भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 : पृष्ठभूमि, प्रमुख प्रावधान, महत्त्व, सीमाएँ एवं आलोचना

विषय सूचीअध्याय के उप-विषय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 : परिचय

➣ भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था, जिसने भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 द्वारा शुरू की गई विधायी भागीदारी को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय एवं प्रांतीय विधायी परिषदों के आकार, कार्यक्षेत्र तथा प्रतिनिधित्व के स्वरूप का विस्तार किया।

➣ इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि इसने – बिना “निर्वाचन” शब्द का प्रत्यक्ष प्रयोग किए – विभिन्न स्थानीय संस्थाओं को सदस्यों के नाम सुझाने का अधिकार देकर अप्रत्यक्ष निर्वाचन का सिद्धांत पहली बार भारतीय विधायी व्यवस्था में प्रविष्ट कराया।

➣ साथ ही सदस्यों को बजट पर सीमित चर्चा तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी पहली बार दिया गया।

➣ फिर भी यह अधिनियम उत्तरदायी शासन या पूर्ण प्रतिनिधि व्यवस्था स्थापित नहीं करता था – बजट पर मतदान, संशोधन अथवा कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाने की शक्ति परिषदों को नहीं दी गई।

➣ इसीलिए इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांगों के प्रति एक सीमित, सतर्क एवं आंशिक स्वीकृति माना जाता है – क्रमिक संवैधानिक विकास की एक कड़ी, अंतिम मंज़िल नहीं।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 की पृष्ठभूमि

1861 की व्यवस्था से असंतोष और इल्बर्ट बिल विवाद

➣ 1861 के अधिनियम ने भारतीयों को विधायी परिषद में नामांकन का द्वार तो खोला था, परंतु व्यवहार में इस अवसर का लाभ मुख्यतः बड़े जमींदारों, सेवानिवृत्त अधिकारियों तथा देशी रियासतों के राजाओं को ही मिला – ऐसे लोग, जो आम भारतीय जनता की वास्तविक समस्याओं से प्रायः दूर थे।

➣ परिणामस्वरूप 1861 की व्यवस्था शिक्षित भारतीय वर्ग की आकांक्षाओं को संतुष्ट करने में विफल रही और 1880 के दशक तक इसके विरुद्ध असंतोष स्पष्ट रूप से मुखर होने लगा।

➣ इसी असंतोष को हवा देने वाली एक बड़ी घटना 1883 का इल्बर्ट बिल विवाद था। इस विधेयक का उद्देश्य वरिष्ठ भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय अभियुक्तों के मुकदमों की सुनवाई का अधिकार देना था, लेकिन भारत में रह रहे यूरोपीय समुदाय के तीव्र विरोध के आगे सरकार को इसे काफी कमजोर रूप में पारित करना पड़ा।

➣ इस पूरे प्रकरण ने भारतीय शिक्षित वर्ग को यह एहसास कराया कि जब तक भारतीयों के पास शासन में अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक उनकी मांगों को सरकार पर प्रभाव डालने में कठिनाई रहेगी। यही राजनीतिक चेतना आगे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और संवैधानिक मांगें

➣ 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ भारतीय राजनीतिक मांगों को एक संगठित अखिल भारतीय मंच मिला। कांग्रेस के आरंभिक नेताओं ने संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी मांगें सरकार के समक्ष रखीं।

1885 तथा 1889 के अधिवेशनों में कांग्रेस ने विशेष रूप से विधायी परिषदों के विस्तार तथा नामांकन के स्थान पर निर्वाचन के सिद्धांत को अपनाने की मांग की।

➣ इसके साथ परिषदों को बजट पर चर्चा का अधिकार देने तथा बंगाल, उत्तर-पश्चिमी प्रांत-अवध और पंजाब जैसे क्षेत्रों में भी अलग विधान परिषदें गठित करने की मांग रखी गई।

➣ भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा एक साथ इंग्लैंड और भारत में आयोजित करने की मांग भी कांग्रेस के प्रारंभिक कार्यक्रम का हिस्सा थी।

डफरिन की पहल से भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 तक

➣ इन बढ़ती मांगों के बीच तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने परिषदों के उदारीकरण का प्रस्ताव इंग्लैंड भेजा तथा अपनी परिषद की एक समिति गठित कर प्रांतीय परिषदों के विस्तार और आंशिक निर्वाचन-सिद्धांत को लागू करने की योजना तैयार करवाई। हालांकि यह योजना संसदीय ढंग की उत्तरदायी सरकार स्थापित करने का प्रस्ताव नहीं थी।

➣ लंदन में भारत सचिव लॉर्ड क्रॉस (Lord Cross) ने कांग्रेस की प्रत्यक्ष निर्वाचन की मांग को स्वीकार नहीं किया, लेकिन किसी न किसी रूप में अप्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था को स्वीकार करने पर सहमति जताई। लॉर्ड क्रॉस ने 1890 में इस विधेयक को ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में प्रस्तुत किया।

➣ लंबी चर्चा के बाद यह विधेयक तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन के कार्यकाल में 20 जून, 1892 को राजकीय स्वीकृति प्राप्त कर भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892) बन गया।

➣ इस प्रकार यह अधिनियम किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि 1861 की अधूरी व्यवस्था से उपजे असंतोष, इल्बर्ट बिल विवाद, कांग्रेस की संगठित संवैधानिक मांगों तथा वायसराय और भारत सचिव के बीच हुई प्रक्रिया की क्रमिक परिणति था।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 के प्रमुख प्रावधान

केंद्रीय एवं प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार-विस्तार (आधिकारिक बहुमत बनाए रखते हुए)

➣ आवश्यकता क्यों पड़ी: 1861 के अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद में केवल 6 से 12 अतिरिक्त सदस्य ही नामित किए जा सकते थे, जो कांग्रेस तथा शिक्षित भारतीय वर्ग की दृष्टि में भारत जैसे विशाल एवं विविध देश की आवाज़ को प्रतिबिंबित करने के लिए अत्यंत अपर्याप्त संख्या थी।

➣ कांग्रेस ने अपने 1885 व 1889 के अधिवेशनों में स्पष्ट रूप से परिषदों के विस्तार की मांग की थी, ताकि अधिक क्षेत्रों, वर्गों तथा हितों को प्रतिनिधित्व मिल सके।

➣ इसी मांग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए केंद्रीय स्तर पर गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की अधिकतम संख्या बढ़ाकर 10 से 16 कर दी गई।

प्रांतीय स्तर पर भी विधान परिषदों की सदस्य-संख्या बढ़ाई गई – मद्रास व बंबई में 8 से 20 तक, बंगाल में अधिकतम 20 तक, तथा उत्तर-पश्चिमी प्रांत तथा अवध में अधिकतम 15 तक। (आगे 1897 में पंजाब व बर्मा को, तथा 1905 में पूर्वी बंगाल-असम को भी अपनी विधान परिषदें प्रदान की गईं।)

➣ छिपी हुई शर्त – “आधिकारिक बहुमत” सुरक्षित: इस विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण परंतु प्रायः अनदेखा किया जाने वाला पहलू यह था कि गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ने के बावजूद, सरकार ने यह सावधानीपूर्वक सुनिश्चित किया कि परिषद में सरकारी सदस्यों का बहुमत कभी समाप्त न हो।

➣ उदाहरणस्वरूप, केंद्रीय विधायी परिषद में 9 पदेन सदस्य (गवर्नर-जनरल, उसकी कार्यकारी परिषद के 6 सदस्य, कमांडर-इन-चीफ तथा जिस प्रांत में बैठक हो रही हो वहाँ का प्रमुख) तथा इनके अतिरिक्त 6 सरकारी अतिरिक्त सदस्य होते थे,

➣ जबकि गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या मात्र 10 तक सीमित रहती थी – अर्थात सरकारी पक्ष का बहुमत गणितीय रूप से सुरक्षित था। प्रांतों में भी (बंबई के कुछ अपवादों को छोड़कर) यही सिद्धांत व्यवहार में लागू रहा।

➣ इस व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रभाव यह था कि संख्यात्मक विस्तार भले ही प्रभावशाली दिखता हो, परंतु व्यवहार में गैर-सरकारी (तथा भारतीय) सदस्य कभी भी बहुमत के बल पर किसी प्रस्ताव को पारित अथवा अस्वीकृत नहीं करा सकते थे।

1892 के बाद केंद्रीय विधान परिषद के कुल 24 सदस्यों में से मात्र 5 ही भारतीय होते थे। यह आँकड़ा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि आधिकारिक बहुमत की व्यवस्था के कारण संख्यात्मक विस्तार व्यवहार में कितना सीमित प्रभाव रखता था।

अप्रत्यक्ष निर्वाचन का सिद्धांत (निर्वाचन शब्द के बिना) – किंबरले धारा

➣ कांग्रेस तथा शिक्षित भारतीय वर्ग की सबसे प्रमुख मांग यह थी कि परिषद-सदस्यों का चयन प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा हो, ताकि सदस्य वास्तव में जनता के प्रति उत्तरदायी बनें।

➣ परंतु ब्रिटिश सरकार भारत में तत्काल प्रत्यक्ष निर्वाचन जैसी पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी, क्योंकि इससे भविष्य में सरकार पर वास्तविक जन-दबाव बनने की आशंका थी।

➣ फिर भी, पूरी तरह मांग को अस्वीकार करने से कांग्रेस तथा जनमत की नाराज़गी और बढ़ने का खतरा था – अतः एक मध्यमार्गी समाधान खोजना आवश्यक हो गया।

➣ इसी दुविधा को हल करने के लिए अधिनियम ने गवर्नर-जनरल तथा प्रांतीय गवर्नरों को यह अधिकार दिया कि वे नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों, वाणिज्य मंडलों (जैसे बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स) तथा जमींदार संगठनों जैसी संस्थाओं को अपने प्रतिनिधियों के नाम सुझाने हेतु आमंत्रित कर सकें। इन सुझाए गए नामों में से सरकार औपचारिक रूप से सदस्यों को नामित करती थी।

➣ किंबरले धारा: इस पूरी सिफारिश-प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप देने के लिए भारत सचिव लॉर्ड किंबरले के नाम पर जानी जाने वाली एक विशेष धारा जोड़ी गई, जिसके अंतर्गत गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को इस नामांकन-प्रक्रिया के संबंध में विनियम बनाने का अधिकार दिया गया –

➣ बशर्ते ऐसे विनियमों को भारत सचिव की पूर्व स्वीकृति प्राप्त हो। इस प्रकार नामांकन की पूरी प्रक्रिया अंततः लंदन के नियंत्रण में ही रही।

➣ चूँकि अंतिम नियुक्ति का अधिकार अब भी सरकार के पास ही था और सरकार किसी भी सुझाए गए नाम को अस्वीकार करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र थी, इसलिए यह वास्तविक अर्थों में प्रत्यक्ष निर्वाचन नहीं था।

➣ फिर भी इसने पहली बार परिषद-सदस्यता के चयन में सामाजिक व संस्थागत निकायों की सहभागिता को वैधानिक रूप से मान्यता दी, जिसे इतिहासकार अप्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रारंभिक रूप मानते हैं – यही सिद्धांत आगे 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों में अधिक स्पष्ट (यद्यपि सांप्रदायिक-आधारित) प्रत्यक्ष निर्वाचन व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ।

इसी सिफारिश-आधारित व्यवस्था के माध्यम से सुरेंद्रनाथ बनर्जी को 1893 में कलकत्ता कॉरपोरेशन की सिफारिश पर बंगाल विधान परिषद में स्थान मिला, और वे आगे दो बार केंद्रीय विधायी परिषद के लिए भी बंगाल के प्रतिनिधि चुने गए। इसी दौर में गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, आशुतोष मुखर्जी तथा रास बिहारी घोष जैसे प्रमुख राष्ट्रवादी नेता भी विभिन्न विधान परिषदों में पहुँचे। इन नेताओं ने इसी सीमित मंच का उपयोग ब्रिटिश नीतियों को उजागर करने तथा भारतीय शिकायतों को सार्वजनिक करने के लिए किया, जिससे यह मंच आगे के राष्ट्रवादी नेताओं के लिए एक प्रशिक्षण भूमि साबित हुआ।

बजट पर चर्चा का (परंतु मतदान का नहीं) अधिकार

➣ 1861 के अधिनियम के अंतर्गत परिषद के सदस्यों को सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर टिप्पणी करने का कोई भी औपचारिक अवसर प्राप्त नहीं था – सरकार अपना वार्षिक व्यय स्वयं ही तय करती और लागू करती थी।

➣ कांग्रेस ने इसे एक गंभीर कमी बताते हुए मांग की कि जनता के धन (राजस्व) से संबंधित निर्णयों पर कम-से-कम जनप्रतिनिधियों की राय अवश्य ली जाए, विशेषकर तब जब भारतीय राजस्व से ही होम चार्जेज जैसे भारी व्यय भी वहन किए जा रहे थे।

➣ इसी मांग के जवाब में केंद्रीय व प्रांतीय परिषदों के सदस्यों को पहली बार सरकार द्वारा प्रस्तुत वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर चर्चा करने और उस पर अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार मिला।

➣ परंतु सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि यह अधिकार केवल टिप्पणी तक सीमित रहे – सदस्यों को बजट पर मतदान करने, कोई मद अस्वीकार करने अथवा उसमें संशोधन प्रस्तावित करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया, और सरकार पर सदस्यों की राय मानने की कोई बाध्यता भी नहीं थी।

➣ इसलिए यह अधिकार मूलतः विचार-विमर्शात्मक ही रहा, न कि वित्तीय नियंत्रण – सरकार अंतिम रूप से जनता के धन के उपयोग हेतु परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं बनी।

➣ फिर भी इसका प्रतीकात्मक महत्व यह था कि पहली बार भारत में विधायिका को सरकार के वित्तीय मामलों से औपचारिक रूप से जोड़ा गया, जो आगे 1909 तथा विशेषकर 1919 के अधिनियम में बजट के कुछ भागों पर वास्तविक मतदान के अधिकार तक विकसित हुआ।

सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार

➣ इससे पहले परिषद के सदस्यों के पास कार्यपालिका के दैनिक प्रशासनिक निर्णयों की जानकारी प्राप्त करने का भी कोई औपचारिक माध्यम नहीं था – प्रशासन पूरी तरह अपारदर्शी ढंग से कार्य करता था और जनप्रतिनिधियों को उसकी जानकारी लेने का कोई अधिकार नहीं था। संसदीय परंपरा से परिचित शिक्षित भारतीय नेता इसे शासन की जवाबदेही की एक बुनियादी कमी मानते थे।

➣ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सदस्यों को सार्वजनिक हित एवं प्रशासनिक विषयों पर सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी पहली बार दिया गया – जो संसदीय व्यवस्था के प्रश्नकाल की एक प्रारंभिक झलक थी।

➣ परंतु इस अधिकार पर भी कई कड़ी शर्तें लगाई गईं। सदस्यों को प्रश्न पूछने के लिए छह दिन की पूर्व सूचना देना अनिवार्य था, जिससे कोई भी प्रश्न तत्काल अथवा किसी अप्रत्याशित घटना पर तुरंत नहीं पूछा जा सकता था। इसके अतिरिक्त सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं थी, और सरकार यह भी तय कर सकती थी कि किसी प्रश्न का उत्तर सार्वजनिक हित के विरुद्ध मानते हुए न दिया जाए।

➣ इन कठोर शर्तों के कारण यह अधिकार व्यवहार में अत्यंत सीमित एवं औपचारिक स्वरूप का ही रहा – इससे प्रभावी प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पाई। फिर भी यह भारत में विधायी जवाबदेही की परंपरा की एक बहुमूल्य शुरुआत साबित हुआ, जिसने आगे चलकर अधिक व्यापक प्रश्नकाल एवं निगरानी तंत्र के विकास की नींव रखी।

इसी प्रश्न पूछने के अधिकार का एक प्रसिद्ध उदाहरण 1895 में देखने को मिला, जब सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने बंगाल विधान परिषद में सरकार का ध्यान इस विषम तथ्य की ओर आकर्षित किया कि ब्रिटेन की मात्र 4 करोड़ जनसंख्या के लिए संसद में 670 सदस्य थे, जबकि बंगाल की 7 करोड़ जनसंख्या के लिए विधान परिषद में गिने-चुने सदस्य ही थे। यह घटना दर्शाती है कि सीमित होते हुए भी यह अधिकार राष्ट्रवादी नेताओं के हाथ में असमानता को सार्वजनिक रूप से उजागर करने का एक प्रभावी औजार बन गया था।

1861 बनाम 1892 – क्रमिक विस्तार की तुलना

पहलूभारतीय परिषद अधिनियम, 1861भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
केंद्रीय परिषद के अतिरिक्त सदस्य6 से 1210 से 16
भारतीयों का चयनपूर्णतः नामांकन (Nomination)संस्थाओं की सिफारिश पर आधारित अप्रत्यक्ष निर्वाचन
बजट पर अधिकारकोई अधिकार नहींकेवल चर्चा, मतदान/संशोधन नहीं
प्रश्न पूछने का अधिकारनहीं थाहाँ, 6 दिन की सूचना सहित, पूरक प्रश्न वर्जित
प्रांतीय शक्तियाँमद्रास व बंबई को कानून बनाने की शक्ति बहालप्रांतीय परिषदों का आकार और अधिक विस्तृत
बहुमत की स्थितिअधिकांशतः सरकारी सदस्यों का प्रभावसांख्यिकीय रूप से सुनिश्चित आधिकारिक बहुमत (9 पदेन + 6 सरकारी बनाम 10 गैर-सरकारी)

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 की सीमाएँ/आलोचना

➣ जैसा ऊपर बताया गया, सदस्य-संख्या बढ़ने के बावजूद परिषदों में आधिकारिक बहुमत को गणितीय रूप से सुरक्षित रखा गया था, इसलिए गैर-सरकारी अथवा भारतीय सदस्य कभी भी अपने बल पर किसी प्रस्ताव को पारित या अस्वीकृत नहीं करा सकते थे – यह “विस्तार” वास्तविक शक्ति-हस्तांतरण की तुलना में अधिक प्रतीकात्मक था।

➣ जैसा ऊपर भी बताया गया, इसने वास्तविक प्रत्यक्ष निर्वाचन को स्वीकार नहीं किया – प्रतिनिधि-चयन की प्रक्रिया सीमित संस्थाओं (जमींदार संगठन, वाणिज्य मंडल, विश्वविद्यालय) तक सिमटी रही, जिससे आम भारतीय जनता का इससे कोई सीधा संपर्क नहीं बन पाया।

➣ बजट पर चर्चा तथा प्रश्न पूछने के अधिकार भी, जैसा ऊपर विस्तार से बताया गया, मूलतः प्रतीकात्मक ही रहे – सरकार न तो परिषद के सुझाव मानने के लिए बाध्य थी, न ही प्रश्नों के माध्यम से प्रभावी प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित हो पाई।

➣ नामांकन हेतु जिन संस्थाओं (नगरपालिका, जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय, वाणिज्य मंडल, जमींदार संगठन) को अनुशंसा का अधिकार दिया गया, वे स्वयं भारतीय समाज के संपन्न, शिक्षित एवं भूस्वामी वर्ग तक सीमित थीं – किसान, श्रमिक तथा सामान्य जनसंख्या का इस प्रक्रिया में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। इस प्रकार प्रतिनिधित्व वास्तव में समाज के एक अत्यंत संकीर्ण वर्ग तक ही सीमित रहा।

➣ अधिनियम ने केंद्रीय कार्यकारी परिषद की संरचना, गवर्नर-जनरल की स्वीकृति/अस्वीकृति की शक्ति, अथवा उसकी अध्यादेश-शक्ति में कोई परिवर्तन नहीं किया – 1861 अधिनियम के अंतर्गत स्थापित शक्ति-संतुलन पूर्णतः अपरिवर्तित रहा; अधिनियम ने केवल विधायी परिषदों के आकार व सीमित प्रक्रियात्मक अधिकारों में संशोधन किया।

➣ अधिनियम ने उत्तरदायी शासन के किसी भी सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया – कार्यपालिका किसी भी रूप में परिषदों के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाई गई, और अंतिम निर्णायक शक्ति सदैव गवर्नर-जनरल तथा भारत सचिव (लंदन) के पास ही केंद्रित रही।

➣ कांग्रेस की प्रारंभिक आग्रह, प्रार्थना व विरोध की नीति को इस अधिनियम की सीमित सफलता ने कमजोर सिद्ध कर दिया – बहुत से युवा एवं शिक्षित राष्ट्रवादियों को यह स्पष्ट हो गया कि विशुद्ध संवैधानिक तरीकों से मिलने वाली रियायतें अत्यंत धीमी तथा अपर्याप्त हैं, जिसने आगे चलकर कांग्रेस के भीतर ही अधिक मुखर एवं आक्रामक (“उग्रवादी”) राष्ट्रवादी धारा – जैसे बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाली धारा – के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 का महत्व

➣ यह अधिनियम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठित संवैधानिक आंदोलन से प्राप्त पहली ठोस रियायत था – इसने यह साबित किया कि संगठित मांग व संवैधानिक तरीकों से भी ब्रिटिश नीति पर कुछ प्रभाव डाला जा सकता है, जिसने आरंभिक उदारवादी नेताओं (जैसे दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता) के संवैधानिक तरीकों में विश्वास को अस्थायी रूप से मजबूत किया।

➣ जैसा ऊपर बताया गया, इसने भारत में अप्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धांत (किंबरले धारा) की नींव रखी, जो आगे मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1909 के अंतर्गत प्रत्यक्ष (यद्यपि सांप्रदायिक-आधारित) निर्वाचन में विकसित हुआ।

➣ बजट-चर्चा व प्रश्न पूछने के अधिकार ने, जैसा ऊपर बताया गया, यद्यपि सीमित थे, फिर भी भारत में विधायी निगरानी तथा प्रशासनिक जवाबदेही की परंपरा की पहली औपचारिक शुरुआत की।

➣ इसने विधायी परिषदों को भारत के शासन-ढांचे में पहली बार एक दृश्यमान व सक्रिय संस्था का दर्जा दिया – अब परिषदें केवल कानून पारित करने वाली औपचारिक इकाई भर नहीं रहीं, बल्कि बजट, प्रशासन तथा नीति पर, चाहे सीमित रूप से ही सही, सार्वजनिक चर्चा का एक मंच बन गईं। इसी बढ़ती संस्थागत भूमिका ने आगे 1909, 1919 तथा 1935 के अधिनियमों के माध्यम से परिषदों की शक्तियों के क्रमिक विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ यह अधिनियम ब्रिटिश नीति की उस विशिष्ट रणनीति का प्रारंभिक उदाहरण भी था, जिसमें संरचनात्मक अथवा वास्तविक सत्ता-हस्तांतरण के बिना ही, संगठित राजनीतिक दबाव के जवाब में सीमित, नियंत्रित एवं क्रमिक रियायतें दी जाती थीं – यही पैटर्न आगे चलकर भारत में ब्रिटिश संवैधानिक सुधारों की एक सतत विशेषता बना रहा।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 – भ्रम बिंदु

➣ अधिनियम ने भारत में प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था स्थापित नहीं की – यह केवल संस्थाओं द्वारा नाम-सिफारिश पर आधारित अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व था।

➣ 1861 में भारतीयों को परिषद में शामिल करने का मार्ग (नामांकन द्वारा) खुला था, जबकि 1892 में संस्थाओं की सिफारिश के माध्यम से प्रतिनिधित्व का सिद्धांत आगे विकसित हुआ – दोनों को एक ही व्यवस्था न समझें।

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) इस अधिनियम का प्रावधान नहीं थी, बल्कि इसकी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पृष्ठभूमि थी।

➣ सदस्यों को बजट पर चर्चा का अधिकार मिला, मतदान या संशोधन का नहीं – बजट पर चर्चा का अर्थ वित्तीय नियंत्रण नहीं समझना चाहिए।

➣ प्रश्न पूछने का अधिकार सीमित था – छह दिन की पूर्व सूचना आवश्यक थी और पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं थी।

➣ इस अधिनियम को उत्तरदायी शासन की शुरुआत नहीं मानना चाहिए – कार्यपालिका अब भी विधायी परिषदों के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।

➣ नगरपालिकाएँ, जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय, वाणिज्य मंडल व जमींदार जैसे निकायों की सहभागिता को सार्वभौमिक मताधिकार अथवा जनसामान्य के प्रत्यक्ष निर्वाचन के समकक्ष न समझें – यह एक सीमित, संभ्रांत-केंद्रित व्यवस्था थी।

➣ केंद्रीय परिषद के सदस्यों की संख्या 1861 के 6–12 से बढ़कर 1892 में 10–16 हुई – इन दो अलग-अलग सीमाओं को परस्पर न बदलें।

➣ सदस्य-संख्या के विस्तार को शक्ति के हस्तांतरण के समान न समझें – आधिकारिक बहुमत (पदेन + सरकारी अतिरिक्त सदस्य) सांख्यिकीय रूप से हमेशा सुरक्षित रखा गया था।

▪ 1883 – इल्बर्ट बिल विवाद (भारतीय असंतोष को संगठित करने वाली चिंगारी)
▪ 1885 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
▪ 1885, 1889 – कांग्रेस द्वारा विधायी सुधार व निर्वाचन की मांग वाले प्रस्ताव
▪ 1892 – अप्रत्यक्ष निर्वाचन, बजट-चर्चा व प्रश्न पूछने का अधिकार (सभी सीमित)
▪ 1909 – मॉर्ले-मिंटो सुधार में प्रत्यक्ष (सांप्रदायिक) निर्वाचन की शुरुआत

बिंदु महत्वपूर्ण तथ्य
राजकीय स्वीकृति 20 जून, 1892; प्रस्तुतकर्ता भारत सचिव – लॉर्ड क्रॉस; तत्कालीन वायसराय – लॉर्ड लैंसडाउन
पृष्ठभूमि इल्बर्ट बिल विवाद (1883) → भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) → कांग्रेस के 1885 व 1889 के प्रस्ताव
केंद्रीय विधायी परिषद अतिरिक्त सदस्यों की संख्या 10 से 16 की गई; 1861 में यह संख्या 6–12 थी। संरचना – 9 पदेन + 6 सरकारी + 10 गैर-सरकारी; आधिकारिक बहुमत सुरक्षित
प्रांतीय परिषदें मद्रास/बंबई – 8–20; बंगाल – अधिकतम 20; उत्तर-पश्चिमी प्रांत/अवध – अधिकतम 15
प्रतिनिधित्व नगरपालिका, जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय, वाणिज्य मंडल और जमींदार निकायों द्वारा नाम-सिफारिश; इसे अप्रत्यक्ष निर्वाचन की शुरुआत माना जाता है। नामांकन-नियमन के लिए किंबरले धारा के तहत भारत सचिव की स्वीकृति आवश्यक थी।
बजट बजट पर केवल चर्चा का अधिकार; मतदान या संशोधन का अधिकार नहीं
प्रश्न पूछना 6 दिन की पूर्व सूचना आवश्यक; पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं
वास्तविक प्रतिनिधित्व 24 सदस्यों में से मात्र 5 भारतीय
ऐतिहासिक महत्व कांग्रेस को मिली पहली संवैधानिक रियायत; अप्रत्यक्ष निर्वाचन की नींव पड़ी, जो 1909 में प्रत्यक्ष निर्वाचन के रूप में विकसित हुआ

📚 Chapters

✖

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    ←
    Swipe left/right to change content
    →

    Share This Page

    WhatsApp Telegram