पृष्ठभूमि
UPSC MCQ → One Liner → Q&A →➣ पुर्तग़ालियों के भारत आने के दो प्रमुख उद्देश्य थे अरबों और वेनिस के व्यापारियों का भारत के मसाला-व्यापार से प्रभाव समाप्त करना, तथा भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना। इन्हीं दो लक्ष्यों – व्यापारिक लाभ और धार्मिक प्रसार – ने आगे चलकर पुर्तगाली नीतियों की दिशा तय की।
➣ वास्कोडिगामा समुद्री मार्ग से भारत पहुँचने वाला प्रथम यूरोपीय यात्री था। लगभग 90 दिनों की समुद्री यात्रा के बाद वह 20 मई, 1498 ई. को गुजरात के एक अरब/गुजराती नाविक अब्दुल मजीद (या अब्दुल मनीक) के मार्गदर्शन में कालीकट (वर्तमान कोझिकोड, केरल) पहुँचा।
➣ उस समय कालीकट पर हिन्दू शासक जमोरिन (समुद्रि राजा) का शासन था। यद्यपि वहाँ पहले से बसे अरब व्यापारियों ने पुर्तग़ालियों का विरोध किया, फिर भी जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया तथा उसे मसालों एवं अन्य व्यापारिक वस्तुओं के व्यापार की अनुमति प्रदान की।
➣ भारत से काली मिर्च, दालचीनी, लौंग तथा अन्य मसाले लेकर जब वास्कोडिगामा पुर्तग़ाल लौटा, तो इनकी बिक्री से उसे अत्यधिक लाभ हुआ। कहा जाता है कि मसालों की बिक्री से प्राप्त लाभ उसकी पूरी यात्रा की लागत से लगभग 60 गुना अधिक था। इस सफलता के बाद पुर्तग़ालियों का भारत की ओर आकर्षण तेजी से बढ़ा।
➣ 9 मार्च, 1500 ई. को पेड्रो अल्वारेज़ केब्राल 13 जहाज़ों के विशाल बेड़े के साथ भारत के लिए रवाना हुआ। वह भारत आने वाला दूसरा पुर्तग़ाली यात्री था। उसके अभियान के दौरान पुर्तग़ालियों ने कालीकट में अपनी पहली व्यापारिक कोठी स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु अरब व्यापारियों के विरोध के कारण यह अधिक समय तक नहीं चल सकी।
➣ 1502 ई. में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। इस यात्रा का उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं था, बल्कि हिंद महासागर के मसाला व्यापार पर पुर्तग़ाल का प्रभुत्व स्थापित करना भी था। इसके बाद कोचीन सहित अन्य तटीय क्षेत्रों में पुर्तग़ालियों ने अपने व्यापारिक केंद्रों का विस्तार किया और भारत में उनकी स्थायी बस्तियाँ विकसित होने लगीं।
दुर्ग की स्थापना
➣ पुर्तग़ालियों ने भारत के पश्चिमी एवं पूर्वी तट पर कालीकट, कोचीन, कन्नूर, गोवा, दमन, दीव तथा हुगली जैसे प्रमुख बंदरगाहों में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं।
➣ 1503 ई. में पुर्तग़ालियों ने कोचीन में भारत का पहला स्थायी दुर्ग फोर्ट इमैनुएल (Fort Emmanuel) बनवाया। इसका उद्देश्य मसालों के व्यापार की सुरक्षा तथा अरब व्यापारियों के प्रभाव को चुनौती देना था।
➣ 1505 ई. में पुर्तग़ाल सरकार ने भारत में अपने व्यापार एवं प्रशासन को संगठित करने के लिए गवर्नर प्रणाली लागू की। इसी के अंतर्गत फ़्राँसिस्को डी अल्मेड़ा को भारत का प्रथम पुर्तग़ाली गवर्नर नियुक्त किया गया।
फ़्राँसिस्को डी अल्मेड़ा (1505–1509 ई.)
➣ 1505 ई. में फ़्राँसिस्को डी अल्मेड़ा भारत में प्रथम पुर्तग़ाली वायसराय (Viceroy) बनकर आया। पुर्तग़ाल के राजा मैनुअल प्रथम ने उसे भारत में पुर्तग़ाली व्यापार की सुरक्षा, हिन्द महासागर में समुद्री प्रभुत्व स्थापित करने तथा अरब व्यापारियों के प्रभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से नियुक्त किया था।
➣ 1508 ई. में चौल के युद्ध में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, मिस्र की मामलुक सल्तनत तथा अरब शक्तियों की संयुक्त नौसेना से संघर्ष हुआ।
➣ इस युद्ध में अल्मेड़ा के पुत्र लोरेंको डी अल्मेड़ा की मृत्यु हो गई। इस घटना ने अल्मेड़ा को संयुक्त मुस्लिम नौसेना के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया।
➣ इसके बाद 1509 ई. में दीव के युद्ध में अल्मेड़ा ने गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, मिस्र (मामलुक सल्तनत) तथा कालीकट के जमोरिन की संयुक्त नौसेना को पराजित कर दिया। यह युद्ध भारतीय महासागर के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक लड़ाइयों में से एक माना जाता है।
➣ दीव के युद्ध (1509) में विजय के बाद हिन्द महासागर में पुर्तग़ालियों की नौसैनिक श्रेष्ठता स्थापित हो गई। परिणामस्वरूप मसालों के समुद्री व्यापार पर उनका प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और हिन्द महासागर को लंबे समय तक पुर्तग़ाली सागर कहा जाने लगा।
➣ अल्मेड़ा का कार्यकाल 1509 ई. में समाप्त हुआ। इसके बाद उसने अपना पद अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क को सौंप दिया। स्वदेश लौटते समय 1510 ई. में अफ्रीका के उत्तमाशा अंतरीप (केप ऑफ गुड होप) के निकट स्थानीय खोइखोई जनजाति के साथ संघर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।
ब्लू वाटर पॉलिसी (Blue Water Policy)
➣ अल्मेड़ा का मानना था कि भारत में विशाल भू-भाग पर अधिकार करने की अपेक्षा समुद्री मार्गों एवं बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करना अधिक लाभदायक होगा। इसी कारण उसने एक शक्तिशाली नौसेना के निर्माण पर विशेष बल दिया। उसकी इसी नीति को ब्लू वाटर पॉलिसी अथवा ‘नील जल नीति’ कहा जाता है।
➣ इस नीति का मुख्य उद्देश्य हिन्द महासागर, अरब सागर तथा प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों पर पुर्तग़ाल का प्रभुत्व स्थापित करना था। इसके अंतर्गत पुर्तग़ालियों ने समुद्री शक्ति को सुदृढ़ किया, प्रमुख बंदरगाहों की सुरक्षा की तथा विदेशी जहाज़ों के आवागमन को नियंत्रित करने का प्रयास किया।
➣ इसी नीति के अंतर्गत अल्मेड़ा ने कार्टाज़ प्रणाली को प्रभावी बनाया। इसके अनुसार समुद्री व्यापार करने वाले जहाज़ों के लिए पुर्तग़ालियों से समुद्री अनुमति-पत्र (पास) प्राप्त करना आवश्यक था।
▪ उद्देश्य – व्यापारिक एकाधिकार + ईसाई धर्म प्रचार
▪ ब्लू वाटर पॉलिसी (नील जल नीति) – फ़्राँसिस्को डी अल्मेड़ा
▪ कार्टाज़ प्रणाली – समुद्री व्यापार हेतु पुर्तग़ाली अनुमति-पत्र व्यवस्था
▪ चौल का युद्ध – 1508 ई. (पुर्तगाली पराजय, पुत्र लोरेंको की मृत्यु)
▪ दीव का युद्ध – 1509 ई. (निर्णायक विजय,(हिन्द महासागर पुर्तगाली सागर में परिवर्तित)
▪ अल्मेड़ा के पुत्र – लोरेंको डी अल्मेड़ा
▪ उत्तराधिकारी – अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क
अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क (1509–1515 ई.)
➣ अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क 1503 ई. में एक स्क्वैड्रन कमांडर के रूप में भारत आया था। 1509 ई. में फ़्राँसिस्को डी अल्मेड़ा के बाद वह भारत का द्वितीय पुर्तग़ाली गवर्नर बना। उसे भारत में पुर्तग़ाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
➣ अल्बुकर्क का उद्देश्य केवल समुद्री व्यापार पर नियंत्रण रखना नहीं था, बल्कि स्थायी उपनिवेशों की स्थापना, दुर्गों का निर्माण तथा प्रमुख बंदरगाहों पर अधिकार कर पुर्तग़ालियों का राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करना था।
➣ इसी कारण उसने अल्मेड़ा की ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ को पीछे छोड़ते हुए क्षेत्रीय विस्तार की नीति अपनाई। उसके शासनकाल में पुर्तग़ालियों ने केवल समुद्री शक्ति ही नहीं, बल्कि भूमि पर भी अपना स्थायी शासन स्थापित करना प्रारम्भ किया।
➣ अल्बुकर्क को भारत में पुर्तग़ाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है, क्योंकि उसी ने पुर्तग़ालियों को एक अस्थायी व्यापारिक शक्ति से एक स्थायी औपनिवेशिक शक्ति में परिवर्तित किया। प्रारम्भ में उसका प्रशासनिक केन्द्र कोचीन था।
➣ 1510 ई. में अल्बुकर्क ने बीजापुर सल्तनत के शासक यूसुफ़ आदिलशाह से गोवा पर अधिकार कर लिया। सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह, उपजाऊ भूमि तथा अरब सागर में सामरिक स्थिति के कारण गोवा शीघ्र ही पुर्तग़ालियों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
➣ यद्यपि गोवा पर अधिकार 1510 ई. में ही हो गया था, किन्तु 1530 ई. में नीनो डी कुन्हा ने पुर्तग़ालियों की राजधानी कोचीन से गोवा स्थानांतरित कर दी। इसके बाद गोवा भारत में पुर्तग़ाली प्रशासन, सेना तथा व्यापार का प्रमुख मुख्यालय बन गया।
➣ अल्बुकर्क ने हिन्द महासागर के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए 1511 ई. में मलक्का तथा 1515 ई. में हरमुज (Hormuz) पर अधिकार कर लिया। गोवा, मलक्का और हरमुज पर नियंत्रण के कारण पुर्तग़ालियों ने भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पश्चिम एशिया के समुद्री व्यापार पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
➣ विजयनगर साम्राज्य के महान शासक कृष्णदेव राय ने पुर्तग़ालियों को भटकल में दुर्ग बनाने की अनुमति प्रदान की। इसके बदले पुर्तग़ालियों ने विजयनगर साम्राज्य को अरबी नस्ल के श्रेष्ठ घोड़ों की नियमित आपूर्ति की।
➣ अल्बुकर्क ने पुर्तग़ाली सैनिकों एवं अधिकारियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे भारत में एक स्थायी लुसो-भारतीय (Luso-Indian) समुदाय का विकास हो सके और पुर्तग़ाली शासन को सामाजिक आधार प्राप्त हो।
➣ उसने गोवा में प्रशासनिक सुधार किए, स्थानीय राजस्व व्यवस्था को संगठित किया तथा ईसाई मिशनरियों को संरक्षण दिया। साथ ही गोवा में सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास भी किया, जिसे उसके महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों में गिना जाता है।
➣ 1515 ई. में हरमुज अभियान से लौटते समय अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई। उसकी इच्छा के अनुसार उसे पहले गोवा में दफ़नाया गया, किन्तु 1566 ई. में उसके अवशेष पुर्तग़ाल की राजधानी लिस्बन ले जाए गए, जहाँ उन्हें पुनः दफ़नाया गया।
▪ नीति – ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ समाप्त, क्षेत्रीय विस्तार अपनाया
▪ 1503 ई. – स्क्वैड्रन कमांडर के रूप में भारत आगमन
▪ 1509-15 ई. – पुर्तगाली वायसराय (दूसरा)
▪ गोवा पर अधिकार – 1510 ई.(यूसुफ़ आदिलशाह, बीजापुर से)
▪ मलक्का पर अधिकार – 1511 ई.
▪ हरमुज पर अधिकार – 1515 ई.
▪ गोवा को राजधानी बनाया – 1530 ई. (नीनो डी कुन्हा)
▪ भटकल में दुर्ग बनाने की अनुमति – कृष्णदेव राय द्वारा
▪ भारतीय महिलाओं से विवाह को प्रोत्साहन – अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क
नीनो डी कुन्हा (1529–1538 ई.)
➣ अल्बुकर्क के बाद 1529 ई. में नीनो डी कुन्हा भारत का पुर्तग़ाली गवर्नर बनकर आया। उसके शासनकाल में भारत में पुर्तग़ाली सत्ता का उल्लेखनीय विस्तार हुआ तथा पश्चिमी एवं पूर्वी दोनों समुद्री तटों पर पुर्तग़ालियों का प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हो गया।
➣ कुन्हा का उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं था, बल्कि भारत के प्रमुख बंदरगाहों एवं समुद्री व्यापार मार्गों पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना भी था। इसी नीति के अंतर्गत उसने पुर्तग़ाली प्रशासन एवं नौसैनिक शक्ति को और अधिक संगठित किया।
➣ 1530 ई. में नीनो डी कुन्हा ने पुर्तग़ालियों की राजधानी कोचीन से गोवा स्थानांतरित कर दी। इसके बाद गोवा भारत में पुर्तग़ाली शासन का प्रशासनिक, सैन्य, धार्मिक एवं व्यापारिक केंद्र बन गया। गोवा 1961 ई. तक पुर्तग़ालियों की राजधानी बना रहा।
➣ 1534 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के साथ हुई बसीन (वसई) की संधि के परिणामस्वरूप पुर्तग़ालियों को बसीन (वर्तमान वसई) प्राप्त हुआ। इसके साथ ही उन्हें बंबई (मुंबई) के सात द्वीपों पर भी अधिकार मिला। बाद में 1661 ई. में पुर्तग़ाल ने बंबई को इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को दहेज में दे दिया।
➣ 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मुग़ल सम्राट हुमायूँ के आक्रमण के दबाव में पुर्तग़ालियों से सैन्य सहायता प्राप्त करने के लिए दीव में दुर्ग बनाने की अनुमति प्रदान की। इसके परिणामस्वरूप पुर्तग़ालियों ने दीव में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया, जो आगे चलकर उनका एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा बन गया।
➣ नीनो डी कुन्हा के शासनकाल में पुर्तग़ालियों ने सैन्थोमी (मायलापुर, वर्तमान चेन्नई) तथा हुगली (बंगाल) में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ स्थापित कीं। इससे उनका व्यापार पश्चिमी तट तक सीमित न रहकर पूर्वी तट एवं बंगाल की खाड़ी तक फैल गया।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया के मलक्का, सुमात्रा, जावा तथा मसाला द्वीपों के साथ व्यापार के लिए पुर्तग़ाली नागपट्टनम सहित कोरोमंडल तट के बंदरगाहों का उपयोग करते थे। इससे भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया एवं यूरोप के बीच समुद्री व्यापार और अधिक संगठित हो गया।
▪ पुर्तग़ाली राजधानी कोचीन से गोवा स्थानांतरित – 1530 ई.
▪ गोवा – पुर्तग़ालियों का प्रशासनिक एवं व्यापारिक मुख्यालय
▪ बसीन (वसई) की संधि – 1534 ई.
▪ दीव में दुर्ग निर्माण की अनुमति – 1535 ई. (बहादुरशाह, गुजरात)
▪ सैन्थोमी (चेन्नई) एवं हुगली – प्रमुख पुर्तग़ाली व्यापारिक बस्तियाँ
अन्य पुर्तग़ाली गवर्नर (1515–1529 ई.)
➣ अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क की मृत्यु (1515 ई.) के बाद 1515–1529 ई. के बीच भारत में कई पुर्तग़ाली गवर्नर नियुक्त हुए। इनमें प्रमुख थे – लोपो सोरेस डी अल्बर्गारिया (1515–1518), दिओगो लोपेस द सेक्वेरा (1518–1522), डुआर्टे डी मेनेज़ेस (1522–1524), वास्कोडिगामा (1524), हेनरिक डी मेनेज़ेस (1524–1526) तथा लोपो वाज़ डी सम्पायो (1526–1529)।
➣ इस अवधि में पुर्तग़ालियों ने नए क्षेत्रों पर अधिकार करने की अपेक्षा अपने पहले से स्थापित व्यापारिक केंद्रों, दुर्गों तथा समुद्री व्यापार मार्गों को सुदृढ़ करने पर अधिक ध्यान दिया। साथ ही भारत, श्रीलंका एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ उनके व्यापारिक संबंधों का भी विस्तार हुआ।
➣ वास्कोडिगामा 1524 ई. में तीसरी बार भारत आया और उसे भारत का पुर्तग़ाली वायसराय नियुक्त किया गया, किन्तु उसी वर्ष कोचीन में उसकी मृत्यु हो गई।
➣ 1529 ई. में नीनो डी कुन्हा के गवर्नर बनने के साथ भारत में पुर्तग़ाली शक्ति के विस्तार का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ।
अन्य प्रमुख घटनाएँ
➣ 16वीं शताब्दी के मध्य तक पुर्तग़ालियों ने गोवा, दमन, दीव, साल्सेट, बसीन (वसई), चैल, बंबई (मुंबई), सैंथोमी (मायलापुर) तथा हुगली जैसे प्रमुख तटीय क्षेत्रों में अपने व्यापारिक केंद्र एवं बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं।
➣ अकबर के शासनकाल में पुर्तग़ालियों को हुगली में व्यापारिक कोठी स्थापित करने की अनुमति मिली। बाद में शाहजहाँ के समय उन्होंने बंदेल में भी अपना केंद्र स्थापित किया।
➣ 1632 ई. में शाहजहाँ के आदेश पर बंगाल के सूबेदार क़ासिम ख़ाँ ने हुगली पर आक्रमण कर पुर्तग़ालियों को पराजित किया और वहाँ से उनका प्रभाव समाप्त कर दिया।
➣ 1666 ई. में औरंगज़ेब के शासनकाल में मुग़ल सेना ने चटगाँव से पुर्तग़ाली समुद्री लुटेरों का प्रभाव समाप्त कर दिया। पुर्तग़ाली चटगाँव बंदरगाह को पोर्टो ग्रांडे (Porto Grande)’ अर्थात् ‘महान बंदरगाह’ कहते थे।
➣ 1661 ई. में पुर्तग़ाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ़ ब्रागांज़ा के विवाह के अवसर पर बंबई (मुंबई) द्वीप इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को दहेज के रूप में सौंप दिया गया। बाद में 1668 ई. में चार्ल्स द्वितीय ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को वार्षिक किराए पर दे दिया।
➣ 1739 ई. में मराठा सेनापति चिमाजी अप्पा ने पुर्तग़ालियों को पराजित कर बसीन (वसई) तथा साल्सेट पर अधिकार कर लिया। इससे भारत के पश्चिमी तट पर पुर्तग़ालियों की शक्ति को गहरा आघात पहुँचा।
भारतीय सामुद्रिक साम्राज्य
➣ पुर्तगालियों ने अपनी भारतीय सामुद्रिक साम्राज्य (कंपनी) को एस्तादो व इण्डिया नाम दिया गया।
➣ पुर्तगाली कम्पनी का वाणिज्यिक उद्देश्य काली मिर्च व अन्य महंगे मसालों के व्यापार पर एकाधिकार करना था।
➣ पुर्तग़ालियों द्वारा अपने प्रभुत्व के अधीन सामुद्रिक मार्गों पर सुरक्षा कर वसूल करने को काटर्ज व्यवस्था कहा जाता था।
➣ काटर्ज-आर्मेडा-काफिला व्यवस्था के अंतगर्त कोई भी भारतीय, अरबी जहाज़ पुर्तगालियों से काटर्ज (परमिट) लिए बिना अरब सागर में नहीं जा सकता था।
➣ यहाँ तक की पुर्तग़ाल अधिग्रहीत क्षेत्रों में व्यापार के लिए मुग़ल बादशाह अकबर को भी एक निःशुल्क काटर्ज प्राप्त करना पड़ता था।
अकबर का पुर्तगालियों से प्रथम परिचय गुजरात के कैम्बे (खम्बात की खाड़ी) में हुआ था।
➣ उन्होंने काटर्ज-आर्मेडा-काफिला व्यवस्था द्वारा एशियाई व्यापार पर गहरा प्रभाव डाला। पुर्तग़ाली अपने को सागर स्वामी कहते थे।
➣ कार्टज प्राप्त अरबी व भारतीय जहाजों को कालीमिर्च और गोलाबारूत प्रकार की सामग्री को ले जाने की अनुमति नहीं थी।
➣ इसके साथ ही पुर्तगालियों द्वारा छोटे स्थानीय व्यापारियों के जहाजों को समुद्री यात्रा के दौरान संरक्षण प्रदान किया जाता था। जिसके लिए जहाजों को चुंगी भी देनी पड़ती थीं। इस व्यवस्था को काफिला प्रणाली कहा जाता था।
➣ 1595 ई. तक पुर्तग़ालियों का हिन्द महासागर पर एकधिकार बना रहा।
ईसाई धर्म का प्रचार
➣ भारत में ईसाई धर्म का प्रवेश पुर्तग़ालियों के आगमन से बहुत पहले हो चुका था। परंपरा के अनुसार लगभग 52 ई. में सेंट थॉमस (ईसा मसीह के बारह प्रेरितों में से एक) भारत आए और केरल के मालाबार तट (मुज़िरिस) पर पहुँचे।
➣उस समय इस क्षेत्र पर चेर वंश का शासन था। सेंट थॉमस द्वारा स्थापित परंपरा के कारण केरल के प्राचीन ईसाइयों को सेंट थॉमस ईसाई या सीरियाई ईसाई कहा जाता है।
➣ भारत में पुर्तग़ालियों के आगमन के बाद ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। पुर्तग़ाली शासकों का उद्देश्य केवल व्यापारिक लाभ प्राप्त करना नहीं था, बल्कि भारत एवं एशिया के अन्य भागों में कैथोलिक ईसाई धर्म का विस्तार करना भी था।
➣ 1542 ई. में प्रसिद्ध जेसुइट मिशनरी एवं संत फ्रांसिस जेवियर पुर्तग़ाली गवर्नर मार्टिम अफ़ांसो डी सूजा के साथ भारत आए। उन्होंने गोवा को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में व्यापक धर्म-प्रचार किया। उन्हें भारत का प्रेरित कहा जाता है।
➣ फ्रांसिस जेवियर ने विशेष रूप से परावा तथा मुकुवा जैसे मछुआरा समुदायों में ईसाई धर्म का प्रचार किया। उनके प्रयासों से दक्षिण भारत के समुद्री तटों पर बड़ी संख्या में लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया।
➣ 1560 ई. में गोवा में गोवा इनक्विजिशन अथवा ईसाई धार्मिक न्यायालय की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य नव-धर्मांतरित ईसाइयों में कैथोलिक धर्म के नियमों का पालन सुनिश्चित करना तथा अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रभाव को समाप्त करना था।
इस न्यायालय के अंतर्गत कठोर दंड, संपत्ति की जब्ती, कारावास तथा यातनाएँ दी जाती थीं। इसी कारण इसे भारतीय इतिहास के सबसे कठोर धार्मिक न्यायाधिकरणों में गिना जाता है।➣ 1580 ई. में सम्राट अकबर के आमंत्रण पर प्रथम जेसुइट मिशन गोवा से फतेहपुर सीकरी पहुँचा। इस मिशन का नेतृत्व फादर रुडोल्फ एक्वाविवा, एंटोनियो मॉनसेरात तथा फ्रांसिस हेनरिक्स ने किया। अकबर ने उन्हें इबादतखाना में विभिन्न धर्मों पर होने वाली चर्चाओं में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था।
➣ पुर्तग़ालियों ने अपने अधिकार वाले क्षेत्रों में अनेक गिरजाघरों , विद्यालयों, मिशनरी संस्थाओं तथा धार्मिक केंद्रों की स्थापना की। गोवा, कोचीन तथा सैंथोमी जैसे नगर ईसाई धर्म-प्रचार के प्रमुख केंद्र बन गए।
➣ यद्यपि पुर्तग़ालियों ने शिक्षा एवं मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा दिया, फिर भी उनकी धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण, गोवा इनक्विजिशन, मंदिरों के ध्वंस तथा समुद्री लूट एवं डकैती जैसी नीतियों के कारण वे भारतीय समाज में व्यापक रूप से अलोकप्रिय हो गए।
➣ यही कारण था कि आगे चलकर भारतीय शासकों तथा अन्य यूरोपीय शक्तियों के सामने उनका प्रभुत्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।
▪ भारत में जेसुइट मिशन का प्रमुख प्रचारक – संत फ्रांसिस जेवियर (1542 ई.)
▪ Apostle of the Indies – फ्रांसिस जेवियर
▪ गोवा इनक्विजिशन – 1560 ई.
▪ प्रथम जेसुइट मिशन अकबर के दरबार में – 1580 ई., फतेहपुर सीकरी
योगदान
➣ भारत में गोथिक स्थापत्य कला का आगमन पुर्तगालियों के साथ ही प्रारम्भ हुआ।
➣ गोवा के प्रसिद्ध चर्च – जैसे बॉम जीसस बासीलिका और से कैथेड्रल – इसी शैली में निर्मित हैं तथा आज भी भारत में यूरोपीय स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं।
➣ पुर्तगालियों के आगमन से भारत में तम्बाकू की खेती (जो मूलतः अमेरिका से लाई गई थी), आधुनिक जहाज़ निर्माण तकनीक तथा प्रिंटिंग प्रेस (मुद्रण तकनीक) की शुरुआत हुई।
➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने मिर्च, आलू, अनानास, काजू जैसी नई फसलों को भी भारत में प्रचलित किया।
➣ पुर्तगाली मालाबार और कोंकण तट से सर्वाधिक काली मिर्च का निर्यात करते थे, जो उनके व्यापार का सबसे लाभदायक हिस्सा था।
➣ इसके अलावा अदरक, दालचीनी, चंदन, हल्दी, नील आदि वस्तुओं का भी बड़े पैमाने पर निर्यात होता था।
➣ भारत में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 ई. में गोवा में हुई, जिसका श्रेय पूर्णतः पुर्तगालियों को जाता है। इस प्रेस की स्थापना मुख्यतः जेसुइट मिशनरियों द्वारा धार्मिक साहित्य के प्रकाशन हेतु की गई थी।
➣ भारतीय जड़ी-बूटियों व वनस्पतियों पर प्रथम पुस्तक 1563 ई. में गोवा से प्रकाशित हुई – यह पुस्तक पुर्तगाली चिकित्सक गार्सिया द ओर्ता द्वारा लिखी गई ‘Colóquios dos Simples e Drogas da Índia’ थी, जिसमें भारतीय औषधीय पौधों का विस्तृत वैज्ञानिक विवरण दिया गया था।
| क्षेत्र | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| स्थापत्य कला | भारत में यूरोपीय (गोथिक) स्थापत्य शैली का विकास हुआ। गोवा के बॉम जीसस बासीलिका एवं से कैथेड्रल इसके प्रमुख उदाहरण हैं। |
| कृषि | मिर्च (चिली), तम्बाकू, आलू, काजू, अनानास आदि नई फसलों का भारत में प्रसार किया। |
| मुद्रण | 1556 ई. में गोवा में भारत का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। |
| चिकित्सा एवं वनस्पति विज्ञान | 1563 ई. में गार्सिया द ओर्ता ने भारतीय औषधीय पौधों पर प्रथम वैज्ञानिक ग्रंथ ‘Colóquios dos Simples e Drogas da Índia’ प्रकाशित किया। |
| समुद्री तकनीक | भारत में यूरोपीय नौसंचालन एवं जहाज़ निर्माण तकनीकों का प्रसार किया। |
| व्यापार | काली मिर्च पुर्तग़ालियों का सबसे लाभदायक निर्यात था। इसके अतिरिक्त अदरक, दालचीनी, चंदन, हल्दी एवं नील का भी बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता था। |
➣ भारत में यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रारम्भ पुर्तग़ालियों के साथ ही हुआ। उन्होंने विशेष रूप से गोवा में अनेक भव्य गिरजाघरों एवं धार्मिक भवनों का निर्माण कराया, जिनमें गोथिक, मैनुएलीन, पुनर्जागरण तथा बारोक स्थापत्य शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है।
➣ यूरोपीय स्थापत्य की प्रमुख विशेषताओं में नुकीले मेहराब, ऊँचे शिखर, विशाल प्रार्थना कक्ष, मोटी पत्थर की दीवारें, रंगीन काँच की खिड़कियाँ तथा भव्य सजावटी अग्रभाग शामिल हैं।
➣ गोवा के प्रसिद्ध चर्च बॉम जीसस बेसिलिका, से कैथेड्रल , सेंट कैजेतान चर्च तथा अन्य गिरजाघर भारत में प्रारम्भिक यूरोपीय स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।
पुर्तग़ालियों के पतन के कारण
(i) धार्मिक असहिष्णुता➣ पुर्तग़ालियों ने भारतीय जनता के प्रति धार्मिक कट्टरता का व्यवहार अपनाया। उन्होंने मंदिरों को नष्ट किया तथा गोवा इनक्विजिशन जैसे कठोर धार्मिक न्यायाधिकरणों के माध्यम से जबरन धर्मांतरण को बढ़ावा दिया। इससे स्थानीय जनता में उनके प्रति व्यापक असंतोष उत्पन्न हो गया।
(ii) एकाधिकारवादी व्यापार नीति एवं समुद्री लूटमार➣ पुर्तग़ालियों ने कार्टाज़ प्रणाली के माध्यम से समुद्री व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। बिना अनुमति-पत्र वाले जहाज़ों को लूटना, जब्त करना तथा अन्य व्यापारियों पर प्रतिबंध लगाना उनकी व्यापारिक नीति का हिस्सा बन गया, जिससे भारतीय एवं अरब व्यापारियों का विरोध बढ़ता गया।
(iii) ब्राज़ील की खोज➣ 1500 ई. में पेद्रो अल्वारेज़ काब्राल द्वारा ब्राज़ील की खोज के बाद पुर्तग़ाल का ध्यान एवं संसाधन अटलांटिक क्षेत्र की ओर अधिक केंद्रित हो गए। परिणामस्वरूप भारत में उनके व्यापार एवं प्रशासन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा सका।
(iv) अन्य यूरोपीय शक्तियों से प्रतिस्पर्धा➣ अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी (1600) तथा डच ईस्ट इंडिया कंपनी (1602) के आगमन से पुर्तग़ालियों को कड़ी व्यापारिक एवं नौसैनिक चुनौती मिली। इन कंपनियों की आर्थिक शक्ति, संगठन एवं समुद्री क्षमता पुर्तग़ालियों की तुलना में अधिक प्रभावी थी।
(v) प्रशासनिक एवं नौसैनिक कमजोरी➣ समय के साथ पुर्तग़ाली प्रशासन में भ्रष्टाचार बढ़ गया तथा उनका नौसैनिक एवं प्रशासनिक ढाँचा डचों और अंग्रेज़ों की तुलना में कमजोर पड़ता गया। सीमित संसाधनों के कारण वे अपने विशाल समुद्री साम्राज्य का प्रभावी संचालन नहीं कर सके।
(vi) पुर्तग़ाली राजा का अत्यधिक नियंत्रण➣ भारत में नियुक्त गवर्नरों एवं वायसरायों पर पुर्तग़ाल के राजा का सीधा नियंत्रण था। इसके कारण वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्वतंत्र एवं त्वरित निर्णय नहीं ले पाते थे, जबकि अंग्रेज़ एवं डच संयुक्त-पूँजी कंपनियों के रूप में अधिक स्वायत्त एवं लचीले ढंग से कार्य करते थे।
➣ इन सभी कारणों के संयुक्त प्रभाव से 17वीं शताब्दी में भारत में पुर्तग़ालियों का प्रभुत्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगा और उनकी जगह डच तथा अंग्रेज़ जैसी नई यूरोपीय शक्तियाँ स्थापित होने लगीं।
➣ यद्यपि भारत में पुर्तग़ालियों की राजनीतिक एवं व्यापारिक शक्ति काफी कमजोर हो गई थी, फिर भी गोवा, दमन एवं दीव पर उनका अधिकार बना रहा। भारत की स्वतंत्रता (1947 ई.) के बाद भी लगभग 14 वर्षों तक ये क्षेत्र पुर्तग़ाली शासन के अधीन रहे।
➣ अंततः 19 दिसंबर, 1961 ई. को भारतीय सेना द्वारा चलाए गए सैन्य अभियान ऑपरेशन विजय के माध्यम से गोवा, दमन एवं दीव को मुक्त कराया गया और भारत में लगभग 451 वर्षों (1510–1961) से चले आ रहे पुर्तग़ाली औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया।
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