सी. राजगोपालाचारी (सी.आर.) फार्मूला (1944) : परिचय
1944 ई. में सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच चले आ रहे गतिरोध को समाप्त करने के लिए एक समझौता प्रस्ताव तैयार किया।
➣ इतिहास में यह प्रस्ताव सी.आर. फार्मूला के नाम से जाना जाता है और कहीं-कहीं इसे राजाजी फार्मूला भी कहा जाता है। यह कोई ब्रिटिश योजना नहीं थी, बल्कि एक भारतीय नेता की अपनी पहल थी, जिसे महात्मा गांधी का समर्थन मिला।
इस फार्मूले का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह था कि पहली बार कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने, गांधीजी की सहमति से, यह स्वीकार किया कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की जनता को जनमत-संग्रह के माध्यम से भारत से अलग होने का विकल्प दिया जा सकता है। यह विकल्प ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की शर्त से जुड़ा हुआ था।
यद्यपि मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया और यह फार्मूला लागू नहीं हो सका, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए है कि इसी के आधार पर 1944 में गांधीजी और जिन्ना के बीच प्रत्यक्ष वार्ता हुई तथा पाकिस्तान के प्रश्न पर कांग्रेस और लीग के बीच पहली बार ठोस राजनीतिक चर्चा संभव हुई।
प्रस्तावक — सी. राजगोपालाचारी | वर्ष — 1944 | स्वरूप — भारतीय पहल, ब्रिटिश योजना नहीं | मुख्य बिंदु — मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जनमत-संग्रह | परिणाम — जिन्ना द्वारा अस्वीकार, लागू नहीं हुआ | संबंध — गांधी–जिन्ना वार्ता का आधार।
सी.आर. फार्मूला की पृष्ठभूमि
भारत छोड़ो आंदोलन के बाद की राजनीतिक स्थिति
➣ अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होते ही सरकार ने कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और आंदोलन का कठोर दमन किया। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस का संगठन लगभग निष्क्रिय हो गया और देश की राजनीति में एक रिक्तता पैदा हो गई।
➣ गांधीजी, नेहरू, पटेल और मौलाना आज़ाद सहित कांग्रेस के अधिकांश शीर्ष नेता जेलों में बंद थे। गांधीजी को मई 1944 में स्वास्थ्य के आधार पर रिहा किया गया (इससे पहले फरवरी 1944 में कारावास के दौरान ही कस्तूरबा गांधी का निधन हो चुका था), जबकि कार्यसमिति के अधिकांश सदस्य, जो अहमदनगर किले में बंद थे, 1945 में छूटे।
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध अभी चल रहा था और ब्रिटिश सरकार की प्राथमिकता युद्ध जीतना थी। उसने भारत को स्वतंत्रता देने की दिशा में कोई नई पहल नहीं की।
मुस्लिम लीग की माँग और कांग्रेस–लीग गतिरोध
➣ कांग्रेस की इस अनुपस्थिति में मुस्लिम लीग को अपना जनाधार और संगठन मज़बूत करने का अवसर मिला। लाहौर प्रस्ताव (1940) के बाद से वह अलग पाकिस्तान की माँग को लगातार आगे बढ़ा रही थी और कई प्रांतों में उसकी राजनीतिक पकड़ बढ़ती जा रही थी।
➣ लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था, और जिन्ना ने इसके उत्तर में बाँटो और जाओ (Divide and Quit) का नारा दिया, जो दिसम्बर 1943 के कराची अधिवेशन में प्रमुखता से सामने आया।
➣ इससे पहले क्रिप्स मिशन (1942) में प्रांतों को भारतीय संघ से बाहर रहने का विकल्प दिया गया था, परंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने उसे अस्वीकार कर दिया था। इस असफलता के बाद संवैधानिक गतिरोध और गहरा हो गया।
➣ कांग्रेस अखंड भारत और तत्काल स्वतंत्रता चाहती थी, जबकि लीग का आग्रह था कि पहले विभाजन का सिद्धांत स्वीकार किया जाए। इस प्रकार दोनों दल एक-दूसरे के विपरीत छोर पर खड़े थे और किसी साझा समाधान की संभावना क्षीण होती जा रही थी।
➣ इसी गतिरोध के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सी. राजगोपालाचारी ने समझौते का एक प्रस्ताव तैयार किया। यह 1944 में बना और जुलाई 1944 में सार्वजनिक हुआ।
उस समय लॉर्ड वेवल भारत के वायसराय थे (अक्टूबर 1943 से)। सी.आर. फार्मूला इसी राजनीतिक ठहराव के दौर में सामने आया।
राजाजी का दृष्टिकोण और फार्मूला की आवश्यकता
➣ सी. राजगोपालाचारी (राजाजी, जन्म 1878) एक वकील और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। वे गांधीजी के निकट सहयोगियों में गिने जाते थे और 1937–39 में मद्रास के प्रधानमंत्री रहे। स्वतंत्रता के बाद वे भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल (1948–50) बने, उन्हें भारत रत्न (1954) मिला और उन्होंने स्वतंत्र पार्टी (1959) की स्थापना की।
➣ राजाजी अपने व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे और राजनीतिक समस्याओं का समाधान आपसी समझौते से खोजने के पक्षधर थे। उनका तर्क था कि पहले स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए और विभाजन जैसे प्रश्न का निर्णय भारतीय पक्षों की आपसी सहमति से किया जाना चाहिए।
➣ 1942 में वे कांग्रेस के बहुमत से अलग राय रखते थे। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया और यह मत रखा कि युद्ध के दौरान कांग्रेस और लीग के सहयोग से राष्ट्रीय सरकार का गठन अधिक उपयोगी होगा।
➣ राजाजी ने 1942 में ही यह विचार रखा था कि कांग्रेस को मुस्लिम लीग के आत्मनिर्णय के अधिकार के सिद्धांत को स्वीकार कर लेना चाहिए। उन्होंने 23 अप्रैल 1942 को मद्रास विधानमंडल के कांग्रेसी सदस्यों से इस आशय का प्रस्ताव पारित करवाया।
➣ कांग्रेस ने उस समय उनके इस रुख को स्वीकार नहीं किया। 2 मई 1942 को इलाहाबाद में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने यह प्रस्ताव 120 के मुकाबले 15 मतों से अस्वीकार कर दिया। इसी बैठक में जगत नारायण लाल का प्रस्ताव भी पारित हुआ, जिसमें किसी भी इकाई को संघ से अलग होने की स्वतंत्रता देने के किसी भी प्रस्ताव का विरोध किया गया। इसके बाद राजाजी ने कांग्रेस के पद और सदस्यता छोड़ दी, किंतु कुछ समय बाद वे पुनः कांग्रेस में लौट आए। इस प्रकार 1944 का फार्मूला उनके पहले से चले आ रहे विचारों का ही विकसित रूप था।
फार्मूले की आवश्यकता क्यों पड़ी?
➣ ब्रिटिश तर्क का उत्तर:- ब्रिटिश सरकार बार-बार यह कहती थी कि जब तक भारतीय दल आपस में सहमत नहीं होते, तब तक सत्ता हस्तांतरण संभव नहीं है। राजाजी इस तर्क को निष्प्रभावी करना चाहते थे।
➣ पहल की रिक्तता:- संवैधानिक प्रश्न पर कोई सक्रिय पहल नहीं हो रही थी। गांधीजी की रिहाई से बातचीत का एक अवसर खुला, जिसका उपयोग भारतीय पक्ष की ओर से समझौते के लिए किया जा सकता था।
➣ युद्ध के बाद की तैयारी:- युद्ध के बाद के भारत की संवैधानिक रूपरेखा तय करने के लिए कांग्रेस और लीग के बीच संवाद आवश्यक था। यदि दोनों दल सहमत न होते, तो आशंका थी कि ब्रिटिश सरकार अपनी इच्छा से कोई समाधान थोप सकती है।
सी.आर. फार्मूला के प्रमुख प्रावधान
➣ फार्मूले के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे:
➣ स्वतंत्रता की माँग का समर्थन और अंतरिम सरकार:- मुस्लिम लीग से अपेक्षा की गई कि वह भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का समर्थन करे और संक्रमण काल में कांग्रेस के साथ मिलकर एक अंतरिम सरकार के गठन में सहयोग दे।
➣ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की पहचान:- द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद एक आयोग नियुक्त किया जाना था, जो उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भारत के उन सन्निहित जिलों की पहचान और सीमांकन करता, जहाँ मुसलमान स्पष्ट बहुमत में थे।
➣ जनमत-संग्रह:- इन सीमांकित क्षेत्रों में रहने वाले सभी निवासियों के बीच वयस्क मताधिकार के आधार पर जनमत-संग्रह कराया जाना था, जो भारत से अलग होने के प्रश्न का अंतिम निर्णय करता। इस मतदान में केवल मुसलमान नहीं, बल्कि वहाँ के सभी वयस्क नागरिक शामिल होते।
➣ अलग राज्य का विकल्प:- यदि बहुमत अलग संप्रभु राज्य के पक्ष में मतदान करता, तो उस निर्णय को लागू किया जाता। साथ ही सीमावर्ती जिलों को यह अधिकार दिया गया कि वे दोनों में से किसी भी राज्य में शामिल होना चुन सकें।
➣ प्रचार की स्वतंत्रता:- जनमत-संग्रह से पहले सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने पक्ष में प्रचार करने की स्वतंत्रता दी जानी थी।
➣ साझा विषयों पर समझौता:- अलग होने की स्थिति में रक्षा, संचार, वाणिज्य तथा अन्य आवश्यक विषयों की सुरक्षा के लिए दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौते किए जाने थे।
➣ जनसंख्या का स्वैच्छिक स्थानांतरण:- यदि किसी प्रकार का जनसंख्या-स्थानांतरण होता, तो वह पूरी तरह स्वैच्छिक आधार पर ही होता। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की दृष्टि से इसे एक महत्वपूर्ण प्रावधान माना जा सकता है।
➣ सत्ता हस्तांतरण की शर्त:- ये सभी शर्तें तभी बाध्यकारी होतीं, जब ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण शक्ति और उत्तरदायित्व सौंप देती।
➣ इस प्रकार फार्मूले की योजना यह थी कि पहले अंतरिम सरकार बने, युद्ध के बाद आयोग सीमांकन करे, फिर सभी वयस्क निवासियों का जनमत-संग्रह हो, और अलग होने की स्थिति में साझा विषयों पर आपसी समझौता किया जाए। यह सब कुछ ब्रिटेन द्वारा पूर्ण सत्ता हस्तांतरण की शर्त पर निर्भर था।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संदर्भ में फार्मूला
कांग्रेस के लिए इसका महत्त्व
➣ कांग्रेस के लिए यह अखंड भारत के आदर्श से व्यावहारिक समझौते की दिशा में एक बड़ा कदम था। पहली बार शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर आत्मनिर्णय के सिद्धांत को सशर्त स्वीकार करने की बात सामने आई। कांग्रेस इसे विभाजन का समर्थन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के मार्ग से आपसी गतिरोध हटाने का उपाय मानती थी।
➣ कांग्रेस ने इसके माध्यम से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया था। फार्मूला धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों की बात नहीं करता था, बल्कि कुछ सीमांकित क्षेत्रों की जनता को क्षेत्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार देता था। कांग्रेस के लिए यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण था।
➣ उस समय कांग्रेस कार्यसमिति के अधिकांश सदस्य जेल में थे, इसलिए संगठन के स्तर पर इस प्रस्ताव पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं हो सका। गांधीजी ने इसे वार्ता का आधार माना, किंतु यह कांग्रेस की आधिकारिक नीति नहीं बन पाया। कांग्रेस के भीतर भी कुछ नेताओं को यह अखंड भारत के सिद्धांत से पीछे हटना प्रतीत हुआ।
मुस्लिम लीग के लिए इसका महत्त्व
➣ लीग के लिए यह पाकिस्तान के सिद्धांत की अप्रत्यक्ष मान्यता जैसा था, क्योंकि कांग्रेस की ओर से पहली बार अलग होने के विकल्प की बात की जा रही थी। फिर भी लीग इसे अपर्याप्त मानती थी, जिसके कारणों का विवरण अगले भाग में है।
➣ लीग की माँग का आधार द्वि-राष्ट्र सिद्धांत था, जिसके अनुसार हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र थे। इसलिए उसके लिए यह केवल क्षेत्रीय प्रश्न नहीं, बल्कि मुसलमानों की राष्ट्रीय पहचान का प्रश्न था।
पाकिस्तान की माँग के संदर्भ में इसका स्थान➣ लाहौर प्रस्ताव (1940) में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को स्वतंत्र राज्यों के रूप में संगठित करने की माँग की गई थी। उसके बाद यह पहला अवसर था जब कांग्रेस की ओर से इस माँग पर कोई ठोस प्रस्ताव सामने आया, और सी.आर. फार्मूला उसी माँग का जनमत-संग्रह पर आधारित एक उत्तर था।
दोनों दृष्टिकोणों का मूल अंतर
➣ दोनों दल एक ही प्रस्ताव को भिन्न दृष्टि से देखते थे। यह अंतर निम्न तालिका से समझा जा सकता है, और यही इसकी असफलता का मूल कारण था।
| बिंदु | कांग्रेस का दृष्टिकोण | मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| फार्मूले का स्वरूप | क्षेत्रीय आत्मनिर्णय की व्यवस्था | मुसलमानों का राष्ट्रीय अधिकार (द्वि-राष्ट्र सिद्धांत) |
| निर्णय का क्रम | स्वतंत्रता की प्रक्रिया के साथ; पहले अंतरिम सरकार, फिर जनमत-संग्रह | पहले पाकिस्तान के सिद्धांत की स्वीकृति, उसके बाद स्वतंत्रता |
| निर्णय में किसकी राय | संबंधित क्षेत्रों के सभी वयस्क निवासी | केवल मुसलमान |
| क्षेत्र | मुस्लिम बहुल सन्निहित जिले | पंजाब और बंगाल जैसे प्रांत उनकी संपूर्णता में |
| अलग होने के बाद संबंध | रक्षा, संचार आदि पर आपसी समझौता | दो संप्रभु राज्यों के बीच संधि |
कांग्रेस के लिए यह विभाजन की स्वीकृति नहीं, केवल जनता की राय जानने का साधन था। लीग के लिए यह पाकिस्तान की पूर्ण स्वीकृति नहीं, केवल एक सीमित और सशर्त प्रस्ताव था।
जिन्ना की प्रतिक्रिया
➣ मोहम्मद अली जिन्ना ने इस फार्मूले को अपर्याप्त माना। उनका कहना था कि इसमें पाकिस्तान की माँग को स्पष्ट और बिना शर्त स्वीकार नहीं किया गया है। उन्होंने इस फार्मूले के अंतर्गत मिलने वाले पाकिस्तान को कटा-छँटा और विकृत (maimed, mutilated and moth-eaten) बताया।
➣ जिन्ना की मूल आपत्ति यह थी कि फार्मूला पाकिस्तान को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर नहीं, बल्कि कुछ जिलों के बहुमत के आधार पर देखता था, और वह भी कांग्रेस की शर्तों तथा ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया से बँधा हुआ था।
पाकिस्तान की माँग से संबंधित आपत्तियाँ
➣ सिद्धांत की पहले स्वीकृति:- जिन्ना चाहते थे कि पहले पाकिस्तान के सिद्धांत को स्वीकार किया जाए और उसके बाद ही स्वतंत्रता तथा सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़े जबकि फार्मूले में विभाजन का निर्णय बाद की प्रक्रिया पर छोड़ दिया गया था।
➣ सभी वयस्कों का मतदान:- लीग का मत था कि पाकिस्तान का प्रश्न मुसलमानों के आत्मनिर्णय से जुड़ा है, इसलिए निर्णय केवल मुसलमानों की राय से होना चाहिए, न कि संबंधित क्षेत्रों के सभी निवासियों के मतदान से।
➣ क्षेत्रों की सीमा:- फार्मूले में केवल मुस्लिम बहुल सन्निहित जिलों को अलग होने का अधिकार था, जबकि लीग पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों को उनकी संपूर्णता में चाहती थी। जिला-आधारित बँटवारे का अर्थ इन प्रांतों का विभाजन भी था।
➣ साझा व्यवस्था पर आपत्ति:- रक्षा, संचार आदि विषयों पर पारस्परिक व्यवस्था का विचार लीग की पूर्ण संप्रभु राष्ट्र की धारणा के विपरीत माना गया। लीग का मत था कि ऐसे प्रश्न दो संप्रभु राज्यों के बीच संधि से तय होंगे, किसी पूर्व-निर्धारित साझा ढाँचे से नहीं।
फार्मूले को स्वीकार न करने के कारण➣ जनमत-संग्रह की प्रक्रिया ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की शर्त से जुड़ी थी, इसलिए लीग को आशंका थी कि पाकिस्तान का प्रश्न अनिश्चित बना रहेगा।
➣ जिन्ना का यह भी तर्क था कि यह प्रस्ताव कांग्रेस के आधिकारिक निर्णय के बजाय राजाजी की व्यक्तिगत पहल पर आधारित है और गांधीजी भी इसे पूरे कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं हैं।
➣ जिन्ना स्वयं को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मानते थे, इसलिए वे पाकिस्तान के प्रश्न पर कांग्रेस के साथ बराबरी की शर्तों पर समझौते के बजाय पहले अपनी माँग की स्वीकृति चाहते थे।
जिन्ना की प्रतिक्रिया का परिणाम➣ जिन्ना की अस्वीकृति के कारण फार्मूले के आधार पर आगे कोई समझौता नहीं हो सका। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस की सशर्त रियायतें भी लीग की माँग के लिए पर्याप्त नहीं थीं और दोनों दलों के बीच मतभेद का मूल पाकिस्तान के स्वरूप तथा उसकी स्वीकृति के क्रम को लेकर था।
➣ संक्षेप में, जिन्ना ने इसे इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि इसमें पाकिस्तान की माँग को तत्काल, स्पष्ट और संप्रभु रूप में स्वीकार नहीं किया गया था।
सी.आर. फार्मूला और गांधी-जिन्ना वार्ता
➣ इस अध्याय में केवल सी.आर. फार्मूले और गांधी–जिन्ना वार्ता के संबंध को समझाया गया है। वार्ता का विस्तृत विवरण अगले अध्याय में दिया गया है।
गांधीजी ने फार्मूले को आधार क्यों बनाया
➣ मई 1944 में रिहा होने के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस और लीग के गतिरोध को बातचीत से सुलझाना चाहते थे। राजाजी का प्रस्ताव उन्हें इसके लिए उपयुक्त लगा, क्योंकि इसमें स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी गई थी और विभाजन का प्रश्न संबंधित क्षेत्रों की जनता की राय पर छोड़ा गया था।
➣ गांधीजी विभाजन के समर्थक नहीं थे। वे इसे अखंड भारत के विरुद्ध नहीं मानते थे, बल्कि यह मानते थे कि स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक ढंग से जनता की राय जानने से आपसी अविश्वास कम हो सकता है। इसलिए उन्होंने इसे कांग्रेस की अंतिम नीति के रूप में नहीं, बल्कि वार्ता के आधार के रूप में स्वीकार किया।
➣ चूँकि कांग्रेस ने इस पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया था, इसलिए गांधीजी ने यह पहल अपने स्तर पर आगे बढ़ाई।
➣ जुलाई 1944 में फार्मूला सार्वजनिक होने के बाद गांधीजी ने जिन्ना को पत्र लिखकर भेंट का प्रस्ताव रखा। इसके परिणामस्वरूप सितम्बर 1944 में दोनों नेताओं के बीच प्रत्यक्ष वार्ता हुई।
➣ वार्ता में फार्मूले के जनमत-संग्रह, सीमांकन और साझा विषयों जैसे प्रश्नों के साथ-साथ लाहौर प्रस्ताव, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और आत्मनिर्णय जैसे बुनियादी प्रश्न भी उठे। जिन्ना की जिन आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, उनका संबंध भी इन्हीं प्रश्नों से है। वार्ता किसी समझौते पर नहीं पहुँची, और इस प्रकार फार्मूले की व्यावहारिक परीक्षा भी असफल रही।
➣ दोनों को अलग-अलग समझें। राजाजी वार्ता के पक्षकार नहीं थे और फार्मूले की शर्तें वार्ता के निष्कर्ष नहीं थीं।
सी.आर. फार्मूला = राजाजी का प्रस्ताव (1944)। गांधी–जिन्ना वार्ता = उस प्रस्ताव के आधार पर गांधीजी और जिन्ना की बातचीत (सितम्बर 1944)। एक का संबंध प्रस्ताव से है, दूसरी का उस पर चर्चा से।
सी.आर. फार्मूला की सीमाएँ
प्रावधानों में अस्पष्टता
➣ पाकिस्तान की परिभाषा में अस्पष्टता:- फार्मूले में यह स्पष्ट नहीं था कि अलग होने वाला राज्य किस स्वरूप का होगा, अर्थात वह पूर्ण संप्रभु होगा या किसी साझा ढाँचे से जुड़ा रहेगा। यही प्रश्न आगे चलकर जिन्ना और कांग्रेस के बीच सबसे बड़े मतभेद का कारण बना।
➣ जनमत-संग्रह से जुड़े प्रश्न:- जनमत-संग्रह की समय-सीमा, उसे कौन कराएगा, मतदाताओं की पात्रता और सीमांकन आयोग की संरचना जैसे व्यावहारिक प्रश्नों पर फार्मूला मौन था। यह भी स्पष्ट नहीं था कि पूरे जिले का निर्णय एक इकाई मानकर होगा या जिलों के भीतर की मिश्रित आबादी का ध्यान रखा जाएगा।
➣ सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया:- अंतरिम सरकार की संरचना और शक्तियाँ तथा सत्ता हस्तांतरण की समय-सारिणी अस्पष्ट थी। यह भी निश्चित नहीं था कि जनमत-संग्रह सत्ता हस्तांतरण से पहले होगा या बाद में।
➣ रियासतों का प्रश्न:- फार्मूला केवल ब्रिटिश भारत के जिलों की बात करता था। देश के बड़े भू-भाग में फैली रियासतों की स्थिति पर इसमें कोई प्रावधान नहीं था।
राजनीतिक मतभेद और अल्पसंख्यकों की चिंता
➣ अलग-अलग व्याख्याएँ:- फार्मूले की भाषा ऐसी थी कि कांग्रेस और लीग उसे अपने-अपने ढंग से पढ़ सकते थे। इसलिए वह किसी साझा आधार का काम नहीं कर सका (दोनों दृष्टिकोणों ऊपर बताया गया है)।
➣ अल्पसंख्यकों की स्थिति:- अलग होने वाले क्षेत्रों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों तथा शेष भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कोई विस्तृत गारंटी फार्मूले में नहीं थी, केवल स्वैच्छिक स्थानांतरण का उल्लेख था। आंबेडकर की चिंता अनुसूचित जातियों और अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर थी, जबकि जिला-आधारित विभाजन से पंजाब का विभाजन निहित होने के कारण अकाली दल भी इसके विरोध में था।
➣ कांग्रेस के भीतर और बाहर विरोध:- कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह अखंड भारत के सिद्धांत से पीछे हटना लगा। हिंदू महासभा ने इसे विभाजन की स्वीकृति मानकर इसका विरोध किया। आलोचकों का कहना था कि जनमत-संग्रह द्वारा अलगाव को मान्यता देने से भविष्य में अलग होने की माँगों को बल मिल सकता है।
व्यावहारिक कठिनाइयाँ
➣ ब्रिटिश सहमति पर निर्भरता:- फार्मूले की सभी शर्तें ब्रिटेन द्वारा पूर्ण सत्ता हस्तांतरण पर निर्भर थीं, जबकि ब्रिटिश सरकार ने इसे केवल एक निजी भारतीय प्रयास माना और कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की। इसलिए फार्मूले को लागू करने का कोई वास्तविक तंत्र मौजूद नहीं था।
➣ किसी पक्ष पर बाध्यता नहीं:- यह कांग्रेस का आधिकारिक प्रस्ताव नहीं था और लीग ने भी इसे स्वीकार नहीं किया। अतः यह किसी भी दल के लिए बाध्यकारी नहीं बन सका।
➣ इस प्रकार सी.आर. फार्मूला की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि वह मूल प्रश्नों, अर्थात पाकिस्तान के स्वरूप और स्वीकृति के क्रम, पर दोनों पक्षों को एक साथ नहीं ला सका और उसे लागू कराने वाली कोई सत्ता भी उसके पास नहीं थी।
फार्मूला का ऐतिहासिक महत्त्व
तात्कालिक महत्त्व
➣ कांग्रेस की स्थिति में बदलाव का संकेत:- इसने कांग्रेस की स्थिति में आ रहे बदलाव का संकेत दिया, क्योंकि 1942 में जिस आत्मनिर्णय संबंधी प्रस्ताव को कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया था, वही विचार 1944 में गांधीजी के समर्थन से वार्ता का आधार बन गया।
➣ कांग्रेस–लीग समझौते का प्रयास:- यह दोनों दलों के बीच समझौते का पहला बड़ा भारतीय प्रयास था, जबकि इससे पहले के अधिकांश प्रस्ताव, जैसे क्रिप्स प्रस्ताव, ब्रिटिश सरकार की ओर से आए थे। इसने यह भी संकेत दिया कि भारतीय दल आपसी सहमति से समाधान खोजने का प्रयास कर सकते हैं।
➣ गांधी–जिन्ना वार्ता की आधारभूमि:- इसने दोनों नेताओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद का मार्ग खोला।
➣ पाकिस्तान के प्रश्न का व्यावहारिक रूप:- इसने पाकिस्तान के प्रश्न को केवल माँग और विरोध की बहस से आगे बढ़ाकर सीमांकन, जनमत-संग्रह और साझा व्यवस्थाओं जैसे व्यावहारिक विषयों तक पहुँचा दिया।
दीर्घकालिक महत्त्व
➣ आगे की योजनाओं की पृष्ठभूमि:- वेवल योजना और शिमला सम्मेलन (1945) तथा कैबिनेट मिशन (1946) में भी कांग्रेस–लीग सहमति का प्रश्न केंद्र में बना रहा। 1945 के शिमला सम्मेलन में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर लीग का वही दावा सामने आया, जिसकी झलक सी.आर. फार्मूले पर जिन्ना के रुख में दिखती है।
➣ बाद की व्यवस्थाओं में प्रतिध्वनि:- सीमांकन, जनमत-संग्रह और प्रांतीय विकल्प जैसे इसके तत्व आगे के प्रस्तावों में किसी न किसी रूप में बार-बार दिखाई देते हैं। 1947 की माउंटबेटन योजना में पंजाब और बंगाल के विभाजन तथा उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और सिलहट में जनमत-संग्रह की व्यवस्था इसका उदाहरण है।
➣ कांग्रेस की आगे की नीति:- आगे चलकर 1946-47 की परिस्थितियों में कांग्रेस की स्थिति और बदली तथा उसने अंततः विभाजन की योजना स्वीकार की।
➣ अन्य योजनाओं से तुलना:- इस फार्मूले का स्थान समझने के लिए इसे उस दौर के अन्य प्रमुख प्रस्तावों के साथ रखकर देखा जा सकता है।
| योजना | वर्ष | प्रस्तावक | मुख्य बिंदु | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| क्रिप्स प्रस्ताव | 1942 | ब्रिटिश सरकार (क्रिप्स मिशन) | युद्ध के बाद डोमिनियन स्तर, संविधान सभा, प्रांतों को संघ से बाहर रहने का विकल्प | कांग्रेस और लीग, दोनों ने अस्वीकार किया |
| सी.आर. फार्मूला | 1944 | सी. राजगोपालाचारी (भारतीय पहल) | अंतरिम सरकार, मुस्लिम बहुल जिलों में जनमत-संग्रह, साझा विषयों पर समझौता | जिन्ना द्वारा अस्वीकृत, लागू नहीं हुआ |
| वेवल योजना / शिमला सम्मेलन | 1945 | वायसराय वेवल | कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन, जिसमें सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को बराबर प्रतिनिधित्व | मुस्लिम सदस्यों के नामांकन पर लीग के दावे के कारण असफल |
| कैबिनेट मिशन | 1946 | ब्रिटिश कैबिनेट मिशन | पूर्ण विभाजन के स्थान पर तीन-स्तरीय संघीय ढाँचा, प्रांतों के समूह, संविधान सभा | आगे चलकर दोनों दलों में मतभेद के कारण विफल |
| माउंटबेटन योजना | 1947 | लॉर्ड माउंटबेटन | भारत का विभाजन, पंजाब और बंगाल का विभाजन, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और सिलहट में जनमत-संग्रह | स्वीकृत; अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए |
इतिहासकारों का मूल्यांकन
➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस फार्मूले ने पाकिस्तान के सिद्धांत को एक प्रकार की वैधता दे दी और विभाजन की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरी ओर, अन्य इतिहासकार इसे स्वतंत्रता के लिए आपसी सहमति बनाने का एक ईमानदार प्रयास मानते हैं, जो अखंड भारत को बचाने की इच्छा से प्रेरित था।
➣ इसलिए सी.आर. फार्मूला विभाजन का निर्णय नहीं था, किंतु उसने उस बहस को आगे बढ़ाया, जो अंततः 1947 के निर्णय तक पहुँची। इस दृष्टि से इसका महत्त्व उसकी सफलता में नहीं, बल्कि उसके द्वारा उठाए गए प्रश्नों और बदली हुई राजनीतिक दिशा में है।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ सी.आर. फार्मूला 1944 में सी. राजगोपालाचारी ने तैयार किया और यह जुलाई 1944 में सार्वजनिक हुआ। यह एक भारतीय पहल थी, ब्रिटिश योजना नहीं। गांधीजी ने इसका समर्थन किया और इसे वार्ता का आधार माना, परंतु यह कांग्रेस का आधिकारिक प्रस्ताव नहीं था।
➣ इसका उद्देश्य कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त कर स्वतंत्रता का मार्ग खोलना था। इसमें प्रस्ताव था कि पहले अंतरिम सरकार बने, युद्ध के बाद एक आयोग मुस्लिम बहुल सन्निहित जिलों का सीमांकन करे, और उन जिलों में जनमत-संग्रह कराया जाए। अलग होने की स्थिति में रक्षा, संचार और वाणिज्य जैसे विषयों पर आपसी समझौता होना था, जनसंख्या का कोई भी स्थानांतरण स्वैच्छिक रहना था, और ये सभी शर्तें तभी लागू होतीं जब ब्रिटेन पूर्ण सत्ता भारतीयों को सौंप देता।
➣ प्रस्तावित जनमत-संग्रह केवल मुसलमानों के लिए नहीं था। उसमें संबंधित क्षेत्रों के सभी वयस्क निवासियों को मतदान का अधिकार दिया जाना था।
➣ जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे पहले पाकिस्तान के सिद्धांत की स्वीकृति चाहते थे, निर्णय केवल मुसलमानों के मत से कराना चाहते थे और पूर्ण संप्रभुता की माँग कर रहे थे। हिंदू महासभा ने भी इसका विरोध किया, जबकि आंबेडकर ने समझौते के प्रयास का स्वागत करते हुए अनुसूचित जातियों और अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता जताई। अकाली दल ने पंजाब के विभाजन की आशंका से इसका विरोध किया और ब्रिटिश सरकार ने इसे केवल एक निजी प्रयास माना।
➣ इसी फार्मूले के आधार पर सितम्बर 1944 में गांधीजी और जिन्ना के बीच वार्ता हुई। उस वार्ता का विवरण अगले अध्याय में दिया गया है।
➣ समय-क्रम की दृष्टि से देखें तो मार्च 1940 में लीग ने लाहौर प्रस्ताव पारित किया। 1942 में क्रिप्स मिशन असफल हुआ और अगस्त में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। अक्टूबर 1943 में वेवल वायसराय बने और दिसम्बर 1943 के कराची अधिवेशन में जिन्ना ने “बाँटो और जाओ” का नारा दिया। मई 1944 में गांधीजी रिहा हुए, जुलाई 1944 में फार्मूला सार्वजनिक हुआ और सितम्बर 1944 में गांधी–जिन्ना वार्ता हुई। इसके बाद 1945 में वेवल योजना और शिमला सम्मेलन, 1946 में कैबिनेट मिशन और 1947 में माउंटबेटन योजना आई।
➣ इस विषय में कुछ बातों को लेकर भ्रम हो सकता है। सी.आर. फार्मूला और गांधी–जिन्ना वार्ता एक ही घटना नहीं हैं, क्योंकि पहला एक प्रस्ताव था और दूसरी उस पर आधारित बातचीत। इस फार्मूले में पाकिस्तान को तत्काल स्वीकार नहीं किया गया था, केवल जनमत-संग्रह का विकल्प रखा गया था। जिन्ना ने इसे इसलिए अस्वीकार नहीं किया कि उसमें पाकिस्तान का उल्लेख नहीं था, बल्कि इसलिए कि पाकिस्तान की माँग को तत्काल और बिना शर्त स्वीकार नहीं किया गया था। इसी प्रकार इस फार्मूले का उद्देश्य विभाजन कराना नहीं था, और विभाजन का अंतिम निर्णय सी.आर. फार्मूले से नहीं, बल्कि माउंटबेटन योजना (1947) से हुआ।
➣ मुख्य परीक्षा की दृष्टि से इस विषय पर इस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं: क्या सी.आर. फार्मूला पाकिस्तान के प्रश्न पर कांग्रेस की नीति में बदलाव का संकेत था? इस फार्मूले के प्रावधानों की समीक्षा करते हुए जिन्ना द्वारा इसे अस्वीकार करने के कारणों की विवेचना कीजिए। 1940 के दशक में कांग्रेस–लीग गतिरोध को सुलझाने के भारतीय प्रयासों में इस फार्मूले का क्या स्थान था?
ऐसे प्रश्नों के उत्तर में परिचय के लिए 1944 की पृष्ठभूमि और फार्मूले का सार रखना चाहिए। उसके बाद प्रावधान, कांग्रेस और लीग की प्रतिक्रिया, सीमाएँ और महत्त्व को क्रम से लिखना चाहिए। निष्कर्ष में यह स्पष्ट करना उपयोगी रहेगा कि फार्मूला विभाजन का निर्णय नहीं था, पर उसने उस बहस को आगे बढ़ाया जो 1947 तक पहुँची।
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