हुमायूँ (1530–1540 एवं 1555–1556 ई.) : इतिहास, युद्ध एवं प्रमुख घटनाएँ

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत हुमायूँ (1530–1540 एवं 1555–1556 ई.)
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हुमायूँ का राज्याभिषेक

➣ बाबर की मृत्यु के बाद 30 दिसम्बर, 1530 ई. को 23 वर्ष की आयु में हुमायूँ का राज्याभिषेक हुआ। इससे पूर्व, 1520 ई. में उसे बदख्शाँ का सूबेदार नियुक्त किया गया था।

नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ का जन्म बाबर की पत्नी माहम बेगम के गर्भ से 6 मार्च, 1508 ई. को काबुल में हुआ था।

➣ बाबर के चार पुत्र—हुमायूँ, कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल—में हुमायूँ सबसे बड़ा था। बाबर ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।

➣ हुमायूँ के छोटे भाई कामरान और अस्करी, गुलरुख बेगम से तथा सबसे छोटा भाई हिन्दाल एवं बहन गुलबदन बेगम, दिलदार बेगम से उत्पन्न बाबर की संतान थे।

➣ जब हुमायूँ आगरा की गद्दी पर बैठा, तब उसके साम्राज्य में काबुल और कंधार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त हिन्दूकुश पर्वत के पार स्थित बदख्शाँ पर भी मुगलों का ढीला-सा आधिपत्य था।

साम्राज्य का विभाजन

➣ राज्याभिषेक के पश्चात अपने पिता के निर्देश के अनुसार हुमायूँ ने अपने राज्य का बँटवारा अपने भाइयों में कर दिया-

कामरानकाबुल व कंधार , पंजाब
अस्करीसंभल
हिन्दालअलवर
सुलेमान मिर्जाबदख्शाँ
इससे केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ गई और भाइयों में सत्ता-संघर्ष की नींव पड़ गई, जो आगे चलकर हुमायूँ के लिये गंभीर संकट का कारण बना।

➣ हुमायूँ का अपने भाइयों को साम्राज्य में हिस्सा देना, उसकी प्रारंभिक भूलों में सबसे बड़ी भूल मानी जाती है। संभवतः यह तैमूरी परंपरा थी, जिसके अंतर्गत साम्राज्य को परिवार की संपत्ति मानकर भाइयों में बाँटा जाता था।

➣ लेकिन कामरान इन गरीबी से प्रस्त इलाक़ों से संतुष्ट नहीं था। उसने लाहौर और मुल्तान की ओर बढ़ कर उन पर अधिकार कर लिया।

➣ हुमायूँ गृह युद्ध प्रारम्भ भी नहीं करना चाहता था। इसलिए उसके पास इस स्थिति को मंजूर करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

➣ हुमायूँ को पूर्व के अफ़ग़ानों की बढ़ती शक्ति और गुजरात के सुल्तान, बहादुरशाह की विजयों दोनों से निपटना था।

प्रारंभिक कठिनाइयाँ

➣ राज्याभिषेक के बाद हुमायूँ को अनेक आंतरिक एवं बाह्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कालांतर में उसके भाइयों ने भी उसका साथ नहीं दिया, जिससे साम्राज्य की स्थिति और कमजोर हो गई।

➣ हुमायूँ के सबसे बड़े शत्रु अफगान थे, क्योंकि वे बाबर के समय से ही मुगलों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिये प्रयत्नशील थे। बंगाल और बिहार में अफगान सरदार शेरशाह सूरी का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा था।

➣ गुजरात में बहादुर शाह का बढ़ता हुआ प्रभाव भी मुगल साम्राज्य के लिये खतरा बन गया था, जिससे हुमायूँ को पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं से सामना करना पड़ा।

➣ बाबर अपने साम्राज्य को संगठित करने और उसकी उचित शासन व्यवस्था स्थापित करने में सफल नहीं हुआ था। उसने अधिकांश समय युद्धों में व्यतीत किया, जिस कारण प्रशासनिक ढाँचा सुदृढ़ नहीं हो पाया।

➣ राजकोष की कमी, सेना में अनुशासन का अभाव और सरदारों की आपसी फूट ने भी हुमायूँ की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया।

➣ मेलसन ने लिखा है- “जब उसकी (बाबर) मृत्यु हुई तो पूर्वकालीन मुसलमान-राजवंशों की भाँति मुगल राजवंश की जड़ें भी भारतीय भूमि पर जम नहीं सकी थीं।”

रिक्त राजकोष

➣ बाबर ने दिल्ली पर अधिकार करने के पश्चात् वहाँ के राजकोष को खुले हाथों अपने सैनिकों में वितरित किया, जिससे राजकोष पर भारी बोझ पड़ा।

पानीपत के युद्ध की विजय के बाद काबुल की जनता को चाँदी के सिक्के वितरित किये गए, जिससे बाबर को ‘कलंदर’ (फकीर के समान उदार दानी) की उपाधि भी मिली।

➣ हुमायूँ ने भी शासक बनने के पश्चात् आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयत्न नहीं किया और न ही धन के अपव्यय को रोकने का प्रयास किया। परिणामतः साम्राज्य आर्थिक दृष्टि से कमजोर हो गया और युद्धों तथा प्रशासन के लिये पर्याप्त धन का अभाव बना रहा।

राजपूत समस्या

➣ बाबर ने खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा को परास्त किया था, परंतु इससे राजपूत शक्ति पूर्णतः समाप्त नहीं हुई। बाबर के अंतिम समय में राजपूत पुनः संगठित होने लगे।

➣ इस बार राजपूतों का नेतृत्व राणा सांगा के पुत्र रतन सिंह (विक्रमादित्य) के हाथों में था, जो मुगलों को भारत से निष्कासित करने के लिये दृढ़ संकल्पित था।

➣ मेवाड़ की बढ़ती शक्ति तथा राजपूतों का पुनः संगठित होना हुमायूँ के लिये एक स्थायी चिंता का विषय बना रहा, यद्यपि हुमायूँ का इस दिशा में सीधा युद्ध अपेक्षाकृत कम हुआ।

अफगान समस्या

➣ हुमायूँ की प्रारंभिक कठिनाइयों में अफगान समस्या सर्वप्रमुख थी। राजपूतों के साथ-साथ अफगान सरदार भी पुनः अपना राज्य प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे थे।

➣ पानीपत के युद्ध में यद्यपि इब्राहिम लोदी पराजित हुआ और मारा गया, किंतु इससे अफगान शक्ति का पूर्णतः उन्मूलन नहीं हुआ। पूर्वी भारत में अफगान सरदार अब भी सशक्त बने हुए थे।

➣ इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी, बंगाल के शासक नुसरतशाह की सहायता से पुनः अपने पैतृक राज्य को प्राप्त करना चाहता था और इस उद्देश्य से उसने अफगान सरदारों को संगठित करने का प्रयास किया।

बिहार में शेर खाँ (आगे चलकर शेरशाह सूरी) भी स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहा था तथा धीरे-धीरे अपनी शक्ति व संसाधन बढ़ाकर मुगलों को भारत से निकालने की योजना बना रहा था। यही शेर खाँ आगे चलकर हुमायूँ का सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी बना।

➣ इब्राहिम लोदी का चाचा आलम खाँ भी गुजरात के शासक बहादुर शाह की सहायता लेकर दिल्ली पर अधिकार करना चाहता था, जिससे अफगान असंतोष और भी व्यापक रूप ले रहा था।

हुमायूँ के प्रमुख अभियान

कालिंजर का अभियान (1530-31 ई.)

➣ राज्याभिषेक के तुरंत बाद हुमायूँ का पहला सैनिक अभियान 1530 ई. में कालिंजर दुर्ग पर हुआ। कालिंजर का शासक राजा प्रतापरुद्र देव था।

➣ यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था, इसलिये हुमायूँ इसे अपने अधिकार में लेना चाहता था।

➣ किले पर घेरा डाले हुए ही उसे सूचना मिली कि अफ़ग़ान सरदार महमूद लोदी बिहार से जौनपुर की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो उसके लिये अधिक गंभीर खतरा था।

➣ अतः हुमायूँ ने कालिंजर पर पूर्ण विजय का प्रयास छोड़कर राजा प्रतापरुद्र देव से धन व सैनिकों के रूप में क्षतिपूर्ति लेकर समझौता कर लिया और स्वयं आगरा लौट आया।

दौहरिया का युद्ध (अगस्त, 1532 ई.)

➣ हुमायूँ ने अगस्त, 1532 ई. में गोमती नदी के किनारे दौहरिया (वर्तमान बाराबंकी जिला, उत्तर प्रदेश) नामक स्थान पर अफ़ग़ानों को परास्त किया।

➣ इस युद्ध में अफ़ग़ान सेना का नेतृत्व महमूद लोदी कर रहा था, जिसे गुप्त रूप से शेरशाह का भी सहयोग प्राप्त था।

➣ इस विजय के पश्चात् हुमायूँ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में जौनपुर पर अधिकार कर लिया, जिससे पूर्व दिशा में मुगल सत्ता पुनः सुदृढ़ हुई।

➣ इस सफलता से उत्साहित होकर हुमायूँ ने आगे बढ़कर चुनार के दुर्ग पर घेरा डाला, जो शेरशाह के अधिकार में था।

चुनार का घेरा (1532 ई.)

➣ हुमायूँ के चुनार के क़िले पर आक्रमण के समय यह क़िला अफ़ग़ान नायक शेरशाह (शेर ख़ाँ) के क़ब्ज़े में था।

➣ यह सशक्त दुर्ग आगरा और पूर्व के बीच के थल-मार्ग और नदी-मार्ग को नियंत्रित करता था, इसीलिये इसे पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता था।

➣ लगभग चार महीने तक लगातार क़िले को घेरे रहने के बाद शेर ख़ाँ ने हुमायूँ के सामने एक समझौता रखा।

➣ शेर ख़ाँ ने हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करते हुए अपने पुत्र क़ुतुब ख़ाँ को एक अफ़ग़ान सैनिक टुकड़ी के साथ हुमायूँ की सेना में भेज दिया।

➣ बदले में चुनार का क़िला शेर ख़ाँ के अधिकार में ही छोड़ दिया गया। हुमायूँ ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।

➣ संभवतः हुमायूँ गुजरात के बहादुरशाह की बढ़ती शक्ति और आगरा से लगी सीमा पर उसकी गतिविधियों के कारण चिंतित हो उठा था, इसलिये उसे जल्द-से-जल्द आगरा लौटना आवश्यक था।

➣ लौटने के बाद लगभग 1533 ई. तक हुमायूँ दिल्ली के निकट दीनपनाह नामक नए नगर के निर्माण में व्यस्त रहा। इसका उद्देश्य एक भव्य राजधानी स्थापित करना तथा मित्रों और शत्रुओं-दोनों पर मुगल साम्राज्य की शक्ति एवं वैभव की छाप छोड़ना था।

➣ साथ ही, गुजरात के बहादुरशाह से संभावित संघर्ष की स्थिति में दीनपनाह को दूसरी राजधानी के रूप में भी विकसित किया जा रहा था।

➣ इस बीच, पूर्व में शेरशाह अपनी शक्ति बढ़ाने में व्यस्त था, जबकि बहादुरशाह ने अजमेर को जीत लिया और पूर्वी राजस्थान को रौंद डाला।

➣ कालांतर में 1534 ई. में बिहार-क्षेत्र में हुए मुहम्मद ज़मान मिर्ज़ा एवं मुहम्मद सुल्तान मिर्ज़ा के विद्रोह को हुमायूँ ने सफलतापूर्वक दबाया।

बहादुरशाह का चित्तौड़ पर आक्रमण एवं रानी कर्णावती का हुमायूँ से सहायता मांगना

➣ बहादुरशाह, जो हुमायूँ की ही आयु का था, एक योग्य और महत्वाकांक्षी शासक था। वह 1526 ई. में गद्दी पर बैठा था और उसने मालवा पर आक्रमण करके उसे जीत लिया था।

➣ उसके बाद वह राजस्थान की ओर मुड़ा और चित्तौड़ पर घेरा डाल दिया। जल्दी ही उसने राजपूत सैनिकों को बुरी तरह पराजित कर दिया।

➣ किंवदंतियों के अनुसार राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता का अनुरोध किया था। हालांकि, इस घटना का समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, इसलिए अनेक इतिहासकार इसे प्रमाणित तथ्य नहीं मानते हैं।

➣ हुमायूँ बहादुरशाह के विरुद्ध अभियान पर निकला, किन्तु वह समय पर चित्तौड़ नहीं पहुँच सका। इससे पहले ही बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया और रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया।

➣ मुगल-हस्तक्षेप की आशंका के कारण बहादुरशाह ने राणा से संधि कर ली तथा पर्याप्त धनराशि लेकर घेरा उठा लिया। किंतु बाद में उसने पुनः चित्तौड़ पर आक्रमण किया और 1535 ई. में उस पर अधिकार कर लिया।

सारंगपुर/चम्पानेर अभियान (1535 ई.)

➣ बहादुरशाह ने हुमायूँ के लिए एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी। उसने इब्राहीम लोदी के सम्बन्धियों को अपने दरबार में आश्रय दिया तथा हुमायूँ के विरुद्ध असफल विद्रोहियों का भी स्वागत किया।

➣ बहादुरशाह की बढ़ती शक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से हुमायूँ ने मालवा पर आक्रमण किया और उसे मालवा से पीछे हटने पर विवश कर दिया।

➣ बहादुरशाह मांडू से चम्पानेर भागा, वहाँ से अहमदाबाद पहुँचा और अंततः काठियावाड़ की ओर चला गया।

➣ परिणामस्वरूप मालवा और गुजरात के समृद्ध प्रदेशों के साथ-साथ मांडू एवं चम्पानेर के दुर्गों में संचित विशाल राजकोष भी हुमायूँ के अधिकार में आ गया।

➣ इस प्रकार हुमायूँ ने मालवा और गुजरात पर अधिकार स्थापित कर लिया तथा गुजरात का प्रशासन अपने छोटे भाई अस्करी को सौंप दिया।

➣ किन्तु हुमायूँ के गुजरात छोड़ते ही मुगल प्रशासन कमजोर पड़ गया। इसका लाभ उठाकर बहादुरशाह ने 1536 ई. तक गुजरात और मालवा के अधिकांश भागों पर पुनः अधिकार कर लिया। ।

➣ बाद में फ़रवरी 1537 ई. में दीव के निकट पुर्तग़ालियों के साथ हुए संघर्ष के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।

पुनः चुनार का घेरा (1537 ई.)

➣ आगरा से हुमायूँ की अनुपस्थिति (फ़रवरी, 1535 ई. से फ़रवरी, 1537 ई. तक) के दौरान शेर ख़ाँ ने अपनी स्थिति और अधिक सुदृढ़ कर ली थी। अफ़ग़ान सरदार उसके नेतृत्व में संगठित होने लगे थे।

1537 ई. में हुमायूँ पूर्व की ओर बढ़ा और पुनः चुनार के क़िले का घेरा डाला। क़ुतुब ख़ाँ ने योजनानुसार लगभग छह महीने तक हुमायूँ को क़िले पर अधिकार नहीं करने दिया।

➣ अंततः हुमायूँ ने कूटनीति तथा कुशल तोपची रूमी ख़ाँ के प्रयासों से चुनार के क़िले पर अधिकार कर लिया।

➣ इन छह महीनों के दौरान शेर ख़ाँ ने बंगाल अभियान में सफलता प्राप्त की, उसकी राजधानी गौड़ पर अधिकार कर लिया तथा अपने परिवार और राजकोष को रोहतासगढ़ के क़िले में सुरक्षित पहुँचा दिया।

➣ शेर ख़ाँ के आक्रमण के समय बंगाल के सुल्तान महमूदशाह ने हुमायूँ से उसके विरुद्ध सहायता की प्रार्थना की।

➣ शेर ख़ाँ ने हुमायूँ के पास प्रस्ताव भेजा कि यदि उसे बंगाल रहने दिया जाए, तो वह बिहार हुमायूँ को सौंप देगा तथा प्रतिवर्ष दस लाख रुपये कर के रूप में देगा। किन्तु हुमायूँ इस प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं हुआ।

बंगाल ‘सोने का देश’ माना जाता था। वह उद्योगों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध तथा विदेशी व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। इन्हीं कारणों से हुमायूँ ने शेर ख़ाँ का प्रस्ताव अस्वीकार कर बंगाल पर अभियान चलाने का निर्णय लिया।

➣ इस प्रकार हुमायूँ और शेर ख़ाँ के मध्य संघर्ष का मुख्य कारण बंगाल बना।

1538 ई. में हुमायूँ ने बंगाल पर अधिकार कर उसकी राजधानी गौड़ में प्रवेश किया। वहाँ व्यापक जनहानि और विनाश देखकर उसने गौड़ का नाम जन्नताबाद रख दिया।

➣ दूसरी ओर, शेर ख़ाँ पहले ही गौड़ छोड़कर रोहतासगढ़ पहुँच चुका था। इस प्रकार उसने अपनी रणनीति से हुमायूँ को चकमा दे दिया।

➣ इस बीच शेर ख़ाँ ने बनारस, कड़ा, बहराइच, कन्नौज तथा सम्भल पर अधिकार कर लिया। साथ ही उसने जौनपुर और चुनारगढ़ को घेरकर आगरा से हुमायूँ का संपर्क विच्छेद कर दिया।

➣ उधर हुमायूँ की अनुपस्थिति में हिन्दाल ने शेख बहलोल की हत्या कर स्वयं को आगरा का बादशाह घोषित कर दिया।

चौसा का युद्ध (1539 ई.)

➣ बंगाल विजय के पश्चात् हुमायूँ जब आगरा लौट रहा था, तब बक्सर के निकट 26 जून, 1539 ई. को हुमायूँ एवं शेर ख़ाँ की सेनाओं के मध्य गंगा नदी के तट पर स्थित चौसा नामक स्थान पर भीषण संघर्ष हुआ।

➣ इस समय तक हुमायूँ की सेना बंगाल के अभियान और लंबी यात्रा से पहले से ही थकी हुई और बीमारियों से ग्रस्त थी। शेर ख़ाँ ने युद्ध से बचने का बहाना बनाते हुए हुमायूँ के सामने शांति-प्रस्ताव रखा और दिखावटी रूप से समझौते की बात चलाई। इस झाँसे में आकर हुमायूँ ने अपनी सेना को असावधान कर दिया और कर्मनासा नदी पार कर उसके पूर्वी तट पर डेरा डाल दिया। शेर ख़ाँ ने इसी असावधानी का लाभ उठाते हुए अचानक रात्रि में आक्रमण कर दिया।

➣ मुगल सेना पूर्णतः अप्रत्याशित आक्रमण से घबरा गई और भारी अव्यवस्था फैल गई। तभी हुमायूँ को अपनी भूल का आभास हुआ, परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

➣ इस अफरा-तफरी में हुमायूँ नदी में कूद गया तथा एक भिश्ती (पानी भरने वाला व्यक्ति) की मशक के सहारे गंगा नदी पार करके अपनी जान बचाई। इस युद्ध में हुमायूँ के अनेक सरदार तथा सैनिक मारे गये या डूब गये, और मुगल सेना का भारी विनाश हुआ।

➣ जिस भिश्ती ने हुमायूँ की जान बचाई थी, उसे हुमायूँ ने कृतज्ञतावश एक दिन के लिये दिल्ली का बादशाह बना दिया। इस अल्पकालीन ‘बादशाह’ ने अपने शासनकाल में चमड़े का सिक्का जारी किया था —-यह घटना इतिहास में हुमायूँ की उदारता और विचित्र स्वभाव के उदाहरण के रूप में प्रसिद्ध है।

➣ चौसा के युद्ध में हुमायूँ की पराजय के पीछे कई कारण उत्तरदायी थे — उसकी अव्यवस्थित एवं अनुशासनहीन सेना, भाइयों का सहयोग न मिलना (कामरान ने पंजाब से सेना भेजने में विलंब किया), शेर ख़ाँ की कूटनीतिक चालों को न समझ पाना, तथा सेना का दीर्घकालीन अभियानों से थक जाना।

➣ इस पराजय में हुमायूँ ने अपने अनेक विश्वस्त सरदार, हाथी, तोपखाना तथा भारी मात्रा में सैनिक सामग्री खो दी, जिससे उसकी सैन्य शक्ति को गहरा आघात पहुँचा।

➣ चौसा के युद्ध में सफल होने के बाद शेर ख़ाँ ने स्वयं को मुगलों के समकक्ष शासक घोषित करते हुए शेरशाह की उपाधि धारण की। साथ ही उसने अपने नाम के खुतबे पढ़वाये तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाने का आदेश दिया, जो उसकी स्वतंत्र सत्ता की औपचारिक घोषणा थी।

➣ चौसा की विजय ने शेरशाह की प्रतिष्ठा और शक्ति को अत्यंत बढ़ा दिया तथा यह उसके आगामी संघर्ष (कन्नौज/बिलग्राम के युद्ध) के लिये निर्णायक आधार बना, जिसमें अंततः हुमायूँ को भारत से ही निर्वासित होना पड़ा।

बिलग्राम या कन्नौज का युद्ध (1540 ई.)

➣ चौसा की पराजय के पश्चात् हुमायूँ ने आगरा पहुँचकर पुनः अपनी शक्ति संगठित करने का प्रयास किया तथा अपने भाइयों को सहायता हेतु बुलाया। मई, 1540 ई. में गंगा नदी के तट पर बिलग्राम (कन्नौज के निकट) नामक स्थान पर हुमायूँ और शेरशाह की सेनाओं में पुनः निर्णायक संघर्ष हुआ।

➣ इस युद्ध में हुमायूँ ने वीरतापूर्वक अफ़गानों का मुकाबला किया। युद्ध में उसके भाई हिन्दाल एवं अस्करी भी उपस्थित थे, परंतु मुगल सरदारों के मध्य पूर्ववत् एकता का अभाव बना रहा।

कामरान हुमायूँ की सहायता हेतु लाहौर से आया था, परंतु सेना के नेतृत्व के प्रश्न पर हुमायूँ से उसका मतभेद हो गया, जिस कारण वह सहायता किये बिना ही अपनी सेना सहित लाहौर लौटने का निर्णय कर लिया। इससे मुगल सेना की शक्ति और भी क्षीण हो गई।

➣ शेरशाह ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अत्यंत कुशल रणनीति अपनाई – उसने गंगा नदी के किनारे की भूमि को घेरते हुए मुगल सेना के लिये पानी और संसाधनों तक पहुँच कठिन बना दी, जिससे मुगल शिविर में अव्यवस्था और भय फैल गया।

➣ अंततः हुमायूँ शेरशाह से निर्णायक रूप से पराजित हुआ। इस युद्ध के पश्चात् शेर ख़ाँ ने आगरा और दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया, जिससे संपूर्ण उत्तर भारत पर अफ़गान सत्ता पुनः स्थापित हो गई।

➣ इस युद्ध की विशेषता यह रही कि तारीख़-ए-रशीदी के लेखक मिर्ज़ा हैदर दोगलत ने स्वयं इस युद्ध में भाग लिया और अपने ग्रंथ में लिखा कि इस युद्ध में एक भी तीर या गोली नहीं चली और मुगल सेना युद्धक्षेत्र से बिना संघर्ष किये ही भाग खड़ी हुई – यह विवरण मुगल सेना के मनोबल और अनुशासन की भयावह स्थिति को दर्शाता है।

➣ बिलग्राम की इस पराजय के साथ ही हुमायूँ का साम्राज्य पूर्णतः बिखर गया, और उसे अपने जीवन की रक्षा के लिये भटकते हुए सिंध की ओर पलायन करना पड़ा।

➣ इस प्रकार कुछ समयांतराल के लिये भारत से मुग़ल वंश का अस्तित्व ही समाप्त हो गया और शेर ख़ाँ ने दिल्ली में सूर वंश (1540-1555 ई.) की स्थापना करते हुए स्वयं को शेरशाह सूरी के रूप में प्रतिष्ठित किया।

हुमायूँ का निर्वासन काल (1540-55 ई.)

➣ शेरशाह से परास्त होने के पश्चात् हुमायूँ सिंध की ओर भाग गया, जहाँ से प्रारंभ होकर उसने लगभग 15 वर्ष (1540-1555 ई.) तक घुमक्कड़ों जैसा निर्वासित जीवन व्यतीत किया।

➣ प्रारंभिक लगभग ढाई वर्षों तक वह सिंध और उसके पड़ोसी क्षेत्रों (मारवाड़, अमरकोट आदि) में भटकता रहा तथा साम्राज्य पुनः प्राप्त करने की योजनाएँ बनाता रहा। इस समय में उसके अपने भाई भी उसके विरुद्ध हो गये।

➣ निर्वासन के दौरान आरंभ में हुमायूँ ने अमरकोट के राणा वीरसाल (परमार वंश) के यहाँ शरण ली थी। इसी स्थान पर आगे चलकर अकबर का जन्म हुआ था।

➣ इस निर्वासन काल में ही हुमायूँ ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरु, फ़ारसी शिया मीर बाबा दोस्त (मीर अली अकबर जामी) की पुत्री हमीदा बेगम से 29 अगस्त, 1541 ई. को निकाह किया।

➣ हमीदा बेगम को मरियम मकानी के नाम से भी जाना जाता है। इस विवाह से अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई. को अमरकोट में हुआ।

➣ अंततः 1544 ई. में हुमायूँ ने ईरान के शाह तहमास्प प्रथम के दरबार में शरण ली। फारस जाते समय शिशु अकबर अस्करी के हाथ लग गया था और कुछ समय उसी की देख-रेख में कंधार में रहा।

➣ शाह तहमास्प ने इस शर्त पर शरण दी कि हुमायूँ शिया मत स्वीकार व प्रचारित करेगा, तथा कंधार जीतने के बाद उसे ईरान को सौंप देगा। हालाँकि बाद में हुमायूँ कंधार देने में बहाने बनाने लगा।

➣ तहमास्प के दरबार में ही हुमायूँ को बैराम ख़ाँ (आगे चलकर अकबर का संरक्षक) नामक शिया मुसलमान सरदार की सेवाएँ प्राप्त हुईं, जो उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

➣ हुमायूँ का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा — वह समृद्धि से कंगाली में गया और फिर कंगाली से समृद्धि की ओर लौटा। 1555 ई. में सूर साम्राज्य के विघटन के बाद वह पुनः दिल्ली पर अधिकार करने में सफल हुआ।

इस प्रकार हुमायूँ के शासनकाल को दो चरणों में बाँटा जाता है — प्रथम चरण: 1530-1540 ई., तथा द्वितीय चरण: 1555-1556 ई.

हुमायूँ की भारत वापसी

➣ शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह की मृत्यु के पश्चात् सूर साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर अव्यवस्था फैल गई, जिससे हुमायूँ को हिन्दुस्तान पर पुनः अधिकार प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर मिला।

➣ हुमायूँ ने ईरानी शासक शाह तहमास्प की सहायता से की सेना के साथ 1545 ई. में पुनः कंधार एवं काबुल पर अधिकार कर लिया।

➣ काबुल पर अधिकार करते समय हुमायूँ की ओर से युद्ध करते हुए उसका भाई हिन्दाल मारा गया। इसके पश्चात् हुमायूँ ने अपने भाई कामरान के पुत्र अब्दुल मआली को अपने संरक्षण में ले लिया तथा उसे फ़रज़ंद (पुत्र) कहकर पुकारता था।

➣ इन सफलताओं से उत्साहित होकर हुमायूँ ने भारत की ओर अपना अभियान आगे बढ़ाया। 5 सितम्बर, 1554 ई. को वह अपनी सेना के साथ पेशावर पहुँचा तथा फरवरी, 1555 ई. में उसने लाहौर पर क़ब्ज़ा कर लिया।

➣ लाहौर पर अधिकार के साथ ही पंजाब की ओर मुगलों का मार्ग प्रशस्त हो गया, जिससे आगे चलकर मच्छीवारा एवं सरहिंद जैसे निर्णायक युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

मच्छिवारा का युद्ध (15 मई, 1555 ई.)

➣ लाहौर पर अधिकार करने के पश्चात् हुमायूँ ने पंजाब में आगे बढ़ते हुए लुधियाना से पूर्व में, सतलुज नदी के किनारे स्थित मच्छीवारा नामक स्थान पर अफ़ग़ान सरदारों नसीब ख़ाँ एवं तातार ख़ाँ की सेनाओं का सामना किया।

➣ ये अफ़ग़ान सरदार सिकंदर सूरी के अधीन कार्यरत थे और पंजाब क्षेत्र में मुगलों की बढ़त को रोकने का प्रयास कर रहे थे, परंतु सूर वंश में फैली आंतरिक फूट के कारण अब पूर्व जैसा संगठित प्रतिरोध संभव नहीं रह गया था।

➣ युद्ध का निर्णय हुमायूँ के पक्ष में रहा और अफ़ग़ान सेना पराजित होकर पीछे हट गई। इस विजय से हुमायूँ का मनोबल बढ़ा तथा भारत-पुनर्विजय अभियान को एक ठोस आधार मिला।

➣ इस सफलता के फलस्वरूप संपूर्ण पंजाब मुग़लों के अधिकार में आ गया, जिससे दिल्ली-आगरा की ओर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

सरहिंद का युद्ध (22 जून, 1555 ई.)

➣ मच्छीवारा की विजय के पश्चात् हुमायूँ की सेना ने आगे बढ़कर सरहिंद के निकट सूर वंश के तत्कालीन शासक सुल्तान सिकंदर सूर की सेना का सामना किया।

➣ इस युद्ध में अफ़ग़ान सेना का नेतृत्व सुल्तान सिकंदर सूर ने तथा मुग़ल सेना का नेतृत्व बैराम ख़ाँ ने किया। सिकंदर सूरी ने अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ हुमायूँ का मार्ग रोकने का प्रयास किया, परंतु मुगल सेना ने उत्कृष्ट रणकौशल का प्रदर्शन करते हुए अफ़ग़ान सेना को बुरी तरह पराजित किया।

➣ इस निर्णायक विजय से सिकंदर सूरी की शक्ति पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो गई और वह युद्धक्षेत्र छोड़कर भाग गया, जिससे दिल्ली-आगरा पर मुगल आधिपत्य की राह में अब कोई बड़ी बाधा नहीं रह गई।

➣ तत्पश्चात् 23 जुलाई, 1555 ई. को हुमायूँ ने एक बार पुनः दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लिया, और इस प्रकार लगभग 15 वर्षों के निर्वासन के बाद मुगल सत्ता दिल्ली में पुनर्स्थापित हुई।

हुमायूं की मृत्यु (1556 ई.)

➣ किंतु यह दुर्भाग्य ही था कि हुमायूँ इस विजय के फल का आनन्द उठाने के लिये अधिक समय तक जीवित नहीं रह सका, और कुछ ही महीनों बाद उसकी मृत्यु हो गई।

➣ जनवरी, 1556 ई. में दीनपनाह नामक भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूँ की मुत्यु हो गयी। इस समय अकबर पंजाब में था।

➣ लेनपूल ने कहा है कि हुमायूँ का अर्थ होता है भाग्यवान, परन्तु वह एक अत्यधिक दुर्भाग्यशाली व्यक्ति था। वह जीवन भर ठोकर खाता रहा और ठोकर खाकर ही उसकी मृत्यु हो गई।

हुमायूँ की असफलता उसकी सुन्दर परन्तु विवेक रहित दयालुता थी।– लेनपूल

सम्बंधित तथ्य

➣ हुमायूँ को अबुल फ़ज़ल ने इन्सान-ए-कामिल कहकर सम्बोधित किया है। अबुल फजल ने हुमायूँ की तुलना अरस्तु से की है।

➣ हुमायूं ने दिल्ली में दीनपनाह नामक नगर बसाया तथा इसमें शेर मण्डल नामक पुस्तकालय बनवाया, जिसमें भारी संख्या में पुस्तकें संगृहीत की गई।

➣ हुमायूं को खगोलशास्त्र एवं भूगोल में गहरी रूचि थी। सैन्य अभियान के दौरान भी हुमायूँ कुछ पुस्तकें अपने साथ ले जाता था।

➣ ज्योतिष में विश्वास के कारण हुमायूं सप्ताह के सातों दिन सात रंग की पोशाक पहनता था। वह रविवार को पीले, शनिवार को काले तथा सोमवार को सफेद कपड़े पहनता था।

➣ हुमायूँ की अपने जीवन में असफलता का प्रमुख कारण उसका कमजोर चरित्र था। हुमायूँ अफीम का शौकीन था।

➣ लोक शिकायते बादशाह तक पहुंचाने के लिए हुमायूँ ने तबद ए अदल (न्याय ढोल) की शुरूआत की।

➣ हुमायूँ ने कोहिनूर हीरा पानीपत की लड़ाई के समय ग्वालियर के दिवंगत राजा विक्रमजीत के परिवार से प्राप्त किया था।

➣ हुमायूँ ने दिल्ली में मीनाबाजार की शुरूआत की तथा मदरसा-ए-बेगम विद्यालय खुलवाया।

हाजी बेगम , उसकी पत्नी ने दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा बनवाया। इसकी सबसे बड़ी विशेषता संगमरमर का बना गुम्बद है।

➣ हुमायूँ की सौतेली बहन गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा की रचना की। जिसमे उसका वर्णन मिलता है।

➣ हुमायूँ की मृत्यु के बाद हेमू ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर विक्रमादित्य (14वां व अंतिम विक्रमादित्य) की उपाधि धारण कर अपना राज्याभिषेक कराया।

हेमू (हेमचन्द्र) : दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने वाला प्रथम और एकमात्र हिन्दू शासक

➣ मध्यकालीन भारत के इतिहास में हेमू प्रथम और एकमात्र हिन्दू शासक था जिसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था।

➣ उसका पूरा नाम हेमचन्द्र विक्रमादित्य था और वह रीवाड़ी (वर्तमान हरियाणा) के एक साधारण व्यापारी परिवार से सम्बन्ध रखता था।

➣ हेमू ने अपने जीवन की शुरुआत नमक के व्यापारी के रूप में की थी। बाद में उसने इस्लामशाह सूरी के शासनकाल में बाज़ारों के अधीक्षक (दीवान-ए-बाज़ार) के रूप में काम करना शुरू किया था।

उसने अपने सैनिक जीवन में बाईस लड़ाईयों में भाग लिया और एक भी नहीं हारी, जिससे उसकी वीरता और रणनीति-कुशलता प्रमाणित होती है।

➣ उसकी लगातार सैन्य सफलताओं से प्रभावित होकर आदिलशाह सूरी ने उसे अपना वज़ीर (प्रधानमंत्री) तथा प्रधान सेनापति नियुक्त कर दिया।

➣ आदिलशाह ने हेमू को मुग़लों को भारत से खदेड़ने का उत्तरदायित्व सौंपा। हेमू ने पहले आगरा पर अधिकार किया, फिर बंगाल के मुग़ल सूबेदार को हराकर आगे बढ़ा और अन्ततः 50,000 घुड़सवार, 500 हाथी तथा एक विशाल तोपखाना लेकर दिल्ली की ओर कूच किया।

➣ दिल्ली के निकट तुगलकाबाद में हुए एक संघर्षपूर्ण युद्ध में हेमू ने मुग़ल सेनापति तर्दी बेग को पराजित किया और दिल्ली तथा आगरा दोनों पर अधिकार कर लिया।

➣ इस विजय के बाद उसका पुराने किले (दिल्ली) में राज्याभिषेक हुआ। उस समय उसने स्वतंत्र शासक के रूप में स्वयं को “विक्रमादित्य” की उपाधि से सुसज्जित किया। यह प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुरूप था, जिसमें विक्रमादित्य एक प्रतिष्ठित शाही उपनाम माना जाता था।

पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556 ई.) हेमू और अकबर की सेना के बीच लड़ा गया, जिसमें हेमू की आँख में तीर लगने से वह बेहोश हो गया और मुग़ल सेना ने युद्ध जीत लिया।

➣ पानीपत के द्वितीय युद्ध में जब हेमू की आँख में तीर लगा और वह बेहोश होकर हाथी के हौदे से गिर पड़ा, तो उसके सैनिकों में अफरा-तफरी मच गई और मुग़ल सेना विजयी हुई।

➣ बेहोश हेमू को मुग़ल सैनिक बैरम खाँ के सामने अकबर के शिविर में लाए। बैरम खाँ ने अकबर से हेमू को “ग़ाज़ी” (काफिर-हन्ता) की उपाधि दिलाने हेतु स्वयं उसका सिर काटने का आग्रह किया।

➣ बेहोश हेमू को मुग़ल सैनिक बैरम ख़ाँ और अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बैरम ख़ाँ ने अकबर को “ग़ाज़ी” (काफ़िर-हन्ता) की उपाधि प्राप्त करने के लिए हेमू का वध करने की सलाह दी। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में हेमू की मृत्यु के संबंध में भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं, किन्तु अंततः उसका सिर काट दिया गया।

➣ इसके बाद हेमू का सिर काबुल भेज दिया गया, जबकि उसका धड़ दिल्ली के एक द्वार पर लटका दिया गया, ताकि विरोधियों में भय उत्पन्न हो।

इतिहासकार इसे प्राचीन भारत के प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा से जोड़ते हुए अंतिम हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य या 14वाँ विक्रमादित्य कहते हैं (प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय थे)।

हुमायूँ के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ (1530–1556 ई.)

वर्ष प्रमुख घटना
1530 ई. 30 दिसम्बर को बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ मुगल सम्राट बना।
1532 ई. दौहरिया के युद्ध में महमूद लोदी को पराजित किया तथा चुनार दुर्ग का प्रथम घेराव किया।
1533 ई. दीनपनाह नगर (दिल्ली) की स्थापना प्रारम्भ की।
1535 ई. बहादुर शाह को पराजित कर माण्डू, चम्पानेर एवं गुजरात पर अधिकार किया।
1537 ई. चुनार दुर्ग पर अधिकार; शेरखाँ (शेरशाह) के विरुद्ध अभियान।
1538 ई. गौड़ (बंगाल) पर अधिकार; नगर का नाम जन्नताबाद रखा।
1539 ई. चौसा के युद्ध में शेरशाह सूरी से पराजित।
1540 ई. कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में पराजित होकर भारत छोड़ने को विवश हुआ; भारत में सूरी साम्राज्य की स्थापना हुई।
1541 ई. हमीदा बानो बेगम से विवाह।
1542 ई. अकबर का जन्म अमरकोट में हुआ।
1545 ई. काबुल एवं कंधार पर पुनः अधिकार स्थापित किया।
1555 ई. मच्छीवाड़ा एवं सरहिन्द के युद्धों में विजय प्राप्त कर दिल्ली पर पुनः अधिकार किया।
1556 ई. 24 जनवरी को दीनपनाह (पुराना किला) की पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूँ की मृत्यु हो गई।

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