भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) | One-Liner Practice

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885)
📚 विषय सूची

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का संगठित प्रारम्भ सामान्यतः 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से माना जाता है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय सामान्यतः एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ए. ओ. ह्यूम) को दिया जाता है। वे एक ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी, राजनीतिक सुधारक तथा पक्षी विज्ञानी (Ornithologist) थे और मूलतः स्कॉटलैंड के निवासी थे।

ए. ओ. ह्यूम को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जनक (Father of Congress) कहा जाता है। उन्होंने कांग्रेस की स्थापना की, लेकिन वे कभी इसके अध्यक्ष नहीं बने। हालाँकि 1885 से 1907 ई. तक वे कांग्रेस के महासचिव रहे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय संघ (Indian National Union) के गठन का प्रयास किया गया था। इसी उद्देश्य से ए. ओ. ह्यूम ने विभिन्न प्रांतों के नेताओं से संपर्क स्थापित किया तथा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन से भी चर्चा की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के समय भारत के वायसराय लॉर्ड डफरिन थे।

कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन प्रारम्भ में 25 दिसंबर 1885 ई. को पूना में आयोजित किया जाना था, लेकिन हैजा फैलने के कारण इसका स्थान बदलकर बम्बई कर दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 से 31 दिसंबर 1885 ई. तक बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में आयोजित हुआ।

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की तथा इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

व्योमेश चंद्र बनर्जी कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध अधिवक्ता थे और वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष बने।

कांग्रेस ने अपने वार्षिक अधिवेशन प्रत्येक वर्ष भारत के अलग-अलग नगरों में आयोजित करने का निर्णय लिया था।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रारम्भिक उद्देश्य भारत के विभिन्न प्रांतों के नेताओं को एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर संगठित करना था।

कांग्रेस भारतीयों में राष्ट्रीय एकता एवं राजनीतिक चेतना का विकास करना चाहती थी तथा उनकी समस्याओं को संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करती थी।

कांग्रेस ने प्रारम्भ से ही विधान परिषदों के विस्तार, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी तथा भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा भारत में भी आयोजित करने की मांग की।

कांग्रेस ने कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग करने, सैन्य व्यय में कमी तथा प्रशासनिक सुधारों की भी मांग की।

1887 ई. में बदरुद्दीन तैयबजी कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष बने, जबकि 1888 ई. में जॉर्ज यूल कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष बने।

1887 ई. में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में भारतीय सुधार समिति का गठन किया गया। इसके बाद 1888 ई. में विलियम डिग्बी की अध्यक्षता में लंदन में ब्रिटिश कमेटी ऑफ इंडिया की स्थापना की गई।

ब्रिटिश समिति का उद्देश्य ब्रिटिश संसद एवं ब्रिटिश जनता के बीच भारतीय प्रश्नों का प्रचार करना था। इसके लिए India नामक साप्ताहिक पत्र का भी प्रकाशन किया गया।

उदारवादी चरण (1885–1905)

1885 से 1905 ई. तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओं का प्रभुत्व रहा। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इस प्रारम्भिक चरण को उदारवादी चरण (Moderate Phase) कहा जाता है।

उदारवादी नेताओं में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, महादेव गोविंद रानाडे, दीनशॉ वाचा, गोपाल कृष्ण गोखले तथा मदन मोहन मालवीय प्रमुख थे।

उदारवादी नेताओं का विश्वास ब्रिटिश न्यायप्रियता तथा संवैधानिक सुधारों में था। वे क्रमिक सुधारों के माध्यम से भारतीयों को अधिक राजनीतिक अधिकार दिलाना चाहते थे।

उदारवादी नेताओं की कार्यप्रणाली प्रार्थना-पत्र (Prayer), याचिका (Petition) तथा प्रतिवाद (Protest) पर आधारित थी। इसी कारण इसे 3P की नीति भी कहा जाता है।

उग्रवादी नेताओं ने उदारवादियों की इस नीति को राजनीतिक भिक्षावृत्ति (Political Mendicancy) की संज्ञा दी।

उदारवादी नेताओं का प्रमुख उद्देश्य विधान परिषदों का विस्तार, भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी तथा संवैधानिक सुधारों की प्राप्ति था।

उदारवादी नेताओं ने भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित करने की मांग की।

उदारवादी नेताओं ने कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग करने, सैन्य व्यय में कमी तथा उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों को अधिक अवसर देने की मांग की।

दादाभाई नौरोजी को भारत का वृद्ध पुरुष (Grand Old Man of India) कहा जाता है। उन्होंने धन-निष्कासन सिद्धांत (Drain Theory) का प्रतिपादन किया।

गोपाल कृष्ण गोखले उदारवादी विचारधारा के प्रमुख नेता थे। उन्हें महात्मा गांधी का राजनीतिक गुरु माना जाता है।

महादेव गोविंद रानाडे उदारवादी आंदोलन के प्रमुख नेता होने के साथ-साथ प्रसिद्ध समाज सुधारक भी थे।

1892 ई. का भारतीय परिषद अधिनियम उदारवादी नेताओं के निरंतर प्रयासों की पहली महत्वपूर्ण संवैधानिक उपलब्धि माना जाता है।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 द्वारा पहली बार अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत हुई तथा परिषदों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई।

1892 के अधिनियम के अंतर्गत सदस्यों को बजट पर चर्चा तथा सार्वजनिक महत्व के विषयों पर प्रश्न पूछने का अधिकार मिला, लेकिन मतदान और पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था।

बेल्बी आयोग (1895–96) के समक्ष दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा दीनशॉ वाचा सहित कई भारतीय नेताओं ने भारत के आर्थिक शोषण से संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत किए।

लोक सेवा आयोग, भारतीय परिषद अधिनियम (1892) तथा बेल्बी आयोग (1895–96) को उदारवादी चरण की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है।

उदारवादी नेताओं ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक एकता तथा संवैधानिक संघर्ष की भावना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उग्रवादी चरण (1905–1919)

1905 से 1919 ई. तक के राष्ट्रीय आंदोलन को सामान्यतः उग्रवादी चरण (Extremist Phase) अथवा नव राष्ट्रवाद का काल कहा जाता है।

उग्रवादी नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल तथा अरविन्द घोष प्रमुख थे। इनमें लाल-बाल-पाल उग्रवाद के तीन प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।

भारत में उग्रवाद के उदय का श्रेय सामान्यतः बाल गंगाधर तिलक को दिया जाता है। उन्होंने 1894 ई. में गणपति महोत्सव तथा 1895 ई. में शिवाजी महोत्सव प्रारम्भ कर राष्ट्रीय चेतना को जन-आंदोलन का रूप दिया।

बाल गंगाधर तिलक ने केसरी (मराठी) तथा मराठा (अंग्रेजी) समाचार-पत्रों का संपादन किया और “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” का प्रसिद्ध नारा दिया।

उग्रवादियों का विश्वास स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के सिद्धांतों में था। वे स्वावलम्बन, संगठन और संघर्ष को स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रभावी मार्ग मानते थे।

उग्रवादी नेताओं ने उदारवादियों की प्रार्थना-पत्र एवं याचिका की नीति को राजनीतिक भिक्षावृत्ति (Political Mendicancy) कहा।

1905 ई. के बंग-भंग के विरोध में प्रारम्भ हुए स्वदेशी आंदोलन ने उग्रवादी विचारधारा को अखिल भारतीय पहचान दिलाई।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग, राष्ट्रीय शिक्षा तथा जनसभाओं पर विशेष बल दिया गया।

1907 ई. के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरम दल और गरम दल में विभाजित हो गई।

1907 ई. में लाला लाजपत राय को मांडले (बर्मा) निर्वासित किया गया, 1908 ई. में बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष के लिए मांडले भेजा गया तथा अरविन्द घोष ने अलीपुर बम कांड (1908) के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ दी।

सरकारी दमन तथा प्रमुख नेताओं के सक्रिय राजनीति से हटने के कारण उग्रवादी आंदोलन का नेतृत्व कमजोर पड़ा और इसकी गति अस्थायी रूप से धीमी हो गई।

भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रारम्भ सामान्यतः 1897 ई. में महाराष्ट्र से माना जाता है, जबकि इसके प्रमुख केंद्र बंगाल, पंजाब तथा महाराष्ट्र रहे।

अरविन्द घोष उग्रवादी आंदोलन के प्रमुख वैचारिक नेता थे, जबकि विपिन चंद्र पाल को बंगाल में उग्रवाद का प्रमुख प्रवक्ता माना जाता है।

लाला लाजपत राय को पंजाब केसरी के नाम से जाना जाता है और वे पंजाब में उग्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेता थे।

मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू की गई, जिसे ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और शासन करो की नीति का प्रमुख उदाहरण माना जाता है।

भारतीय प्रेस अधिनियम, 1910 तथा अन्य दमनकारी कानूनों के माध्यम से राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों एवं क्रांतिकारी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया।

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवादी गतिविधियों पर नियंत्रण और अधिक कठोर कर दिया, जिससे उग्रवादी आंदोलन की गति प्रभावित हुई।

1916 ई. में लखनऊ अधिवेशन के दौरान नरम दल और गरम दल के बीच पुनः समझौता हुआ, जिससे कांग्रेस की संगठनात्मक एकता पुनः स्थापित हुई।

उग्रवादी आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया तथा आगे चलकर गांधी युग के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण तैयार किया।

कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन एवं घटनाक्रम

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 ई. को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की तथा इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

दादाभाई नौरोजी ने 1886 ई. के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता की। इसी अधिवेशन से कांग्रेस का स्वरूप अधिक अखिल भारतीय बनने लगा।

बदरुद्दीन तैयबजी 1887 ई. के मद्रास अधिवेशन में कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष बने, जबकि जॉर्ज यूल 1888 ई. के इलाहाबाद अधिवेशन में कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष चुने गए।

1890 ई. के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता फिरोजशाह मेहता ने की, जबकि 1894 ई. के मद्रास अधिवेशन में अल्फ्रेड वेब कांग्रेस के प्रथम आयरिश अध्यक्ष बने।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने 1895 ई. के पूना अधिवेशन की अध्यक्षता की तथा 1896 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार “वन्दे मातरम्” का सार्वजनिक गायन किया गया।

1901 ई. के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता दीनशॉ वाचा ने की।

गोपाल कृष्ण गोखले ने 1905 ई. के बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता की। उसी समय बंग-भंग विरोधी आंदोलन पूरे देश में फैल रहा था।

कलकत्ता अधिवेशन (1906) में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य बताया तथा स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के कार्यक्रमों का समर्थन किया गया।

सूरत अधिवेशन (1907) कांग्रेस के इतिहास में नरम दल और गरम दल के विभाजन के लिए प्रसिद्ध है।

मदन मोहन मालवीय ने 1909 ई. के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता की।

1911 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार “जन-गण-मन” का गायन किया गया।

लखनऊ अधिवेशन (1916) में नरम दल और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ तथा ऐतिहासिक कांग्रेस-लीग समझौता (लखनऊ पैक्ट) संपन्न हुआ।

एनी बेसेंट 1917 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं।

1918 ई. के बम्बई विशेष अधिवेशन में हसन इमाम ने अध्यक्षता की, जबकि उसी वर्ष दिल्ली अधिवेशन की अध्यक्षता मदन मोहन मालवीय ने की।

अमृतसर अधिवेशन (1919) में रॉलेट एक्ट तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड की कठोर निंदा की गई।

नागपुर अधिवेशन (1920) में असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति दी गई तथा कांग्रेस का पुनर्गठन भाषाई प्रांतों के आधार पर किया गया।

अहमदाबाद अधिवेशन (1921) में निर्वाचित अध्यक्ष चित्तरंजन दास जेल में होने के कारण अध्यक्षता हकीम अजमल खाँ ने की।

गया अधिवेशन (1922) में चित्तरंजन दास का काउंसिल प्रवेश का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया, जिसके बाद आगे चलकर स्वराज पार्टी की स्थापना हुई।

दिल्ली विशेष अधिवेशन (1923) में कांग्रेस ने काउंसिल प्रवेश की नीति को स्वीकार कर लिया।

बेलगाँव अधिवेशन (1924) की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। वे कांग्रेस के एकमात्र अधिवेशन अध्यक्ष रहे।

सरोजिनी नायडू 1925 ई. के कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।

गौहाटी अधिवेशन (1926) में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए खादी पहनना अनिवार्य किया गया।

मद्रास अधिवेशन (1927) में साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय लिया गया।

कलकत्ता अधिवेशन (1928) में नेहरू रिपोर्ट पर विचार किया गया तथा डोमिनियन स्टेटस के लिए ब्रिटिश सरकार को एक वर्ष का समय दिया गया।

लाहौर अधिवेशन (1929) में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया गया तथा 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।

कराची अधिवेशन (1931) में मौलिक अधिकारों तथा राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम संबंधी ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए गए।

बम्बई अधिवेशन (1934) में सविनय अवज्ञा आंदोलन को औपचारिक रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

जवाहरलाल नेहरू ने 1936 ई. के लखनऊ तथा 1937 ई. के फ़ैज़पुर अधिवेशन की अध्यक्षता की। फ़ैज़पुर कांग्रेस का पहला ग्रामीण अधिवेशन था।

हरिपुरा अधिवेशन (1938) में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने तथा राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का निर्णय लिया गया, जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाए गए।

त्रिपुरी अधिवेशन (1939) में पंत प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट के कारण सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

रामगढ़ अधिवेशन (1940) की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने की। वे 1946 ई. तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे।

8 अगस्त 1942 ई. को बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारम्भ करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

मेरठ अधिवेशन (1946) में आचार्य जे. बी. कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वही कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

15 अगस्त 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लगभग 62 वर्षों तक चले राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व की अपनी ऐतिहासिक भूमिका पूर्ण की।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram