भारत में अंग्रेजों का आगमन एवं ब्रिटिश शासन (1608–1947 ई.)

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पृष्ठभूमि

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डचों के पश्चात् भारत में अंग्रेजों का आगमन हुआ। यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों में अंग्रेज सबसे अधिक सफल सिद्ध हुए। प्रारम्भ में उनका उद्देश्य भी अन्य यूरोपीय देशों की भाँति मसालों के व्यापार से लाभ कमाना था।

➣ उन्होंने पहले पूर्वी द्वीपसमूह (इंडोनेशिया) में व्यापार स्थापित करने का प्रयास किया, किन्तु वहाँ डचों के प्रबल प्रतिरोध के कारण उनका ध्यान धीरे-धीरे भारतीय उपमहाद्वीप की ओर केन्द्रित हो गया। यही परिवर्तन भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना का आधार बना।

▪ इंस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (लंदन): 1600ई. (अकबर के शासनकाल में)
▪ भारत में पहली कोठी (मसुलीपट्टनम): 1611 ई. (जहांगीर के शासनकाल में)

भारत आने वाले प्रारम्भिक अंग्रेज यात्री

➣ भारत आने वाला प्रथम ज्ञात अंग्रेज थॉमस स्टीफेन्स था, जो एक जेसुइट पादरी के रूप में 24 अक्टूबर, 1579 ई. को पुर्तगालियों के साथ गोवा पहुँचा।

➣ स्टीफेन्स ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के न्यू कॉलेज से सम्बद्ध था तथा उत्तमाशा अंतरीप के समुद्री मार्ग से भारत पहुँचने वाला प्रथम अंग्रेज माना जाता है। उसने गोवा में धर्म-प्रचार के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं का अध्ययन किया तथा अपना शेष जीवन वहीं व्यतीत किया।

➣ इसके बाद राल्फ फिंच 1583 ई. में जॉन न्यूबेरी, विलियम लीड्स तथा जेम्स स्टोरी के साथ टाइगर नामक जहाज़ से लन्दन से रवाना हुआ।

➣ यह दल पश्चिम एशिया एवं फारस की खाड़ी के मार्ग से भारत पहुँचा। यात्रा के दौरान होर्मुज में पुर्तगालियों ने इन्हें बन्दी बना लिया और गोवा ले गए, जहाँ से बाद में राल्फ फिंच निकलने में सफल रहा।

➣ लगभग 1585 ई. में राल्फ फिंच आगरा तथा फतेहपुर सीकरी पहुँचा और मुग़ल सम्राट अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ। उसने इन दोनों नगरों को उस समय के लन्दन से भी अधिक समृद्ध एवं विशाल बताया।

मुग़ल सम्राट अकबर के दरबार में पहुँचने वाला प्रथम उल्लेखनीय अंग्रेज व्यापारी राल्फ फिंच था। उसकी यात्रा-वृत्तान्त को बाद में रिचर्ड हैकलुइट ने प्रकाशित किया, जिसने भारत के प्रति अंग्रेज व्यापारियों की रुचि बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ भारत से लौटने के बाद राल्फ फिंच ने यहाँ के व्यापार, नगरों तथा आर्थिक समृद्धि का विस्तृत वर्णन किया। उसने इंग्लैण्ड के व्यापारियों को यह विश्वास दिलाया कि भारत के साथ प्रत्यक्ष व्यापार अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो सकता है। परिणामस्वरूप अंग्रेज व्यापारियों ने एक संगठित व्यापारिक कम्पनी स्थापित करने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ किए।

1577–1580 ई. के मध्य अंग्रेज नाविक एवं प्रसिद्ध समुद्री डाकू सर फ्रांसिस ड्रेक ने विश्व-परिक्रमा के दौरान भारत से लिस्बन जा रहे एक पुर्तगाली जहाज़ को लूट लिया। इस जहाज़ से प्राप्त मानचित्रों, समुद्री मार्गों तथा व्यापारिक सूचनाओं ने अंग्रेजों को पूर्वी देशों के लाभदायक व्यापार की प्रत्यक्ष जानकारी उपलब्ध कराई।

1588 ई. में इंग्लैण्ड ने स्पेन के विशाल नौसैनिक बेड़े स्पेनिश आर्माडा को पराजित कर समुद्री शक्ति के क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की। इस विजय के बाद स्पेन एवं पुर्तगाल का समुद्री प्रभुत्व कमजोर होने लगा तथा अंग्रेजों का आत्मविश्वास बढ़ा। परिणामस्वरूप वे स्वतंत्र रूप से एशिया के साथ व्यापार करने के लिए अधिक सक्रिय हो गए।

1599 ई. में जॉन मिल्डेनहाल फारस के रास्ते स्थल मार्ग से भारत आने वाला प्रथम अंग्रेज बना। वह 1603 ई. में आगरा पहुँचा और सम्राट अकबर से गुजरात में व्यापार की अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया।

➣ यद्यपि पुर्तगालियों के प्रभाव के कारण उसे तत्काल सफलता नहीं मिली, फिर भी उसकी यात्रा ने भारत के साथ प्रत्यक्ष व्यापार की अंग्रेजी योजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

➣ 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत एवं पूर्वी देशों के साथ होने वाले लाभदायक व्यापार ने अंग्रेज व्यापारियों का ध्यान आकर्षित कर लिया था। विशेषकर मसालों, रेशम, सूती वस्त्रों तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के व्यापार में भागीदारी के उद्देश्य से इंग्लैण्ड के व्यापारियों ने एक संगठित व्यापारिक संस्था स्थापित करने का निर्णय लिया।

1581 ई. में महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने टर्की कम्पनी को ऑटोमन साम्राज्य के साथ व्यापार करने का शाही अधिकार-पत्र प्रदान किया।

बाद में 1592 ई. में टर्की कम्पनी तथा वेनिस कम्पनी के विलय से लीवेंट कम्पनी का गठन हुआ। इस कम्पनी के व्यापारिक अनुभव एवं पूँजी ने आगे चलकर पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की अंग्रेजी योजना को मजबूत आधार प्रदान किया।

24 सितम्बर, 1599 ई. को लन्दन के मर्चेण्ट एडवेंचरर्स नामक व्यापारियों के एक समूह ने एक नई कम्पनी की स्थापना का प्रस्ताव रखा।

➣ इसका मुख्य उद्देश्य पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष व्यापार करना तथा मसालों के व्यापार में डचों एवं पुर्तगालियों के एकाधिकार को चुनौती देना था।

➣ इसी प्रयास के परिणामस्वरूप 31 दिसम्बर, 1600 ई. को इंग्लैण्ड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने एक शाही अधिकार-पत्र जारी कर दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेन्ट्स ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इन्टू द ईस्ट इंडीज की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की। यही कम्पनी आगे चलकर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

➣ प्रारम्भ में कम्पनी को 15 वर्षों के लिए पूर्वी देशों के साथ व्यापार का एकाधिकार प्रदान किया गया। यह अधिकार समय-समय पर नवीनीकृत किया जाता था तथा आवश्यकता पड़ने पर इसे समाप्त भी किया जा सकता था।

1609 ई. में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम ने कम्पनी के अधिकार-पत्र का नवीनीकरण कर उसे अनिश्चित काल तक के लिए मान्यता प्रदान कर दी। साथ ही यह व्यवस्था भी की गई कि दो वर्ष की पूर्व सूचना देकर इस अधिकार को समाप्त किया जा सकता है।

➣ कम्पनी में प्रारम्भ में लगभग 217–218 साझीदार थे, जिनमें लन्दन के प्रमुख व्यापारी, उद्योगपति, नाइट तथा एल्डरमैन सम्मिलित थे। कम्पनी का उद्देश्य उस समय केवल व्यापार करना था, न कि भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित करना।

➣ कम्पनी का प्रथम गवर्नर सर टॉमस स्माइथ नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कम्पनी ने पूर्वी देशों के साथ नियमित व्यापार प्रारम्भ करने तथा समुद्री अभियानों का आयोजन करने की योजना बनाई।

तथ्य विवरण
स्थापना का प्रस्ताव 24 सितम्बर, 1599 ई.
स्थापना 31 दिसम्बर, 1600 ई.
शाही अधिकार-पत्र महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम
प्रारम्भिक नाम The Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies
लोकप्रिय नाम अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी
प्रथम गवर्नर सर टॉमस स्माइथ
प्रारम्भिक अधिकार 15 वर्षों का व्यापारिक एकाधिकार
1609 ई. जेम्स प्रथम ने कम्पनी का चार्टर अनिश्चित काल के लिए बढ़ाया।
प्रारम्भिक शेयरधारक लगभग 217–218

1833 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा कम्पनी का आधिकारिक संक्षिप्त नाम ईस्ट इंडिया कम्पनी कर दिया गया तथा इसी अधिनियम द्वारा कम्पनी के समस्त व्यापारिक अधिकार समाप्त कर उसे केवल एक प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित कर दिया गया।

प्रथम समुद्री अभियान एवं भारत की ओर अग्रसर

31 दिसम्बर, 1600 ई. को अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना के बाद कम्पनी ने अपना प्रथम लक्ष्य पूर्वी द्वीपसमूह (इंडोनेशिया) के लाभदायक मसाला व्यापार में प्रवेश करना निर्धारित किया। उस समय यूरोप में काली मिर्च, लौंग, जायफल तथा अन्य मसालों की अत्यधिक माँग थी, इसलिए कम्पनी ने प्रारम्भ में भारत की अपेक्षा मसाला द्वीपों की ओर अधिक ध्यान दिया।

1601 ई. में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रथम समुद्री अभियान आरम्भ हुआ। इस अभियान का नेतृत्व सर जेम्स लैंकेस्टर ने किया, जिन्हें कम्पनी के प्रथम समुद्री बेड़े का कमाण्डर नियुक्त किया गया।

➣ इसके पश्चात रेड ड्रैगन नामक प्रमुख जहाज़ के नेतृत्व में इंग्लैण्ड से पूर्वी देशों की यात्रा प्रारम्भ हुई। जहाज़ उत्तमाशा अंतरीप से होते हुए आचेह (सुमात्रा) पहुँचा, जहाँ स्थानीय शासक से व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की गई।

➣ अंग्रेजों ने जावा तथा अन्य मसाला द्वीपों में भी व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। यह अभियान व्यापारिक दृष्टि से अत्यन्त सफल रहा और कम्पनी को पर्याप्त लाभ प्राप्त हुआ।

➣ प्रारम्भिक अभियानों से अंग्रेजों को यह अनुभव हुआ कि पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार अत्यधिक लाभदायक है। किन्तु इंडोनेशिया में डच ईस्ट इंडिया कम्पनी (VOC) पहले से ही अत्यन्त शक्तिशाली थी।

➣ डचों के कड़े विरोध एवं मसाला व्यापार पर उनके प्रभावी नियंत्रण के कारण अंग्रेजों के लिए वहाँ स्थायी व्यापारिक आधार स्थापित करना कठिन होता गया।

➣ इसी कारण 1604 ई. के बाद अंग्रेजों ने अपना ध्यान धीरे-धीरे भारतीय उपमहाद्वीप की ओर केन्द्रित करना प्रारम्भ किया। उस समय भारत न केवल सूती वस्त्र, नील, रेशम एवं मसालों का प्रमुख उत्पादक था, बल्कि मुग़ल साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता भी विदेशी व्यापार के लिए अनुकूल मानी जाती थी।

➣ कम्पनी ने पश्चिमी भारत के प्रमुख बंदरगाह सूरत में व्यापारिक कोठी स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इसके लिए मुग़ल सम्राट से आधिकारिक व्यापारिक अनुमति (फ़रमान) प्राप्त करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से कम्पनी ने अपना प्रतिनिधि भारत भेजने का निर्णय लिया।

वर्ष घटना महत्त्व
1601 ई. प्रथम समुद्री अभियान सर जेम्स लैंकेस्टर के नेतृत्व में कम्पनी की पहली समुद्री यात्रा।
1601 ई. रेड ड्रैगन जहाज़ प्रथम अंग्रेजी अभियान का प्रमुख जहाज़।
1601–02 ई. आचेह (सुमात्रा) पहुँचना स्थानीय शासक से व्यापार की अनुमति प्राप्त हुई।
1604 ई. भारत की ओर ध्यान डच विरोध के कारण कम्पनी ने भारतीय व्यापार को प्राथमिकता दी।
1608 ई. भारत में प्रतिनिधि भेजने का निर्णय इसी क्रम में आगे चलकर कैप्टन विलियम हॉकिन्स भारत पहुँचा।

➣ इस प्रकार 1604–1608 ई. के बीच अंग्रेजों की व्यापारिक नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। मसाला द्वीपों से अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण उन्होंने भारत को अपना प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनाने का निर्णय लिया।

➣ आगे चलकर इसी नीति के अंतर्गत 1608 ई. में कैप्टन विलियम हॉकिन्स भारत पहुँचा, जिसने मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रतिनिधित्व किया।

कैप्टन विलियम हॉकिन्स (1608–1611 ई.)

➣ भारत में स्थायी व्यापारिक कोठी स्थापित करने के उद्देश्य से ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने कैप्टन विलियम हॉकिन्स को अपना राजदूत बनाकर मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा।

➣ हॉकिन्स ईस्ट इंडिया कम्पनी के जहाज़ हेक्टर का नेतृत्व करते हुए 24 अगस्त, 1608 ई. को सूरत बंदरगाह पहुँचा। यह भारत पहुँचने वाला ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रथम जहाज़ था।

➣ सूरत पहुँचने पर पुर्तग़ालियों ने हॉकिन्स का कड़ा विरोध किया। अनेक बाधाओं के बावजूद स्थानीय मुग़ल अधिकारियों की सहायता से हॉकिन्स आगरा जाने में सफल हुआ।

➣ पुर्तग़ालियों की शत्रुता से बचने के लिए उसने यात्रा के दौरान अफ़ग़ान व्यापारी का वेश धारण किया और 16 अप्रैल, 1609 ई. को मुग़ल राजधानी आगरा पहुँचा।

➣ आगरा में हॉकिन्स ने सम्राट जहाँगीर से भेंट कर सूरत में अंग्रेजों को स्थायी व्यापारिक कोठी स्थापित करने तथा स्वतंत्र रूप से व्यापार करने की अनुमति देने का अनुरोध किया।

➣ जहाँगीर ने प्रारम्भ में उसके प्रस्ताव का स्वागत किया और कुछ अस्थायी व्यापारिक रियायतें भी प्रदान कीं।

➣ किन्तु पुर्तग़ालियों के प्रभाव, सूरत के स्थानीय व्यापारियों के विरोध तथा दरबारी षड्यंत्रों के कारण यह अनुमति बाद में वापस ले ली गई। परिणामस्वरूप हॉकिन्स अपने कार्यकाल में सूरत में कोई स्थायी अंग्रेज़ी फैक्ट्री स्थापित नहीं कर सका।

➣ हॉकिन्स को फ़ारसी एवं तुर्की भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उसने जहाँगीर से तुर्की भाषा में सीधे वार्तालाप किया, जिससे किसी दुभाषिये की आवश्यकता नहीं पड़ी। उसकी विद्वता, स्पष्टवादिता तथा पूर्वी देशों के अनुभव से प्रभावित होकर जहाँगीर ने उसे अपने निकटस्थ दरबारियों में स्थान दिया।

➣ जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब प्रदान किया तथा उसे इंग्लिश ख़ाँ की उपाधि से सम्मानित किया। दरबार में उसके स्थायित्व को बढ़ाने के उद्देश्य से जहाँगीर ने उसका विवाह एक आर्मेनियाई ईसाई महिला मरियम से भी करवा दिया, जो अकबर के दरबार से जुड़े एक उच्च अधिकारी के परिवार से सम्बन्धित थी।

➣ हॉकिन्स 1609 से 1611 ई. तक मुग़ल दरबार में रहा और लगातार अंग्रेजों के लिए व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त करने का प्रयास करता रहा। किन्तु पुर्तग़ालियों के प्रभाव तथा दरबारी राजनीति के कारण उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

➣ अंततः नवम्बर, 1611 ई. में वह निराश होकर आगरा से वापस लौट गया। यद्यपि हॉकिन्स अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं हुआ, फिर भी उसकी यात्रा ने मुग़ल दरबार और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच औपचारिक संबंधों की नींव रखी, जिसका लाभ आगे चलकर अंग्रेजों को प्राप्त हुआ।

भारत आने वाला ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रथम जहाज़हेक्टर (1608 ई.)
भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रथम प्रतिनिधिकैप्टन विलियम हॉकिन्स
जहाँगीर द्वारा प्रदत्त उपाधिइंग्लिश ख़ाँ
जहाँगीर द्वारा प्रदत्त मनसब400

सर हेनरी मिडलटन (1611 ई.)

कैप्टन विलियम हॉकिन्स के भारत से लौटने के बाद 1611 ई. में सर हेनरी मिडलटन ईस्ट इंडिया कम्पनी के अगले प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में भारत पहुँचे।

➣ कैप्टन विलियम हॉकिन्स का मुख्य उद्देश्य भारत में अंग्रेजी व्यापार का विस्तार करना तथा पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित करना था।

➣ मिडलटन ने पुर्तग़ालियों के कड़े विरोध के बावजूद अपना जहाज़ सूरत बंदरगाह पर उतारने में सफलता प्राप्त की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पश्चिमी भारत के समुद्री व्यापार पर पुर्तग़ालियों का एकाधिकार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा था।

➣ इसी काल में अंग्रेजों ने भारत के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में अपनी प्रथम अस्थायी व्यापारिक कोठी स्थापित की। यह दक्षिण भारत में अंग्रेजी व्यापार का प्रारम्भिक केंद्र बना तथा आगे चलकर कोरोमंडल तट पर अंग्रेजों के व्यापारिक विस्तार का आधार सिद्ध हुआ।

➣ यद्यपि मिडलटन के समय अंग्रेजों को मुग़ल सम्राट से कोई महत्वपूर्ण शाही फ़रमान प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी उसके प्रयासों ने भारत में अंग्रेजी व्यापार की निरंतरता बनाए रखी।

➣ इसके परिणामस्वरूप अगले ही वर्ष कैप्टन थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में अंग्रेजों ने पुर्तग़ालियों को निर्णायक चुनौती दी, जिसने भारत में अंग्रेजी व्यापार के इतिहास को नई दिशा प्रदान की।

सर हेनरी मिडलटन – 1611 ई. में भारत आया।
मुख्य उपलब्धि – पुर्तग़ालियों के विरोध के बावजूद सूरत में जहाज़ उतारने में सफलता।
महत्वपूर्ण घटना – मसूलीपट्टनम में अंग्रेजों की प्रथम अस्थायी व्यापारिक कोठी की स्थापना।

कैप्टन थॉमस बेस्ट एवं सवाल्ली का युद्ध (1612–1613 ई.)

सर हेनरी मिडलटन के प्रयासों के बाद भी पश्चिमी भारत में अंग्रेजों की स्थिति पूरी तरह सुदृढ़ नहीं हो सकी थी। सूरत तथा उसके आसपास के समुद्री व्यापार पर अभी भी पुर्तग़ालियों का प्रभाव बना हुआ था।

➣ इसी परिस्थिति में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने दसवें समुद्री अभियान (Tenth Voyage) के अंतर्गत कैप्टन थॉमस बेस्ट को भारत भेजा।

1 फरवरी, 1612 ई. को थॉमस बेस्ट इंग्लैण्ड से रवाना हुआ और 5 सितम्बर, 1612 ई. को सूरत पहुँचा। उसका उद्देश्य मुग़ल अधिकारियों से व्यापारिक अनुमति प्राप्त करना तथा पश्चिमी भारत में अंग्रेजी व्यापार को स्थायी आधार प्रदान करना था।

➣ जब थॉमस बेस्ट सूरत के अधिकारियों से व्यापारिक अधिकारों पर वार्ता कर रहा था, तभी पुर्तग़ाली नौसेना ने अंग्रेजों को वहाँ से हटाने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच सवाल्ली (सुवाली) बंदरगाह के निकट समुद्री संघर्ष प्रारम्भ हो गया।

29–30 नवम्बर, 1612 ई. को लड़े गए सवाल्ली के युद्ध में थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में अंग्रेजों ने पुर्तग़ालियों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। अंग्रेजों के पास केवल चार जहाज़ थे, जबकि पुर्तग़ालियों के पास चार गैलियन तथा लगभग 26 छोटे युद्धपोत थे। इसके बावजूद अंग्रेजों की बेहतर नौसैनिक रणनीति और तोपों के प्रभावी प्रयोग ने उन्हें विजय दिलाई।

सवाल्ली का युद्ध भारत में अंग्रेजों की प्रथम महत्वपूर्ण नौसैनिक विजय माना जाता है। इस विजय ने पश्चिमी तट पर पुर्तग़ालियों की समुद्री श्रेष्ठता को गहरा आघात पहुँचाया तथा यह सिद्ध कर दिया कि अंग्रेजी नौसेना अब पुर्तग़ालियों को चुनौती देने में सक्षम हो चुकी थी।

➣ इस विजय से प्रभावित होकर गुजरात के सूबेदार ने इसकी सूचना मुग़ल सम्राट जहाँगीर को भेजी। जहाँगीर का विश्वास अंग्रेजों के प्रति बढ़ा और वह पुर्तग़ालियों की अपेक्षा अंग्रेजों के साथ व्यापार करने के प्रति अधिक अनुकूल हो गया।

6 जनवरी, 1613 ई. को थॉमस बेस्ट को गुजरात के सूबेदार द्वारा प्रस्तुत जहाँगीर का अनुसमर्थन-पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें अंग्रेजों के साथ हुई व्यापारिक संधि की औपचारिक पुष्टि की गई।

➣ इसके परिणामस्वरूप 1613 ई. के प्रारम्भ में सम्राट जहाँगीर ने एक शाही फ़रमान जारी कर अंग्रेजों को सूरत में टॉमस एल्डवर्थ के नियंत्रण में स्थायी व्यापारिक कोठी स्थापित करने की अनुमति प्रदान की। यह भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की प्रथम स्थायी व्यापारिक फैक्ट्री थी, जिसने भारत में अंग्रेजी व्यापार की सुदृढ़ नींव रखी।

वर्ष / तिथि घटना महत्त्व
1 फरवरी, 1612 ई. थॉमस बेस्ट इंग्लैण्ड से रवाना हुआ। ईस्ट इंडिया कम्पनी का दसवाँ समुद्री अभियान।
5 सितम्बर, 1612 ई. सूरत पहुँचा। व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने का प्रयास।
29–30 नवम्बर, 1612 ई. सवाल्ली (सुवाली) का युद्ध। पुर्तग़ालियों पर अंग्रेजों की प्रथम निर्णायक नौसैनिक विजय।
6 जनवरी, 1613 ई. जहाँगीर का अनुसमर्थन-पत्र प्राप्त। अंग्रेजों के व्यापारिक अधिकारों की पुष्टि।
1613 ई. सूरत में प्रथम स्थायी अंग्रेजी फैक्ट्री। टॉमस एल्डवर्थ के नियंत्रण में स्थापना।

भारत में अंग्रेजों की प्रथम महत्वपूर्ण नौसैनिक विजयसवाल्ली (सुवाली) का युद्ध, 1612 ई.
प्रथम स्थायी अंग्रेजी फैक्ट्रीसूरत (1613 ई.)
प्रथम स्थायी फैक्ट्री का प्रमुखटॉमस एल्डवर्थ

सर टॉमस रो (1615–1619 ई.)

सवाल्ली (1612 ई.) में विजय के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अनुभव किया कि मुग़ल दरबार से स्थायी व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने के लिए कम्पनी के प्रतिनिधि के स्थान पर ब्रिटिश सम्राट का आधिकारिक राजदूत भेजना अधिक प्रभावी होगा। इसी उद्देश्य से कम्पनी के प्रथम गवर्नर सर टॉमस स्माइथ की अनुशंसा पर सर टॉमस रो को भारत भेजा गया।

18 सितम्बर, 1615 ई. को सर टॉमस रो ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम के आधिकारिक राजदूत के रूप में सूरत पहुँचा।

➣ प्रारम्भ में सूरत के स्थानीय अधिकारियों तथा कम्पनी के कर्मचारियों के साथ शिष्टाचार एवं अधिकारों से संबंधित कुछ विवादों के कारण उसे लगभग पाँच सप्ताह तक वहीं रुकना पड़ा।

➣ इसके बाद रो बुरहानपुर पहुँचा, जहाँ उसकी भेंट शहज़ादा परवेज से हुई। तत्पश्चात् जनवरी, 1616 ई. में वह अजमेर पहुँचा, जहाँ उस समय मुग़ल सम्राट जहाँगीर का दरबार लगा हुआ था। यहीं से उसने मुग़ल दरबार में अंग्रेजी हितों की रक्षा के लिए अपना कूटनीतिक अभियान प्रारम्भ किया।

➣ सर टॉमस रो 1615 से 1619 ई. तक मुग़ल दरबार में रहा। इस दौरान वह सम्राट जहाँगीर के साथ अजमेर, मांडू तथा अन्य स्थानों की यात्राएँ करता रहा, क्योंकि मुग़ल दरबार सम्राट के साथ स्थानांतरित होता रहता था।

17 अगस्त, 1616 ई. को जहाँगीर ने सर टॉमस रो को स्वर्ण पदक भेंट कर उसे अपने विश्वसनीय विदेशी प्रतिनिधियों में विशेष सम्मान प्रदान किया।

➣ रो की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने कम्पनी की ओर से सम्राट जहाँगीर तथा शहज़ादा खुर्रम (भावी शाहजहाँ) दोनों से अलग-अलग व्यापारिक फ़रमान प्राप्त किए।

➣ इन फ़रमानों के माध्यम से अंग्रेजों को मुग़ल साम्राज्य में अपेक्षाकृत स्वतंत्र एवं सुविधाजनक व्यापार करने का अधिकार मिला। जिस स्थायी व्यापारिक अनुमति को विलियम हॉकिन्स प्राप्त नहीं कर सका था, उसे टॉमस रो ने अपनी कुशल कूटनीति के बल पर प्राप्त कर लिया।

➣ टॉमस रो की कूटनीतिक सफलता के परिणामस्वरूप अंग्रेजों को सूरत के अतिरिक्त आगरा, अहमदाबाद तथा भड़ौच (बड़ौच) में भी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त हुई।

➣ साथ ही अनेक स्थानों पर आन्तरिक चुंगी (Inland Toll) में भी रियायत मिली। इससे मुग़ल दरबार में अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ा तथा पुर्तग़ालियों की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हो गई।

फरवरी, 1619 ई. में सर टॉमस रो भारत से इंग्लैण्ड लौट गया। उसने अपने भारत प्रवास का विस्तृत विवरण “The Embassy of Sir Thomas Roe to the Court of the Great Mughal” नामक डायरी में लिखा।

➣ यह ग्रंथ जहाँगीर के दरबार, मुग़ल प्रशासन, तत्कालीन समाज तथा अंग्रेजों के प्रारम्भिक व्यापारिक प्रयासों के अध्ययन के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण समकालीन स्रोत माना जाता है।

ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम का आधिकारिक राजदूतसर टॉमस रो
भारत आगमन18 सितम्बर, 1615 ई.
जहाँगीर से भेंटअजमेर (जनवरी, 1616 ई.)
मुग़ल दरबार में प्रवास1615–1619 ई.

दक्षिण भारत एवं पूर्वी भारत में अंग्रेजों का विस्तार

सर टॉमस रो की कूटनीतिक सफलता के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पश्चिमी भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत एवं पूर्वी भारत में भी अपने व्यापारिक विस्तार पर विशेष ध्यान देना प्रारम्भ किया।

➣ कम्पनी का उद्देश्य समुद्री तटों पर स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित कर वस्त्र, मसालों तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के व्यापार को बढ़ाना था।

1611 ई. में सर हेनरी मिडलटन के समय मसूलीपट्टनम में स्थापित अंग्रेजों की अस्थायी व्यापारिक कोठी को आगे चलकर अधिक सुदृढ़ किया गया।

➣ 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मसूलीपट्टनम अंग्रेजों के लिए कोरोमंडल तट का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया और दक्षिण भारत में कम्पनी के विस्तार का आधार सिद्ध हुआ।

1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने अंग्रेजों को 500 पैगोडा (स्वर्ण मुद्रा) के वार्षिक निश्चित शुल्क के बदले प्रसिद्ध सुनहरा फ़रमान प्रदान किया।

➣ सुनहरा फ़रमान को मसूलीपट्टनम की संधि भी कहा जाता है। इस फ़रमान के आधार पर कम्पनी ने अपनी व्यापारिक स्थिति को पुनः सुदृढ़ किया तथा मसूलीपट्टनम की कोठी को नए उत्साह के साथ विकसित किया।

➣ इस सुनहरे फ़रमान के द्वारा अंग्रेजों को गोलकुण्डा राज्य के सभी बंदरगाहों पर अपेक्षाकृत स्वतंत्र एवं रियायती व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हुआ।

➣ इससे दक्षिण भारत में कम्पनी की व्यापारिक स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई। 1634 ई. में इस फ़रमान का पुनः नवीनीकरण भी किया गया, जिससे अंग्रेजों के व्यापारिक अधिकार और अधिक सुरक्षित हो गए।

1633 ई. में अंग्रेजों ने उड़ीसा के बालासोर तथा महानदी के मुहाने पर स्थित हरिहरपुर में अपनी प्रथम व्यापारिक फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं।

➣ इन केंद्रों के माध्यम से बंगाल एवं उड़ीसा क्षेत्र में कम्पनी के व्यापार का विस्तार प्रारम्भ हुआ, जो आगे चलकर पूर्वी भारत में अंग्रेजी प्रभुत्व की नींव बना।

वर्ष घटना महत्त्व
1611 ई. मसूलीपट्टनम में अंग्रेजों की अस्थायी कोठी दक्षिण भारत में अंग्रेजी व्यापार की शुरुआत।
1632 ई. सुनहरा फ़रमान (Golden Farman) अब्दुल्ला कुतुबशाह द्वारा 500 पैगोडा वार्षिक शुल्क पर व्यापारिक अधिकार।
1633 ई. बालासोर एवं हरिहरपुर में फैक्ट्रियाँ पूर्वी भारत में अंग्रेजी व्यापार का विस्तार।
1634 ई. सुनहरे फ़रमान का नवीनीकरण गोलकुण्डा में अंग्रेजों के व्यापारिक अधिकार सुदृढ़ हुए।

Golden Farman (1632 ई.)अब्दुल्ला कुतुबशाह द्वारा प्रदान किया गया।
वार्षिक शुल्क500 पैगोडा
पूर्वी भारत की प्रथम अंग्रेजी फैक्ट्रियाँबालासोर एवं हरिहरपुर (1633 ई.)

दक्षिण भारत में विस्तार

सर टॉमस रो की कूटनीतिक सफलता के पश्चात् अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पश्चिमी भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत में भी अपने व्यापार का विस्तार प्रारम्भ किया। कम्पनी का उद्देश्य समुद्री तटों पर स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित कर वस्त्र, मसालों तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार को सुदृढ़ करना था।

1611 ई. में सर हेनरी मिडलटन के समय मसूलीपट्टनम में स्थापित अस्थायी अंग्रेजी व्यापारिक कोठी को आगे चलकर अधिक सुदृढ़ किया गया। शीघ्र ही मसूलीपट्टनम कोरोमंडल तट पर अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया और दक्षिण भारत में कम्पनी के विस्तार का आधार सिद्ध हुआ।

1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने अंग्रेजों को 500 पैगोडा (स्वर्ण मुद्रा) के वार्षिक निश्चित शुल्क के बदले प्रसिद्ध ‘सुनहरा फ़रमान’ (Golden Farman) प्रदान किया। इस फ़रमान के आधार पर कम्पनी को गोलकुण्डा राज्य के बंदरगाहों से व्यापार करने की विशेष सुविधाएँ प्राप्त हुईं। 1634 ई. में इस फ़रमान का पुनः नवीनीकरण भी किया गया।

1639 ई. में कम्पनी के अधिकारी फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के नायक शासक से मद्रास (चेन्नई) का एक भाग पट्टे पर प्राप्त किया। यह स्थान कोरोमंडल तट पर सुरक्षित बंदरगाह होने के कारण अंग्रेजों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

1641 ई. में मद्रास में अंग्रेजों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण कराया। यह भारत में अंग्रेजों द्वारा निर्मित प्रथम किला था। इस किले के चारों ओर अंग्रेजों की बस्ती विकसित हुई, जिसे आगे चलकर व्हाइट टाउन कहा गया।

फ्रांसिस डे को मद्रास का संस्थापक माना जाता है।

1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रागांज़ा से हुआ। विवाह के उपहार (दहेज) के रूप में बम्बई (मुंबई) अंग्रेजी राजसत्ता को प्राप्त हुआ।

1668 ई. में सम्राट चार्ल्स द्वितीय ने बम्बई को मात्र 10 पौण्ड वार्षिक किराये पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दिया। इसके बाद बम्बई कम्पनी का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक एवं सामरिक केंद्र बन गया और आगे चलकर पश्चिमी भारत में अंग्रेजी शक्ति का प्रमुख आधार सिद्ध हुआ।

वर्ष घटना महत्त्व
1611 ई. मसूलीपट्टनम में अंग्रेजी कोठी दक्षिण भारत में अंग्रेजी व्यापार का प्रारम्भिक आधार।
1632 ई. सुनहरा फ़रमान (Golden Farman) गोलकुण्डा में व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त हुए।
1639 ई. मद्रास पट्टे पर प्राप्त फ्रांसिस डे द्वारा अंग्रेजी बस्ती की स्थापना।
1641 ई. फोर्ट सेंट जॉर्ज भारत में अंग्रेजों का प्रथम किला।
1661 ई. बम्बई दहेज में प्राप्त चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाल से मिला।
1668 ई. बम्बई कम्पनी को हस्तांतरित 10 पौण्ड वार्षिक किराये पर ईस्ट इंडिया कम्पनी को दिया गया।

पूर्वी भारत में विस्तार एवं बंगाल में व्यापार

1633 ई. में अंग्रेज़ों ने पूर्वी भारत में अपना पहला व्यापारिक कारखाना उड़ीसा के बालासोर एवं हरिहरपुर में स्थापित किया। यही पूर्वी भारत में अंग्रेजी व्यापार का प्रारम्भिक आधार बना। इसके बाद कम्पनी ने बंगाल, बिहार, पटना तथा ढाका में भी अपने व्यापार का विस्तार प्रारम्भ किया।

1651 ई. में अंग्रेजों ने बंगाल में अपनी प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री हुगली में स्थापित की। यह अनुमति तत्कालीन बंगाल के सूबेदार शाहशुजा (सम्राट शाहजहाँ के द्वितीय पुत्र) द्वारा प्रदान की गई थी। हुगली शीघ्र ही बंगाल में कम्पनी का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया।

➣ परंपरागत विवरणों के अनुसार डॉक्टर गैब्रियल बॉटन द्वारा मुग़ल शाही परिवार की एक महिला का सफल उपचार किए जाने के बाद अंग्रेजों को 3,000 रुपये वार्षिक शुल्क पर बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में व्यापार करने की विशेष सुविधा प्राप्त हुई।

ब्रिजमैन को 1651 ई. में स्थापित हुगली फैक्ट्री का प्रथम प्रधान नियुक्त किया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने कासिम बाज़ार, पटना तथा राजमहल में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर बंगाल एवं बिहार में व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार किया।

1658 ई. तक बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा कोरोमंडल तट की सभी अंग्रेजी फैक्ट्रियों को प्रशासनिक दृष्टि से फोर्ट सेंट जॉर्ज (मद्रास) के अधीन कर दिया गया। इससे कम्पनी के पूर्वी एवं दक्षिणी व्यापारिक केंद्रों का प्रशासन अधिक सुव्यवस्थित हो गया।

➣ आगे चलकर 1672 ई. में बंगाल के सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ तथा 1680 ई. में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब से भी अंग्रेजों ने व्यापारिक रियायतों से संबंधित फ़रमान प्राप्त किए। इन रियायतों ने बंगाल में कम्पनी की व्यापारिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ कर दिया।

वर्ष घटना महत्त्व
1633 ई. बालासोर एवं हरिहरपुर में प्रथम कारखाने पूर्वी भारत में अंग्रेजी व्यापार का प्रारम्भ।
1651 ई. हुगली में प्रथम बंगाल फैक्ट्री शाहशुजा की अनुमति से स्थापना।
1651 ई. ब्रिजमैन की नियुक्ति हुगली फैक्ट्री का प्रथम प्रधान।
1658 ई. फैक्ट्रियाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज के अधीन पूर्वी एवं दक्षिणी प्रशासन का केंद्रीकरण।
1672 ई. शाइस्ता ख़ाँ का फ़रमान व्यापारिक रियायतें प्राप्त हुईं।
1680 ई. औरंगज़ेब का फ़रमान बंगाल में अंग्रेजी व्यापार को और सुविधा मिली।

बम्बई का विकास

1668 ई. में बम्बई अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकार में आने के बाद कम्पनी ने इसे पश्चिमी भारत के प्रमुख व्यापारिक एवं नौसैनिक केंद्र के रूप में विकसित करना प्रारम्भ किया। सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह होने के कारण बम्बई शीघ्र ही सूरत का प्रमुख विकल्प बनकर उभरा।

जॉर्ज ऑक्सिंडेन बम्बई का प्रथम अंग्रेज गवर्नर माना जाता है। उसके कार्यकाल में कम्पनी ने बम्बई के प्रशासन को व्यवस्थित करने तथा इसे एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करने की नींव रखी।

1669 से 1677 ई. तक गैराल्ड औंगियार बम्बई का द्वितीय गवर्नर रहा। उसे बम्बई का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, क्योंकि उसके शासनकाल में बम्बई एक छोटे व्यापारिक केंद्र से विकसित होकर अंग्रेजों के प्रमुख प्रशासनिक एवं वाणिज्यिक नगर के रूप में उभरने लगा।

➣ औंगियार ने बम्बई की किलेबन्दी को सुदृढ़ कराया तथा जहाज़ों के आवागमन एवं मरम्मत की सुविधा के लिए गोदी (Dockyard) का निर्माण करवाया। इससे बम्बई की सामरिक एवं व्यापारिक महत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

➣ उसने नगर प्रशासन को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से न्यायालय तथा पुलिस व्यवस्था की स्थापना की। इन सुधारों के कारण विभिन्न भारतीय एवं विदेशी व्यापारी बम्बई में बसने लगे और नगर का तीव्र आर्थिक विकास हुआ।

➣ गैराल्ड औंगियार ने बम्बई में टकसाल की स्थापना कर ताँबे तथा चाँदी के सिक्कों का निर्माण प्रारम्भ कराया। इससे स्थानीय व्यापार को प्रोत्साहन मिला तथा कम्पनी की प्रशासनिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई।

1677 ई. में गैराल्ड औंगियार के पश्चात् रौल्ट बम्बई का गवर्नर नियुक्त हुआ, जिसने 1682 ई. तक कम्पनी के प्रशासन का संचालन किया।

वर्ष व्यक्ति / घटना महत्त्व
1668 ई. बम्बई ईस्ट इंडिया कम्पनी को प्राप्त पश्चिमी भारत में कम्पनी का प्रमुख केंद्र बना।
1668 ई. जॉर्ज ऑक्सिंडेन बम्बई का प्रथम अंग्रेज गवर्नर।
1669–1677 ई. गैराल्ड औंगियार बम्बई का वास्तविक संस्थापक।
1677–1682 ई. रौल्ट औंगियार का उत्तराधिकारी।

मद्रास का संस्थापकफ्रांसिस डे
भारत में अंग्रेजों का प्रथम किलाफोर्ट सेंट जॉर्ज (1641 ई.)
बम्बई कम्पनी को दिया गया1668 ई. (10 पौण्ड वार्षिक किराये पर)

पूर्वी भारत में अंग्रेजों का पहला व्यापारिक कारखानाबालासोर एवं हरिहरपुर (1633 ई.)
बंगाल की प्रथम अंग्रेजी फैक्ट्रीहुगली (1651 ई.)
हुगली फैक्ट्री का प्रथम प्रधानब्रिजमैन

बम्बई का प्रथम अंग्रेज गवर्नरजॉर्ज ऑक्सिंडेन
बम्बई का वास्तविक संस्थापकगैराल्ड औंगियार
औंगियार का कार्यकाल1669–1677 ई.
औंगियार द्वारा स्थापित संस्थाएँगोदी, न्यायालय, पुलिस व्यवस्था एवं टकसाल

अंग्रेज–मुग़ल संघर्ष (चाइल्ड का युद्ध, 1686–1690 ई.)

➣ 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी केवल व्यापारिक संस्था न रहकर अपनी सैन्य शक्ति भी बढ़ाने लगी थी। कम्पनी का उद्देश्य व्यापारिक विशेषाधिकारों के साथ-साथ अपने कारखानों एवं बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना था। कम्पनी के लन्दन स्थित गवर्नर सर जोशिया चाइल्ड की आक्रामक नीति के कारण उनका मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब से संघर्ष हुआ, जिसे इतिहास में चाइल्ड का युद्ध (1686–1690 ई.) कहा जाता है। इस युद्ध का नाम कम्पनी के तत्कालीन गवर्नर सर जोसाइया चाइल्ड के नाम पर पड़ा।

1686 ई. में अंग्रेजों ने बंगाल के हुगली बंदरगाह पर आक्रमण कर उसे लूट लिया। कम्पनी का उद्देश्य मुग़लों पर दबाव डालकर अधिक व्यापारिक रियायतें प्राप्त करना था, किन्तु यह नीति अंग्रेजों के लिए उलटी पड़ गई।

➣ सम्राट औरंगज़ेब ने अंग्रेजों के विरुद्ध कठोर सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया। मुग़ल सेना ने बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों में कम्पनी की गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा सूरत, मसूलीपट्टनम, विशाखापत्तनम आदि स्थानों पर अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियों एवं अधिकारों को गंभीर क्षति पहुँचाई।

➣ अंततः कम्पनी ने सम्राट औरंगज़ेब से क्षमा-याचना की तथा लगभग 1.5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद औरंगज़ेब ने अंग्रेजों को पुनः व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी।

➣ बंगाल के शक्तिशाली सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ अंग्रेजों के व्यवहार से अत्यंत असंतुष्ट थे। उन्होंने अंग्रेजी कम्पनी को “कुत्सित (नीच), झगड़ालू तथा बेईमान व्यापारियों की कम्पनी” कहा था, जो उस समय मुग़ल प्रशासन की अंग्रेजों के प्रति नकारात्मक धारणा को दर्शाता है।

1687 ई. में कम्पनी ने अपने पश्चिमी भारत के मुख्यालय को सूरत से बम्बई स्थानांतरित कर दिया। उस समय मराठों की बढ़ती शक्ति को देखते हुए अंग्रेजों ने औरंगज़ेब से बम्बई की किलेबंदी की अनुमति भी माँगी, जिससे भविष्य में अपने व्यापारिक एवं सामरिक हितों की रक्षा की जा सके।

वर्ष घटना महत्त्व
1686 ई. हुगली पर अंग्रेजों का आक्रमण चाइल्ड के युद्ध की शुरुआत।
1686–1690 ई. चाइल्ड का युद्ध अंग्रेजों और औरंगज़ेब के बीच संघर्ष।
1687 ई. मुख्यालय सूरत से बम्बई बम्बई कम्पनी का प्रमुख केंद्र बना।
1690 ई. युद्ध का अंत अंग्रेजों ने क्षमा माँगी तथा मुआवज़ा देकर व्यापारिक अधिकार पुनः प्राप्त किए।

कलकत्ता की स्थापना एवं बंगाल प्रेसीडेन्सी

चाइल्ड के युद्ध के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल में अपनी व्यापारिक स्थिति को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से कम्पनी ने यहाँ एक स्थायी व्यापारिक एवं प्रशासनिक केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई।

24 अगस्त, 1690 ई. को कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारी जॉब चार्नॉक ने सुतानुती नामक स्थान पर अंग्रेजों की एक स्थायी व्यापारिक बस्ती की स्थापना की। इसी घटना को परम्परागत रूप से कलकत्ता (कोलकाता) की स्थापना का आधार माना जाता है।

▪ हालांकि, 2003 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जॉब चार्नॉक को कलकत्ता का एकमात्र संस्थापक नहीं माना जा सकता।
▪ न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने निष्कर्ष दिया कि कलकत्ता का विकास किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं हुआ, बल्कि सुतानुटी, गोविंदपुर एवं कालिकाता जैसे पहले से विद्यमान गाँवों के क्रमिक विकास से हुआ।
▪ इस प्रक्रिया में जॉब चार्नॉक, चार्ल्स आयर, जॉन गोल्ड्सबरो, लक्ष्मीकांत मजूमदार, सेठ-बसाक परिवार तथा साबर्ण राय चौधरी परिवार सहित अनेक व्यक्तियों एवं परिवारों का योगदान रहा।

10 फरवरी, 1691 ई. को सम्राट औरंगज़ेब से कम्पनी को एक शाही फ़रमान प्राप्त हुआ, जिसके अनुसार 3,000 रुपये वार्षिक निश्चित कर के बदले बंगाल में अधिकांश सीमा शुल्क से छूट प्रदान कर दी गई। इससे बंगाल में कम्पनी का व्यापार अत्यधिक लाभदायक हो गया।

जनवरी, 1693 ई. में जॉब चार्नॉक का कलकत्ता में निधन हो गया। उसके उत्तराधिकारी एवं दामाद सर चार्ल्स आयर ने उनकी स्मृति में एक मकबरे का निर्माण कराया, जो आज भी सेंट जॉन चर्च, कोलकाता परिसर में स्थित है।

1698 ई. में बंगाल के सूबेदार अजीमुश्शान (कुछ स्रोतों में इब्राहिम ख़ाँ) की अनुमति से कम्पनी ने स्थानीय सावर्ण राय चौधरी परिवार से सुतानुती, कालिकाता तथा गोविन्दपुर – इन तीन गाँवों की जमींदारी खरीद ली।

1698 ई. में तीनों गाँवों की जमींदारी प्राप्त करने के बाद कम्पनी ने आधुनिक कलकत्ता (कोलकाता) के विकास की नींव रखी। साथ ही नगर की सुरक्षा के लिए 1696 ई. से प्रारम्भ फोर्ट विलियम के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया गया। इस किले का नाम तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट विलियम तृतीय के सम्मान में रखा गया।

1690 ई. में जॉब चार्नॉक ने कलकत्ता की स्थापना की। परीक्षा दृष्टि से यही कथन सही माना जाता है जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से यह पूरी तरह सही नहीं है।

1700 ई. में सर चार्ल्स आयर को फोर्ट विलियम का प्रथम प्रेसीडेंट नियुक्त किया गया। इसी वर्ष बंगाल (कलकत्ता) को मद्रास प्रेसीडेन्सी से पृथक कर एक स्वतंत्र प्रेसीडेन्सी का दर्जा प्रदान किया गया। इससे कलकत्ता अंग्रेजी प्रशासन का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

वर्ष घटना महत्त्व
1690 ई. जॉब चार्नॉक का बंगाल आगमन बंगाल में अंग्रेजी व्यापार का पुनर्गठन।
1691 ई. 3,000 रुपये वाला फ़रमान बंगाल में सीमा शुल्क से महत्वपूर्ण छूट।
1698 ई. तीन गाँवों की जमींदारी सुतानूती, कालिकाता एवं गोविंदपुर कम्पनी को प्राप्त हुए।
1699 ई. कलकत्ता की स्थापना एवं फोर्ट विलियम बंगाल में अंग्रेजों का स्थायी प्रशासनिक केंद्र।
1700 ई. सर चार्ल्स आयर प्रथम प्रेसीडेंट बंगाल स्वतंत्र प्रेसीडेन्सी बना।

24 अगस्त, 1690 ई. – जॉब चार्नॉक द्वारा सुतानुती में अंग्रेजी बस्ती की स्थापना (परम्परागत रूप से कलकत्ता की स्थापना)।
1698 ई. – सुतानुती, कालिकाता एवं गोविन्दपुर की जमींदारी कम्पनी ने खरीदी।
1700 ई. – बंगाल को स्वतंत्र प्रेसीडेन्सी का दर्जा मिला तथा सर चार्ल्स आयर प्रथम प्रेसीडेंट बने। ▪ ब्रिटिश भारत की राजधानीकलकत्ता (1774–1911 ई.); 1911 ई. में राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की गई।

फ़र्रुख़सियर का फरमान (1717 ई.)

➣ 1715 ई. में जॉन सरमन के नेतृत्व में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक व्यापारिक मिशन मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर के दरबार में भेजा गया। इसे इतिहास में जॉन सरमन मिशन के नाम से जाना जाता है।

➣ इसका उद्देश्य कम्पनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों का विस्तार करना तथा मुग़ल साम्राज्य से स्थायी व्यापारिक रियायतें प्राप्त करना था।

➣ इस मिशन में एडवर्ड स्टीफ़ेंसन, डॉ. विलियम हैमिल्टन (सर्जन) तथा ख़्वाजा सेहुर्द (अर्मेनियाई द्विभाषिया) भी सम्मिलित थे। इन सभी ने मुग़ल दरबार में कम्पनी के हितों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ मिशन के दौरान कम्पनी के चिकित्सक डॉ. विलियम हैमिल्टन ने सम्राट फ़र्रुख़सियर के गंभीर रोग (फोड़े) का सफल उपचार किया। उनकी चिकित्सा से प्रसन्न होकर सम्राट ने 1717 ई. में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण शाही फ़रमान जारी किया।

क्षेत्र फ़रमान द्वारा प्राप्त प्रमुख सुविधा
बंगाल 3000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले लगभग शुल्क-मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त हुआ।
कलकत्ता कम्पनी को कलकत्ता के आसपास के गाँवों को किराये/पट्टे पर लेने का अधिकार प्रदान किया गया।
बम्बई बम्बई की टकसाल में ढाले गए सिक्कों को मुग़ल साम्राज्य में वैध मान्यता प्राप्त हुई।
सूरत 10,000 रुपये वार्षिक भुगतान पर शुल्क-मुक्त व्यापार का अधिकार मिला।

➣ इतिहासकार ओर्मे ने फ़र्रुख़सियर द्वारा जारी इस फ़रमान को ईस्ट इंडिया कम्पनी का मैग्ना कार्टा कहा है, क्योंकि इससे कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों एवं विशेषाधिकारों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

➣ बंगाल के शक्तिशाली सूबेदार मुर्शिद कुली ख़ाँ ने इस फ़रमान का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया तथा कम्पनी की व्यापारिक छूटों को सीमित करने का प्रयास किया। आगे चलकर यही विवाद बंगाल के नवाबों और अंग्रेजों के मध्य संघर्ष का एक प्रमुख कारण बना।

1715 ई. – जॉन सरमन मिशन मुग़ल दरबार पहुँचा।
1717 ई. – फ़र्रुख़सियर का प्रसिद्ध फ़रमान जारी हुआ।
डॉ. विलियम हैमिल्टन के उपचार से प्रसन्न होकर फ़रमान जारी किया गया।
▪ इतिहासकार ओर्मे ने इसे ईस्ट इंडिया कम्पनी का मैग्ना कार्टा कहा है।

निष्कर्ष

➣ अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अपना आगमन एक व्यापारिक संस्था के रूप में किया था, किन्तु समय के साथ उसने व्यापारिक हितों की रक्षा के नाम पर अपनी सैन्य, राजनीतिक एवं प्रशासनिक शक्ति का निरंतर विस्तार किया।

➣ मुग़ल सम्राटों से प्राप्त फरमानों, स्थानीय शासकों से हुए समझौतों, सुदृढ़ नौसैनिक शक्ति तथा संगठित व्यापारिक व्यवस्था के बल पर कम्पनी ने भारत में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की।

➣ 18वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन, प्रांतीय शक्तियों के उदय तथा भारतीय राज्यों के पारस्परिक संघर्षों का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने धीरे-धीरे व्यापारिक कम्पनी से एक औपनिवेशिक शक्ति का रूप धारण कर लिया।

प्लासी का युद्ध (1757 ई.) तथा बक्सर का युद्ध (1764 ई.) अंग्रेजी सत्ता की स्थापना के निर्णायक पड़ाव सिद्ध हुए। इन विजयों के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी केवल व्यापारी संस्था न रहकर भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन गई, जिसने लगभग दो शताब्दियों तक भारतीय इतिहास एवं प्रशासन को गहराई से प्रभावित किया।

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