यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन : संक्षिप्त परिचय

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन
📚 विषय सूची

➣ यूरोपीय कंपनियों के भारत आगमन (1498 ई.) से पहले भी अनेक विदेशी आक्रमणकारी एवं शासक भारत आए थे। इनमें अधिकांश उत्तर-पश्चिम के थल मार्ग (खैबर एवं बोलन दर्रे) से भारत पहुँचे-

अंग्रेजो से पहले भारत आये विदेशी

आक्रमणकारी / वंश अनुमानित तिथि
फारस (डेरियस प्रथम / दारा प्रथम, हखामनी साम्राज्य) 516 ई.पू.
यूनानी (सिकंदर) 326 ई.पू.
हिंद-यवन (डेमेट्रियस-I) लगभग 190 ई.पू.
शक (माउस / Maues) लगभग 85 ई.पू.
पहलव (गोंडोफर्नीस) लगभग 20–50 ई.
कुषाण (कुजुल कडफिसेस) लगभग 15 ई.
हूण (तोरमाण) लगभग 490 ई.
अरब (मुहम्मद बिन कासिम) 711–712 ई.
तुर्क (सुबुक्तगीन) 986 ई.
तुर्क (महमूद गजनवी) 1000–1001 ई.
अफगान (बहलोल लोदी) 1451 ई.
मुगल (बाबर) 1526 ई.

1935 ई. में रज़ा शाह पहलवी ने फारस का आधिकारिक नाम बदलकर ईरान कर दिया।

➣ उपरोक्त विदेशियों का भारत आने का उद्देश्य अपने साम्राज्य का विस्तार करना, भारत में सत्ता स्थापित करना अथवा यहाँ की धन सम्पदा को लूटना था।

समुद्री मार्ग की खोज

➣ मध्यकाल में भारत एवं पूर्वी देशों (चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया आदि) के साथ यूरोप का व्यापार मुख्यतः मसालों, रेशम, सूती वस्त्रों, नील, चीनी मिट्टी के बर्तनों, बहुमूल्य रत्नों पर आधारित था। इन वस्तुओं की यूरोप में अत्यधिक माँग थी, जिसके कारण भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया था।

15वीं शताब्दी में हुई भौगोलिक खोजों ने विश्व के विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्क को नई दिशा दी। इसी समय यूरोपीय देशों ने भारत तक सीधे पहुँचने के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज प्रारम्भ की।

➣ यूरोपीय देशों का मुख्य उद्देश्य भारत के मसालों एवं अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का सीधे व्यापार करना तथा अरब एवं इतालवी व्यापारियों के एकाधिकार को समाप्त करना था।

➣ इसके अतिरिक्त कुछ यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर पुर्तगालियों, का उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना भी था।

➣ मध्यकाल में भारत को पश्चिमी देशों से जोड़ने वाले दो प्रमुख समुद्री मार्ग थे –
1. फारस की खाड़ी वाला मार्ग
2. लाल सागर वाला मार्ग

➣ इनमें से अधिकांश व्यापार फारस की खाड़ी वाले मार्ग से होता था, क्योंकि व्यापारी इसे अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक मानते थे।

➣ इसके विपरीत लाल सागर वाले मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ थीं, जैसे प्रवाल भित्तियों (चट्टानों) की अधिकता, प्रतिकूल हवाएँ तथा बड़े जहाजों के लिए उपयुक्त बंदरगाहों का अभाव।

➣ भारत एवं एशिया से यूरोप जाने वाली वस्तुएँ अनेक राज्यों एवं व्यापारिक केंद्रों से होकर गुजरती थीं। प्रत्येक राज्य अपने क्षेत्र से गुजरने वाले व्यापारियों से चुंगी (व्यापार कर) तथा मार्ग कर (पारगमन शुल्क) वसूल करता था।

➣ परिणामस्वरूप वस्तुओं की कीमत यूरोप पहुँचते-पहुँचते कई गुना बढ़ जाती थी, जिसका भार अंततः यूरोपीय उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता था।

➣ इस सम्पूर्ण पूर्वी व्यापार पर इटली के नगर-राज्यों, विशेषकर वेनिस और जेनोआ, का लगभग एकाधिकार था।

➣ इनके माध्यम से ही अधिकांश एशियाई वस्तुएँ यूरोप के अन्य देशों तक पहुँचती थीं, जिससे पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड तथा हॉलैंड जैसे उभरते राष्ट्र इस लाभदायक व्यापार में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले पाते थे।

➣ 1453 ई. में उस्मानी (ऑटोमन) तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) पर अधिकार कर ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना की।

➣ इसके बाद उन्होंने प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर यूरोपीय व्यापारियों पर भारी कर लगाए तथा व्यापार में अनेक बाधाएँ उत्पन्न कीं।

➣ इन परिस्थितियों ने यूरोपीय देशों को भारत एवं पूर्वी देशों तक पहुँचने के लिए नए एवं सीधे समुद्री मार्ग खोजने के लिए प्रेरित किया। इसी आवश्यकता ने भौगोलिक खोजों के युग को जन्म दिया।

➣ नए समुद्री मार्गों की खोज में पुर्तगाल सबसे अग्रणी राष्ट्र बनकर उभरा। यहाँ के राजकुमार प्रिंस हेनरी द नेविगेटर ने नौवहन, मानचित्र निर्माण तथा समुद्री अभियानों को विशेष संरक्षण दिया। उनके प्रयासों से अफ्रीका के पश्चिमी तट की व्यवस्थित खोज प्रारंभ हुई और पुर्तगाल समुद्री अन्वेषण का प्रमुख केंद्र बन गया।

1487–88 ई. में पुर्तगाली नाविक बार्थोलोम्यू डियाज़ अफ्रीका के दक्षिणी सिरे पर स्थित केप ऑफ गुड होप (उत्तमाशा अंतरीप) तक पहुँचे। उन्होंने प्रारम्भ में इसका नाम तूफानी अंतरीप रखा, क्योंकि यहाँ समुद्र में अत्यधिक तूफान आते थे।

➣ बाद में पुर्तगाल के राजा जॉन द्वितीय ने इसका नाम बदलकर उत्तमाशा अंतरीप रख दिया, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि इसी मार्ग से भारत तक समुद्री यात्रा संभव हो सकेगी।

➣यद्यपि डियाज़ स्वयं भारत नहीं पहुँच सके, फिर भी उनकी इस खोज ने भारत के समुद्री मार्ग का द्वार खोल दिया और आगे चलकर अन्य पुर्तगाली नाविक (वास्को-डी-गामा) इसी मार्ग से भारत पहुँचने में सफल हुआ।

➣ 1492 ई. में स्पेन के संरक्षण में क्रिस्टोफर कोलम्बस भारत पहुँचने के उद्देश्य से पश्चिम दिशा में अटलांटिक महासागर के मार्ग से निकला, किंतु भारत के स्थान पर अमेरिका पहुँच गया।

➣ ऐसा कहा जाता है कि उसने जीवनभर यही माना कि वह भारत (इंडीज) पहुँच गया है, इसलिए वहाँ के मूल निवासियों को उसने इंडियन कहा।

➣ यद्यपि कोलंबस भारत नहीं पहुँच सका, फिर भी उसकी इस यात्रा ने नई दुनिया (अमेरिका) को यूरोप के सामने प्रस्तुत किया और भौगोलिक खोजों के युग को नई गति प्रदान की।

➣ अंततः 1498 ई. में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा उत्तमाशा अंतरीप का चक्कर लगाकर भारत के कालीकट (वर्तमान कोझिकोड) बंदरगाह पहुँचा। इस प्रकार यूरोप से भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग स्थापित हो गया।

➣ यह घटना भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, क्योंकि इसी के बाद क्रमशः पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, डेनिश तथा फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियों का भारत आगमन हुआ और आगे चलकर भारत में यूरोपीय उपनिवेशवाद की नींव पड़ी।

उत्तर मुग़लकालीन शासक

दो समुद्री मार्ग – फारस की खाड़ी व लाल सागर
1453 ई. – तुर्कों द्वारा कुस्तुनतुनिया विजय, ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना
प्रिंस हेनरी द नेविगेटर – पुर्तगाली खोजों के प्रेरणास्रोत
1487-88 ई. – बार्थोलोम्यू डियाज़ द्वारा उत्तमाशा अंतरीप की खोज
1492 ई. – कोलम्बस द्वारा अमेरिका की खोज (भारत खोजते हुए)
1498 ई. – वास्कोडिगामा का कालीकट पहुँचना, भारत हेतु सीधा समुद्री मार्ग

यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन

➣ इसके विपरीत निम्लिखित यूरोपीय शक्तियाँ ने भारत पर आक्रमण नहीं किया था। इनका प्रारम्भिक उद्देश्य व्यापार करना, समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करना तथा भारत में व्यापारिक फैक्ट्रियाँ (उपनिवेश) स्थापित करना था-

कंपनी / मूल नाम भारत में प्रथम प्रमुख प्रशासक / प्रतिनिधि भारत में प्रमुख मुख्यालय स्थापना-वर्ष
इस्तादो दा इंडिया फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (प्रथम वायसराय) गोवा 1505 ई.
द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इंटू द ईस्ट इंडीज सर टॉमस रो (प्रथम अंग्रेज राजदूत) कलकत्ता 1600 ई.
वीरेनिग्डे ओस्ट-इंडिशे कंपनी (VOC) कॉर्नेलिस डी हाउटमैन पुलिकट (बाद में नागापट्टनम) 1602 ई.
डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी (DOK) ओवे गेड्डे त्रांक्वेबार (तमिलनाडु) 1616 ई.
कंपनी देज़ आन्द ओरियान्ताल फ्रांस्वा मार्टिन पांडिचेरी 1664 ई.
स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी (SOC) हेनरिक कोएनिग गोटेबोर्ग (स्वीडन) 1731 ई.

➣ कालांतर में भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर कुछ यूरोपीय शक्तियों ने व्यापार के साथ-साथ अपने राजनीतिक प्रभाव का विस्तार किया। इनमें अंग्रेज सबसे अधिक शक्तिशाली बनकर उभरे और अंततः भारत में अपना शासन स्थापित करने में सफल हुए।

पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) में अहमद शाह अब्दाली के हाथों मराठों की पराजय से भारत में शक्ति-संतुलन बदल गया, जिसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया।

➣ इसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल, मैसूर, मराठों तथा अवध सहित अनेक भारतीय शक्तियों से युद्ध किए। इन संघर्षों में अंग्रेजों के प्रमुख यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी फ्रांसीसियों ने भी कई अवसरों पर भारतीय शासकों का साथ दिया, किंतु अंततः अंग्रेज विजयी रहे।

प्लासी का युद्ध (1757) अंग्रेजों के राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, जबकि बक्सर का युद्ध (1764) उनकी विजय को निर्णायक सिद्ध हुआ। इसके बाद मुग़ल सम्राट अंग्रेजों के अधीन आ गया और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभुत्व की मजबूत नींव पड़ गई।

प्लासी का युद्ध (1757) कलकत्ता पर अधिकार प्राप्त करने के लिए नहीं लड़ा गया था। अंग्रेज जनवरी 1757 में ही कलकत्ता (फ़ोर्ट विलियम) पर पुनः अधिकार कर चुके थे। इस युद्ध के बाद अंग्रेजों का बंगाल की राजनीति पर निर्णायक प्रभाव स्थापित हुआ।

पुर्तगाली

पुर्तगालियों का विस्तृत अध्ययन करें।

गवर्नर कार्यकाल प्रमुख तथ्य
फ्रांसिस्को डी अल्मीडा 1505–1509 ई. ▪ कोचीन का दुर्गीकरण कराया तथा इसे अपना मुख्यालय बनाया।
▪ 1508–09 ई. में दीव के युद्ध में गुजरात, मिस्र एवं तुर्की के संयुक्त मुस्लिम जल बेड़े को पराजित किया।
अफ़ोंसो डी अल्बुकर्क 1509–1515 ई. भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
▪ 1510 ई. में बीजापुर से गोवा पर अधिकार किया।
▪ गोवा की किलेबंदी कर उसे पुर्तगालियों का प्रमुख शक्ति केन्द्र बनाया।
वास्को-डि-गामा 1524 ई. ▪ भारत का अंतिम पुर्तगाली वायसराय (गवर्नर) बना।
▪ 1524 ई. में गोवा में ही उसकी मृत्यु हुई।
▪ उसकी कब्र गोवा में स्थित सेंट फ्रांसिस चर्च में बनाई गई (बाद में अवशेष पुर्तगाल ले जाए गए)।
नुनो-दा-कुन्हा 1529–1538 ई. ▪ 1530 ई. में कोचीन के स्थान पर गोवा को राजधानी बनाया।
▪ सैंथोम (मद्रास के निकट) तथा हुगली (बंगाल) में पुर्तगाली बस्तियाँ स्थापित कीं।
▪ भारत के पूर्वी तट पर पुर्तगाली व्यापार का विस्तार किया।

डच

भारत में पुर्तगालियों के आगमन, विस्तार एवं पतन का विस्तृत अध्ययन करें।

वर्ष / घटना प्रमुख तथ्य
1595 ई. कार्नेलियस हाउटमैन के नेतृत्व में डचों का पहला अभियान दल सुमात्रा पहुँचा।
1602 ई. ▪ विभिन्न डच व्यापारिक कंपनियों को मिलाकर यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ऑफ नीदरलैंड (VOC) की स्थापना की गई।
1605 ई. वान-डेर-हेग के नेतृत्व में डचों का पहला अभियान भारत पहुँचा।
मसुलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में भारत की पहली डच फैक्ट्री स्थापित की गई।
1610 ई. पुलीकट (तमिलनाडु) में फैक्ट्री स्थापित की।
▪ पुलीकट को डचों का भारतीय मुख्यालय बनाया।
▪ यहाँ स्वर्ण पैगोडा (सोने की मुद्रा) ढाली जाती थी।
1653 ई. चिनसुरा (बंगाल) में फैक्ट्री स्थापित की।
▪ यह बंगाल में डचों का सबसे बड़ा व्यापारिक केन्द्र था।
भारत से प्रमुख निर्यात ▪ सूती वस्त्र
▪ नील
▪ शोरा (Saltpetre)
▪ कच्चा रेशम
▪ अफीम
▪ चावल
▪ नमक
भारत से मसालों का निर्यात नहीं करते थे।

अंग्रेज़

भारत में अंग्रेजों के आगमन एवं विस्तार का विस्तृत अध्ययन करें।

वर्ष / घटना प्रमुख तथ्य
एलिज़ाबेथ-I का शासन ▪ ब्रिटिश इतिहास का स्वर्णिम युग कहलाता है।
▪ व्यापारिक विस्तार को विशेष प्रोत्साहन दिया गया।
31 दिसम्बर 1600 ई. ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।
▪ आधिकारिक नाम – The Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies
▪ यह एक संयुक्त पूँजी (Joint Stock) कंपनी थी।
1601 ई. ▪ कंपनी का पहला समुद्री अभियान इंडोनेशिया भेजा गया।
1608 ई. कैप्टन विलियम हॉकिन्स ‘हेक्टर’ जहाज से सूरत पहुँचा।
▪ सूरत में अंग्रेज़ों की पहली अस्थायी फैक्ट्री स्थापित की गई।
जहाँगीर का दरबार ▪ कैप्टन हॉकिन्स जहाँगीर के दरबार पहुँचा।
▪ जहाँगीर ने उसे 400 का मनसब तथा खाँ / इंग्लिश खाँ की उपाधि प्रदान की।
1611 ई. मसुलीपट्टनम में अंग्रेज़ों की दूसरी फैक्ट्री स्थापित हुई।
1613 ई. सूरत की फैक्ट्री को स्थायी मान्यता प्राप्त हुई।
1615–1618 ई. सर थॉमस रो ब्रिटिश सम्राट जेम्स-I के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार आया।
▪ कंपनी के लिए व्यापार एवं कर-छूट संबंधी विशेष अधिकार (फरमान) प्राप्त किए।
1632 ई. अब्दुल्ला कुतुबशाह (गोलकुण्डा) से 500 पौण्ड वार्षिक कर के बदले सभी बंदरगाहों पर व्यापार का अधिकार प्राप्त किया।
▪ यह सुनहरा फरमान (Golden Farman) कहलाया।
1639 ई. चंद्रगिरि के शासक से मद्रास पट्टे पर प्राप्त किया।
▪ यहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण कराया गया।
1661 ई. चार्ल्स-II का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रागांज़ा से हुआ।
▪ दहेज में बम्बई (मुंबई) प्राप्त हुआ।
1668 ई. ▪ चार्ल्स-II ने बम्बई को 10 पौण्ड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया।
▪ बाद में जेराल्ड ऑंगियर (Gerald Aungier) ने बम्बई के विकास एवं शहरीकरण को बढ़ावा दिया।
1698 ई. सूतानती, गोविंदपुर एवं कलिकाता गाँवों की ज़मींदारी खरीदी गई।
▪ इन तीनों गाँवों से आगे चलकर कलकत्ता (कोलकाता) नगर विकसित हुआ।
जॉब चार्नक ▪ परंपरागत रूप से कलकत्ता का संस्थापक माना जाता है।
1700 ई. फोर्ट विलियम का निर्माण हुआ।
▪ यह पूर्वी भारत में अंग्रेज़ों का प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र बना।
▪ प्रथम अध्यक्ष – सर चार्ल्स आयर
1715–1717 ई. जॉन सरमन के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल फर्रुखशियर के दरबार पहुँचा।
▪ चिकित्सक विलियम हैमिल्टन ने सम्राट का उपचार किया।
▪ प्रसन्न होकर फर्रुखशियर ने 1717 ई. में कंपनी को अनेक व्यापारिक रियायतें प्रदान कीं।

डेनिश

भारत में डेनिशों के आगमन, विस्तार एवं पतन का विस्तृत अध्ययन करें।

वर्ष / घटना प्रमुख तथ्य
1616 ई. डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी (Danish East India Company) की स्थापना डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ (Christian IV) द्वारा की गई।
1620 ई. तंजौर (Thanjavur) के नायक शासक रघुनाथ नायक से संधि की गई।
त्रांकेबार (थारंगमबाड़ी) में डेनिशों ने अपनी पहली व्यापारिक फैक्ट्री एवं डैन्सबोर्ग (Dansborg) किले की स्थापना की।
1698 ई. ▪ बंगाल में श्रीरामपुर (Serampore) में डेनिश व्यापारिक केन्द्र की स्थापना की गई।
1777 ई. ▪ डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार सीधे डेनमार्क सरकार के नियंत्रण में आ गया।
1845 ई. ▪ डेनिशों ने भारत स्थित अपनी सभी बस्तियाँ एवं व्यापारिक केन्द्र अंग्रेज़ों को बेच दिए।
▪ इसके साथ ही भारत में डेनिश शासन एवं व्यापारिक गतिविधियों का अंत हो गया।

फ्रांसीसी

भारत में फ्रांसीसियों के आगमन, विस्तार एवं पतन का विस्तृत अध्ययन करें।

वर्ष / घटना प्रमुख तथ्य
1664 ई. फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।
▪ स्थापना लुई-XIV के शासनकाल में उसके वित्त मंत्री ज्यां-बाप्तिस्त कोलबर्ट (Colbert) के प्रयासों से हुई।
1667 ई. फ्रांसिस कैरो (François Caron) के नेतृत्व में पहला फ्रांसीसी अभियान भारत पहुँचा।
सूरत में फ्रांसीसियों की पहली फैक्ट्री स्थापित की गई।
1669 ई. मसुलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) में फ्रांसीसियों की दूसरी फैक्ट्री स्थापित की गई।
1673 ई. ▪ बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खाँ से भूमि प्राप्त की।
▪ इसी भूमि पर चंदनगर (चंद्रनगर) नामक प्रमुख फ्रांसीसी बस्ती का विकास हुआ।
1701 ई. पांडिचेरी को फ्रांसीसियों का मुख्यालय बनाया गया।
फ्रांसिस मार्टिन पांडिचेरी का प्रथम गवर्नर बना।
1735 ई. ड्यूमा (Dumas) पांडिचेरी का गवर्नर बनकर आया।
▪ इसके शासनकाल में भारत में फ्रांसीसी व्यापार का उल्लेखनीय विस्तार हुआ।

यूरोपीय कम्पनियों के मध्य संघर्ष

यूरोपीय कम्पनियों के मध्य संघर्ष का विस्तृत अध्ययन करें।

युद्ध वर्ष कारण समाप्ति परिणाम
प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746–1748 ई. ▪ ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध का प्रभाव।
▪ अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों के बीच वैश्विक संघर्ष।
1748 ई.
एक्स-ला-शेपल (Aix-la-Chapelle) की संधि
▪ अंग्रेज़ों एवं कर्नाटक के नवाब की पराजय।
▪ मद्रास अंग्रेज़ों को वापस मिला।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध 1748–1754 ई. ▪ हैदराबाद एवं कर्नाटक के उत्तराधिकार विवाद।
▪ अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों का भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप।
1754/1755 ई.
पांडिचेरी की संधि
▪ अंग्रेज़ों की स्थिति अधिक सुदृढ़ हुई।
▪ फ्रांसीसी प्रभाव कमजोर पड़ा।
तृतीय कर्नाटक युद्ध 1756–1763 ई. ▪ यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध (Seven Years’ War) 1763 ई.
पेरिस की संधि
▪ अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय।
▪ भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभुत्व का अंत तथा अंग्रेज़ी सत्ता की नींव मजबूत हुई।

यूरोपियों की भारत में प्रमुख बस्तियां

यूरोपीय शक्ति भारत में प्रमुख व्यापारिक केन्द्र
पुर्तगाली कोचीन (1500 ई.), गोवा (1510 ई.), बसई (1533 ई.), दीव (1535 ई.), हुगली (1537 ई.), दमन (1558 ई.), सैनथोम (मद्रास के निकट) तथा बम्बई।
डच मसुलीपट्टनम (1605 ई.), पुलीकट (1610 ई.), सूरत (1616 ई.), बालासोर, पटना, कासिम बाजार, बड़ा नगर, नागपट्टम (1658 ई.) तथा कोचीन (1663 ई.)।
अंग्रेज मसुलीपट्टनम (1611 ई.), सूरत (1613 ई.), आगरा, अहमदाबाद, भड़ौच, मद्रास (1639 ई.), हरिहरपुर, बालासोर, हुगली (1658 ई.), पटना, कासिम बाजार तथा बम्बई (1668 ई.)।
डेनिश त्रांकेबार (1620 ई.), बालासोर (1636 ई.) तथा श्रीरामपुर/सेरामपुर (1755 ई.)।
फ्रांसीसी सूरत (1668 ई.), मसुलीपट्टनम (1669 ई.), पांडिचेरी (1674 ई.), चन्द्रनगर (1690–91 ई.) तथा माहे (1725 ई.)।
भारत में यूरोपीय कंपनियों की प्रमुख बस्तियों का मानचित्र

यूरोपीयों की प्रथम व्यापारिक फैक्ट्रियाँ

यूरोपीय शक्ति प्रथम व्यापारिक फैक्ट्री
पुर्तगाली 1503 ई. –कोचीन (केरल)
डच 1605 ई. –मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश)
अंग्रेज 1611 ई. –मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश)
डेनिश 1620 ई. –त्रांक्वेबार (थारंगमबाड़ी, तमिलनाडु)
फ्रांसीसी 1668 ई. –सूरत (गुजरात)

यूरोपीयों का भारत आगमन : कालक्रम

वर्ष घटना
1498 पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा 20 मई, 1498 ई. को कालीकट (कोझिकोड) पहुँचा तथा भारत के लिए नए समुद्री मार्ग का उद्घाटन हुआ।
1500 पेड्रो अल्वारेस काब्राल के नेतृत्व में द्वितीय पुर्तगाली अभियान भारत पहुँचा।
1502 वास्को द गामा दूसरी बार भारत आया।
1503 भारत में पहली स्थायी पुर्तगाली फैक्ट्री कोचीन में स्थापित की गई।
1505 फ्रांसिस्को डी अल्मीडा भारत का प्रथम पुर्तगाली वायसराय बना तथा कन्नूर में पुर्तगालियों ने अपनी दूसरी फैक्ट्री स्थापित की।
1509 अफोंसो डी अल्बुकर्क भारत का पुर्तगाली गवर्नर बना। इसे भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
1510 पुर्तगालियों ने गोवा पर अधिकार किया।
1529 नूनो डी कुन्हा भारत का पुर्तगाली गवर्नर बना।
1530 गोवा को पुर्तगालियों की राजधानी बनाया गया।
1596 कॉर्नेलिस डी हाउटमैन भारत आने वाला प्रथम डच यात्री बना।
1599 लंदन के व्यापारियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के गठन का निर्णय लिया।
1600 31 दिसम्बर, 1600 को इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को चार्टर प्रदान किया।
1602 डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) की स्थापना हुई।
1608 कैप्टन विलियम हॉकिंस सूरत पहुँचा।
1609 कैप्टन विलियम हॉकिंस मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में पहुँचा।
1611 अंग्रेजों ने मसूलीपट्टनम में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की।
1612 स्वाली (सूरत) का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित किया।
1613 अंग्रेजों को सूरत में पहली स्थायी फैक्ट्री स्थापित करने की अनुमति मिली।
1615–1619 सर टॉमस रो इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार में रहे।
1661 पुर्तगाल ने बम्बई (मुंबई) इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को दहेज में दिया।
1664 फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।
1668 फ्रांसीसियों ने सूरत में अपनी पहली व्यापारिक कोठी स्थापित की।
1669 मसूलीपट्टनम में फ्रांसीसियों की दूसरी व्यापारिक कोठी स्थापित हुई।
1674 फ्रांस्वा मार्टिन ने पांडिचेरी के विकास की नींव रखी तथा यह फ्रांसीसियों का प्रमुख केन्द्र बना।
1690 जॉब चार्नॉक ने कलकत्ता की स्थापना से संबंधित कार्य किया।
1708–1709 पुरानी एवं नई अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनियों का विलय होकर यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी बनी।
1725 फ्रांसीसियों ने माहे पर अधिकार किया।
1739 फ्रांसीसियों ने कराईकल पर अधिकार किया।
1746–1748 प्रथम कर्नाटक युद्ध हुआ। ऐक्स-ला-शैपेल की संधि (1748) के बाद मद्रास अंग्रेजों को लौटा दिया गया।
1749–1754 द्वितीय कर्नाटक युद्ध हुआ, जिसका अंत पांडिचेरी की संधि (1754) से हुआ।
1756–1763 तृतीय कर्नाटक युद्ध हुआ, जिसका अंत पेरिस की संधि (1763) से हुआ।
1759 बेदरा का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर भारत में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंत कर दिया।
1760 वांडीवाश का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से पराजित किया।
1761 अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया।
1763 पेरिस की संधि के तहत फ्रांसीसियों को पांडिचेरी, चन्द्रनगर, माहे, कराईकल और यानम लौटा दिए गए, किन्तु उन्हें किलेबंदी और सैन्य गतिविधियों की अनुमति नहीं थी।

यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों से संबद्ध प्रमुख व्यक्ति

व्यक्ति परिचय / योगदान
वास्को द गामा 1498 ई. में भारत (कालीकट) आने वाला प्रथम यूरोपीय (पुर्तगाली) समुद्री यात्री।
वास्को द गामा 1502 ई. में दूसरी बार भारत आया तथा पुर्तगाली व्यापारिक हितों को सुदृढ़ किया।
पेड्रो अल्वारेस काब्राल 1500 ई. में भारत आने वाला द्वितीय पुर्तगाली यात्री।
फ्रांसिस्को डी अल्मीडा भारत का प्रथम पुर्तगाली वायसराय (1505 ई.)।
अफोंसो डी अल्बुकर्क भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक; 1510 ई. में गोवा पर अधिकार किया।
जॉन मिल्डेनहॉल भारत आने वाला प्रथम अंग्रेज (ब्रिटिश) व्यापारी।
कैप्टन विलियम हॉकिंस जहाँगीर के दरबार में पहुँचने वाला प्रथम अंग्रेज प्रतिनिधि (1609 ई.)।
सर टॉमस रो इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत, जिसने जहाँगीर के दरबार में अंग्रेजों के व्यापारिक अधिकार प्राप्त किए।
जेराल्ड औंगियर बम्बई (मुंबई) के विकास एवं प्रशासन का प्रमुख निर्माता; आधुनिक बम्बई का संस्थापक माना जाता है।
जॉब चार्नॉक 1690 ई. में कलकत्ता (कोलकाता) की स्थापना से संबंधित अंग्रेज अधिकारी।
चार्ल्स आयर फोर्ट विलियम (कलकत्ता) का प्रथम अध्यक्ष/प्रशासक।
सर विलियम नॉरिस औरंगज़ेब के दरबार में भेजा गया अंग्रेज राजदूत (1699–1702 ई.)।
फ्रांस्वा मार्टिन पांडिचेरी का प्रथम फ्रांसीसी गवर्नर तथा फ्रांसीसी बस्ती का प्रमुख निर्माता।
फ्रांसिस डे 1639 ई. में मद्रास (चेन्नई) की स्थापना करने वाला अंग्रेज अधिकारी।
शोभा सिंह बर्दवान (वर्धमान) का जमींदार, जिसने 1696 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।
जॉन सरमन 1715 ई. के अंग्रेज शिष्टमंडल का प्रमुख, जिसने फर्रुखसियर से 1717 ई. का व्यापारिक फरमान प्राप्त किया।
फादर एंटोनियो मोनसेराट अकबर के दरबार में पहुँचे प्रथम जेसुइट मिशन (1580 ई.) के प्रमुख सदस्यों में से एक।
फ्रांस्वा कैरों भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रारम्भिक गतिविधियों से जुड़ा अधिकारी; सूरत में फ्रांसीसी व्यापारिक केन्द्र की स्थापना में योगदान।
कॉर्नेलिस डी हाउटमैन 1596 ई. में भारत पहुँचने वाला प्रथम डच यात्री।
मार्कारा (मार्कारा अवांचिन्त्ज़) 1668 ई. में सूरत में फ्रांसीसी व्यापारिक कोठी स्थापित कराने में प्रमुख भूमिका निभाई।

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