माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947) : परिचय
➣ माउंटबेटन योजना (3 जून योजना) की घोषणा 3 जून, 1947 ई. को ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने की। उसी शाम आकाशवाणी (AIR) पर माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना तथा सिखों की ओर से बलदेव सिंह ने प्रसारण किया।
➣ यह पहली ब्रिटिश योजना थी जिसने भारत के विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार किया और सत्ता हस्तांतरण की तिथि जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 कर दी।
➣ योजना की एक सूक्ष्म बात: प्रांतों के सामने प्रश्न सीधे भारत या पाकिस्तान का नहीं था, बल्कि यह था कि वे वर्तमान संविधान सभा (दिल्ली) में रहेंगे या नई संविधान सभा में जाएँगे। पाकिस्तान का गठन इसी प्रक्रिया का परिणाम था।
कैबिनेट मिशन, अंतरिम सरकार तथा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के विस्तृत प्रावधान अलग अध्यायों में हैं। इस अध्याय में उनका केवल संदर्भ दिया गया है।
पृष्ठभूमि
➣ कैबिनेट मिशन योजना (1946) की विफलता और अंतरिम सरकार में कांग्रेस-लीग टकराव के बाद संवैधानिक गतिरोध गहरा गया। 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई, पर मुस्लिम लीग ने उसका बहिष्कार किया। (विस्तार: कैबिनेट मिशन एवं अंतरिम सरकार अध्याय)
➣ सांप्रदायिक हिंसा लगातार बढ़ी: 16 अगस्त, 1946 (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) के बाद कलकत्ता, नोआखली और बिहार में दंगे हुए। मार्च 1947 में रावलपिंडी में भीषण हिंसा हुई और 2 मार्च, 1947 को पंजाब की यूनियनिस्ट मंत्रिपरिषद (खिज़र हयात टिवाना) ने इस्तीफ़ा दे दिया।
➣ 20 फरवरी, 1947 को प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि सत्ता जून 1948 से पहले भारतीय हाथों में सौंप दी जाएगी। साथ ही यह चेतावनी भी थी कि यदि पूर्ण प्रतिनिधिक संविधान सभा नहीं बनी, तो ब्रिटिश सरकार स्वयं तय करेगी कि सत्ता किसे सौंपी जाए: केंद्र को, प्रांतीय सरकारों को, या किसी अन्य रूप में।
➣ एकीकृत भारत की कठिनाई: कांग्रेस मज़बूत केंद्र चाहती थी, जबकि लीग पृथक पाकिस्तान पर अड़ी थी। मध्यमार्ग (कैबिनेट मिशन का त्रि-स्तरीय ढाँचा) दोनों पक्षों की व्याख्याओं में टूट चुका था।
माउंटबेटन का भारत आगमन और राजनीतिक प्रयास
➣ माउंटबेटन 22 मार्च, 1947 को दिल्ली पहुँचे और 24 मार्च, 1947 को लॉर्ड वेवल के स्थान पर वायसराय बने। उनके प्रमुख सहयोगी थे लॉर्ड इस्मे (चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़) और वी. पी. मेनन (संवैधानिक सलाहकार)।
➣ उन्हें निर्देश था कि जहाँ तक संभव हो कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर एकीकृत भारत का समाधान निकालें, पर परिस्थिति अनुसार निर्णय लेने की पर्याप्त छूट भी दी गई थी। सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा जून 1948 थी।
➣ माउंटबेटन ने गांधी, नेहरू, पटेल, जिन्ना, लियाकत अली आदि से लगातार अलग-अलग वार्ताएँ कीं। अप्रैल 1947 की शुरुआत में गांधीजी ने सुझाव दिया कि जिन्ना को पूरी अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाए, ताकि विभाजन टल सके। कांग्रेस नेतृत्व इससे उत्साहित नहीं था और जिन्ना ने भी इसे स्वीकार नहीं किया। प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा।
➣ 15 अप्रैल, 1947 को गांधी और जिन्ना ने हिंसा के विरुद्ध संयुक्त अपील जारी की, पर इससे राजनीतिक गतिरोध नहीं सुलझा।
➣ जिन्ना पूर्ण पाकिस्तान की माँग पर अडिग रहे। माउंटबेटन का तर्क था कि यदि धर्म के आधार पर देश बँटेगा, तो वही सिद्धांत पंजाब और बंगाल पर भी लागू होगा। जिन्ना इसे कटा-फटा पाकिस्तान मानते थे।
➣ यह तर्क कांग्रेस के लिए नया नहीं था। रावलपिंडी हिंसा के बाद 8 मार्च, 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति ने पंजाब के विभाजन की माँग का प्रस्ताव पारित किया था। इसलिए प्रांतों का भी विभाजन वाला सिद्धांत कांग्रेस को पहले से स्वीकार्य था।
प्लान बाल्कन (मई 1947) और मेनन फ़ॉर्मूला
➣ माउंटबेटन के प्रारंभिक मसौदे में सत्ता प्रांतों को सौंपने की बात थी, जो बाद में संघ बनाने या न बनाने का निर्णय लेते। मसौदा विचार के लिए लॉर्ड इस्मे के हाथ लंदन भेजा गया।
➣ माउंटबेटन ने 10 मई को शिमला में यह मसौदा नेहरू को दिखाया। नेहरू ने तीव्र आपत्ति की, क्योंकि इससे केवल प्रांत ही नहीं, रियासतें भी स्वतंत्र दावा कर सकती थीं और भारत के बाल्कनीकरण का ख़तरा था। योजना वहीं छोड़ दी गई।
➣ इसके बाद वी. पी. मेनन का वैकल्पिक सुझाव सामने आया। विभाजन स्वीकार हो और सत्ता डोमिनियन स्टेटस के आधार पर दो उत्तराधिकारी सत्ताओं को सौंपी जाए।
➣ आम व्याख्या के अनुसार, इससे कांग्रेस को शीघ्र सत्ता मिलती और ब्रिटेन राष्ट्रमंडल से संबंध बनाए रख सकता था। कुछ स्रोतों के अनुसार डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करना कांग्रेस की ओर से एक बड़ी रियायत थी, और इसमें पटेल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
➣ माउंटबेटन संशोधित योजना को ब्रिटिश कैबिनेट की स्वीकृति के लिए 18 मई को लंदन गए और 31 मई को लौटे।
➣ 2 जून, 1947 को वायसराय भवन में सात नेताओं (कांग्रेस:- नेहरू, पटेल, कृपलानी; लीग:- जिन्ना, लियाकत, निश्तार; सिख:- बलदेव सिंह) के सामने योजना रखी गई। अगले दिन उसकी घोषणा हुई।
➣ कुछ स्रोतों के अनुसार जिन्ना ने औपचारिक लिखित सहमति नहीं दी और माउंटबेटन ने उनकी मौन सहमति (सिर हिलाने) के आधार पर आगे कार्यवाही की। औपचारिक स्वीकृति लीग काउंसिल ने 9 जून को दी (विवरण: कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया)।
माउंटबेटन के अनुसार, उन्होंने पहले कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर समझौता कराने का प्रयास किया, पर सहमति नहीं बनी। विभाजन अंततः व्यावहारिक विकल्प के रूप में सामने आया।
3 जून, 1947 की योजना
➣ ब्रिटिश सरकार चालू संसदीय सत्र में कानून लाकर उसी वर्ष (1947) डोमिनियन स्टेटस के आधार पर एक या दो उत्तराधिकारी सत्ताओं को सत्ता सौंपेगी। यह इस बात पर निर्भर था कि प्रांतों के निर्णय क्या रहते हैं।
➣ बुनियादी सिद्धांत: ब्रिटिश सरकार किसी अनिच्छुक क्षेत्र पर संविधान नहीं थोपेगी। विभाजन थोपा नहीं गया, बल्कि विधायकों के मतदान और जनमत संग्रह के माध्यम से तय होना था।
➣ कैबिनेट मिशन से मूल अंतर: उसमें प्रांतों के समूह के साथ अखंड भारत का ढाँचा था। इस योजना में समूह-व्यवस्था नहीं रही और विभाजन का सिद्धांत मान लिया गया।
प्रमुख प्रावधान
➣ संविधान सभा: मौजूदा संविधान सभा काम करती रहेगी, पर उसके बनाए संविधान को उन क्षेत्रों पर लागू नहीं किया जाएगा जो उसमें शामिल नहीं होना चाहते। ऐसे क्षेत्रों के लिए नई संविधान सभा बनेगी।
➣ पंजाब और बंगाल: विधानसभा के सदस्य दो खंडों (मुस्लिम-बहुल जिले और शेष जिले) में अलग-अलग बैठेंगे। किसी भी एक खंड का साधारण बहुमत विभाजन के पक्ष में जाने पर प्रांत बँट जाएगा। विभाजन होने पर प्रत्येक खंड यह भी तय करेगा कि वह किस संविधान सभा में जाएगा। विस्तार खंड ‘पंजाब और बंगाल का विभाजन’ में।
➣ सिंध: विधानसभा स्वयं निर्णय लेगी कि वह किस संविधान सभा में जाएगी।
➣ NWFP और सिलहट: जनमत संग्रह कराया जाएगा। सिलहट का जनमत संग्रह बंगाल के विभाजन और उसके पूर्वी भाग के पाकिस्तान में जाने के निर्णय पर निर्भर था।
➣ बलूचिस्तान: वहाँ की जनता की इच्छा जानने की व्यवस्था गवर्नर-जनरल करेंगे।
➣ सीमा आयोग: पंजाब और बंगाल (और सिलहट) की सीमाएँ तय करने के लिए आयोग बनेंगे।
➣ प्रशासनिक विभाजन: कुछ स्रोतों के अनुसार सेना, सेवाओं और संपत्तियों के बँटवारे के लिए तंत्र बनाने की बात योजना में थी। इसी से आगे विभाजन परिषद बनी (विस्तार खंड: ‘योजना का क्रियान्वयन’)।
➣ रियासतें: कैबिनेट मिशन के 12 मई, 1946 के ज्ञापन की नीति यथावत रही (विस्तार खंड: देशी रियासतों का प्रश्न)।
➣ डोमिनियन स्टेटस: दोनों नए राज्य अपनी संविधान सभाओं के माध्यम से अपना संविधान बनाने को स्वतंत्र होंगे। राष्ट्रमंडल में रहने या न रहने का अधिकार उनकी संविधान सभाओं के पास सुरक्षित रखा गया।
क्षेत्रवार निर्णय तालिका
| क्षेत्र | निर्णय की पद्धति | परिणाम |
|---|---|---|
| पंजाब | विधानसभा के दो खंडों की अलग बैठकें | विभाजन (23 जून) |
| बंगाल | विधानसभा के दो खंडों की अलग बैठकें | विभाजन (20 जून) |
| सिलहट (असम) | जनमत संग्रह (6-7 जुलाई) | पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) में शामिल |
| NWFP | जनमत संग्रह (6 जुलाई से) | पाकिस्तान में शामिल |
| सिंध | विधानसभा का मतदान (26 जून) | पाकिस्तान में शामिल |
| ब्रिटिश बलूचिस्तान | शाही जिरगा एवं क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्य (29 जून) | पाकिस्तान में शामिल |
| सीमा निर्धारण | दो सीमा आयोग, अध्यक्ष: रेडक्लिफ (30 जून को घोषित) | अवार्ड 17 अगस्त को सार्वजनिक |
| देशी रियासतें | कैबिनेट मिशन ज्ञापन (12 मई, 1946) की नीति यथावत | भारत/पाकिस्तान से संबंध का प्रश्न शासकों पर |
योजना के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति
➣ 3 जून योजना ने ब्रिटिश भारत के हर भाग के लिए एक ही पद्धति नहीं अपनाई। पंजाब-बंगाल में विधानसभा के दो खंडों ने, सिंध में पूरी विधानसभा ने, NWFP और सिलहट में मतदाताओं ने और ब्रिटिश बलूचिस्तान में सीमित निकायों ने निर्णय लिया। रियासतों के लिए पुरानी नीति ही लागू रही।
| पद्धति | कहाँ | किसने निर्णय लिया |
|---|---|---|
| दो खंडों में विधानसभा | पंजाब, बंगाल | विधानसभा सदस्य (खंडवार) |
| पूरी विधानसभा | सिंध | विधानसभा सदस्य |
| जनमत संग्रह | NWFP, सिलहट | मतदाता |
| नामांकित / सीमित निकाय | ब्रिटिश बलूचिस्तान | शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्य |
| रियासतों वाली नीति | कलात आदि | शासक (समझौता / विलय पत्र) |
पंजाब और बंगाल का विभाजन
➣ दोनों प्रांतों में आबादी मिश्रित थी। 1941 की जनगणना के अनुसार पंजाब में लगभग 53% मुस्लिम, 29% हिंदू और 15% सिख थे, जबकि बंगाल में लगभग 54% मुस्लिम और 42% हिंदू थे। इसलिए इन्हें बिना बाँटे किसी एक राज्य में शामिल करना संभव नहीं माना गया।
➣ पंजाब में किसी भी जिले में सिख बहुमत में नहीं थे, लेकिन उनकी आबादी मध्य पंजाब के अमृतसर-लाहौर क्षेत्र में केंद्रित थी और उनके अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे पश्चिमी हिस्से में थे।
➣ इसलिए कांग्रेस ने 8 मार्च, 1947 को पंजाब के विभाजन के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था और अकाली नेतृत्व भी विभाजन चाहता था। यूनियनिस्ट मंत्रिपरिषद के इस्तीफ़े (मार्च 1947) के बाद, कुछ स्रोतों के अनुसार, वहाँ राज्यपाल शासन लागू था।
➣ बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व में थी। दूसरी ओर, हिंदू महासभा और बंगाल के कई हिंदू नेताओं ने प्रांत के विभाजन की माँग तेज़ कर दी थी।
➣ विभाजन पर निर्णय लेने के लिए पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं के सदस्यों को दो समूहों में बाँटा गया। एक समूह में मुस्लिम-बहुल जिलों के प्रतिनिधि और दूसरे में गैर-मुस्लिम-बहुल जिलों के प्रतिनिधि शामिल थे। इन जिलों का निर्धारण 1941 की जनगणना के आधार पर किया गया था और उनकी सूची योजना के परिशिष्ट में दी गई थी।
➣ सबसे पहले दोनों समूहों को यह तय करना था कि प्रांत का विभाजन किया जाए या नहीं। यदि किसी एक समूह के बहुमत ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया, तो प्रांत का विभाजन होना तय था।
➣ विभाजन का निर्णय होने पर दोनों समूहों को अलग-अलग यह तय करना था कि वे भारत की मौजूदा संविधान सभा (दिल्ली) में शामिल होंगे या पाकिस्तान की प्रस्तावित संविधान सभा में।
➣ यदि विभाजन के पक्ष में निर्णय नहीं आता, तो पूरी प्रांतीय विधानसभा संयुक्त बैठक में यह तय करती कि प्रांत किस संविधान सभा में शामिल होगा।
| प्रांत / तिथि | समूह | मतदान (लगभग) |
|---|---|---|
| पंजाब (23 जून) | पश्चिमी पंजाब (मुस्लिम-बहुल) | विभाजन के विरुद्ध, 69-27 (कुछ स्रोतों के अनुसार) |
| पूर्वी पंजाब (गैर-मुस्लिम-बहुल) | विभाजन के पक्ष में, 50-22 | |
| बंगाल (20 जून) | संयुक्त बैठक | अविभाजित रहने पर पाकिस्तान की संविधान सभा में जाने के पक्ष में, 126-90 |
| पश्चिमी बंगाल (गैर-मुस्लिम-बहुल) | विभाजन के पक्ष में, 58-21; मौजूदा संविधान सभा में रहने का निर्णय | |
| पूर्वी बंगाल (मुस्लिम-बहुल) | विभाजन के विरुद्ध, 106-35; विभाजन होने पर पाकिस्तान की संविधान सभा के पक्ष में, 107-34 |
➣ दोनों प्रांतों में एक समूह के विभाजन के पक्ष में मत देने से विभाजन तय हुआ। पंजाब में पश्चिमी समूह नई संविधान सभा में और पूर्वी समूह मौजूदा संविधान सभा में गया।
➣ मई-जून 1947 में हुसैन शहीद सुहरावर्दी, शरत चंद्र बोस, किरण शंकर रॉय और अबुल हाशिम ने संप्रभु और संयुक्त बंगाल का प्रस्ताव रखा।
➣ कांग्रेस हाईकमान (विशेषतः पटेल) और हिन्दू महासभा (श्यामा प्रसाद मुखर्जी) इसके विरोध में थे। कुछ स्रोतों के अनुसार जिन्ना ने इसे सैद्धांतिक रूप से अनुकूल माना, पर बात आगे नहीं बढ़ी। 20 जून के मतदान ने इस प्रयास को व्यवहार में समाप्त कर दिया।
सीमा आयोग और रेडक्लिफ अवार्ड
➣ 30 जून, 1947 को पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए दो अलग-अलग सीमा आयोगों की घोषणा की गई। प्रत्येक आयोग में चार सदस्य थे, जिनमें दो कांग्रेस और दो मुस्लिम लीग द्वारा नामित किए गए थे। दोनों आयोगों के अध्यक्ष सर सिरिल रेडक्लिफ थे।
➣ रेडक्लिफ इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। वे 8 जुलाई, 1947 को भारत पहुँचे और उन्हें सीमा निर्धारण का कार्य पूरा करने के लिए लगभग पाँच सप्ताह मिले।
➣ आयोगों को यह निर्धारित करना था कि कौन-से सटे हुए क्षेत्र मुस्लिम-बहुल और कौन-से गैर-मुस्लिम-बहुल थे। साथ ही, निर्णय लेते समय अन्य कारकों को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया था। इस अस्पष्ट प्रावधान के कारण सीमा निर्धारण को लेकर कई विवाद उत्पन्न हुए।
➣ बाद में अकाली दल ने आरोप लगाया कि सीमा निर्धारण के दौरान अन्य कारकों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप सिख समुदाय के कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे और उनसे जुड़ी भूमि पाकिस्तान में चली गई।
➣ दोनों आयोगों के सदस्य सीमा निर्धारण पर सर्वसम्मति से सहमत नहीं हो सके। इसलिए अंतिम निर्णय रेडक्लिफ को स्वयं करना पड़ा। उन्होंने अपना निर्णय 12 अगस्त, 1947 तक तैयार कर लिया था, लेकिन इसे स्वतंत्रता के बाद 17 अगस्त, 1947 को सार्वजनिक किया गया।
पंजाब सीमा आयोग में मेहर चंद महाजन और तेजा सिंह गैर-मुस्लिम सदस्य थे, जबकि दीन मुहम्मद और मुहम्मद मुनीर मुस्लिम सदस्य थे। बंगाल सीमा आयोग में गैर-मुस्लिम सदस्यों के रूप में सी. सी. बिस्वास और बी. के. मुखर्जी तथा मुस्लिम सदस्यों के रूप में अबू सालेह मुहम्मद अकरम और एस. ए. रहमान शामिल थे।
➣ पंजाब में सीमा निर्धारण के तहत लाहौर पाकिस्तान को और अमृतसर भारत को मिला। गुरदासपुर जिले में मामूली मुस्लिम बहुमत होने के बावजूद उसकी तीन तहसीलें—गुरदासपुर, बटाला और पठानकोट—भारत में रखी गईं।
➣ इससे भारत को जम्मू-कश्मीर तक सड़क-संपर्क बनाए रखने में सहायता मिली। इसके अतिरिक्त, फ़िरोज़पुर और ज़ीरा की मुस्लिम-बहुल तहसीलों को भी भारत में शामिल किया गया। इन निर्णयों को लेकर विवाद हुआ और कुछ स्रोतों में इनकी आलोचना की गई।
➣ बंगाल में चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र, जहाँ अधिकांश आबादी गैर-मुस्लिम थी, पूर्वी पाकिस्तान को दिया गया। हिंदू-बहुल खुलना पाकिस्तान में शामिल हुआ, जबकि मुस्लिम-बहुल मुर्शिदाबाद भारत में रहा। दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी भी भारत के हिस्से में आए।
➣ सीमा संबंधी निर्णय सार्वजनिक होने से पहले कुछ क्षेत्रों में अस्थायी रूप से गलत पक्ष का ध्वज भी फहराया गया था। उदाहरण के लिए, मुर्शिदाबाद, नदिया और मालदा में पाकिस्तान का तथा खुलना में भारत का ध्वज फहराए जाने की घटनाएँ सामने आईं। रेडक्लिफ अवार्ड प्रकाशित होने के बाद स्थिति स्पष्ट हुई। मालदा जिले का अधिकांश भाग भारत में रहा, जबकि उसका एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान को मिला।
➣ अंततः पंजाब और बंगाल—दोनों प्रांतों का विभाजन हुआ। इस विभाजन के साथ बड़े पैमाने पर जनसंख्या का पलायन और सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसका विवरण आगे खंड ‘योजना का क्रियान्वयन’ और ‘सीमाएँ एवं आलोचना’ में दिया गया है।
भारत-पाकिस्तान सीमा का निर्धारण 1947 में रेडक्लिफ द्वारा हुआ। भारत-चीन के बीच मैकमोहन रेखा का निर्धारण 1914 में हुआ।
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में जनमत-संग्रह
➣ उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में 90% से अधिक आबादी मुस्लिम थी, फिर भी वहाँ कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने 50 में से लगभग 30 सीटें जीती थीं, जबकि मुस्लिम लीग को लगभग 17 सीटें मिली थीं। उस समय डॉ. खान साहब प्रांत के मुख्यमंत्री थे।
➣ कांग्रेस की शक्ति मुख्यतः खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी / बादशाह खान) के नेतृत्व वाले अहिंसक खुदाई खिदमतगार आंदोलन से आती थी, जिसके कार्यकर्ता सुर्ख़पोश के नाम से भी जाने जाते थे।
➣ कुछ स्रोतों के अनुसार, फरवरी से अप्रैल 1947 के बीच मुस्लिम लीग ने कांग्रेस मंत्रिमंडल के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया। इसी दौरान माउंटबेटन ने 28–29 अप्रैल, 1947 को पेशावर का दौरा किया।
➣ 3 जून योजना के अंतर्गत NWFP की जनता के लिए जनमत संग्रह का प्रावधान किया गया। इसमें लोगों को यह चुनना था कि वे भारत की संविधान सभा के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होना चाहते हैं।
➣ मतपत्र पर केवल यही दो विकल्प दिए गए थे; स्वतंत्र पख्तूनिस्तान का विकल्प शामिल नहीं था। जनमत संग्रह निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत कराया जाना था।
➣ खान अब्दुल गफ्फार खान और खुदाई खिदमतगारों ने पहले नए चुनाव कराने और बाद में स्वतंत्र पख्तूनिस्तान को तीसरे विकल्प के रूप में शामिल करने की माँग की। इस माँग को 21 जून, 1947 के बन्नू प्रस्ताव में औपचारिक रूप से रखा गया।
➣ माउंटबेटन ने स्वतंत्र पख्तूनिस्तान के विकल्प को स्वीकार नहीं किया। अनेक स्रोतों के अनुसार, कांग्रेस कार्यसमिति ने विभाजन योजना स्वीकार कर ली, जबकि सीमांत गांधी और उनके समर्थकों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिला। इससे खान अब्दुल गफ्फार खान गहरे निराश हुए। उनकी प्रतिक्रिया का विवरण खंड ‘कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया’ में दिया गया है।
➣ जनमत संग्रह के लिए मतदान 6 से 17 जुलाई, 1947 के बीच हुआ और परिणाम 20 जुलाई, 1947 को घोषित किए गए। कांग्रेस और खुदाई खिदमतगारों ने इसका बहिष्कार किया।
➣ परिणामस्वरूप, लगभग 2.89 लाख मत पाकिस्तान के पक्ष में और केवल 2,874 मत भारत के पक्ष में पड़े। लगभग 5.7 लाख मतदाताओं में से करीब 51% ने मतदान किया।
➣ इस जनमत संग्रह में प्रांत के बसे हुए जिले शामिल थे; स्वतंत्र कबायली क्षेत्र इसके दायरे से बाहर रखे गए थे।
➣ जनमत संग्रह का परिणाम पाकिस्तान के पक्ष में स्पष्ट था, लेकिन कम मतदान, कांग्रेस और खुदाई खिदमतगारों के बहिष्कार तथा स्वतंत्र पख्तूनिस्तान के विकल्प की अनुपस्थिति के कारण इसकी प्रतिनिधिकता और वैधता पर सवाल उठे।
➣ पख्तूनिस्तान का प्रश्न विभाजन के बाद भी बना रहा और अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के संबंधों में डूरंड रेखा से जुड़े विवाद के साथ सामने आता रहा। अफगानिस्तान ने 1947 में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की सदस्यता का विरोध भी किया था।
सिलहट में जनमत-संग्रह
➣ सिलहट असम प्रांत का एक मुस्लिम-बहुल जिला था, जिसकी सीमा पूर्वी बंगाल से लगती थी। इसलिए विभाजन के समय यह प्रश्न उठा कि सिलहट असम में बना रहेगा या पूर्वी बंगाल में शामिल होकर पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा।
➣ बंगाल और पंजाब के विभाजन का निर्णय संबंधित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों के मतदान से होना था, लेकिन सिलहट के मामले में पूरे असम के विभाजन का प्रश्न नहीं था। केवल यह तय करना था कि सिलहट किस प्रांत का हिस्सा बनेगा।
➣ इसलिए यहाँ विधानसभा के मतदान के बजाय जनमत संग्रह का रास्ता अपनाया गया। असम का कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत समूह-विवाद से संबंध अलग अध्याय में दिया गया है।
➣ 3 जून, 1947 की योजना में सिलहट में जनमत संग्रह कराने का प्रावधान एक शर्त के साथ रखा गया था। यदि बंगाल का विभाजन होता, तभी वहाँ की जनता से पूछा जाता कि सिलहट असम में बना रहे या पूर्वी बंगाल में शामिल हो जाए। 20 जून, 1947 को बंगाल विधानसभा ने विभाजन के पक्ष में निर्णय लिया, जिससे यह शर्त पूरी हो गई।
➣ योजना में यह भी व्यवस्था थी कि यदि जनमत संग्रह का परिणाम पूर्वी बंगाल में शामिल होने के पक्ष में आता है, तो एक सीमा आयोग सिलहट की सीमा और उससे सटे जिलों के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों का निर्धारण करेगा। इसके बाद निर्धारित क्षेत्र पूर्वी बंगाल को हस्तांतरित किए जाने थे।
➣ 6–7 जुलाई, 1947 को हुए जनमत संग्रह में लगभग 2.39 लाख मत पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) में शामिल होने के पक्ष में पड़े, जबकि लगभग 1.84 लाख मत असम (भारत) में बने रहने के पक्ष में पड़े। दोनों पक्षों के मतों में लगभग 55 हजार का अंतर था। इस प्रकार बहुमत ने सिलहट को पूर्वी बंगाल में शामिल करने का समर्थन किया।
➣ अंतिम सीमा निर्धारण के दौरान सिलहट का करीमगंज उपखंड भारत में रहा, जबकि शेष प्रमुख भाग पूर्वी पाकिस्तान में शामिल हुआ। इस तरह सिलहट के मामले में जनता ने जनमत संग्रह के माध्यम से अपना निर्णय दिया, लेकिन भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच अंतिम सीमा सीमा-निर्धारण की प्रक्रिया से तय हुई।
➣ सिलहट के अधिकांश भाग के पूर्वी पाकिस्तान में चले जाने से असम का क्षेत्रफल और उसकी मुस्लिम-बहुल आबादी का एक हिस्सा कम हो गया। कुछ ऐतिहासिक व्याख्याओं के अनुसार, इस घटनाक्रम ने असम के भारत में बने रहने की स्थिति को भी प्रभावित किया अर्थात असम के भारत में बने रहने का मार्ग और पक्का हुआ।
➣ NWFP और सिलहट की तुलना:
| बिंदु | NWFP | सिलहट |
|---|---|---|
| स्थिति | पूरा प्रांत | असम का एक जिला |
| तिथि | 6 जुलाई, 1947 से | 6-7 जुलाई, 1947 |
| विकल्प | वर्तमान या नई संविधान सभा | असम में रहना या पूर्वी बंगाल में जाना |
| शर्त | सीधा प्रावधान | बंगाल के विभाजन पर निर्भर |
| बहिष्कार | कांग्रेस और खुदाई खिदमतगार | नहीं |
| परिणाम | पाकिस्तान (भारी अंतर) | पाकिस्तान (सीमित अंतर, लगभग 55 हज़ार) |
दोनों जनमत संग्रहों में बहुमत ने पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय दिया, पर NWFP में तीसरे विकल्प और बहिष्कार का विवाद था, जबकि सिलहट में निर्णय अधिक सीधा और सीमित अंतर का रहा।
सिंध की स्थिति
➣ सिंध को 1936 में बंबई प्रेसीडेंसी से अलग करके स्वतंत्र प्रांत बनाया गया था। यह मुस्लिम-बहुल प्रांत था, जहाँ 1941 की जनगणना के अनुसार लगभग 26% आबादी हिंदू थी।
➣ पाकिस्तान की माँग के समर्थन में प्रस्ताव पारित करने वाली पहली प्रांतीय विधानसभा के रूप में सिंध विधानसभा का विशेष स्थान है। 3 मार्च, 1943 को जी. एम. सैयद द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के माध्यम से विधानसभा ने पाकिस्तान के पक्ष में अपना समर्थन व्यक्त किया था। इस पृष्ठभूमि ने 1947 में सिंध के निर्णय की दिशा को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ 3 जून, 1947 की योजना में प्रांत के विभाजन का प्रावधान केवल पंजाब और बंगाल के लिए था। सिंध में कोई सटा हुआ हिंदू-बहुल क्षेत्र नहीं था, इसलिए वहाँ प्रांत के विभाजन का प्रश्न नहीं उठा। सिंध विधानसभा को केवल यह तय करना था कि प्रांत भारत की मौजूदा संविधान सभा में शामिल होगा या पाकिस्तान की संविधान सभा में।
➣ 26 जून, 1947 को सिंध विधानसभा की विशेष बैठक में बहुमत ने पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने के पक्ष में निर्णय लिया। इस प्रकार सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बनने की दिशा में आगे बढ़ा।
➣ विभाजन के बाद बड़ी संख्या में सिंधी हिंदू भारत आ गए। इसके बाद 1948 में कराची को सिंध से अलग करके पाकिस्तान की संघीय राजधानी बनाया गया।
बलूचिस्तान की स्थिति
➣ बलूचिस्तान में चुनी हुई विधानसभा नहीं थी, इसलिए यहाँ पंजाब और बंगाल की तरह विधानसभा के मतदान या उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) की तरह जनमत संग्रह की पद्धति अपनाना संभव नहीं था। उस समय इस क्षेत्र में तीन अलग-अलग प्रकार की राजनीतिक इकाइयाँ थीं।
➣ ब्रिटिश बलूचिस्तान मुख्य आयुक्त के अधीन एक प्रांत था, जिसमें क्वेटा-पिशिन, झोब और लोरालाई जैसे क्षेत्र शामिल थे। यहाँ सीधे ब्रिटिश शासन था और 3 जून, 1947 की योजना का प्रावधान इसी क्षेत्र पर लागू होता था।
➣ इसके विपरीत, कलात, मकरान, लास बेला और खारान रियासतें थीं, जिनके संबंध में रियासतों वाली नीति लागू थी (विवरण खंड: देशी रियासतों का प्रश्न)। मर्री-बुगटी जैसे कबायली क्षेत्रों की स्थिति भी इन दोनों से अलग थी।
➣ ब्रिटिश बलूचिस्तान के संबंध में योजना में कहा गया था कि गवर्नर-जनरल वहाँ की जनता की इच्छा जानने की व्यवस्था करेंगे। इसी उद्देश्य से 29 जून, 1947 को शाही जिरगा (सरदारों की परिषद) और क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों ने बैठक की। इन दोनों निकायों ने सर्वसम्मति से पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में निर्णय लिया। कुछ स्रोतों में इस निर्णय की तारीख 30 जून भी दी गई है।
➣ कलात रियासत का मामला इससे अलग था। कलात के खान मीर अहमद यार खान का मानना था कि उनकी रियासत की स्थिति अन्य रियासतों से भिन्न थी। उल्लेखनीय है कि मुहम्मद अली जिन्ना पहले कलात के कानूनी सलाहकार रह चुके थे।
➣ अगस्त 1947 के आरंभ में दिल्ली में माउंटबेटन, जिन्ना, लियाकत अली खान और कलात के प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई। इसके बाद पाकिस्तान और कलात के बीच एक यथास्थिति समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत कलात की पृथक स्थिति को स्वीकार किया गया। कलात के खान ने स्वतंत्रता का दावा किया, लेकिन यह स्थिति अधिक समय तक कायम नहीं रही।
➣ मार्च 1948 में मकरान, लास बेला और खारान पाकिस्तान में शामिल हो गए। इसी महीने कलात का भी पाकिस्तान में विलय हुआ। इसके बाद कलात में इस विलय का विरोध हुआ और विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हुई।
➣ ब्रिटिश बलूचिस्तान के पाकिस्तान में शामिल होने की प्रक्रिया को लेकर भी मतभेद रहे हैं, क्योंकि निर्णय किसी निर्वाचित प्रांतीय विधानसभा के बजाय शाही जिरगा और नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों ने लिया था। बलूच राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से इस प्रक्रिया को अपर्याप्त माना जाता है, जबकि पाकिस्तान सरकार इसे वैध निर्णय मानती है।
देशी रियासतों का प्रश्न
➣ योजना ने रियासतों के लिए कोई नई नीति नहीं बनाई। उसने कैबिनेट मिशन के 12 मई, 1946 के ज्ञापन की नीति यथावत रखी: ब्रिटिश सर्वोच्चता किसी उत्तराधिकारी सरकार को नहीं सौंपी जाएगी, वह समाप्त होगी, और रियासतों के अधिकार उन्हें लौट जाएँगे। (कानूनी बारीकी: स्वतंत्रता अधिनियम अध्याय)
➣ रियासतों के सामने सैद्धांतिक रूप से तीन रास्ते थे: भारत में जाना, पाकिस्तान में जाना, या स्वतंत्र रहना। अनेक स्रोतों के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया कि वह किसी रियासत को पृथक डोमिनियन के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। माउंटबेटन ने भी 25 जुलाई के भाषण में रियासतों के लिए डोमिनियन स्टेटस की संभावना से इनकार किया।
➣ रियासतों के भविष्य को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के विचार अलग थे। कांग्रेस का मानना था कि संप्रभुता का वास्तविक आधार जनता है, इसलिए रियासतों के शासकों को जनता की इच्छा की अनदेखी करके स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों के रूप में निर्णय नहीं लेना चाहिए।
➣ इसके विपरीत, 17 जून, 1947 को जिन्ना ने सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद रियासतों को कानूनी रूप से स्वतंत्र मानते हुए अपना भविष्य तय करने का अधिकार होने की बात कही।
➣ कुछ रियासतों के शासकों ने स्वतंत्र रहने की इच्छा भी व्यक्त की। त्रावणकोर के दीवान सी. पी. रामास्वामी अय्यर ने जून 1947 में स्वतंत्र रहने की मंशा जताई। हैदराबाद के निज़ाम ने 11 जून, 1947 के फ़रमान में किसी भी डोमिनियन में शामिल न होने की घोषणा की।
➣ इसी प्रकार, नरेंद्र मंडल के चांसलर भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान भी रियासतों के विलय के विरोधी थे और उन्होंने जून 1947 के आरंभ में चांसलर पद से त्यागपत्र दे दिया।
➣ माउंटबेटन उस समय भारत के वायसराय होने के साथ-साथ क्राउन रिप्रेज़ेंटेटिव भी थे, इसलिए रियासतों के साथ सर्वोच्चता के संबंध को समाप्त करना उनका ही काम था। उन्होंने शासकों से कहा कि विलय का निर्णय अंततः शासक का है, पर निर्णय भौगोलिक निकटता और जनता की इच्छा को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
➣ 25 जुलाई, 1947 को नरेंद्र मंडल में भाषण देते हुए माउंटबेटन ने शासकों को आगाह किया कि वे अपने पड़ोसी डोमिनियन की उपेक्षा नहीं कर सकते। उनका तर्क था कि भौगोलिक स्थिति और व्यावहारिक आवश्यकताओं को देखते हुए स्वतंत्र रहना उचित विकल्प नहीं होगा।
➣ माउंटबेटन ने रियासतों से भारत या पाकिस्तान के साथ अभिगमन पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया। इसके अंतर्गत रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे तीन विषय संबंधित डोमिनियन को सौंपे जाने थे, जबकि अन्य विषयों में रियासतों की आंतरिक स्वायत्तता बनी रह सकती थी।
➣ मौजूदा प्रशासनिक और अन्य व्यवस्थाओं को जारी रखने के लिए यथास्थिति समझौते (Standstill Agreement) का भी प्रावधान रखा गया था। रियासतों से 15 अगस्त, 1947 तक निर्णय लेने का आग्रह किया गया।
➣ भारत सरकार ने भी रियासतों के साथ संबंधों को व्यवस्थित करने के लिए अलग विभाग बनाने की प्रक्रिया शुरू की। 13 जून, 1947 को इस संबंध में निर्णय लिया गया और 5 जुलाई, 1947 को रियासत विभाग का गठन हुआ।
➣ कुछ स्रोतों में इससे संबंधित निर्णयों और विभाग की स्थापना के लिए 25–27 जून की तारीखें भी मिलती हैं। इस विभाग के मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और सचिव वी. पी. मेनन थे।
➣ 5 जुलाई, 1947 को भारत सरकार ने रियासतों के प्रति अपनी नीति का वक्तव्य जारी किया। भारत सर्वोच्चता का उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहता और रियासतों से तत्काल सभी विषयों पर विलय के बजाय मुख्यतः रक्षा, विदेश मामले और संचार के संबंध में विलय चाहता था ताकि रियासतों की आंतरिक स्वायत्तता बनी रहे।
➣ अधिकांश रियासतों ने 15 अगस्त, 1947 तक भारत या पाकिस्तान में विलय स्वीकार कर लिया। जबकि विवादित मामले मुख्यतः तीन रहे-
| रियासत | प्रारंभिक स्थिति | आगे की स्थिति |
|---|---|---|
| हैदराबाद | निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहता था | नवंबर 1947 में भारत के साथ एक वर्ष का यथास्थिति समझौता; सितंबर 1948 की सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो) के बाद भारत में एकीकरण |
| जूनागढ़ | हिंदू-बहुल, शासक (नवाब) मुस्लिम; पाकिस्तान में विलय की घोषणा (15 सितंबर, 1947) | भारत की कार्रवाई और फरवरी 1948 के जनमत संग्रह के बाद भारत में शामिल |
| जम्मू-कश्मीर | मुस्लिम-बहुल, शासक (हरि सिंह) हिंदू; प्रारंभ में स्वतंत्र रहने की इच्छा | अक्टूबर 1947 के कबायली हमले के बाद 26 अक्टूबर, 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर |
स्वतंत्रता के समय 560 से अधिक रियासतें थीं। विलय की प्रक्रिया माउंटबेटन, पटेल और मेनन के प्रयासों से आगे बढ़ी। (विस्तृत अध्ययन के लिए देशी रियासतों का विलय वाला अध्याय देखें)
सत्ता हस्तांतरण की तिथि में परिवर्तन
➣ 20 फरवरी, 1947 की ब्रिटिश घोषणा में सत्ता हस्तांतरण की अंतिम समय-सीमा जून 1948 रखी गई थी। लेकिन 24 मार्च, 1947 को वायसराय का पद संभालने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने इस प्रक्रिया को निर्धारित समय से पहले पूरा करने का निर्णय लिया।
➣ वर्ष 1946–47 में सांप्रदायिक हिंसा लगातार बढ़ रही थी, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव पड़ रहा था। अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेदों के कारण शासन-कार्य भी बाधित हो रहा था।
➣ माउंटबेटन को आशंका थी कि सत्ता हस्तांतरण में देरी होने से स्थिति और बिगड़ सकती है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रमुख नेतृत्व भी शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के पक्ष में थे। (विस्तार: अंतरिम सरकार अध्याय)
➣ 3 जून, 1947 की योजना में विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा प्रस्तुत की गई, लेकिन निश्चित तारीख की घोषणा अगले दिन हुई। 4 जून, 1947 को नई दिल्ली में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख 15 अगस्त, 1947 घोषित की।
➣ बाद में उन्होंने बताया कि इस तारीख को चुनने का एक कारण द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगाँठ थी। 15 अगस्त, 1945 को जापान के सम्राट ने आत्मसमर्पण की घोषणा की थी। उस समय माउंटबेटन दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सर्वोच्च कमान के प्रमुख थे।
➣ भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 में 15 अगस्त, 1947 को नियत दिन (Appointed Day) घोषित किया गया। इसी दिन से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन के रूप में स्थापित होने थे। (विस्तार: स्वतंत्रता अधिनियम अध्याय)
➣ पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक 10 अगस्त, 1947 को कराची में हुई। 11 अगस्त को मोहम्मद अली जिन्ना सभा के अध्यक्ष चुने गए। इसी दिन अपने प्रसिद्ध भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता दिए जाने की बात कही।
➣ 14 अगस्त, 1947 को कराची में माउंटबेटन की उपस्थिति में सत्ता हस्तांतरण समारोह आयोजित हुआ। इसके अगले दिन, 15 अगस्त को जिन्ना ने पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल के रूप में शपथ ली।
➣ भारत में 14–15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को दिल्ली में संविधान सभा का विशेष सत्र आयोजित हुआ। इस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (नियति से साक्षात्कार) दिया। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र डोमिनियन बना।
➣ माउंटबेटन दोनों डोमिनियनों के साझा गवर्नर-जनरल बने रहने के इच्छुक थे, लेकिन 2 जुलाई, 1947 को जिन्ना ने पाकिस्तान का गवर्नर-जनरल बनने की अपनी इच्छा स्पष्ट कर दी।
➣ इसके बाद जिन्ना ने यह पद संभाला, जबकि माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने और जून 1948 तक इस पद पर रहे। उनके बाद सी. राजगोपालाचारी भारत के गवर्नर-जनरल बने।
कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया
➣ योजना की घोषणा 3 जून, 1947 को ब्रिटिश संसद में और भारत में एक साथ हुई, और प्रमुख दलों की औपचारिक स्वीकृति जून 1947 के भीतर ही मिल गई।
कांग्रेस
➣ कांग्रेस नेतृत्व ने अंततः 3 जून, 1947 की योजना को स्वीकार करने का निर्णय लिया। इसमें जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका प्रमुख थी। इस निर्णय के पीछे की परिस्थितियों का विवरण ऊपर के खंड ‘सत्ता हस्तांतरण की तिथि में परिवर्तन’ में दिया गया है।
➣ 14–15 जून, 1947 को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस अध्यक्ष जे. बी. कृपलानी ने की।
➣ कुछ स्रोतों के अनुसार, गोविन्द बल्लभ पंत ने योजना स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव लगभग 157 मतों के पक्ष और 29 मतों के विरोध में पारित हुआ। कुछ सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया या तटस्थ रहे।
➣ प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया कि कांग्रेस विभाजन को अवांछनीय मानती है, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में उसे विवश होकर स्वीकार कर रही है। साथ ही, यह अपेक्षा व्यक्त की गई कि विभाजन की प्रक्रिया में अशांति को न्यूनतम रखा जाए और दोनों पक्षों के अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा की जाए।
➣ कांग्रेस के भीतर भी इस निर्णय का विरोध हुआ। पुरुषोत्तम दास टंडन और सैफुद्दीन किचलू जैसे नेताओं ने योजना का विरोध किया। कुछ स्रोतों के अनुसार, समाजवादी नेता भी विभाजन के पक्ष में नहीं थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद प्रारंभ से ही अखंड भारत के समर्थक थे। कुछ स्रोतों के अनुसार, वे AICC की बैठक में मौन रहे और मतदान में तटस्थ रहे।
➣ महात्मा गांधी व्यक्तिगत रूप से भारत के विभाजन के विरोधी थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय के विरुद्ध विरोध का नेतृत्व नहीं किया। उनका मत था कि विभाजन की जिम्मेदारी केवल वायसराय पर नहीं डाली जा सकती; इसमें भारतीय नेतृत्व के निर्णय की भी भूमिका थी।
मुस्लिम लीग
➣ 9 जून, 1947 को दिल्ली में मुस्लिम लीग की काउंसिल की बैठक हुई, जिसमें 3 जून की माउंटबेटन योजना पर विचार किया गया। काउंसिल ने इसे समझौते के आधार के रूप में स्वीकार किया और जिन्ना को आगे की वार्ताएँ करने तथा योजना से संबंधित आवश्यक निर्णय लेने का अधिकार दिया।
➣ हालांकि, मुस्लिम लीग ने योजना को पूर्णतः संतोषजनक नहीं माना। उसकी मुख्य आपत्ति पंजाब और बंगाल के विभाजन पर थी। जिन्ना संपूर्ण पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे। उनके अनुसार, इन दोनों प्रांतों के विभाजन से पाकिस्तान का क्षेत्र और संसाधन कम हो जाते तथा वह एक कटा-फटा पाकिस्तान बनकर रह जाता।
➣ इसके बावजूद जिन्ना ने लीग काउंसिल को योजना स्वीकार करने की सलाह दी। उनका मानना था कि योजना को ठुकराने से पाकिस्तान की स्थापना का अवसर हाथ से निकल सकता है।
➣ इसलिए लीग ने अपनी असहमति के बावजूद इसे समझौते के रूप में स्वीकार किया। उसने यह भी स्पष्ट रखा कि पूर्ण पंजाब और बंगाल सहित पाकिस्तान की उसकी मूल आकांक्षा पूरी नहीं हुई थी।
सिखों एवं अन्य राजनीतिक समूहों की प्रतिक्रिया
➣ बलदेव सिंह ने सिखों की ओर से योजना स्वीकार की, लेकिन मास्टर तारा सिंह और अकाली नेतृत्व में असंतोष बना रहा। पंजाब के विभाजन से सिख आबादी, कृषि भूमि और उनके अनेक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल दोनों ओर बँट रहे थे।
➣ सिख नेतृत्व ने इससे पहले पृथक सिख राज्य या विशेष संरक्षण की माँग भी की थी, लेकिन योजना में इन माँगों को स्वीकार नहीं किया गया। पंजाब सीमा आयोग में सिखों का प्रतिनिधित्व करने के लिए तेजा सिंह को सदस्य बनाया गया।
➣ हिंदू महासभा ने पाकिस्तान और धर्म के आधार पर भारत के विभाजन का विरोध किया, लेकिन पंजाब और बंगाल के विभाजन की माँग का समर्थन किया। बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस माँग का नेतृत्व किया।
➣ जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिंद तथा कांग्रेस से जुड़े अनेक राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता भी भारत के विभाजन के विरोधी थे। उनका दृष्टिकोण मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग से अलग था।
➣ सीमांत प्रांत में खुदाई खिदमतगारों की प्रतिक्रिया और रियासतों के शासकों का रुख अलग-अलग था, जिनका विवरण ऊपर “बलूचिस्तान की स्थिति” वाले भाग में दिया गया है।
प्रमुख नेताओं और संगठनों का रुख| नेता / संगठन | रुख | विवरण |
|---|---|---|
| महात्मा गांधी | व्यक्तिगत रूप से विरोधी | विभाजन को भारत की एकता के विरुद्ध माना; कांग्रेस के निर्णय का विरोध नहीं किया। |
| जवाहरलाल नेहरू | परिस्थितियों में स्वीकार | शीघ्र सत्ता हस्तांतरण और स्थिर शासन के लिए निर्णय स्वीकार किया; प्लान बाल्कन का विरोध करके योजना के पुनर्गठन में भूमिका निभाई। |
| सरदार पटेल | परिस्थितियों में स्वीकार | प्रशासनिक गतिरोध और सांप्रदायिक टकराव को देखते हुए विभाजन स्वीकार किया। |
| मौलाना आज़ाद | प्रारंभ में विरोधी | अखंड भारत के पक्षधर रहे; कुछ स्रोतों के अनुसार AICC में मौन रहे और मतदान में तटस्थ रहे। |
| पुरुषोत्तम दास टंडन | विरोधी | योजना का विरोध किया। |
| मोहम्मद अली जिन्ना | स्वीकार (असंतुष्ट) | पाकिस्तान की माँग पूरी हुई, पर पंजाब-बंगाल के विभाजन से असंतोष रहा। |
| खान अब्दुल गफ्फार खान | कड़े विरोधी | कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय पर गहरी निराशा व्यक्त की और जनमत संग्रह का बहिष्कार किया। |
| बलदेव सिंह | स्वीकार | सिखों की ओर से योजना को स्वीकार किया। |
| मास्टर तारा सिंह | असंतुष्ट | सिख हितों की सुरक्षा पर चिंता; पृथक सिख राज्य की माँग स्वीकार नहीं हुई। |
| हिन्दू महासभा | विभाजन विरोधी | पाकिस्तान का विरोध; पंजाब-बंगाल के विभाजन की माँग। |
| जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिंद | विभाजन विरोधी | धर्म के आधार पर विभाजन का विरोध। |
योजना को मुस्लिम लीग (9 जून), कांग्रेस (14-15 जून) और सिख प्रतिनिधि (3 जून) ने स्वीकार किया। यह स्वीकृति सभी पक्षों में पूर्ण संतोष की नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य थी।
योजना का क्रियान्वयन
➣ विभाजन की रूपरेखा को कानूनी रूप देने के लिए भारतीय स्वतंत्रता विधेयक 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया। 18 जुलाई, 1947 को इसे शाही स्वीकृति मिल गई और यह भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 बन गया। (विस्तार: स्वतंत्रता अधिनियम,1947 वाले अध्याय में)
➣ विभाजन की प्रशासनिक प्रक्रिया को संभालने के लिए 12 जून, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन की अध्यक्षता में एक विभाजन समिति बनाई गई। बाद में, 26–27 जून, 1947 के आसपास इसे विभाजन परिषद के रूप में पुनर्गठित किया गया।
➣ परिषद में कांग्रेस की ओर से सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मुस्लिम लीग की ओर से मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान तथा सिख प्रतिनिधि के रूप में सरदार बलदेव सिंह शामिल थे। प्रारंभिक समिति में मुस्लिम लीग की ओर से अब्दुर रब निश्तर थे, जिनका स्थान बाद में जिन्ना ने लिया।
➣ विभाजन परिषद के कामकाज में सहायता के लिए एक संचालन समिति बनाई गई, जिसमें भारत की ओर से एच. एम. पटेल और पाकिस्तान की ओर से चौधरी मुहम्मद अली प्रमुख अधिकारी थे। इनके साथ विभिन्न विभागों की परिसंपत्तियों, कर्मचारियों, अभिलेखों और अन्य संसाधनों के बँटवारे के लिए विशेषज्ञ समितियाँ भी गठित की गईं।
➣ दोनों देशों के बीच परिसंपत्तियों का बँटवारा अलग-अलग श्रेणियों के आधार पर किया गया। मुद्रा, सिक्कों, राजस्व टिकटों और स्वर्ण भंडार जैसी मौद्रिक एवं तरल परिसंपत्तियों का विभाजन 82.5 : 17.5 के अनुपात में हुआ, जबकि सरकारी फर्नीचर, स्टेशनरी और अन्य चल संपत्तियों का बँटवारा 80 : 20 के अनुपात में किया गया (भारत : पाकिस्तान)।
➣ विभाजन से उत्पन्न विवादों के निपटारे के लिए 12 अगस्त, 1947 को एक मध्यस्थ अधिकरण (Arbitral Tribunal) गठित किया गया, जिसकी अध्यक्षता सर पैट्रिक स्पेंस ने की।
➣ सशस्त्र बलों का विभाजन फील्ड मार्शल सर क्लॉड ऑचिनलेक के सर्वोच्च कमांडर रहते हुए किया गया। दोनों डोमिनियनों के बीच रक्षा-संबंधी मामलों में समन्वय बनाए रखने के लिए संयुक्त रक्षा परिषद बनाई गई।
➣ पंजाब में सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिए जुलाई 1947 में पंजाब सीमा बल का गठन किया गया। यह बल 1 अगस्त से 1 सितंबर, 1947 तक सक्रिय रहा, लेकिन हिंसा को रोकने में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के कारण इसे भंग कर दिया गया।
➣ विभाजन के दौरान भारतीय सिविल सेवा, पुलिस और अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को भारत या पाकिस्तान में सेवा जारी रखने का विकल्प दिया गया।
➣ चूँकि अधिकांश केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में स्थित थे, इसलिए पाकिस्तान को कराची में अपना केंद्रीय प्रशासन स्थापित करने के लिए नए सिरे से कार्यालय, आवास और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ विकसित करनी पड़ीं।
➣ पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए सीमा आयोगों की घोषणा 30 जून, 1947 को की गई। दोनों आयोगों के अध्यक्ष सर सिरिल रेडक्लिफ थे। सीमा निर्धारण और रेडक्लिफ अवार्ड का विस्तृत विवरण खंड ‘पंजाब और बंगाल का विभाजन’ में दिया गया है।
➣ सत्ता हस्तांतरण के साथ दोनों देशों में नई सरकारों का गठन हुआ। भारत में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पहला मंत्रिमंडल बना, जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल उप-प्रधानमंत्री बने।
➣ पाकिस्तान में लियाकत अली खान प्रथम प्रधानमंत्री बने, जबकि मोहम्मद अली जिन्ना गवर्नर-जनरल और संविधान सभा के अध्यक्ष बने। विभाजित प्रांतों में पश्चिम बंगाल के प्रथम राज्यपाल सी. राजगोपालाचारी, पूर्वी पंजाब के चंदूलाल त्रिवेदी, पश्चिमी पंजाब के फ्रांसिस मुडी और पूर्वी बंगाल के फ्रेडरिक बोर्न बने।
➣ अंततः 14 अगस्त, 1947 को कराची में पाकिस्तान और 15 अगस्त, 1947 को दिल्ली में भारत में सत्ता हस्तांतरण के समारोह हुए। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार, दोनों स्वतंत्र डोमिनियन 15 अगस्त, 1947 से अस्तित्व में आए। (विस्तार खंड: ‘सत्ता हस्तांतरण की तिथि में परिवर्तन’)
घटनाक्रम तालिका (मार्च-अगस्त 1947):| तिथि (1947) | घटना |
|---|---|
| 24 मार्च | माउंटबेटन ने वायसराय का पदभार संभाला |
| 10 मई | प्लान बाल्कन पर नेहरू की आपत्ति (शिमला) |
| 18 / 31 मई | माउंटबेटन लंदन गए / वापस लौटे |
| 2 जून | सात नेताओं से बैठक |
| 3 जून | योजना की घोषणा |
| 4 जून | पत्रकार सम्मेलन; 15 अगस्त की तिथि की घोषणा |
| 9 जून | मुस्लिम लीग काउंसिल की स्वीकृति |
| 14-15 जून | AICC की स्वीकृति |
| 20 जून | बंगाल विधानसभा का निर्णय |
| 23 जून | पंजाब विधानसभा का निर्णय |
| 26 जून | सिंध विधानसभा का निर्णय |
| 29 जून | ब्रिटिश बलूचिस्तान का निर्णय |
| 30 जून | सीमा आयोगों की घोषणा |
| 4 / 18 जुलाई | स्वतंत्रता विधेयक प्रस्तुत / शाही स्वीकृति |
| 6-7 जुलाई | सिलहट जनमत संग्रह |
| 6 जुलाई से | NWFP जनमत संग्रह (परिणाम 20 जुलाई) |
| 8 जुलाई | रेडक्लिफ भारत पहुँचे |
| 25 जुलाई | नरेंद्र मंडल में माउंटबेटन का भाषण |
| 1 अगस्त | पंजाब सीमा बल सक्रिय (स्थापना 17 जुलाई; भंग 1 सितंबर) |
| 10-11 अगस्त | पाकिस्तान की संविधान सभा की बैठक; जिन्ना अध्यक्ष चुने गए (11 अगस्त) |
| 14 / 15 अगस्त | पाकिस्तान / भारत को सत्ता हस्तांतरण |
| 17 अगस्त | रेडक्लिफ अवार्ड सार्वजनिक |
विभाजन के साथ हुई सांप्रदायिक हिंसा और जनसंख्या-अंतरण का विवरण इस अध्याय के क्षेत्र से बाहर है और अलग सामग्री में दिया जाना उपयुक्त है। विभिन्न स्रोतों में इसके अनुमान अलग-अलग मिलते हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार मृतकों की संख्या लगभग दस लाख थी, जबकि अन्य स्रोतों में इससे कम या अधिक संख्या दी गई है; विस्थापितों की संख्या 1 से 2 करोड़ के बीच बताई जाती है।
माउंटबेटन योजना का महत्त्व
➣ राजनीतिक गतिरोध का समाधान: इससे पूर्व क्रिप्स प्रस्ताव (1942), वेवल योजना (1945) और कैबिनेट मिशन योजना (1946) कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सर्वमान्य समाधान नहीं दे सकी थीं। 3 जून की योजना को जून 1947 के भीतर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधि, तीनों की स्वीकृति मिल गई।
➣ सत्ता हस्तांतरण का स्पष्ट मार्ग: योजना ने प्रत्येक प्रांत और क्षेत्र के लिए निर्णय की पद्धति निर्धारित की और डोमिनियन स्टेटस के आधार पर शीघ्र सत्ता हस्तांतरण का आधार तैयार किया।
➣ ब्रिटिश शासन का अंत: सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा जून 1948 से घटकर 15 अगस्त, 1947 हो गई। इस प्रकार ब्रिटिश शासन पूर्व निर्धारित समय से लगभग दस माह पहले समाप्त हुआ।
➣ भारत और पाकिस्तान का गठन: योजना के अंतर्गत हुए निर्णयों के परिणामस्वरूप दो स्वतंत्र डोमिनियन अस्तित्व में आए। पाकिस्तान में पश्चिमी पंजाब, सिंध, NWFP, बलूचिस्तान, पूर्वी बंगाल और सिलहट शामिल हुए। वह दो भौगोलिक भागों, पश्चिमी और पूर्वी, में बँटा रहा, जिनके बीच अनेक स्रोतों के अनुसार लगभग 1,600 किलोमीटर का भारतीय भू-भाग था।
➣ संविधान निर्माण की प्रक्रिया: संविधान सभा का विभाजन हुआ। पाकिस्तान के क्षेत्रों के प्रतिनिधि अलग संविधान सभा में गए और भारत की संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर लगभग 299 रह गई। 15 अगस्त, 1947 के बाद उसने संविधान निर्माण के साथ विधायी कार्य भी किया। (संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत हुआ था)
➣ रियासतों के विलय की प्रक्रिया: ब्रिटिश सर्वोच्चता की समाप्ति के साथ रियासतों के भारत या पाकिस्तान में विलय की प्रक्रिया आरंभ हुई।
➣ संवैधानिक स्थिति: दोनों राज्य आरंभ में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत डोमिनियन थे। भारत 26 जनवरी, 1950 को गणराज्य बना और पाकिस्तान 1956 में।
सार: 3 जून की योजना के अंतर्गत पंजाब-बंगाल का विभाजन, NWFP और सिलहट के जनमत संग्रह, सीमा आयोगों का गठन और डोमिनियन स्टेटस के आधार पर 14-15 अगस्त, 1947 को सत्ता हस्तांतरण संपन्न हुआ।
सीमाएँ एवं आलोचना
➣ समय-सीमा: योजना की घोषणा (3 जून) और सत्ता हस्तांतरण (15 अगस्त) के बीच लगभग दस सप्ताह का अंतर था। इसी अवधि में सेना, वित्त, प्रशासन और सीमाओं के विभाजन की व्यवस्था की जानी थी। आलोचकों के अनुसार इतने कम समय में यह कार्य सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न होना संभव नहीं था।
➣ सीमा निर्धारण: रेडक्लिफ को निर्णय के लिए लगभग पाँच सप्ताह मिले और दोनों आयोगों के सदस्य सांप्रदायिक आधार पर विभाजित थे। अवार्ड स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक हुआ, इसलिए स्वतंत्रता के दिन तक अनेक क्षेत्रों के निवासियों को यह ज्ञात नहीं था कि वे किस देश के अंतर्गत हैं।
➣ विवादित निर्णय: गुरदासपुर, फ़िरोज़पुर और ज़ीरा तहसील, चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र तथा खुलना और मुर्शिदाबाद से संबंधित निर्णय विवाद का विषय रहे (विवरण खंड: पंजाब और बंगाल का विभाजन)।
➣ सुरक्षा व्यवस्था: अनेक स्रोतों के अनुसार योजना में बड़े पैमाने पर जनसंख्या-अंतरण के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। पंजाब में शांति-व्यवस्था के लिए गठित पंजाब सीमा बल सितंबर के आरंभ में भंग हो गया। अनेक इतिहासकारों के अनुसार विभाजन के साथ हुई सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन की व्यापकता इन व्यवस्थाओं के अनुमान से कहीं अधिक सिद्ध हुई।
➣ सिख समुदाय: पंजाब के विभाजन से सिख समुदाय दो देशों में बँट गया, जबकि योजना में उनके लिए कोई पृथक या विशेष प्रावधान नहीं किया गया था।
➣ रियासतों का प्रश्न: योजना में रियासतों के भविष्य का निर्णय उनके शासकों पर छोड़ा गया। परिणामस्वरूप हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर के विलय का प्रश्न विवादित रहा, और जम्मू-कश्मीर का प्रश्न भारत-पाकिस्तान संबंधों में दीर्घकालीन विवाद बन गया।
➣ इतिहासकारों के मत: यास्मीन खान (The Great Partition, 2007) ने विभाजन की शीघ्रता और अपर्याप्त प्रशासनिक तैयारी को हिंसा की व्यापकता से जोड़ा है। पेंडरेल मून की कृति Divide and Quit (1961) इसी अवधि का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है।
➣ इसके विपरीत माउंटबेटन और उनके समर्थकों का तर्क रहा कि प्रशासनिक व्यवस्था विघटित हो रही थी और विलंब से गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। आयशा जलाल (The Sole Spokesman, 1985) ने तर्क दिया है कि जिन्ना की पाकिस्तान की माँग प्रारंभ में राजनीतिक सौदेबाज़ी का साधन भी थी, जो अंततः वास्तविकता बन गई।
योजना की आलोचना मुख्यतः समय-सीमा, सीमा निर्धारण, सुरक्षा व्यवस्था और रियासतों के प्रश्न पर केंद्रित रही है। समर्थन में गृहयुद्ध और प्रशासनिक विघटन की आशंका का तर्क दिया गया।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ सिंध 1936 में बंबई प्रेसीडेंसी से अलग प्रांत बना, और 3 मार्च, 1943 को उसकी विधानसभा ने जी. एम. सैयद के प्रस्ताव पर पाकिस्तान के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया।
➣ 20 फरवरी, 1947 को एटली ने घोषणा की कि जून 1948 से पहले सत्ता भारतीय हाथों में सौंप दी जाएगी।
➣ 2 मार्च, 1947 को पंजाब की यूनियनिस्ट मंत्रिपरिषद (खिज़र हयात टिवाना) ने इस्तीफ़ा दिया, और 8 मार्च को कांग्रेस कार्यसमिति ने पंजाब के विभाजन का प्रस्ताव पारित किया।
➣ लॉर्ड माउंटबेटन 22 मार्च, 1947 को दिल्ली पहुँचे और 24 मार्च को वेवल के उत्तराधिकारी के रूप में वायसराय बने।
➣ 15 अप्रैल, 1947 को गांधी और जिन्ना ने हिंसा के विरुद्ध संयुक्त अपील जारी की।
➣ माउंटबेटन के प्रारंभिक मसौदे (प्लान बाल्कन) पर 10 मई, 1947 को शिमला में नेहरू ने आपत्ति की, और वह योजना छोड़ दी गई।
➣ वी. पी. मेनन ने डोमिनियन स्टेटस पर आधारित वैकल्पिक योजना प्रस्तुत की, जिसे माउंटबेटन 18 मई को स्वीकृति के लिए लंदन ले गए और 31 मई को लौटे।
➣ 2 जून, 1947 को वायसराय भवन में सात नेताओं (नेहरू, पटेल, कृपलानी, जिन्ना, लियाकत, निश्तार और बलदेव सिंह) के सामने योजना रखी गई।
➣ 3 जून, 1947 को योजना की घोषणा हुई, और उसी शाम माउंटबेटन, नेहरू, जिन्ना और बलदेव सिंह ने आकाशवाणी से प्रसारण किए।
➣ 4 जून के पत्रकार सम्मेलन में माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तिथि 15 अगस्त, 1947 बताई।
➣ योजना के अंतर्गत प्रश्न यह था कि प्रांत वर्तमान संविधान सभा में रहेंगे या नई संविधान सभा में जाएँगे।
➣ योजना डोमिनियन स्टेटस पर आधारित थी, और राष्ट्रमंडल में रहने या न रहने का अधिकार संविधान सभाओं के पास सुरक्षित रखा गया।
➣ 9 जून को मुस्लिम लीग काउंसिल ने योजना स्वीकार की और जिन्ना को निर्णय का अधिकार दिया।
➣ 14-15 जून को AICC ने लगभग 157-29 के मतों से योजना को स्वीकृति दी (कुछ स्रोतों के अनुसार प्रस्ताव गोविन्द बल्लभ पंत ने रखा)।
➣ 17 जून को जिन्ना ने कहा कि सर्वोच्चता समाप्त होने पर रियासतें स्वतंत्र होंगी।
➣ 20 जून को बंगाल और 23 जून को पंजाब की विधानसभाओं के खंडों ने मतदान किया, और दोनों प्रांतों का विभाजन तय हुआ।
➣ 21 जून को बन्नू प्रस्ताव में स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की माँग की गई।
➣ 26 जून को सिंध विधानसभा ने विशेष बैठक में पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का निर्णय लिया।
➣ 29 जून को ब्रिटिश बलूचिस्तान में शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों ने पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय दिया।
➣ 30 जून को दो सीमा आयोग घोषित हुए, जिनमें प्रत्येक के चार सदस्य थे और दोनों के अध्यक्ष सर सिरिल रेडक्लिफ थे।
➣ सीमा निर्धारण का आधार 1941 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुमत वाले सटे क्षेत्र थे, और आयोगों को “अन्य कारकों” पर भी विचार करना था।
➣ भारतीय स्वतंत्रता विधेयक 4 जुलाई को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत हुआ और 18 जुलाई को उसे शाही स्वीकृति मिली।
➣ 5 जुलाई को भारत सरकार ने रियासतों पर नीति-वक्तव्य जारी किया; रियासत विभाग के मंत्री पटेल और सचिव मेनन थे।
➣ 6-7 जुलाई को सिलहट में जनमत संग्रह हुआ, जिसमें लगभग 2.39 लाख मत पूर्वी बंगाल के पक्ष में और 1.84 लाख असम के पक्ष में पड़े।
➣ 6 जुलाई से NWFP में जनमत संग्रह हुआ; कांग्रेस और खुदाई खिदमतगारों ने बहिष्कार किया, और लगभग 2.89 लाख मत पाकिस्तान के पक्ष में तथा 2,874 भारत के पक्ष में पड़े।
➣ रेडक्लिफ 8 जुलाई को भारत पहुँचे।
➣ 25 जुलाई को माउंटबेटन ने नरेंद्र मंडल में रियासतों से रक्षा, विदेश मामले और संचार पर विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया।
➣ पंजाब सीमा बल 1 अगस्त से सक्रिय हुआ और सितंबर के आरंभ (1 सितंबर) तक कार्यरत रहने के बाद भंग कर दिया गया।
➣ पाकिस्तान की संविधान सभा की बैठक 10-11 अगस्त को हुई, और 11 अगस्त को जिन्ना उसके अध्यक्ष चुने गए।
➣ रेडक्लिफ अवार्ड 12 अगस्त तक तैयार हो चुका था और 17 अगस्त को सार्वजनिक किया गया।
➣ 14 अगस्त को कराची में पाकिस्तान को और 15 अगस्त को दिल्ली में भारत को सत्ता सौंपी गई; स्वतंत्रता अधिनियम में 15 अगस्त “नियत दिन” था।
➣ माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल हुए, और जून 1948 में सी. राजगोपालाचारी उनके उत्तराधिकारी बने।
➣ जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल और लियाकत अली खान प्रथम प्रधानमंत्री बने।
➣ 15 सितंबर, 1947 को जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा की, और 26 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के शासक ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
➣ कलात का पाकिस्तान में विलय मार्च 1948 में हुआ।
➣ जनमत संग्रह केवल NWFP और सिलहट में हुआ; शेष क्षेत्रों में निर्णय विधानसभा या सीमित निकायों ने लिया।
➣ मौद्रिक और तरल परिसंपत्तियों का विभाजन 82.5 : 17.5 (भारत : पाकिस्तान) के अनुपात में हुआ।
➣ विभाजन के बाद भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या लगभग 299 रह गई।
➣ पाकिस्तान दो भागों, पश्चिमी और पूर्वी, में बँटा था, जिनके बीच अनेक स्रोतों के अनुसार लगभग 1,600 किलोमीटर का भारतीय भू-भाग था।
➣ भारत 26 जनवरी, 1950 को और पाकिस्तान 1956 में गणराज्य बना।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947) ब्रिटिश सरकार की राजनीतिक घोषणा थी, जबकि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित वह कानून था, जिसने भारत और पाकिस्तान के दो स्वतंत्र डोमिनियन स्थापित करने की कानूनी व्यवस्था की। अधिनियम को 18 जुलाई, 1947 को शाही स्वीकृति मिली।
➣ 20 फरवरी, 1947 की एटली की घोषणा में सत्ता हस्तांतरण की अंतिम समय-सीमा जून 1948 रखी गई थी। 3 जून की योजना में इस समय-सीमा को आगे लाकर उसी वर्ष सत्ता हस्तांतरित करने की बात कही गई। हालाँकि, 15 अगस्त, 1947 की निश्चित तारीख योजना में नहीं दी गई थी; माउंटबेटन ने इसकी घोषणा 4 जून, 1947 के पत्रकार सम्मेलन में की थी।
➣ पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रावधान माउंटबेटन योजना में था, लेकिन रेडक्लिफ रेखा का निर्धारण उसमें नहीं किया गया था। इसके लिए सीमा आयोग गठित किए जाने थे। सर सिरिल रेडक्लिफ द्वारा तैयार सीमा संबंधी निर्णय 17 अगस्त, 1947 को सार्वजनिक किया गया।
➣ संविधान सभा का गठन माउंटबेटन योजना के अंतर्गत नहीं हुआ था; भारतीय संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना (1946) के आधार पर पहले ही हो चुका था। माउंटबेटन योजना ने विभाजन की स्थिति में मौजूदा संविधान सभा और पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा की व्यवस्था प्रस्तुत की।
➣ कैबिनेट मिशन योजना (1946) का उद्देश्य प्रांतों के समूहों वाले ढाँचे के माध्यम से भारत की एकता बनाए रखते हुए संविधान निर्माण का रास्ता निकालना था। इसके विपरीत, माउंटबेटन योजना (1947) ने भारत के विभाजन और दो डोमिनियन स्थापित करने की प्रक्रिया निर्धारित की।
➣ पंजाब और बंगाल में विभाजन का निर्णय लेने के लिए विधानसभाओं के सदस्यों को मुस्लिम-बहुल तथा गैर-मुस्लिम-बहुल जिलों के आधार पर दो भागों में बैठना था। यदि किसी एक भाग का साधारण बहुमत विभाजन के पक्ष में मतदान करता, तो प्रांत का विभाजन किया जाना था।
➣ विभाजन का निर्णय और संविधान सभा का चयन अलग-अलग चरण थे। विभाजन होने पर दोनों भाग अलग-अलग तय करते कि उनके प्रतिनिधि मौजूदा संविधान सभा में जाएँगे या नई संविधान सभा में। यदि विभाजन नहीं होता, तो पूरी विधानसभा के लिए संयुक्त निर्णय की व्यवस्था भी थी।
➣ जनमत संग्रह केवल उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और सिलहट में कराया गया। पंजाब और बंगाल में निर्णय प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिया। सिंध विधानसभा ने यह तय किया कि प्रांत किस संविधान सभा में शामिल होगा, जबकि ब्रिटिश बलूचिस्तान में निर्णय शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों ने लिया।
➣ उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के जनमत संग्रह में भारत की मौजूदा संविधान सभा या पाकिस्तान के लिए नई संविधान सभा में शामिल होने के विकल्प थे। स्वतंत्र पख्तूनिस्तान को तीसरे विकल्प के रूप में शामिल नहीं किया गया था।
➣ सिलहट असम प्रांत का जिला था, बंगाल का हिस्सा नहीं। वहाँ जनमत संग्रह कराने का प्रावधान इस शर्त पर था कि बंगाल का विभाजन हो और पूर्वी बंगाल अलग प्रांत के रूप में बने। जनमत संग्रह का उद्देश्य यह तय करना था कि सिलहट असम में बना रहेगा या पूर्वी बंगाल में शामिल होगा।
➣ रेडक्लिफ पंजाब और बंगाल, दोनों सीमा आयोगों के साझा अध्यक्ष थे। प्रत्येक आयोग में कांग्रेस द्वारा नामित दो और मुस्लिम लीग द्वारा नामित दो सदस्य थे। आयोगों को सटे हुए मुस्लिम तथा गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के आधार पर सीमा निर्धारित करने के साथ अन्य कारकों पर भी विचार करना था।
➣ सीमा आयोग, विभाजन परिषद और पंजाब सीमा बल तीन अलग-अलग संस्थाएँ थीं। सीमा आयोग का कार्य पंजाब और बंगाल की सीमाएँ निर्धारित करना था। विभाजन परिषद प्रशासनिक व्यवस्था, परिसंपत्तियों और सेवाओं के बँटवारे से संबंधित थी, जबकि पंजाब सीमा बल का गठन सांप्रदायिक हिंसा के दौरान शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया गया था।
➣ प्लान बाल्कन माउंटबेटन की प्रारंभिक योजना का मसौदा था, जिसमें सत्ता हस्तांतरण की वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया गया था। नेहरू ने इसके संभावित परिणामों पर गंभीर आपत्ति जताई। इसके बाद वी. पी. मेनन की योजना से प्रेरित संशोधित प्रस्ताव तैयार हुआ, जिसे 3 जून, 1947 को माउंटबेटन योजना के रूप में घोषित किया गया।
➣ 3 जून, 1947 को माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना और सरदार बलदेव सिंह ने आकाशवाणी से योजना के संबंध में प्रसारण किए। महात्मा गांधी इन प्रसारण करने वाले नेताओं में शामिल नहीं थे।
ब्रिटिश बलूचिस्तान और कलात जैसी रियासतों की स्थिति अलग थी। ब्रिटिश बलूचिस्तान के संबंध में 3 जून योजना के अंतर्गत निर्णय लिया गया, जबकि कलात, मकरान, लास बेला और खारान पर रियासतों से संबंधित नीति लागू थी। इसलिए ब्रिटिश बलूचिस्तान के पाकिस्तान में शामिल होने की प्रक्रिया को कलात के विलय के समान नहीं मानना चाहिए।➣ रियासतों के मामले में 3 जून योजना ने कैबिनेट मिशन के 12 मई, 1946 के ज्ञापन में निर्धारित नीति को बनाए रखा। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम लागू होने पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होनी थी। ब्रिटिश सरकार ने रियासतों को पृथक डोमिनियन के रूप में मान्यता देने का आश्वासन नहीं दिया था।
➣ भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र होने के समय डोमिनियन थे, गणराज्य नहीं। भारत 26 जनवरी, 1950 को गणराज्य बना, जबकि पाकिस्तान 1956 में गणराज्य बना। इसलिए स्वतंत्रता प्राप्ति और गणराज्य बनने की तिथियों में अंतर है।
➣ लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने, जबकि मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल थे। माउंटबेटन दोनों डोमिनियनों के साझा गवर्नर-जनरल नहीं बने।
➣ पाकिस्तान में सत्ता हस्तांतरण का समारोह 14 अगस्त, 1947 को और भारत में 15 अगस्त, 1947 को आयोजित हुआ। हालाँकि, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने 15 अगस्त, 1947 को दोनों डोमिनियनों के लिए नियत दिन घोषित किया था।
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