महात्मा गाँधी (1869-1948) : जीवन परिचय, आंदोलन, विचार एवं महत्वपूर्ण तथ्य

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महात्मा गाँधी (1869-1948)

प्रारंभिक जीवन

➣ महात्मा गाँधी गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को काठियावाड़ क्षेत्र की पोरबंदर रियासत में हुआ था। उनका जन्म जिस पैतृक भवन में हुआ, वह आज कीर्ति मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

➣ गाँधीजी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। परिवार में उन्हें बचपन में मोनिया या मनु जैसे नामों से भी पुकारा जाता था।

➣ गाँधीजी का परिवार मोध बनिया समुदाय से संबंधित था और इसकी सामाजिक पृष्ठभूमि वैश्य परंपरा से जुड़ी थी। हालाँकि परिवार का संबंध व्यापारिक समुदाय से था, लेकिन गाँधीजी के दादा और पिता काठियावाड़ की देशी रियासतों में प्रशासनिक पदों पर कार्यरत रहे।

➣ गाँधीजी के दादा उत्तमचंद गाँधी, जिन्हें ओता गाँधी और पिता करमचंद उत्तमचंद गाँधी, जिन्हें सामान्यतः कबा गाँधी कहा जाता था, दोनों पोरबंदर के दीवान रहे और पिता बाद में राजकोट तथा अन्य रियासतों से भी जुड़े।

➣ करमचंद गाँधी की चार पत्नियाँ थीं। उनकी चौथी पत्नी पुतलीबाई थीं। पुतलीबाई से लक्ष्मीदास/कालिदास, रलियात, करसंदास और मोहनदास हुए। इस प्रकार मोहनदास अपने इन तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। रलियात गाँधीजी की बहन थीं।

➣ गाँधीजी की माता पुतलीबाई अत्यंत धार्मिक, संयमी और व्रत-उपवास का कठोर पालन करने वाली महिला थीं। वे नियमित रूप से प्रार्थना, व्रत और उपवास करती थीं। उनके धार्मिक अनुशासन और आत्मसंयम का गाँधीजी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।

➣ गाँधी परिवार मुख्यतः वैष्णव धार्मिक वातावरण से प्रभावित था। गुजरात के व्यापक सामाजिक वातावरण में जैन धर्म का भी प्रभाव था, जिससे अहिंसा, संयम और आत्मनियंत्रण जैसी धारणाओं से गाँधीजी का प्रारंभिक परिचय हुआ। आगे चलकर ये तत्व उनके नैतिक और राजनीतिक चिंतन के महत्वपूर्ण आधार बने।

बाल्यकाल

➣ गाँधीजी ने अपने जीवन के प्रारंभिक लगभग सात वर्ष पोरबंदर में बिताए। उन्होंने वहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा शुरू की।

➣ बाद में उनके पिता के राजकोट राज्य से जुड़ने के कारण नवंबर 1876 में परिवार पोरबंदर से राजकोट चला गया। राजकोट गाँधीजी के बाल्यकाल और किशोरावस्था के व्यक्तित्व-निर्माण का प्रमुख केंद्र बना।

➣ राजकोट में गाँधी परिवार का प्रमुख निवास कबा गाँधी नो डेलो था। यही वह स्थान है जहाँ गाँधीजी ने अपने बाल्यकाल के कई महत्वपूर्ण वर्ष बिताए। राजकोट स्थित उनके घर तथा वहाँ के उनके कमरे को उनके प्रारंभिक जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में दर्ज करता है।

➣ बाल्यकाल में गाँधीजी का स्वभाव संकोची, शांत और अंतर्मुखी था। वे अपने सहपाठियों की तुलना में बहुत अधिक मिलनसार नहीं थे। फिर भी उनमें नैतिक प्रश्नों को गंभीरता से लेने और अपने आचरण का आत्मपरीक्षण करने की प्रवृत्ति प्रारंभ से दिखाई देती थी।

➣ गाँधीजी पर श्रवण कुमार और राजा हरिश्चंद्र की कथाओं का विशेष प्रभाव पड़ा। श्रवण कुमार की कथा से उन्हें माता-पिता की सेवा और कर्तव्य का आदर्श मिला,

➣ जबकि हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा ने उनके भीतर सत्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता उत्पन्न की। बाद के जीवन में सत्य उनके पूरे दर्शन का केंद्रीय आधार बना।

➣ बचपन में गाँधीजी के भय को दूर करने में रंभा दाई की भी भूमिका रही। उन्होंने बालक मोहनदास को भय की स्थिति में रामनाम का जाप करने की सलाह दी। गाँधीजी के बाद के जीवन में रामनाम का विशेष आध्यात्मिक महत्व रहा।

➣ गाँधीजी के पिता के धार्मिक परिवेश में रामायण का पाठ भी होता था। इस प्रकार बाल्यकाल से ही गाँधीजी का संपर्क धार्मिक ग्रंथों, प्रार्थना और नैतिक कथाओं से हुआ। इन अनुभवों ने धर्म को उनके लिए केवल कर्मकांड न रहकर नैतिक जीवन से जोड़ने की आधारभूमि तैयार की।

➣ किशोरावस्था में मित्रों के प्रभाव में गाँधीजी ने मांसाहार और धूम्रपान का प्रयोग किया तथा एक अवसर पर चोरी भी की। बाद में उन्हें इन कार्यों का पश्चाताप हुआ। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और प्रायश्चित किया।

विवाह

➣ गाँधीजी का विवाह कम आयु में कस्तूरबाई कपाड़िया से हुआ, जिन्हें आगे चलकर कस्तूरबा गाँधी के नाम से जाना गया। गाँधीजी और कस्तूरबा का विवाह 1882–83 के आसपास हुआ और उस समय गाँधीजी की आयु लगभग 13 वर्ष थी।

उस समय बाल-विवाह भारतीय समाज में व्यापक रूप से प्रचलित था। गाँधीजी ने बाद में अपनी आत्मकथा में अपने बाल-विवाह और किशोरावस्था के दांपत्य जीवन का आत्मालोचनात्मक वर्णन किया।

➣ गाँधीजी ने अपने प्रारंभिक वैवाहिक जीवन में ईर्ष्या, अधिकार-बोध तथा दांपत्य आकर्षण जैसी भावनाओं की भी चर्चा की है। आगे चलकर उन्होंने आत्मसंयम और ब्रह्मचर्य को अपने नैतिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बनाया और अपने पूर्व अनुभवों को भी आत्मशुद्धि की प्रक्रिया के रूप में देखा।

➣ कस्तूरबा आगे चलकर गाँधीजी के सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण सहभागी बनीं। दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष से लेकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तक उन्होंने गाँधीजी के अनेक कार्यों में सहयोग दिया और स्वयं भी राजनीतिक एवं सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

प्रारंभिक संस्कार

➣ गाँधीजी के प्रारंभिक संस्कारों में सबसे गहरा प्रभाव उनकी माता पुतलीबाई का था। उनके धार्मिक जीवन से गाँधीजी ने व्रत, उपवास, प्रार्थना, संयम और आत्मनियंत्रण के संस्कार ग्रहण किए। आगे चलकर उपवास गाँधीजी के नैतिक और राजनीतिक संघर्ष का एक प्रमुख साधन बना।

➣ उनके पिता करमचंद गाँधी से उन्हें प्रशासनिक जीवन और न्यायप्रियता के वातावरण का अनुभव मिला। देशी रियासतों के प्रशासन में पिता की भूमिका के कारण गाँधीजी बचपन से ही शासन, अधिकारियों और रियासती राजनीति के वातावरण से परिचित हुए।

➣ वैष्णव परंपरा और जैन प्रभाव ने उनके धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों को गहराई दी। अहिंसा, आत्मसंयम, प्राणीमात्र के प्रति करुणा और आत्मशुद्धि जैसी धारणाएँ धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनती गईं।

➣ श्रवण कुमार से उन्हें कर्तव्य एवं माता-पिता की सेवा का आदर्श मिला और राजा हरिश्चंद्र से सत्यनिष्ठा की प्रेरणा मिली। इन बाल्यकालीन प्रभावों को बाद के गाँधी के नैतिक दर्शन की प्रारंभिक पृष्ठभूमि के रूप में देखा जा सकता है।

➣ रंभा दाई से मिला रामनाम का संस्कार, पिता के साथ रामायण का संपर्क और परिवार का धार्मिक वातावरण उनके आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण रहे। आगे चलकर गाँधीजी ने धर्म को नैतिक आचरण, सत्य और आत्मशुद्धि से जोड़कर देखा।

➣ किशोरावस्था की भूलों को स्वीकार कर प्रायश्चित करने की प्रवृत्ति ने गाँधीजी में आत्मपरीक्षण और आत्मशुद्धि को मजबूत किया। यही प्रवृत्ति बाद में उनके जीवन में सत्य के प्रयोग के रूप में दिखाई देती है।

शिक्षा एवं इंग्लैंड प्रवास

प्रारंभिक शिक्षा

➣ गाँधीजी की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई। बचपन में उनका परिवार पोरबंदर से राजकोट चला गया, जहाँ उनकी आगे की शिक्षा हुई। वे पढ़ाई में कोई असाधारण विद्यार्थी नहीं थे, लेकिन वे अनुशासित और नियमित छात्र थे।

➣ 1 दिसंबर 1880 को गाँधीजी ने राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल में प्रवेश लिया। उस समय उनकी आयु लगभग 11 वर्ष थी। उन्होंने वहाँ लगभग सात वर्ष अध्ययन किया और 1887 में मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण की। यह विद्यालय उस समय सौराष्ट्र क्षेत्र के प्रमुख अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में से एक था।

➣ अल्फ्रेड हाई स्कूल में गाँधीजी ने अंग्रेजी सहित विभिन्न विषयों का अध्ययन किया। संस्कृत के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि नहीं थी और विद्यालय के दिनों में उन्हें संस्कृत कठिन भी लगती थी। बाद में उन्हें भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य के अध्ययन का गहरा महत्व समझ में आया।

➣ विद्यालय में रहते हुए गाँधीजी के व्यक्तित्व से जुड़ी ईमानदारी और अनुशासन की प्रवृत्ति भी दिखाई देती थी। श्रुतिलेख परीक्षा में शिक्षक द्वारा दूसरे विद्यार्थी की कॉपी से एक शब्द की वर्तनी ठीक करने का संकेत दिए जाने के बावजूद उन्होंने नकल नहीं की। यह घटना उनके सत्यनिष्ठ स्वभाव के प्रारंभिक उदाहरणों में मानी जाती है।

समलदास कॉलेज में प्रवेश

➣ 1887 में मैट्रिकुलेशन उत्तीर्ण करने के बाद गाँधीजी ने उच्च शिक्षा के लिए भावनगर स्थित समलदास कॉलेज में प्रवेश लिया। वे जनवरी 1888 में भावनगर गए। उस समय उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह सौराष्ट्र क्षेत्र का एक प्रमुख महाविद्यालय था।

➣ गाँधीजी ने कॉलेज में प्रथम वर्ष की पढ़ाई शुरू की। वहाँ पढ़ाई का माध्यम मुख्यतः अंग्रेजी था, जबकि विद्यालय स्तर पर उनकी शिक्षा अपेक्षाकृत सरल वातावरण में हुई थी। वे पढ़ाई को ठीक से समझने में कठिनाई महसूस करते थे।

➣ उन्होंने बाद में अपने छात्र जीवन के इस चरण का उल्लेख करते हुए स्वीकार किया कि समलदास कॉलेज में पढ़ाई उनके लिए आसान नहीं थी। प्रथम वर्ष के अध्ययन के बाद वे आगे की शिक्षा को लेकर भी निश्चित नहीं थे।

➣ इसी दौरान गाँधीजी को यह अनुभव होने लगा कि केवल सामान्य कॉलेज शिक्षा की अपेक्षा व्यावसायिक शिक्षा उनके भविष्य के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है। परिवार के कुछ लोगों ने भी उन्हें ऐसा पेशा अपनाने की सलाह दी जिससे वे आगे चलकर सम्मानजनक जीवनयापन कर सकें।

➣ गाँधीजी ने अंततः समलदास कॉलेज की पढ़ाई छोड़ने का निर्णय लिया और राजकोट लौट आए। अब उनके सामने नया लक्ष्य था- इंग्लैंड जाकर कानून पढ़ना और बैरिस्टर बनना। यही निर्णय आगे उनके इंग्लैंड प्रवास की आधारभूमि बना।

इंग्लैंड जाने का निर्णय

➣ राजकोट लौटने के बाद उनके बड़े भाई लक्ष्मीदास गाँधी तथा परिवार के परिचित मावजी जोशी ने सुझाव दिया कि मोहनदास को इंग्लैंड भेजकर कानून की शिक्षा दिलाई जाए, ताकि वे बैरिस्टर बनकर बेहतर पेशेवर जीवन शुरू कर सकें।

➣ उस समय भारत में बैरिस्टर बनने को प्रतिष्ठित पेशा माना जाता था। गाँधीजी ने भी इंग्लैंड जाकर कानून का अध्ययन करने का निर्णय लिया। किंतु विदेश जाने को लेकर परिवार और जाति-समुदाय के स्तर पर आपत्तियाँ थीं। यह निर्णय केवल शिक्षा से संबंधित नहीं था, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दबाव से जुड़ा हुआ भी था।

➣ अपनी माता पुतलीबाई को आश्वस्त करने के लिए गाँधीजी ने जैन साधु बेचरजी स्वामी की उपस्थिति में यह प्रतिज्ञा की कि वे इंग्लैंड में मांस, मदिरा और स्त्रियों से दूर रहेंगे। यह प्रतिज्ञा उनके आगे के इंग्लैंड प्रवास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।

➣ गाँधीजी के इंग्लैंड जाने के निर्णय के कारण राजकोट में उनके जाति-समुदाय के कुछ लोगों ने उनका बहिष्कार भी किया। उस समय समुद्र पार जाकर विदेश में रहने को लेकर रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताएँ प्रचलित थीं। इसके बावजूद गाँधीजी अपने निर्णय पर कायम रहे।

इंग्लैंड प्रस्थान एवं लंदन आगमन

➣ गाँधीजी 10 अगस्त 1888 को राजकोट से मुंबई के लिए रवाना हुए। इसके बाद 4 सितंबर 1888 को उन्होंने मुंबई से इंग्लैंड के लिए समुद्री यात्रा प्रारंभ की। वे 29 सितंबर 1888 को इंग्लैंड के साउथैम्पटन पहुँचे।

➣ इंग्लैंड पहुँचने के बाद गाँधीजी को प्रारंभ में पश्चिमी जीवन-शैली, भोजन, पहनावे और सामाजिक व्यवहार से परिचित होने में कठिनाई हुई। उन्होंने कुछ समय तक अपने पहनावे और तौर-तरीकों में अंग्रेज सज्जन की तरह दिखने का प्रयास भी किया।

➣ लंदन में आरंभिक समय में वे महँगे होटल में रहे, फिर रिचमंड में रहे और बाद में 20 बारन्स कोर्ट रोड, वेस्ट केंसिंग्टन में भी रहे। वहाँ शाकाहारी भोजन प्राप्त करना उनके लिए कठिन था, क्योंकि उन्होंने भारत में मांस न खाने की प्रतिज्ञा की थी।

कानून की शिक्षा एवं बैरिस्टर बनना

➣ गाँधीजी ने लंदन में इनर टेंपल (Inner Temple) में कानून की शिक्षा प्राप्त की। उन्हें 6 नवंबर 1888 को Inner Temple में प्रवेश दिया गया। यह इंग्लैंड के चार प्रमुख Inns of Court में से एक था, जिनके माध्यम से बैरिस्टर बनने की पेशेवर शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त किया जाता था।

➣ कानून की पढ़ाई के दौरान गाँधीजी ने अपने औपचारिक अध्ययन के साथ अंग्रेजी समाज और संस्कृति को भी समझने का प्रयास किया।

➣ उन्होंने कुछ समय नृत्य, वायलिन और फ्रेंच जैसी गतिविधियों में रुचि लेने की कोशिश की, किंतु बाद में उन्हें लगा कि इन पर अत्यधिक समय और धन खर्च करना उनके उद्देश्य के अनुकूल नहीं है।

➣ गाँधीजी ने आवश्यक कानून की परीक्षाएँ पूरी कीं और 10 जून 1891 को उन्हें Inner Temple से Call to the Bar प्राप्त हुआ। इसके अगले दिन उनका नाम उच्च न्यायालय के पेशेवर रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। इस प्रकार वे बैरिस्टर बन गए।

लंदन में शाकाहार एवं वैचारिक प्रभाव

➣ इंग्लैंड में गाँधीजी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन उनके शाकाहार को लेकर हुआ। भारत में उन्होंने मुख्यतः अपनी माता से किए वचन के कारण मांस से परहेज किया था, लेकिन लंदन में शाकाहारी साहित्य पढ़ने के बाद उन्होंने शाकाहार को नैतिक और बौद्धिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया।

➣ लंदन में उन्हें Henry S. Salt की पुस्तक A Plea for Vegetarianism पढ़ने का अवसर मिला। इस पुस्तक ने उनके शाकाहार को केवल धार्मिक व्रत से निकालकर एक विवेकपूर्ण नैतिक चुनाव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ बाद में वे London Vegetarian Society से जुड़े और उसके कार्यों में सक्रिय भागीदारी की।

➣ गाँधीजी ने लंदन में विभिन्न विचारधाराओं और धार्मिक साहित्य का अध्ययन भी किया। पश्चिमी धार्मिक चिंतन, ईसाई साहित्य तथा भारतीय धार्मिक ग्रंथों के प्रति उनकी रुचि बढ़ी। भगवद्गीता के अंग्रेजी अनुवाद के अध्ययन ने उनके धार्मिक एवं नैतिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।

भारत वापसी

➣ गाँधीजी की माता पुतलीबाई का 12 जून 1891 को राजकोट में निधन हो गया। उस समय गाँधीजी लंदन में थे। परिवार ने उन्हें उनकी माता की मृत्यु की सूचना तत्काल नहीं दी थी, इसलिए उन्हें बाद में इस घटना का पता चला।

➣ बैरिस्टर बनने के बाद गाँधीजी जुलाई 1891 में भारत लौटे। वे 10 जुलाई 1891 को राजकोट पहुँचे। इंग्लैंड में लगभग तीन वर्ष बिताने के बाद वे भारत लौटे और अपने परिवार के साथ पुनः जुड़े।

➣ इस प्रकार 1888 से 1891 तक का इंग्लैंड प्रवास गाँधीजी के जीवन में कानून की शिक्षा का काल था।

दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी का संघर्ष

➣ बैरिस्टर बनने के बाद गाँधीजी भारत लौटे, लेकिन भारत में वकालत के क्षेत्र में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसी दौरान दादाभाई अब्दुल्ला के व्यावसायिक प्रतिष्ठान से जुड़े एक कानूनी मामले के सिलसिले में उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाने का अवसर मिला।

➣ वे 25 मई 1893 को डरबन (नटाल) पहुँचे। प्रारंभ में वे वहाँ एक कानूनी मामले में सहायता करने के उद्देश्य से गए थे और उनका वहाँ लंबे समय तक रहने का कोई निश्चित उद्देश्य नहीं था।

➣ दक्षिण अफ्रीका पहुँचने के तुरंत बाद ही उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। 26 मई 1893 को डरबन की अदालत में प्रवेश करते समय उनसे अपनी पगड़ी उतारने को कहा गया।

➣ गाँधीजी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और अदालत से बाहर चले गए। यह दक्षिण अफ्रीका में उनके साथ घटित शुरुआती भेदभावपूर्ण घटनाओं में से एक थी।

➣ इसके कुछ ही दिनों बाद 31 मई 1893 को पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर उन्हें प्रथम श्रेणी का वैध टिकट होने के बावजूद ट्रेन के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया, क्योंकि एक यूरोपीय यात्री ने उनके वहाँ बैठने पर आपत्ति की थी। इस घटना ने गाँधीजी के जीवन की दिशा बदल दी।

➣ उन्होंने अपमान सहकर चुपचाप भारत लौटने के बजाय अन्याय और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने का निर्णय लिया।

➣ दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी ने शीघ्र ही समझ लिया कि समस्या केवल उनकी व्यक्तिगत बेइज्जती की नहीं थी, बल्कि वहाँ रहने वाले भारतीय समुदाय के व्यापक नागरिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों से जुड़ी थी। उन्होंने भारतीयों की समस्याओं का अध्ययन शुरू किया और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना आरंभ किया।

➣ गाँधीजी का पारिवारिक जीवन भी इस दौरान दक्षिण अफ्रीका से जुड़ गया। 1896 में कस्तूरबा गाँधी अपने पति गाँधीजी और परिवार के साथ दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हुईं और जनवरी 1897 में डरबन पहुँचीं।

भारतीयों के अधिकारों के लिए राजनीतिक संघर्ष

➣ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को अनेक प्रकार के कानूनी और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था। उनकी आवाज राजनीतिक संस्थाओं में कमजोर थी और कई क्षेत्रों में उनके आवागमन, व्यापार, संपत्ति तथा नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जाते थे।

➣ गाँधीजी ने भारतीयों की इन समस्याओं के संबंध में अधिकारियों को अनेक याचिकाएँ और ज्ञापन प्रस्तुत किए। प्रारंभिक दक्षिण अफ्रीकी संघर्ष में उनका तरीका तत्काल टकराव के बजाय तथ्यों को सामने रखना, तर्क देना और प्रशासन पर नैतिक तथा सार्वजनिक दबाव बनाना था।

➣ 22 अगस्त 1894 को गाँधीजी ने नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। वे इसके पहले सचिव बने। इसका उद्देश्य दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों को संगठित करना तथा उनके नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था।

➣ इस चरण में गाँधीजी का संघर्ष मुख्यतः संवैधानिक और कानूनी तरीकों पर आधारित था। वे याचिकाओं, सार्वजनिक सभाओं, प्रेस और ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करने का प्रयास करते थे। इससे उनके राजनीतिक व्यक्तित्व में संगठन, जनमत निर्माण और सार्वजनिक अभियान की क्षमता विकसित हुई।

इंडियन ओपिनियन और फीनिक्स सेटलमेंट

➣ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की आवाज को मजबूत करने के लिए गाँधीजी ने 4 जून 1903 को इंडियन ओपिनियन पत्र का प्रकाशन शुरू कराया।

➣ यह पत्र भारतीय समुदाय की समस्याओं, नस्लीय भेदभाव और गाँधीजी के सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों को सामने रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बना। बाद में यह दक्षिण अफ्रीकी सत्याग्रह का भी महत्वपूर्ण प्रचार एवं संचार माध्यम बना।

➣ 1904 में गाँधीजी के जीवन में एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन आया। जोहानिसबर्ग में उनके मित्र हेनरी पोलक ने उन्हें जॉन रस्किन की पुस्तक Unto This Last पढ़ने के लिए दी।

➣ इस पुस्तक का गाँधीजी पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने श्रम की समान प्रतिष्ठा, सरल जीवन तथा सामुदायिक जीवन की दिशा में अपने विचारों को विकसित किया।

➣ दिसंबर 1904 में गाँधीजी ने डरबन के निकट फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना की। इसका उद्देश्य सरल जीवन, शारीरिक श्रम, सामुदायिक सहयोग और आत्मनिर्भरता पर आधारित जीवन-पद्धति विकसित करना था। इंडियन ओपिनियन का संचालन भी बाद में फीनिक्स सेटलमेंट से किया जाने लगा।

➣ फीनिक्स सेटलमेंट गाँधीजी के लिए केवल निवास-स्थान नहीं था, बल्कि यह सरल जीवन, सामुदायिक श्रम, आत्मनिर्भरता और नैतिक अनुशासन के प्रयोग का केंद्र बन गया। बाद में उनके आश्रम जीवन की कई विशेषताओं की प्रारंभिक झलक यहीं दिखाई देती है।

बोअर युद्ध और गाँधी जी की भूमिका

➣ 1899–1902 के द्वितीय बोअर युद्ध के दौरान गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी तत्कालीन निष्ठा के आधार पर भारतीयों को युद्ध में चिकित्सा एवं राहत कार्यों में सहयोग करने के लिए संगठित किया।

➣ उन्होंने Indian Ambulance Corps का गठन कराया, जिसका कार्य घायल सैनिकों को युद्धक्षेत्र से हटाकर चिकित्सा सहायता पहुँचाना था।

➣ यह भूमिका प्रत्यक्ष युद्ध में हथियार उठाने के बजाय सेवा और चिकित्सा सहायता पर आधारित थी। गाँधी हेरिटेज पोर्टल में अक्टूबर 1899 में Indian Ambulance Corps की स्थापना दर्ज है।

➣ बोअर युद्ध में भारतीयों की सेवा के पीछे गाँधीजी का एक राजनीतिक तर्क भी था। उनका मानना था कि यदि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के संकट के समय अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, तो बदले में उन्हें अपने नागरिक अधिकारों और समानता की मांग करने का नैतिक आधार मिलेगा।

➣ यद्यपि आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति गाँधीजी के विचारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, फिर भी दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध के समय अपनाई गई उनकी नीति उनके राजनीतिक विचारों के विकास को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

➣ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ लगातार भेदभाव और अधिकारों के प्रश्न ने उन्हें यह समझने के लिए प्रेरित किया कि संगठित राजनीतिक प्रयास और जनमत निर्माण आवश्यक हैं।

➣इसी क्रम में वे कुछ समय के लिए भारत लौटे और 1901 के कांग्रेस अधिवेशन में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समस्याओं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने रखा।

ब्रह्मचर्य और सत्याग्रह का विकास

➣ दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष के बढ़ने के साथ गाँधीजी का व्यक्तिगत जीवन भी बदलने लगा। 20 जुलाई 1906 को उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। यह उनके आत्मसंयम और नैतिक अनुशासन के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण चरण था।

➣ इसी वर्ष ट्रांसवाल सरकार द्वारा भारतीयों के विरुद्ध कठोर पंजीकरण व्यवस्था लागू करने की तैयारी की गई। इसे भारतीय समुदाय ने ब्लैक एक्ट के रूप में देखा। प्रस्तावित कानून के अंतर्गत एशियाई लोगों के लिए अनिवार्य पंजीकरण और पहचान संबंधी कठोर प्रावधान थे।

➣ 11 सितंबर 1906 को जोहानिसबर्ग के एम्पायर थिएटर में भारतीयों की विशाल सभा हुई। यहाँ उपस्थित लोगों ने ईश्वर को साक्षी मानकर इस कानून का शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने की शपथ ली। यही घटना दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के सत्याग्रह आंदोलन के आरंभ का महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है।

➣ प्रारंभ में इस संघर्ष के लिए Passive Resistance (निष्क्रिय प्रतिरोध) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था, लेकिन गाँधीजी को यह शब्द अपने संघर्ष की वास्तविक प्रकृति के लिए उपयुक्त नहीं लगता था, क्योंकि उनका आंदोलन केवल किसी अन्यायपूर्ण कानून का विरोध या निष्क्रिय असहयोग नहीं था।

➣ इसलिए गाँधीजी ने अपने संघर्ष के लिए एक ऐसे शब्द की खोज की जो उसकी सकारात्मक नैतिक शक्ति को व्यक्त कर सके। 1908 में इस संघर्ष-पद्धति के लिए सत्याग्रह शब्द का प्रयोग स्थापित हुआ।

सत्याग्रह का अर्थ केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सत्य पर दृढ़ रहकर अहिंसक ढंग से अन्याय का सामना करना था। इस प्रकार गाँधीजी ने निष्क्रिय प्रतिरोध की धारणा को एक व्यापक नैतिक एवं सक्रिय अहिंसक संघर्ष-पद्धति में विकसित किया।

सत्याग्रह का विस्तार और जेल यात्राएँ

➣ ट्रांसवाल के पंजीकरण कानून के विरुद्ध संघर्ष के दौरान गाँधीजी और उनके साथियों ने अनिवार्य पंजीकरण का विरोध किया। गाँधीजी ने स्वयं गिरफ्तारी का सामना किया और जेल गए। इसके बाद सत्याग्रहियों ने अन्यायपूर्ण कानून का पालन न करने तथा स्वेच्छा से गिरफ्तारी देने की नीति अपनाई।

➣ 1908 में स्वैच्छिक पंजीकरण को लेकर जनरल जान क्रिश्चियन स्मट्स और गाँधीजी के बीच समझौते का प्रयास हुआ, लेकिन उसके बाद परिस्थितियाँ फिर बिगड़ीं। 16 अगस्त 1908 को पंजीकरण प्रमाणपत्रों की सार्वजनिक रूप से होली जलाने की घटना सत्याग्रह की उग्रता और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बनी। गाँधीजी को कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया।

➣ दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष गाँधीजी के लिए व्यक्तिगत भी था। 10 फरवरी 1908 को पंजीकरण के लिए जाते समय उन पर मीर आलम और अन्य लोगों ने हमला किया। इसके बावजूद उन्होंने प्रतिशोध का रास्ता नहीं अपनाया। यह उनके अहिंसक संघर्ष और विरोधियों के प्रति भी हिंसा से बचने की प्रवृत्ति का उदाहरण था।

टॉल्सटॉय फार्म और विचारों का विस्तार

➣ सत्याग्रह के लंबे संघर्ष के दौरान जेल जाने वाले सत्याग्रहियों और उनके परिवारों के लिए सामुदायिक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस हुई। इसी उद्देश्य से 1910 में जोहानिसबर्ग के निकट टॉल्सटॉय फार्म स्थापित किया गया। गाँधीजी के मित्र हर्मन कैलनबाख ने इसके लिए भूमि उपलब्ध कराई। इसका नाम रूसी लेखक लियो टॉल्सटॉय के सम्मान में रखा गया।

➣ टॉल्सटॉय फार्म में सामुदायिक जीवन, शारीरिक श्रम, आत्मनिर्भरता, शिक्षा, स्वच्छता, सहशिक्षा तथा सरल जीवन के प्रयोग किए गए। इस प्रकार यह केवल सत्याग्रहियों का निवास-स्थान नहीं, बल्कि गाँधीजी के सामाजिक दर्शन का प्रयोगस्थल भी बन गया।

➣ 1909 में इंग्लैंड की यात्रा के दौरान और समुद्री यात्रा में गाँधीजी ने हिन्द स्वराज की रचना की। इसका लेखन 13–22 नवंबर 1909 के दौरान किल्डोनन कैसल जहाज पर हुआ तथा इसका प्रकाशन दिसंबर 1909 में Indian Opinion में हुआ। इस पुस्तक में आधुनिक पश्चिमी सभ्यता, औद्योगिकता, स्वराज और नैतिक जीवन के संबंध में गाँधीजी के विकसित होते विचार सामने आए।

1913–14 का सत्याग्रह और संघर्ष की सफलता

➣ 1913 में दक्षिण अफ्रीका का भारतीय सत्याग्रह अपने निर्णायक चरण में पहुँचा। इस चरण में संघर्ष केवल अनिवार्य पंजीकरण और पहचान-पत्रों के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय विवाहों की मान्यता, £3 कर और भारतीयों के नागरिक अधिकारों जैसे व्यापक प्रश्नों से भी जुड़ गया।

➣ इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली भारतीय महिलाओं ने भी सत्याग्रह में सक्रिय भाग लिया। कस्तूरबा गाँधी सहित कई भारतीय महिलाओं ने इस संघर्ष में भाग लिया और जेल गईं।

22 सितंबर 1913 को कस्तूरबा गाँधी तथा अन्य सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया और 23 सितंबर 1913 को कस्तूरबा को तीन माह के कठोर कारावास की सजा दी गई।

➣ आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा £3 कर था। यह कर उन भारतीयों पर लगाया जाता था जो गिरमिटिया श्रम-व्यवस्था से मुक्त होने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में रहना चाहते थे। भारतीय समुदाय ने इसे अन्यायपूर्ण माना और इसके उन्मूलन की मांग को सत्याग्रह का प्रमुख हिस्सा बना दिया।

➣ सत्याग्रह में भारतीय मजदूरों की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया। बड़ी संख्या में मजदूरों ने काम का बहिष्कार किया और जुलूसों तथा विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया।

➣ इस प्रकार दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष व्यापारियों और शिक्षित भारतीयों तक सीमित न रहकर मजदूरों, महिलाओं और व्यापक भारतीय समुदाय का आंदोलन बन गया।

➣ सत्याग्रहियों की गिरफ्तारियों, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और मजदूरों के व्यापक आंदोलन ने दक्षिण अफ्रीकी सरकार पर दबाव बढ़ाया।

➣ गाँधीजी ने अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध स्वैच्छिक कष्ट-सहन, गिरफ्तारी और अहिंसक प्रतिरोध की नीति जारी रखी। इस संघर्ष ने सत्याग्रह को एक प्रभावी सामूहिक राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया।

➣ अंततः दक्षिण अफ्रीकी सरकार और भारतीय नेतृत्व के बीच समझौते का मार्ग खुला। 26 जून 1914 को Indian Relief Act (भारतीय राहत अधिनियम) पारित हुआ।

➣ इस अधिनियम ने भारतीयों की कुछ प्रमुख शिकायतों का समाधान किया तथा £3 कर को समाप्त करने और भारतीय विवाहों की मान्यता से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ दक्षिण अफ्रीका गाँधीजी के जीवन का वह निर्णायक चरण था जहाँ उनके सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम संबंधी विचारों ने व्यावहारिक रूप ग्रहण किया। भारत लौटने के बाद इन्हीं प्रयोगों को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया।

1901 में भारत वापसी और कांग्रेस से पहला संपर्क

➣ 1899–1900 के बोअर युद्ध के दौरान गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की सेवा के लिए Indian Ambulance Corps का गठन किया था।

➣ युद्ध समाप्त होने के बाद उन्हें लगा कि दक्षिण अफ्रीका में उनका तत्काल कार्य कुछ हद तक पूरा हो गया है। साथ ही वे यह भी महसूस करने लगे थे कि वे केवल वकालत और आर्थिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर सार्वजनिक

➣ जीवन में अधिक उपयोगी योगदान दे सकते हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपने सहयोगियों से कुछ समय के लिए भारत लौटने की अनुमति माँगी।

➣ दक्षिण अफ्रीका के भारतीय समुदाय ने उन्हें आसानी से जाने नहीं दिया। अंततः यह शर्त रखी गई कि यदि एक वर्ष के भीतर वहाँ उनकी आवश्यकता महसूस हुई, तो उन्हें वापस दक्षिण अफ्रीका लौटना होगा।

➣ गाँधीजी इस शर्त को स्वीकार करके अक्टूबर 1901 में भारत के लिए रवाना हुए और दिसंबर 1901 में भारत पहुँचे।

➣ भारत आने का उनका प्रमुख उद्देश्य दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समस्याओं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय नेताओं के सामने रखना था।

➣ वे चाहते थे कि भारत की राष्ट्रीय राजनीतिक संस्था दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव और उनके अधिकारों के प्रश्न पर ब्रिटिश सरकार के समक्ष आवाज उठाए। ([turn347842search7])

➣ इसी उद्देश्य से गाँधीजी दिसंबर 1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के किसी अधिवेशन में उनकी पहली भागीदारी थी। अधिवेशन की अध्यक्षता सर दिनशॉ एडुलजी वाचा ने की थी।

➣ गाँधीजी ने यहाँ दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति से संबंधित एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसे कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया।

➣ कलकत्ता में रहते हुए गाँधीजी की मुलाकात कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं से हुई। इनमें गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और फिरोजशाह मेहता प्रमुख थे।

➣ उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन के दौरान स्वयंसेवकों के साथ काम किया तथा शिविर की स्वच्छता व्यवस्था में भी स्वयं श्रम किया। इस अनुभव ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यप्रणाली और भारतीय समाज की वास्तविक समस्याओं को निकट से देखने का अवसर दिया।

➣ कांग्रेस अधिवेशन के बाद गाँधीजी ने भारत के कुछ अन्य क्षेत्रों की यात्रा की और कुछ समय गोपाल कृष्ण गोखले के साथ भी बिताया। वे भारत में वकालत के साथ सार्वजनिक कार्य करने की संभावना पर विचार कर रहे थे।

➣ अंततः उन्होंने मुंबई में वकालत शुरू की, लेकिन दक्षिण अफ्रीका से उनका संबंध समाप्त नहीं हुआ था।

➣ 1902 में दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों की स्थिति पुनः गंभीर हो गई। वहाँ के भारतीय समुदाय ने गाँधीजी से वापस आने का आग्रह किया, विशेषकर लॉर्ड मिलनर/ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों के समक्ष भारतीयों की समस्याएँ रखने के लिए।

➣ गाँधीजी ने भारत में अपनी वकालत छोड़कर पुनः दक्षिण अफ्रीका लौटने का निर्णय लिया और दिसंबर 1902 में वहाँ पहुँच गए। इस प्रकार 1901–02 का भारत प्रवास उनके दक्षिण अफ्रीका और भारत के राजनीतिक जीवन के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमणकाल था।

गाँधी जी की भारत वापसी

➣ दक्षिण अफ्रीका में लगभग 21 वर्षों तक भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के बाद गाँधीजी ने 18 जुलाई 1914 को दक्षिण अफ्रीका छोड़ा। वे इंग्लैंड होते हुए भारत लौटे।

➣ गाँधीजी के साथ उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी भी भारत वापस लौटीं। लगभग दो दशकों के दक्षिण अफ्रीकी अनुभव के बाद वे अब भारतीय सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने के लिए तैयार थे।

भारत आगमन एवं गोपाल कृष्ण गोखले से संबंध

➣ 9 जनवरी 1915 को गाँधीजी और कस्तूरबा सुबह लगभग 7:30 बजे बंबई के अपोलो बंदर पहुँचे। भारत लौटने पर उनका स्वागत हुआ और उसी दिन उन्होंने प्रमुख भारतीय नेताओं से मुलाकात की। उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले और वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री से भी मुलाकात की।

➣ गाँधीजी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। भारत लौटने के बाद गोखले ने उन्हें तत्काल सक्रिय राजनीति में कूदने के बजाय पहले भारत को समझने, देश की वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन करने और जनता के बीच जाने की सलाह दी।

➣ भारत लौटने के बाद गाँधीजी शीघ्र ही शांतिनिकेतन भी गए। फरवरी 1915 में वहाँ उनकी पहली महत्वपूर्ण यात्रा हुई। इसी दौरान उनकी मुलाकात काका कालेलकर और जीवतराम कृपलानी जैसे व्यक्तियों से हुई, जो आगे चलकर उनके निकट सहयोगी बने।

➣ मार्च 1915 में शांतिनिकेतन की दूसरी यात्रा के दौरान उनकी रवीन्द्रनाथ ठाकुर से पहली महत्वपूर्ण भेंट हुई।

भारत भ्रमण एवं राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन

➣ गोखले की सलाह के अनुसार गाँधीजी ने भारत लौटते ही तत्काल किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया।

➣ उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की और भारतीय समाज, किसानों, मजदूरों, ग्रामीण जनता तथा राजनीतिक परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया। इस अवधि में वे भारतीय जनता के जीवन और ब्रिटिश शासन के वास्तविक प्रभाव से प्रत्यक्ष रूप से परिचित हुए।

➣ गाँधीजी का यह प्रारंभिक भारतीय प्रवास उनके दक्षिण अफ्रीकी अनुभवों को भारतीय परिस्थितियों के साथ जोड़ने का चरण था। उन्होंने समझा कि भारत में राजनीतिक संघर्ष को सफल बनाने के लिए केवल शिक्षित वर्ग ही नहीं, बल्कि किसानों, मजदूरों, महिलाओं और सामान्य जनता को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना आवश्यक होगा।

➣ इसी अवधि में गाँधीजी का संपर्क भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं तथा विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक समूहों से बढ़ा। दक्षिण अफ्रीका में विकसित उनकी सत्याग्रह की अवधारणा अब भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप रूप लेने लगी।

➣ आगे चलकर चंपारण सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) जैसे आंदोलनों ने उनके भारतीय राजनीतिक जीवन की दिशा निर्धारित की।

प्रवासी भारतीय दिवस

➣ 9 जनवरी को भारत में प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है। इस तिथि का चयन इसलिए किया गया क्योंकि 9 जनवरी 1915 को महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे।

➣ भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रवासी भारतीय दिवस की शुरुआत 2003 में हुई और इसका उद्देश्य विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के भारत के विकास में योगदान को मान्यता देना तथा प्रवासी भारतीयों से संबंध मजबूत करना है।

➣ 2015 से प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन का स्वरूप बदलकर इसे प्रत्येक दो वर्ष में आयोजित किया जाने लगा, जबकि बीच के वर्षों में विषय-आधारित सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं।

➣ गाँधीजी की भारत वापसी के कारण 9 जनवरी भारतीय प्रवासी इतिहास और भारत के राष्ट्रीय जीवन के बीच एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक तिथि बन गई है।

गाँधी जी के प्रमुख आंदोलन

➣ भारत लौटने के बाद महात्मा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में विकसित सत्याग्रह और अहिंसा की पद्धति को भारतीय परिस्थितियों में लागू किया।

➣ प्रारंभिक चरण में उनके संघर्ष किसानों और मजदूरों की स्थानीय समस्याओं से जुड़े रहे, लेकिन धीरे-धीरे यही संघर्ष अखिल भारतीय राजनीतिक आंदोलनों में बदल गए।

चंपारण सत्याग्रह (1917)

➣ गाँधीजी की पहली महत्वपूर्ण भारतीय राजनीतिक परीक्षा चंपारण सत्याग्रह (1917) थी। 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में गाँधीजी की पहली मुलाकात राजकुमार शुक्ल से हुई।

➣ चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी से नील की खेती से पीड़ित किसानों की स्थिति देखने के लिए चंपारण आने का आग्रह किया। गाँधीजी ने अंततः उनका आग्रह स्वीकार किया और अप्रैल 1917 में चंपारण पहुँचे।

➣ 10 अप्रैल 1917 को वे राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुँचे और उसी रात मुजफ्फरपुर गए, जहाँ आचार्य जे.बी. कृपलानी ने उनका स्वागत किया।

➣ चंपारण की समस्या का मुख्य आधार तीनकठिया प्रथा थी। किसानों को अपनी भूमि के एक हिस्से में नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था। गाँधीजी ने किसानों की शिकायतों को व्यवस्थित रूप से दर्ज किया और प्रशासन के आदेश के बावजूद चंपारण छोड़ने से इनकार किया।

➣ 18 अप्रैल 1917 को मोतिहारी की अदालत में उन्होंने आदेश की अवज्ञा स्वीकार की और दंड भुगतने की तैयारी दिखाई। उनके इस नैतिक प्रतिरोध ने प्रशासन पर दबाव बनाया।

➣ चंपारण समस्या की जाँच में गाँधीजी के सहयोगियों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आचार्य जे.बी. कृपलानी, ब्रजकिशोर प्रसाद, डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह और महादेव देसाई प्रमुख थे। सी.एफ. एंड्रूज ने भी इस दौरान गाँधीजी की सहायता की। वहीं एन.जी. रंगा ने महात्मा गाँधी के चंपारण सत्याग्रह का विरोध किया था।

➣ चंपारण आंदोलन के परिणामस्वरूप सरकार ने चंपारण जाँच समिति गठित की, जिसमें गाँधीजी भी सदस्य थे। समिति की जाँच और उसके बाद की कार्रवाई से किसानों की शिकायतों को सरकारी मान्यता मिली तथा चंपारण कृषि अधिनियम, 1918 के माध्यम से नील किसानों की स्थिति में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918)

➣ 1918 में अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच प्लेग बोनस और मजदूरी को लेकर विवाद हुआ। अनसूया साराभाई ने मजदूरों की समस्या के समाधान के लिए गाँधीजी से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। वे मिल मालिक अंबालाल साराभाई की बहन थीं।

➣ गाँधीजी ने मजदूरों को 35 प्रतिशत वेतन वृद्धि की मांग पर शांतिपूर्ण हड़ताल करने के लिए संगठित किया। जब मजदूरों का मनोबल कमजोर पड़ने लगा, तब गाँधीजी ने 15 मार्च 1918 को उपवास आरंभ किया। 18 मार्च 1918 को समझौते के बाद उन्होंने उपवास समाप्त किया। इस कारण अहमदाबाद मिल आंदोलन को गाँधीजी के भारत में प्रथम महत्वपूर्ण राजनीतिक उपवास से जोड़ा जाता है।

➣ यह आंदोलन किसान समस्या से आगे बढ़कर गाँधीजी के सत्याग्रह को औद्योगिक मजदूरों तक ले गया। इसमें गाँधीजी ने श्रमिक संघर्ष को वर्ग-संघर्ष के हिंसक रूप के बजाय सत्य, अनुशासन और नैतिक दबाव के माध्यम से संचालित करने का प्रयास किया।

खेड़ा सत्याग्रह (1918)

➣ 1918 के खेड़ा सत्याग्रह का संबंध फसल खराब होने और किसानों की लगान संबंधी समस्या से था। गाँधीजी का कहना था कि जिन किसानों की फसल निर्धारित सीमा से कम हुई है, उनसे राजस्व वसूल नहीं किया जाना चाहिए।

➣ इस आंदोलन में वल्लभभाई पटेल ने महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। उनके साथ शंकरलाल बैंकर, इंदुलाल याज्ञिक, महादेव देसाई, नरहरि पारिख और मोहनलाल पांड्या जैसे कार्यकर्ताओं ने भी काम किया। इससे खेड़ा आंदोलन केवल गाँधीजी के व्यक्तिगत नेतृत्व तक सीमित न रहकर एक संगठित स्थानीय आंदोलन बना।

➣ 22 मार्च 1918 को नडियाद में गाँधीजी ने किसानों को संबोधित किया और सामूहिक रूप से राजस्व न देने की नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया। आंदोलन का मुख्य आधार अहिंसक कर-अवज्ञा था। अंततः सरकार ने कमजोर किसानों को राहत देने की दिशा में रियायतें दीं।

अन्य प्रमुख आंदोलन

➣ चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा के प्रारंभिक आंदोलनों के बाद गाँधीजी का राजनीतिक संघर्ष स्थानीय समस्याओं से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया।

➣ 1919 के रॉलेट सत्याग्रह में उन्होंने पहली बार व्यापक स्तर पर अखिल भारतीय सत्याग्रह का प्रयोग किया। रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया, लेकिन विभिन्न स्थानों पर हिंसा होने के बाद गाँधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।

➣ इसके बाद खिलाफत आंदोलन के प्रश्न को गाँधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता तथा राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।

➣ खिलाफत नेताओं के साथ सहयोग ने कांग्रेस और मुस्लिम नेतृत्व के बीच निकटता बढ़ाई और आगे चलकर असहयोग आंदोलन के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण तैयार हुआ।

➣ 1920–1922 के असहयोग आंदोलन में गाँधीजी ने पहली बार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक स्तर पर जन-असहयोग को राजनीतिक हथियार बनाया।

➣ उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन विद्यार्थियों, महिलाओं, किसानों, व्यापारियों और समाज के अन्य वर्गों तक पहुँचा। चौरी-चौरा कांड के बाद गाँधीजी ने आंदोलन वापस लेकर यह स्पष्ट किया कि उनके लिए अहिंसा आंदोलन के साधन की मूल शर्त थी।

➣ 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में गाँधीजी ने औपनिवेशिक कानूनों की अहिंसक अवज्ञा के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह उनके नेतृत्व के प्रमुख प्रतीक बने।

➣ इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक ध्यान दिलाया तथा गाँधीजी और ब्रिटिश सरकार के बीच गाँधी-इरविन समझौते का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में 1940–1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के माध्यम से गाँधीजी ने व्यापक जनआंदोलन के स्थान पर सीमित और नियंत्रित प्रतिरोध का मार्ग अपनाया।

➣ इसका उद्देश्य भारतीयों को युद्ध और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार दिलाना था। विनोबा भावे को प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही चुना गया।

➣ अंततः 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गाँधीजी ने ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की मांग को निर्णायक रूप दिया। करो या मरो का उनका आह्वान आंदोलन का प्रमुख संदेश बना।

➣ 9 अगस्त 1942 को गाँधीजी सहित प्रमुख कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन देश के अनेक हिस्सों में जारी रहा। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गाँधीजी के नेतृत्व में चलाया गया अंतिम व्यापक अखिल भारतीय जनआंदोलन था।

गाँधी जी के प्रमुख आंदोलन

आंदोलनपरीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
चंपारण सत्याग्रह, 19171916 के लखनऊ अधिवेशन में गाँधीजी की राजकुमार शुक्ल से मुलाकात, तीनकठिया प्रथा, गाँधीजी का प्रारंभिक सफल किसान सत्याग्रह, जाँच समिति में गाँधीजी की भागीदारी।
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, 1918अनसूया साराभाई की भूमिका, 35% मजदूरी वृद्धि की मांग, गाँधीजी का भारत में पहला महत्वपूर्ण राजनीतिक उपवास।
खेड़ा सत्याग्रह, 1918फसल खराबी के कारण लगान में राहत की मांग, वल्लभभाई पटेल सहित स्थानीय नेताओं की भूमिका, अहिंसक कर-अवज्ञा।
रॉलेट सत्याग्रह, 1919पहला व्यापक अखिल भारतीय सत्याग्रह, 6 अप्रैल 1919 की देशव्यापी हड़ताल, बाद में हिंसा के कारण गाँधीजी ने आंदोलन वापस लिया।
खिलाफत आंदोलन, 1919–24अली बंधुओं की प्रमुख भूमिका, गाँधीजी का समर्थन, हिंदू-मुस्लिम एकता और असहयोग आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार।
असहयोग आंदोलन, 1920–22गाँधीजी का पहला व्यापक अखिल भारतीय जनआंदोलन, विदेशी वस्तुओं और सरकारी संस्थाओं के बहिष्कार पर जोर, चौरी-चौरा के बाद वापसी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1930–34दांडी मार्च, नमक कानून की अवज्ञा, गाँधी-इरविन समझौता, धरसाना सत्याग्रह, अब्बास तैयबजी और सरोजिनी नायडू की भूमिका।
व्यक्तिगत सत्याग्रह, 1940–41विनोबा भावे प्रथम सत्याग्रही, जवाहरलाल नेहरू दूसरे, युद्ध-विरोधी विचारों की शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति।
भारत छोड़ो आंदोलन, 19428 अगस्त 1942 भारत छोड़ो प्रस्ताव, 9 अगस्त को गिरफ्तारियाँ, अरुणा आसफ अली और उषा मेहता की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ।

➣ इसके अलावा महात्मा गाँधी का नाम दो अन्य आंदोलनों के साथ भी आता है, जिनमें केरल का वायकोम सत्याग्रह और गुजरात का बारडोली सत्याग्रह प्रमुख हैं। दोनों आंदोलन महात्मा गाँधी के सत्याग्रह एवं अहिंसा के सिद्धांतों से प्रेरित थे।

आंदोलनमुख्य उद्देश्य/मुद्दाप्रमुख नेतृत्व
वायकोम सत्याग्रह (1924–1925)निचली जातियों को मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर आवागमन का अधिकार दिलानाटी. के. माधवन, के. केलप्पन एवं के. पी. केशव मेनन
बारडोली सत्याग्रह (1928)किसानों के बढ़े हुए भूमि-राजस्व का विरोधवल्लभभाई पटेल

➣ ध्यान रहे, इन दोनों आंदोलनों में गाँधीजी की सक्रिय भूमिका नहीं थी। गाँधीजी की भूमिका मुख्यतः सैद्धांतिक समर्थन एवं मार्गदर्शन तक सीमित रही। इसलिए यहाँ गाँधीजी को इन आंदोलनों का प्रत्यक्ष नेता मानना सही नहीं होगा।

गाँधी जी के उपवास एवं अनशन

➣ उपवास और अनशन गाँधीजी के सत्याग्रह के महत्वपूर्ण नैतिक साधनों में शामिल थे। उनके लिए उपवास केवल राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम नहीं था, बल्कि आत्मशुद्धि, प्रायश्चित, आत्मसंयम, नैतिक अपील और साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने का साधन भी था।

➣ गाँधीजी के उपवास अलग-अलग परिस्थितियों में किए गए। कुछ उपवास आंदोलन या हड़ताल को अनुशासित रखने के लिए थे, कुछ हिंसा के प्रायश्चित के लिए, कुछ अस्पृश्यता के विरोध में तथा कुछ हिंदू-मुस्लिम एकता और साम्प्रदायिक शांति के लिए किए गए।

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन का उपवास (1918)

➣ 15 मार्च 1918 को अहमदाबाद के मिल मजदूरों की हड़ताल के दौरान गाँधीजी ने उपवास आरंभ किया। मजदूरों की 35 प्रतिशत वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चल रहे संघर्ष में जब मजदूरों का संकल्प कमजोर पड़ने लगा, तब गाँधीजी ने स्वयं उपवास कर उन्हें अपने वचन पर दृढ़ रहने की प्रेरणा दी।

➣ तीन दिन के बाद 18 मार्च 1918 को समझौते के बाद उन्होंने उपवास समाप्त किया।

➣ इसे गाँधीजी के भारत में किए गए पहले महत्वपूर्ण राजनीतिक उपवास के रूप में विशेष रूप से याद किया जाता है। इसके बाद उपवास उनके सत्याग्रह की एक विशिष्ट नैतिक तकनीक बन गया।

असहयोग आंदोलन के दौरान प्रायश्चित का उपवास (1922)

➣ चौरी-चौरा कांड के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया। हिंसा की इस घटना के लिए नैतिक जिम्मेदारी महसूस करते हुए उन्होंने बारडोली में पाँच दिन का उपवास किया।

गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की आधिकारिक घटनाक्रम में 1922 में उनके पाँच दिवसीय प्रायश्चित उपवास का उल्लेख मिलता है।

➣ यह उपवास गाँधीजी के उस सिद्धांत का उदाहरण था जिसमें वे अपने आंदोलन के किसी भी चरण में हुई हिंसा को केवल राजनीतिक समस्या न मानकर नैतिक जिम्मेदारी के रूप में भी देखते थे।

साम्प्रदायिक एकता के लिए उपवास (1924)

➣ 17 सितंबर से 7 अक्टूबर 1924 तक गाँधीजी ने दिल्ली में 21 दिन का उपवास किया। इसका उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करना और साम्प्रदायिक तनाव को कम करना था।

➣ गाँधी हेरिटेज पोर्टल की उपवास-सूची इसे स्पष्ट रूप से For Hindu-Muslim unity के उद्देश्य से दर्ज करती है।

➣ यह गाँधीजी के सबसे प्रसिद्ध साम्प्रदायिक सद्भाव संबंधी उपवासों में से एक था। उनके लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता का संघर्ष साम्प्रदायिक एकता के बिना अधूरा था।

अस्पृश्यता के विरुद्ध यरवदा उपवास और पूना समझौता (1932)

➣ ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड के साम्प्रदायिक निर्णय (Communal Award) में दलित वर्ग (Depressed Classes) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान किया गया।

➣ गाँधीजी ने इसका विरोध किया, क्योंकि वे इसे हिंदू समाज के स्थायी विभाजन का कारण मानते थे। उन्होंने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण उपवास आरंभ किया। इस उपवास के दौरान भारतीय नेताओं के बीच तीव्र वार्ता हुई।

➣ अंततः 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ, जिसमें पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।

➣ इसके बाद गाँधीजी ने 26 सितंबर 1932 को उपवास समाप्त किया। उस समय रवींद्रनाथ ठाकुर भी यरवदा जेल में उपस्थित थे।

➣ इस उपवास के बाद गाँधीजी ने अस्पृश्यता-उन्मूलन को अपने रचनात्मक कार्यक्रम का प्रमुख हिस्सा बनाया। इसी संदर्भ में हरिजन सेवक संघ की स्थापना भी हुई।

आत्मशुद्धि और हरिजन कार्य से जुड़े उपवास (1933)

➣ 8 मई 1933 को गाँधीजी ने 21 दिन का आत्मशुद्धि उपवास आरंभ किया। यह उपवास अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके अभियान और अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन के शुद्धिकरण की भावना से जुड़ा था। गाँधी स्मृति के अनुसार यह उपवास 21 दिनों का था।

➣ इसी वर्ष अगस्त में उन्होंने यरवदा जेल में पुनः उपवास किया। गाँधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार 16 से 22 अगस्त 1933 तक का उपवास सरकार द्वारा हरिजन कार्य के लिए पहले प्राप्त सुविधाओं को न देने के विरोध में था।

आगा खाँ पैलेस में उपवास (1943)

➣ 10 फरवरी 1943 को गाँधीजी ने आगा खाँ पैलेस, पुणे में 21 दिन का उपवास आरंभ किया। वे भारत छोड़ो आंदोलन के बाद गिरफ्तार किए गए नेताओं तथा कांग्रेस पर लगाए जा रहे आरोपों के विरोध में उपवास पर बैठे।

➣ यह उपवास ब्रिटिश सरकार के उस प्रचार के विरुद्ध था जिसमें कांग्रेस को हिंसा और अराजकता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था।

➣ 1943 का यह उपवास गाँधीजी के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक उपवास था। उस समय उनकी आयु 73 वर्ष थी और स्वास्थ्य की स्थिति भी कमजोर थी, फिर भी उन्होंने इसे सत्याग्रह के नैतिक साधन के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध उपवास (1947)

➣ भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के समय गाँधीजी राजनीतिक सत्ता के उत्सव से अधिक साम्प्रदायिक हिंसा रोकने पर केंद्रित थे। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब गाँधीजी कलकत्ता में थे और वहाँ साम्प्रदायिक तनाव कम करने के प्रयास कर रहे थे।

➣ इसके बाद 1 से 3 सितंबर 1947 तक उन्होंने कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगों के विरोध में उपवास किया। उनके नैतिक हस्तक्षेप के बाद कलकत्ता में हिंसा को रोकने और शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया।

➣ गाँधीजी के इस प्रयास को प्रायः कलकत्ता चमत्कार के संदर्भ में भी याद किया जाता है।

गाँधीजी का अंतिम उपवास (1948)

➣ गाँधीजी ने 13 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में साम्प्रदायिक हिंसा समाप्त करने और हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए अपना अंतिम उपवास आरंभ किया।

➣ यह उपवास आमरण प्रकृति का था और उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक दिल्ली में शांति स्थापित करने के लिए आवश्यक आश्वासन नहीं मिलते, वे उपवास जारी रखेंगे।

➣ विभिन्न समुदायों के नेताओं द्वारा शांति बनाए रखने का आश्वासन दिए जाने के बाद गाँधीजी ने 18 जनवरी 1948 को अपना उपवास समाप्त किया।

➣ यह उनके जीवन का अंतिम उपवास था। इसके केवल 12 दिन बाद, 30 जनवरी को बिड़ला भवन में उनकी हत्या कर दी गई।

गाँधी जी के प्रमुख उपवास : परीक्षा-उपयोगी सार

वर्ष / अवधिस्थानमुख्य उद्देश्य / तथ्य
1918अहमदाबादमिल मजदूरों के संकल्प को बनाए रखने के लिए, गाँधीजी का भारत में पहला महत्वपूर्ण राजनीतिक उपवास।
1919अहमदाबादरॉलेट सत्याग्रह के दौरान हिंसा और अराजकता के विरोध में, जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद तीन दिन का उपवास।
1922बारडोलीचौरी-चौरा की हिंसा के बाद प्रायश्चित के रूप में पाँच दिन का उपवास।
1924दिल्ली21 दिन का उपवास, हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए।
1932यरवदा जेलCommunal Award में पृथक निर्वाचक मंडल के विरोध में आमरण उपवास, परिणामस्वरूप पूना समझौता।
1933पुणे / यरवदा21 दिन का आत्मशुद्धि उपवास तथा बाद में हरिजन कार्य से संबंधित उपवास।
1943आगा खाँ पैलेसभारत छोड़ो आंदोलन के बाद कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों और सरकारी प्रचार के विरोध में 21 दिन का उपवास।
1947कलकत्तासाम्प्रदायिक हिंसा समाप्त करने और शांति स्थापित करने के लिए उपवास।
1948दिल्ली13–18 जनवरी, साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए गाँधीजी का अंतिम उपवास।

महात्मा गाँधी की 11 सूत्री मांगें

➣ दिसंबर 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया।

➣ इसके बाद महात्मा गाँधी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के संबंध में उचित समय और स्थान तय करने की जिम्मेदारी दी गई।

➣ गाँधीजी ने तत्काल आंदोलन शुरू करने के बजाय पहले ब्रिटिश सरकार के सामने कुछ ऐसी मांगें रखीं, जिनके माध्यम से वे सरकार की आर्थिक, प्रशासनिक और दमनकारी नीतियों को चुनौती देना चाहते थे।

➣ 31 जनवरी 1930 को गाँधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने 11 मांगें रखीं और संकेत दिया कि यदि सरकार इन मांगों को स्वीकार नहीं करती है, तो वे सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करेंगे।

11 सूत्री मांगें

➣ 1. पूर्ण मद्यनिषेध लागू करना: गाँधीजी शराब और अन्य मादक पदार्थों की बिक्री तथा सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध चाहते थे। यह मांग उनके सामाजिक सुधार और नैतिक जीवन संबंधी दृष्टिकोण से जुड़ी थी।

➣ 2. रुपये और स्टर्लिंग के विनिमय अनुपात में परिवर्तन: गाँधीजी ने भारतीय रुपये और ब्रिटिश स्टर्लिंग के बीच विनिमय दर को भारतीय हितों के अनुरूप बदलने की मांग की। उन्होंने इसे 1 शिलिंग 4 पेंस के स्तर पर लाने की मांग की थी।

➣ 3. भूमि-राजस्व में 50 प्रतिशत की कमी: किसानों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए भूमि-राजस्व की दर आधी करने की मांग की गई। यह गाँधीजी की मांगों में प्रमुख किसान-हितैषी मांग थी।

➣ 4. नमक कर समाप्त करना और सरकारी नमक एकाधिकार खत्म करना: गाँधीजी ने नमक कर समाप्त करने के साथ-साथ नमक के उत्पादन और व्यापार पर सरकार के एकाधिकार को समाप्त करने की मांग की। नमक आम जनता, विशेषकर गरीबों की दैनिक आवश्यकता थी। इसलिए यह मांग व्यापक जनसमुदाय को सीधे प्रभावित करती थी। आगे चलकर यही मांग दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह का केंद्रीय आधार बनी।

➣ 5. सैन्य व्यय में कमी: गाँधीजी ने सरकार के सैन्य खर्च को लगभग 50 प्रतिशत तक कम करने की मांग की। उनका तर्क था कि भारतीय राजस्व का बड़ा हिस्सा ऐसे सैन्य खर्च पर नहीं किया जाना चाहिए जिसका लाभ मुख्यतः औपनिवेशिक शासन को मिलता था।

➣ 6. उच्च श्रेणी की सिविल सेवाओं के वेतन और प्रशासनिक खर्च में कमी: गाँधीजी ने उच्च प्रशासनिक सेवाओं पर होने वाले अत्यधिक खर्च को कम करने की मांग की। इसका उद्देश्य औपनिवेशिक प्रशासन पर होने वाले भारी व्यय को कम करना और भारतीय जनता पर आर्थिक बोझ घटाना था।

➣ 7. विदेशी कपड़ों पर सुरक्षात्मक शुल्क: भारतीय वस्त्र उद्योग को ब्रिटिश औद्योगिक वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए विदेशी कपड़ों पर संरक्षणात्मक सीमा शुल्क लगाने की मांग की गई। इसका उद्देश्य भारतीय उद्योग और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना था।

➣ 8. तटीय नौवहन को भारतीयों के लिए सुरक्षित करना: गाँधीजी ने तटीय परिवहन के लिए आरक्षण संबंधी विधेयक स्वीकार करने की मांग की, जिससे तटीय नौवहन में भारतीय कंपनियों के हितों की रक्षा की जा सके। यह मांग भारतीय व्यापारिक हितों और आर्थिक आत्मनिर्भरता से संबंधित थी।

➣ 9. राजनीतिक बंदियों की रिहाई: गाँधीजी ने सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की मांग की, हालांकि हत्या के दोषी व्यक्तियों को इसका अपवाद माना गया था। यह मांग औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध राजनीतिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से संबंधित थी।

➣ 10. केंद्रीय जाँच विभाग (C.I.D.) में सुधार: गाँधीजी ने CID को समाप्त करने अथवा उस पर लोकप्रिय नियंत्रण स्थापित करने की मांग की। औपनिवेशिक शासन में राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी और दमन में CID की भूमिका के कारण यह मांग नागरिक स्वतंत्रता से संबंधित थी।

➣ 11. आत्मरक्षा के लिए हथियारों के लाइसेंस: गाँधीजी ने सामान्य नागरिकों को आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने के लाइसेंस देने की नीति में सुधार की मांग की। वे चाहते थे कि हथियारों के लाइसेंस पर औपनिवेशिक सरकार का एकाधिकारवादी नियंत्रण कम किया जाए।

➣ गाँधीजी की 11 मांगों को विषय-वस्तु के आधार पर मुख्यतः तीन वर्गों में समझा जा सकता है-सामान्य जनहित की मांगें, भारतीय व्यापारिक एवं औद्योगिक हितों से संबंधित मांगें तथा किसान-हित की मांगें।

  • सामान्य जनहित की मांगों में मद्यनिषेध, सैन्य एवं प्रशासनिक खर्च में कमी, CID में सुधार, हथियारों के लाइसेंस और राजनीतिक बंदियों की रिहाई शामिल थीं।
  • व्यापारिक एवं औद्योगिक हितों से संबंधित मांगों में रुपये-स्टर्लिंग विनिमय दर में परिवर्तन, विदेशी कपड़ों पर सुरक्षात्मक शुल्क और तटीय नौवहन की सुरक्षा शामिल थी।
  • किसान-हित की प्रमुख मांगों में भूमि-राजस्व में कमी और नमक कर समाप्त करना शामिल था।

सरकार की प्रतिक्रिया

➣ गाँधीजी की 11 मांगों पर वायसराय लॉर्ड इरविन की ओर से ऐसा सकारात्मक उत्तर नहीं मिला जिससे गाँधीजी अपनी प्रस्तावित कार्रवाई रोकते। परिणामस्वरूप गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।

➣ 12 मार्च 1930 को गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी के लिए ऐतिहासिक यात्रा शुरू की। लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने समुद्र से नमक बनाकर औपनिवेशिक नमक कानून का उल्लंघन किया। इस प्रकार 11 सूत्री मांगों में शामिल नमक कर का प्रश्न सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक केंद्र बन गया।

क्रम11 सूत्री मांगमुख्य उद्देश्य
1पूर्ण मद्यनिषेधसामाजिक एवं नैतिक सुधार
2रुपया-स्टर्लिंग विनिमय अनुपात में परिवर्तनभारतीय आर्थिक हितों की रक्षा
3भूमि-राजस्व में 50% कमीकिसानों को आर्थिक राहत
4नमक कर और सरकारी नमक एकाधिकार समाप्त करनाजनसाधारण को राहत एवं औपनिवेशिक आर्थिक नियंत्रण को चुनौती
5सैन्य व्यय में 50% कमीभारतीय राजस्व पर भार कम करना
6उच्च प्रशासनिक व्यय/वेतन में कमीऔपनिवेशिक प्रशासन के खर्च को कम करना
7विदेशी कपड़ों पर सुरक्षात्मक शुल्कभारतीय वस्त्र उद्योग की रक्षा
8तटीय नौवहन को भारतीयों के लिए सुरक्षित करनाभारतीय व्यापारिक हितों की रक्षा
9राजनीतिक बंदियों की रिहाईराजनीतिक दमन समाप्त करना
10CID में सुधार/लोकप्रिय नियंत्रणनागरिक स्वतंत्रता की रक्षा
11आत्मरक्षा हेतु हथियारों के लाइसेंसऔपनिवेशिक नियंत्रण में कमी

स्वतंत्रता पश्चात् गाँधी एवं उनकी मृत्यु

➣ 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। दिल्ली में स्वतंत्रता समारोह आयोजित किए जा रहे थे, उस समय गाँधीजी कलकत्ता में थे। वे देश की स्वतंत्रता का उत्सव मनाने के बजाय वहाँ के साम्प्रदायिक तनाव को समाप्त करने में लगे हुए थे।

➣ 1947 में भारत के विभाजन का प्रश्न निर्णायक चरण में पहुँचा। तब उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के आधार पर भारत की एकता बनाए रखने के लिए अंतिम समय तक प्रयास किया। उन्होंने विभिन्न नेताओं से संवाद किया और साम्प्रदायिक समझौते का मार्ग तलाशने का प्रयास किया।

➣ किंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक समझौता न हो सका तथा विभाजन की योजना स्वीकार कर ली गई। इसके बाद गाँधीजी ने स्वतंत्रता के राजनीतिक समारोहों से स्वयं को दूर रखते हुए दंगाग्रस्त क्षेत्रों में शांति स्थापना को प्राथमिकता दी।

नोआखली और बिहार में शांति प्रयास

➣ 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखली क्षेत्र में व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा के बाद गाँधीजी वहाँ पहुँचे। उन्होंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों में गाँव-गाँव जाकर लोगों से संपर्क किया और भय तथा अविश्वास को दूर करने का प्रयास किया। लगभग चार महीने तक उन्होंने नोआखली के अनेक गाँवों में पदयात्रा की।

➣ गाँधीजी का तरीका प्रशासनिक शक्ति या राजनीतिक आदेश का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संपर्क, प्रार्थना, संवाद और नैतिक अपील का था। वे हिंसा से प्रभावित परिवारों के बीच गए और दोनों समुदायों से बदले की भावना छोड़कर शांति स्थापित करने का आग्रह किया।

➣ नोआखली के बाद गाँधीजी बिहार गए, जहाँ साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा को कम करने का प्रयास किया। उन्होंने हिंदू समुदाय से भी आत्मपरीक्षण करने और मुसलमानों के प्रति अन्याय रोकने का आग्रह किया। उनके लिए अहिंसा का सिद्धांत किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं था।

कलकत्ता में साम्प्रदायिक शांति

➣ 13 अगस्त 1947 को गाँधीजी कलकत्ता पहुँचे। वहाँ उन्होंने हुसैन शहीद सुहरावर्दी के साथ मिलकर शांति स्थापित करने का प्रयास किया। सुहरावर्दी उस समय बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री थे और विभाजन तथा साम्प्रदायिक राजनीति के कारण विवादास्पद राजनीतिक व्यक्तित्व माने जाते थे।

➣ गाँधीजी ने हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों से बातचीत की और हिंदू तथा मुस्लिम दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की। उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति ने लोगों पर गहरा नैतिक प्रभाव डाला और कलकत्ता में हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई।

➣ अगस्त के अंत में जब कलकत्ता में पुनः हिंसा भड़की, तब गाँधीजी ने 31 अगस्त 1947 को अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक मांग को मनवाना नहीं, बल्कि दोनों समुदायों को हिंसा रोकने और शांति स्थापित करने के लिए नैतिक रूप से प्रेरित करना था।

➣ विभिन्न समुदायों के नेताओं और नागरिकों द्वारा शांति का आश्वासन दिए जाने के बाद गाँधीजी ने 4 सितंबर 1947 को अपना उपवास समाप्त किया। कलकत्ता में हिंसा के इस प्रकार शांत होने की घटना को प्रायः कलकत्ता चमत्कार कहा जाता है।

दिल्ली में शरणार्थियों और साम्प्रदायिक हिंसा के बीच

➣ 9 सितंबर 1947 को गाँधीजी दिल्ली पहुँचे। विभाजन के कारण पंजाब और पश्चिमी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदू एवं सिख शरणार्थी दिल्ली पहुँचे थे।

➣ दूसरी ओर दिल्ली के मुसलमान भी भय और असुरक्षा का सामना कर रहे थे। गाँधीजी ने दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाल करने का प्रयास किया।

➣ उन्होंने शरणार्थी शिविरों का दौरा किया, मुस्लिम नेताओं से बातचीत की और प्रार्थना सभाओं में साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया। वे इस बात पर जोर देते थे कि विभाजन की त्रासदी के कारण किसी निर्दोष समुदाय के विरुद्ध सामूहिक प्रतिशोध उचित नहीं हो सकता।

➣ गाँधीजी ने दिल्ली में मुसलमानों की सुरक्षा, धार्मिक स्थलों की बहाली और साम्प्रदायिक हिंसा की समाप्ति को महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करे।

अंतिम चरण और मृत्यु

➣ जनवरी 1948 तक दिल्ली में साम्प्रदायिक तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। गाँधीजी लगातार विभिन्न समुदायों, राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत करते रहे। 13 जनवरी 1948 को उन्होंने साम्प्रदायिक शांति के लिए अपना अंतिम आमरण उपवास आरंभ किया।

➣ विभिन्न समुदायों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने शांति बनाए रखने तथा गाँधीजी की अपेक्षाओं को पूरा करने का आश्वासन दिया। इसके बाद गाँधीजी ने 18 जनवरी 1948 को अपना उपवास समाप्त किया।

➣ अंतिम उपवास के दौरान जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित अनेक प्रमुख नेता उनके संपर्क में रहे।

➣ 20 जनवरी 1948 को नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन की प्रार्थना सभा में गाँधीजी की हत्या का प्रयास किया गया।

➣ सभा के दौरान एक बम विस्फोट हुआ, लेकिन गाँधीजी सुरक्षित रहे और उन्होंने घटना के बाद भी अपनी प्रार्थना सभा जारी रखी। बाद में इस मामले में मदनलाल पाहवा को गिरफ्तार किया गया।

➣ 30 जनवरी 1948 को गाँधीजी अपने निवास बिड़ला भवन से प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे। उनके साथ मनु गाँधी और आभा गाँधी थीं।

➣ लगभग शाम 5:17 बजे नाथूराम विनायक गोडसे ने निकट से उन पर तीन गोलियाँ चलाईं। गाँधीजी वहीं गिर पड़े और उनका निधन हो गया।

➣ गाँधीजी की हत्या के संबंध में प्रचलित रूप से उनके अंतिम शब्द हे राम बताए जाते हैं, लेकिन इन शब्दों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी रहा है। इसलिए परीक्षा सामग्री में इसे प्रचलित मान्यता के अनुसार लिखना अधिक सावधानीपूर्ण है।

➣ गाँधीजी की मृत्यु के समय वे 78 वर्ष के थे। सरकारी अभिलेखों के अनुसार उनकी मृत्यु बिड़ला भवन में हुई, जहाँ वे 9 सितंबर 1947 से 30 जनवरी 1948 तक रहे थे। आज यह स्थान गाँधी स्मृति के नाम से जाना जाता है और उनके जीवन के अंतिम 144 दिनों की स्मृतियों को सुरक्षित रखता है।

➣ गाँधीजी का अंतिम संस्कार 31 जनवरी 1948 को किया गया। उनके अंतिम संस्कार में विशाल जनसमूह शामिल हुआ। उनकी मृत्यु ने भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में गहरा प्रभाव डाला और अहिंसा, शांति तथा मानव एकता के उनके संदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।

स्वतंत्रता पश्चात् गाँधीजी का ऐतिहासिक महत्व

➣ स्वतंत्रता के बाद गाँधीजी ने कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं किया और उनका ध्यान सत्ता-संचालन के बजाय सामाजिक पुनर्निर्माण तथा साम्प्रदायिक शांति पर रहा।

➣ वे स्वतंत्र भारत को केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और मानवीय रूप से स्वतंत्र समाज के रूप में देखना चाहते थे।

➣ उनके अंतिम महीनों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भी अपने मूल सिद्धांतों- सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव और मानव एकता से समझौता नहीं किया।

➣ कलकत्ता और दिल्ली में उनके शांति प्रयास यह दिखाते हैं कि वे सत्ता से बाहर रहकर भी अपने नैतिक प्रभाव के माध्यम से सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर सकते थे।

➣ इस प्रकार 1947–48 का काल गाँधीजी के जीवन का अंतिम राजनीतिक एवं नैतिक चरण था। जिस समय देश स्वतंत्र हुआ, उसी समय वे विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा से उत्पन्न पीड़ा के बीच शांति स्थापित करने में लगे रहे।

➣ उनकी हत्या के साथ उनका भौतिक जीवन समाप्त हुआ, लेकिन सत्य, अहिंसा और मानवता पर आधारित उनका विचार-विश्व भारतीय और वैश्विक सार्वजनिक जीवन में स्थायी प्रभाव छोड़ गया।

महात्मा गाँधी के प्रमुख आश्रम

➣ गाँधीजी के आश्रमों की विशेषता यह थी कि वे केवल निवास-स्थल नहीं थे। वे सत्य के प्रयोग, आत्मसंयम, सामुदायिक जीवन, श्रम की गरिमा, शिक्षा, खादी, अस्पृश्यता-उन्मूलन और ग्राम पुनर्निर्माण के प्रयोगशाला-स्थल थे।

➣ दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स और टॉल्सटॉय फार्म से शुरू हुआ यह आश्रम-प्रयोग भारत में कोचरब, साबरमती और सेवाग्राम के माध्यम से व्यापक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों में बदल गया।

कोचरब आश्रम (1915)

➣ भारत लौटने के बाद गाँधीजी ने मई 1915 में अहमदाबाद के कोचरब में अपना पहला भारतीय आश्रम स्थापित किया। इसे प्रारंभ में सत्याग्रह आश्रम कहा गया। गाँधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार यह भारत में गाँधीजी द्वारा स्थापित पहला आश्रम था।

➣ गाँधीजी ने अहमदाबाद को चुनने के पीछे कई कारण बताए थे। वे गुजराती भाषा के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से काम करना चाहते थे तथा अहमदाबाद के पुराने हाथकरघा उद्योग के कारण उन्हें यहाँ चरखा और घरेलू कताई को पुनर्जीवित करने की संभावनाएँ दिखाई देती थीं।

➣ कोचरब आश्रम में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, शारीरिक श्रम और स्वावलंबन जैसे सिद्धांतों का अभ्यास किया गया। सितंबर 1915 में दूदाभाई, दानीबहन और उनकी बेटी लक्ष्मी नामक दलित परिवार के आश्रम में प्रवेश को लेकर सामाजिक विरोध हुआ, लेकिन गाँधीजी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपनी स्थिति पर दृढ़ता बनाए रखी।

➣ कोचरब क्षेत्र में प्लेग फैलने के कारण गाँधीजी ने आश्रम को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इसके बाद आश्रम को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित किया गया।

साबरमती आश्रम (1917)

➣ 1917 में कोचरब से आश्रम को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित किया गया। यह स्थान आगे चलकर साबरमती आश्रम या सत्याग्रह आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गाँधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार 1917 में आश्रम का स्थायी रूप से साबरमती स्थानांतरण हुआ।

➣ साबरमती आश्रम 1917 से 1930 तक गाँधीजी के सार्वजनिक जीवन का प्रमुख केंद्र रहा। यहीं से उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद जैसे प्रारंभिक संघर्षों के दौरान अपने रचनात्मक और राजनीतिक कार्यों को आगे बढ़ाया।

➣ चरखा, खादी, स्वच्छता, ग्रामोद्योग, शिक्षा और सामाजिक सुधार से संबंधित अनेक कार्यक्रम भी इस आश्रम से संचालित हुए।

➣ 12 मार्च 1930 को गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी मार्च शुरू किया। दांडी यात्रा पर निकलते समय उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे स्वराज्य प्राप्त होने तक आश्रम में वापस नहीं लौटेंगे। इस कारण साबरमती आश्रम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।

➣ 1933 में गाँधीजी ने सत्याग्रह आश्रम को भंग कर दिया। बाद में आश्रम की संपत्ति हरिजन सेवक संघ को सौंप दी गई।

➣ स्वतंत्रता के बाद गाँधीजी के सहयोगियों और अनुयायियों ने Sabarmati Ashram Preservation and Memorial Trust की स्थापना की, जिसने इस स्थान के संरक्षण का कार्य आगे बढ़ाया।

सेवाग्राम आश्रम (1936)

➣ 1936 में गाँधीजी ने वर्धा के निकट सेगाँव नामक गाँव को अपना निवास बनाया। बाद में 5 मार्च 1940 को सेगाँव का नाम सेवाग्राम रखा गया।

➣ गाँधीजी अप्रैल 1936 से अगस्त 1946 तक सेवाग्राम से जुड़े रहे और यह उनके जीवन का अंतिम प्रमुख आश्रम-केंद्र बना।

➣ सेवाग्राम का उद्देश्य गाँधीजी के ग्राम स्वराज, रचनात्मक कार्यक्रम, ग्रामोद्योग, खादी, स्वच्छता और ग्रामीण पुनर्निर्माण के विचारों को व्यवहार में उतारना था।

वे चाहते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित न रहे, बल्कि गाँवों के सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण से भी जुड़ा हो।

➣ सेवाग्राम की बापू कुटी गाँधीजी के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों की साक्षी रही। व्यक्तिगत सत्याग्रह तथा भारत के राजनीतिक भविष्य से संबंधित अनेक चर्चाएँ इसी व्यापक सेवाग्राम परिवेश में हुईं।

आश्रम / सेटलमेंटवर्षस्थानपरीक्षा हेतु प्रमुख तथ्य
फीनिक्स सेटलमेंट1904डरबन, दक्षिण अफ्रीकारस्किन के “Unto This Last” से प्रभावित सामुदायिक जीवन। Indian Opinion से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र।
टॉल्सटॉय फार्म1910जोहानिसबर्ग के निकट, दक्षिण अफ्रीकाहर्मन कैलनबाख के सहयोग से स्थापित। सत्याग्रहियों और उनके परिवारों के लिए सामुदायिक जीवन का केंद्र।
कोचरब आश्रम1915अहमदाबादभारत में गाँधीजी द्वारा स्थापित पहला आश्रम। प्रारंभिक नाम सत्याग्रह आश्रम।
साबरमती आश्रम1917अहमदाबाद1917–1930 तक गाँधीजी का प्रमुख केंद्र। दांडी मार्च 12 मार्च 1930 को यहीं से शुरू हुआ।
सेवाग्राम आश्रम1936वर्धा, महाराष्ट्रगाँधीजी का अंतिम प्रमुख आश्रम-केंद्र। ग्राम स्वराज और रचनात्मक कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण केंद्र।

गाँधी जी के उपनाम एवं संबोधन

➣ महात्मा गाँधी को उनके जीवनकाल में विभिन्न व्यक्तियों, समुदायों और राजनीतिक विरोधियों ने अलग-अलग सम्मानसूचक, आत्मीय तथा व्यंग्यात्मक संबोधनों से पुकारा।

➣ इनमें कुछ नाम उनके नैतिक व्यक्तित्व और जनसेवा को दर्शाते थे, जबकि कुछ संबोधन औपनिवेशिक शासन के समर्थकों द्वारा आलोचनात्मक अथवा व्यंग्यात्मक रूप से प्रयुक्त किए गए थे।

महात्मा

➣ महात्मा शब्द संस्कृत के महा और आत्मा से बना है, जिसका सामान्य अर्थ महान आत्मा है। गाँधीजी के लिए इस संबोधन का प्रयोग उनके सार्वजनिक जीवन के दौरान धीरे-धीरे व्यापक हुआ।

➣ प्रचलित धारणा में रवींद्रनाथ टैगोर को गाँधीजी को महात्मा कहने वाले प्रमुख व्यक्तियों में माना जाता है। भारत सरकार की गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के अनुसार टैगोर ने 1915 में गाँधीजी को महात्मा कहकर संबोधित किया था।

➣ हालांकि सरकार यह भी स्पष्ट करती है कि सबसे पहले किस व्यक्ति ने गाँधीजी को महात्मा कहा, इसका कोई निर्णायक प्रामाणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

बापू

➣ गाँधीजी को भारत में व्यापक रूप से बापू कहा जाता था। बापू का अर्थ सामान्यतः पिता या पूज्य पिता के रूप में लिया जाता है। यह संबोधन उनके प्रति जनता के स्नेह, आत्मीयता और नैतिक नेतृत्व की भावना को व्यक्त करता था।

➣ गाँधीजी के लिए बापू संबोधन उनके अनुयायियों और सामान्य जनता में विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। उनके पत्र-व्यवहार, आश्रम जीवन तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी यह संबोधन व्यापक रूप से प्रयुक्त होता था।

राष्ट्रपिता

➣ राष्ट्रपिता गाँधीजी के लिए सबसे प्रसिद्ध सम्मानसूचक संबोधनों में से एक है। हालांकि भारत सरकार ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि देने संबंधी कोई आधिकारिक अधिसूचना या संवैधानिक आदेश जारी नहीं किया है। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के अनुसार ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

➣ उपलब्ध सरकारी अभिलेखों के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 4 जून 1944 को रंगून स्थित आजाद हिंद रेडियो से अपने संबोधन में गाँधीजी को Father of the Nation कहकर संबोधित किया था।

➣ बाद में इसका हिंदी रूप राष्ट्रपिता अत्यंत लोकप्रिय हो गया। इसलिए परीक्षा में यह लिखना अधिक उचित है कि राष्ट्रपिता संबोधन को लोकप्रिय बनाने वालों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रमुख स्थान है, न कि यह कि भारत सरकार ने उन्हें औपचारिक रूप से यह उपाधि दी थी।

गाँधी जी के अन्य प्रमुख संबोधन

➣ दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के कारण भारतीयों को सामान्यतः कुली कहकर अपमानित किया जाता था। इसी संदर्भ में गाँधीजी को भी कुली बैरिस्टर कहा गया।

गाँधीजी स्वयं अपनी आत्मकथा में दक्षिण अफ्रीका के उस नस्लवादी वातावरण का उल्लेख करते हैं जिसमें भारतीयों को कुली कहा जाता था और उन्हें कुली बैरिस्टर के रूप में देखा जाता था। यह संबोधन भारतीयों के प्रति उस समय के औपनिवेशिक नस्लीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।

➣ गाँधीजी ने स्वच्छता और शारीरिक श्रम को अपने जीवन और आश्रम-व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। वे स्वयं शौचालय की सफाई और मेहतर के कार्य को करने में संकोच नहीं करते थे।

➣ इसी कारण उनके निकट सहयोगियों और सामाजिक कार्य से जुड़े लोगों में उन्हें भंगी शिरोमणि जैसे सम्मानसूचक संबोधन से याद किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह संबोधन उनके श्रम की गरिमा और अस्पृश्यता-विरोध के विचार से जुड़ा हुआ है।

➣ दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के सहयोगियों और उनके कार्यों से प्रभावित लोगों द्वारा उन्हें कर्मवीर जैसे सम्मानसूचक संबोधनों से भी याद किया गया। यह नाम उनके सक्रिय कार्य, सेवा और संघर्षशील जीवन की ओर संकेत करता है।

➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रयासों के लिए भारतीयों की भर्ती का समर्थन किया। विशेष रूप से 1918 के वॉर कॉन्फ्रेंस के समय उन्होंने भारतीयों से सेना में भर्ती होने की अपील की।

➣ इसी कारण उन्हें आलोचनात्मक रूप से भर्ती करने वाला सार्जेंट कहा गया। यह संबोधन उनके राजनीतिक जीवन के उस चरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है जब वे ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सहयोग की नीति से तत्काल पूर्ण विरोध की स्थिति में नहीं पहुँचे थे।

➣ कैसर-ए-हिंद वास्तव में गाँधीजी का उपनाम नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा दिया गया एक सम्मान-पदक था।

उन्हें यह पदक 1915 में दक्षिण अफ्रीका में एम्बुलेंस सेवा तथा ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उनकी सेवाओं के सम्मान में प्रदान किया गया था। बाद में जलियाँवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में ब्रिटिश दमन के विरोध में गाँधीजी ने यह पदक लौटा दिया।

➣ ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने गाँधीजी के सादे पहनावे और औपनिवेशिक सत्ता के साथ उनके राजनीतिक संघर्ष की आलोचना करते हुए उन्हें Half-naked Fakir (अर्धनंगा फकीर) कहा था। यह टिप्पणी विशेष रूप से गाँधीजी की सादगी और उनके राजनीतिक प्रभाव के प्रति चर्चिल के आलोचनात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

➣ चर्चिल ने गाँधीजी के प्रति अपने तीखे विरोध के दौरान उन्हें देशद्रोही फकीर जैसे अपमानजनक शब्दों से भी संबोधित किया। इसका संबंध ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गाँधीजी के राजनीतिक संघर्ष और विशेष रूप से उनके जनआंदोलनों के प्रति चर्चिल की कठोर असहमति से था।

➣ गाँधीजी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच राजनीतिक वार्ताओं और मुलाकातों को कवयित्री एवं स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू ने प्रसिद्ध रूप से दो महात्मा के रूप में वर्णित किया था। यह संबोधन

➣ गाँधी-इरविन संवाद की ऐतिहासिक परिस्थितियों और दोनों के बीच हुई राजनीतिक बातचीत के संदर्भ में उल्लेखनीय है।

➣ 1947 के विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा के समय गाँधीजी कलकत्ता में शांति स्थापित करने के लिए सक्रिय थे। पंजाब में हजारों सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद व्यापक हिंसा जारी थी, जबकि गाँधीजी की व्यक्तिगत उपस्थिति वाले बंगाल में स्थिति नियंत्रित हो रही थी।

➣ इस संदर्भ में लॉर्ड माउंटबेटन ने 26 अगस्त 1947 के पत्र में गाँधीजी को One-Man Boundary Force कहा। यह संबोधन गाँधीजी की नैतिक शक्ति और साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने की क्षमता का प्रतीक बन गया।

➣ सेवाग्राम में गाँधीजी के सादगीपूर्ण जीवन, सेवा-भाव, ग्राम-उत्थान और आश्रम-आधारित जीवन-पद्धति से प्रभावित लोगों द्वारा उन्हें सेवाग्राम का संत जैसे संबोधनों से भी याद किया गया। यह संबोधन उनके ग्रामीण पुनर्निर्माण, सेवा और तपस्वी जीवन को व्यक्त करता है।

➣ 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में गाँधीजी की अहिंसक गतिविधियों और उनके सरल जीवन से प्रभावित होकर वहाँ के कुछ पठान/कबायली लोगों द्वारा उन्हें मलंग बाबा जैसे संबोधन से पुकारे जाने का उल्लेख मिलता है। यह संबोधन स्थानीय जनसमुदाय के बीच गाँधीजी की लोकप्रियता और उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है।

➣ गाँधीजी के लिए भिखारियों का राजा जैसे संबोधन का उल्लेख उनके अत्यंत सादे जीवन और जनता से सहायता जुटाने की शैली के संदर्भ में मिलता है। यह संबोधन सामान्यतः गाँधीजी के सादगीपूर्ण जीवन और जनसेवा के लिए संसाधन जुटाने की शैली से जोड़ा जाता है।

उपनाम / संबोधनसंबंधित व्यक्ति / समूहमहत्वपूर्ण तथ्य
महात्मारवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1915 में प्रयोग का प्रमाणसबसे पहले किसने कहा, इसका निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं।
बापूजनता एवं सहयोगीआत्मीय संबोधन, अर्थ — पिता/पूज्य पिता।
राष्ट्रपितासुभाष चंद्र बोस1944 के रंगून रेडियो प्रसारण में Father of the Nation संबोधन।
कुली बैरिस्टरदक्षिण अफ्रीका का नस्लवादी औपनिवेशिक वातावरणभारतीयों को कुली कहने की प्रथा के कारण गाँधीजी को भी कहा गया।
कर्मवीरसहयोगी / प्रशंसकउनके सक्रिय और संघर्षशील कार्य से संबंधित सम्मानसूचक संबोधन।
भर्ती करने वाला सार्जेंटआलोचनात्मक संबोधन1918 में प्रथम विश्व युद्ध के लिए भारतीय सैनिकों की भर्ती के समर्थन के संदर्भ में।
कैसर-ए-हिंदब्रिटिश सरकार1915 में मिला सम्मान-पदक, बाद में गाँधीजी ने लौटा दिया।
अर्धनंगा फकीरविंस्टन चर्चिलगाँधीजी की सादगी और ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की आलोचना में।
देशद्रोही फकीरविंस्टन चर्चिलगाँधीजी के ब्रिटिश शासन-विरोधी राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में।
दो महात्मासरोजिनी नायडूगाँधी और लॉर्ड इरविन के बीच राजनीतिक वार्ताओं के संदर्भ में।
वन-मैन बॉउंड्री फोर्सलॉर्ड माउंटबेटन1947 में बंगाल की साम्प्रदायिक हिंसा शांत कराने में गाँधीजी की भूमिका के लिए।
मलंग बाबाउत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के स्थानीय लोग1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान प्रचलित संबोधन के रूप में उल्लेखित।

➣ गाँधीजी के संबोधनों का अध्ययन करते समय यह अंतर समझना आवश्यक है कि महात्मा, बापू और राष्ट्रपिता सम्मानसूचक संबोधन हैं, जबकि अर्धनंगा फकीर, देशद्रोही फकीर और कुली बैरिस्टर जैसे शब्द अलग-अलग राजनीतिक या औपनिवेशिक संदर्भों में प्रयुक्त हुए थे। वहीं कैसर-ए-हिंद वास्तव में एक सरकारी सम्मान-पदक था, उपनाम नहीं।

महात्मा की उपाधि : मतभेद

➣ महात्मा गाँधी को महात्मा कहे जाने के संबंध में सामान्यतः रवींद्रनाथ टैगोर का नाम लिया जाता है, लेकिन इस संबंध में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मतभेद है।

➣ इतिहासकार एस. आर. मेहरोत्रा ने अपनी पुस्तक The Mahatma &amp। The Doctor में उपलब्ध पत्र-साक्ष्य के आधार पर बताया है कि डॉ. प्राणजीवन मेहता ने गाँधीजी को टैगोर से पहले ही Mahatma कहा था।

➣ इसका प्रमाण 8 नवंबर 1909 को डॉ. प्राणजीवन मेहता द्वारा गोपाल कृष्ण गोखले को लिखे पत्र में मिलता है। इस पत्र में मेहता ने गाँधीजी को a great Mahatma कहकर संबोधित किया था। यह पत्र मेहता के गाँधीजी के साथ लंबे व्यक्तिगत संबंध और उनके व्यक्तित्व के प्रति गहरी प्रशंसा को भी दर्शाता है।

➣ इस आधार पर एस. आर. मेहरोत्रा ने डॉ. प्राणजीवन मेहता को गाँधीजी के लिए महात्मा संबोधन के सबसे प्रारंभिक ज्ञात प्रयोगकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया है। यह प्रयोग 1909 का है, अर्थात गाँधीजी के भारत लौटने (1915) से लगभग छह वर्ष पहले का।

➣ दूसरी ओर, भारत सरकार की गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति का कहना है कि यह निश्चित रूप से प्रमाणित करने के लिए कोई निर्णायक प्रामाणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है कि सबसे पहले किसने गाँधीजी को महात्मा कहा।

➣ सरकारी स्रोत रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1915 में गाँधीजी को महात्मा कहे जाने की पुष्टि करता है। इसलिए परीक्षा की दृष्टि से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि 1909 में डॉ. प्राणजीवन मेहता द्वारा Mahatma शब्द का प्रयोग एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक प्रमाण है, जबकि टैगोर द्वारा 1915 में इसका प्रयोग व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुआ।

गाँधी शांति अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार

➣ गाँधी शांति पुरस्कार भारत सरकार द्वारा 1995 में महात्मा गाँधी की 125वीं जयंती के अवसर पर स्थापित किया गया। यह पुरस्कार सत्य, अहिंसा और मानव सेवा के गाँधीवादी आदर्शों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया। यह एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार है, जिसके लिए किसी व्यक्ति या संस्था का किसी विशेष राष्ट्रीयता, जाति, भाषा, लिंग, वर्ग या धर्म से संबंधित होना आवश्यक नहीं है।

➣ गाँधी शांति पुरस्कार का उद्देश्य उन व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित करना है जिन्होंने शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय, मानव कल्याण और सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन के क्षेत्र में गाँधीवादी तरीकों से महत्वपूर्ण योगदान दिया हो। पुरस्कार के माध्यम से सत्य, अहिंसा और मानव सेवा जैसे गाँधीवादी मूल्यों को प्रोत्साहित किया जाता है।

पुरस्कार का स्वरूप

➣ गाँधी शांति पुरस्कार में वर्तमान स्वरूप के अनुसार 1 करोड़ रुपये की नकद राशि, एक प्रशस्ति-पत्र, एक पट्टिका तथा एक उत्कृष्ट पारंपरिक हस्तशिल्प/हथकरघा वस्तु प्रदान की जाती है। यह पुरस्कार व्यक्तियों के साथ-साथ संस्थाओं और संगठनों को भी दिया जा सकता है।

➣ पुरस्कार के लिए सामान्यतः नामांकन से पहले के दस वर्षों के योगदान को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है, हालांकि यदि पुराने योगदान का महत्व हाल में स्पष्ट हुआ हो तो उन्हें भी विचार में लिया जा सकता है।

पुरस्कार का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली जूरी द्वारा किया जाता है।

प्रमुख विजेता

➣ गाँधी शांति पुरस्कार का प्रथम पुरस्कार 1995 में डॉ. जूलियस के. न्येरेरे को प्रदान किया गया। वे तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति थे और अफ्रीकी एकता, शांति तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनके योगदान को सम्मानित किया गया।

वर्षपुरस्कार विजेताप्रमुख पहचान
1995डॉ. जूलियस के. न्येरेरेतंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति, प्रथम गाँधी शांति पुरस्कार विजेता।
1996डॉ. ए. टी. अरियारत्नश्रीलंका के सर्वोदय श्रमदान आंदोलन के संस्थापक।
1997डॉ. गेरहार्ड फिशरजर्मनी।
1998रामकृष्ण मिशनभारत की प्रमुख सामाजिक-सेवा एवं आध्यात्मिक संस्था।
1999बाबा आम्टेकुष्ठरोगियों के पुनर्वास और मानव सेवा के लिए प्रसिद्ध।
2000नेल्सन मंडेला एवं ग्रामीण बैंकसंयुक्त रूप से, मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और ग्रामीण बैंक बांग्लादेश की संस्था।
2001जॉन ह्यूमआयरलैंड, शांति और राजनीतिक समझौते के लिए प्रसिद्ध।
2002भारतीय विद्या भवनभारत की प्रमुख सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संस्था।
2003वाक्लाव हावेलपूर्व चेकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के समर्थक।
2005आर्कबिशप डेसमंड टूटूदक्षिण अफ्रीका, रंगभेद-विरोधी और शांति के लिए प्रसिद्ध।
2013चंडी प्रसाद भट्टपर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकर्ता, चिपको आंदोलन से जुड़े।
2014भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)वैज्ञानिक एवं तकनीकी योगदान।
2015विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारीशिक्षा, सेवा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में कार्य।
2016अक्षय पात्र फाउंडेशन एवं सुलभ इंटरनेशनलसंयुक्त रूप से, सामाजिक सेवा और मानव कल्याण के लिए।
2017एकल अभियान ट्रस्टग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और सामाजिक विकास।
2018योहेई ससाकावाजापान, कुष्ठरोग उन्मूलन और मानव सेवा से जुड़े कार्य।
2019सुल्तान काबूस बिन सईद अल सईदओमान के सुल्तान, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सहयोग के लिए।
2020शेख मुजीबुर रहमानबांग्लादेश, बांग्लादेश के राष्ट्रपिता के रूप में प्रसिद्ध।
2021गीता प्रेस, गोरखपुरभारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशन और प्रसार में योगदान।

गाँधी उपनाम से जाने जाने वाले प्रमुख व्यक्ति

➣ महात्मा गाँधी के सत्य, अहिंसा, जनसेवा और सामाजिक सुधार के विचारों से प्रभावित होकर भारत तथा विश्व के कई प्रमुख व्यक्तियों को सम्मानपूर्वक गाँधी की उपाधि या संबोधन से जोड़ा गया।

उपनाम / संबोधनप्रमुख व्यक्तिपरीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
सीमांत गाँधीखान अब्दुल गफ्फार खानउत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के महान अहिंसक नेता, खुदाई खिदमतगार आंदोलन के संस्थापक तथा गाँधीवादी विचारों के समर्थक।
बिहार के गाँधीडॉ. राजेंद्र प्रसादबिहार के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, गाँधीजी के निकट सहयोगी और भारत के प्रथम राष्ट्रपति।
आधुनिक गाँधीबाबा आम्टेकुष्ठरोगियों के पुनर्वास, मानव सेवा और सामाजिक सुधार के लिए प्रसिद्ध, उनके जीवन में गाँधीवादी सेवा, श्रम और अहिंसा की स्पष्ट छाप थी। उन्हें Modern Gandhi (आधुनिक गाँधी) के रूप में भी जाना जाता है।
श्रीलंका के गाँधीए. टी. अरियारत्नश्रीलंका के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, सर्वोदय श्रमदान आंदोलन के संस्थापक, जिसने गाँधीवादी ग्राम-उत्थान और सामुदायिक सेवा की भावना को आगे बढ़ाया।
अमेरिकन गाँधीमार्टिन लूथर किंग जूनियरअमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के प्रमुख नेता, उन्होंने गाँधीजी के अहिंसक प्रतिरोध से प्रेरणा ली और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन चलाया।
बर्मी गाँधीजनरल आंग सानबर्मा (म्यांमार) के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के कारण उन्हें कभी-कभी गाँधीवादी तुलना के संदर्भ में याद किया जाता है।
अफ्रीकी गाँधीकेनेथ कौंडाजाम्बिया के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता और देश के प्रथम राष्ट्रपति, अफ्रीकी स्वतंत्रता संघर्ष में अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में चर्चित।

➣ सीमांत गाँधी के रूप में खान अब्दुल गफ्फार खान का संबोधन सबसे अधिक स्थापित और व्यापक रूप से प्रमाणित है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने भी उन्हें Frontier Gandhi (सीमांत गाँधी) तथा गाँधीजी के निकट अहिंसक सहयोगी के रूप में उल्लेखित किया है।

➣ इसी प्रकार बाबा आम्टे का कार्य गाँधीवादी मूल्यों से गहराई से प्रभावित था। उन्होंने कुष्ठरोग से पीड़ित लोगों के पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन के लिए आनंदवन जैसी संस्थाओं के माध्यम से काम किया। उन्हें Modern Gandhi of India के रूप में भी संदर्भित किया गया है।

➣ इन संबोधनों का सामान्य उद्देश्य यह बताना है कि संबंधित व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में अहिंसा, जनसेवा, सामाजिक सुधार, आत्मनिर्भरता या नैतिक संघर्ष जैसे गाँधीवादी मूल्यों को आगे बढ़ाया।

➣ हालांकि इन सभी उपाधियों का स्रोत और प्रचलन समान स्तर का नहीं है, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से “किसे क्या कहा जाता है?” के रूप में इन्हें याद करना अधिक उपयोगी है।

महात्मा गाँधी से सम्बद्ध प्रमुख स्थल

➣ महात्मा गाँधी का जीवन भारत और विदेशों के अनेक स्थानों से जुड़ा रहा। पोरबंदर और राजकोट उनके प्रारंभिक जीवन से, लंदन उनकी कानून की शिक्षा से, दक्षिण अफ्रीका उनके सत्याग्रह के विकास से तथा साबरमती, सेवाग्राम, चंपारण, दांडी और दिल्ली उनके भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन से जुड़े प्रमुख स्थल हैं।

प्रमुख स्थलस्थानमहात्मा गाँधी से संबंध
कीर्ति मंदिरपोरबंदर, गुजरातगाँधीजी का जन्मस्थान, 2 अक्टूबर 1869 को जन्म।
कबा गाँधी नो डेलोराजकोट, गुजरातगाँधीजी के बाल्यकाल और किशोरावस्था से संबंधित पारिवारिक निवास।
पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशनदक्षिण अफ्रीका1893 में प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर निकाले जाने की घटना, दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष का निर्णायक मोड़।
फीनिक्स सेटलमेंटडरबन, दक्षिण अफ्रीका1904 में स्थापित, सामुदायिक जीवन, श्रम, स्वावलंबन और Indian Opinion से संबंधित प्रमुख केंद्र।
टॉल्सटॉय फार्मजोहानिसबर्ग के निकट, दक्षिण अफ्रीका1910 में स्थापित, सत्याग्रहियों और उनके परिवारों के लिए सामुदायिक जीवन तथा आत्मनिर्भरता का केंद्र।
कोचरब आश्रमअहमदाबाद, गुजरात1915 में स्थापित, भारत में गाँधीजी का पहला आश्रम, प्रारंभिक नाम सत्याग्रह आश्रम।
साबरमती आश्रमअहमदाबाद, गुजरात1917 में आश्रम स्थानांतरित, गाँधीजी के राजनीतिक एवं रचनात्मक कार्यों का प्रमुख केंद्र, 12 मार्च 1930 को दांडी मार्च यहीं से शुरू हुआ।
चंपारणबिहार1917 के चंपारण सत्याग्रह का केंद्र, नील किसानों और तीनकठिया प्रथा के विरुद्ध गाँधीजी का महत्वपूर्ण प्रारंभिक किसान संघर्ष।
मोतिहारीबिहारचंपारण आंदोलन का प्रमुख केंद्र, 18 अप्रैल 1917 को गाँधीजी की अदालत में पेशी और प्रशासनिक आदेश की अवज्ञा का ऐतिहासिक प्रसंग।
दांडीगुजरात6 अप्रैल 1930 को गाँधीजी ने समुद्र से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा, सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रमुख प्रतीक।
सेवाग्राम आश्रमवर्धा, महाराष्ट्र1936 से गाँधीजी का प्रमुख आश्रम-केंद्र, ग्राम स्वराज, खादी, ग्रामोद्योग और ग्रामीण पुनर्निर्माण के प्रयोगों से संबंधित।
यरवदा जेलपुणे, महाराष्ट्र1932 का आमरण उपवास और पूना समझौते से संबंधित महत्वपूर्ण स्थल।
आगा खाँ पैलेसपुणे, महाराष्ट्रभारत छोड़ो आंदोलन के बाद गाँधीजी की नजरबंदी, महादेव देसाई (1942) और कस्तूरबा गाँधी (1944) के निधन से संबंधित।
गाँधी स्मृतिनई दिल्ली5, तीस जनवरी मार्ग स्थित बिड़ला भवन, गाँधीजी के अंतिम 144 दिनों और 30 जनवरी 1948 की हत्या से संबंधित।
राजघाटनई दिल्ली31 जनवरी 1948 को गाँधीजी का अंतिम संस्कार, वर्तमान में उनकी समाधि स्थित है।

महात्मा गाँधी : विशिष्ट तथ्य

महत्वपूर्ण तिथियाँ

तिथि / वर्षमहत्वपूर्ण घटना / तथ्य
2 अक्टूबर 1869मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म पोरबंदर, गुजरात में हुआ। उनके पिता करमचंद गाँधी (कबा गाँधी) और माता पुतलीबाई थीं।
1883गाँधीजी का विवाह कस्तूरबा गाँधी से हुआ।
1887मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण की और समलदास कॉलेज, भावनगर में प्रवेश लिया।
4 सितंबर 1888कानून की शिक्षा के लिए मुंबई से इंग्लैंड प्रस्थान किया।
10 जून 1891Inner Temple से बैरिस्टर के रूप में योग्य हुए।
1893अब्दुल्ला के मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए।
1894दक्षिण अफ्रीका में नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की।
1899द्वितीय बोअर युद्ध के दौरान भारतीयों की चिकित्सा एवं राहत सेवा के लिए Indian Ambulance Corps का गठन कराया।
1901कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार भाग लिया, यह गाँधीजी का कांग्रेस अधिवेशन में पहला अनुभव था। इसी अवसर पर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समस्याओं को कांग्रेस के सामने रखा।
1904दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना की।
1906दक्षिण अफ्रीका में संगठित सत्याग्रह का महत्वपूर्ण चरण प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत भी लिया।
1908सत्याग्रह के दौरान पहली बार जेल गए।
1910जोहान्सबर्ग के निकट टॉल्सटॉय फार्म की स्थापना हुई।
1914दक्षिण अफ्रीका में लगभग 21 वर्षों के संघर्ष के बाद भारत लौटने की तैयारी की।
9 जनवरी 1915दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, इसी कारण 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।
1915अहमदाबाद के कोचरब में भारत का पहला गाँधी आश्रम स्थापित किया।
1917आश्रम को साबरमती स्थानांतरित किया गया और इसी वर्ष चंपारण सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
1918अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन और खेड़ा सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
1919रॉलेट सत्याग्रह का नेतृत्व किया, 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल हुई।
1920असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया।
1923अखिल भारतीय खादी बोर्ड की स्थापना से संबंधित खादी संगठनात्मक कार्य को आगे बढ़ाया।
1924बेलगाँव कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की, कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता करने का गाँधीजी का एकमात्र अवसर था।
1925गाँधीजी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना हुई।
12 मार्च 1930साबरमती आश्रम से ऐतिहासिक दांडी मार्च प्रारंभ किया।
6 अप्रैल 1930दांडी पहुँचकर नमक कानून का उल्लंघन किया।
20 सितंबर 1932यरवदा जेल में आमरण उपवास प्रारंभ किया, इसके बाद पूना समझौता हुआ।
1936वर्धा के निकट सेगाँव में निवास प्रारंभ किया, जो आगे चलकर सेवाग्राम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
8 अगस्त 1942भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया गया और गाँधीजी ने “करो या मरो” का आह्वान किया।
9 अगस्त 1942गाँधीजी सहित कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
13 जनवरी 1948दिल्ली में अंतिम उपवास प्रारंभ किया।
18 जनवरी 1948साम्प्रदायिक शांति के आश्वासन के बाद अंतिम उपवास समाप्त किया।
30 जनवरी 1948नई दिल्ली के बिड़ला भवन में गाँधीजी की हत्या कर दी गई।
31 जनवरी 1948गाँधीजी का अंतिम संस्कार किया गया, बाद में राजघाट उनका प्रमुख स्मारक और समाधि स्थल बना।

प्रमुख पुस्तकें

पुस्तकप्रमुख विषय / महत्व
हिन्द स्वराज (1909)आधुनिक सभ्यता, स्वराज, औद्योगीकरण और पश्चिमी राजनीतिक व्यवस्था पर गाँधीजी के विचार।
सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथागाँधीजी की आत्मकथा, जीवन को सत्य के प्रयोगों के रूप में प्रस्तुत किया।
दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहासदक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के विकास और संघर्षों का विवरण।
रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थानखादी, ग्रामोद्योग, अस्पृश्यता-उन्मूलन, साम्प्रदायिक एकता और सामाजिक पुनर्निर्माण।
आरोग्य की कुंजीस्वास्थ्य, आहार और जीवन-पद्धति पर गाँधीजी के विचार।
गीता के अनुसार अनासक्ति योगभगवद्गीता की गाँधीवादी व्याख्या और अनासक्ति के सिद्धांत से संबंधित।

प्रमुख सहयोगी

व्यक्तिगाँधीजी से संबंध / भूमिका
गोपाल कृष्ण गोखलेगाँधीजी के राजनीतिक गुरु, भारत की परिस्थितियों का अध्ययन करने की सलाह दी।
राजकुमार शुक्लचंपारण के किसान नेता, उनके आग्रह पर गाँधीजी चंपारण पहुँचे।
डॉ. राजेंद्र प्रसादचंपारण सत्याग्रह के महत्वपूर्ण सहयोगी, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति।
आचार्य जे.बी. कृपलानीचंपारण में सहयोगी, बाद में कांग्रेस के प्रमुख नेता।
सरदार वल्लभभाई पटेलखेड़ा सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में गाँधीजी के प्रमुख सहयोगी।
महादेव देसाईगाँधीजी के निकट सहयोगी, निजी सचिव और लेखक।
जमनालाल बजाजगाँधीजी के निकट सहयोगी और रचनात्मक कार्यक्रमों के प्रमुख समर्थक।
मीराबेनगाँधीजी की शिष्या, आश्रम तथा ग्रामीण कार्यों से जुड़ीं।
सी.एफ. एंड्रूजगाँधीजी के निकट मित्र और भारतीय हितों के समर्थक।
हर्मन कैलनबाखदक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के सहयोगी, टॉल्सटॉय फार्म से संबंधित।

प्रमुख नारे

नारा / कथनसंबंधित संदर्भ
करो या मरो8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के अवसर पर गाँधीजी का प्रसिद्ध आह्वान।
अंग्रेजों भारत छोड़ोभारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनभावना का प्रमुख नारा।
करेंगे या मरेंगेभारत छोड़ो आंदोलन की निर्णायक भावना को व्यक्त करने वाला कथन, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंतिम संघर्ष का संदेश।

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