जैन मंदिर की मरम्मत कराने का भी आदेश दिया, जो उसकी धार्मिक सहिष्णुता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
➣ शाहजहाँ तीर्थयात्रा कर पुनः लागू करना चाहता था, किन्तु काशी के प्रसिद्ध विद्वान कवीन्द्राचार्य सरस्वती के अनुरोध पर उसने अपना निर्णय वापस ले लिया।
➣ इसके पश्चात् बनारस एवं इलाहाबाद में लगाया गया तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया गया।
➣ शाहजहाँ ने सामान्य रूप से गोहत्या पर लगा प्रतिबन्ध हटा दिया था, किन्तु खम्भात (कैंबे) के हिन्दू नागरिकों के अनुरोध पर वहाँ पुनः गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
➣ शाहजहाँ की धार्मिक नीति में रूढ़िवादिता एवं व्यावहारिक सहिष्णुता—दोनों के उदाहरण मिलते हैं। इसलिए अधिकांश इतिहासकार उसे अकबर और औरंगज़ेब के मध्यवर्ती धार्मिक दृष्टिकोण वाला शासक मानते हैं।
राजपूत नीति
➣ शाहजहाँ की राजपूत नीति सामान्यतः अकबर की अपेक्षा कम उदार थी। यद्यपि उसने राजपूतों को मुगल प्रशासन एवं सेना में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया, फिर भी उन पर अकबर जैसा विश्वास नहीं किया।
➣ शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में किसी भी राजपूत शासक को सूबेदार (प्रान्तीय गवर्नर) नियुक्त नहीं किया।
➣ अपवादस्वरूप उसने राजा रघुनाथ को शाही दीवान जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया, जो उसके प्रशासन में किसी राजपूत को प्राप्त सर्वोच्च पदों में से एक था।
➣ यद्यपि शाहजहाँ की धार्मिक नीति अपेक्षाकृत रूढ़िवादी थी, फिर भी उसने अधिकांश राजपूत राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे तथा उन्हें मुगल साम्राज्य का सहयोगी बनाए रखा।
➣ शाहजहाँ ने राजपूतों को प्रशासन एवं सेना में स्थान तो दिया, किन्तु अकबर की भाँति उन्हें पूर्ण राजनीतिक विश्वास एवं प्रान्तीय शासन का अधिकार नहीं दिया।
दरबारी एवं प्रशासनिक परिवर्तन
➣ शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में मुगल दरबार की कुछ परम्पराओं में परिवर्तन किए तथा दरबारी शिष्टाचार को अधिक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।
➣ 1636–37 ई. में उसने सिजदा (बादशाह के समक्ष पूर्ण दण्डवत प्रणाम) तथा पायबोस (बादशाह के चरण चूमने की प्रथा) को समाप्त कर दिया।
➣ इनके स्थान पर उसने चहार तस्लीम (चार बार हाथ जोड़कर अथवा हाथ माथे तक ले जाकर अभिवादन करने की दरबारी प्रथा) का प्रचलन किया।
➣ इस नई प्रथा का उद्देश्य सम्राट के प्रति सम्मान बनाए रखना था, साथ ही ऐसी दरबारी परम्पराओं को समाप्त करना था जिन्हें कई लोग धार्मिक दृष्टि से अनुचित मानते थे।
➣ शाहजहाँ के समय मुगल दरबार की शिष्टाचार व्यवस्था, राजकीय समारोह तथा दरबारी अनुशासन को और अधिक भव्य एवं व्यवस्थित बनाया गया।
➣ सिजदा एवं पायबोस का स्थान लेकर चहार तस्लीम शाहजहाँ काल की प्रमुख दरबारी अभिवादन-प्रथा बन गई। यह परिवर्तन उसके शासनकाल की महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक एवं दरबारी उपलब्धियों में गिना जाता है।
उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष (1657–1659 ई.)
➣ शाहजहाँ के चारों पुत्र-दारा शिकोह, शाहशुजा, औरंगज़ेब तथा मुराद बख्श—सभी मुमताज़ महल की संतान थे।
➣ सितम्बर 1657 ई. में शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर उत्तराधिकार का संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जो लगभग एक वर्ष तक चला। इस संघर्ष में पाँच प्रमुख युद्ध हुए-बहादुरपुर, धरमट, सामूगढ़, खजुवा तथा देवराई।
➣ इन युद्धों में क्रमशः शाहशुजा, दारा शिकोह तथा उसके समर्थकों की पराजय हुई। सामूगढ़ का युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसके बाद औरंगज़ेब ने आगरा पर अधिकार कर शाहजहाँ को आगरा किले के मुसम्मन बुर्ज में कैद कर दिया।
➣ अंततः देवराई के युद्ध (1659 ई.) में दारा शिकोह की अंतिम पराजय हुई। बाद में उसे विधर्मी घोषित कर मृत्युदण्ड दिया गया तथा हुमायूँ के मकबरे में दफनाया गया।
➣ शाहशुजा अराकान (बर्मा) भाग गया, जबकि मुराद बख्श को बंदी बनाकर ग्वालियर दुर्ग में भेज दिया गया, जहाँ बाद में उसकी हत्या कर दी गई।
➣ दारा के ज्येष्ठ पुत्र सुलेमान शिकोह ने श्रीनगर (गढ़वाल) में शरण ली, किन्तु गढ़वाल के शासक ने उसे औरंगज़ेब को सौंप दिया और 1662 ई. में ग्वालियर किले में धीमा विष देकर उसकी हत्या कर दी गई।
| युद्ध | तिथि | मुख्य पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| बहादुरपुर का युद्ध | 24 फरवरी 1658 ई. | शाहशुजा बनाम शाही सेना (सुलेमान शिकोह एवं मिर्जा राजा जयसिंह) | शाहशुजा पराजित हुआ। |
| धरमट का युद्ध | 15 अप्रैल 1658 ई. | औरंगज़ेब एवं मुराद बख्श बनाम महाराजा जसवंत सिंह एवं क़ासिम ख़ाँ | औरंगज़ेब विजयी हुआ; विजय की स्मृति में फ़तेहाबाद बसाया। |
| सामूगढ़ का युद्ध | 29 मई 1658 ई. | औरंगज़ेब एवं मुराद बख्श बनाम दारा शिकोह | निर्णायक विजय; आगरा पर अधिकार एवं शाहजहाँ को कैद किया गया। |
| खजुवा का युद्ध | 5 जनवरी 1659 ई. | औरंगज़ेब बनाम शाहशुजा | शाहशुजा पराजित होकर अराकान (बर्मा) भाग गया। |
| देवराई का युद्ध | 12–14 अप्रैल 1659 ई. | औरंगज़ेब बनाम दारा शिकोह | दारा की अंतिम पराजय; बाद में मृत्युदण्ड दिया गया। |
उत्तराधिकार का निर्णायक युद्ध सामूगढ़ (29 मई 1658 ई.) था, जबकि अंतिम युद्ध देवराई (12–14 अप्रैल 1659 ई.) था।
➣ इस प्रकार औरंगज़ेब ने अपने सभी भाई−भतीजों को मारा और अपने वृद्ध पिता को तख्त-ए- ताऊससे हटा कर आगरा के क़िले में क़ैद कर लिया और ख़ुद सन् 1658 में मुग़ल सम्राट बन बैठा।
शाहजहाँ की कैद एवं मृत्यु
➣ सामूगढ़ के युद्ध (29 मई, 1658 ई.) में विजय प्राप्त करने के बाद 8 जून, 1658 ई. को औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में बंदी बना लिया।
➣ शाहजहाँ अपने जीवन के अंतिम आठ वर्ष आगरा किले के मुसम्मन बुर्ज (शाह बुर्ज) में बंदी के रूप में रहा। उसकी ज्येष्ठ पुत्री जहाँआरा बेगम अंत तक उसकी सेवा एवं देखभाल करती रही।
➣ 22 जनवरी, 1666 ई. को 74 वर्ष की आयु में शाहजहाँ का निधन हो गया। उसे उसकी प्रिय पत्नी मुमताज़ महल के समीप ताजमहल (आगरा) में दफनाया गया।
शाहजहाँ पहला मुगल सम्राट था जिसे उसके जीवनकाल में गद्दी से हटाकर बंदी बनाया गया। उसने अपने जीवन के अंतिम आठ वर्ष आगरा किले के मुसम्मन बुर्ज में बिताए।
शाहजहाँ का काल : मुगल साम्राज्य का स्वर्ण काल
➣ मुगल सम्राट शाहजहाँ (1628–1658 ई.) का शासनकाल सामान्यतः मुगल साम्राज्य का स्वर्ण काल माना जाता है। इस काल में विशेष रूप से स्थापत्य कला, साहित्य, शिक्षा तथा ललित कलाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ।
➣ डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘मुगलकालीन भारत’ में लिखा है कि “शाहजहाँ का शासनकाल मध्यकालीन भारत के स्वर्ण युग के नाम से प्रसिद्ध है।”
➣ इतिहासकार एल्फिन्स्टन के अनुसार “शाहजहाँ का काल भारतीय इतिहास में सर्वाधिक समृद्धि का काल था।”
➣ तथापि अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि शाहजहाँ का काल मुख्यतः कला एवं विशेषकर स्थापत्य कला की दृष्टि से ही स्वर्ण युग कहा जा सकता है, क्योंकि इसी काल में अनेक भव्य इमारतों का निर्माण हुआ।
फ़ारसी साहित्य का विकास
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य ने विशेष उन्नति की। इस समय फ़ारसी भाषा की दो प्रमुख शैलियाँ प्रचलित थीं— भारतीय फ़ारसी तथा ईरानी फ़ारसी।
➣ भारतीय फ़ारसी शैली के प्रमुख विद्वानों में अब्दुल हमीद लाहौरी, मुहम्मद वारिस तथा चंद्रभान ब्राह्मण प्रमुख थे।
➣ ईरानी फ़ारसी शैली के प्रमुख विद्वानों में अमीनाई क़ज़वीनी तथा जलालुद्दीन तबातबाई उल्लेखनीय थे।
➣ शाहजहाँ के समय ईरानी फ़ारसी पद्य शैली का विशेष प्रभाव था। इसी कारण उसने प्रसिद्ध ईरानी कवि कलीम को अपना राजकवि नियुक्त किया।
➣ इस काल के अन्य प्रमुख फ़ारसी कवियों में सईदाई गीलानी, कुदसी, मीर मुहम्मद काशी, सायब, सलीम, मसीह, रफ़ी, फ़ारुख, मुनीर, शोदा, चंद्रभान ब्राह्मण, हाजिक तथा दिलेरी आदि उल्लेखनीय थे।
➣ शाहजहाँ के दरबार में अनेक भारतीय एवं विदेशी विद्वानों, कवियों तथा इतिहासकारों को संरक्षण प्राप्त था, जिसके कारण उसका दरबार तत्कालीन भारत का प्रमुख साहित्यिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र बन गया।
प्रमुख इतिहासकार
➣ अब्दुल हमीद लाहौरी शाहजहाँ का राजकीय इतिहासकार था। उसने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पादशाहनामा’ की रचना की, जिसे शाहजहाँ के शासनकाल का सर्वाधिक प्रामाणिक इतिहास माना जाता है।
➣ लाहौरी की मृत्यु के बाद मुहम्मद वारिस ने ‘पादशाहनामा’ को आगे बढ़ाकर पूरा किया।
➣ अमीनाई क़ज़वीनी ने भी शाहजहाँ के शासनकाल का इतिहास ‘पादशाहनामा’ शीर्षक से लिखा, जो प्रारम्भिक शासनकाल का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य के साथ-साथ संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य को भी संरक्षण प्राप्त हुआ।
➣ कवीन्द्राचार्य सरस्वती शाहजहाँ के दरबार के प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान एवं आश्रित कवि थे। उनकी भाषा में ब्रज एवं अवधी का सुंदर समन्वय मिलता है।
➣ कवीन्द्राचार्य ने शाहजहाँ की प्रशंसा में प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘कवीन्द्र कल्पलता’ की रचना की।
➣ ‘सरस्वती’ की उपाधि से सम्मानित कवीन्द्राचार्य ने शाहजहाँ से निवेदन कर हिन्दुओं पर लगाए गए तीर्थयात्रा कर को समाप्त करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दारा शिकोह का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान
➣ शाहजहाँ के चारों पुत्रों में दारा शिकोह सर्वाधिक विद्वान, उदार, सहिष्णु तथा अध्ययनशील माना जाता था। उसे भारतीय दर्शन एवं सूफ़ी विचारधारा में विशेष रुचि थी।
➣ दारा शिकोह ने हिन्दू एवं इस्लामी दर्शन के समन्वय का प्रयास किया तथा अनेक हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन कराया।
➣ उसने लगभग 52 उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ (महान रहस्य) शीर्षक से कराया।
➣ दारा शिकोह ने ‘योग वशिष्ठ’ का भी फ़ारसी अनुवाद कराया, जिससे भारतीय दर्शन का परिचय फ़ारसी भाषी विद्वानों तक पहुँचा।
➣ उसकी प्रसिद्ध मौलिक कृति ‘मज्म-उल-बहरीन’ (दो समुद्रों का संगम) है, जिसमें हिन्दू एवं सूफ़ी दर्शन की समानताओं का विवेचन किया गया है।
➣ दारा शिकोह का उद्देश्य हिन्दू एवं इस्लामी आध्यात्मिक परम्पराओं के बीच वैचारिक समन्वय स्थापित करना था।
➣ इतिहासकार लेनपूल ने दारा शिकोह की उदारता एवं सहिष्णुता के कारण उसे ‘लघु अकबर’ की संज्ञा दी है।
➣ शाहजहाँ ने दारा शिकोह को ‘शाह बुलन्द इक़बाल’ की उपाधि प्रदान की थी।
➣ उत्तराधिकार युद्ध में पराजय के कारण दारा शिकोह की उदार एवं समन्वयवादी विचारधारा को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल सका, फिर भी भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में उसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्थापत्य कला
➣ शाहजहाँ का शासनकाल मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग माना जाता है। उसके काल में मुगल वास्तुकला अपनी पूर्णता एवं वैभव के शिखर पर पहुँची।
➣ इस काल में सफेद संगमरमर, पच्चीकारी (Pietra Dura), जड़ाऊ नक्काशी, बहुमूल्य रत्नों की सजावट, संतुलित अनुपात तथा भव्य गुम्बदों का व्यापक प्रयोग हुआ।
शाहजहाँ की प्रमुख स्थापत्य कृतियाँ
| इमारत | स्थान | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| ताजमहल | आगरा | मुमताज़ महल की स्मृति में निर्मित विश्वप्रसिद्ध मकबरा; मुगल स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण। |
| लाल किला | शाहजहानाबाद (दिल्ली) | शाहजहाँ की नई राजधानी का दुर्ग; दीवान-ए-आम, दीवान-ए-ख़ास आदि प्रमुख भवन। |
| जामा मस्जिद | दिल्ली | भारत की सबसे विशाल ऐतिहासिक मस्जिदों में से एक। |
| आगरा किले की मोती मस्जिद | आगरा | सफेद संगमरमर से निर्मित सुंदर मस्जिद। |
| मुसम्मन बुर्ज | आगरा किला | यहीं शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए। |
| ख़ास महल | आगरा किला | शाहजहाँ का निजी आवासीय महल। |
| नगीना मस्जिद | आगरा किला | शाही महिलाओं के लिए निर्मित मस्जिद। |
शाहजहानाबाद
➣ अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी बसाने की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शाहजहाँ ने दिल्ली में शाहजहानाबाद नामक नई राजधानी की स्थापना की।
➣ शाहजहानाबाद का मुख्य आकर्षण लाल किला था। इसके पश्चिमी द्वार को लाहौरी दरवाज़ा तथा दक्षिणी द्वार को दिल्ली दरवाज़ा कहा जाता है।
➣ शाहजहानाबाद का निर्माण मुगल साम्राज्य की समृद्धि, वैभव तथा स्थापत्य कला के उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है।
प्रशासनिक एवं दरबारी परिवर्तन
➣ शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में मुगल दरबार की अनेक परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों में परिवर्तन किए।
➣ उसने सिजदा (साष्टांग दण्डवत) की प्रथा को समाप्त कर उसके स्थान पर ज़मीनबोस (भूमि चूमकर अभिवादन) की प्रथा को प्रोत्साहित किया। बाद में ज़मीनबोस के स्थान पर चहार तस्लीम (चार बार हाथ जोड़कर अभिवादन) को अधिक मान्यता दी गई।
➣ शाहजहाँ ने दरबारियों की पगड़ी पर बादशाह का चित्र धारण करने की प्रथा पर भी रोक लगा दी।
➣ उसने प्रशासनिक कार्यों में इलाही संवत् के स्थान पर पुनः हिजरी संवत् के प्रयोग को प्रोत्साहित किया।
इतिहासकारों का मूल्यांकन
➣ डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘मुगलकालीन भारत’ में लिखा है कि “शाहजहाँ का शासनकाल मध्यकालीन भारत के स्वर्ण युग के नाम से प्रसिद्ध है।”
➣ इतिहासकार एल्फिन्स्टन के अनुसार “शाहजहाँ का काल भारतीय इतिहास में सर्वाधिक समृद्धि का काल था।”
➣ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि शाहजहाँ का शासनकाल विशेष रूप से स्थापत्य कला, फ़ारसी साहित्य तथा दरबारी संस्कृति की उन्नति के लिए प्रसिद्ध है।
➣ यद्यपि इस काल में भव्य भवनों का निर्माण हुआ, परन्तु इन निर्माण कार्यों तथा निरन्तर सैन्य अभियानों के कारण राजकोष पर भारी व्यय भी हुआ। इसलिए कुछ इतिहासकार इसे केवल कला एवं स्थापत्य की दृष्टि से स्वर्ण युग मानते हैं।
शाहजहाँ का शासनकाल मुगल स्थापत्य कला, फ़ारसी साहित्य तथा सांस्कृतिक वैभव का चरमोत्कर्ष माना जाता है। इसी कारण उसे सामान्यतः मुगल साम्राज्य का स्वर्ण काल कहा जाता है, यद्यपि आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सभी इतिहासकार इसे पूर्ण स्वर्ण युग नहीं मानते।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
➣ शाहजहाँ (1628–1658 ई.) का शासनकाल सामान्यतः मुगल साम्राज्य का स्वर्ण काल माना जाता है।
➣ शाहजहाँ के काल में मुगल स्थापत्य कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। इसी काल में ताजमहल, लाल किला तथा जामा मस्जिद जैसी विश्वविख्यात इमारतों का निर्माण हुआ।
➣ शाहजहाँ की राजधानी प्रारम्भ में आगरा थी, किन्तु बाद में उसने दिल्ली में शाहजहानाबाद नामक नई राजधानी बसाई।
➣ शाहजहाँ के दरबार में फ़ारसी साहित्य का विशेष विकास हुआ। अब्दुल हमीद लाहौरी, मुहम्मद वारिस, चंद्रभान ब्राह्मण तथा कलीम इस काल के प्रमुख विद्वान थे।
➣ अब्दुल हमीद लाहौरी द्वारा रचित ‘पादशाहनामा’ शाहजहाँ के शासनकाल का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ माना जाता है।
➣ शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह ने ‘सिर्र-ए-अकबर’ के नाम से 52 उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद कराया तथा ‘मज्म-उल-बहरीन’ की रचना की।
➣ कवीन्द्राचार्य सरस्वती ने शाहजहाँ से निवेदन कर हिन्दुओं पर लगाया गया तीर्थयात्रा कर समाप्त करवाया।
➣ शाहजहाँ ने दरबार की परम्पराओं में परिवर्तन करते हुए सिजदा के स्थान पर ज़मीनबोस तथा बाद में चहार तस्लीम को मान्यता दी।
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में फ़ारसी भाषा, साहित्य, चित्रकला तथा स्थापत्य कला का अभूतपूर्व विकास हुआ, जिसके कारण यह काल सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध माना जाता है।
• स्वर्ण काल – शाहजहाँ का शासनकाल
• राजकीय इतिहासकार – अब्दुल हमीद लाहौरी
• प्रमुख ग्रन्थ – पादशाहनामा
• राजकवि – कलीम
• नई राजधानी – शाहजहानाबाद
• प्रसिद्ध इमारत – ताजमहल
• उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद – सिर्र-ए-अकबर (दारा शिकोह)
• मौलिक कृति – मज्म-उल-बहरीन
• शाहजहाँ को “स्वर्ण युग” का शासक कहने वाले प्रमुख इतिहासकार – डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव एवं एल्फिन्स्टन
शाहजहाँकालीन प्रमुख घटनाएँ (वर्षवार)
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1628 ई. | शाहजहाँ का आगरा में राज्याभिषेक एवं मुगल सम्राट बना। |
| 1628–1635 ई. | बुंदेला (जुझार सिंह) का विद्रोह। |
| 1628–1631 ई. | खान-ए-जहाँ लोदी का विद्रोह। |
| 1630–1632 ई. | गुजरात, खानदेश एवं दक्कन में भीषण अकाल। |
| 1631 ई. | मुमताज़ महल की मृत्यु। |
| 1632 ई. | हुगली में पुर्तगालियों का दमन। |
| 1632 ई. | माही मरातिब सम्मान की शुरुआत। |
| 1633 ई. | अहमदनगर का मुगल साम्राज्य में विलय। |
| 1636 ई. | बीजापुर एवं गोलकुण्डा ने मुगल अधीनता स्वीकार की; औरंगज़ेब पहली बार दक्कन का सूबेदार नियुक्त हुआ। |
| 1638 ई. | अलीमर्दान ख़ाँ द्वारा कंधार मुगलों को सौंपा गया। |
| 1638–1648 ई. | शाहजहानाबाद (दिल्ली) का निर्माण। |
| 1648 ई. | राजधानी आगरा से शाहजहानाबाद (दिल्ली) स्थानांतरित की गई; लाल किला एवं शाही राजधानी का उद्घाटन। |
| 1646–1647 ई. | बल्ख एवं बदख्शाँ अभियान। |
| 1649 ई. | ईरान ने कंधार पर पुनः अधिकार किया। |
| 1649, 1652, 1653 ई. | कंधार को पुनः प्राप्त करने के तीन मुगल अभियान असफल रहे। |
| 1657 ई. | शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा; उत्तराधिकार का युद्ध प्रारम्भ। |
| 1658 ई. | सामूगढ़ के युद्ध में औरंगज़ेब की विजय; शाहजहाँ को आगरा किले में बंदी बनाया गया। |
| 1659 ई. | देवराई के युद्ध के बाद दारा शिकोह की हत्या। |
| 1666 ई. | आगरा किले में शाहजहाँ की मृत्यु; ताजमहल में दफनाया गया। |
समकालीन विदेशी यात्री
➣ शाहजहाँ के शासनकाल में अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत की यात्रा की और मुगल प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था, व्यापार तथा उत्तराधिकार के युद्ध का विस्तृत वर्णन किया। इन यात्रियों के वृत्तांत मुगलकालीन इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।
| विदेशी यात्री | देश | प्रमुख विवरण |
|---|---|---|
| जीन बैप्टिस्ट टेवर्नियर | फ़्रांस | प्रसिद्ध जौहरी था। शाहजहाँ एवं औरंगज़ेब के शासनकाल में छह बार भारत आया। उसने तख्त-ए-ताऊस, कोहिनूर तथा मुगल वैभव का विस्तृत वर्णन किया। |
| फ़्राँस्वा बर्नियर | फ़्रांस | चिकित्सक एवं इतिहासकार था। उसने उत्तराधिकार के युद्ध तथा मुगल प्रशासन, भूमि व्यवस्था एवं समाज का विस्तृत वर्णन किया। |
| पीटर मुंडी | इंग्लैंड | अंग्रेज़ व्यापारी एवं यात्री था। उसने 1630–32 ई. के गुजरात एवं दक्कन के भीषण अकाल तथा भारतीय व्यापार का वर्णन किया। |
| निकोलाओ मनूची | इटली | उत्तराधिकार के युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी था। उसने स्टोरिया दो मोगोर नामक ग्रंथ में मुगल इतिहास का विस्तृत वर्णन किया। |
शाहजहाँ के काल में आने वाले प्रमुख विदेशी यात्रियों में जीन बैप्टिस्ट टेवर्नियर, फ़्राँस्वा बर्नियर, पीटर मुंडी तथा निकोलाओ मनूची प्रमुख हैं। इनमें टेवर्नियर और बर्नियर फ़्रांसीसी, पीटर मुंडी अंग्रेज़ तथा निकोलाओ मनूची इतालवी यात्री थे।
शाहजहाँ के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ (1628–1658 ई.)
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1628 ई. | 4 फरवरी को आगरा में शाहजहाँ का राज्याभिषेक; विरोधियों का दमन एवं शासन का पुनर्गठन। |
| 1629–1631 ई. | खानजहाँ लोदी के विद्रोह का दमन किया गया। |
| 1631 ई. | मुमताज़ महल की बुरहानपुर में मृत्यु; ताजमहल के निर्माण की योजना बनाई गई। |
| 1632 ई. | ताजमहल का निर्माण कार्य प्रारम्भ; हुगली से पुर्तगालियों को निष्कासित किया गया। |
| 1633 ई. | दौलताबाद दुर्ग पर मुगलों का अधिकार; निजामशाही सत्ता का अंत। |
| 1636 ई. | बीजापुर एवं गोलकुण्डा के साथ संधि; औरंगज़ेब को प्रथम बार दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया गया। |
| 1638 ई. | कंधार पुनः मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हुआ। |
| 1639 ई. | शाहजहानाबाद नगर तथा लाल किला के निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। |
| 1645–1647 ई. | बल्ख एवं बदख्शाँ अभियान चलाया गया, किन्तु स्थायी सफलता नहीं मिली। |
| 1648 ई. | लाल किला एवं शाहजहानाबाद का निर्माण पूर्ण; राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की गई। |
| 1649 ई. | फ़ारस ने पुनः कंधार पर अधिकार कर लिया। |
| 1652 ई. | कंधार को पुनः प्राप्त करने का दूसरा मुगल अभियान भी असफल रहा। |
| 1653 ई. | ताजमहल का निर्माण पूर्ण हुआ। |
| 1657 ई. | शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उत्तराधिकार युद्ध प्रारम्भ हुआ। |
| 1658 ई. | सामूगढ़ के युद्ध में औरंगज़ेब ने दारा शिकोह को पराजित किया; शाहजहाँ को आगरा के किले में कैद कर दिया गया। |
मुमताज
➣ मुमताज महल का जन्म 1593 ई. में आगरा में हुआ था। उसका वास्तविक नाम अर्जुमन्द बानू बेगम था। वह फ़ारसी मूल के कुलीन परिवार से सम्बन्ध रखती थी।
➣ उसके पिता आसफ खाँ सम्राट जहाँगीर के दरबार में एक प्रभावशाली अमीर एवं वज़ीर थे, तथा उसकी बुआ नूरजहाँ स्वयं जहाँगीर की पत्नी और साम्राज्ञी थी। इस प्रकार मुमताज, नूरजहाँ की भतीजी थी।
➣ शाहजहाँ (तब शहज़ादा खुर्रम) की सगाई अर्जुमन्द बानू से 1607 ई. में हुई थी, परन्तु विवाह पाँच वर्ष पश्चात 1612 ई. में सम्पन्न हुआ। यह शाहजहाँ का तीसरा विवाह था, परन्तु मुमताज उसकी सर्वाधिक प्रिय और प्रभावशाली पत्नी बनी।
➣ विवाह के पश्चात ही शाहजहाँ ने उसे “मुमताज महल” (महल की श्रेष्ठ/चयनित स्त्री) की उपाधि प्रदान की। इसके अतिरिक्त उसे “मलिक-ए-जमानी” (युग की स्वामिनी) की उपाधि भी प्राप्त थी।
➣ मुमताज न केवल शाहजहाँ की पत्नी अपितु उसकी अत्यन्त विश्वासपात्र सलाहकार भी थी। कहा जाता है कि शाहजहाँ राजकीय मुहर (मुहर उज़ुक़) भी उसे सौंप देता था और कई महत्त्वपूर्ण निर्णयों में उसकी सलाह ली जाती थी। वह सदैव शाहजहाँ के साथ उसके सैन्य अभियानों एवं यात्राओं में भी साथ रहती थी, यहाँ तक कि गर्भावस्था की दशा में भी।
➣ वह इतिहास में मुमताज महल के नाम से प्रसिद्ध हुई तथा आगरा का विश्वप्रसिद्ध ताजमहल शाहजहाँ ने उसी की याद में बनवाया था।
➣ इस मक़बरे के निर्माण में लगभग 22 वर्ष (1632-1653 ई. के लगभग) तथा हज़ारों कारीगरों व श्रमिकों का श्रम लगा। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है तथा इसे मुग़ल वास्तुकला की सर्वोत्तम कृति एवं विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। इसके वास्तुकार का नाम उस्ताद अहमद लाहौरी माना जाता है।
➣ 1631 ई. में शाहजहाँ के दक्षिण भारत अभियान (बुरहानपुर अभियान) के दौरान मुमताज भी उसके साथ थी। वहीं अपने 14वें बच्चे (पुत्री गौहर आरा) को जन्म देते समय प्रसव-सम्बन्धी जटिलताओं के कारण बुरहानपुर (वर्तमान मध्यप्रदेश) में उसकी मृत्यु हो गई।
➣ प्रारम्भ में उसे बुरहानपुर के ज़ैनाबाद उद्यान में अस्थायी रूप से दफनाया गया, बाद में लगभग छह माह पश्चात उसके अवशेषों को आगरा लाकर ताजमहल में स्थायी रूप से दफनाया गया। कहा जाता है कि उसकी मृत्यु से शाहजहाँ इतना शोकाकुल हुआ कि उसके बाल समय से पूर्व सफेद हो गए थे।
➣ मुमताज़ महल की 14 संतानों में से केवल चार पुत्र एवं तीन पुत्रियाँ ही वयस्कता तक जीवित रहीं, जबकि शेष संतानों की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो गई।
➣ जीवित संतानें थीं— जहाँआरा बेगम (1614 ई., शाहजहाँ की सबसे प्रिय पुत्री), दारा शिकोह (1615 ई., शाहजहाँ द्वारा उत्तराधिकारी घोषित), शाह शुजा (1616 ई.), रोशनआरा बेगम (1617 ई.), औरंगज़ेब (1618 ई., जो आगे चलकर मुगल सम्राट बना), मुराद बख्श (1624 ई.) तथा गौहरआरा बेगम (1631 ई., जिसके जन्म के समय ही मुमताज़ महल की मृत्यु हो गई)।
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