अकाली दल (1920–1947) : गुरुद्वारा सुधार, सिख राजनीति एवं संवैधानिक संघर्ष

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत अकाली दल (1920–1947)
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अकाली दल (1920–1947)

अकाली दल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पंजाब के सिख समुदाय के बीच विकसित हुआ एक महत्वपूर्ण धार्मिक-सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन था। इसका उदय मुख्यतः गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ,

➣ इसका उद्देश्य सिख गुरुद्वारों को भ्रष्ट एवं निरंकुश महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराकर उनका प्रबंधन सिख समुदाय के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपना था।

➣ प्रारंभिक दौर में अकाली दल मुख्यतः गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के स्वयंसेवी संगठन के रूप में कार्य करता था। इसके कार्यकर्ता जत्थों के रूप में संगठित होकर गुरुद्वारों के सुधार, उनके लोकतांत्रिक प्रबंधन तथा धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति और अधिकारों को सिख समुदाय के नियंत्रण में लाने के लिए संघर्ष करते थे।

1920 के दशक में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की सफलता और SGPC के गठन के बाद अकाली दल का स्वरूप धीरे-धीरे व्यापक होने लगा। यह केवल गुरुद्वारा प्रबंधन से संबंधित संगठन न रहकर सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुरक्षा, पंजाब के राजनीतिक भविष्य और सिख समुदाय के अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित हुआ।

➣ आगे चलकर मास्टर तारा सिंह जैसे नेताओं के नेतृत्व में अकाली राजनीति का संबंध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, संवैधानिक सुधारों तथा पंजाब के भविष्य के प्रश्नों से भी जुड़ गया

➣ इस प्रकार गुरुद्वारा सुधार से शुरू हुई अकाली राजनीति धीरे-धीरे सिखों के राजनीतिक हितों और प्रतिनिधित्व की व्यापक राजनीति में परिवर्तित हुई।

सिख धार्मिक सुधार की पृष्ठभूमि

➣ अकाली आंदोलन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए 19वीं शताब्दी के सिख धार्मिक सुधार आंदोलनों को समझना आवश्यक है। सिख समाज में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार की चेतना विकसित करने में सिंह सभा आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

➣ इसिंह सभा आंदोलन ने सिख धर्म की विशिष्ट पहचान, धार्मिक शिक्षाओं और सामाजिक सुधार पर जोर दिया तथा सिख समुदाय में शिक्षा और संगठन की भावना को मजबूत किया।

1873 में अमृतसर सिंह सभा और 1879 में लाहौर सिंह सभा की स्थापना के बाद सिख धार्मिक सुधार गतिविधियों को अधिक संगठित रूप मिला।

➣ इइन संस्थाओं ने सिख धर्म की शिक्षाओं के प्रचार, आधुनिक शिक्षा के प्रसार तथा सिख धार्मिक पहचान को मजबूत करने के लिए कार्य किया। आगे चलकर इसी सुधारवादी चेतना ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के लिए सामाजिक आधार तैयार किया।

गुरुद्वारों पर महंतों का नियंत्रण

➣ 19वीं शताब्दी के दौरान पंजाब के अनेक महत्वपूर्ण गुरुद्वारों का प्रबंधन महंतों के हाथों में था। महंत धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधक के रूप में कार्य करते थे और कई स्थानों पर गुरुद्वारों की संपत्ति तथा आय पर भी उनका प्रभाव था। समय के साथ कुछ महंतों के विरुद्ध भ्रष्टाचार, संपत्ति के दुरुपयोग तथा धार्मिक मर्यादाओं से विचलन के आरोप लगने लगे।

➣ सुधारवादी सिखों का आरोप था कि कुछ गुरुद्वारों में सिख धार्मिक परंपराओं के स्थान पर ऐसी प्रथाएँ बढ़ रही थीं जिन्हें वे सिख धर्म की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध मानते थे। गुरुद्वारों की विशाल संपत्ति और आय पर महंतों का व्यक्तिगत नियंत्रण भी असंतोष का महत्वपूर्ण कारण बना।

➣ इस कारण सिख समाज के भीतर यह मांग मजबूत होने लगी कि गुरुद्वारों का प्रबंधन किसी व्यक्तिगत महंत के बजाय सिख समुदाय के निर्वाचित एवं उत्तरदायी प्रतिनिधियों के हाथों में होना चाहिए। यही मांग आगे चलकर गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनी।

ब्रिटिश शासन और गुरुद्वारों का प्रश्न

➣ गुरुद्वारों के महंतों और औपनिवेशिक प्रशासन के बीच संबंध भी गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण थे। कई सुधारवादी सिखों का मानना था कि ब्रिटिश प्रशासन महंतों को संरक्षण देता था क्योंकि वे औपनिवेशिक शासन के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माने जाते थे। इस कारण गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराने की मांग धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष से भी जुड़ने लगी।

➣ इस परिस्थिति में गुरुद्वारा सुधार केवल धार्मिक प्रबंधन का प्रश्न नहीं रहा। यह धार्मिक अधिकार, सामुदायिक संपत्ति, सामाजिक सुधार और औपनिवेशिक सत्ता के संबंधों से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन गया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड और सिख राजनीतिक चेतना

13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने पंजाब के राजनीतिक वातावरण को गहराई से प्रभावित किया। अमृतसर में जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थी सभा पर गोली चलाए जाने से व्यापक आक्रोश पैदा हुआ। इस घटना ने पंजाब में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को और तीव्र किया।

➣ जलियांवाला बाग की घटना और उसके बाद पंजाब में औपनिवेशिक दमन ने सिख समाज के एक बड़े वर्ग में भी राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया। धार्मिक संस्थाओं के सुधार की मांग अब व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी चेतना से जुड़ने लगी।

गुरुद्वारा सुधार की बढ़ती मांग

➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक सिख सुधारवादी नेताओं और संगठनों ने गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए संगठित प्रयास तेज कर दिए।

➣ उनका उद्देश्य गुरुद्वारों की धार्मिक मर्यादा की पुनर्स्थापना, संपत्ति का सामुदायिक संरक्षण और प्रबंधन में सिख समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना था।

➣ इस आंदोलन में धार्मिक सुधार के साथ सामुदायिक संगठन और राजनीतिक चेतना भी विकसित हुई। स्वयंसेवकों को जत्थों के रूप में संगठित किया गया और शांतिपूर्ण ढंग से गुरुद्वारों पर सामुदायिक अधिकार स्थापित करने के प्रयास किए जाने लगे।

➣ इस प्रकार सिंह सभा आंदोलन की सुधारवादी चेतना, गुरुद्वारों पर महंतों का नियंत्रण, धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति एवं प्रबंधन का प्रश्न, ब्रिटिश प्रशासन का रवैया तथा 1919 के बाद बढ़ती राजनीतिक जागरूकता ने मिलकर

➣ उस परिस्थिति को जन्म दिया जिसमें संगठित गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का उदय हुआ। इसी प्रक्रिया के अगले चरण में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और अकाली दल का गठन हुआ।

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का उदय एवं SGPC की स्थापना

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का संगठित रूप

1919 के बाद पंजाब में राजनीतिक जागरूकता और औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष बढ़ने के साथ गुरुद्वारा सुधार की मांग ने भी अधिक संगठित रूप ग्रहण किया।

➣ सिख सुधारवादी नेताओं का उद्देश्य गुरुद्वारों को व्यक्तिगत महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराकर उनका प्रबंधन सिख समुदाय के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में देना था।

➣ इस आंदोलन का प्रारंभिक केंद्र पंजाब के प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारे बने। सुधारवादी कार्यकर्ताओं ने गुरुद्वारों के प्रबंधन में पारदर्शिता, धार्मिक मर्यादा तथा सामुदायिक उत्तरदायित्व की मांग उठाई। धीरे-धीरे अलग-अलग स्थानों पर चल रहे प्रयास एक व्यापक गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में बदलने लगे।

अकाल तख्त और हरमंदिर साहिब के प्रबंधन का प्रश्न

1920 में अमृतसर के हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) और अकाल तख्त के प्रबंधन का प्रश्न आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। सुधारवादी सिखों ने मांग की कि इन प्रमुख धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन किसी व्यक्तिगत महंत या सीमित समूह के बजाय व्यापक सिख समुदाय के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाना चाहिए।

➣ इसी पृष्ठभूमि में नवंबर 1920 में अमृतसर में एक व्यापक सिख सभा आयोजित करने की पहल हुई। इसका उद्देश्य एक ऐसी केंद्रीय संस्था का निर्माण करना था जो विभिन्न गुरुद्वारों के प्रबंधन और सुधार के लिए सामुदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान कर सके।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की स्थापना

15 नवंबर 1920 को अमृतसर में आयोजित एक बड़ी सिख सभा में गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए एक केंद्रीय प्रतिनिधिक संस्था के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस सभा में लगभग 175 सदस्यों वाली समिति गठित की गई, जिसे आगे चलकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के नाम से जाना गया।

➣ SGPC की पहली बैठक 12 दिसंबर 1920 को हुई। इसका उद्देश्य प्रमुख सिख गुरुद्वारों के प्रबंधन को व्यवस्थित करना, उनकी संपत्ति की रक्षा करना तथा गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को एक केंद्रीय संगठनात्मक दिशा प्रदान करना था। इस प्रकार SGPC ने विभिन्न स्थानीय गुरुद्वारा सुधार प्रयासों को एक केंद्रीय प्रतिनिधिक मंच प्रदान किया।

➣ SGPC का गठन गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि इससे पहली बार व्यापक स्तर पर गुरुद्वारा प्रबंधन के प्रश्न को सामुदायिक प्रतिनिधित्व के आधार पर संगठित करने का प्रयास हुआ।

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का विस्तार

➣ SGPC के गठन के बाद आंदोलन को अधिक संगठित दिशा मिली। विभिन्न गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए अकाली जत्थों को संगठित किया जाने लगा। इन जत्थों के स्वयंसेवक सामूहिक रूप से गुरुद्वारों की ओर जाते और शांतिपूर्ण ढंग से उनके प्रबंधन को समुदाय के हाथों में सौंपने की मांग करते थे।

➣ आंदोलन की कार्यपद्धति में सत्याग्रह, सामूहिक गिरफ्तारी और अहिंसक प्रतिरोध प्रमुख थे। हालांकि बाद में इसी व्यापक आंदोलन के भीतर बब्बर अकाली जैसी अधिक उग्र धारा भी विकसित हुई, जिसका स्वरूप मुख्य अकाली आंदोलन से अलग था।

➣ गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के विस्तार ने ब्रिटिश सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी। गुरुद्वारों के प्रबंधन का प्रश्न अब केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामुदायिक अधिकार, औपनिवेशिक हस्तक्षेप और राजनीतिक स्वतंत्रता से भी जुड़ गया।

SGPC का ऐतिहासिक महत्व

➣ SGPC की स्थापना ने सिख समुदाय में संस्थागत संगठन और सामुदायिक प्रतिनिधित्व को मजबूत किया। इसने गुरुद्वारों के प्रबंधन को व्यक्तिगत नियंत्रण से निकालकर एक व्यापक प्रतिनिधिक व्यवस्था की दिशा में ले जाने का प्रयास किया।

➣ आगे चलकर SGPC गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का प्रमुख संस्थागत केंद्र बनी और इसके माध्यम से आंदोलन को संगठनात्मक निरंतरता प्राप्त हुई। इसी संगठनात्मक आधार पर अकाली आंदोलन ने तरन तारन, ननकाना साहिब, चाबी मोर्चा, गुरु का बाग और जैतो जैसे संघर्षों को आगे बढ़ाया।

➣ इस प्रकार 1920 में SGPC का गठन गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के संस्थागत चरण की शुरुआत थी। इसके बाद आंदोलन को एक संगठित स्वयंसेवी शक्ति की आवश्यकता हुई, जिसके परिणामस्वरूप 14 दिसंबर 1920 को अकाली दल का गठन हुआ।

अकाली दल की स्थापना (1920)

SGPC की स्थापना (नवंबर 1920) के बाद गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को जमीन पर लागू करने के लिए एक संगठित स्वयंसेवी शक्ति की आवश्यकता महसूस हुई।

➣ पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में पहले से ही अनेक अकाली जत्थे गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए सक्रिय थे। इन अलग-अलग जत्थों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से एक केंद्रीय संगठन के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

14 दिसंबर 1920 को अमृतसर में अकाल तख्त के सामने प्रमुख अकाली कार्यकर्ताओं की बैठक में विभिन्न क्षेत्रीय जत्थों को समन्वित करने के लिए एक केंद्रीय अकाली दल के गठन का निर्णय लिया गया।

इसका प्रारंभिक उद्देश्य SGPC को गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के लिए आवश्यक स्वयंसेवक और जत्थे उपलब्ध कराना तथा विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों को एक केंद्रीय दिशा देना था।

➣ इस समय संगठन को समकालीन अभिलेखों में Central Akali Dal भी कहा गया। बाद में 29 मार्च 1922 को अकाली दल द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद इसके नाम के साथ शिरोमणि शब्द जुड़ा।

➣ इसलिए 14 दिसंबर 1920 को अकाली दल की स्थापना की तिथि मानना और 1922 में शिरोमणि अकाली दल नाम के औपचारिक प्रयोग को अलग समझना ऐतिहासिक रूप से अधिक सटीक है।

क्षेत्रीय जत्थों से केंद्रीय संगठन तक

➣ अकाली दल के गठन से पहले पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में कई अकाली जत्थे गुरुद्वारा सुधार के लिए कार्य कर रहे थे। नवंबर 1920 में SGPC के गठन के बाद इन जत्थों के बीच समन्वय की आवश्यकता और अधिक स्पष्ट हुई। समकालीन विवरणों में लगभग दस प्रमुख जत्थों के गुरुद्वारा सुधार गतिविधियों में सक्रिय होने का उल्लेख मिलता है।

मास्टर मोटा सिंह ने लगभग 500 स्वयंसेवकों वाला एक गुरुद्वारा सेवक दल बनाने का सुझाव दिया था, जबकि जथेदार करतार सिंह झब्बर ने आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न स्थानों पर भेजे जा सकने वाले लगभग 200 स्वयंसेवकों के जत्थे का प्रस्ताव रखा। इन विचारों ने एक केंद्रीय स्वयंसेवी संगठन की आवश्यकता को स्पष्ट किया।

➣ प्रारंभ में विभिन्न जत्थे पूरी तरह केंद्रीय नियंत्रण में नहीं थे और कई स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहे। फिर भी अकाली दल का उद्देश्य इन क्षेत्रीय जत्थों के बीच समन्वय स्थापित करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें गुरुद्वारा सुधार के विभिन्न मोर्चों पर संगठित रूप से भेजना था।

प्रारंभिक संगठनात्मक संरचना

➣ प्रारंभिक अकाली दल को मुख्यतः एक स्वयंसेवी एवं आंदोलनकारी संगठन के रूप में विकसित किया गया। इसके कार्यकर्ता जत्थों में संगठित होते थे और सामूहिक अनुशासन के साथ गुरुद्वारा सुधार के लिए निर्धारित स्थानों पर जाते थे।

➣ समकालीन सरकारी अभिलेखों में अकाली दल को कभी-कभी Akali Fauj के रूप में भी वर्णित किया गया है। उनके मार्च, झंडे, बैज और शिविरों की व्यवस्था से संगठन की अनुशासित प्रकृति स्पष्ट होती है।

➣ हालांकि यह संगठन सैन्य दल नहीं था। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की मुख्य धारा ने अहिंसक प्रतिरोध, सत्याग्रह, सामूहिक गिरफ्तारी और बलिदान को संघर्ष के प्रमुख साधन के रूप में अपनाया।

➣आगे चलकर इसी आंदोलन के भीतर बब्बर अकाली जैसी अलग और अधिक उग्र धारा विकसित हुई, जिसे मुख्य अकाली आंदोलन से अलग समझना आवश्यक है।

➣ प्रारंभिक चरण में अकाली दल को व्यापक रूप से SGPC के आंदोलनकारी/स्वयंसेवी अंग के रूप में देखा जाता था। SGPC गुरुद्वारों के प्रबंधन और नीतिगत दिशा से जुड़ी प्रतिनिधिक संस्था थी, जबकि अकाली दल स्वयंसेवकों को संगठित करके उन निर्णयों को जमीन पर लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

प्रमुख प्रारंभिक नेता

➣ अकाली आंदोलन के प्रारंभिक चरण में अनेक क्षेत्रीय नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें सरमुख सिंह झब्बल, बाबा खड़क सिंह, करतार सिंह झब्बर, मास्टर सुंदर सिंह लायलपुरी और मास्टर तारा सिंह प्रमुख थे।

सरमुख सिंह झब्बल को 14 दिसंबर 1920 को गठित केंद्रीय अकाली दल का पहला जत्थेदार/अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

➣बाद के वर्षों में बाबा खड़क सिंह और विशेष रूप से मास्टर तारा सिंह अकाली राजनीति के अत्यंत प्रभावशाली नेताओं के रूप में उभरे।

मास्टर तारा सिंह प्रारंभ से ही अकाली आंदोलन से जुड़े रहे। वे SGPC के प्रारंभिक सदस्यों में शामिल थे और 1921 के ननकाना साहिब संघर्ष के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता और बढ़ी।

➣बाद में वे SGPC के सचिव बने और अमृतसर को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया। इस प्रक्रिया में वे सिख राजनीति के प्रमुख नेताओं में उभरने लगे।

अकाली दल के प्रमुख उद्देश्य

➣ अकाली दल के प्रारंभिक उद्देश्यों का केंद्र गुरुद्वारा सुधार था। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  • गुरुद्वारों को भ्रष्ट एवं निरंकुश महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराना।
  • गुरुद्वारा संपत्ति और आय को सामुदायिक हित में सुरक्षित करना।
  • गुरुद्वारों का प्रबंधन सिख समुदाय के प्रतिनिधियों के हाथों में लाना।
  • सिख धार्मिक संस्थाओं में धार्मिक मर्यादा और सुधार स्थापित करना।
  • विभिन्न क्षेत्रीय अकाली जत्थों के बीच समन्वय स्थापित करना।
  • गुरुद्वारा सुधार के लिए आवश्यकता पड़ने पर सत्याग्रह, गिरफ्तारी और बलिदान के माध्यम से संघर्ष करना।

➣ समय के साथ इन उद्देश्यों का दायरा बढ़ा और अकाली आंदोलन औपनिवेशिक शासन, सिख राजनीतिक अधिकारों तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े व्यापक प्रश्नों के संपर्क में आया। जिसके कारण 1920 का अकाली आंदोलन केवल धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का आंदोलन न रहकर पंजाब की महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति में विकसित होने लगा।

संगठन मुख्य भूमिका
SGPC (Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee) मुख्यतः गुरुद्वारों के प्रबंधन, धार्मिक संस्थाओं की देखरेख और सुधार से संबंधित प्रतिनिधिक संस्था थी।
अकाली दल मुख्यतः अकाली स्वयंसेवकों, जत्थों और आंदोलन को संगठित करने वाला राजनीतिक/आंदोलनकारी संगठन था।

➣ 1925 के Sikh Gurdwaras Act के बाद SGPC की भूमिका मुख्यतः गुरुद्वारा प्रबंधन तक सीमित हुई, जबकि अकाली दल ने सिखों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व के प्रश्न उठाने शुरू किए। इस प्रकार, SGPC ने जिसे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के लिए बनाया था, वही अकाली दल आगे चलकर सिख राजनीति की प्रमुख शक्ति बन गया।

। इसलिए यहाँ पर दोनों में अंतर समझना जरुरी है।

अकाली आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति का समकालीन संदर्भ

➣ अकाली दल का गठन ऐसे समय हुआ जब पूरे भारत में असहयोग आंदोलन गति पकड़ रहा था। 1920 में कांग्रेस और गांधीजी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असहयोग की नीति अपनाई गई थी।

➣पंजाब में इसी समय गुरुद्वारा सुधार आंदोलन भी तेजी से संगठित हो रहा था। इसलिए प्रारंभिक वर्षों में अकाली आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच सहयोग की महत्वपूर्ण संभावनाएँ बनीं।

➣ हालांकि अकाली आंदोलन का तत्काल और विशिष्ट लक्ष्य गुरुद्वारों को मुक्त कराना था, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन द्वारा महंतों को संरक्षण और सुधारवादी गतिविधियों पर दमन ने इसे औपनिवेशिक शासन के प्रश्न से जोड़ दिया।

➣इस प्रकार गुरुद्वारा सुधार और औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति के बीच संबंध धीरे-धीरे मजबूत हुआ।

➣ अकाली आंदोलन के शुरुआती वर्षों में पंजाबी प्रेस ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अकाली नामक समाचार-पत्र ने गुरुद्वारा सुधार के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न को भी उठाया।

➣इस प्रकार प्रेस, जत्थों और राजनीतिक सभाओं ने मिलकर अकाली आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान करने में सहायता की।

➣ इस प्रकार 14 दिसंबर 1920 को अकाली दल का गठन गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के संगठनात्मक इतिहास में निर्णायक चरण था। इसने विभिन्न क्षेत्रीय जत्थों को एक केंद्रीय आंदोलनकारी मंच प्रदान किया और आगे होने वाले तरन तारन संघर्ष, ननकाना साहिब हत्याकांड, चाबी मोर्चा और गुरु का बाग मोर्चा जैसे संघर्षों के लिए संगठनात्मक आधार तैयार किया।

प्रारंभिक गुरुद्वारा सुधार संघर्ष : तरन तारन एवं ननकाना साहिब

1921 की शुरुआत में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन ने निर्णायक रूप से संघर्ष का रूप ग्रहण कर लिया। SGPC के गठन और अकाली जत्थों के संगठन के बाद सुधारवादियों ने उन प्रमुख गुरुद्वारों को समुदाय के नियंत्रण में लाने के प्रयास तेज कर दिए, जिन पर महंतों का अधिकार था।

➣इसी क्रम में तरन तारन और उसके कुछ ही सप्ताह बाद ननकाना साहिब की घटनाएँ सामने आईं। इन दोनों घटनाओं ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की दिशा और गति को गहराई से प्रभावित किया।

तरन तारन गुरुद्वारा सुधार संघर्ष (25 जनवरी 1921)

तरन तारन का गुरुद्वारा श्री दरबार साहिब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के शुरुआती प्रमुख केंद्रों में से एक बना। सुधारवादी सिख गुरुद्वारे के प्रबंधन में सुधार और महंतों के प्रभाव को समाप्त करने की मांग कर रहे थे।

24 जनवरी 1921 को अकाल तख्त पर हुई सभा में तरन तारन गुरुद्वारे के प्रबंधन को सुधारवादियों के नियंत्रण में लाने का निर्णय लिया गया। अगले दिन अकाली जत्था वहाँ पहुँचा।

25 जनवरी 1921 को सुधारवादी सिखों और गुरुद्वारे के पुजारियों/महंतों के बीच सुधार की शर्तों को लेकर बातचीत हुई। अकाली पक्ष की ओर से गुरुद्वारे के प्रबंधन में सुधार और समुदाय के अधिकार को स्वीकार करने की मांग रखी गई। बातचीत के दौरान स्थिति अचानक हिंसक हो गई और महंतों के समर्थकों ने सुधारवादी सिखों पर हमला कर दिया।

➣ इस हमले में 17 गुरसिख घायल हुए तथा भाई हजारा सिंह और भाई हुकम सिंह की हत्या कर दी गई। भाई हजारा सिंह को गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का पहला शहीद माना जाता है। हजारा सिंह अमृतसर जिले के अलादीनपुर गाँव से संबंधित थे।

➣ तरन तारन की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि गुरुद्वारों पर नियंत्रण का प्रश्न केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि महंतों और सुधारवादी सिखों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष का रूप ले चुका था।

➣ इस घटना को व्यापक गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की शुरुआत का महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसके बाद अकाली जत्थों की गतिविधियाँ और तेज हुईं।

➣ आंदोलन के दबाव के परिणामस्वरूप अगले दिन, 26 जनवरी 1921 को गुरुद्वारे का प्रबंधन सुधारवादी प्रतिनिधियों को सौंप दिया गया। इस प्रकार तरन तारन संघर्ष ने अकाली आंदोलन को एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक सफलता भी प्रदान की, यद्यपि इसके लिए सुधारवादियों को गंभीर बलिदान देना पड़ा।

ननकाना साहिब की पृष्ठभूमि

➣ तरन तारन के बाद गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का अगला और कहीं अधिक गंभीर संघर्ष ननकाना साहिब में सामने आया। ननकाना साहिब गुरु नानक देव का जन्मस्थान होने के कारण सिखों के लिए अत्यंत पवित्र धार्मिक स्थल था।

➣ यहाँ स्थित गुरुद्वारा जन्मस्थान का प्रबंधन महंत नारायण दास के हाथों में था। सुधारवादी सिखों का आरोप था कि गुरुद्वारा प्रबंधन में अनियमितताएँ थीं तथा गुरुद्वारे की आय और संपत्ति का उपयोग सामुदायिक हितों के अनुरूप नहीं किया जा रहा था।

अक्टूबर 1920 में धारोवाल में आयोजित एक सभा में महंत नारायण दास से गुरुद्वारा प्रशासन में सुधार करने और अपनी गतिविधियों में सुधार लाने की मांग की गई थी। इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हुआ।

➣ जब SGPC ने ननकाना साहिब जैसे महत्वपूर्ण गुरुद्वारों को पंथिक नियंत्रण में लाने की दिशा में प्रयास तेज किए, तो महंत पक्ष ने इसका विरोध किया।

24 जनवरी 1921 को SGPC ने ननकाना साहिब में एक बड़े धार्मिक सम्मेलन के आयोजन का निर्णय लिया। इसके लिए 4 से 6 मार्च 1921 के बीच सभा आयोजित करने की योजना बनाई गई थी।

➣ इसी बीच महंत नारायण दास को यह आशंका हुई कि गुरुद्वारा सुधारवादी उसके नियंत्रण को समाप्त कर सकते हैं। उसने अपने बचाव के नाम पर बड़ी संख्या में सशस्त्र लोगों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। स्थानीय अधिकारियों को भी उसकी तैयारियों की जानकारी थी।

ननकाना साहिब हत्याकांड (20 फरवरी 1921)

➣ इसी तनावपूर्ण परिस्थिति में 20 फरवरी 1921 को एक अकाली जत्था ननकाना साहिब के गुरुद्वारा जन्मस्थान पहुँचा। इस जत्थे का नेतृत्व भाई लच्छमन सिंह धरोवालिया कर रहे थे।

जत्थे का उद्देश्य शांतिपूर्ण ढंग से गुरुद्वारे में प्रवेश करना और सुधारवादी सिखों के अधिकार को स्थापित करना था। रास्ते में जत्थे को SGPC की ओर से आगे न बढ़ने का संदेश भी मिला, लेकिन साथियों के आग्रह पर जत्था आगे बढ़ा।

➣ जत्थे के सदस्य गुरुद्वारे के भीतर पहुँचे, गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेका और शांतिपूर्वक कीर्तन करने लगे। दूसरी ओर महंत नारायण दास के लोगों ने पहले से ही हथियारों की तैयारी कर रखी थी। थोड़ी ही देर में महंत के सशस्त्र लोगों ने निहत्थे जत्थे पर हमला कर दिया।

➣ हमलावरों ने गोलियों, लाठियों और धारदार हथियारों का प्रयोग किया। गुरुद्वारे के विभिन्न हिस्सों में भागने वाले लोगों को भी खोज-खोजकर मारा गया। बड़ी संख्या में अकाली स्वयंसेवक और अन्य सिख श्रद्धालु मारे गए।

➣ कई शवों और घायल लोगों को केरोसिन डालकर जलाने का भी प्रयास किया गया। इस प्रकार यह घटना ननकाना साहिब हत्याकांड के नाम से प्रसिद्ध हुई।

➣ ननकाना साहिब की घटना में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं। इसलिए इसे निश्चित संख्या के बजाय बड़ी संख्या में निहत्थे सिखों की हत्या के रूप में समझना अधिक उचित है।

ननकाना साहिब हत्याकांड के बाद की प्रतिक्रिया

➣ हत्याकांड की खबर फैलते ही पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश प्रशासन द्वारा महंतों के विरुद्ध पहले से मौजूद शिकायतों के बावजूद पर्याप्त कार्रवाई न करने के प्रश्न पर भी आलोचना हुई।

➣ महंत नारायण दास को गिरफ्तार किया गया और गुरुद्वारा जन्मस्थान को सैन्य सुरक्षा में रखा गया।

➣ ननकाना साहिब की घटना ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को और व्यापक जनसमर्थन दिया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि गुरुद्वारों को महंतों के व्यक्तिगत नियंत्रण से मुक्त कराकर सिख समुदाय के प्रतिनिधिक नियंत्रण में लाना आवश्यक है। इस घटना के बाद अकाली आंदोलन की गति और संगठनात्मक शक्ति दोनों में वृद्धि हुई।

➣ महात्मा गांधी ने भी ननकाना साहिब हत्याकांड पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। 25 फरवरी 1921 को उन्होंने ननकाना त्रासदी पर बोलते हुए सिखों से धैर्य बनाए रखने की अपील की और 3 मार्च 1921 को शौकत अली के साथ ननकाना साहिब जाकर स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। उन्होंने सिखों के साहस को राष्ट्रीय सेवा से जोड़ते हुए शांतिपूर्ण संघर्ष की भावना को बनाए रखने की अपील की।

➣ ननकाना साहिब की घटना के बाद महंतों और उनके समर्थकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी हुई। इस मुकदमे ने यह स्पष्ट किया कि गुरुद्वारा प्रबंधन का प्रश्न अब केवल धार्मिक विवाद नहीं रहा था, बल्कि पंजाब की औपनिवेशिक राजनीति और व्यापक जनमत का महत्वपूर्ण विषय बन चुका था।

तरन तारन और ननकाना साहिब संघर्ष का महत्व

तरन तारन और ननकाना साहिब की घटनाओं ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को निर्णायक गति प्रदान की। तरन तारन में सुधारवादियों के शुरुआती बलिदान और ननकाना साहिब में हुए व्यापक नरसंहार ने सिख समुदाय में गुरुद्वारा सुधार के प्रति दृढ़ संकल्प पैदा किया।

➣ इन घटनाओं के बाद अकाली जत्थों की गतिविधियाँ और तेज हुईं तथा गुरुद्वारों को समुदाय के नियंत्रण में लाने का आंदोलन पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों तक फैल गया। आगे चलकर इसी संघर्ष की श्रृंखला में चाबी मोर्चा, गुरु का बाग मोर्चा और जैतो मोर्चा जैसे महत्वपूर्ण आंदोलन सामने आए।

➣ इस प्रकार तरन तारन (25 जनवरी 1921) ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रारंभिक संघर्ष और बलिदान का स्वरूप प्रस्तुत किया, जबकि ननकाना साहिब (20 फरवरी 1921) ने इसे व्यापक जन-आक्रोश और निर्णायक राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया।

तिथि घटना
24 जनवरी 1921 अकाल तख्त/SGPC स्तर पर तरन तारन सुधार का निर्णय
25 जनवरी 1921 तरन तारन संघर्ष – हजारा सिंह और हुकम सिंह शहीद
26 जनवरी 1921 तरन तारन गुरुद्वारे का प्रबंधन सुधारवादियों को सौंपा गया
24 जनवरी 1921 SGPC ने ननकाना साहिब में मार्च के लिए योजना बनाई
20 फरवरी 1921 ननकाना साहिब हत्याकांड
25 फरवरी 1921 गांधीजी ने ननकाना त्रासदी पर प्रतिक्रिया दी
3 मार्च 1921 गांधीजी और शौकत अली ने ननकाना साहिब का दौरा किया
4–6 मार्च 1921 SGPC द्वारा पहले से प्रस्तावित ननकाना सभा की तिथि

चाबी मोर्चा एवं गुरु का बाग मोर्चा

तरन तारन और ननकाना साहिब की घटनाओं के बाद गुरुद्वारा सुधार आंदोलन और अधिक व्यापक हो गया। अब अकाली आंदोलन केवल महंतों के नियंत्रण वाले गुरुद्वारों को मुक्त कराने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गुरुद्वारा संपत्ति, प्रशासनिक अधिकार और औपनिवेशिक हस्तक्षेप के प्रश्न से भी सीधे जुड़ गया।

➣ इसी क्रम में चाबी मोर्चा (1921–22) और गुरु का बाग मोर्चा (1922) अत्यंत महत्वपूर्ण संघर्षों के रूप में सामने आए।

चाबी मोर्चा (1921–22)

चाबी मोर्चा का संबंध अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के तोषाखाना की चाबियों से था। 1849 में पंजाब के ब्रिटिश विलय के बाद से स्वर्ण मंदिर के प्रशासन में सरकार द्वारा नियुक्त सरबराह (Sarbrah) की भूमिका बनी हुई थी।

1920 में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बढ़ने के बाद स्वर्ण मंदिर का प्रबंधन सुधारवादी सिखों के नियंत्रण में आ गया और SGPC ने पुराने सरबराह सुंदर सिंह रामगढ़िया को अपने अधीन कार्य करने की अनुमति दी। हालांकि तोशाखाना की चाबियाँ अभी भी उसके पास थीं।

➣ सुधारवादी सिखों का मानना था कि जब स्वर्ण मंदिर का प्रशासन SGPC के अधीन आ चुका है, तो उसकी संपत्ति और तोशाखाने की चाबियाँ भी पूरी तरह सिख प्रतिनिधिक संस्था के नियंत्रण में होनी चाहिए।

➣ इसी उद्देश्य से 20 अक्टूबर 1921 को SGPC ने सुंदर सिंह से चाबियाँ अपने अध्यक्ष को सौंपने का निर्णय लिया। लेकिन इससे पहले कि निर्णय लागू होता, अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर को इसकी जानकारी मिल गई।

7 नवंबर 1921 को अतिरिक्त सहायक आयुक्त अमर नाथ ने पुलिस के साथ सुंदर सिंह रामगढ़िया के घर पर छापा मारकर तोशाखाने की चाबियाँ अपने कब्जे में ले लीं। 11 नवंबर को सरकार ने कैप्टन बहादुर सिंह को नया सरबराह नियुक्त कर दिया। SGPC ने इस नियुक्ति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

➣ सरकारी कार्रवाई के विरोध में 12 नवंबर 1921 को अमृतसर के बाग अकाली में एक विरोध सभा आयोजित की गई। इसमें बाबा खड़क सिंह सहित अनेक अकाली नेताओं ने भाग लिया। इसके बाद अमृतसर और पंजाब के अन्य क्षेत्रों में विरोध सभाएँ और आंदोलन तेज हो गए।

➣ आंदोलन के दौरान 26 नवंबर 1921 को दान सिंह वच्छोआ और जसवंत सिंह झब्बाल को अजनाला में एक दीवान के दौरान गिरफ्तार किया गया। इसके विरोध में SGPC के अनेक सदस्य अजनाला पहुँचे और सभा जारी रखी।

➣ प्रशासन ने इसे अवैध सभा घोषित कर दिया और बाबा खड़क सिंह, सरदार बहादुर मेहताब सिंह तथा मास्टर सुंदर सिंह लायलपुरी सहित कई प्रमुख अकाली नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

27 नवंबर 1921 को SGPC ने सरकारी कार्रवाई की निंदा की और 4 दिसंबर को विरोध दिवस मनाने का आह्वान किया। अकालियों ने प्रिंस ऑफ वेल्स के संभावित भारत दौरे के दौरान उसके स्वागत समारोहों से दूर रहने की अपील भी की।

➣ इस प्रकार चाबी मोर्चा धीरे-धीरे गुरुद्वारा प्रबंधन के प्रश्न से आगे बढ़कर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध से जुड़ गया।

➣ सरकार लगातार बढ़ते विरोध और विशेष रूप से सिख सैनिकों तथा ग्रामीण जनता पर इसके संभावित प्रभाव से चिंतित हुई। अंततः 3 जनवरी 1922 को सरकार ने चाबियाँ SGPC को लौटाने का निर्णय घोषित किया। हालांकि अकालियों ने गिरफ्तार सिखों की बिना शर्त रिहाई होने तक चाबियाँ स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

11 जनवरी 1922 को पंजाब विधान परिषद में गृह सदस्य सर जॉन मेनार्ड ने आंदोलन के दौरान हिरासत में लिए गए सिखों की रिहाई की घोषणा की। इसके बाद भी अकालियों ने स्वयं डिप्टी कमिश्नर के पास जाकर चाबियाँ लेने से इनकार किया।

➣ अंततः 19 जनवरी 1922 को एक सरकारी अधिकारी लाल रेशम में लिपटी चाबियाँ अकाल तख्त में आयोजित दीवान में SGPC के अध्यक्ष बाबा खड़क सिंह को सौंपने पहुँचा।

➣ चाबियों की वापसी को अकाली आंदोलन की महत्वपूर्ण विजय माना गया। महात्मा गांधी ने इस सफलता को भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष की पहली निर्णायक जीतों में से एक बताया।

गुरु का बाग मोर्चा (1922)

➣ चाबी मोर्चे के बाद अकाली आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण संघर्ष गुरु का बाग में सामने आया। गुरु का बाग अमृतसर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित था और वहाँ गुरु अर्जन देव तथा गुरु तेग बहादुर से संबंधित ऐतिहासिक गुरुद्वारे थे। गुरुद्वारे से लगी भूमि और उसके पेड़ों के अधिकार को लेकर महंत सुंदर दास तथा SGPC के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।

➣ गुरुद्वारा SGPC के नियंत्रण में आ जाने के बाद भी महंत सुंदर दास ने दावा किया कि समझौते के अंतर्गत केवल गुरुद्वारा सौंपा गया था, उससे लगी भूमि नहीं। अकाली स्वयंसेवक गुरु का लंगर चलाने के लिए उस भूमि से सूखी लकड़ी काटकर ले जाते थे। महंत ने इसे अवैध बताते हुए पुलिस से कार्रवाई की मांग की।

9 अगस्त 1922 को पुलिस ने लकड़ी लेने गए पाँच अकाली सिखों को आपराधिक अतिक्रमण के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन उन्हें शीघ्रता से मुकदमे में पेश किया गया और छह महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई। इसके बावजूद अकाली स्वयंसेवकों ने अपना संघर्ष जारी रखा।

➣ SGPC ने निर्णय लिया कि प्रतिदिन पाँच स्वयंसेवकों के जत्थे गुरु का बाग भेजे जाएँगे। वे निर्धारित स्थान से लकड़ी काटने का प्रयास करेंगे और पुलिस द्वारा रोके जाने पर शांतिपूर्वक गिरफ्तारी देंगे।

22 अगस्त 1922 से पुलिस ने इन जत्थों को गिरफ्तार करना शुरू किया और आंदोलन लगातार फैलने लगा।

25 अगस्त को अमावस्या के अवसर पर गुरु का बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। पुलिस ने उन्हें हटाने के लिए लाठीचार्ज किया। इसके बाद सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए और कठोर नीति अपनाई।

26 अगस्त को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर ने SGPC की कार्यकारिणी के आठ सदस्यों की गिरफ्तारी के वारंट जारी किए। इसके बाद तेजा सिंह समुंदरी के नेतृत्व में एक Action Committee ने मोर्चे का संचालन संभाला।

➣ सरकार ने गुरु का बाग में लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया और स्वयंसेवकों को रोकने के लिए सड़कों तथा पुलों पर पुलिस तैनात कर दी। इसके बावजूद काली पगड़ियाँ पहने अकाली जत्थे प्रतिदिन वहाँ पहुँचते रहे।

➣ पुलिस स्वयंसेवकों को बेरहमी से पीटती, जिसके बाद वे घायल होकर जमीन पर गिर जाते। इसके बावजूद अकालियों ने अहिंसा और आत्मसंयम बनाए रखा।

➣ गुरु का बाग में पुलिस की कार्रवाई को देखने के लिए भारतीय और विदेशी पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा राजनीतिक नेताओं का आगमन हुआ।

➣ अमेरिकी सिनेमैटोग्राफर ए. एल. वर्गीस ने यहाँ की घटनाओं की फिल्म भी तैयार की। इस दृश्य ने अकाली आंदोलन के अहिंसक प्रतिरोध और ब्रिटिश दमन को व्यापक सार्वजनिक ध्यान दिलाया।

12 सितंबर 1922 को ईसाई मिशनरी और शिक्षाविद सी. एफ. एंड्रयूज़ गुरु का बाग पहुँचे और पुलिस द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को प्रत्यक्ष देखा।

➣ उन्होंने अकाली स्वयंसेवकों के असाधारण आत्मसंयम की प्रशंसा की और इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से दी। इसके बाद 13 सितंबर 1922 को पंजाब के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर एडवर्ड मैकलागन स्वयं गुरु का बाग पहुँचे और पुलिस को स्वयंसेवकों की पिटाई बंद करने का आदेश दिया।

➣ इसके बाद भी गिरफ्तारियाँ, कारावास और जुर्माने जारी रहे, लेकिन पुलिस की खुली मारपीट बंद हो गई। 17 सितंबर 1922 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यसमिति ने गुरु का बाग में पुलिस की कार्रवाई की निंदा की और घटनाओं की जाँच के लिए एक समिति नियुक्त की। इससे अकाली आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध और मजबूत हुए।

➣ लंबे गतिरोध को समाप्त करने के लिए सर गंगा राम की मध्यस्थता का उपयोग किया गया। 17 नवंबर 1922 को उन्होंने महंत सुंदर दास से लगभग 524 कनाल 12 मरले भूमि पट्टे पर ली और अकालियों को उस भूमि तक पहुँच की अनुमति दी।

➣ इसके बाद 27 अप्रैल 1923 को पंजाब सरकार ने गुरु का बाग मोर्चे से संबंधित कैदियों की रिहाई के आदेश जारी किए। SGPC के अभिलेखों के अनुसार इस मोर्चे में 5,605 अकाली स्वयंसेवक जेल गए

गुरु का बाग मोर्चे का राष्ट्रीय प्रभाव

➣ गुरु का बाग मोर्चा अकाली आंदोलन के इतिहास में इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसमें स्वयंसेवकों ने अत्यधिक दमन के बावजूद अहिंसक अनुशासन और आत्मसंयम बनाए रखा।

➣ पुलिस की कार्रवाई और अकालियों के शांतिपूर्ण प्रतिरोध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और विदेशी पर्यवेक्षकों का ध्यान आकर्षित किया।

➣ गुरु का बाग में हुए दमन ने कांग्रेस और अकाली आंदोलन के बीच सहयोग को मजबूत किया। इस संघर्ष ने यह भी प्रदर्शित किया कि धार्मिक संस्थाओं के सुधार का आंदोलन औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संघर्ष का रूप ग्रहण कर चुका था।

➣ गुरु का बाग मोर्चे के दौरान और उसके बाद अकाली आंदोलन का प्रभाव पंजाब के बाहर भी दिखाई दिया। 30 अक्टूबर 1922 को पंजा साहिब में अकाली कैदियों को ले जा रही ट्रेन को रोककर उन्हें भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।

➣ इस दौरान भाई प्रताप सिंह और भाई करम सिंह ट्रेन के नीचे आकर शहीद हुए। यह घटना साका पंजा साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुई और अकाली आंदोलन के बलिदानी चरित्र को और मजबूत किया।

➣ इस प्रकार चाबी मोर्चा ने अकालियों को ब्रिटिश प्रशासन से गुरुद्वारा संपत्ति पर अधिकार के प्रश्न में महत्वपूर्ण सफलता दिलाई, जबकि गुरु का बाग मोर्चा ने उनके अहिंसक प्रतिरोध, संगठनात्मक अनुशासन और बलिदान की क्षमता को पूरे देश के सामने स्थापित किया। इन संघर्षों के बाद अकाली आंदोलन और अधिक व्यापक तथा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बन गया।

तिथि घटना
20 अक्टूबर 1921 SGPC ने स्वर्ण मंदिर के तोशाखाने की चाबियाँ माँगने का निर्णय लिया
7 नवंबर 1921 सरकार ने चाबियाँ अपने कब्जे में लीं
12 नवंबर 1921 अमृतसर में विरोध सभा
26 नवंबर 1921 अजनाला में अकाली नेताओं की गिरफ्तारियाँ
3 जनवरी 1922 सरकार ने चाबियाँ लौटाने का निर्णय घोषित किया
11 जनवरी 1922 हिरासत में लिए गए सिखों की रिहाई की घोषणा
19 जनवरी 1922 चाबियाँ बाबा खड़क सिंह को वापस
9 अगस्त 1922 गुरु का बाग में पाँच अकालियों की गिरफ्तारी
22 अगस्त 1922 नियमित अकाली जत्थों का मोर्चे में प्रवेश
25–26 अगस्त 1922 लाठीचार्ज और SGPC नेताओं पर कार्रवाई
12 सितंबर 1922 सी. एफ. एंड्रयूज़ ने घटनाएँ देखीं
13 सितंबर 1922 सर एडवर्ड मैकलागन ने पुलिस की पिटाई रुकवाई
17 सितंबर 1922 कांग्रेस कार्यसमिति ने जाँच समिति नियुक्त की
30 अक्टूबर 1922 साका पंजा साहिब
17 नवंबर 1922 सर गंगा राम ने विवादित भूमि पट्टे पर ली
27 अप्रैल 1923 गुरु का बाग से संबंधित कैदियों की रिहाई के आदेश

जैतो मोर्चा और अकाली आंदोलन का विस्तार

गुरु का बाग मोर्चे के बाद अकाली आंदोलन का अगला बड़ा संघर्ष जैतो (Jaito) मोर्चा था। यह आंदोलन मुख्यतः नाभा रियासत के महाराजा रिपुदमन सिंह के पदच्युत किए जाने तथा जैतो के गुरुद्वारा गंगसर में अखंड पाठ के अधिकार पर औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरोध में विकसित हुआ।

➣ यह संघर्ष 1923 से 1925 तक चला और धीरे-धीरे गुरुद्वारा सुधार के प्रश्न को व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी तथा राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने लगा।

महाराजा रिपुदमन सिंह का पदच्युत किया जाना

महाराजा रिपुदमन सिंह नाभा रियासत के शासक थे और वे अकाली आंदोलन तथा व्यापक राष्ट्रवादी गतिविधियों के प्रति सहानुभूति रखते थे। उन्होंने ननकाना साहिब हत्याकांड के बाद शोक एवं विरोध की भावना व्यक्त की तथा गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रति समर्थन प्रदर्शित किया। उनके राष्ट्रवादी झुकाव और अकाली नेताओं से निकटता से ब्रिटिश सरकार असंतुष्ट थी।

9 जुलाई 1923 को ब्रिटिश सरकार ने रिपुदमन सिंह को नाभा के सिंहासन से हटाकर उनके नाबालिग पुत्र प्रताप सिंह के पक्ष में सत्ता त्यागने के लिए बाध्य किया।

➣ ब्रिटिश सरकार ने इसे औपचारिक रूप से स्वैच्छिक त्याग के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन अकालियों और राष्ट्रवादी वर्गों ने इसे ब्रिटिश हस्तक्षेप का परिणाम माना। नाभा में एक ब्रिटिश प्रशासक नियुक्त कर दिया गया।

➣ महाराजा को हटाए जाने के बाद पंजाब के अनेक हिस्सों में उनके समर्थन में सभाएँ और प्रार्थना सभाएँ आयोजित होने लगीं। 2 अगस्त 1923 को SGPC ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को तार भेजकर महाराजा के स्वैच्छिक त्याग के सरकारी दावे पर प्रश्न उठाया और स्वतंत्र जाँच की मांग की।

➣ इसके कुछ दिन बाद SGPC ने महाराजा को पुनः गद्दी पर स्थापित कराने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने का निर्णय लिया।

जैतो में अखंड पाठ और मोर्चे का आरंभ

➣ नाभा प्रशासन ने महाराजा के पक्ष में सार्वजनिक चर्चा और सभाओं पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, लेकिन अकालियों ने इसका विरोध जारी रखा। 25 अगस्त 1923 को जैतो में एक बड़ा दीवान आयोजित किया गया, जिसमें महाराजा रिपुदमन सिंह के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया और ब्रिटिश कार्रवाई की निंदा की गई।

27 अगस्त 1923 को नाभा प्रशासन ने इस सभा के आयोजकों को राजनीतिक भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

➣ इसके बाद अकालियों ने सभा को समाप्त करने के बजाय आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और गुरुद्वारा गंगसर, जैतो में अखंड पाठ आयोजित करना शुरू किया। अखंड पाठ का अर्थ गुरु ग्रंथ साहिब का बिना किसी व्यवधान के लगातार पाठ करना था।

➣ नाभा प्रशासन ने इस धार्मिक आयोजन को भी रोकने का प्रयास किया। 14 सितंबर 1923 को पुलिस ने गुरुद्वारा गंगसर में चल रहे अखंड पाठ को बाधित किया और पाठ कर रहे ग्रंथी को गिरफ्तार कर दिया।

➣ सरकारी अधिकारियों द्वारा धार्मिक पाठ में हस्तक्षेप की इस घटना ने सिख समुदाय में तीव्र आक्रोश पैदा किया।

29 सितंबर 1923 को SGPC ने नाभा प्रशासन की कार्रवाई की निंदा करते हुए सिखों के धार्मिक उपासना के स्वतंत्र अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया।

आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर ब्रिटिश पंजाब सरकार ने 12 अक्टूबर 1923 को SGPC और शिरोमणि अकाली दल को गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया। मोर्चा समिति के अनेक सदस्यों को गिरफ्तार कर राजद्रोह के आरोप लगाए गए।

➣ इसके बावजूद आंदोलन बंद नहीं हुआ। गिरफ्तार किए गए नेताओं के स्थान पर नए सदस्य नियुक्त किए गए और अकाली जत्थे लगातार जैतो की ओर भेजे जाते रहे। इस प्रकार ब्रिटिश प्रतिबंधों के बावजूद जत्था प्रणाली ने आंदोलन को निरंतर बनाए रखा।

शहीदी जत्थे और 21 फरवरी 1924 की गोलीबारी

➣ आंदोलन को अधिक व्यापक और संगठित रूप देने के लिए SGPC ने 500 स्वयंसेवकों का एक शहीदी जत्था जैतो भेजने का निर्णय लिया। इस जत्थे का उद्देश्य गुरुद्वारा गंगसर में अखंड पाठ पुनः आरंभ करना था।

➣ स्वयंसेवकों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे विचार, वचन और कर्म-तीनों स्तरों पर अहिंसा का पालन करेंगे।

➣ यह 500 सदस्यीय जत्था 9 फरवरी 1924 को अकाल तख्त से जैतो के लिए रवाना हुआ। रास्ते में अनेक गाँवों और कस्बों में लोगों ने इसका स्वागत किया। 20 फरवरी को जत्था जैतो से लगभग 10 किलोमीटर दूर बरगाड़ी पहुँचा। अगले दिन यह जैतो की ओर बढ़ा।

21 फरवरी 1924 को जब जत्था गुरुद्वारा गंगसर की ओर बढ़ रहा था, नाभा के ब्रिटिश प्रशासक विल्सन जॉनस्टन के नेतृत्व में तैनात पुलिस और सैनिकों ने उसे रोकने का प्रयास किया।

जत्थे ने पीछे हटने से इनकार किया और इसके बाद उस पर गोली चलाई गई

➣ बड़ी संख्या में स्वयंसेवक घायल हुए और अनेक शहीद हुए। सरकारी तथा अकाली स्रोतों में मृतकों और घायलों की संख्या को लेकर अंतर मिलता है, इसलिए निश्चित संख्या के बजाय इसे अकाली शहीदी जत्थे पर हुई पुलिस गोलीबारी के रूप में याद रखना अधिक उचित है।

➣ गोलीबारी के बावजूद अकाली आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद भी लगातार 500-500 स्वयंसेवकों के जत्थे जैतो भेजे जाते रहे और वे गिरफ्तारियाँ देते रहे।

28 फरवरी 1924 को एक और 500 सदस्यीय जत्था रवाना हुआ और आगे चलकर कई अन्य जत्थों ने भी मोर्चे में भाग लिया। कनाडा, हांगकांग और शंघाई से आए सिख स्वयंसेवकों ने भी आंदोलन में भाग लिया।

जैतो मोर्चा और राष्ट्रीय आंदोलन

➣ जैतो मोर्चे के अहिंसक प्रतिरोध और ब्रिटिश दमन ने पूरे भारत में ध्यान आकर्षित किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अकालियों के आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया। 31 जनवरी 1924 को बंबई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक में अकाली आंदोलन के लिए 25,000 रुपये की सहायता देने का निर्णय लिया गया, जिसे SGPC के परामर्श से खर्च किया जाना था।

जवाहरलाल नेहरू ने भी जैतो की परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से देखने का निर्णय लिया। वे 19 सितंबर 1923 को ए. टी. गिडवानी और के. संथानम के साथ नाभा के लिए रवाना हुए।

➣ 20 सितंबर को उन्होंने मुक्तसर में सभा को संबोधित किया और अगले दिन जैतो की ओर जाते समय अकाली जत्थे के साथ आगे बढ़े। नाभा प्रशासन के आदेश की अवहेलना करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

➣ नेहरू की गिरफ्तारी ने जैतो मोर्चे को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रसिद्ध बना दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अकाली आंदोलन अब केवल सिख धार्मिक संस्थाओं के सुधार का प्रश्न नहीं रह गया था, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के अधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक प्रश्नों से भी जुड़ चुका था।

➣ हालांकि अकाली आंदोलन का तत्काल उद्देश्य गुरुद्वारा गंगसर में धार्मिक उपासना के अधिकार की पुनर्स्थापना था, लेकिन महाराजा रिपुदमन सिंह की बहाली का प्रश्न भी आंदोलन से जुड़ा रहा।

➣ बाद की घटनाओं में ब्रिटिश सरकार ने गुरुद्वारा संबंधी प्रश्न पर समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन रिपुदमन सिंह को नाभा की गद्दी पर वापस नहीं बैठाया गया

➣ लंबे संघर्ष के दौरान सरकार ने अकाली आंदोलन को कमजोर करने के लिए मध्यमार्गी सिख नेताओं के समानांतर संगठनों को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया।

➣ दूसरी ओर अकाली जत्थों का अनुशासन और लगातार गिरफ्तारियाँ देने की नीति आंदोलन को जीवित रखती रही। अंततः सरकार को गुरुद्वारा सुधार के प्रश्न पर व्यापक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।

जैतो मोर्चे का परिणाम

➣ जैतो मोर्चा लगभग दो वर्षों तक चला और अंततः इसका समाधान सिख गुरुद्वारा विधान की दिशा में आगे बढ़ने के साथ हुआ।

➣ पंजाब सरकार ने 7 जुलाई 1925 को सिख गुरुद्वारा बिल को विधान परिषद में पारित कराया, जिसे बाद में विधायी प्रक्रिया पूरी होने पर गुरुद्वारा प्रबंधन की नई व्यवस्था का आधार बनाया गया।

हालांकि इस कानून का संबंध केवल गुरुद्वारा प्रबंधन से था और इसमें महाराजा रिपुदमन सिंह की बहाली का प्रश्न शामिल नहीं था।

➣ जैतो मोर्चे का एक महत्वपूर्ण धार्मिक परिणाम भी था। गुरुद्वारा गंगसर में अखंड पाठ के अधिकार को लेकर चला संघर्ष अंततः व्यापक गुरुद्वारा सुधार कानून की प्रक्रिया से जुड़ा।

1925 के गुरुद्वारा अधिनियम के बाद गुरुद्वारों के प्रबंधन के प्रश्न को वैधानिक आधार मिला और अकाली आंदोलन के लंबे गुरुद्वारा सुधार संघर्ष को संस्थागत समाधान की दिशा मिली।

तिथि घटना
9 जुलाई 1923 महाराजा रिपुदमन सिंह को नाभा की गद्दी से हटाया गया
2 अगस्त 1923 SGPC ने वायसराय को स्वतंत्र जाँच के लिए तार भेजा
5 अगस्त 1923 शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने का निर्णय
25 अगस्त 1923 जैतो में बड़ा दीवान
27 अगस्त 1923 दीवान के आयोजकों की गिरफ्तारी; अखंड पाठ का सिलसिला शुरू
14 सितंबर 1923 पुलिस ने अखंड पाठ बाधित किया
19–21 सितंबर 1923 नेहरू ने नाभा-जैतो क्षेत्र का दौरा किया और गिरफ्तार हुए
29 सितंबर 1923 SGPC ने कार्रवाई की निंदा की
12 अक्टूबर 1923 SGPC और अकाली दल को गैर-कानूनी घोषित किया गया
31 जनवरी 1924 AICC ने अकाली आंदोलन के लिए ₹25,000 सहायता का निर्णय लिया
9 फरवरी 1924 500 सदस्यीय शहीदी जत्था अकाल तख्त से रवाना
21 फरवरी 1924 जैतो के निकट 500 सदस्यीय जत्थे पर गोलीबारी
7 जुलाई 1925 Sikh Gurdwaras Bill विधान परिषद से पारित

बब्बर अकाली आंदोलन (1921–25)

बब्बर अकाली आंदोलन गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की मुख्यतः अहिंसक धारा से अलग विकसित हुई एक उग्र एवं गुप्त क्रांतिकारी धारा थी। इसका उदय ननकाना साहिब हत्याकांड (1921), गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान हुए दमन तथा ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते असंतोष की पृष्ठभूमि में हुआ।

➣ बब्बर अकालियों ने अहिंसक सत्याग्रह के स्थान पर सशस्त्र प्रतिरोध को अपनाया और ब्रिटिश अधिकारियों तथा उनके भारतीय सहयोगियों को अपना लक्ष्य बनाया।

बब्बर अकाली आंदोलन की पृष्ठभूमि

तरन तारन (जनवरी 1921) और विशेष रूप से ननकाना साहिब हत्याकांड (20 फरवरी 1921) ने कुछ उग्रवादी सिख कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाया कि केवल शांतिपूर्ण सत्याग्रह से ब्रिटिश समर्थित महंतों और औपनिवेशिक शासन का प्रभाव समाप्त नहीं किया जा सकता। ननकाना साहिब की घटना ने उनके भीतर प्रतिशोध और सशस्त्र संघर्ष की भावना को मजबूत किया।

मार्च 1921 में होशियारपुर में आयोजित सिख एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान किशन सिंह गर्गज्ज और मास्टर मोटा सिंह सहित कुछ उग्रवादी कार्यकर्ताओं ने गुप्त बैठक की।

➣ उन्होंने ननकाना साहिब हत्याकांड के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करने की योजना बनाई। उनके निशाने पर ब्रिटिश अधिकारी, विशेष रूप से जे. डब्ल्यू. बॉवरिंग तथा सी. एम. किंग जैसे अधिकारी थे।

➣ इस योजना से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं को 23 मई 1921 को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि किशन सिंह गर्गज्ज और मास्टर मोटा सिंह गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत हो गए।

➣ इसके बाद किशन सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रिटिश-विरोधी प्रचार तेज किया और लोगों से सरकारी सहयोग से दूर रहने तथा अकाली आंदोलन से जुड़ने का आह्वान किया।

चक्रवर्ती जत्था और बब्बर अकाली जत्थे का गठन

नवंबर 1921 के आसपास किशन सिंह गर्गज्ज ने एक गुप्त संगठन बनाया, जिसे चक्रवर्ती जत्था कहा गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण जनता और सैनिकों के बीच ब्रिटिश-विरोधी विचारों का प्रचार करना था।

➣ इसी दौरान करम सिंह दउलतपुर ने होशियारपुर क्षेत्र में एक समानांतर उग्रवादी समूह संगठित किया। दोनों समूहों का आधार मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय सिख कार्यकर्ताओं और ब्रिटिश-विरोधी तत्वों में था।

1922 में इन गुप्त समूहों की गतिविधियाँ अधिक संगठित होने लगीं। दलिप सिंह दउलतपुर, करम सिंह झिंगर/झिरिगड़, सुंदर सिंह बब्बर और उदे सिंह जैसे कार्यकर्ता इस धारा से जुड़े।

➣ आंदोलन में ऐसे लोगों की भी भागीदारी थी जिनका संबंध सेना से रहा था या जो प्रवासी सिख समुदाय और गदर आंदोलन की क्रांतिकारी परंपरा से प्रभावित थे।

अगस्त 1922 के अंत में दोनों चक्रवर्ती जत्थों ने अपने संगठनों को मिलाकर बब्बर अकाली जत्था का रूप दिया। किशन सिंह गर्गज्ज को इसका जत्थेदार/प्रमुख चुना गया। संगठन ने हथियार और गोला-बारूद एकत्र करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित कार्रवाई करने की योजना बनाई।

बब्बर अकालियों की विचारधारा और कार्यपद्धति

➣ बब्बर अकालियों का मूल लक्ष्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का विरोध और उसके भारतीय सहयोगियों को कमजोर करना था। वे मुख्य अकाली आंदोलन की अहिंसक नीति से अलग थे और सशस्त्र कार्रवाई को औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का साधन मानते थे।

➣ बब्बर अकालियों ने ब्रिटिश अधिकारियों, मुखबिरों तथा ब्रिटिश शासन के समर्थक भारतीयों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया। उनकी भाषा में ऐसे सहयोगियों के विरुद्ध सुधार शब्द का प्रयोग किया जाता था, जो वास्तव में उन्हें दंडित करने अथवा समाप्त करने के लिए प्रयुक्त एक सांकेतिक शब्द था।

➣ संगठन का अपना अनुशासन और आचार-संहिता भी थी। सदस्यों से गुरबाणी और सिख धार्मिक आचरण का पालन करने की अपेक्षा की जाती थी।

➣ व्यक्तिगत बदले की भावना से कार्रवाई न करने, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार न करने तथा संगठन के निर्देशों के अतिरिक्त निजी संपत्ति या धन न लेने जैसे नियम भी निर्धारित किए गए थे।

➣ बब्बर अकाली संगठन अपेक्षाकृत छोटा और गुप्त था। सक्रिय सदस्यों की संख्या लगभग 200 से अधिक नहीं मानी जाती है, जबकि उससे कहीं बड़ा समर्थक वर्ग उन्हें भोजन, आश्रय, संदेश और प्रचार सामग्री उपलब्ध कराता था। गुप्त संचार और संगठन की सुरक्षा के लिए सांकेतिक भाषा और गुप्त नेटवर्क का उपयोग किया जाता था।

बब्बर अकाली दोआबा और प्रचार गतिविधियाँ

➣ बब्बर अकालियों ने अपने विचारों के प्रचार के लिए गुप्त साहित्य और समाचार-पत्रों का उपयोग किया। बब्बर अकाली दोआबा नामक साइक्लोस्टाइल समाचार-पत्र/पर्चे के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विचारों का प्रचार किया गया। संगठन ने विशेष रूप से सैनिकों और विद्यार्थियों के बीच संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ ग्रामीण क्षेत्रों में दीवान आयोजित करके ब्रिटिश-विरोधी भाषण दिए जाते थे। कार्यकर्ता किसानों और पूर्व सैनिकों के बीच औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना पैदा करने का प्रयास करते थे।

➣ इस प्रकार बब्बर अकाली आंदोलन केवल गुप्त हिंसक कार्रवाइयों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके साथ एक राजनीतिक एवं वैचारिक प्रचार अभियान भी चलता था।

ब्रिटिश सरकार का दमन

➣ बब्बर अकालियों की गतिविधियों से चिंतित होकर पंजाब सरकार ने व्यापक दमनात्मक कार्रवाई शुरू की। 1923 में सरकार ने संगठन को आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1908 के अंतर्गत गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया।

➣ बब्बर अकालियों की गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित किए गए और पुलिस तथा सेना को उनके विरुद्ध विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया। सरकार ने बब्बर अकालियों को आश्रय देने वाले लोगों के विरुद्ध भी कार्रवाई की।

➣ संवेदनशील क्षेत्रों में सैन्य एवं विशेष पुलिस बल तैनात किए गए तथा शिवालिक पहाड़ियों में छिपे कार्यकर्ताओं को पकड़ने के लिए संयुक्त अभियान चलाए गए। सरकार ने प्रचार-पर्चों के माध्यम से भी ग्रामीण जनता को बब्बर अकालियों से दूर रहने के लिए प्रभावित करने का प्रयास किया।

गिरफ्तारी और पुलिस मुठभेड़ों में अनेक प्रमुख कार्यकर्ताओं के मारे जाने से संगठन की शक्ति लगातार घटती गई। जून 1924 में वरियाम सिंह धुग्गा की पुलिस कार्रवाई में मृत्यु के बाद आंदोलन की सक्रियता लगभग समाप्त हो गई। इस प्रकार बब्बर अकाली आंदोलन का सक्रिय चरण मुख्यतः 1922–24 के बीच रहा।

बब्बर अकाली षड्यंत्र मुकदमा (1923–25)

➣ गिरफ्तार किए गए बब्बर अकालियों के विरुद्ध सरकार ने व्यापक षड्यंत्र का मुकदमा चलाया। इसका विचारण 15 अगस्त 1923 को लाहौर सेंट्रल जेल में शुरू हुआ।

➣ प्रारंभ में 62 व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया गया और जनवरी 1924 में 36 और नाम जोड़े गए। जाँच के दौरान दो अभियुक्तों की मृत्यु हुई तथा पाँच को मजिस्ट्रेट स्तर पर बरी कर दिया गया। अंततः 91 अभियुक्त सेशन कोर्ट के समक्ष भेजे गए।

➣ मुकदमे की कार्यवाही 2 जून 1924 से अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे. के. एम. टैप के समक्ष आगे बढ़ी। अभियोजन पक्ष ने बड़ी संख्या में गवाह और दस्तावेज प्रस्तुत किए।

➣ यह मुकदमा ब्रिटिश सरकार द्वारा बब्बर अकाली गतिविधियों को एक संगठित औपनिवेशिक-विरोधी षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रमुख माध्यम बना।

28 फरवरी 1925 को सेशन कोर्ट ने अपना निर्णय दिया। 91 अभियुक्तों में से 34 को बरी किया गया, जबकि 49 को विभिन्न अवधियों के कारावास की सजा दी गई और 6 प्रमुख बब्बर अकालियों को मृत्युदंड दिया गया। मृत्युदंड में किशन सिंह गर्गज्ज, बाबू संता सिंह, दलिप सिंह धमियां, करम सिंह मानको, नंद सिंह घुरियाल और धरम सिंह हयातपुर शामिल थे।

➣ सरकार ने मृत्युदंड और अन्य सजाओं के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण की कार्यवाही की। उच्च न्यायालय ने कुछ बिंदुओं पर निचली अदालत के निर्णय में परिवर्तन किया, लेकिन मृत्युदंड को बरकरार रखा। 27 फरवरी 1926 को इन छह बब्बर अकाली नेताओं को फाँसी दी गई।

➣ आंदोलन अल्पकालिक रहा और कठोर सरकारी दमन के कारण समाप्त हो गया, लेकिन इसकी क्रांतिकारी परंपरा का प्रभाव बाद के पंजाब के नौजवान और किरती किसान आंदोलनों पर देखा गया। इस दृष्टि से बब्बर अकाली आंदोलन पंजाब के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी था।

बब्बर अकाली आंदोलन का मुख्य अकाली आंदोलन से संबंध

➣ बब्बर अकाली आंदोलन का उदय अकाली गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ, लेकिन दोनों की कार्यपद्धति में स्पष्ट अंतर था।

➣ मुख्य अकाली आंदोलन का नेतृत्व SGPC और अकाली दल की संस्थाओं के माध्यम से अहिंसक सत्याग्रह और सामूहिक गिरफ्तारी पर आधारित था, जबकि बब्बर अकालियों ने गुप्त संगठन और सशस्त्र कार्रवाई को अपनाया।

➣ ननकाना साहिब हत्याकांड और गुरु का बाग में पुलिस दमन ने इस उग्रवादी धारा को प्रेरित किया, लेकिन SGPC की आधिकारिक आंदोलनकारी नीति अहिंसक ही रही।

➣ इसलिए बब्बर अकालियों को मुख्य अकाली आंदोलन का पर्याय नहीं, बल्कि उसी व्यापक गुरुद्वारा सुधार एवं औपनिवेशिक-विरोधी वातावरण से निकली उग्रवादी धारा के रूप में समझना चाहिए।

वर्ष/तिथि घटना
मार्च 1921 किशन सिंह गर्गज्ज और मास्टर मोटा सिंह की गुप्त बैठक
23 मई 1921 ननकाना कांड के प्रतिशोध की योजना से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी
नवंबर 1921 किशन सिंह द्वारा चक्रवर्ती जत्था का गठन
अगस्त 1922 चक्रवर्ती जत्थों का विलय; बब्बर अकाली जत्था का गठन
1922–23 आंदोलन की सक्रियता का प्रमुख चरण
अप्रैल 1923 बब्बर अकाली जत्थे को गैर-कानूनी घोषित किया गया
15 अगस्त 1923 बब्बर अकाली षड्यंत्र मुकदमे की शुरुआत
जून 1924 वरियाम सिंह धुग्गा की मृत्यु; आंदोलन लगभग समाप्त
28 फरवरी 1925 षड्यंत्र मुकदमे का निर्णय
27 फरवरी 1926 छह प्रमुख बब्बर अकालियों को फाँसी

सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925

1920 से 1925 तक चले गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के लगातार दबाव, अकाली जत्थों के संघर्ष, व्यापक गिरफ्तारियों तथा जैतो मोर्चे के बाद ब्रिटिश सरकार को सिख गुरुद्वारों के प्रबंधन के प्रश्न पर वैधानिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।

➣ इसी प्रक्रिया का परिणाम सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 (Sikh Gurdwaras Act, 1925) था। इस अधिनियम ने गुरुद्वारा प्रबंधन को एक निर्वाचित प्रतिनिधिक व्यवस्था के अधीन लाने का कानूनी आधार प्रदान किया।

सिख गुरुद्वारा विधेयक, 1925

7 मई 1925 को शिमला में पंजाब विधान परिषद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया, जिसमें सिख गुरुद्वारा एवं धार्मिक स्थल विधेयक, 1925 प्रस्तुत किए गए।

➣ विधेयक को एक चयन समिति के पास भेजा गया और समिति ने 20 जून 1925 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस प्रक्रिया में सिख नेताओं के साथ विचार-विमर्श के बाद गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए प्रतिनिधिक व्यवस्था को स्वीकार किया गया।

➣ विधेयक को 7 जुलाई 1925 को पंजाब विधान परिषद ने पारित किया। 28 जुलाई 1925 को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिलने के बाद यह अधिनियम बन गया। इसे 7 अगस्त 1925 को पंजाब गजट में प्रकाशित किया गया और 1 नवंबर 1925 से यह प्रभावी हुआ।

सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 की प्रमुख विशेषताएँ

➣ अधिनियम का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों के बेहतर प्रशासन, उनके प्रबंधन से संबंधित विवादों की जाँच तथा उनके समाधान के लिए एक वैधानिक व्यवस्था स्थापित करना था।

➣ इसने गुरुद्वारों के प्रबंधन को व्यक्तिगत महंतों या सरकारी नामित प्रबंधकों के नियंत्रण से हटाकर सिख प्रतिनिधियों द्वारा संचालित केंद्रीय व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाया।

➣ अधिनियम के अंतर्गत एक केंद्रीय बोर्ड का प्रावधान किया गया, जिसे सिखों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों से गठित किया जाना था। बाद में इसी केंद्रीय बोर्ड को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के रूप में जाना गया। इस प्रकार गुरुद्वारा प्रबंधन को पहली बार व्यापक वैधानिक एवं प्रतिनिधिक आधार प्राप्त हुआ।

➣ अधिनियम में किसी गुरुद्वारे को सिख गुरुद्वारा घोषित करने की कानूनी प्रक्रिया भी निर्धारित की गई। उदाहरण के लिए, धारा 7 के अंतर्गत संबंधित क्षेत्र के कम-से-कम 50 सिख उपासक किसी गुरुद्वारे को सिख गुरुद्वारा घोषित करने के लिए याचिका प्रस्तुत कर सकते थे।

➣ गुरुद्वारे की धार्मिक प्रकृति पर विवाद होने की स्थिति में न्यायाधिकरण को यह निर्धारित करने की व्यवस्था थी कि संबंधित संस्था ऐतिहासिक परंपरा, दस गुरुओं से संबंध अथवा सिख सार्वजनिक उपासना के आधार पर सिख गुरुद्वारा है या नहीं। इस प्रकार धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवादों के समाधान के लिए एक न्यायिक तंत्र भी स्थापित किया गया।

अधिनियम का अकाली आंदोलन पर प्रभाव

➣ अधिनियम के लागू होने के साथ अकाली आंदोलन का मूल संघर्ष-गुरुद्वारों के प्रबंधन का अधिकार-काफी हद तक वैधानिक रूप ले चुका था। अब अकालियों के सामने नया प्रश्न था कि इस नई व्यवस्था के अंतर्गत SGPC पर वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में रहेगा। यही प्रश्न अकाली राजनीति में नए मतभेदों का कारण बना।

➣ ब्रिटिश सरकार ने जेल में बंद अकाली नेताओं को रिहा करने के लिए अधिनियम को स्वीकार करने और उसके अनुसार कार्य करने की शर्त रखी। कुछ नेताओं ने इस शर्त को स्वीकार कर रिहाई प्राप्त कर ली, जबकि मास्टर तारा सिंह और तेजा सिंह समुंदरी सहित कुछ प्रमुख नेताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया और जेल में रहना पसंद किया। इस प्रश्न ने अकाली नेतृत्व में मतभेद की स्पष्ट रेखा खींच दी।

तिथि/वर्ष घटना
7 मई 1925 सिख गुरुद्वारा विधेयक विधान परिषद में प्रस्तुत
20 जून 1925 चयन समिति की रिपोर्ट
7 जुलाई 1925 विधेयक पंजाब विधान परिषद से पारित
28 जुलाई 1925 गवर्नर-जनरल की स्वीकृति
7 अगस्त 1925 अधिनियम पंजाब गजट में प्रकाशित
1 नवंबर 1925 Sikh Gurdwaras Act लागू
18 जून 1926 अधिनियम के तहत पहला केंद्रीय बोर्ड/SGPC चुनाव
27 सितंबर 1926 अकालियों पर सरकारी प्रतिबंध हटाया गया
2 अक्टूबर 1926 बाबा खड़क सिंह अध्यक्ष एवं मास्टर तारा सिंह उपाध्यक्ष निर्वाचित
27 नवंबर 1926 SGPC ने गुरुद्वारा प्रबंधन का कार्य संभाला

1926 का SGPC चुनाव एवं अकाली दल का राजनीतिक प्रभुत्व

सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 के लागू होने के बाद गुरुद्वारा प्रबंधन को एक वैधानिक एवं निर्वाचित व्यवस्था के अधीन लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। अधिनियम के अंतर्गत गठित होने वाले केंद्रीय बोर्ड के चुनाव ने अकाली आंदोलन के सामने एक नया राजनीतिक प्रश्न खड़ा किया-गुरुद्वारों की प्रतिनिधिक संस्था पर किस राजनीतिक धड़े का नियंत्रण रहेगा? यही प्रश्न 1926 के SGPC चुनाव का मुख्य आधार बना।

अकाली नेतृत्व में मतभेद

➣ गुरुद्वारा अधिनियम स्वीकार किए जाने के बाद अकाली नेतृत्व के भीतर मतभेद उभरने लगे। ब्रिटिश सरकार ने जेल में बंद अकाली नेताओं की रिहाई के लिए यह शर्त रखी कि वे सिख गुरुद्वारा अधिनियम को स्वीकार करेंगे और उसके अनुसार कार्य करने का लिखित आश्वासन देंगे

सरदार बहादुर मेहताब सिंह के नेतृत्व वाले एक धड़े ने सरकार की शर्त स्वीकार कर जेल से रिहाई प्राप्त कर ली। इसके विपरीत मास्टर तारा सिंह, तेजा सिंह समुंदरी और अन्य कई प्रमुख अकाली नेताओं ने सरकार की इस शर्त को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और जेल में रहना पसंद किया। इस प्रकार अकाली नेतृत्व में एक स्पष्ट मध्यमार्गी और संघर्षशील धड़े का विभाजन दिखाई देने लगा।

➣ यह मतभेद केवल व्यक्तिगत नेतृत्व का प्रश्न नहीं था। इसके पीछे यह मूल प्रश्न था कि गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान संघर्ष करने वाले अकाली नेता नई वैधानिक व्यवस्था को किस सीमा तक स्वीकार करें और SGPC पर वास्तविक नियंत्रण किस प्रकार बनाए रखें

पहला SGPC चुनाव (18 जून 1926)

18 जून 1926 को सिख गुरुद्वारा अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड का पहला चुनाव हुआ। बाद में यही केंद्रीय बोर्ड शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के रूप में कार्य करने लगा।

चुनाव मुख्यतः सरदार बहादुर मेहताब सिंह के समर्थक समूह और उन अकाली नेताओं के समर्थकों के बीच हुआ जो सरकारी शर्त स्वीकार करने से इनकार कर जेल में रहे थे।

➣ चुनाव का परिणाम अकाली राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। कुल 120 सीटों में से संघर्षशील अकाली धड़े ने 85 सीटें प्राप्त कीं।

➣ मेहताब सिंह के नेतृत्व वाले समूह को 26 सीटें मिलीं, जबकि सरकार समर्थित सुधार समिति को 5 और स्वतंत्र उम्मीदवारों को 4 सीटें मिलीं। इस प्रकार संघर्षशील अकाली धड़े को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ।

➣ चुनाव परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले और सरकारी दबाव का विरोध करने वाले अकाली नेताओं को सिख समुदाय में व्यापक राजनीतिक समर्थन प्राप्त था।

इस विजय ने शिरोमणि अकाली दल को सिख पंथ की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद वह धीरे-धीरे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन से आगे बढ़कर सिखों के राजनीतिक अधिकारों और हितों के प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ा। उसका यह राजनीतिक संघर्ष 1947 में पंजाब के विभाजन तक जारी रहा।

SGPC पर अकाली दल का नियंत्रण

➣ 1926 के चुनाव के बाद SGPC और अकाली दल के संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के शुरुआती चरण में अकाली दल मुख्यतः SGPC को स्वयंसेवक और आंदोलनकारी समर्थन प्रदान करने वाला संगठन था। लेकिन चुनाव के बाद अकाली दल ने अपनी राजनीतिक शक्ति के माध्यम से SGPC पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

➣ इस प्रकार 1926 के बाद SGPC धार्मिक-संस्थागत प्रबंधन की सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था और अकाली दल उसका प्रभावशाली राजनीतिक संगठन बन गया। दोनों संस्थाओं के बीच यह संबंध आगे चलकर सिख राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता बना।

➣ चुनावी विजय के बाद अकाली दल को यह अनुभव भी हुआ कि गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान विकसित उसका संगठनात्मक नेटवर्क अब निर्वाचन राजनीति में भी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है।

➣ इससे अकाली राजनीति का दायरा गुरुद्वारा प्रबंधन से आगे बढ़कर व्यापक पंथिक और प्रांतीय राजनीतिक प्रश्नों तक फैलने लगा।

अकाली दल का स्वतंत्र राजनीतिक संगठन के रूप में विकास

➣ 1926 के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि अकाली दल केवल गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का स्वयंसेवी संगठन नहीं रहा

➣ अब उसे SGPC के चुनावों में मतदाताओं को संगठित करने, उम्मीदवारों का समर्थन करने और सिख राजनीतिक हितों को राजनीतिक मंच पर प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी। इस प्रक्रिया ने उसे एक अधिक स्पष्ट स्वतंत्र पंथिक राजनीतिक संगठन में बदल दिया।

➣ गुरुद्वारा अधिनियम ने SGPC के कार्यक्षेत्र को मुख्यतः धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन तक सीमित किया था। इसलिए राजनीतिक गतिविधियों और मतदाताओं के संगठन का कार्य स्वाभाविक रूप से अकाली दल के हाथों में अधिक महत्वपूर्ण हो गया। इस प्रकार धार्मिक संस्था और राजनीतिक संगठन के बीच एक विशिष्ट संस्थागत संबंध विकसित हुआ।

➣ SGPC पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद अकाली दल ने राष्ट्रीय राजनीति में भी अधिक सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। आगे चलकर उसने बारडोली सत्याग्रह और साइमन कमीशन के बहिष्कार (1928) जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन किया।

अकाली आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

असहयोग आंदोलन और अकाली आंदोलन का प्रारंभिक संबंध

➣ अकाली आंदोलन का संगठित चरण उस समय शुरू हुआ जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन भी गति पकड़ रहा था। पंजाब में दोनों आंदोलनों के बीच प्रारंभिक स्तर पर महत्वपूर्ण समानता थी-दोनों ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-संगठन, बहिष्कार और अहिंसक प्रतिरोध को महत्व देते थे। पंजाब के अनेक सिख कार्यकर्ता और संगठन राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यक्रमों के प्रति सहानुभूति रखते थे।

सेंट्रल सिख लीग जैसे संगठनों ने भी असहयोग आंदोलन का समर्थन किया। पंजाब में सिख राजनीतिक चेतना और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच यह संपर्क अकाली आंदोलन के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण बनाने वाला था। 1920 में सेंट्रल सिख लीग ने गांधी के असहयोग आंदोलन के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया और स्वराज के लिए स्वयंसेवी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।

➣ हालांकि अकाली आंदोलन को केवल असहयोग आंदोलन की शाखा मानना सही नहीं होगा। इसका अपना स्वतंत्र गुरुद्वारा सुधार कार्यक्रम, संगठनात्मक ढाँचा और सिख धार्मिक-सामुदायिक आधार था। दोनों आंदोलनों के बीच सहयोग मुख्यतः ब्रिटिश-विरोध और अहिंसक जन-संघर्ष के स्तर पर था।

ननकाना साहिब हत्याकांड और राष्ट्रीय प्रतिक्रिया

20 फरवरी 1921 के ननकाना साहिब हत्याकांड ने अकाली आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के बीच संबंध को और मजबूत किया। महात्मा गांधी ने ननकाना साहिब की घटना को गंभीरता से लिया और मार्च 1921 में वहाँ जाकर स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया।

➣ उनके ननकाना दौरे ने अकाली आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर व्यापक पहचान दिलाई। इस घटना के बाद गुरुद्वारा सुधार का प्रश्न केवल सिख समुदाय का आंतरिक धार्मिक प्रश्न न रहकर औपनिवेशिक शासन और नागरिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन गया।

➣ ननकाना साहिब की घटना के बाद पंजाब में अकाली और राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग बढ़ा। हालांकि इसी दौर में आंदोलन की उग्र प्रतिक्रिया के रूप में बब्बर अकाली आंदोलन भी विकसित हुआ, जिसने गांधीवादी अहिंसा और असहयोग की नीति को अस्वीकार कर दिया।

गुरु का बाग–जैतो मोर्चा और राष्ट्रीय समर्थन

1922 के गुरु का बाग मोर्चे में अकालियों के अहिंसक सत्याग्रह और पुलिस के कठोर दमन ने पूरे भारत का ध्यान आकर्षित किया। सी. एफ. एंड्रयूज़ सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अकालियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। इससे अकाली आंदोलन के व्यापक जनाधार और उसके राष्ट्रीय महत्व को बल मिला।

1923–25 के जैतो मोर्चे ने अकाली आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सहयोग को और स्पष्ट किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे औपनिवेशिक दमन और नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न माना।

जवाहरलाल नेहरू की सितंबर 1923 में नाभा-जैतो क्षेत्र की यात्रा और गिरफ्तारी ने इस सहयोग को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व प्रदान किया।

अकाली आंदोलन और कांग्रेस के संबंधों की सीमाएँ

➣ अकाली आंदोलन और कांग्रेस के बीच सहयोग के बावजूद दोनों की संगठनात्मक पहचान और प्राथमिकताएँ अलग थीं। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य भारतीय स्वशासन और अंततः स्वतंत्रता प्राप्त करना था, जबकि अकाली आंदोलन का तत्काल केंद्र गुरुद्वारा सुधार और सिख धार्मिक संस्थाओं का सामुदायिक नियंत्रण था।

➣ इसी कारण प्रत्येक चरण में दोनों संगठनों का सहयोग समान स्तर का नहीं रहा। अकाली नेतृत्व अपने पंथिक हितों और गुरुद्वारा सुधार को प्राथमिकता देता था, जबकि कांग्रेस व्यापक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती थी। फिर भी ब्रिटिश दमन और नागरिक अधिकारों के प्रश्न पर दोनों के बीच महत्वपूर्ण सहयोग विकसित हुआ।

➣ दूसरी ओर बब्बर अकाली जैसी उग्रवादी धारा कांग्रेस और गांधी की अहिंसक नीति से अलग थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अकाली आंदोलन को एक पूर्णतः एकरूप राजनीतिक धारा के रूप में देखना उचित नहीं है। इसके भीतर अहिंसक गुरुद्वारा सुधारवादी, राजनीतिक अकाली और उग्रवादी बब्बर अकाली जैसी अलग-अलग प्रवृत्तियाँ मौजूद थीं।

राष्ट्रीय आंदोलन पर अकाली आंदोलन का प्रभाव

➣ अकाली आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को संगठित जन-सत्याग्रह, सामूहिक गिरफ्तारी और अनुशासित अहिंसक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रदान किया। गुरु का बाग और जैतो जैसे संघर्षों में स्वयंसेवकों ने लंबे समय तक दमन सहते हुए आंदोलन जारी रखा।

➣ इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि धार्मिक एवं सामुदायिक संस्थाओं के सुधार का प्रश्न औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध का माध्यम बन सकता है।

➣ ब्रिटिश सरकार के लिए अकाली आंदोलन इसलिए विशेष चुनौती था क्योंकि इसका आधार केवल शहरी शिक्षित वर्ग नहीं, बल्कि ग्रामीण पंजाब और विशेष रूप से केंद्रीय पंजाब की बड़ी किसान आबादी में भी था।

➣ अकाली आंदोलन की निरंतरता ने पंजाब में राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया और सिख राजनीतिक समुदाय को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि इसकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामुदायिक पहचान बनी रही।

➣ फिर भी अकाली आंदोलन को केवल कांग्रेस का सहयोगी आंदोलन कहना सही नहीं होगा। यह एक स्वतंत्र सिख सुधार एवं राजनीतिक आंदोलन था, जिसने अपनी विशिष्ट मांगों और संगठनात्मक पहचान को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के साथ सहयोग किया। यही इसकी ऐतिहासिक विशिष्टता थी।

आधार SGPC अकाली दल
मुख्य स्वरूप गुरुद्वारा प्रबंधन की प्रतिनिधिक संस्था गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की संगठित आंदोलनकारी शक्ति
मुख्य कार्य गुरुद्वारों का प्रबंधन, धार्मिक संस्थाओं की देखरेख और सुधार SGPC के सुधार कार्यक्रम को लागू करने के लिए स्वयंसेवकों और जत्थों को संगठित करना
भूमिका गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को संस्थागत आधार देना आंदोलन को संगठनात्मक और जन-आंदोलन का आधार देना
आपसी संबंध दोनों एक ही संस्था नहीं थे, लेकिन परस्पर जुड़े हुए थे और उन्होंने मिलकर गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को व्यापक आधार प्रदान किया।

गुरुद्वारा सुधार से संवैधानिक राजनीति की ओर

1926 के SGPC चुनाव के बाद अकाली आंदोलन एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर चुका था। गुरुद्वारा सुधार के संघर्ष से निकली अकाली राजनीति अब SGPC, सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पंजाब की संवैधानिक राजनीति से अधिक गहराई से जुड़ने लगी।

➣ इस दौर में बाबा खड़क सिंह और मास्टर तारा सिंह दो प्रमुख नेताओं के रूप में सामने आए, लेकिन दोनों की राजनीतिक दृष्टि और कार्यशैली में महत्वपूर्ण अंतर विकसित हुआ।

बाबा खड़क सिंह का नेतृत्व और तारा सिंह का उभार (1926–29)

1926 के प्रथम SGPC चुनाव में बाबा खड़क सिंह को अध्यक्ष और मास्टर तारा सिंह को उपाध्यक्ष चुना गया। बाबा खड़क सिंह गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के पुराने और प्रतिष्ठित नेताओं में थे तथा उनका राजनीतिक प्रभाव विशेष रूप से अकाली आंदोलन की प्रारंभिक पंथिक राजनीति में मजबूत था।

➣ दूसरी ओर, मास्टर तारा सिंह अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के नेता के रूप में तेजी से उभर रहे थे। 1926–29 के दौरान SGPC की अनेक बैठकों में उनकी सक्रिय भूमिका रही और वे संगठन के दैनिक राजनीतिक कार्यों तथा अकाली गतिविधियों में लगातार अधिक प्रभावशाली होते गए।

➣ बाबा खड़क सिंह की राजनीति में ब्रिटिश सरकार के प्रति कठोर विरोध और पंथिक स्वायत्तता पर विशेष जोर था। वे अकाली आंदोलन को औपनिवेशिक सत्ता के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रखने के पक्षधर थे।

➣ इसके विपरीत तारा सिंह ने सिख राजनीतिक हितों को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन और भावी संवैधानिक व्यवस्था के प्रश्नों से जोड़ने की दिशा में अधिक सक्रिय रुख अपनाया।

➣ इस अवधि में तारा सिंह का ध्यान केवल गुरुद्वारा प्रबंधन तक सीमित नहीं रहा। वे यह मानने लगे थे कि गुरुद्वारा सुधार के बाद सिख राजनीति का अगला महत्वपूर्ण प्रश्न सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा है। इसलिए वे भारत के भावी संविधान और पंजाब में सिखों की राजनीतिक स्थिति से जुड़े प्रश्नों पर अधिक सक्रिय होने लगे।

1927–28 के दौरान भारत के भावी संवैधानिक सुधारों को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हुईं। सिख नेतृत्व के भीतर यह चिंता बढ़ने लगी कि यदि भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था केवल बहुसंख्यक समुदाय के राजनीतिक हितों पर आधारित हुई, तो पंजाब में सिखों की स्थिति कमजोर हो सकती है।

➣ इसी दौर में पटियाला रियासत के महाराजा से संबंधित राजनीतिक प्रश्नों ने भी अकाली राजनीति को प्रभावित किया। अकाली नेतृत्व रियासतों में सिख धार्मिक एवं राजनीतिक हितों तथा शासकों के हस्तक्षेप से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय था।

➣ इन गतिविधियों ने तारा सिंह की राजनीतिक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया और वे अकाली राजनीति के अधिक सक्रिय नेताओं में शामिल हो गए। इस प्रकार 1926–29 का काल अकाली नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का दौर था।

बाबा खड़क सिंह पुराने अकाली नेतृत्व के प्रमुख प्रतिनिधि बने रहे, जबकि मास्टर तारा सिंह नई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप सिख प्रतिनिधित्व और संवैधानिक राजनीति को अधिक महत्व देने वाले नेता के रूप में उभरते गए।

पहलू बाबा खड़क सिंह मास्टर तारा सिंह
राजनीतिक दृष्टिकोण पंथिक स्वायत्तता और सिख हितों की स्वतंत्र राजनीतिक रक्षा पर अधिक जोर। सिख हितों की रक्षा के साथ राष्ट्रीय आंदोलन और संवैधानिक राजनीति में सक्रिय भागीदारी पर जोर।
ब्रिटिश सरकार के प्रति रुख ब्रिटिश शासन के प्रति अधिक कठोर और असहयोगात्मक रुख। ब्रिटिश विरोध के साथ परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक एवं संवैधानिक माध्यमों के उपयोग के पक्षधर।
कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण कांग्रेस के प्रति अधिक अविश्वास और आलोचनात्मक रुख। सिख हितों की संवैधानिक सुरक्षा के आश्वासन के आधार पर कांग्रेस के साथ सहयोग के पक्षधर।
सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व सिखों के लिए स्वतंत्र और स्पष्ट राजनीतिक अधिकारों तथा सुरक्षा पर जोर। सिख प्रतिनिधित्व को व्यापक भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के भीतर सुरक्षित कराने पर जोर।
राजनीतिक कार्यशैली अधिक स्वतंत्र, कठोर और पंथिक दबाव की राजनीति। संगठनात्मक राजनीति, राष्ट्रीय आंदोलन और संवैधानिक वार्ता-तीनों के संयोजन पर जोर।
1926–29 में स्थिति अकाली आंदोलन के पुराने और प्रमुख नेतृत्व का प्रतिनिधित्व। नई पीढ़ी के नेता के रूप में तेजी से प्रभावशाली होते गए।
दीर्घकालिक प्रभाव प्रारंभिक अकाली पंथिक एवं स्वतंत्र राजनीतिक परंपरा को मजबूत किया। आगे चलकर अकाली दल को व्यापक सिख राजनीतिक और संवैधानिक आंदोलन से जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई।

नेहरू रिपोर्ट और सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व

➣ अखिल भारतीय स्तर पर भारत के भावी संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए बनी मोतीलाल नेहरू समिति में सिख पक्ष का प्रतिनिधित्व सरदार मंगल सिंह ने किया था।

➣ नेहरू रिपोर्ट की सामुदायिक व्यवस्था का सिख नेतृत्व ने विशेष रूप से विरोध किया। रिपोर्ट का मूल दृष्टिकोण संयुक्त निर्वाचन और सीमित आरक्षण पर आधारित था तथा पंजाब में सिखों को उनकी राजनीतिक स्थिति के अनुरूप अतिरिक्त प्रतिनिधित्व देने की मांग स्वीकार नहीं की गई।

➣ सिख नेताओं का तर्क था कि पंजाब में उनकी संख्या अल्पसंख्यक होने के कारण केवल सामान्य बहुमत की व्यवस्था उनके राजनीतिक हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं कर सकती।

मास्टर तारा सिंह और ज्ञानी शेर सिंह ने नेहरू रिपोर्ट के प्रति अपना विरोध दर्ज कराया। बाबा खड़क सिंह, जो उस समय SGPC और सेंट्रल सिख लीग के प्रमुख नेताओं में थे, ने भी रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।

➣ उनके विरोध का एक प्रमुख आधार यह था कि प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था सिखों को पंजाब में किसी एक समुदाय के राजनीतिक प्रभुत्व से पर्याप्त सुरक्षा नहीं देती थी।

➣ सिख नेतृत्व ने 1928 के सर्वदलीय सम्मेलनों में अपनी मांगों को संशोधित रूप में स्वीकार कराने का प्रयास किया, लेकिन दिसंबर 1928 के कलकत्ता सम्मेलन तक भी सिखों की प्रमुख मांगों पर सहमति नहीं बन सकी।

➣ परिणामस्वरूप सिख नेताओं ने सम्मेलन की कार्यवाही से स्वयं को अलग कर लिया। इसके बाद सिख राजनीतिक नेतृत्व और कांग्रेस के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए।

1929 का लाहौर कांग्रेस अधिवेशन और सिख आश्वासन

दिसंबर 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में सिख असंतोष को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपनी स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।

➣ कांग्रेस ने आश्वासन दिया कि भविष्य के भारतीय संविधान में सिखों, मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों से संबंधित कोई भी संवैधानिक व्यवस्था उनकी संतुष्टि के बिना स्वीकार नहीं की जाएगी। यह आश्वासन सिख राजनीतिक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण था।

➣ इस आश्वासन के बाद मास्टर तारा सिंह ने कांग्रेस के साथ सहयोग की नीति अपनाने का निर्णय लिया। इसके विपरीत बाबा खड़क सिंह कांग्रेस के प्रति अधिक आलोचनात्मक रहे और उन्होंने कांग्रेस के बहिष्कार की नीति को अपनाया।

➣ इस आश्वासन के बाद मास्टर तारा सिंह ने कांग्रेस के साथ सहयोग की नीति अपनाने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि सिखों के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से पूरी तरह अलग रहने की अपेक्षा कांग्रेस के साथ सहयोग करते हुए अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से रखना अधिक उपयोगी हो सकता है।

➣ इसके विपरीत बाबा खड़क सिंह कांग्रेस के प्रति अधिक आलोचनात्मक रहे और उन्होंने कांग्रेस के बहिष्कार की नीति को अपनाया। यह मतभेद आगे चलकर अकाली राजनीति में तारा सिंह के नेतृत्व के उभार का महत्वपूर्ण आधार बना।

1930 तक मास्टर तारा सिंह का प्रभाव अकाली राजनीति में तेजी से बढ़ चुका था। वे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

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➣ b>1930 में वे SGPC के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और इस प्रकार बाबा खड़क सिंह के स्थान पर अकाली-सिख राजनीति के प्रमुख संगठनात्मक नेता बनकर उभरे।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और अकाली दल (1930–31)

➣ 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में सिखों को दिए गए संवैधानिक आश्वासन के बाद मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में अकाली राजनीति का एक प्रभावशाली वर्ग कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन के साथ सहयोग करने की दिशा में आगे बढ़ा।

मास्टर तारा सिंह ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने पेशावर में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे पठान सत्याग्रहियों की सहायता के लिए एक अकाली जत्थे का नेतृत्व किया।

इस कार्रवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इससे तारा सिंह की छवि केवल सिख धार्मिक-राजनीतिक नेता की न रहकर ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रीय संघर्ष में सक्रिय नेता के रूप में भी मजबूत हुई।

➣ तारा सिंह की गिरफ्तारी के बाद भी अकाली कार्यकर्ताओं की राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी जारी रही। अकाली स्वयंसेवकों और सेंट्रल सिख लीग से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सविनय अवज्ञा में भाग लिया। इससे पंजाब में राष्ट्रीय आंदोलन और सिख राजनीतिक गतिविधियों के बीच संपर्क और मजबूत हुआ।

➣ हालांकि अकाली दल का राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोग कांग्रेस की राजनीति के साथ पूर्ण वैचारिक एकीकरण नहीं था। अकाली नेतृत्व लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि स्वतंत्रता के साथ-साथ सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पंजाब में उनके हितों और भावी संवैधानिक सुरक्षा का प्रश्न भी हल किया जाना चाहिए।

➣ इस चरण का महत्व इसलिए भी था कि मास्टर तारा सिंह का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। वे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

➣ 1930 में SGPC के अध्यक्ष बनने और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वे सिख धार्मिक संस्थाओं और राजनीतिक आंदोलन-दोनों में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरने लगे।

➣ धीरे-धीरे उन्होंने बाबा खड़क सिंह की जगह अकाली-सिख राजनीति के प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

गोलमेज सम्मेलन का दौर (1930–32)

प्रथम गोलमेज सम्मेलन

प्रथम गोलमेज सम्मेलन (12 नवंबर 1930–19 जनवरी 1931) में सिखों का प्रतिनिधित्व सरदार उज्जल सिंह और सरदार संपूर्ण सिंह ने किया। इस समय मास्टर तारा सिंह जेल में थे।

➣ सिख राजनीतिक संगठनों ने सम्मेलन के प्रति पूरी तरह उत्साह नहीं दिखाया और स्वशासन के स्पष्ट आश्वासन के अभाव में इसका बहिष्कार करने की नीति अपनाई। इसके बावजूद सम्मेलन में भाग लेने वाले सिख प्रतिनिधियों ने पंजाब में सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया।

➣ प्रथम सम्मेलन में सिखों की मुख्य चिंता यह थी कि भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था में पंजाब के राजनीतिक ढाँचे को इस प्रकार बनाया जाए कि सिखों को स्थायी राजनीतिक अधीनता का सामना न करना पड़े।

➣ इसलिए सिख प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं था, बल्कि मंत्रिमंडल, प्रशासनिक सेवाओं और संवैधानिक संस्थाओं में भागीदारी से भी जुड़ा हुआ था।

➣ प्रथम सम्मेलन में सिख प्रतिनिधित्व का प्रश्न निर्णायक रूप से हल नहीं हो सका। इससे अकाली नेतृत्व को यह अनुभव हुआ कि केवल सरकारी नामांकन के माध्यम से सिखों के हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं हो सकती।

➣ परिणामस्वरूप अगले सम्मेलन के लिए अकाली दल ने अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अधिक स्पष्ट रूप से स्थापित करने का प्रयास किया।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर–1 दिसंबर 1931) सिख राजनीति की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण था। इस सम्मेलन के लिए अकाली दल ने मास्टर तारा सिंह को अपना प्रतिनिधि बनाने का निर्णय किया।

➣ हालांकि मास्टर तारा सिंह को सम्मेलन के आधिकारिक सिख प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। ब्रिटिश सरकार ने अपनी आधिकारिक प्रतिनिधि-व्यवस्था के अंतर्गत पुनः उज्जल सिंह और संपूर्ण सिंह को सिख प्रतिनिधियों के रूप में रखा।

➣ इस दौरान मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में सिख प्रतिनिधिमंडल ने अपनी 17 सूत्रीय मांगें सामने रखीं। इन मांगों का मूल उद्देश्य ऐसी संवैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित करना था जिसमें सिखों को पंजाब और केंद्र दोनों स्तरों पर प्रभावी राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त हो।

➣ सिखों की प्रमुख मांग थी कि पंजाब विधानमंडल में उन्हें 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया जाए। यह मांग उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक थी और इसका आधार केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि पंजाब के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सैनिक जीवन में सिखों की भूमिका और उनके योगदान को माना गया था।

➣ सिख नेतृत्व ने पंजाब के मंत्रिमंडल और लोक सेवा आयोग में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व की भी मांग की। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्रांतीय प्रशासन और उच्च सरकारी सेवाओं में सिख समुदाय की पर्याप्त भागीदारी बनी रहे।

➣ सिखों ने एक वैकल्पिक संवैधानिक व्यवस्था के रूप में पंजाब की सीमाओं में पुनर्गठन का प्रस्ताव भी रखा। मांग थी कि यदि पंजाब में सामुदायिक संतुलन के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था संभव नहीं है, तो कुछ मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को पंजाब से अलग कर सामुदायिक संतुलन वाला पंजाब बनाया जाए।

➣ ऐसी स्थिति में संयुक्त निर्वाचन और बिना आरक्षण की व्यवस्था स्वीकार करने की बात कही गई। यह मांग सिख नेतृत्व की उस चिंता को दिखाती है कि वे स्थायी सांप्रदायिक बहुमत के अधीन राजनीतिक व्यवस्था स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

➣ सिख मांगों में पंजाबी को पंजाब की आधिकारिक भाषा बनाने तथा गुरुमुखी लिपि के अध्ययन की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग भी शामिल थी।

➣ केंद्रीय स्तर पर सिख नेतृत्व ने केंद्रीय विधानमंडल में 5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व, केंद्रीय मंत्रिमंडल में कम-से-कम एक सिख सदस्य, केंद्रीय लोक सेवा आयोग तथा अखिल भारतीय सेवाओं में प्रभावी सिख प्रतिनिधित्व और सेना में सिखों की पारंपरिक भागीदारी बनाए रखने की मांग की।

➣ सिखों ने यह भी मांग की कि भविष्य के संविधान में उनके लिए जो भी संवैधानिक सुरक्षा निर्धारित किए जाएँ, उन्हें सिखों की स्पष्ट सहमति के बिना समाप्त या संशोधित न किया जाए। यह मांग सिख नेतृत्व की उस आशंका को दर्शाती थी कि भविष्य की बहुमत-आधारित राजनीति में एक बार प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा को आसानी से बदला जा सकता है।

➣ गोलमेज सम्मेलन के दौरान सिखों की राजनीतिक मांगों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे स्वयं को केवल एक धार्मिक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि विशिष्ट राजनीतिक हितों वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। अकाली नेतृत्व चाहता था कि स्वतंत्र भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था में सिखों की स्थिति केवल संख्या के आधार पर निर्धारित न हो।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन

तृतीय गोलमेज सम्मेलन (17 नवंबर–24 दिसंबर 1932) तक आते-आते सिखों की संवैधानिक मांगों में कोई निर्णायक समाधान नहीं निकल पाया था। इस सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में सीमित था और सिख प्रश्न पर भी कोई ऐसा समझौता नहीं हुआ जो अकाली नेतृत्व की प्रमुख मांगों को स्वीकार करता।

➣ इसलिए तीसरे सम्मेलन का महत्व मुख्यतः इस बात में था कि इससे पहले उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन सिख राजनीतिक सुरक्षा का प्रश्न अनसुलझा रहा।

➣ गोलमेज सम्मेलनों की विफलता के बाद सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न आगे चलकर सामुदायिक निर्णय (1932) और फिर भारत शासन अधिनियम (1935) के संदर्भ में सामने आया।

➣ इस प्रकार 1930–32 का गोलमेज सम्मेलन काल अकाली दल के लिए एक महत्वपूर्ण संक्रमणकाल बना, जिसमें उसका ध्यान गुरुद्वारा प्रबंधन से आगे बढ़कर संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक भागीदारी और सिख पहचान की सुरक्षा पर केंद्रित हो गया।

क्षेत्र सिख मांग
पंजाब विधानमंडल 30% प्रतिनिधित्व
पंजाब मंत्रिमंडल 1/3 प्रतिनिधित्व
लोक सेवा आयोग/प्रशासन 1/3 भागीदारी
पंजाब का विकल्प सामुदायिक संतुलन के लिए क्षेत्रीय पुनर्गठन
भाषा पंजाबी को प्रांतीय भाषा
केंद्रीय विधानमंडल 5% प्रतिनिधित्व
केंद्रीय मंत्रिमंडल कम-से-कम 1 सिख सदस्य
सेना युद्ध-पूर्व सिख अनुपात बनाए रखने की मांग
All India Services प्रभावी सिख प्रतिनिधित्व
संवैधानिक सुरक्षा सिखों की सहमति के बिना सुरक्षा में परिवर्तन न हो

1935 का भारत शासन अधिनियम और 1937 के चुनाव

भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता और विस्तृत निर्वाचन व्यवस्था लागू की गई। पंजाब में इस नई व्यवस्था का सिख राजनीति पर विशेष प्रभाव पड़ा, क्योंकि अब अकाली दल के सामने गुरुद्वारा प्रबंधन के साथ-साथ विधानमंडल में सिखों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी प्रमुख हो गया।

➣ पंजाब की सामाजिक संरचना अन्य प्रांतों से कुछ अलग थी। 1931 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिखों की आबादी लगभग 13.2 प्रतिशत थी। इसलिए अकाली नेतृत्व के सामने यह चुनौती थी कि संख्या में अल्पसंख्यक होने के बावजूद सिखों को उनकी राजनीतिक, आर्थिक, सैनिक और सामाजिक भूमिका के अनुरूप पर्याप्त प्रतिनिधित्व कैसे मिले।

1937 के प्रांतीय चुनाव नए अधिनियम और सामुदायिक निर्णय के आधार पर कराए गए। पंजाब में कुल 175 सीटों वाली विधानसभा थी, जिसमें सिखों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र और आरक्षित सीटों की व्यवस्था थी। इस चुनाव ने अकाली दल को पहली बार नए संवैधानिक ढाँचे के भीतर अपनी पंथिक राजनीतिक शक्ति को प्रत्यक्ष रूप से परखने का अवसर दिया।

4 जनवरी 1937 को हुए चुनावों में अकाली दल ने 14 सिख सीटों पर चुनाव लड़ा और उनमें से 10 सीटों पर विजय प्राप्त की। कुल मिलाकर विधानसभा में अकाली दल के 11 सदस्य पहुँचे। सिख सीटों में खालसा नेशनल पार्टी ने 13 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 5 सिख सीटों पर सफलता प्राप्त की। इस प्रकार सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व स्वयं कई दलों में विभाजित रहा और अकाली दल सिख राजनीति की एकमात्र प्रतिनिधि शक्ति नहीं बन सका।

➣ चुनाव के बाद यूनियनिस्ट पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी और उसने लगभग 98–99 सीटों के समर्थन से सरकार बनाई। अकाली दल सरकार में शामिल होने के बजाय विधानसभा में विपक्ष में बैठा और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार का विरोध किया।

➣ इससे अकाली दल की भूमिका केवल धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन तक सीमित न रहकर संसदीय विपक्ष और सिख राजनीतिक हितों के प्रतिनिधि के रूप में विकसित होने लगी।

➣ 1937 के चुनावों का अकाली दल के लिए एक महत्वपूर्ण सबक यह था कि SGPC पर नियंत्रण और गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की विरासत अपने आप में पंजाब की विधानमंडलीय राजनीति में पर्याप्त नहीं थी। सिख समुदाय के भीतर अकाली दल के अलावा खालसा नेशनल पार्टी जैसे राजनीतिक समूह भी प्रभावशाली थे।

➣ इसलिए अकाली नेतृत्व को सिख राजनीतिक मतदाताओं के बीच अपना प्रभाव और मजबूत करने तथा पंजाब की सत्ता-राजनीति में अपनी स्वतंत्र भूमिका विकसित करने की आवश्यकता महसूस हुई।

1937 का सिकंदर-जिन्ना समझौता और अकाली दल की चिंता

1937 के चुनावों के बाद पंजाब की राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन सिकंदर-जिन्ना समझौते के रूप में सामने आया।

➣ पंजाब के प्रीमियर सर सिकंदर हयात खान और मुहम्मद अली जिन्ना के बीच हुए सिकंदर-जिन्ना समझौते से मुस्लिम लीग को पंजाब में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला। साथ ही, यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच भी राजनीतिक संबंधों का नया दौर शुरू हुआ।

➣ अकाली नेतृत्व के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पंजाब में मुस्लिम राजनीतिक शक्ति पहले से ही मजबूत थी। यदि यूनियनिस्ट राजनीति और मुस्लिम लीग के बीच निकटता बढ़ती, तो अकालियों को आशंका थी कि भविष्य में सिखों के राजनीतिक हित और प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ सकते हैं। इसलिए अकाली दल ने पंजाब की राजनीति में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाए रखने पर अधिक जोर दिया।

➣ अकाली नेतृत्व की चिंता केवल विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं थी। उसके लिए सरकारी नौकरियों, प्रशासनिक पदों, मंत्रिमंडल, स्थानीय संस्थाओं और पंजाब की भावी संवैधानिक व्यवस्था में सिखों की स्थिति भी महत्वपूर्ण थी।

➣ इस अवधि में अकाली दल ने यह समझ लिया कि पंजाब में सिखों की राजनीतिक स्थिति बनाए रखने के लिए केवल किसी एक बड़े राजनीतिक दल के साथ स्थायी गठबंधन पर्याप्त नहीं होगा। उसे अपनी स्वतंत्र पंथिक राजनीतिक पहचान बनाए रखते हुए परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के साथ संबंध स्थापित करने होंगे।

शहीदगंज विवाद और अकाली राजनीति

शहीदगंज विवाद लाहौर में स्थित एक धार्मिक स्थल को लेकर सिखों और मुसलमानों के बीच उत्पन्न हुआ महत्वपूर्ण विवाद था, जिसने 1930 के दशक में पंजाब की राजनीति और विशेष रूप से अकाली राजनीति को प्रभावित किया।

➣ यह विवाद केवल धार्मिक स्थल के स्वामित्व का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि आगे चलकर सिख धार्मिक अधिकार, SGPC की भूमिका और सामुदायिक राजनीतिक हितों से जुड़ गया।

➣ विवादित परिसर में एक पुरानी मस्जिद की इमारत तथा उसके निकट गुरुद्वारा शहीदगंज से संबंधित धार्मिक दावे थे। सिख पक्ष के लिए यह स्थान भाई तारू सिंह तथा अन्य सिख शहीदों की स्मृति से जुड़ा हुआ था, जबकि मुस्लिम पक्ष पुराने मस्जिद अधिकार का दावा करता था। औपनिवेशिक न्यायालयों में इस स्थल को लेकर पहले भी लंबे समय से मुकदमे चलते रहे थे।

1925 के सिख गुरुद्वारा अधिनियम के बाद विवादित स्थल का प्रबंधन SGPC के अधिकार क्षेत्र में आ गया। इसके बाद स्थल पर सिख प्रबंधन और पुराने मुस्लिम दावे के बीच विवाद बना रहा। 1935 में यह विवाद अचानक अत्यंत गंभीर रूप ले गया।

29 जून 1935 को सिख पक्ष द्वारा पुरानी मस्जिद की इमारत को हटाने की घोषणा के बाद लाहौर में तनाव बढ़ गया। ब्रिटिश पंजाब सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने और समझौता कराने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी।

➣ अंततः 7 जुलाई 1935 की रात विवादित मस्जिद की इमारत को गिरा दिया गया। इस घटना के बाद लाहौर में व्यापक सांप्रदायिक तनाव और हिंसक घटनाएँ हुईं तथा प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठाने पड़े।

➣ इस घटना ने अकाली राजनीति को भी प्रभावित किया। SGPC के नियंत्रण में आने वाले धार्मिक स्थल पर हुई कार्रवाई ने सिख धार्मिक संस्थाओं के अधिकार और उनकी रक्षा को अकाली नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न बना दिया। साथ ही अकाली नेताओं को यह अनुभव हुआ कि धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवाद अब सीधे सिख सामुदायिक राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

➣ विवाद के बाद मुस्लिम पक्ष ने न्यायालय का रास्ता अपनाया और 30 अक्टूबर 1935 को लाहौर के जिला न्यायालय में SGPC तथा संबंधित गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के विरुद्ध मुकदमा दायर किया गया।

➣ इसमें विवादित स्थल को मस्जिद घोषित करने, मुस्लिमों के पूजा-अधिकार को मान्यता देने तथा मस्जिद की इमारत के पुनर्निर्माण की मांग की गई।

25 मई 1936 को लाहौर के जिला न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद मामले को लाहौर उच्च न्यायालय में अपील के रूप में ले जाया गया।

➣ उच्च न्यायालय ने भी 26 जनवरी 1938 को निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा। हालांकि न्यायमूर्ति दीन मोहम्मद ने इस निर्णय से असहमति व्यक्त की।

➣ इसके बाद मामला ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्च न्यायिक संस्था प्रिवी काउंसिल तक पहुँचा। 2 मई 1940 को प्रिवी काउंसिल ने मुस्लिम पक्ष की अपील खारिज कर दी। इस निर्णय ने लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद को निर्णायक रूप से समाप्त कर दिया और पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों को प्रभावी बनाए रखा।

➣ शहीदगंज विवाद का अकाली राजनीति पर महत्व केवल न्यायालय के निर्णय तक सीमित नहीं था। इसने अकाली नेतृत्व में सिख धार्मिक स्थलों, SGPC के अधिकार और सामुदायिक हितों की राजनीतिक सुरक्षा के प्रश्न को और मजबूत किया।

➣ गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बाद SGPC केवल धार्मिक प्रबंधन की संस्था नहीं रह गई थी। उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़े विवाद अब व्यापक सिख राजनीति का हिस्सा बनने लगे थे।

➣ इस विवाद ने पंजाब में सामुदायिक राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ाया। 1930 के दशक के उत्तरार्ध में सिख-मुस्लिम संबंधों में बढ़ते तनाव के बीच शहीदगंज विवाद एक प्रतीकात्मक मुद्दा बन गया।

➣ बाद के वर्षों में जब पंजाब के राजनीतिक भविष्य और सिखों की संवैधानिक सुरक्षा पर बहस तेज हुई, तब ऐसे धार्मिक विवादों की स्मृति ने अकाली नेतृत्व की राजनीतिक चिंताओं को और प्रभावित किया।

लाहौर प्रस्ताव, 1940 और सिख राजनीतिक चिंता

23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे बाद में लाहौर प्रस्ताव अथवा पाकिस्तान प्रस्ताव कहा गया। प्रस्ताव में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को समूहों के रूप में संगठित कर उनके लिए स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों की स्थापना की मांग की गई। पंजाब इस प्रस्तावित व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था।

➣ इस प्रस्ताव ने सिख राजनीतिक नेतृत्व के सामने पंजाब के भविष्य का प्रश्न अत्यंत गंभीर बना दिया। पंजाब में सिख महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति रखते थे, लेकिन वे जनसंख्या की दृष्टि से बहुसंख्यक नहीं थे।

इसलिए अकाली नेतृत्व को आशंका हुई कि यदि पंजाब किसी मुस्लिम-बहुल राजनीतिक इकाई का हिस्सा बनता है, तो सिखों को स्थायी राजनीतिक अल्पसंख्यक की स्थिति में रहना पड़ सकता है।

पाकिस्तान की मांग का अकाली दल द्वारा विरोध

मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व ने पाकिस्तान की मांग का स्पष्ट विरोध किया। उनका मुख्य तर्क यह था कि प्रस्तावित पाकिस्तान में पंजाब के सिखों के धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हित पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं रहेंगे।

➣ तारा सिंह के लिए प्रश्न केवल यह नहीं था कि पंजाब भारत में रहेगा या पाकिस्तान में जाएगा। मूल प्रश्न यह था कि सिखों को ऐसी राजनीतिक व्यवस्था कैसे मिले जिसमें वे किसी स्थायी बहुमत के अधीन राजनीतिक रूप से असुरक्षित न हों। इसीलिए 1940 के बाद अकाली राजनीति में सिख राजनीतिक स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा की चर्चा पहले की तुलना में अधिक प्रमुख हो गई।

➣ तारा सिंह ने इसी संदर्भ में स्पष्ट किया कि सिखों का उद्देश्य केवल मालिक बदलना नहीं था। वे ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता चाहते थे, लेकिन ऐसी स्वतंत्रता नहीं जिसमें ब्रिटिश प्रभुत्व समाप्त होने के बाद सिख किसी दूसरे राजनीतिक प्रभुत्व के अधीन चले जाएँ। इस विचार को उनके प्रसिद्ध कथन freedom, not a change of masters में संक्षेपित किया गया है।

➣ पाकिस्तान की मांग के बढ़ते प्रभाव के बीच अकाली दल ने कांग्रेस के साथ सहयोग की संभावनाओं को भी बनाए रखा, लेकिन उसका समर्थन सिख हितों की संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ था। अकाली नेतृत्व चाहता था कि स्वतंत्र भारत की किसी भी भावी व्यवस्था में सिखों की राजनीतिक स्थिति के संबंध में स्पष्ट आश्वासन दिया जाए।

➣ इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव (1940) से पहले सिख राजनीतिक आंदोलन का प्रमुख जोर गुरुद्वारा सुधार, SGPC और प्रतिनिधित्व पर था। लेकिन 1940 के बाद प्रश्न अधिक व्यापक हो गया-स्वतंत्र भारत में सिखों की राजनीतिक स्थिति क्या होगी और पंजाब का भविष्य किस प्रकार निर्धारित किया जाएगा?

क्रिप्स मिशन और अकाली मांगें (1942)

मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भारत भेजा। अकाली नेतृत्व ने इस प्रस्ताव को विशेष रूप से पंजाब और सिखों के राजनीतिक भविष्य के दृष्टिकोण से देखा।

➣ सिख नेतृत्व की मुख्य चिंता यह थी कि प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था में यदि प्रांतों को भविष्य में भारतीय संघ से अलग होने का विकल्प मिलता है, तो पंजाब के मुस्लिम-बहुल स्वरूप के कारण सिखों को ऐसी राजनीतिक इकाई में रहना पड़ सकता है जहाँ वे स्थायी अल्पसंख्यक बन जाएँ।

मास्टर तारा सिंह इस संभावना से विशेष रूप से चिंतित थे कि सिखों को ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में डाल दिया जाएगा जिसमें वे भविष्य में अपने राजनीतिक भाग्य का स्वतंत्र रूप से निर्धारण नहीं कर सकेंगे।

➣ इसलिए उन्होंने क्रिप्स मिशन के सामने सिखों की स्थिति को अलग से स्पष्ट करने और उनके लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

➣ सिख राजनीतिक नेतृत्व ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि पंजाब के भविष्य का निर्णय केवल उसकी बहुसंख्यक आबादी के आधार पर नहीं किया जा सकता। सिखों के ऐतिहासिक अधिकार, उनकी धार्मिक संस्थाएँ, कृषि एवं आर्थिक हित, सैन्य योगदान और पंजाब के सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका को भी संवैधानिक व्यवस्था में ध्यान में रखा जाना चाहिए।

➣ क्रिप्स मिशन के दौरान सिख राजनीतिक संगठनों ने अपने मत को संगठित रूप से प्रस्तुत करने के लिए सिख ऑल-पार्टियों कमेटी के माध्यम से क्रिप्स को ज्ञापन दिया।

➣ इस ज्ञापन का उद्देश्य सिखों की उस स्थिति को स्पष्ट करना था जिसे वे प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था में असुरक्षित मान रहे थे। इस समिति में विभिन्न सिख राजनीतिक धाराओं को साथ लाने का प्रयास किया गया था।

➣ ज्ञापन में सिखों की प्रमुख चिंता पंजाब की राजनीतिक संरचना और सिखों की संवैधानिक सुरक्षा थी। सिख नेतृत्व चाहता था कि किसी भी भावी संवैधानिक व्यवस्था में पंजाब के संबंध में ऐसा निर्णय न लिया जाए जिससे सिखों को उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी मुस्लिम-बहुल राजनीतिक इकाई में सम्मिलित होना पड़े।

➣ इस प्रकार क्रिप्स मिशन के दौरान अकाली राजनीति का मुख्य जोर केवल ब्रिटिश सत्ता से स्वतंत्रता प्राप्त करने पर नहीं था। उसका दूसरा समान रूप से महत्वपूर्ण पक्ष था-स्वतंत्रता के बाद सिखों की राजनीतिक स्थिति और सुरक्षा सुनिश्चित करना

मास्टर तारा सिंह और आजाद पंजाब की अवधारणा

➣ क्रिप्स मिशन की विफलता और पाकिस्तान की संभावना से बढ़ती चिंता के बीच 1942–43 में मास्टर तारा सिंह और कुछ अन्य अकाली नेताओं ने आजाद पंजाब की योजना को आगे बढ़ाया। इसका उद्देश्य ऐसे पंजाब की कल्पना करना था जिसमें सिखों को किसी स्थायी मुस्लिम बहुमत के अधीन न रहना पड़े।

➣ आजाद पंजाब का प्रस्ताव तत्काल एक स्वतंत्र सिख राष्ट्र की स्पष्ट मांग नहीं था। इसका मूल उद्देश्य पंजाब की क्षेत्रीय सीमाओं में परिवर्तन के माध्यम से ऐसी राजनीतिक संरचना तैयार करना था जिसमें सिखों की स्थिति अधिक सुरक्षित हो।

➣ इस योजना को अकाली नेतृत्व के सभी नेताओं का समान समर्थन नहीं मिला। बाबा खड़क सिंह और संत सिंह जैसे कुछ प्रमुख सिख नेता इसके प्रति सहमत नहीं थे।

➣ फिर भी आजाद पंजाब की अवधारणा का महत्व इस बात में था कि इसने अकाली राजनीति को सिर्फ पाकिस्तान के विरोध से आगे बढ़ाकर सिखों के लिए एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था की तलाश की दिशा में आगे बढ़ाया।

➣ क्रिप्स मिशन के असफल होने के बाद मास्टर तारा सिंह की चिंता और बढ़ गई कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत से सत्ता हस्तांतरित करती है और पंजाब की राजनीतिक संरचना वर्तमान रूप में बनी रहती है, तो सिखों को भविष्य में गंभीर राजनीतिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अकाली राजनीति में सिख राजनीतिक स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा का प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

➣ इसी समय सी. राजगोपालाचारी द्वारा पाकिस्तान के प्रश्न पर समझौते की संभावना तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं के रुख ने भी तारा सिंह की चिंता को बढ़ाया।

➣ उन्हें आशंका हुई कि यदि कांग्रेस किसी संशोधित व्यवस्था के अंतर्गत पाकिस्तान की मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाती है, तो पंजाब के सिखों के हितों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाएगी।

➣ इसके परिणामस्वरूप अकाली नेतृत्व ने सिखों के लिए अलग राजनीतिक इकाई की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार करना शुरू किया। आगे चलकर यदि पाकिस्तान की स्थापना की संभावना वास्तविक होती है, तो सिखों के लिए एक पृथक क्षेत्र या राजनीतिक इकाई की मांग को अधिक स्पष्ट रूप दिया गया।

शिमला सम्मेलन (1945) और सिख प्रतिनिधित्व

लॉर्ड वेवेल की योजना के आधार पर 25 जून से 14 जुलाई 1945 तक शिमला में सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य युद्ध के बाद भारत की संवैधानिक व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना तथा वायसराय की कार्यकारिणी का पुनर्गठन करना था।

➣ सिख राजनीति के लिए यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार युद्धोत्तर भारत की भावी सत्ता-व्यवस्था में सिखों की राजनीतिक स्थिति और प्रतिनिधित्व पर प्रत्यक्ष चर्चा का अवसर सामने आया।

मास्टर तारा सिंह ने शिमला सम्मेलन में सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व किया। उनके लिए सम्मेलन का मुख्य प्रश्न केवल नई कार्यकारिणी में एक-दो सिख सदस्यों की नियुक्ति नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि स्वतंत्र भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था में सिखों के राजनीतिक हितों को पर्याप्त सुरक्षा मिले।

➣ अकाली नेतृत्व की चिंता का मूल कारण पंजाब की जनसांख्यिकीय स्थिति थी। पंजाब में सिख एक महत्वपूर्ण सामाजिक एवं राजनीतिक समुदाय थे, लेकिन वे बहुसंख्यक नहीं थे।

➣ इसलिए तारा सिंह चाहते थे कि सिखों की राजनीतिक स्थिति केवल जनसंख्या के अनुपात से निर्धारित न हो, बल्कि पंजाब में उनके ऐतिहासिक, आर्थिक, सैनिक और सामाजिक योगदान को भी ध्यान में रखा जाए।

वेवेल योजना के अनुसार वायसराय की नई कार्यकारिणी में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी थी और प्रमुख समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया जाना था।

➣ लेकिन अकाली नेतृत्व के लिए समस्या यह थी कि प्रस्तावित व्यवस्था में सिखों की स्थिति को स्पष्ट और पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा के साथ परिभाषित नहीं किया गया था।

➣ मास्टर तारा सिंह का दृष्टिकोण था कि सिखों को केवल किसी एक प्रतिनिधि के नामांकन से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। वे चाहते थे कि सिखों को भविष्य की शासन-व्यवस्था में ऐसा राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले जिससे वे अपने सामुदायिक हितों की प्रभावी रक्षा कर सकें।

➣ यह मांग 1930–32 के गोलमेज सम्मेलनों और 1944 के अखिल भारतीय अकाली सम्मेलन में उठाए गए सिख संवैधानिक अधिकारों के प्रश्न की ही आगे की कड़ी थी।

➣ शिमला सम्मेलन अंततः किसी समझौते पर नहीं पहुँच सका। मुख्य विवाद इस बात पर केंद्रित हो गया कि वायसराय की नई कार्यकारिणी में मुस्लिम सदस्यों को नामित करने का अधिकार किस राजनीतिक संगठन के पास होगा। इस विवाद के कारण सम्मेलन विफल हो गया।

➣ यद्यपि सम्मेलन की विफलता का प्रत्यक्ष कारण मुस्लिम प्रतिनिधित्व का प्रश्न था, लेकिन इसका सिख राजनीति पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अकाली नेतृत्व को यह अनुभव हुआ कि सिखों की राजनीतिक सुरक्षा का प्रश्न अभी तक निर्णायक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है

➣ सम्मेलन की विफलता के बाद मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व का ध्यान 1945–46 के आम चुनावों की ओर गया। अब चुनाव केवल विधानमंडल में प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं थे, बल्कि सिख समुदाय की राजनीतिक शक्ति और उसकी मांगों के लिए जनसमर्थन को प्रदर्शित करने का माध्यम बन गए।

1945–46 के चुनाव और अकाली दल

➣ सिख राजनीति के लिए इन चुनावों का महत्व इसलिए और बढ़ गया क्योंकि 1940 के लाहौर प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन और शिमला सम्मेलन के बाद अकाली दल यह दिखाना चाहता था कि सिखों की राजनीतिक मांगों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है।

➣ पंजाब में चुनावों के दौरान अकाली दल ने सिख मतदाताओं के सामने मुख्य रूप से सिख राजनीतिक सुरक्षा, पंजाब में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था में सुरक्षा का मुद्दा रखा।

1946 के पंजाब प्रांतीय चुनावों में अकाली दल ने सिख निर्वाचन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया। उसने 22 सिख आरक्षित सीटों में से 22 पर उम्मीदवार खड़े किए और 22 में से 22 सीटें जीतने में सफल रहा। इस परिणाम ने अकाली दल को पंजाब की सिख राजनीति में अत्यंत मजबूत स्थिति प्रदान की।

➣ इस चुनावी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अर्थ यह था कि अकाली दल सिखों की प्रमुख पंथिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया।

➣ इससे मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व को आगामी संवैधानिक वार्ताओं में यह दावा करने का आधार मिला कि पंजाब के राजनीतिक भविष्य से जुड़े प्रश्नों पर सिखों की ओर से अकाली दल की बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

➣ अकाली दल की चुनावी सफलता ने मास्टर तारा सिंह की राजनीतिक स्थिति को भी मजबूत किया। वे अब केवल अकाली संगठन के नेता नहीं, बल्कि पंजाब के भविष्य और सिखों की राजनीतिक सुरक्षा से संबंधित वार्ताओं में प्रभावशाली सिख प्रतिनिधि के रूप में सामने आए।

➣ चुनावों के बाद पंजाब में नई सरकार के गठन का प्रश्न उठा। अकाली दल ने ऐसी किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का समर्थन करने से पहले सिख हितों और राजनीतिक सुरक्षा को प्रमुख आधार बनाया।

➣ उसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सिखों को किसी भी भावी पंजाब या भारतीय संघ में ऐसी स्थिति न मिले जहाँ वे स्थायी रूप से राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएँ।

➣ इस प्रकार 1945–46 के चुनाव अकाली दल के राजनीतिक विकास में निर्णायक चरण बने। 1937 में सीमित चुनावी शक्ति रखने वाला अकाली दल 1946 तक सिख आरक्षित सीटों पर प्रभावशाली चुनावी शक्ति बन चुका था।

➣ इससे उसे कैबिनेट मिशन, संविधान सभा और पंजाब के भविष्य से संबंधित आगामी राजनीतिक वार्ताओं में अपनी मांगें अधिक मजबूती से रखने का आधार मिला।

➣ चुनावों के बाद कैबिनेट मिशन (1946) भारत के संवैधानिक भविष्य का समाधान खोजने के लिए आया। अकाली दल ने कैबिनेट मिशन के सामने सिखों की स्थिति को लेकर अपनी मांगें रखीं और यह स्पष्ट किया कि किसी भी संवैधानिक समझौते में सिखों की सहमति और राजनीतिक सुरक्षा की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

कैबिनेट मिशन योजना और अकाली प्रतिक्रिया (1946)

मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य का समाधान खोजने के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजा। मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी संवैधानिक योजना प्रस्तुत की।

➣ सिख राजनीतिक नेतृत्व ने इस योजना को विशेष रूप से पंजाब में सिखों की भावी स्थिति के दृष्टिकोण से देखा।

➣ कैबिनेट मिशन की योजना में ब्रिटिश भारत से 296 प्रतिनिधियों वाली संविधान सभा का प्रस्ताव था। इनमें 216 सामान्य, 78 मुस्लिम और 4 सिख प्रतिनिधि निर्धारित किए गए थे।

पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और सिंध को Section B में रखा गया था, जिसमें कुल 35 प्रतिनिधि होने थे-9 सामान्य, 22 मुस्लिम और केवल 4 सिख। इस व्यवस्था ने अकाली नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी क्योंकि पंजाब में सिखों को मुस्लिम बहुमत के सामने बहुत सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल रहा था।

➣ योजना में प्रांतों को तीन समूहों में संगठित करने का प्रावधान था। पंजाब को Section B में रखा गया, जिसमें मुस्लिम-बहुल पंजाब के साथ उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और सिंध भी शामिल थे।

➣ अकाली नेतृत्व को आशंका थी कि इस समूह व्यवस्था में पंजाब के सिखों की राजनीतिक स्थिति और कमजोर हो सकती है तथा वे भविष्य के संवैधानिक निर्णयों में पर्याप्त प्रभाव नहीं डाल पाएँगे।

सिखों के लिए संवैधानिक सुरक्षा का प्रश्न

➣ अकाली दल की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि कैबिनेट मिशन ने मुस्लिमों के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा को पर्याप्त महत्व दिया, लेकिन सिखों के लिए उसी स्तर की सुरक्षा का प्रावधान नहीं किया।

➣ सिखों को तीन प्रमुख समुदायों में एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता तो मिली, लेकिन उन्हें ऐसी प्रभावी सुरक्षा या veto नहीं मिला जिससे वे पंजाब के भविष्य से जुड़े किसी निर्णय को अपनी इच्छा के विरुद्ध होने से रोक सकें।

➣ विशेष रूप से अकाली नेतृत्व की चिंता यह थी कि पंजाब में मुस्लिम बहुमत और संविधान सभा में सीमित सिख प्रतिनिधित्व के कारण भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था में सिखों के हित बहुमत के अधीन हो सकते हैं। इसलिए मास्टर तारा सिंह और अन्य अकाली नेताओं ने योजना को सिखों के लिए अस्वीकार्य माना।

मास्टर तारा सिंह ने कैबिनेट मिशन की योजना को सिखों के साथ विश्वासघात के रूप में देखा। उनका मानना था कि योजना ने सिखों की उस मूल चिंता का समाधान नहीं किया था जो 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद लगातार सामने आ रही थी-अर्थात् यदि पंजाब किसी मुस्लिम-बहुल राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनता है तो सिखों की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।

अमृतसर सम्मेलन और सिख विरोध

➣ कैबिनेट मिशन योजना के विरोध को संगठित करने के लिए 9–10 जून 1946 को अमृतसर में एक व्यापक सिख सभा आयोजित की गई। इसमें विभिन्न सिख संगठनों, अकालियों और अन्य सिख प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सभा ने कैबिनेट मिशन की योजना को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि सिखों की सहमति के बिना निर्धारित कोई भी संवैधानिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं होगी

➣ इस सभा में सरदार उज्जल सिंह ने प्रमुख प्रस्ताव रखा, जिसका ज्ञानी करतार सिंह ने समर्थन किया। इसके साथ ही एक Action Committee के गठन का निर्णय लिया गया, जिसे सिख राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए आगे की रणनीति तय करनी थी।

➣ इस समिति में मास्टर तारा सिंह, सरदार बलदेव सिंह, भाई जोध सिंह, जत्थेदार उधम सिंह नागोके, ज्ञानी करतार सिंह और ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर जैसे प्रमुख सिख नेता शामिल थे।

➣ अमृतसर की इस सभा ने यह स्पष्ट कर दिया कि कैबिनेट मिशन योजना के प्रति असंतोष केवल अकाली दल के कुछ नेताओं तक सीमित नहीं था। विभिन्न सिख संगठनों और धाराओं में यह भावना मजबूत थी कि सिखों की सहमति के बिना पंजाब के भविष्य का निर्धारण नहीं किया जाना चाहिए

संविधान सभा और अंतरिम सरकार के बहिष्कार का निर्णय

➣ प्रारंभिक प्रतिक्रिया में अकाली नेतृत्व ने संविधान सभा और अंतरिम सरकार दोनों के बहिष्कार का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और अन्य भारतीय राजनीतिक शक्तियों पर दबाव डालना था कि सिखों की विशेष राजनीतिक स्थिति को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया जाए।

➣ यह निर्णय सिख राजनीति में उस समय की गंभीर निराशा को दर्शाता था। अकाली नेतृत्व का तर्क था कि यदि संविधान सभा की मूल संरचना ही सिखों को पर्याप्त राजनीतिक सुरक्षा नहीं देती, तो उसमें भाग लेकर ऐसी व्यवस्था को वैधता देना सिख हितों के लिए उचित नहीं होगा।

➣ कैबिनेट मिशन योजना के प्रति सिख असंतोष के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने भी माना कि सिखों के साथ अन्याय हुआ है। इससे अकाली नेतृत्व और कांग्रेस के बीच बातचीत की संभावना फिर से बनी।

➣ बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में अकाली दल ने अंततः संविधान सभा और अंतरिम सरकार के पूर्ण बहिष्कार की नीति को बदल दिया। अकाली प्रतिनिधियों ने संविधान सभा में भाग लेने का निर्णय लिया और अंतरिम सरकार में भी सिख प्रतिनिधित्व स्वीकार किया।

बलदेव सिंह और अंतरिम सरकार में सिख प्रतिनिधित्व

16 जून 1946 को कैबिनेट मिशन ने अंतरिम सरकार के गठन से संबंधित प्रस्ताव रखा। इसमें कुल 14 सदस्यों वाली कार्यकारिणी की योजना थी, जिसमें सरदार बलदेव सिंह को भी शामिल किया गया। उन्हें रक्षा विभाग दिया गया।

➣ हालांकि बलदेव सिंह को केवल औपचारिक रूप से सिख समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे अंतरिम सरकार में एक भारतीय राजनीतिक नेता के रूप में शामिल हुए थे।

➣ फिर भी उनका रक्षा सदस्य के रूप में शामिल होना सिख राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे केंद्र की भावी सत्ता-व्यवस्था में सिख नेतृत्व की प्रत्यक्ष भागीदारी स्थापित हुई।

1947 का संकट और पंजाब के विभाजन का प्रश्न

1946 के अंत और 1947 की शुरुआत तक पंजाब की राजनीतिक स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। कैबिनेट मिशन योजना के बाद सिख नेतृत्व की संवैधानिक चिंताएँ दूर नहीं हुई थीं और दूसरी ओर पंजाब में मुस्लिम लीग की राजनीतिक गतिविधियाँ तथा पाकिस्तान की मांग अधिक तीव्र हो रही थी।

➣ इस समय अकाली नेतृत्व के सामने मूल प्रश्न यह था कि सिखों का भविष्य संयुक्त पंजाब में सुरक्षित हो सकता है या नहीं। 1940 के बाद से अकाली दल लगातार राजनीतिक सुरक्षा और सिख स्वायत्तता की मांग कर रहा था, लेकिन 1946–47 तक इन मांगों का कोई संतोषजनक संवैधानिक समाधान सामने नहीं आया। इसलिए पंजाब की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों ने सिख नेतृत्व को अपने विकल्पों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।

खिज़र हयात तिवाना सरकार का पतन

1946 के पंजाब चुनावों के बाद मुस्लिम लीग सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। सर खिज़र हयात तिवाना के नेतृत्व में यूनियनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल के सहयोग से गठबंधन सरकार बनी। अकाली दल इस सरकार में एक महत्वपूर्ण सिख राजनीतिक घटक था।

➣ 1947 की शुरुआत में मुस्लिम लीग ने पंजाब में सरकार बनाने और अपनी राजनीतिक मांगों को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए आंदोलन तेज किया। 2 मार्च 1947 को खिज़र हयात तिवाना ने पंजाब के प्रीमियर पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ गठबंधन सरकार समाप्त हो गई और पंजाब में नई राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हो गई।

➣ खिज़र सरकार के पतन ने अकाली नेतृत्व की चिंता को और बढ़ा दिया। अब उसे आशंका होने लगी कि यदि मुस्लिम लीग को पंजाब में सत्ता मिलती है, तो सिखों के लिए पहले से मांगी जा रही राजनीतिक सुरक्षा और प्रभावी प्रतिनिधित्व व्यावहारिक रूप से कमजोर पड़ सकता है।

मास्टर तारा सिंह का विरोध

3 मार्च 1947 को लाहौर में हिंदू और सिख नेताओं ने पाकिस्तान की स्थापना के विरोध में सभा की। इसी दिन मास्टर तारा सिंह ने पंजाब विधानसभा भवन के बाहर मुस्लिम लीग की सत्ता की मांग का तीखा विरोध किया।

➣ तारा सिंह का विरोध केवल किसी एक सरकार के गठन का विरोध नहीं था। उनके लिए यह पंजाब के राजनीतिक भविष्य का प्रश्न था। अकाली नेतृत्व का तर्क था कि यदि पंजाब पाकिस्तान का हिस्सा बनता है, तो सिख समुदाय को मुस्लिम बहुमत के अधीन रहना पड़ेगा और उसके धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक हितों के लिए पर्याप्त सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी।

➣ इस समय तक अकाली नेतृत्व की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका था। पहले वह ऐसी संवैधानिक व्यवस्था की तलाश कर रहा था जिसमें संयुक्त पंजाब में सिखों को पर्याप्त सुरक्षा मिल सकें। लेकिन 1947 की परिस्थितियों में यह विश्वास कमजोर होने लगा कि संयुक्त पंजाब में ऐसी सुरक्षा व्यावहारिक रूप से संभव होगी।

लाहौर और अमृतसर में सांप्रदायिक हिंसा

4 मार्च 1947 को लाहौर में विरोध प्रदर्शनों के बाद सांप्रदायिक संघर्ष शुरू हुआ और शीघ्र ही अमृतसर सहित पंजाब के अन्य क्षेत्रों में भी हिंसा फैलने लगी। 5 मार्च को स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पंजाब के गवर्नर सर इवान जेनकिंस ने Governor’s Rule लागू कर दिया। पंजाब में इसके बाद सीधे ब्रिटिश गवर्नर का शासन रहा और सत्ता हस्तांतरण तक यह स्थिति बनी रही।

➣ हिंसा ने अकाली नेतृत्व की राजनीतिक चिंताओं को और अधिक तीखा कर दिया। अब सिख नेतृत्व को यह डर सताने लगा कि यदि प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर हुआ और पंजाब का राजनीतिक संघर्ष सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गया, तो सिख अल्पसंख्यक क्षेत्रों की सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

रावलपिंडी हिंसा और सिख दृष्टिकोण में निर्णायक परिवर्तन

मार्च 1947 में रावलपिंडी डिवीजन में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। विशेष रूप से ग्रामीण सिख और हिंदू आबादी को भारी नुकसान उठाना पड़ा तथा अनेक गाँवों से लोगों को विस्थापित होना पड़ा। इस हिंसा ने सिख राजनीतिक नेतृत्व पर गहरा प्रभाव डाला।

➣ रावलपिंडी क्षेत्र में सिख आबादी की स्थिति विशेष रूप से कठिन थी क्योंकि पश्चिमी पंजाब के अनेक जिलों में सिख महत्वपूर्ण लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में रहते थे। हिंसा और विस्थापन ने अकाली नेतृत्व के उस भय को वास्तविक अनुभव में बदल दिया कि मुस्लिम-बहुल पश्चिमी पंजाब में सिख समुदाय की सुरक्षा केवल राजनीतिक आश्वासनों पर निर्भर नहीं छोड़ी जा सकती

➣ इस हिंसा के बाद अकाली नेतृत्व के भीतर यह विचार मजबूत हुआ कि यदि पंजाब का विभाजन होना ही है, तो सिखों के बहुलता वाले क्षेत्रों को भारत में शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार पंजाब के विभाजन का प्रश्न धीरे-धीरे अकाली राजनीति की केंद्रीय मांग बनता गया।

संयुक्त पंजाब से पंजाब के विभाजन की ओर

➣ 1947 के शुरुआती महीनों में अकाली दल की स्थिति को एक क्रमिक परिवर्तन के रूप में समझना चाहिए। पहले अकाली नेतृत्व संयुक्त भारत और संयुक्त पंजाब में सिखों के लिए पर्याप्त राजनीतिक सुरक्षा चाहता था।

➣ इसके बाद उसने आजाद पंजाब जैसे विकल्पों पर विचार किया और अंततः सांप्रदायिक तनाव तथा हिंसा के बढ़ने के साथ पंजाब के विभाजन की संभावना को स्वीकार करने की दिशा में बढ़ा।

मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व के सामने अब दो प्रमुख प्रश्न थे-पहला, पंजाब को पाकिस्तान में जाने से रोकना और दूसरा, यदि भारत का विभाजन अपरिहार्य हो जाए तो सिखों के बहुल क्षेत्रों को भारत में शामिल कराना। इस परिवर्तन ने अकाली राजनीति को संवैधानिक सुरक्षा की मांग से आगे बढ़ाकर सीधे पंजाब की क्षेत्रीय सीमाओं और विभाजन के प्रश्न से जोड़ दिया।

➣ इसी दौर में सिख नेतृत्व ने पंजाब के उन क्षेत्रों को लेकर राजनीतिक अभियान तेज किया जहाँ सिख और हिंदू आबादी अपेक्षाकृत अधिक थी। उद्देश्य यह था कि यदि पंजाब विभाजित होता है, तो सिख धार्मिक केंद्रों, कृषि क्षेत्रों और प्रमुख सिख आबादी वाले क्षेत्रों को भारत की ओर रखा जाए।

माउंटबेटन योजना और पंजाब का विभाजन

3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना में पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रावधान किया गया। पंजाब के लिए यह निर्णय विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि इसका सीधा संबंध सिखों के राजनीतिक भविष्य, उनकी आबादी, कृषि क्षेत्रों, धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक केंद्रों से था।

मास्टर तारा सिंह ने योजना की घोषणा के तुरंत बाद सिखों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि योजना में सिखों को कोई स्पष्ट राजनीतिक शक्ति या विशेष संवैधानिक सुरक्षा नहीं दी गई थी अर्थात योजना को स्वीकार करने का निर्णय मुख्य रूप से पंजाब सीमा आयोग द्वारा तय की जाने वाली सीमा पर निर्भर करेगा।

➣ सिख नेतृत्व की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि पंजाब के विभाजन की स्थिति में सिख आबादी, कृषि भूमि और प्रमुख धार्मिक स्थलों का वितरण किस प्रकार होगा। सिख आबादी पंजाब में किसी एक स्पष्ट और निरंतर बहुमत वाले क्षेत्र में केंद्रित नहीं थी। इसलिए केवल जनसंख्या के आधार पर सीमा निर्धारित होने पर सिख समुदाय के महत्वपूर्ण हिस्से के पाकिस्तान में चले जाने की आशंका थी।

पंजाब सीमा आयोग और सिखों की मांगें

30 जून 1947 को पंजाब के विभाजन के लिए पंजाब सीमा आयोग का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष ब्रिटिश न्यायविद सर सिरिल रैडक्लिफ थे। आयोग में पंजाब उच्च न्यायालय के चार न्यायाधीश-जस्टिस दीन मोहम्मद, जस्टिस मुहम्मद मुनीर, जस्टिस मेहर चंद महाजन और जस्टिस तेजा सिंह-शामिल थे।

➣ आयोग को पंजाब की सीमा इस आधार पर निर्धारित करने का निर्देश दिया गया कि मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की सन्निहितता को ध्यान में रखा जाए तथा इसके साथ अन्य कारकों पर भी विचार किया जाए।

➣ सिख नेतृत्व ने इस दूसरे प्रावधान को विशेष महत्व दिया, क्योंकि वह चाहता था कि सीमा निर्धारण में केवल जनसंख्या ही निर्णायक न हो। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि पंजाब की सामाजिक और आर्थिक संरचना को केवल सांप्रदायिक जनसंख्या के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।

➣ सीमा आयोग की सार्वजनिक सुनवाई 21 से 31 जुलाई 1947 तक लाहौर में हुई। सिख पक्ष की ओर से हरनाम सिंह ने शिरोमणि अकाली दल का पक्ष प्रस्तुत किया। सिख प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों की ओर ध्यान आकर्षित किया जहाँ सिखों की आबादी, कृषि संपत्ति और धार्मिक महत्व महत्वपूर्ण था।

सिख-बहुल पंजाब की योजना

➣ विभाजन की संभावना स्पष्ट होने के साथ अकाली नेतृत्व के भीतर पूर्वी पंजाब के पुनर्गठन का विचार भी सामने आया। ज्ञानी करतार सिंह ऐसे पुनर्गठित पूर्वी पंजाब की कल्पना कर रहे थे जिसमें सिखों को बहुमत प्राप्त हो सके। इसमें पंजाब के साथ मैदानी रियासतों को जोड़कर एक सिख-बहुल प्रांत बनाने की संभावना पर भी विचार किया गया।

➣ इस योजना का मूल उद्देश्य एक स्वतंत्र सिख राज्य की तत्काल घोषणा करना मात्र नहीं था, बल्कि विभाजन के बाद बनने वाले भारतीय पंजाब को इस प्रकार पुनर्गठित करना था कि सिखों को राजनीतिक रूप से सुरक्षित और प्रभावशाली क्षेत्र प्राप्त हो। यह विचार अकाली दल की 1940 के बाद विकसित हो रही राजनीतिक स्वायत्तता की मांग का अंतिम चरण था।

सिखों की निराशा

12 अगस्त 1947 को सर सिरिल रैडक्लिफ ने पंजाब सीमा आयोग का अपना निर्णय वायसराय को सौंपा और इसे 16 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया। इसके अनुसार पंजाब का विभाजन पूर्वी पंजाब (भारत) और पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में किया गया।

➣ रैडक्लिफ पुरस्कार से सिख नेतृत्व संतुष्ट नहीं था। सिखों की बड़ी आबादी और विशाल कृषि संपत्तियाँ पश्चिमी पंजाब में रह गईं। विशेष रूप से मोंटगोमरी, मुल्तान, लायलपुर और शाहपुर की नहर कॉलोनियों में बसे अनेक सिख परिवार अचानक पाकिस्तान का हिस्सा बन गए।

➣ विभाजन ने सिख समुदाय को भौगोलिक रूप से भी दो हिस्सों में बाँट दिया। अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे और सिख धार्मिक स्थल पाकिस्तान में चले गए, जबकि पूर्वी पंजाब में आने वाले सिखों को अपने घर, जमीन और संपत्ति छोड़कर विस्थापित होना पड़ा।

➣ इस प्रकार सिखों के लिए विभाजन केवल राजनीतिक सीमा परिवर्तन नहीं था, बल्कि भूमि, धार्मिक विरासत और सामुदायिक जीवन के व्यापक विस्थापन का अनुभव था।

➣ रैडक्लिफ सीमा निर्धारण से सिखों की एक प्रमुख शिकायत यह थी कि सीमा आयोग के निर्देशों में अन्य कारकों का उल्लेख होने के बावजूद अंतिम सीमा में जनसंख्या का सांप्रदायिक वितरण अत्यंत महत्वपूर्ण आधार बना रहा। सिख नेतृत्व को लगा कि उनकी कृषि, आर्थिक और धार्मिक दावों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला।

विभाजन और सिखों का व्यापक विस्थापन

अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान के निर्माण के साथ पंजाब का विभाजन हुआ। पश्चिमी पंजाब के अनेक जिलों में रहने वाले सिखों और हिंदुओं को भारत की ओर तथा पूर्वी पंजाब में रहने वाले अनेक मुसलमानों को पाकिस्तान की ओर पलायन करना पड़ा। पंजाब में यह विस्थापन अत्यंत हिंसक और व्यापक था।

➣ सिख समुदाय के लिए यह त्रासदी इसलिए और गहरी थी क्योंकि उनके कई ऐतिहासिक धार्मिक केंद्र, गुरुद्वारे, कृषि क्षेत्र और पैतृक गाँव पश्चिमी पंजाब में रह गए। दूसरी ओर भारत आए सिख शरणार्थियों को अपनी छोड़ी हुई संपत्ति और आजीविका के बदले नए क्षेत्रों में पुनर्वास की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

➣ विभाजन के बाद अकाली दल के सामने एक बिल्कुल नया राजनीतिक संदर्भ उत्पन्न हुआ। अब प्रश्न पाकिस्तान में सिखों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि भारत में सिखों की राजनीतिक स्थिति, पूर्वी पंजाब की संरचना, शरणार्थियों का पुनर्वास और सिख पहचान की संवैधानिक सुरक्षा का था। इसी नए संदर्भ से आगे चलकर पंजाबी सूबा आंदोलन और अकाली-कांग्रेस संबंधों का नया चरण विकसित हुआ।


इस प्रकार 1920 के दशक में गुरुद्वारा सुधार से शुरू हुई अकाली राजनीति अब सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व → संवैधानिक सुरक्षा → राजनीतिक स्वायत्तता → पंजाब के पुनर्गठन → विभाजन और पुनर्वास के लंबे राजनीतिक अनुभव से गुजर चुकी थी।

स्वतंत्रता पश्चात अकाली दल

1947 के बाद भी अकाली दल सिख और पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहा। स्वतंत्रता के बाद उसने पंजाबी सूबा की मांग, पंजाब के पुनर्गठन और सिखों से जुड़े राजनीतिक अधिकारों के प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन और पंजाबी-भाषी राज्य के गठन के बाद अकाली दल एक प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।

➣ आगे चलकर आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, धर्म युद्ध मोर्चा और पंजाब की स्वायत्तता से जुड़े प्रश्नों ने अकाली राजनीति को नई दिशा दी। समय के साथ पार्टी में कई विभाजन भी हुए, लेकिन अकाली दल पंजाब की राजनीति में अपनी भूमिका बनाए रखने में सफल रहा। आज भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरह शिरोमणि अकाली दल (SAD) एक सक्रिय राजनीतिक दल है।

वर्ष/तिथि विवरण
1947 स्वतंत्रता और विभाजन के बाद अकाली दल ने सिखों के राजनीतिक अधिकारों और हितों के प्रश्न को प्रमुखता से उठाना जारी रखा।
1955 पंजाबी सूबा आंदोलन ने जोर पकड़ा। अकाली दल ने पंजाबी भाषी क्षेत्र के लिए आंदोलन चलाया।
1960–61 संत फतेह सिंह के नेतृत्व में पंजाबी सूबा आंदोलन को नई गति मिली।
1966 पंजाब पुनर्गठन के बाद पंजाब और हरियाणा अलग राज्य बने तथा चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश बना।
1967 अकाली दल पुनर्गठित पंजाब में प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरा और गठबंधन सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1973 आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता और राज्यों के अधिकारों को मजबूत करने की मांग की गई।
1977 अकाली दल ने जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर पंजाब में सरकार बनाई और प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
4 अगस्त 1982 धर्म युद्ध मोर्चा शुरू हुआ। अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव और अन्य पंजाब संबंधी मांगों को लेकर आंदोलन चलाया।
जून 1984 ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अकाली दल की राजनीति और पंजाब की स्थिति में बड़ा बदलाव आया।
24 जुलाई 1985 प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच राजीव–लोंगोवाल समझौता हुआ।
1985 अकाली दल को विधानसभा चुनाव में बड़ी सफलता मिली और सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में सरकार बनी।
1987 बरनाला सरकार बर्खास्त हुई और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
1992 अकाली दल ने पंजाब विधानसभा चुनावों का बहिष्कार किया, जिससे पार्टी के राजनीतिक प्रभाव को बड़ा झटका लगा।
1996 अकाली दल ने अपना राजनीतिक आधार व्यापक करते हुए स्वयं को केवल सिखों की पार्टी के बजाय सभी पंजाबियों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया।
1997 अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने पंजाब विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल की और प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
2007–2017 अकाली दल–भाजपा गठबंधन ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीते और पंजाब में सरकार बनाई।
2020 कृषि कानूनों के विरोध के मुद्दे पर अकाली दल ने NDA से संबंध समाप्त कर लिया।
2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल का प्रदर्शन कमजोर रहा और पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा।
2024 लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद अकाली दल में नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक सुधार की मांग तेज हुई।

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