भक्ति आन्दोलन : परिचय, प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय

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भक्ति आंदोलन का उद्भव

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➣ भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेताश्वतर उपनिषद में मिलता है, जहाँ ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत समर्पण (भक्ति) का प्रारम्भिक उल्लेख प्राप्त होता है।

➣ भक्ति आंदोलन का आरम्भ दक्षिण भारत में लगभग 7वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य हुआ (कुछ विद्वान इसकी प्रारम्भिक पृष्ठभूमि 5वीं-6वीं शताब्दी से भी मानते हैं)। यह एक धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन था, जिसमें ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति, समानता तथा सरल उपासना पर बल दिया गया।

➣ इस आंदोलन ने जाति-भेद, कर्मकाण्ड तथा धार्मिक आडम्बरों का विरोध किया तथा धर्म को सामान्य जनता के लिए सरल एवं सुलभ बनाने का प्रयास किया। दक्षिण भारत में इसने बौद्ध एवं जैन धर्म के बढ़ते प्रभाव का भी प्रभावी उत्तर प्रस्तुत किया।

➣ दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन के व्यापक प्रसार का श्रेय 12 अलवार (वैष्णव) तथा 63 नयनार (शैव) संतों को दिया जाता है। इन संतों ने तमिल भाषा में भक्ति-साहित्य की रचना कर जनसाधारण में भक्ति का प्रचार किया।

➣ अलवार भगवान विष्णु के उपासक थे, जबकि नयनार भगवान शिव के भक्त थे। दोनों परम्पराओं ने व्यक्तिगत भक्ति तथा ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण पर विशेष बल दिया।

➣ अलवार संतों में अण्डाल एकमात्र प्रमुख महिला संत थीं, जिन्हें भगवान विष्णु की महान भक्त माना जाता है।

➣ अलवार संतों की रचनाएँ नालायिर दिव्य प्रबन्धम् तथा नयनार संतों की रचनाएँ तेवारम् (देवारम्) नामक ग्रन्थों में संकलित हैं।

दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलनवैष्णव शाखाशैव शाखा
संतअलवार (12)नयनार (63)
आराध्यभगवान विष्णुभगवान शिव
भाषातमिलतमिल
प्रमुख संकलननालायिर दिव्य प्रबन्धम्तेवारम्
प्रमुख संतनम्मालवार, मधुरकवि, अण्डाल, कुलशेखरतिरुनावुक्करसर (अप्पार), तिरुज्ञानसम्बन्दर, सुन्दरमूर्ति, मणिक्कावाचकर

• भक्ति का प्रथम उल्लेख: श्वेताश्वतर उपनिषद

• दक्षिण भारत में उद्भव: 7वीं–12वीं शताब्दी (कुछ विद्वानों के अनुसार 5वीं–6वीं शताब्दी से प्रारम्भिक पृष्ठभूमि)

• अलवार (वैष्णव) = 12 संत, नयनार (शैव) = 63 संत | प्रमुख महिला संत: अण्डाल

• रचना-संकलन: अलवार → नालायिर दिव्य प्रबन्धम् | नयनार → तेवारम्

• उद्देश्य: व्यक्तिगत भक्ति का प्रचार, जाति-भेद एवं कर्मकाण्ड का विरोध तथा धर्म को जनसामान्य के लिए सरल बनाना

मध्यकालीन भारत में भक्ति आन्दोलन एवं प्रमुख संत

महाराष्ट्र के धार्मिक आंदोलन

➣ महाराष्ट्र मध्यकालीन में वैष्णव भक्ति परम्परा की एक प्रमुख शाखा थी। इसके आराध्य देव विठोबा (विट्ठल) थे, जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण का ही एक रूप माना जाता है। इनका प्रमुख तीर्थ पंढरपुर (महाराष्ट्र) है।

➣ महाराष्ट्र की भक्ति परम्परा में वारकरी सम्प्रदाय सर्वाधिक प्रमुख था। इसके अनुयायी प्रतिवर्ष आषाढ़ी एवं कार्तिकी एकादशी के अवसर पर पंढरपुर की वारी (तीर्थयात्रा) करते थे।

➣ आगे चलकर समर्थ रामदास ने समर्थ (रामदासी) सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया। साथ ही इस परम्परा में भगवान राम एवं हनुमान की उपासना, संगठन, शारीरिक शक्ति, अनुशासन तथा राष्ट्रधर्म पर विशेष बल दिया गया।

➣ महाराष्ट्र की भक्ति परम्परा को पंढरपुर आंदोलन भी कहा जाता है, क्योंकि इसका प्रमुख केंद्र पंढरपुर स्थित विठोबा मंदिर तथा वहाँ आयोजित होने वाली वारी (तीर्थयात्रा) रही।

सम्प्रदायआराध्यमुख्य विशेषता
वारकरीविठोबा (विट्ठल)भक्ति, वारी (तीर्थयात्रा), अभंग परम्परा
समर्थ (रामदासी)राम एवं हनुमानराष्ट्रधर्म, संगठन एवं चरित्र-निर्माण

➣ महाराष्ट्र धर्म के प्रमुख संतों में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम तथा समर्थ रामदास का विशेष स्थान है। इनमें ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ एवं तुकाराम वारकरी परम्परा से सम्बन्धित थे।

संतसम्प्रदायविशेष योगदान
ज्ञानेश्वरवारकरीज्ञानेश्वरी की रचना, महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन के अग्रदूत
नामदेववारकरीअभंग साहित्य एवं विठोबा भक्ति का व्यापक प्रचार
एकनाथवारकरीमराठी भक्ति साहित्य का विकास एवं सामाजिक समन्वय
तुकारामवारकरीअभंग रचनाएँ एवं सामाजिक समानता का संदेश
समर्थ रामदाससमर्थ (रामदासी)राम-हनुमान उपासना, राष्ट्रधर्म एवं संगठन पर बल

• महाराष्ट्र धर्म का प्रमुख आराध्य: विठोबा (विट्ठल) | प्रमुख केंद्र: पंढरपुर

• वारकरी सम्प्रदाय → विठोबा भक्ति, वारी (तीर्थयात्रा), अभंग साहित्य

• समर्थ (रामदासी) सम्प्रदाय → राम-हनुमान उपासना, राष्ट्रधर्म, संगठन एवं चरित्र-निर्माण

• प्रमुख संत: ज्ञानेश्वर → नामदेव → एकनाथ → तुकाराम → समर्थ रामदास

• वैकल्पिक नाम: पंढरपुर आंदोलन

• भक्ति आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान: क्षेत्रीय (लोक) भाषाओं-हिन्दी, तमिल, मराठी, बंगाली, गुजराती, अवधी, ब्रज आदि-के साहित्य का अभूतपूर्व विकास

भक्ति आंदोलन के प्रमुख दर्शन

➣ भक्ति आंदोलन के दौरान विभिन्न आचार्यों ने वेदान्त की अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। इन दर्शनों का मुख्य अंतर ब्रह्म, जीव तथा जगत के पारस्परिक सम्बन्ध को लेकर है।

आचार्यदर्शनमुख्य सिद्धान्त
आदि शंकराचार्यअद्वैतवादब्रह्म ही सत्य है, जगत माया (मिथ्या) है तथा जीव और ब्रह्म में वास्तविक भेद नहीं है।
रामानुजाचार्यविशिष्टाद्वैतवादजीव एवं जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं, बल्कि उसके विशिष्ट (अंग) रूप हैं।
माध्वाचार्यद्वैतवादजीव, जगत और ब्रह्म तीनों पृथक-पृथक एवं वास्तविक हैं।
निम्बार्काचार्यद्वैताद्वैतवाद (भेदाभेद)जीव और ब्रह्म में भेद भी है तथा अभेद भी है।
वल्लभाचार्यशुद्धाद्वैतवादब्रह्म ही एकमात्र सत्य है तथा जगत भी उसी का वास्तविक स्वरूप है, मिथ्या नहीं।
चैतन्य महाप्रभुअचिन्त्य भेदाभेदवादजीव एवं ब्रह्म में भेद भी है और अभेद भी, किन्तु यह सम्बन्ध मानव बुद्धि से परे (अचिन्त्य) है।

भक्ति आंदोलन : एक नज़र में

संत / आचार्यदर्शन / धाराआराध्य / सम्प्रदायप्रमुख ग्रन्थ / विशेषता
आदि शंकराचार्यअद्वैत वेदान्तस्मार्त परम्पराप्रस्थानत्रयी भाष्य, चार मठ
रामानुजाचार्यविशिष्टाद्वैतश्रीसम्प्रदायश्रीभाष्यम्
माध्वाचार्यद्वैतब्रह्मसम्प्रदायअनुव्याख्यान, उडुपी अष्टमठ
निम्बार्काचार्यद्वैताद्वैत (भेदाभेद)सनकादि सम्प्रदायवेदान्तपारिजातसौरभ
वल्लभाचार्यशुद्धाद्वैतपुष्टिमार्गअणुभाष्य, सुबोधिनी
रामानन्दसगुण रामभक्तिरामानन्दी (रामावत)उत्तर भारत में भक्ति का प्रसार
चैतन्य महाप्रभुअचिन्त्य भेदाभेदगौड़ीय वैष्णवसंकीर्तन आन्दोलन
मीराबाईसगुण कृष्णभक्तिकृष्णमीरा की पदावली
सूरदाससगुण कृष्णभक्तिपुष्टिमार्गसूरसागर
तुलसीदाससगुण रामभक्तिरामरामचरितमानस
दादू दयालनिर्गुण भक्तिदादूपंथदादूवाणी
ज्ञानेश्वरवारकरी परम्पराविठोबाज्ञानेश्वरी
नामदेववारकरी परम्पराविठोबाअभंग, गुरु ग्रन्थ साहिब में वाणी
एकनाथवारकरी परम्पराविठोबाएकनाथी भागवत
तुकारामवारकरी परम्पराविठोबातुकारामाची गाथा
समर्थ रामदाससमर्थ (रामदासी)राम-हनुमानदासबोध

📌 महाराष्ट्र के संतों का क्रम
• ज्ञानेश्वर → नामदेव → एकनाथ → तुकाराम → समर्थ रामदास
उत्तर भारत के प्रमुख संत
• रामानन्द → कबीर → रैदास → मीराबाई → सूरदास → तुलसीदास → दादू दयाल

➣ भक्ति आन्दोलन का सबसे बड़ा प्रभाव क्षेत्रीय (लोक) भाषाओं के विकास पर पड़ा। संतों ने संस्कृत के स्थान पर हिन्दी, अवधी, ब्रज, मराठी, बंगाली, गुजराती, असमिया आदि भाषाओं में साहित्य की रचना की, जिससे इन भाषाओं का व्यापक साहित्यिक विकास हुआ।

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