कैबिनेट मिशन योजना (1946) : परिचय
➣ कैबिनेट मिशन ब्रिटिश सरकार द्वारा 1946 ई. में भारत भेजा गया एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल था। इसका उद्देश्य भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने, सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तैयार करने तथा भारतीय नेताओं की सहमति से संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त करना था। इसे त्रि-सदस्यीय मिशन या कैबिनेट मिशन प्लान भी कहा जाता है।
➣ मिशन ने भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग, से कई दौर की बातचीत की। जब दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बन सकी, तब मिशन ने अपनी ओर से 16 मई, 1946 ई. को अपनी योजना प्रस्तुत की।
➣ कैबिनेट मिशन ने भारत के विभाजन का समर्थन नहीं किया, बल्कि एक ऐसे संघीय ढाँचे का प्रस्ताव रखा, जिसमें केंद्र (संघ), प्रांतीय समूह तथा प्रांत तीनों स्तर शामिल थे। साथ ही, इसी योजना में संविधान सभा के गठन तथा अंतरिम सरकार बनाने का भी प्रस्ताव दिया गया।
➣ यद्यपि कैबिनेट मिशन योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व अधिक है, क्योंकि भारत की संविधान सभा का गठन इसी योजना के आधार पर हुआ और आगे चलकर इसी संविधान सभा ने भारतीय संविधान का निर्माण किया।
कैबिनेट मिशन योजना (1946) ब्रिटिश सरकार का भारत के लिए अंतिम प्रमुख संवैधानिक प्रस्ताव था। इसने भारत के विभाजन का समर्थन नहीं किया, संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया तथा भारतीय संविधान के निर्माण की आधारशिला रखी।
कैबिनेट मिशन की पृष्ठभूमि
➣ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की स्थिति:- द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) ने ब्रिटेन को आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर कर दिया था। युद्ध के भारी खर्च के बीच एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य को बनाए रखना कठिन होता जा रहा था, जबकि अमेरिका और सोवियत संघ नई महाशक्तियों के रूप में उभर रहे थे। इसी कारण ब्रिटेन भारत में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की दिशा में सोचने लगा।
➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक मतभेद एवं पाकिस्तान की माँग:- कांग्रेस अखंड भारत और अपेक्षाकृत मज़बूत केंद्र वाले संविधान की समर्थक थी तथा स्वयं को सभी भारतीयों की प्रतिनिधि मानती थी।
➣ इसके विपरीत मुस्लिम लीग मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र मानती थी और लाहौर प्रस्ताव (मार्च 1940) के बाद पाकिस्तान की माँग पर अड़ी थी। यही मतभेद आगे की सभी वार्ताओं की मुख्य बाधा बना रहा।
➣ वेवेल योजना एवं शिमला सम्मेलन (1945) की असफलता के बाद यह स्पष्ट हो गया कि केवल भारतीय नेताओं के बीच बातचीत से भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान नहीं निकल पा रहा था।
➣ वायसराय वेवेल ने 14 जून, 1945 ई. को अपनी योजना घोषित की और 25 जून से 14 जुलाई 1945 तक शिमला सम्मेलन चला, लेकिन मुस्लिम लीग की यह जिद कि कार्यकारी परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य वही नामित करेगी, इसकी असफलता का मुख्य कारण बनी। इसके बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद पहले की अपेक्षा और अधिक गहरे हो चुके थे।
➣ इसी बीच जुलाई 1945 ई. में ब्रिटेन में आम चुनाव हुए, जिनमें लेबर पार्टी को स्पष्ट बहुमत (393 सीटें) मिला। क्लेमेंट एटली ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने। नई सरकार भारत की समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकालने तथा शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के पक्ष में थी।
19 सितम्बर, 1945 ई. को वायसराय वेवेल ने घोषणा की कि केंद्रीय एवं प्रांतीय चुनावों के बाद एक संविधान निर्मात्री संस्था बुलाई जाएगी और कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन होगा।➣ भारत में भी राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। 1945-46 के केन्द्रीय एवं प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भारी सफलता प्राप्त की। केंद्रीय विधानसभा की 102 निर्वाचित सीटों में से 57 सीटें कांग्रेस को मिलीं और उसने 11 में से 8 प्रांतों में सरकार बनाई।
➣ दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने केंद्रीय विधानसभा की सभी 30 मुस्लिम आरक्षित सीटें तथा प्रांतों में लगभग 90% मुस्लिम सीटें जीतकर यह दावा और मजबूत किया कि वही भारत के मुसलमानों की एकमात्र प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि है। लीग ने बंगाल और सिंध में सरकार बनाई।
➣ INA अधिकारियों पर चले मुकदमों (नवम्बर 1945) तथा 18 फरवरी, 1946 ई. के नौसैनिक विद्रोह (HMIS तलवार, बंबई) जैसी घटनाओं ने भी ब्रिटिश सरकार पर भारत की समस्या का शीघ्र समाधान निकालने का दबाव बढ़ाया।
➣ इन परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 19 फरवरी, 1946 ई. को भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भारत भेजने की घोषणा की।
15 मार्च, 1946 ई. को ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) में एटली ने स्पष्ट कहा कि भारत को अपना भविष्य स्वयं चुनने का अधिकार है और किसी अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक की प्रगति पर वीटो लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यही प्रतिनिधिमंडल इतिहास में कैबिनेट मिशन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।वेवेल योजना/शिमला सम्मेलन (जून-जुलाई 1945) → लेबर सरकार (जुलाई 1945) → 1945-46 के चुनाव → मिशन की घोषणा (19 फरवरी 1946) → मिशन का आगमन (24 मार्च 1946)।
कैबिनेट मिशन के सदस्य
➣ इस मिशन में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन सदस्य शामिल थे। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल थे और मिशन ने उनके सहयोग से कार्य किया।
| सदस्य | पद |
|---|---|
| लॉर्ड पैथिक-लॉरेंस | भारत सचिव (Secretary of State for India) एवं मिशन के अध्यक्ष |
| सर स्टैफर्ड क्रिप्स | बोर्ड ऑफ ट्रेड के अध्यक्ष (President of the Board of Trade) |
| ए. वी. एलेक्ज़ेंडर | प्रथम लॉर्ड ऑफ द एडमिरल्टी (First Lord of the Admiralty / नौसेना मंत्री) |
➣ 24 मार्च, 1946 ई. को यह मिशन भारत पहुँचा और इसने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख नेताओं, देशी रियासतों तथा अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से कई दौर की वार्ता की। महात्मा गांधी से भी मिशन ने कई बार परामर्श किया। मिशन 29 जून, 1946 ई. तक भारत में रहा।
➣ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद 16 मई, 1946 ई. को कैबिनेट मिशन ने भारत के भावी शासन और सत्ता हस्तांतरण से संबंधित अपनी योजना प्रस्तुत की। मिशन में स्टैफर्ड क्रिप्स की भूमिका सबसे प्रभावशाली मानी जाती है।
कैबिनेट मिशन का उद्देश्य
➣ भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजना:- कैबिनेट मिशन का प्रमुख उद्देश्य कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते राजनीतिक मतभेदों को दूर कर भारत की संवैधानिक समस्या का ऐसा समाधान खोजना था, जिसे सभी प्रमुख राजनीतिक दल स्वीकार कर सकें।
➣ सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तैयार करना:- ब्रिटिश सरकार भारत में अपने शासन का शांतिपूर्ण अंत चाहती थी। इसलिए मिशन को भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करने की उपयुक्त व्यवस्था और प्रक्रिया निर्धारित करने का दायित्व दिया गया।
➣ संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त करना:- मिशन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ऐसी संविधान सभा के गठन की व्यवस्था करना था, जो भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा भारत का संविधान तैयार कर सके।
➣ अंतरिम सरकार के गठन में सहायता करना:- जब तक नया संविधान तैयार न हो जाए, तब तक केंद्र में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के सहयोग से एक अंतरिम सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त करना भी मिशन का प्रमुख उद्देश्य था।
➣ भारत की एकता बनाए रखना:- ब्रिटिश सरकार तत्काल भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थी। इसलिए कैबिनेट मिशन ने ऐसा समाधान खोजने का प्रयास किया, जिससे भारत की एकता बनी रहे और साथ ही विभिन्न प्रांतों तथा समुदायों की चिंताओं का भी समाधान हो सके।
द्वितीय शिमला सम्मेलन (5-12 मई, 1946)
➣ मिशन ने सबसे पहले कांग्रेस और लीग को एक साझा समझौते पर लाने का प्रयास किया। इसके लिए 5 से 12 मई, 1946 ई. तक शिमला में त्रिपक्षीय सम्मेलन (मिशन, कांग्रेस और लीग) हुआ। इसे द्वितीय शिमला सम्मेलन कहा जाता है, ताकि इसे 1945 के वेवेल योजना वाले शिमला सम्मेलन से अलग पहचाना जा सके।
➣ प्रतिनिधि:- कांग्रेस की ओर से मौलाना आज़ाद, नेहरू, पटेल और खान अब्दुल गफ्फार खान तथा लीग की ओर से जिन्ना, लियाक़त अली खान, नवाब इस्माइल खान और अब्दुर रब निश्तर।
➣ चर्चा के मुख्य बिंदु:- बातचीत मुख्यतः संघ के विषयों, पाकिस्तान के स्वरूप और प्रतिनिधित्व की समता (parity) पर केंद्रित रही। 11 मई की बैठक के रिकॉर्ड के अनुसार दोनों पक्षों का रुख इस प्रकार था-
| मुद्दा | कांग्रेस | मुस्लिम लीग |
|---|---|---|
| संघ के विषय | मज़बूत केंद्र आवश्यक; तीन विषयों के अतिरिक्त मुद्रा, सीमा शुल्क और नियोजन जैसे विषय भी। नेहरू के अनुसार न्यूनतम स्वीकार्य: तीन विषय तथा प्रत्यक्ष कर द्वारा अपना राजस्व जुटाने का अधिकार। | तीन से अधिक विषय स्वीकार नहीं; संघ के वित्त की पद्धति संविधान सभा पर छोड़ी जाए (जिन्ना)। |
| पाकिस्तान और संघ | अखंड संघ। | यदि संप्रभु पाकिस्तान को समूह के रूप में मान्यता मिले, तो तीन विषयों के लिए संघ को अधिकार सौंपने को तैयार (जिन्ना)। |
| प्रतिनिधित्व | केंद्रीय विधायिका में समता (parity) अस्वीकार। | संघ के संविधान में समता की माँग। |
➣ परिणाम:- मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी और सम्मेलन 12 मई को समाप्त हो गया, इसलिए मिशन ने 16 मई को अपनी योजना स्वयं प्रस्तुत की।
➣ योजना में संघ के केवल तीन विषय रखे गए (जिन्ना की सीमा), परंतु उनके लिए आवश्यक वित्त जुटाने की शक्ति भी दी गई (नेहरू की न्यूनतम माँग)। समता की माँग के स्थान पर प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दों पर दोनों समुदायों के बहुमत की व्यवस्था रखी गई। इसे दोनों पक्षों के बीच का रास्ता माना जा सकता है।
कैबिनेट मिशन की मुख्य समस्याएँ
➣ मिशन के भारत पहुँचने पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की माँगें कई बुनियादी प्रश्नों पर एक-दूसरे से टकरा रही थीं। मिशन को पहले इन्हीं समस्याओं को सुलझाने का मार्ग खोजना था। (योजना की घोषणा के बाद आई कठिनाइयाँ और उसकी असफलता के कारण आगे दिए गए हैं।)
| समस्या | कांग्रेस का पक्ष | मुस्लिम लीग का पक्ष |
|---|---|---|
| एकीकृत भारत बनाम पाकिस्तान | अखंड भारत; छह पूर्ण प्रांतों वाले पाकिस्तान का विरोध। | उत्तर-पश्चिम (पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान) और उत्तर-पूर्व (बंगाल, असम) को मिलाकर संप्रभु पाकिस्तान; पहले पाकिस्तान का सिद्धांत माना जाए, सीमाओं का समायोजन बाद में। |
| केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का प्रश्न | विदेश मामले, प्रतिरक्षा और संचार केंद्र के अनिवार्य विषय; प्रांत चाहें तो कुछ अतिरिक्त वैकल्पिक विषय भी केंद्र को सौंप सकें। | दो समूहों (मुस्लिम बहुल उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व) की व्यवस्था, जिसमें केंद्र का स्थान गौण रहे। |
| अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व | प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में; केंद्रीय विधायिका में समता (parity) स्वीकार नहीं। | संघ और समूहों के संविधान-निर्माण में हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच समता (parity) की माँग। |
| संविधान निर्माण की प्रक्रिया | एक ही संविधान सभा, जो प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुनी जाए। | दो अलग संविधान निर्मात्री संस्थाएँ- एक पाकिस्तान के लिए और एक हिंदुस्तान के लिए। |
➣ समस्या केवल दो दलों तक सीमित नहीं थी। सिखों को डर था कि पंजाब के विभाजन से उनका समुदाय दो भागों में बँट जाएगा, अनुसूचित जातियाँ पृथक सुरक्षा चाहती थीं, और ईसाई, एंग्लो-इंडियन, पारसी तथा जनजातीय क्षेत्रों जैसे छोटे वर्गों को जनसंख्या के आधार पर लगभग कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता।
➣ साथ ही देशी रियासतों के सामने प्रश्न था कि ब्रिटिश सर्वोच्चता की समाप्ति के बाद उनकी स्थिति और संविधान-निर्माण में उनकी भूमिका क्या होगी।
➣ इन सभी माँगों को एक साथ संतुष्ट करना लगभग असंभव था। शिमला सम्मेलन (5-12 मई, 1946) में दोनों दलों के रुख़ का यह अंतर खुलकर सामने आया, और सहमति न बनने पर मिशन ने स्वयं 16 मई को अपनी योजना प्रस्तुत की। मिशन ने ऐसा हल खोजा जिसमें विभाजन भी न हो और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा-चिंताएँ भी दूर हों।
कैबिनेट मिशन योजना के प्रमुख प्रस्ताव
➣ 16 मई, 1946 ई. की इस योजना को राजकीय पत्र भी कहा जाता है। यह कुल 24 पैराग्राफ का वक्तव्य था, जिसका मूल पैरा 15 है (इसमें संविधान के आधारभूत स्वरूप के छह उप-बिंदु हैं)। कांग्रेस और लीग में शिमला में सहमति न बनने पर मिशन ने स्वयं ये प्रस्ताव रखे।
➣ वक्तव्य में एटली (15 मार्च 1946) के शब्दों का उल्लेख था कि भारत का भावी शासन भारत स्वयं तय करेगा। वह राष्ट्रमंडल में रहना चाहे तो अपनी स्वतंत्र इच्छा से, और यदि वह पूर्ण स्वतंत्रता चुने तो उसे इसका अधिकार है। मिशन का उद्देश्य संविधान का पूरा ब्यौरा देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना था जिससे संविधान भारतीयों द्वारा, भारतीयों के लिए तय हो सके।
➣ पूर्व-आकलन (पैरा 4-5):- मिशन ने माना कि मुस्लिम लीग के समर्थकों को छोड़कर भारत में एकता की लगभग सार्वभौमिक इच्छा थी, परंतु मुसलमानों में स्थायी हिंदू बहुमत के शासन का भय भी बहुत गहरा था, जिसे केवल कागज़ी सुरक्षा-उपायों से दूर नहीं किया जा सकता था।
संघीय व्यवस्था (त्रिस्तरीय ढाँचा)
➣ कैबिनेट मिशन योजना ने अखंड भारत पर आधारित एक संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा। भारत को विभाजित करने के बजाय एक ही संघ बनाए रखा जाना था, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांत और देशी रियासतें दोनों शामिल होतीं। ढाँचा तीन स्तरों का था- सबसे ऊपर संघ (केंद्र), बीच में प्रांतों के समूह और सबसे नीचे प्रांत।
➣ संघ की कार्यपालिका और विधायिका में ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतों दोनों के प्रतिनिधि होने थे। इसका उद्देश्य भारत की एकता बनाए रखते हुए प्रांतों और समुदायों की पहचान तथा अधिकारों की रक्षा करना था।
➣ संघीय विधायिका के लिए एक विशेष सुरक्षा-व्यवस्था रखी गई थी। यदि कोई प्रश्न प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दे से जुड़ा हो, तो उसके निर्णय के लिए दोनों प्रमुख समुदायों (हिंदू और मुस्लिम) के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का अलग-अलग बहुमत तथा साथ ही सभी सदस्यों का बहुमत आवश्यक था। इसे मुस्लिम हितों की रक्षा का एक प्रकार का सांप्रदायिक वीटो माना जाता है।
➣ इसके अलावा संघ के संविधान के लागू होने के 10 वर्ष बाद, तथा उसके बाद हर 10 वर्ष पर, कोई भी प्रांत अपनी विधान सभा के बहुमत के निर्णय से संविधान की शर्तों पर पुनर्विचार की माँग कर सकता था।
इस योजना में केंद्र बहुत कमज़ोर तथा प्रांत शक्तिशाली थे, इसलिए इसे कई विद्वान ढीला संघ कहते हैं।
| पैरा 15 का उप-बिंदु | प्रावधान |
|---|---|
| (1) | ब्रिटिश भारत और रियासतों को मिलाकर एक संघ, जिसके विषय विदेश मामले, प्रतिरक्षा और संचार तथा इनके लिए आवश्यक वित्त जुटाने की शक्ति। |
| (2) | संघ की कार्यपालिका और विधायिका में ब्रिटिश भारत तथा रियासतों दोनों के प्रतिनिधि; प्रमुख सांप्रदायिक प्रश्न पर दोनों प्रमुख समुदायों का अलग-अलग बहुमत तथा सभी सदस्यों का बहुमत आवश्यक। |
| (3) | संघ के विषयों के अतिरिक्त सभी विषय और अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास। |
| (4) | रियासतें संघ को सौंपे गए विषयों के अतिरिक्त सभी विषय और शक्तियाँ अपने पास रखेंगी। |
| (5) | प्रांत कार्यपालिका और विधायिका वाले समूह) बनाने के लिए स्वतंत्र; समूह तय करेगा कि कौन-से प्रांतीय विषय साझा होंगे। |
| (6) | संघ और समूहों के संविधान में प्रावधान कि कोई प्रांत विधान सभा के बहुमत से 10 वर्ष बाद और फिर हर 10 वर्ष पर संविधान की शर्तों पर पुनर्विचार माँग सकता है। |
केंद्र के विषय
➣ कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार प्रस्तावित संघीय केंद्र के अधिकार बहुत सीमित रखे गए थे। केंद्र को केवल तीन प्रमुख विषय सौंपे जाने का प्रस्ताव था, जबकि अन्य सभी विषयों पर अधिकार प्रांतों के पास रहने थे।
➣ केंद्र के अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित विषय शामिल किए गए थे-
| केंद्र के विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रतिरक्षा (Defence) | देश की सुरक्षा, सेना तथा युद्ध संबंधी सभी विषय। |
| विदेश मामले (Foreign Affairs) | अन्य देशों के साथ संबंध, संधियाँ तथा विदेश नीति। |
| संचार (Communications) | परिवहन तथा डाक-तार जैसी संचार व्यवस्था। |
➣ इन विषयों के संचालन के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाने का अधिकार भी केंद्र को दिया जाना था। अर्थात केंद्र केवल अपने कार्यों के लिए आवश्यक कर एवं राजस्व ही एकत्र कर सकता था।
➣ देशी रियासतों के संबंध में यह व्यवस्था थी कि वे केवल उन्हीं विषयों में संघ का हिस्सा होंगी जो वे स्वेच्छा से संघ को सौंपें। शेष सभी विषय और शक्तियाँ रियासतों के पास ही रहनी थीं।
भारत शासन अधिनियम 1935 में प्रस्तावित संघ का केंद्र कहीं अधिक शक्तिशाली था। कैबिनेट मिशन का केंद्र उससे भी कमज़ोर था, इसीलिए कांग्रेस के अनेक नेताओं को भारत के बाल्कनीकरण (टुकड़ों में बँटने) की आशंका थी।
प्रांतीय स्वायत्तता
➣ कैबिनेट मिशन योजना में प्रांतों को व्यापक स्वायत्तता देने का प्रस्ताव रखा गया। केंद्र सूची के अतिरिक्त सभी विषयों पर संबंधित प्रांतीय सरकारें स्वयं निर्णय लेतीं, जिससे प्रत्येक प्रांत अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार प्रशासन चला सकता था।
➣ आंतरिक प्रशासन, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कानून-व्यवस्था तथा अन्य प्रांतीय विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार प्रांतों के पास होना था। इससे प्रांतीय सरकारों की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती।
➣ इस योजना की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र के बजाय प्रांतों को दी गई थीं। अर्थात जो विषय स्पष्ट रूप से केंद्र को नहीं दिए गए थे, वे सभी स्वतः प्रांतों के अधिकार क्षेत्र में आते।
➣ ब्रिटिश सरकार का मानना था कि अधिक स्वायत्तता मिलने से विभिन्न प्रांत अपनी आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार प्रशासन चला सकेंगे। साथ ही, इससे मुस्लिम लीग की उस चिंता को भी कम किया जा सकेगा कि एक शक्तिशाली केंद्र में मुस्लिम बहुल प्रांतों के हितों की उपेक्षा हो सकती है।
कैबिनेट मिशन योजना में अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास थीं, जबकि भारतीय संविधान में वे केंद्र के पास हैं (अनुच्छेद 248)।
प्रांतों का समूह
➣ कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार ब्रिटिश भारतीय प्रांतों को प्रशासनिक सुविधा तथा विभिन्न समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए तीन समूहों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा गया।
➣ प्रत्येक समूह अपने प्रांतों के लिए कुछ सामान्य विषयों पर संयुक्त रूप से कार्य कर सकता था। संविधान सभा के भीतर इन्हें सेक्शन (Section A, B, C) कहा गया, जबकि बाद में बनने वाली समूह-व्यवस्था को ग्रुप कहा गया।
➣ मिशन का उद्देश्य एक ओर भारत की एकता बनाए रखना था, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम बहुल प्रांतों को आपसी सहयोग का अवसर देना भी था। इसी कारण प्रांतों का यह समूह बनाया गया।
➣ कांग्रेस की वैकल्पिक विषयों वाली योजना अस्वीकार:- कांग्रेस ने सुझाव दिया था कि प्रांतों को न्यूनतम अनिवार्य केंद्रीय विषयों (विदेश, रक्षा, संचार) के साथ पूर्ण स्वायत्तता मिले और प्रांत चाहें तो कुछ अतिरिक्त वैकल्पिक विषय भी केंद्र को सौंप सकें।
➣ मिशन ने इसे अव्यावहारिक माना, क्योंकि तब केंद्र में कुछ मंत्री पूरे भारत के प्रति और कुछ केवल चुने हुए प्रांतों के प्रति उत्तरदायी होते, तथा केंद्रीय विधायिका में कुछ सदस्यों को कुछ विषयों पर बोलने-मतदान से रोकना पड़ता। मिशन के अनुसार जो प्रांत वैकल्पिक विषय नहीं देना चाहते, उन्हें भी समूह बनाने का अधिकार देना उचित था। इसी तर्क से समूह-व्यवस्था का प्रस्ताव निकला।
| समूह | शामिल प्रांत | विशेषता |
|---|---|---|
| समूह A | मद्रास, बॉम्बे, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार तथा उड़ीसा | मुख्यतः हिंदू बहुल प्रांत |
| समूह B | पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत तथा बलूचिस्तान | मुख्यतः उत्तर-पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांत |
| समूह C | बंगाल तथा असम | पूर्वी भारत के प्रांत (बंगाल मुस्लिम बहुल, असम हिंदू बहुल) |
➣ प्रत्येक समूह को यह अधिकार दिया गया था कि वह अपने प्रांतों की आवश्यकताओं के अनुसार साझा विषयों पर अलग कार्यपालिका तथा विधानमंडल का गठन कर सके।
➣ यद्यपि प्रारंभ में प्रत्येक प्रांत को अपने निर्धारित समूह का हिस्सा बनना था, लेकिन नया संविधान लागू होने और प्रथम आम चुनावों के बाद संबंधित प्रांत की नई विधायिका को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो अपने समूह से बाहर निकल सके।
➣ कांग्रेस का मत था कि किसी भी प्रांत को किसी समूह में शामिल होना या न होना उसकी स्वैच्छिक इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। विशेष रूप से असम (गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में) और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (जहाँ कांग्रेस की सरकार थी) को मुस्लिम बहुल समूहों में बाँधे जाने पर आपत्ति थी। गांधीजी ने भी असम को समूह C में न जाने की सलाह दी।
➣ दूसरी ओर, मुस्लिम लीग चाहती थी कि समूह व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू की जाए, क्योंकि इससे मुस्लिम बहुल प्रांतों की राजनीतिक एकता मजबूत होती थी। यही प्रश्न आगे चलकर दोनों दलों के बीच विवाद का एक प्रमुख कारण बना।
UPSC दृष्टिकोण: समूह B और C में मुस्लिम सदस्यों का बहुमत था (B में 35 में से 22 तथा C में 70 में से 36 मुस्लिम सदस्य)। इसलिए लीग को लगता था कि समूह-व्यवस्था से वास्तव में उसे लगभग अपना पाकिस्तान मिल जाएगा। उधर बंगाल की संख्या असम से बहुत अधिक होने के कारण समूह C में असम के हितों के दब जाने का खतरा था।
संविधान सभा का गठन
➣ कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारत के लिए एक संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव रखा गया, जिसका कार्य भारत का नया संविधान तैयार करना था। यह संविधान सभा भारत के विभिन्न प्रांतों तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों से मिलकर बननी थी।
➣ मिशन ने संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों, मुख्य आयुक्त शासित क्षेत्रों तथा देशी रियासतों को प्रतिनिधित्व दिया गया। प्रतिनिधित्व का आधार लगभग प्रत्येक 10 लाख की जनसंख्या पर 1 सदस्य था।
| श्रेणी | सदस्य संख्या |
|---|---|
| ब्रिटिश भारतीय प्रांत | 292 |
| मुख्य आयुक्त शासित क्षेत्र (दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान) | 4 |
| देशी रियासतें | 93 (अधिकतम) |
| कुल | 389 |
➣ ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के प्रतिनिधियों का चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा नहीं, बल्कि संबंधित प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से किया जाना था। यानी संविधान सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित नहीं थी।
➣ अप्रत्यक्ष चुनाव क्यों?:- मिशन ने स्वीकार किया कि वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनाव सबसे उपयुक्त होता, परंतु उससे संविधान-निर्माण में अस्वीकार्य देरी होती। इसलिए हाल ही में चुनी गई प्रांतीय विधानसभाओं को निर्वाचक मंडल बनाया गया।
➣ इनमें दो कठिनाइयाँ थीं- (1) विधानसभाओं का आकार जनसंख्या के अनुपात में नहीं था (असम की जनसंख्या 1 करोड़ पर 108 सदस्य, जबकि बंगाल की 6 गुना जनसंख्या पर केवल 250 सदस्य), और (2) सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) के भारांक के कारण विधानसभाओं में समुदायों की सीटें उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं थीं (बंगाल में मुसलमान जनसंख्या का 55% थे, पर सीटें केवल 48%)।
➣ इन्हीं को सुधारने के लिए तीन सूत्र अपनाए गए- (क) प्रत्येक प्रांत को जनसंख्या के अनुपात में सीटें (लगभग 10 लाख पर 1), (ख) इन सीटों को समुदायों में उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँटना, और (ग) प्रत्येक समुदाय के प्रतिनिधि उसी समुदाय के विधानसभा-सदस्यों द्वारा चुने जाएँ।
➣ संविधान सभा के लिए केवल तीन प्रमुख समुदाय माने गए- सामान्य, मुस्लिम तथा सिख। ‘सामान्य’ में वे सभी शामिल थे जो न मुस्लिम थे और न सिख (जैसे अनुसूचित जातियाँ, ईसाई आदि)।
➣ छोटे अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व के नुकसान की भरपाई के लिए मिशन ने सलाहकार समिति की व्यवस्था की। ब्रिटिश भारत की 292 सीटों में सामान्य 210, मुस्लिम 78 तथा सिख 4 सीटें थीं।
| समूह / सेक्शन | कुल सीटें | सामान्य | मुस्लिम | सिख |
|---|---|---|---|---|
| A (मद्रास 49, बॉम्बे 21, संयुक्त प्रांत 55, बिहार 36, मध्य प्रांत 17, उड़ीसा 9) | 187 | 167 | 20 | – |
| B (पंजाब 28, सिंध 4, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत 3) | 35 | 9 | 22 | 4 |
| C (बंगाल 60, असम 10) | 70 | 34 | 36 | – |
| कुल | 292 | 210 | 78 | 4 |
➣ मुख्य आयुक्त प्रांतों के 4 प्रतिनिधि:- दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा तथा कुर्ग के प्रतिनिधि सेक्शन A में और ब्रिटिश बलूचिस्तान का प्रतिनिधि सेक्शन B में जोड़े जाने थे। इस प्रकार सेक्शन A में कुल 190, सेक्शन B में 36 और सेक्शन C में 70 सदस्य होते, यानी ब्रिटिश भारत की कुल 296 सीटें।
➣ संविधान निर्माण की प्रक्रिया (पैरा 19):- (1) चुने गए प्रतिनिधि जल्द से जल्द नई दिल्ली में मिलेंगे। (2) प्रारंभिक बैठक में कार्यसूची तय होगी, अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारी चुने जाएँगे और नागरिकों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के अधिकारों पर एक सलाहकार समिति बनेगी।
➣ इसके बाद प्रांतों के प्रतिनिधि सेक्शन A, B, C में बँटेंगे। (3) ये सेक्शन अपने प्रांतों के प्रांतीय संविधान तय करेंगे तथा यह भी निर्णय करेंगे कि कोई समूह संविधान बने या नहीं और बने तो उसमें कौन-से प्रांतीय विषय हों।
➣ (4) इसके बाद सेक्शनों के प्रतिनिधि तथा रियासतों के प्रतिनिधि पुनः एकत्र होकर संघ का संविधान बनाएँगे। (5) नई व्यवस्था लागू होने के बाद कोई प्रांत, प्रथम आम चुनाव के बाद अपनी विधायिका के निर्णय से, समूह से बाहर निकल सकेगा।
➣ संघ की संविधान सभा में सांप्रदायिक वीटो (पैरा 19-vii):- संघ का संविधान बनाते समय पैरा 15 के प्रावधानों में परिवर्तन करने वाले या किसी प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दे को उठाने वाले प्रस्ताव के लिए दोनों प्रमुख समुदायों के उपस्थित एवं मतदान करने वाले प्रतिनिधियों का अलग-अलग बहुमत आवश्यक था।
➣ कौन-सा प्रस्ताव प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दा है, यह अध्यक्ष तय करेगा, और किसी भी प्रमुख समुदाय के प्रतिनिधियों के बहुमत के अनुरोध पर वह निर्णय से पहले संघीय न्यायालय (Federal Court) से परामर्श करेगा।
➣ सलाहकार समिति (पैरा 20):- नागरिकों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के अधिकारों पर बनने वाली सलाहकार समिति में प्रभावित हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना था। इसका कार्य संघीय संविधान सभा को मौलिक अधिकारों की सूची, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा संबंधी खंडों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के प्रशासन की योजना पर रिपोर्ट देना और यह सलाह देना था कि इन अधिकारों को प्रांतीय, समूह या संघ में से किस संविधान में रखा जाए। आगे चलकर इसी आधार पर सरदार पटेल की अध्यक्षता में समिति बनी।
➣ सत्ता हस्तांतरण से उत्पन्न विषयों (जैसे ब्रिटिश सैनिक, सेवाएँ आदि) को सुलझाने के लिए संविधान सभा और ब्रिटिश सरकार के बीच एक संधि करने की व्यवस्था भी थी।
➣ वायसराय को तत्काल प्रांतीय विधानमंडलों से अपने प्रतिनिधि चुनने का और रियासतों से अपनी वार्ता समिति बनाने का अनुरोध करना था (पैरा 21)।
संविधान सभा के निर्वाचन की प्रक्रिया (जुलाई-अगस्त 1946)
➣ ब्रिटिश भारत की 296 सीटों (प्रांतों की 292 + मुख्य आयुक्त शासित क्षेत्रों की 4) के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में हुए। चुनाव की पद्धति (अप्रत्यक्ष, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत) ऊपर ‘संविधान सभा का गठन’ में बताई गई है।
| दल | प्राप्त सीटें (296 में से) |
|---|---|
| कांग्रेस | 208 |
| मुस्लिम लीग | 73 (मुस्लिम वर्ग की लगभग सभी सीटें) |
| अन्य | 15 |
➣ कांग्रेस की स्थिति:- कांग्रेस ने संविधान सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। उसने 16 मई की दीर्घकालीन योजना के आधार पर संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया, किंतु समूहकरण पर अपनी अलग व्याख्या बनाए रखी।
➣ मुस्लिम लीग की स्थिति:- लीग ने मुस्लिम वर्ग की लगभग सभी सीटें जीतीं, जिससे वह मुसलमानों की प्रमुख प्रतिनिधि सिद्ध हुई। किंतु 29 जुलाई, 1946 को योजना की स्वीकृति वापस लेने के बाद उसने संविधान सभा का बहिष्कार किया और 9 दिसम्बर, 1946 की पहली बैठक में उसके सदस्य शामिल नहीं हुए।
देशी रियासतों की स्थिति
➣ कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार देशी रियासतों को प्रस्तावित भारतीय संघ का हिस्सा बनने का अवसर दिया गया। उन्हें भी संविधान सभा में प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया, ताकि वे संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भाग ले सकें।
➣ योजना के अनुसार रियासतों को अंतिम संविधान सभा में अधिकतम 93 सीटें मिलनी थीं (ब्रिटिश भारत की जनसंख्या-गणना के आधार पर)।
➣ प्रतिनिधियों के चयन की पद्धति परामर्श से तय की जानी थी। यह स्पष्ट नहीं था कि वे जनता द्वारा चुने जाएँगे या शासकों द्वारा मनोनीत होंगे। प्रारंभिक चरण में रियासतों का प्रतिनिधित्व उनकी वार्ता समिति को करना था।
➣ सर्वोच्चता (पैरा 14):- ब्रिटिश भारत के स्वतंत्र होने पर शासकों और ब्रिटिश क्राउन के बीच का पुराना संबंध संभव नहीं रहेगा।
सर्वोच्चता (Paramountcy) न तो ब्रिटिश क्राउन अपने पास रख सकता है और न नई सरकार को हस्तांतरित कर सकता है। रियासतों ने नए भारत के विकास में सहयोग की इच्छा जताई, परंतु सहयोग का स्वरूप वार्ता से तय होगा और सभी रियासतों के लिए एक जैसा नहीं होगा।➣ 12 मई, 1946 का ज्ञापन:- मिशन ने 12 मई 1946 को नरेंद्र मंडल के चांसलर को रियासतों की संधियाँ और सर्वोच्चता पर एक ज्ञापन सौंपा (22 मई को प्रकाशित)। इसके अनुसार रियासतों ने सर्वोच्च सत्ता को जो अधिकार सौंपे थे, वे उन्हें वापस लौट जाएँगे, तथा रियासतों और ब्रिटिश क्राउन/ब्रिटिश भारत के बीच की राजनीतिक व्यवस्थाएँ समाप्त होंगी। इस रिक्तता को रियासतें या तो उत्तराधिकारी सरकार या सरकारों के साथ संघीय संबंध बनाकर, या विशेष राजनीतिक समझौतों द्वारा भरेंगी।
➣ इसके बाद प्रत्येक देशी रियासत को यह निर्णय लेना था कि वह भारत की भावी संघीय व्यवस्था के साथ किस प्रकार अपने संबंध स्थापित करेगी। इसी कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के समय अधिकांश रियासतों के भारत या पाकिस्तान में विलय का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया।
कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार रियासतों को संविधान सभा में अधिकतम 93 सीटें मिलनी थीं। चयन की पद्धति परामर्श से तय होनी थी (जनता द्वारा चुनाव या शासकों द्वारा मनोनयन का प्रश्न खुला था)।
अंतरिम सरकार
➣ कैबिनेट मिशन योजना में यह प्रस्ताव रखा गया कि जब तक संविधान सभा नया संविधान तैयार न कर दे, तब तक केंद्र में एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाए ताकि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सुचारु रूप से आगे बढे साथ ही भारतीय नेताओं को शासन संचालन का अनुभव प्रदान हो।
➣ प्रस्तावित अंतरिम सरकार में भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों तथा विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव दिया गया, ताकि यह सरकार अधिकतम प्रतिनिधित्व वाली और उत्तरदायी हो सके। योजना में कहा गया कि सरकार के सभी विभाग (युद्ध विभाग सहित) भारतीय नेताओं के पास होंगे। वायसराय कार्यकारी परिषद का अध्यक्ष बना रहेगा।
➣ अंतरिम सरकार के गठन, सदस्यों और कार्यप्रणाली की विस्तृत चर्चा अंतरिम सरकार (1946) अध्याय में की गई है। इस अध्याय के लिए इतना ही ध्यान रखें कि योजना में अंतरिम सरकार का प्रावधान था, परंतु मिशन के भारत में रहते यह सरकार नहीं बन सकी।
पाकिस्तान की माँग पर कैबिनेट मिशन का दृष्टिकोण
➣ मुस्लिम लीग की प्रमुख माँग भारत को विभाजित कर एक पृथक पाकिस्तान की स्थापना करना था (लाहौर प्रस्ताव, 1940)। कैबिनेट मिशन ने इस माँग पर गंभीरता से विचार किया, लेकिन अंततः भारत के विभाजन का समर्थन नहीं किया।
➣ मिशन का मत था कि भारत का विभाजन राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक तथा सैन्य दृष्टि से व्यावहारिक नहीं होगा। विभाजन के बाद प्रतिरक्षा, संचार, परिवहन, डाक-तार तथा अन्य साझा सेवाओं के संचालन में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होंगी। भारतीय सेना के विभाजन का प्रश्न भी अत्यंत जटिल था।
➣ जनसंख्या के आँकड़ों का हवाला देते हुए मिशन ने बताया कि लीग जिस पाकिस्तान की माँग कर रही है, उसमें उत्तर-पश्चिम (पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान) में लगभग 62% मुसलमान और 38% गैर-मुस्लिम होंगे, जबकि उत्तर-पूर्व (बंगाल, असम) में लगभग 52% मुसलमान और 48% गैर-मुस्लिम होंगे। इतनी बड़ी गैर-मुस्लिम आबादी को नए राज्य में रखना उचित नहीं होता।
➣ मिशन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि केवल मुस्लिम बहुल जिलों को लेकर छोटा पाकिस्तान बनाया जाए, तो पंजाब और बंगाल जैसे मिश्रित आबादी वाले प्रांतों का विभाजन करना पड़ेगा।
➣ इन प्रांतों की सिख तथा बंगाली समुदाय की अपनी ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक एकता थी, जिसे तोड़ने से नई सांप्रदायिक और प्रशासनिक समस्याएँ पैदा होतीं।
➣ छोटे पाकिस्तान की व्यावहारिक कठिनाइयाँ:- मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक सीमित पाकिस्तान में पंजाब के अंबाला और जालंधर संभाग, सिलहट को छोड़कर पूरा असम तथा पश्चिम बंगाल का बड़ा भाग (कलकत्ता सहित, जहाँ मुसलमान 23.6% थे) बाहर रह जाते। लीग स्वयं इसे अव्यावहारिक मानती थी।
➣ इसके अलावा शेष ब्रिटिश भारत में लगभग 2 करोड़ मुसलमान (कुल 18.8 करोड़ की आबादी में) बिखरे हुए थे, इसलिए पाकिस्तान बनने से भी सांप्रदायिक अल्पसंख्यक समस्या हल नहीं होती।
➣ अन्य तर्क:- प्रस्तावित पाकिस्तान के दोनों हिस्से लगभग 700 मील दूर थे और उनके बीच संचार हिंदुस्तान की सद्भावना पर निर्भर रहता। उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व की सीमाएँ भारत की सबसे संवेदनशील सीमाएँ थीं, जिनकी रक्षा के लिए पाकिस्तान का क्षेत्र पर्याप्त नहीं होता। रियासतों को भी विभाजित ब्रिटिश भारत से जुड़ना कठिन होता। इन्हीं कारणों से मिशन ने कहा कि वह ब्रिटिश सरकार को सत्ता दो पूर्णतः अलग संप्रभु राज्यों को सौंपने की सलाह नहीं दे सकता।
➣ इन कारणों से कैबिनेट मिशन ने पृथक पाकिस्तान के बजाय अखंड भारत को अधिक उपयुक्त विकल्प माना। इसलिए मुस्लिम लीग की प्रमुख चिंताओं को दूर करने के लिए उसने ऐसी संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रांतों को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान की गई थी और समूह व्यवस्था के माध्यम से मुस्लिम बहुल प्रांतों को आपसी सहयोग का अवसर दिया गया।
➣ इस प्रकार कैबिनेट मिशन ने भारत की एकता बनाए रखते हुए कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के लिए स्वीकार्य संवैधानिक समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया, यद्यपि बाद में दोनों दल इस योजना की अलग-अलग व्याख्या करने लगे।
भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ कैबिनेट मिशन योजना पर विभिन्न दलों और वर्गों की प्रतिक्रिया एक समान नहीं थी। सामान्यतः सभी ने किसी न किसी रूप में योजना के कुछ हिस्सों से असंतोष व्यक्त किया। सबसे निर्णायक प्रतिक्रियाएँ कांग्रेस और मुस्लिम लीग की थीं, क्योंकि योजना की सफलता इन्हीं की सहमति पर टिकी थी।
| पक्ष | प्रारंभिक रुख | मुख्य आपत्ति / चिंता |
|---|---|---|
| कांग्रेस | दीर्घकालीन योजना (संविधान सभा) स्वीकार | अनिवार्य समूह-व्यवस्था, संविधान सभा की संप्रभुता |
| मुस्लिम लीग | 6 जून को स्वीकार; 29 जुलाई को अस्वीकार | पाकिस्तान न मिलना, समूह-व्यवस्था की सुरक्षा, नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य से आशंका |
| अकाली दल (सिख | असंतुष्ट | केवल 4 सीटें; समूह B में मुस्लिम बहुमत के नीचे दब जाने का भय |
| अनुसूचित जातियाँ | असंतुष्ट | पृथक निर्वाचन एवं संवैधानिक सुरक्षा का अभाव |
| हिंदू महासभा | विरोध | योजना को मुस्लिम लीग के तुष्टिकरण का प्रयास माना; 16 जून 1946 को विरोध घोषित किया |
| देशी रियासतें | सामान्यतः स्वागत | सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त होने के बाद भविष्य की अनिश्चितता; शासकों द्वारा मनोनयन पर लोक परिषद् की आपत्ति |
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना का पूर्णतः विरोध नहीं किया। उसने अखंड भारत, संविधान सभा के गठन तथा अंतरिम सरकार की स्थापना जैसे प्रस्तावों का स्वागत किया, क्योंकि ये भारत में सत्ता हस्तांतरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थे।
➣ कांग्रेस की आपत्ति के दो प्रमुख बिंदु:- कांग्रेस की आपत्तियाँ एक ही विषय पर नहीं थीं। इन्हें अलग-अलग समझना आवश्यक है-
▪ (1) समूह व्यवस्था (Grouping): कांग्रेस चाहती थी कि प्रांत स्वेच्छा से तय करें कि वे किसी समूह में शामिल होंगे या नहीं (विस्तार ‘प्रांतों का समूह’ खंड में)।
▪ (2) संविधान सभा की संप्रभुता: कांग्रेस का विश्वास था कि संविधान सभा भारत का संविधान स्वतंत्र रूप से तैयार करेगी और किसी बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होगी। वह मिशन योजना को अंतिम और अपरिवर्तनीय समझौता मानने को तैयार नहीं थी।
25 जून, 1946 ई. को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि कांग्रेस 16 मई की दीर्घकालीन योजना के आधार पर संविधान सभा में भाग लेगी।➣ मौलाना आज़ाद आज़ाद उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे (1940 से 1946 तक) और मिशन के साथ वार्ताओं में कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधि थे। उन्होंने कांग्रेस को योजना की दीर्घकालीन व्यवस्था स्वीकार करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इस निर्णय को 6-7 जुलाई, 1946 ई. को बंबई में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के अधिवेशन में अनुमोदित किया गया। इसी अधिवेशन के बाद जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला।
➣ महात्मा गांधी ने (हरिजन, 1946 में) चार दिन की गहन जाँच के बाद इस योजना को उन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार द्वारा तैयार किया जा सकने वाला सर्वश्रेष्ठ दस्तावेज़ बताया और कांग्रेस को इसे स्वीकार करने की सलाह दी।
➣ कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद नेहरू ने 10 जुलाई, 1946 ई. को बंबई के प्रेस सम्मेलन में कांग्रेस का दृष्टिकोण स्पष्ट किया कि संविधान सभा संप्रभु होगी और संशोधन के लिए स्वतंत्र रहेगी (इस वक्तव्य का विवरण और लीग पर इसका प्रभाव ‘योजना का संकट’ खंड में है)। मौलाना आज़ाद ने अपनी पुस्तक India Wins Freedom में इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
➣ हालाँकि समूह-व्यवस्था पर उनकी आपत्ति बनी रही। उनका मत था कि प्रांतों को समूह में बाध्य नहीं किया जा सकता (असम को उनकी सलाह का उल्लेख ‘प्रांतों का समूह’ खंड में है)। इस प्रकार गांधीजी योजना के समर्थक भी थे और समूह-व्यवस्था के आलोचक भी।
➣ कांग्रेस ने योजना को अपनी व्याख्या के अनुसार स्वीकार किया, जो मुस्लिम लीग की व्याख्या से भिन्न थी। इसी भिन्नता ने आगे चलकर योजना की असफलता का मार्ग प्रशस्त किया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ मुस्लिम लीग ने प्रारंभ में कैबिनेट मिशन योजना का स्वागत किया। लीग का मानना था कि प्रांतों की समूह व्यवस्था के माध्यम से मुस्लिम बहुल प्रांत एक साथ संगठित रह सकेंगे और भविष्य में उनके राजनीतिक हितों की प्रभावी रक्षा हो सकेगी।
➣ 6 जून, 1946 ई. को मुस्लिम लीग परिषद् की बैठक में, मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया गया। लीग ने इसे इस आधार पर स्वीकार किया कि समूह व्यवस्था भविष्य में पाकिस्तान की स्थापना की दिशा में एक मजबूत आधार सिद्ध हो सकती है।
➣ लीग कार्यसमिति ने 16 मई के वक्तव्य को औपचारिक रूप से बिना किसी आरक्षण के स्वीकार किया, जबकि कांग्रेस कार्यसमिति ने केवल उसका दीर्घकालीन भाग स्वीकार किया। किंतु यह स्वीकृति पूर्ण संतोष का परिणाम नहीं थी। लीग को निराशा थी कि मिशन ने संप्रभु पाकिस्तान की माँग स्वीकार नहीं की।
➣ 10 जून, 1946 ई. को जिन्ना ने कराची के एक नेता को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि योजना की स्वीकृति केवल पहला कदम है। अर्थात लीग ने योजना को पाकिस्तान का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी ओर बढ़ने का साधन माना।
➣ मुस्लिम लीग का विश्वास था कि समूह B (पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत एवं बलूचिस्तान) तथा समूह C (बंगाल एवं असम) के माध्यम से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का एक शक्तिशाली राजनीतिक संगठन विकसित होगा, जिससे आगे चलकर पृथक राष्ट्र की माँग को बल मिलेगा।
➣ नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य को लीग ने समूह-व्यवस्था के लिए खतरा माना। 29 जुलाई, 1946 ई. को मुस्लिम लीग परिषद् ने योजना की स्वीकृति वापस ले ली तथा संविधान सभा से अलग रहने का निर्णय लिया (विवरण ‘योजना का संकट’ खंड में)।
➣ इस प्रकार मुस्लिम लीग ने पहले कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार किया, लेकिन बाद में समूह व्यवस्था को लेकर उत्पन्न मतभेदों और नेहरू के वक्तव्य से उपजी आशंका के कारण उसे अस्वीकार कर दिया और पुनः पाकिस्तान की माँग को अपना प्रमुख लक्ष्य बना लिया।
अनुसूचित जातियों एवं अन्य दलों की प्रतिक्रिया
➣ डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व वाले अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ (Scheduled Castes Federation) ने 5 अप्रैल, 1946 ई. को कैबिनेट मिशन को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें पृथक निर्वाचन तथा अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा की माँग की गई थी। परंतु मिशन ने इन माँगों को विशेष महत्व नहीं दिया।
➣ योजना में अनुसूचित जातियों के लिए अलग से सीटें निर्धारित नहीं थीं और उन्हें सामान्य वर्ग के अंतर्गत ही गिना गया। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए केवल एक सलाहकार समिति का प्रावधान था, जिसे अंबेडकर पर्याप्त नहीं मानते थे। 17 मई, 1946 ई. को अंबेडकर ने चर्चिल को भेजे तार में योजना को छह करोड़ अछूतों के हितों के साथ विश्वासघात बताया।
➣ यद्यपि बाद में अंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के लिए चुने गए और आगे चलकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने। (उल्लेखनीय है कि 1945-46 के चुनावों में अनुसूचित जाति संघ का प्रदर्शन खराब रहा, जिससे अंबेडकर की सौदेबाज़ी की शक्ति कमज़ोर हुई।)
➣ सिख नेताओं (अकाली दल, मास्टर तारा सिंह) ने योजना पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। संविधान सभा में सिखों को केवल 4 सीटें मिलीं और पंजाब के समूह B में रहने पर उन्हें मुस्लिम बहुमत के नीचे दब जाने का भय था। बाद में कांग्रेस के आश्वासनों के बाद सिख प्रतिनिधि संविधान सभा में शामिल हुए (बलदेव सिंह)।
➣ अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने 16 जून, 1946 ई. को कैबिनेट मिशन योजना का विरोध घोषित किया। महासभा का मत था कि योजना का मूल विचार मुस्लिम लीग को संतुष्ट (तुष्ट) करना है।
➣ महासभा को भी सिखों की तरह यह आशंका थी कि योजना सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व को मज़बूत करती है और बहुसंख्यक वर्ग के हितों की उपेक्षा करती है।
कैबिनेट मिशन एवं ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया (मध्यस्थता के प्रयास)
➣ ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन योजना को भारत की संवैधानिक समस्या का अंतिम शांतिपूर्ण समाधान माना। मिशन ने योजना को एक संपूर्ण पैकेज के रूप में प्रस्तुत किया था, जिसके विभिन्न हिस्से आपस में जुड़े हुए थे।
➣ 25 मई, 1946 ई. का स्पष्टीकरण:- 16 मई की योजना घोषित होने के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने समूह-व्यवस्था तथा संविधान सभा की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी शंकाएँ व्यक्त कीं। इन्हीं शंकाओं के उत्तर में मिशन और वायसराय ने 25 मई, 1946 ई. को एक स्पष्टीकरण जारी किया।
➣ इसमें मिशन ने समूह-व्यवस्था को योजना का मूल अंग बताया और स्पष्ट किया कि प्रांतों को प्रारंभ में अपने-अपने सेक्शन में बैठना होगा। प्रांतों को समूह से बाहर निकलने का अधिकार केवल नए संविधान के लागू होने और प्रथम आम चुनावों के बाद मिलना था। यह व्याख्या मुस्लिम लीग के पक्ष में जाती थी और कांग्रेस की इस मान्यता के विपरीत थी कि प्रांत शुरू से ही स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं।
➣ मिशन की वापसी:- मिशन 29 जून, 1946 ई. को भारत से रवाना हो गया। उसने यह माना कि दीर्घकालीन योजना (संविधान सभा) पर आगे बढ़ा जा सकता है। इसके बाद के घटनाक्रम का वर्णन आगे ‘योजना का संकट’ खंड में है।
➣ जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने समूह व्यवस्था तथा संविधान सभा की शक्तियों की अलग-अलग व्याख्या करनी शुरू की, तब ब्रिटिश सरकार ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का प्रयास किया।
➣ नेहरू, जिन्ना, लियाक़त अली खान और बलदेव सिंह को दिसम्बर 1946 में लंदन बुलाया गया (वार्ता 6 दिसम्बर तक चली), किंतु वह असफल रही। इस वार्ता तक कांग्रेस यह मान चुकी थी कि प्रांतों को अपने-अपने सेक्शन में शामिल होना होगा, परंतु सेक्शनों में मतदान की प्रक्रिया पर गहरा मतभेद बना रहा, और अंत में यह तय हुआ कि व्याख्या के प्रश्न पर संघीय न्यायालय का निर्णय माना जाएगा।
➣ 6 दिसम्बर, 1946 ई. को ब्रिटिश सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किया कि समूह-व्यवस्था पर निर्णय सरल बहुमत से होगा, और यदि संविधान सभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के बिना संविधान बना, तो उसे देश के अनिच्छुक भागों पर थोपा नहीं जाएगा। यह व्याख्या लीग के पक्ष में और विभाजन की ओर संकेत करने वाली मानी गई।
➣ 6 जनवरी, 1947 ई. को AICC ने 6 दिसम्बर के वक्तव्य को स्वीकार तो किया, परंतु इस शर्त के साथ कि किसी प्रांत पर समूह-व्यवस्था थोपी नहीं जाएगी और सिखों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। लीग ने इसे बिना शर्त स्वीकृति नहीं माना और 31 जनवरी, 1947 ई. को उसकी कार्यसमिति ने संविधान सभा को भंग करने की माँग की। इसके बाद 20 फरवरी 1947 की घोषणा हुई।
देशी रियासतों की प्रतिक्रिया
➣ देशी रियासतों ने सामान्यतः कैबिनेट मिशन योजना का स्वागत किया, क्योंकि प्रस्तावित संविधान सभा में उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना था। इससे उन्हें पहली बार भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे के निर्माण में भाग लेने का अवसर मिला।
➣ रियासतों की चिंता:- सर्वोच्चता की समाप्ति की घोषणा से रियासतें एक ओर निश्चिंत हुईं कि उन पर कोई सीधा नियंत्रण नहीं थोपा जाएगा, किंतु दूसरी ओर उनके सामने अपने भविष्य और सुरक्षा की अनिश्चितता भी खड़ी हो गई। कुछ बड़ी रियासतों ने सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद स्वतंत्र बने रहने की संभावना पर भी विचार किया।
➣ भोपाल के नवाब का मत था कि रियासतों को स्वयं तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे किसके साथ संबंध रखें, और त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर ने आगे चलकर 1947 में स्वतंत्र रहने की घोषणा की।
➣ हैदराबाद के निज़ाम 12 मई 1946 के ज्ञापन के बाद से ही स्वतंत्र रहने के विचार पर सोच रहे थे (11 जून 1947 को उन्होंने घोषणा की कि वे किसी भी डोमिनियन में शामिल नहीं होंगे)।
➣ नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes) का रुख:- रियासतों की संस्था नरेंद्र मंडल के चांसलर भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान थे। 2 अप्रैल, 1946 ई. को रियासतों के प्रतिनिधिमंडल ने मिशन से भेंट कर अधिकतम संप्रभुता बनाए रखने तथा आवश्यक हो तो रियासतों का एक संघ बनाने की इच्छा जताई।
➣ 19 जून, 1946 ई. को नरेंद्र मंडल की स्थायी समिति ने योजना को स्वतंत्रता की दिशा में आवश्यक ढाँचा तथा आगे की वार्ता का उचित आधार मानकर स्वागत किया। साथ ही यह आग्रह रखा कि संघ में शामिल होने की शर्तें आपसी वार्ता से तय हों।
➣ इसी उद्देश्य से रियासतों की ओर से एक वार्ता समिति गठित की गई, और संविधान सभा ने भी 21 दिसम्बर, 1946 ई. को रियासतों से वार्ता के लिए अपनी समिति चुनी।
➣ जनता बनाम शासक का प्रश्न:- योजना में रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की पद्धति परामर्श से तय होनी थी, किंतु आशंका थी कि वे शासकों द्वारा मनोनीत होंगे।
➣ अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् (All India States Peoples Conference) तथा कांग्रेस ने इसका विरोध किया और माँग की कि रियासतों के प्रतिनिधि भी जनता द्वारा निर्वाचित हों। यह विवाद आगे चलकर रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण बना।
➣ संविधान सभा में भागीदारी:- रियासतों के प्रतिनिधि प्रारंभ में संविधान सभा से अलग रहे और चरणबद्ध ढंग से शामिल हुए। 28 अप्रैल, 1947 ई. को बड़ौदा, बीकानेर, कोचीन, जयपुर, जोधपुर, रीवा आदि रियासतों के प्रतिनिधियों ने पहली बार संविधान सभा में स्थान ग्रहण किया (पटियाला, उदयपुर, ग्वालियर आदि ने भी भाग लेने की घोषणा की)। 3 जून, 1947 की माउंटबेटन योजना के बाद अधिकांश रियासतें इसमें शामिल हो गईं।
योजना का संकट
➣ कांग्रेस–मुस्लिम लीग मतभेद:- कांग्रेस और लीग दोनों ने 16 मई की योजना को स्वीकार तो किया, परंतु दोनों की व्याख्याएँ उलटी थीं। कांग्रेस इसे अखंड भारत की पुष्टि और पाकिस्तान की माँग का खंडन मानती थी, जबकि लीग समूह-व्यवस्था को पाकिस्तान की नींव मानती थी।
➣ समूहकरण की व्याख्या का विवाद:- कांग्रेस के अनुसार प्रांत अपने सेक्शन में बैठने या न बैठने के लिए स्वतंत्र थे और समूह का संविधान बनाते समय प्रत्येक प्रांत का एक मत होना चाहिए। लीग के अनुसार समूह-व्यवस्था अनिवार्य थी और समूह में प्रांतों का प्रभाव उनकी जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए। 25 मई, 1946 ई. के स्पष्टीकरण ने प्रारंभिक चरण में समूहकरण को अनिवार्य बताया, पर प्रक्रिया का विवाद बना रहा।
➣ मुस्लिम लीग द्वारा योजना वापस लेना:- 10 जुलाई, 1946 ई. को बंबई में कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू ने कहा कि कांग्रेस संविधान सभा में किसी समझौते से बँधे बिना जाएगी, संविधान सभा संप्रभु होगी और किसी भी प्रस्ताव में संशोधन के लिए स्वतंत्र होगी।
➣ उन्होंने संकेत भी दिया कि समूह-व्यवस्था टिक नहीं पाएगी, क्योंकि असम और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत उसमें शामिल नहीं होंगे। लीग ने इसे मिशन की मूल भावना तथा समूह-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा माना और उसे आशंका हुई कि कांग्रेस बहुमत के बल पर समूह-व्यवस्था बदल देगी।
➣ इसलिए 29 जुलाई, 1946 ई. को लीग ने योजना की स्वीकृति वापस ले ली, प्रत्यक्ष कार्यवाही का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया और जिन्ना ने ब्रिटिश उपाधियाँ त्यागने का आह्वान किया।
➣ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस (Direct Action Day) — 16 अगस्त, 1946:- जिन्ना के आह्वान पर यह दिवस मनाया गया। इस दौरान विशेषकर कलकत्ता (बंगाल के मुख्यमंत्री एच. एस. सुहरावर्दी के शासन में) में 16-19 अगस्त तक भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए, जिन्हें ग्रेट कलकत्ता किलिंग कहा जाता है। इनमें हज़ारों लोग मारे गए।
➣ इसके बाद देश के अन्य भागों, विशेषकर नोआखाली (अक्टूबर 1946) तथा बिहार (अक्टूबर-नवम्बर 1946) में भी भीषण दंगे हुए। गांधीजी शांति स्थापना के लिए नोआखाली गए। लीग के बहिष्कार के कारण संविधान सभा अपेक्षित रूप से कार्य नहीं कर सकती थी और कांग्रेस-लीग वार्ता का मार्ग लगभग बंद हो गया।
कैबिनेट मिशन योजना की असफलता के कारण
➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग की अलग-अलग व्याख्याएँ:- योजना के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न स्पष्ट रूप से तय नहीं किए गए थे, जैसे सेक्शन में प्रांतों की स्थिति, समूह के भीतर निर्णय की विधि और संविधान सभा की स्वायत्तता की सीमा। इस अस्पष्टता ने दोनों दलों को अपनी सुविधानुसार व्याख्या करने का अवसर दिया, इसलिए औपचारिक स्वीकृति के बावजूद कोई साझा समझ नहीं बन सकी।
➣ समूह व्यवस्था को लेकर विवाद:- यह योजना की सबसे विवादास्पद कड़ी थी, क्योंकि यह सीधे दोनों दलों के मूल लक्ष्यों से जुड़ी थी। लीग के लिए समूह B और C पाकिस्तान की व्यावहारिक नींव थे, जबकि कांग्रेस के लिए यह असम और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत जैसे प्रांतों की इच्छा के विरुद्ध थोपी गई व्यवस्था थी और अखंडता के लिए खतरा भी।
➣ पाकिस्तान की माँग:- लीग का अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान ही रहा। उसने योजना को समझौते के रूप में नहीं, बल्कि एक सीढ़ी के रूप में स्वीकार किया, जैसा जिन्ना के 10 जून 1946 के पत्र (स्वीकृति केवल पहला कदम) से स्पष्ट है। जब उसे लगा कि कांग्रेस के बहुमत वाली संविधान सभा में समूह-व्यवस्था सुरक्षित नहीं रहेगी, तो उसने योजना छोड़कर सीधे पाकिस्तान के लिए आंदोलन का मार्ग चुना।
➣ केंद्र की सीमित शक्तियाँ:- केवल तीन विषयों वाले कमज़ोर केंद्र और प्रांतों के पास अवशिष्ट शक्तियों के कारण कांग्रेस को भारत के बाल्कनीकरण की आशंका रही, इसलिए उसने संविधान सभा को संशोधन की स्वतंत्रता देने पर ज़ोर दिया। यही आग्रह लीग के लिए अविश्वास का कारण बना।
➣ इस प्रकार केंद्र की कमज़ोरी ने कांग्रेस की संशोधन-स्वतंत्रता और लीग की सुरक्षा की माँगों को टकराव में बदल दिया। साथ ही संघ के संविधान पर लागू सांप्रदायिक वीटो की व्यवस्था सांप्रदायिक विभाजन को संस्थागत बनाती थी।
➣ ब्रिटिश मध्यस्थता की सीमाएँ:- योजना दोनों दलों की सहमति से नहीं, बल्कि सहमति न बनने पर मिशन ने स्वयं घोषित की थी। बाद के स्पष्टीकरणों (25 मई और 6 दिसम्बर 1946) को एक पक्ष ने दूसरे के पक्ष में माना। साथ ही ब्रिटेन किसी अनिच्छुक पक्ष पर संविधान थोपने को तैयार नहीं था और अपनी कमज़ोर स्थिति में कड़ा रुख अपनाने में सक्षम भी नहीं था।
➣ परिणाम:- इन कारणों से योजना अपने मूल उद्देश्य, यानी अखंड भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान, में सफल नहीं हो सकी। आगे की घटनाएँ (सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा, माउंटबेटन योजना और स्वतंत्रता) अगले अध्यायों में हैं।
कैबिनेट मिशन योजना : प्रमुख घटनाक्रम
| तिथि | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 19 फरवरी, 1946 | एटली द्वारा मिशन भेजने की घोषणा | भारत को सत्ता हस्तांतरण की दिशा में ब्रिटिश सरकार का स्पष्ट संकेत। |
| 15 मार्च, 1946 | ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) में एटली का वक्तव्य | भारत को अपना भविष्य स्वयं चुनने का अधिकार; किसी अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक की प्रगति पर वीटो की अनुमति नहीं। |
| 24 मार्च, 1946 | कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा | भारतीय नेताओं से वार्ता प्रारम्भ हुई। |
| 5-12 मई, 1946 | द्वितीय शिमला (त्रिपक्षीय) सम्मेलन | कांग्रेस और लीग में सहमति नहीं बनी, इसलिए मिशन ने अपनी योजना देने का निर्णय लिया। |
| 12 मई, 1946 | रियासतों की संधियों एवं सर्वोच्चता पर मिशन का ज्ञापन | सर्वोच्चता की समाप्ति पर रियासतों के अधिकार उन्हें वापस लौटने की बात (22 मई को प्रकाशित)। |
| 16 मई, 1946 | कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा | संघीय व्यवस्था, संविधान सभा एवं अंतरिम सरकार का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। |
| 25 मई, 1946 | मिशन का स्पष्टीकरण | कांग्रेस और लीग की शंकाओं के उत्तर में समूह-व्यवस्था को योजना का मूल अंग बताया गया। |
| 6 जून, 1946 | मुस्लिम लीग ने योजना स्वीकार की | समूह व्यवस्था (Grouping) के कारण लीग ने प्रारंभ में योजना का समर्थन किया; जिन्ना ने 10 जून के पत्र में इसे केवल पहला कदम बताया। |
| 16 जून, 1946 | अंतरिम सरकार संबंधी प्रस्ताव | कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया (विवरण अंतरिम सरकार अध्याय में)। |
| 25 जून, 1946 | कांग्रेस कार्यसमिति ने संविधान सभा में भाग लेने का निर्णय लिया | कांग्रेस ने 16 मई की दीर्घकालीन योजना को अपनी व्याख्या के अनुसार स्वीकार किया। |
| 29 जून, 1946 | मिशन भारत से रवाना हुआ | मिशन का भारत में कार्य समाप्त। |
| 6-7 जुलाई, 1946 | बंबई में AICC का अधिवेशन | कांग्रेस के निर्णय का अनुमोदन हुआ; नेहरू ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला। |
| जुलाई-अगस्त, 1946 | संविधान सभा के लिए चुनाव | 296 सीटों में कांग्रेस को 208, लीग को 73 तथा अन्य को 15 सीटें मिलीं। |
| 10 जुलाई, 1946 | जवाहरलाल नेहरू का वक्तव्य | नेहरू ने कहा कि संविधान सभा किसी भी प्रस्ताव में संशोधन करने के लिए स्वतंत्र होगी। |
| 29 जुलाई, 1946 | मुस्लिम लीग ने योजना अस्वीकार की | लीग ने अपना पूर्व निर्णय वापस लिया और प्रत्यक्ष कार्यवाही का निर्णय किया। |
| 16 अगस्त, 1946 | प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस | कलकत्ता (16-19 अगस्त) सहित देश के कई भागों में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और राजनीतिक संकट गहरा गया। |
| दिसम्बर 1946 (6 दिसम्बर तक) | लंदन वार्ता एवं ब्रिटिश सरकार का स्पष्टीकरण | वार्ता असफल रही; 6 दिसम्बर के वक्तव्य में समूह-व्यवस्था की व्याख्या लीग के पक्ष में मानी गई। |
| 9 दिसम्बर, 1946 | संविधान सभा की पहली बैठक | मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया। |
| 6 एवं 31 जनवरी, 1947 | AICC का निर्णय तथा लीग की माँग | AICC ने 6 दिसम्बर के वक्तव्य को शर्तों के साथ स्वीकार किया (6 जनवरी); लीग कार्यसमिति ने संविधान सभा को भंग करने की माँग की (31 जनवरी)। |
15 मार्च (एटली का वक्तव्य) → 24 मार्च (मिशन आया) → 5-12 मई (शिमला सम्मेलन) → 16 मई (योजना) → 25 मई (स्पष्टीकरण) → 6 जून (लीग ने स्वीकार किया) → 25 जून (कांग्रेस ने दीर्घकालीन योजना स्वीकार की) → 29 जून (मिशन रवाना) → जुलाई-अगस्त (संविधान सभा के चुनाव) → 10 जुलाई (नेहरू का वक्तव्य) → 29 जुलाई (लीग ने अस्वीकार किया) → 16 अगस्त (प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस) → 9 दिसम्बर (संविधान सभा की पहली बैठक)।
कैबिनेट मिशन और संविधान सभा का संबंध
➣ भारत की संविधान सभा सीधे कैबिनेट मिशन योजना की देन थी। योजना में तय संरचना के आधार पर ही चुनाव हुए, परंतु व्यवहार में कई बातें योजना से अलग रहीं। इसे नीचे के तुलनात्मक सारांश से समझा जा सकता है।
कैबिनेट मिशन योजना (16 मई 1946) → संविधान सभा की योजना → जुलाई-अगस्त 1946 के चुनाव → 9 दिसम्बर 1946 की पहली बैठक → विभाजन के बाद पुनर्गठन (1947)
| योजना का प्रावधान | वास्तव में क्या हुआ |
|---|---|
| कुल 389 सीटें (296 ब्रिटिश भारत + 93 रियासतें) | शुरुआत केवल ब्रिटिश भारतीय सदस्यों से हुई; रियासतों के प्रतिनिधि चरणबद्ध ढंग से शामिल हुए (पहला बैच 28 अप्रैल 1947)। |
| प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव | जुलाई-अगस्त 1946 में चुनाव हुए; कांग्रेस को 208 तथा मुस्लिम लीग को 73 सीटें मिलीं। |
| प्रारंभिक बैठक में अध्यक्ष का चयन | 9 दिसम्बर को अस्थायी अध्यक्ष (सच्चिदानंद सिन्हा) और 11 दिसम्बर को स्थायी अध्यक्ष (राजेंद्र प्रसाद) चुने गए। |
| सलाहकार समिति (पैरा 20) | बाद में सरदार पटेल की अध्यक्षता में नागरिकों के अधिकारों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों पर समिति बनी। |
| सेक्शन A, B, C में अलग बैठकें और समूह संविधान | लीग के बहिष्कार के कारण समूह-व्यवस्था पर आधारित योजना का ढाँचा लागू नहीं हो सका; अंतिम संविधान में समूह-व्यवस्था नहीं है। |
➣ पहली बैठक:- संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 ई. को नई दिल्ली के संविधान भवन (वर्तमान संसद भवन का केंद्रीय कक्ष) में हुई, जिसमें 207 सदस्य उपस्थित हुए।
➣ सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष चुने गए और 11 दिसम्बर, 1946 ई. को डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष बने। यह बैठक लीग के बहिष्कार (ऊपर देखें) और रियासतों के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में हुई।
➣ विभाजन के बाद पुनर्गठन:- 3 जून, 1947 की योजना के स्वीकार होने और विभाजन के बाद पाकिस्तान में गए क्षेत्रों (पश्चिमी पंजाब, पूर्वी बंगाल, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, बलूचिस्तान और असम का सिलहट जिला) के प्रतिनिधि भारत की संविधान सभा से अलग हो गए और पाकिस्तान की अलग संविधान सभा बनी।
➣ 31 दिसम्बर 1947 तक भारत की संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 (प्रांत 229 + रियासतें 70) रह गई। मुस्लिम लीग के 73 में से 28 सदस्य भारत की संविधान सभा में शामिल हुए। डॉ. अंबेडकर की बंगाल की सीट पाकिस्तान में चली जाने पर वे बंबई से चुने गए।
➣ संप्रभुता:- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के बाद संविधान सभा पूर्ण रूप से संप्रभु निकाय बन गई। उसे ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के संबंध में बनाए गए किसी भी कानून को निरस्त या परिवर्तित करने का अधिकार मिल गया। इस प्रकार कैबिनेट मिशन योजना की उन सीमाओं का महत्व समाप्त हो गया, जिन्हें लेकर कांग्रेस और लीग में विवाद था।
➣ संविधान सभा की आगे की कार्यवाही (उद्देश्य प्रस्ताव, समितियाँ, संविधान का अंगीकरण आदि) संविधान सभा के अध्याय में पढ़ें।
कैबिनेट मिशन योजना का महत्व
➣ भारत की संविधान-निर्माण प्रक्रिया की आधारभूमि:- योजना ने संविधान बनाने की पूरी प्रक्रिया तय की, यानी प्रारंभिक बैठक, सलाहकार समिति तथा प्रांतीय और संघ स्तर के चरण। इसी की सलाहकार समिति (पैरा 20) ने मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के प्रश्न को संविधान-निर्माण के एजेंडे का हिस्सा बनाया।
➣ संविधान सभा के गठन का आधार:- संविधान सभा की संरचना (कुल 389 सीटें, प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव, जनसंख्या के अनुपात में सीटें और समुदायवार प्रतिनिधित्व) इसी योजना से आई। जुलाई 1946 के चुनाव से लेकर विभाजन के बाद के पुनर्गठन तक का क्रम पिछले खंड में दिया गया है, सदस्य संख्या बदली, पर मूल ढाँचा यही रहा।
➣ इसकी एक सीमा यह थी कि योजना ने संविधान सभा के कार्य को कुछ मूल सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के ढाँचे में बाँधा था, जबकि कांग्रेस उसे संप्रभु मानती थी, और यही विवाद का एक बिंदु बना।
➣ सत्ता हस्तांतरण की दिशा में महत्वपूर्ण चरण:- अगस्त प्रस्ताव (1940) और क्रिप्स प्रस्तावों (1942) में सिद्धांत रूप में कही गई बात को पहली बार तत्काल लागू होने वाली ठोस रूपरेखा मिली। योजना ने भारत के स्वतंत्र होने के अधिकार (राष्ट्रमंडल में रहने या न रहने की स्वतंत्रता) को स्वीकार किया और सत्ता हस्तांतरण से उत्पन्न मामलों को निपटाने के लिए संविधान सभा और ब्रिटेन के बीच संधि (पैरा 22) की व्यवस्था की।
➣ संघीय ढाँचे और केंद्र-प्रांत संबंधों की बहस:- कमज़ोर केंद्र और शक्तिशाली प्रांतों वाली संघीय व्यवस्था (अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को) के प्रस्ताव ने केंद्र-प्रांत संबंधों पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ी। विभाजन के बाद संविधान सभा ने इसके विपरीत अपेक्षाकृत मज़बूत केंद्र वाली व्यवस्था अपनाई; योजना के कौन-से प्रावधान लिए गए और कौन-से छोड़े गए, इसकी तुलना अगले खंड में है।
➣ विभाजन रोकने का अंतिम प्रयास और मतभेदों की स्पष्टता:- यह ब्रिटिश सरकार का भारत की एकता बनाए रखते हुए सत्ता हस्तांतरण का अंतिम प्रमुख प्रयास था। यद्यपि यह सफल नहीं हो सका, फिर भी इसने यह स्पष्ट कर दिया कि गतिरोध की जड़ समूह व्यवस्था तथा पाकिस्तान की माँग थी, जिसे आगे की किसी भी योजना में सुलझाना आवश्यक था।
संक्षेप में: कैबिनेट मिशन योजना अखंड भारत बचाने में असफल रही, परंतु इसने संविधान सभा और संविधान-निर्माण की प्रक्रिया की नींव रखी तथा केंद्र-प्रांत संबंधों पर बहस छेड़ी।
भारतीय संविधान पर कैबिनेट मिशन का प्रभाव
➣ कैबिनेट मिशन योजना के कुछ विचार आगे चलकर भारतीय संविधान में किसी न किसी रूप में आए, जबकि उसके कई प्रमुख प्रावधान छोड़ दिए गए।
| विषय | कैबिनेट मिशन योजना | भारतीय संविधान |
|---|---|---|
| संघ का नाम | Union of India (ब्रिटिश भारत और रियासतों का संघ) | ‘Union of States’ (अनुच्छेद 1) |
| केंद्र की शक्तियाँ | केवल तीन विषय- प्रतिरक्षा, विदेश मामले, संचार | संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची (सातवीं अनुसूची) |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | प्रांतों के पास | केंद्र (संसद) के पास (अनुच्छेद 248) |
| समूह (Groups) | प्रांतों के तीन समूह (A, B, C) | शामिल नहीं |
| सांप्रदायिक वीटो | प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दों पर दोनों समुदायों का अलग बहुमत | शामिल नहीं; अल्पसंख्यकों के लिए सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30) |
| 10 वर्ष बाद पुनर्विचार | प्रांत विधानसभा के बहुमत से संघ के संविधान की शर्तों पर पुनर्विचार माँग सकते थे | शामिल नहीं |
| सलाहकार समिति | मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों पर सलाह (पैरा 20) | इसी विषय पर संविधान सभा की समिति (अध्यक्ष: पटेल); परिणामस्वरूप भाग III (मौलिक अधिकार) और जनजातीय क्षेत्रों के लिए पाँचवीं-छठी अनुसूचियाँ |
| संघीय न्यायालय | सांप्रदायिक वीटो के प्रश्न पर परामर्श के लिए | 1950 में सर्वोच्च न्यायालय ने संघीय न्यायालय का स्थान लिया |
| चुनाव की पद्धति | संविधान सभा का अप्रत्यक्ष चुनाव | लोकसभा और विधानसभाओं के लिए वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326) |
➣ निष्कर्ष:- कैबिनेट मिशन ने संविधान-निर्माण की प्रक्रिया और संविधान सभा दी, परंतु संविधान ने उसके कमज़ोर केंद्र, समूह-व्यवस्था और सांप्रदायिक वीटो जैसे सूत्रों को छोड़कर अपेक्षाकृत मज़बूत केंद्र वाला संघ अपनाया। विभाजन के अनुभव ने इस झुकाव को और बल दिया।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
➣ कैबिनेट मिशन योजना का मूल्यांकन इस आधार पर करना चाहिए कि उसने जिन समस्याओं (अखंड भारत बनाम पाकिस्तान, केंद्र-प्रांत शक्तियाँ, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और संविधान-निर्माण) को सुलझाने का प्रयास किया, उनमें वह कहाँ तक सफल रही।
| आयाम | सकारात्मक पक्ष | सीमाएँ |
|---|---|---|
| राजनीतिक समाधान | विभाजन टालने और अखंड भारत बचाने का प्रयास; शुरुआत में लीग ने पूरी योजना और कांग्रेस ने दीर्घकालीन योजना स्वीकार की। | स्वीकृति की प्रकृति अलग-अलग थी (लीग के लिए ‘पहला कदम’, कांग्रेस के लिए संशोधन की स्वतंत्रता), इसलिए समझौता अस्थायी रहा। |
| संघीय एवं संवैधानिक ढाँचा | त्रिस्तरीय संघ; प्रांतों को अधिकतम स्वायत्तता; विविधता का सम्मान; रियासतों को संघ से जोड़ने की संभावना। | केंद्र के पास केवल तीन विषय; आलोचकों के अनुसार इससे राष्ट्रीय एकता और आर्थिक नियोजन कठिन होता; तीन-स्तरीय ढाँचा जटिल था। |
| सांप्रदायिक एवं अल्पसंख्यक प्रश्न | प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दों पर दोनों समुदायों के बहुमत की सुरक्षा; सलाहकार समिति के माध्यम से मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यक सुरक्षा का मार्ग। | सांप्रदायिक पहचान को संस्थागत रूप मिला; सिख (4 सीटें) और अनुसूचित जातियाँ (सामान्य वर्ग में गिनी गईं) असंतुष्ट रहीं। |
| संविधान सभा एवं लोकतांत्रिक आधार | भारतीयों द्वारा संविधान बनाने की ठोस और तत्काल लागू होने वाली रूपरेखा; हाल में चुनी गई विधानसभाओं से वैधता। | अप्रत्यक्ष चुनाव और सीमित मताधिकार; रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की अस्पष्टता; संविधान सभा की संप्रभुता पर विवाद। |
| सत्ता हस्तांतरण | भारत के स्वतंत्र होने के अधिकार की स्वीकृति; हस्तांतरण से जुड़े मामलों के लिए संधि की व्यवस्था। | स्पष्ट समय-सीमा नहीं थी; योजना की सफलता पूरी तरह दोनों दलों के सहयोग पर निर्भर थी। |
➣ विभिन्न दृष्टिकोण:- योजना की असफलता का दोष किसे दिया जाए, इस पर मत भिन्न हैं-
➣ ▪ (1) महात्मा गांधी ने इसे उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा तैयार किया जा सकने वाला सर्वश्रेष्ठ दस्तावेज़ बताया, परंतु समूह-व्यवस्था पर उनकी आपत्ति बनी रही।
➣ ▪ (2) मौलाना आज़ाद ने अपनी पुस्तक India Wins Freedom में इसे हर दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ समाधान माना, जिसने भारत की एकता बचाई थी। उनके अनुसार नेहरू का 10 जुलाई का वक्तव्य एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, जिसने जिन्ना को लीग की स्वीकृति वापस लेने का अवसर दे दिया।
➣ ▪ (3) जिन्ना और लीग ने इसे पाकिस्तान की ओर पहला कदम माना। इसलिए एक मत के अनुसार लीग की स्वीकृति कभी पूर्ण नहीं थी। (4) कुछ विश्लेषक मानते हैं कि योजना की अस्पष्टता और कमज़ोर केंद्र के कारण वह अपने आप में अव्यावहारिक थी।
➣ ▪ संतुलित मूल्यांकन यह है कि असफलता किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि योजना की अस्पष्टता और दोनों दलों के भिन्न उद्देश्यों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम थी।
➣ निष्कर्ष:- कैबिनेट मिशन योजना अपने तात्कालिक उद्देश्य (एकता बचाना) में असफल रही, परंतु इसने संविधान सभा और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया की ठोस नींव रखी। इस दृष्टि से इसे भारत की स्वतंत्रता और संविधान-निर्माण की सीढ़ी माना जाता है।
Mains उत्तर में उपयोग हेतु मुख्य बिंदु: केंद्र के 3 विषय (प्रतिरक्षा, विदेश, संचार) | समूह A/B/C | 389 सीटें (296 + 93) | अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को | सांप्रदायिक वीटो | 25 मई का स्पष्टीकरण | नेहरू का 10 जुलाई का वक्तव्य | लीग का 29 जुलाई का निर्णय | प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ कैबिनेट मिशन भारत 24 मार्च, 1946 ई. को पहुँचा और 29 जून, 1946 तक भारत में रहा। 5-12 मई के द्वितीय शिमला सम्मेलन में सहमति न बनने पर मिशन ने 16 मई, 1946 को अपनी योजना घोषित की।
➣ कैबिनेट मिशन में लॉर्ड पैथिक-लॉरेंस (अध्यक्ष), सर स्टैफर्ड क्रिप्स तथा ए. वी. एलेक्ज़ेंडर शामिल थे। उस समय वायसराय लॉर्ड वेवेल थे।
➣ 16 मई, 1946 के वक्तव्य को राजकीय पत्र भी कहा जाता है। इसमें कुल 24 पैराग्राफ थे और इसका मूल पैरा 15 है।
➣ मिशन ने भारत के विभाजन का समर्थन नहीं किया और अखंड भारत पर आधारित संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा। लीग के प्रस्तावित पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम आबादी उत्तर-पश्चिम में 37.93% और उत्तर-पूर्व में 48.31% होती, इसलिए मिशन ने उसे अस्वीकार किया।
➣ प्रस्तावित संघ के पास केवल तीन विषय-प्रतिरक्षा, विदेश मामले और संचार तथा इनके लिए आवश्यक वित्त जुटाने की शक्ति थी।
➣ अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के बजाय प्रांतों को देने का प्रस्ताव किया गया था। रियासतें संघ को सौंपे गए विषयों के अतिरिक्त सभी विषय और शक्तियाँ अपने पास रखतीं।
➣ सांप्रदायिक वीटो: किसी प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दे पर निर्णय के लिए दोनों प्रमुख समुदायों के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का अलग-अलग बहुमत तथा सभी सदस्यों का बहुमत आवश्यक था। यह शर्त संघ की संविधान सभा पर भी लागू थी, जहाँ निर्णायक भूमिका अध्यक्ष की थी और वह आवश्यक होने पर संघीय न्यायालय से परामर्श करता।
➣ कोई प्रांत अपनी विधानसभा के बहुमत से संघ के संविधान की शर्तों पर 10 वर्ष बाद और फिर हर 10 वर्ष पर पुनर्विचार माँग सकता था।
➣ ब्रिटिश भारतीय प्रांतों को तीन समूहों (A, B और C) में बाँटने का प्रस्ताव योजना की सबसे विवादास्पद विशेषता था। सीटें: A: 187, B: 35, C: 70 (मुख्य आयुक्त प्रांतों के 4 सदस्य जोड़ने पर A: 190 और B: 36)। संविधान सभा के भीतर इन्हें सेक्शन और बाद में समूह (Group) कहा गया।
➣ प्रांत नए संविधान के लागू होने और प्रथम आम चुनाव के बाद अपनी विधायिका के निर्णय से समूह से बाहर निकल सकते थे।
➣ संविधान सभा की कुल प्रस्तावित सदस्य संख्या 389 थी (296 ब्रिटिश भारत + अधिकतम 93 रियासतें)। ब्रिटिश भारत की 296 में से 292 प्रांतों की और 4 मुख्य आयुक्त प्रांतों की थीं। प्रतिनिधित्व लगभग प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 1 सदस्य के आधार पर था।
➣ ब्रिटिश भारत की 292 प्रांतीय सीटें तीन समुदायों में बँटी थीं- सामान्य 210, मुस्लिम 78 तथा सिख 4।
➣ संविधान सभा का चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से (आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली) हुआ।
➣ देशी रियासतों के संबंध में मिशन ने घोषणा की कि सर्वोच्चता (Paramountcy) न तो ब्रिटिश क्राउन अपने पास रखेगा और न नई सरकार को सौंपेगा। प्रतिनिधियों के चयन की पद्धति परामर्श से तय होनी थी, और 12 मई, 1946 का ज्ञापन इसी विषय पर था।
➣ नागरिकों, अल्पसंख्यकों तथा जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के अधिकारों के लिए संविधान सभा द्वारा सलाहकार समिति बनाने और सत्ता हस्तांतरण से जुड़े मामलों के लिए ब्रिटेन के साथ संधि की व्यवस्था थी।
➣ योजना में अंतरिम सरकार का प्रावधान था, जिसमें सभी विभाग (युद्ध विभाग सहित) भारतीयों के पास रहने थे (विस्तार अंतरिम सरकार अध्याय में)।
➣ 25 मई, 1946 के स्पष्टीकरण में मिशन ने प्रारंभिक चरण में समूहकरण को अनिवार्य बताया।
➣ 6 जून, 1946 ई. को मुस्लिम लीग ने योजना स्वीकार की, जबकि 25 जून, 1946 ई. को कांग्रेस ने केवल दीर्घकालीन योजना (संविधान सभा) स्वीकार की; दोनों ने इसकी अलग-अलग व्याख्या की।
➣ 10 जुलाई, 1946 को नेहरू के वक्तव्य के बाद 29 जुलाई, 1946 को लीग ने योजना की स्वीकृति वापस ली और 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाया।
➣ संविधान सभा के चुनाव (जुलाई-अगस्त 1946) में कांग्रेस ने 208, मुस्लिम लीग ने 73 तथा अन्य ने 15 सीटें जीतीं।
➣ संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई, जिसमें 207 सदस्य उपस्थित थे। अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा तथा स्थायी अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद (11 दिसम्बर) थे। मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया।
➣ विभाजन के बाद भारत की संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 (प्रांत 229 + रियासतें 70) रह गई; लीग के 73 में से 28 सदस्य इसमें शामिल हुए।
➣ कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर आगे चलकर संविधान सभा का गठन हुआ और उसी ने भारत का संविधान तैयार किया।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ कैबिनेट मिशन योजना ने पाकिस्तान की माँग स्वीकार नहीं की थी। इसके विपरीत, इसने अखंड भारत को बनाए रखते हुए एक संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव दिया था।
➣ कैबिनेट मिशन योजना और माउंटबेटन योजना (1947) एक ही योजना नहीं हैं। कैबिनेट मिशन का उद्देश्य भारत का विभाजन रोकना था, जबकि माउंटबेटन योजना के आधार पर भारत का विभाजन स्वीकार किया गया।
➣ कैबिनेट मिशन ने संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव दिया था। भारतीय संविधान का निर्माण इसी संविधान सभा ने किया था, न कि माउंटबेटन योजना के अंतर्गत गठित किसी नई सभा ने। विभाजन के बाद इसी सभा का पुनर्गठन हुआ था।
➣ कैबिनेट मिशन योजना में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को नहीं, बल्कि प्रांतों को देने का प्रस्ताव किया गया था। (भारतीय संविधान में ये केंद्र के पास हैं।)
➣ प्रांतों की समूह व्यवस्था और भारत का विभाजन एक ही बात नहीं हैं। समूह व्यवस्था का उद्देश्य अखंड भारत को बनाए रखते हुए प्रांतों को समूहों में संगठित करना था, जबकि विभाजन का अर्थ दो स्वतंत्र देशों का गठन था।
➣ मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को प्रारंभ में 6 जून, 1946 ई. को स्वीकार किया था, लेकिन बाद में 29 जुलाई, 1946 ई. को इसे अस्वीकार कर दिया।
➣ कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया था। उसने संविधान सभा के गठन का समर्थन किया, लेकिन प्रांतों की समूह व्यवस्था की अलग व्याख्या की।
➣ कैबिनेट मिशन स्वयं संविधान बनाने नहीं आया था। उसका उद्देश्य संविधान सभा के गठन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तैयार करना था।
➣ संविधान सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव से बनी थी। रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की पद्धति परामर्श से तय होनी थी (शासकों के मनोनयन की आशंका थी)।
➣ कैबिनेट मिशन (1946) और क्रिप्स मिशन (1942) अलग हैं। क्रिप्स मिशन में प्रांतों को संघ से बाहर रहने का अधिकार दिया गया था, कैबिनेट मिशन में नहीं (केवल समूह से बाद में निकलने का अधिकार)।
➣ कैबिनेट मिशन के तीन ही सदस्य थे (पैथिक-लॉरेंस, क्रिप्स और एलेक्ज़ेंडर); वायसराय वेवेल मिशन के सदस्य नहीं थे, यद्यपि मिशन ने उनके सहयोग से कार्य किया। इनमें सबसे प्रभावशाली क्रिप्स माने जाते हैं, जबकि अध्यक्ष पैथिक-लॉरेंस थे।
➣ शिमला सम्मेलन दो हैं: 1945 का शिमला सम्मेलन वेवेल योजना से जुड़ा था, जबकि 5-12 मई, 1946 का द्वितीय शिमला सम्मेलन कैबिनेट मिशन के प्रयास का हिस्सा था। दोनों में कांग्रेस और लीग में सहमति नहीं बन सकी।
➣ कैबिनेट मिशन योजना का अर्थ प्रायः 16 मई, 1946 का वक्तव्य है। 25 मई का स्पष्टीकरण, 16 जून का अंतरिम सरकार संबंधी वक्तव्य और 12 मई का रियासतों पर ज्ञापन उससे अलग दस्तावेज़ हैं।
➣ केंद्र के तीन विषय ही थे- प्रतिरक्षा, विदेश मामले और संचार। इनके लिए आवश्यक वित्त जुटाने की शक्ति को चौथा विषय न समझें।
➣ समूह C (बंगाल और असम) में असम हिंदू बहुल था। समूह में मुस्लिम बहुमत केवल बंगाल के कारण था (36 मुस्लिम सदस्य बनाम 34 सामान्य), इसलिए असम को समूह में दबाए जाने का भय था।
➣ बलूचिस्तान (ब्रिटिश बलूचिस्तान) गवर्नर का प्रांत नहीं, बल्कि मुख्य आयुक्त शासित क्षेत्र था। उसका एक प्रतिनिधि संविधान सभा में सेक्शन B में जोड़ा जाना था। इसी तरह दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा और कुर्ग के तीन प्रतिनिधि सेक्शन A में जोड़े जाने थे।
➣ संविधान सभा की संख्याएँ अलग-अलग हैं- 389 (योजना के अनुसार कुल) = 296 (ब्रिटिश भारत: 292 प्रांत + 4 मुख्य आयुक्त क्षेत्र) + अधिकतम 93 (रियासतें); विभाजन के बाद 299 (229 प्रांत + 70 रियासतें)।
➣ कैबिनेट मिशन ने मौलिक अधिकारों की सूची नहीं दी। उसने केवल ऐसी सलाहकार समिति बनाने का निर्देश दिया, जो मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यक सुरक्षा और जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों के प्रशासन पर सलाह दे।
➣ मुस्लिम लीग दो अलग संविधान निर्मात्री सभाएँ (पाकिस्तान और हिंदुस्तान के लिए) चाहती थी, जबकि मिशन ने एक ही संविधान सभा रखी, जो प्रारंभ के बाद सेक्शनों में बँटती।
➣ 1945-46 के प्रांतीय चुनाव और जुलाई-अगस्त 1946 का संविधान सभा चुनाव अलग हैं। संविधान सभा के सदस्य नया प्रत्यक्ष चुनाव जीतकर नहीं आए, बल्कि हाल में चुनी गई प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों ने उन्हें चुना।
➣ 10 जुलाई, 1946 का वक्तव्य कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू का था, मौलाना आज़ाद का नहीं। आज़ाद 1940 से 1946 तक अध्यक्ष रहे और 25 जून 1946 के कार्यसमिति निर्णय के समय अध्यक्ष थे; नेहरू ने जुलाई 1946 में पदभार संभाला।
➣ प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस (16 अगस्त, 1946) कैबिनेट मिशन योजना का कोई प्रावधान नहीं था। इसका निर्णय योजना की स्वीकृति वापस लेने के साथ 29 जुलाई को मुस्लिम लीग परिषद् ने लिया था।
➣ कैबिनेट मिशन ने अंतरिम सरकार का प्रस्ताव रखा था, परंतु उसका गठन मिशन के भारत से जाने के बाद हुआ (विस्तार अंतरिम सरकार अध्याय में)।
➣ योजना के अंतर्गत संविधान सभा का कार्य कुछ मूल सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के ढाँचे में बँधा था। उसे पूर्ण संप्रभु निकाय भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने बनाया, योजना ने नहीं।
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