भारत में फ्रांसीसियों का आगमन, विस्तार एवं पतन (1664–1954 ई.)

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पृष्ठभूमि

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➣ यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों में फ्रांसीसी सबसे अंत में भारत पहुँचे। उनका उद्देश्य भी अन्य यूरोपीय कंपनियों की भाँति भारत तथा पूर्वी देशों के साथ लाभदायक व्यापार स्थापित करना था।

1664 ई. में फ्रांस के सम्राट लुई चौदहवें के वित्तमंत्री जाँ-बप्तिस्त कोलबर्ट के प्रयासों से फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा हिन्द महासागर क्षेत्र में फ्रांस के व्यापारिक हितों का विस्तार करना था।

➣ फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी अन्य यूरोपीय कम्पनियों से कुछ भिन्न थी, क्योंकि यह मुख्यतः फ्रांसीसी सरकार के संरक्षण में कार्य करती थी। सरकार ने कम्पनी को व्यापारिक विशेषाधिकार प्रदान किए तथा आर्थिक सहायता देकर उसके प्रारम्भिक विकास को प्रोत्साहित किया।

➣ कम्पनी को सुदृढ़ बनाने के लिए कोलबर्ट ने लगभग 30 लाख फ्रैंक की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई तथा स्थापना के बाद प्रथम दस वर्षों तक होने वाले संभावित घाटे की भरपाई का आश्वासन भी दिया। इससे कम्पनी को प्रारम्भिक वर्षों में पर्याप्त सरकारी संरक्षण प्राप्त हुआ।

➣ भारत आने से पूर्व फ्रांसीसियों ने मेडागास्कर में अपना उपनिवेश स्थापित करने का प्रयास किया, किन्तु स्थानीय परिस्थितियों तथा प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण वे वहाँ स्थायी सफलता प्राप्त नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने अपना ध्यान सीधे भारत की ओर केन्द्रित किया।

1667 ई. में फ्रांसीसी अधिकारी फ्रांसिस कैरों भारत अभियान के लिए रवाना हुआ। अगले वर्ष 1668 ई. में उसने सूरत में फ्रांसीसी कम्पनी की प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की। यही भारत में फ्रांसीसी व्यापार का प्रारम्भिक केन्द्र बना।

1669 ई. में फ्रांसीसी अधिकारी मार्कारा ने गोलकुण्डा के सुल्तान से अनुमति प्राप्त कर मसूलीपट्टनम में दूसरी फ्रांसीसी व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की। इससे फ्रांसीसियों को कोरोमण्डल तट पर भी व्यापार करने का अवसर प्राप्त हुआ।

घटना वर्ष महत्त्व
फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना 1664 ई. लुई XIV के मंत्री कोलबर्ट के प्रयासों से स्थापना।
मेडागास्कर अभियान 1664–1667 ई. प्रथम उपनिवेशी प्रयास, किन्तु असफल।
सूरत फैक्ट्री 1668 ई. भारत में फ्रांसीसियों की पहली व्यापारिक फैक्ट्री।
मसूलीपट्टनम फैक्ट्री 1669 ई. कोरोमण्डल तट पर दूसरी व्यापारिक फैक्ट्री।

1664 ई. – फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना।
संस्थापकजाँ-बप्तिस्त कोलबर्ट (लुई XIV के वित्तमंत्री)।
भारत की प्रथम फ्रांसीसी फैक्ट्रीसूरत (1668 ई.)
दूसरी फ्रांसीसी फैक्ट्रीमसूलीपट्टनम (1669 ई.)

फ्रांसीसी बस्तियों का विस्तार

1672 ई. में फ्रांसीसी नौसैनिक अधिकारी एडमिरल डेला हे ने गोलकुण्डा के सुल्तान की सहायता से सैनथोमी पर अधिकार कर लिया। यद्यपि यह विजय स्थायी नहीं रही, फिर भी इससे दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ा।

1673 ई. में फ्रांसीसी अधिकारी फ्रैंको (फ्रांस्वा) मार्टिन ने बीजापुर के अधीन विलियानूर (वालिकोंडापुर) क्षेत्र के सूबेदार शेर ख़ाँ लोदी से पुदुचेरी (पांडिचेरी) नामक गाँव प्राप्त किया।

1674 ई. में फ्रैंको मार्टिन ने यहाँ एक स्थायी फ्रांसीसी बस्ती बसाई, जो आगे चलकर पांडिचेरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसी कारण फ्रैंको मार्टिन को भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

➣ मार्टिन के कुशल प्रशासन में पांडिचेरी शीघ्र ही फ्रांसीसी व्यापार, प्रशासन तथा सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया। उसने यहाँ फोर्ट लुई का निर्माण कराया, जिससे फ्रांसीसी बस्ती की सुरक्षा और व्यापारिक स्थिति दोनों मजबूत हुईं।

1674 ई. में बंगाल के सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ ने फ्रांसीसियों को हुगली नदी के किनारे व्यापार करने की अनुमति दी। बाद में 1690–1692 ई. के बीच यहाँ चन्द्रनगर की स्थापना की गई, जो बंगाल में फ्रांसीसियों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया।

1693 ई. में डचों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया, किन्तु 1697 ई. की रिजविककी संधि के बाद यह पुनः फ्रांसीसियों को लौटा दिया गया।

1701 ई. में पांडिचेरी को भारत में स्थित सभी फ्रांसीसी बस्तियों का मुख्यालय बनाया गया तथा फ्रैंको मार्टिन को भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का महानिदेशक नियुक्त किया गया।

फ्रांसीसी व्यापारिक केन्द्र वर्ष प्रमुख तथ्य
सूरत 1668 ई. भारत में फ्रांसीसियों की प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री।
मसूलीपट्टनम 1669 ई. कोरोमण्डल तट पर दूसरी व्यापारिक फैक्ट्री।
सैनथोमी 1672 ई. एडमिरल डेला हे ने अस्थायी रूप से अधिकार किया।
पांडिचेरी 1674 ई. फ्रांसीसी बस्तियों का प्रमुख केन्द्र एवं बाद में मुख्यालय।
चन्द्रनगर 1690–1692 ई. बंगाल का प्रमुख फ्रांसीसी व्यापारिक केन्द्र।

भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का वास्तविक संस्थापकफ्रैंको (फ्रांस्वा) मार्टिन
फ्रांसीसी कम्पनी का मुख्यालयपांडिचेरी
1697 ई.रिजविक की संधि के बाद पांडिचेरी पुनः फ्रांसीसियों को मिला।
1701 ई. – पांडिचेरी भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का आधिकारिक मुख्यालय बना।

पुनर्गठन एवं विस्तार (1706–1742 ई.)

1706 ई. में फ्रैंको मार्टिन की मृत्यु के बाद भारत में फ्रांसीसी व्यापार एवं प्रशासन का प्रभाव कुछ समय के लिए कमजोर पड़ गया। उनके समान दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव में कम्पनी की गतिविधियों में ठहराव आ गया और 1706 से 1720 ई. के बीच फ्रांसीसी प्रभाव में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।

➣ इस स्थिति में सुधार लाने के लिए 1720 ई. में फ्रांसीसी कम्पनी का पुनर्गठन किया गया। इसके बाद कम्पनी को कम्पैनी पर्पेचुअल देज़ आन्द अथवा इंडीज की चिरस्थायी कम्पनी के रूप में पुनर्संगठित किया गया। इस पुनर्गठन का उद्देश्य फ्रांसीसी व्यापार को अधिक सुदृढ़ एवं प्रतिस्पर्धी बनाना था।

➣ पुनर्गठन के बाद जॉन लॉ के नेतृत्व में कम्पनी को नई वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्था मिली। इसके परिणामस्वरूप फ्रांसीसियों ने पुनः हिन्द महासागर क्षेत्र में अपने व्यापारिक विस्तार के प्रयास प्रारम्भ किए।

1721 ई. में फ्रांसीसियों ने मॉरीशस पर अधिकार स्थापित किया। हिन्द महासागर में स्थित यह द्वीप आगे चलकर फ्रांसीसी नौसैनिक गतिविधियों तथा समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण आधार बन गया।

➣ इसके बाद 1725 ई. में फ्रांसीसियों ने मालाबार तट पर स्थित माही पर अधिकार कर लिया। माही पश्चिमी तट पर फ्रांसीसी व्यापार का प्रमुख केन्द्र बन गया और अरब सागर के व्यापार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1731 ई. में डूप्ले को चन्द्रनगर का गवर्नर नियुक्त किया गया। उसके कुशल प्रशासन एवं व्यापारिक नीतियों के कारण बंगाल में फ्रांसीसी व्यापार को नई गति मिली और कम्पनी की आर्थिक स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत हुई।

1735 ई. में ड्यूमा भारत में फ्रांसीसी गवर्नर बना। उसके शासनकाल में फ्रांसीसी प्रभाव और अधिक बढ़ा। इसी अवधि में मराठा सेनापति रघुजी भोंसले के आक्रमण में कर्नाटक के नवाब दोस्त अली की मृत्यु हो गई, जो फ्रांसीसियों का सहयोगी था। इस घटना ने दक्षिण भारतीय राजनीति में फ्रांसीसी हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि तैयार की।

1739 ई. में फ्रांसीसियों ने करैकाल पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार पांडिचेरी, माही, करैकाल तथा चन्द्रनगर जैसे प्रमुख केन्द्रों के माध्यम से फ्रांसीसियों का व्यापारिक नेटवर्क भारत के विभिन्न भागों तक फैल गया।

घटना वर्ष महत्त्व
फ्रैंको मार्टिन की मृत्यु 1706 ई. फ्रांसीसी प्रभाव में अस्थायी गिरावट प्रारम्भ।
कम्पनी का पुनर्गठन 1720 ई. इंडीज की चिरस्थायी कम्पनी के रूप में पुनर्संगठन।
मॉरीशस 1721 ई. हिन्द महासागर का प्रमुख फ्रांसीसी नौसैनिक केन्द्र।
माही 1725 ई. मालाबार तट पर फ्रांसीसी व्यापारिक केन्द्र।
डूप्ले 1731 ई. चन्द्रनगर का गवर्नर नियुक्त।
ड्यूमा 1735 ई. भारत में फ्रांसीसी गवर्नर बना।
करैकाल 1739 ई. फ्रांसीसियों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना।

1706 ई. – फ्रैंको मार्टिन की मृत्यु।
1720 ई. – कम्पनी का पुनर्गठन (इंडीज की चिरस्थायी कम्पनी)।
1721 ई. – मॉरीशस पर अधिकार।
1725 ई. – माही पर अधिकार।
1731 ई. – डूप्ले चन्द्रनगर का गवर्नर बना।
1735 ई. – ड्यूमा भारत का गवर्नर बना।
1739 ई. – करैकाल पर अधिकार।

डूप्ले (1741–1742 ई.)

जोज़ेफ़ फ़्राँस्वा डूप्ले भारत में फ्रांसीसी शासन के सबसे प्रसिद्ध एवं महत्वाकांक्षी प्रशासकों में से एक था। उसने सबसे पहले यह समझा कि भारत में केवल व्यापार से अधिक लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करके यूरोपीय साम्राज्य की स्थापना भी संभव है।

1731 ई. में डूप्ले को चन्द्रनगर का गवर्नर नियुक्त किया गया। उसके कुशल प्रशासन के कारण बंगाल में फ्रांसीसी व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और कम्पनी की आर्थिक स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गई।

1741–1742 ई. में डूप्ले को पांडिचेरी का गवर्नर (गवर्नर-जनरल) नियुक्त किया गया। उसके नेतृत्व में फ्रांसीसी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया और कम्पनी ने केवल व्यापार तक सीमित रहने के बजाय भारतीय राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया।

➣ डूप्ले का विश्वास था कि भारतीय शासकों के उत्तराधिकार विवादों एवं क्षेत्रीय संघर्षों का लाभ उठाकर फ्रांस भारत में अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित कर सकता है। उसने पहली बार भारतीय शासकों की सहायता के लिए यूरोपीय प्रशिक्षित सेना तथा भारतीय सिपाहियों का संगठित रूप से उपयोग किया।

➣ डूप्ले को भारत में यूरोपीय साम्राज्य की अवधारणा प्रस्तुत करने वाला पहला फ्रांसीसी प्रशासक माना जाता है। उसके द्वारा अपनाई गई अनेक राजनीतिक एवं सैनिक रणनीतियों को बाद में अंग्रेजों ने भी अपनाया और उनका सफलतापूर्वक उपयोग किया।

➣ इतिहासकार थॉमस बैबिंगटन मैकाले के अनुसार, डूप्ले पहला व्यक्ति था जिसने यह अनुभव किया कि भारत में मुग़ल साम्राज्य के खंडहरों पर एक यूरोपीय साम्राज्य की स्थापना की जा सकती है। यह कथन भारत में यूरोपीय साम्राज्यवाद की बदलती नीति को स्पष्ट करता है।

➣ डूप्ले के समय तक फ्रांसीसी कम्पनी का मुख्य उद्देश्य केवल व्यापार नहीं रह गया था। उसने भारतीय राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप कर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। यही नीति आगे चलकर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष का प्रमुख कारण बनी।

तथ्य विवरण
पूरा नाम जोज़ेफ़ फ़्राँस्वा डूप्ले (Joseph François Dupleix)
चन्द्रनगर का गवर्नर 1731 ई.
पांडिचेरी का गवर्नर 1741–1742 ई.
प्रमुख उद्देश्य व्यापार के साथ भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप कर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाना।
ऐतिहासिक महत्त्व भारत में यूरोपीय साम्राज्य की अवधारणा को व्यवहार में लागू करने वाला प्रथम फ्रांसीसी प्रशासक।

1731 ई. – डूप्ले चन्द्रनगर का गवर्नर बना।
1741–1742 ई. – पांडिचेरी का गवर्नर नियुक्त हुआ।
भारत में यूरोपीय साम्राज्य की अवधारणा – डूप्ले ने सबसे पहले व्यावहारिक रूप से अपनाई।
▪ मैकाले ने डूप्ले को भारत में यूरोपीय साम्राज्य की संभावना पहचानने वाला प्रथम व्यक्ति बताया।

फ्रांसीसियों की नीति

➣ भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना का मूल उद्देश्य व्यापार था। प्रारम्भिक वर्षों में कम्पनी ने सूरत, मसूलीपट्टनम, पांडिचेरी एवं चन्द्रनगर जैसे व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर समुद्री व्यापार को विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया।

➣ फ्रांसीसियों ने अपनी व्यापारिक बस्तियों की सुरक्षा के लिए किलेबंदी की तथा स्थानीय सैनिकों (सिपाहियों) की भर्ती भी प्रारम्भ की। उस समय इसका उद्देश्य मुख्यतः अंग्रेजों, डचों तथा अन्य यूरोपीय शक्तियों से अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना था, न कि भारत में राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करना।

डूप्ले के गवर्नर बनने के बाद फ्रांसीसी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। उसने भारतीय राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप कर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। इस प्रकार कम्पनी का स्वरूप केवल व्यापारिक संस्था तक सीमित न रहकर धीरे-धीरे राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति के रूप में भी विकसित होने लगा।

1742 ई. के बाद फ्रांसीसी कम्पनी ने व्यापारिक लाभ के साथ-साथ राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की नीति अपनाई। परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के मध्य प्रतिस्पर्धा तीव्र हो गई और दक्षिण भारत में दोनों यूरोपीय शक्तियाँ प्रत्यक्ष संघर्ष की ओर बढ़ने लगीं।

➣ आगे चलकर यही प्रतिस्पर्धा कर्नाटक युद्धों का प्रमुख कारण बनी, जिसने भारत में अंग्रेजी एवं फ्रांसीसी शक्ति के भविष्य का निर्णय किया।

पहलू फ्रांसीसी नीति
प्रारम्भिक उद्देश्य व्यापार एवं व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना।
सुरक्षा व्यवस्था किलेबंदी एवं भारतीय सिपाहियों की भर्ती।
नीति में परिवर्तन डूप्ले के समय व्यापार से राजनीति की ओर।
परिणाम अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

निष्कर्ष

➣ भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना, पांडिचेरी एवं चन्द्रनगर जैसे महत्वपूर्ण नगरों के विकास तथा दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि प्रारम्भ में उसका उद्देश्य केवल व्यापार था, किन्तु डूप्ले के नेतृत्व में कम्पनी ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया।

➣ यही नीति आगे चलकर अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष का आधार बनी। औपनिवेशिक शक्तियों के मध्य संघर्ष (कर्नाटक युद्ध) का विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में किया जाएगा।

फ्रांसीसी कम्पनी का प्रारम्भिक उद्देश्य – व्यापार।
नीति में परिवर्तन – डूप्ले के समय राजनीति में हस्तक्षेप।
फ्रांसीसी मुख्यालय – पांडिचेरी।
अंग्रेज–फ्रांसीसी संघर्ष की पृष्ठभूमि – 1742 ई. के बाद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा।

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