संत तुकाराम
➣ संत तुकाराम महाराष्ट्र के महान संत, कवि एवं वारकरी सम्प्रदाय के प्रमुख संतों में से एक थे। उन्होंने मराठी भाषा में भक्ति, सामाजिक समानता तथा नाम-स्मरण का व्यापक प्रचार किया। उन्हें “महाराष्ट्र का कबीर” भी कहा जाता है।
➣ तुकाराम का जन्म 1598 ई. में देहू (वर्तमान पुणे, महाराष्ट्र) में इन्द्रायणी नदी के तट पर हुआ। उनका परिवार वाणी (व्यापारी) समुदाय से सम्बन्धित था। अपनी रचनाओं में उन्होंने स्वयं को शूद्र कहा है। इनके पिता का नाम बोल्होबा (बाळोबा) तथा माता का नाम कनकाई था। परिवार का पारम्परिक व्यवसाय महाजनी (वणिक) था।
➣ लगभग 17–18 वर्ष की आयु में इनके माता-पिता का देहावसान हो गया। इसी समय महाराष्ट्र में पड़े भीषण अकाल के कारण इनके बड़े पुत्र, पशुधन तथा पारिवारिक व्यवसाय का भी नाश हो गया, जिससे वे सांसारिक जीवन से विरक्त होकर भक्ति-मार्ग की ओर अग्रसर हुए।
➣ तुकाराम ने देहू के निकट भण्डारा पर्वत पर एकांत साधना की। इनके गुरु बाबाजी चैतन्य (केशव चैतन्य) थे, जिनसे उन्होंने भक्ति एवं आध्यात्मिक साधना की दीक्षा प्राप्त की।
➣ संत तुकाराम वारकरी सम्प्रदाय के प्रमुख परवर्ती संतों में गिने जाते हैं। उन्होंने नाम-स्मरण, कीर्तन, भक्ति तथा सामाजिक समरसता का प्रचार किया। वारकरी परम्परा में उन्हें सम्मानपूर्वक जगद्गुरु कहा जाता है।
| विषय | संत तुकाराम |
|---|---|
| सम्प्रदाय | वारकरी सम्प्रदाय |
| गुरु | बाबाजी चैतन्य |
| भाषा | मराठी |
| विशेष पहचान | महाराष्ट्र का कबीर, वारकरी परम्परा के प्रमुख संत |
साहित्य एवं भक्ति आन्दोलन में योगदान
➣ संत तुकाराम ने मराठी भाषा में बड़ी संख्या में अभंग रचे। उनकी वाणी का संकलन तुकारामाची गाथा के नाम से प्रसिद्ध है
➣ तुकारामाची गाथा में लगभग 4,000–5,000 अभंग संकलित माने जाते हैं। इन रचनाओं में भक्ति, सामाजिक समानता, नैतिकता तथा दैनिक जीवन के आध्यात्मिक अनुभवों का सरल एवं प्रभावशाली वर्णन मिलता है।
| रचना / विषय | विशेषता |
|---|---|
| तुकारामाची गाथा | तुकाराम के अभंगों का प्रमुख संग्रह |
| भाषा | मराठी |
| काव्य-विधा | अभंग |
| मुख्य विषय | भक्ति, सामाजिक समानता, नैतिकता एवं नाम-स्मरण |
➣ संत तुकाराम ने जाति-भेद, धार्मिक आडम्बर एवं सामाजिक ऊँच-नीच का विरोध किया तथा नाम-स्मरण, निष्काम भक्ति और मानव-समता को मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग बताया। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव पर भी बल दिया।
➣ उनके शिष्यों में बहिणाबाई विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने तुकाराम की शिक्षाओं का व्यापक प्रचार किया और मराठी भक्ति-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।
➣ संत तुकाराम छत्रपति शिवाजी के समकालीन थे। परम्परा के अनुसार शिवाजी द्वारा भेजी गई धन-सम्पत्ति एवं उपहारों को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। यह घटना उनके वैराग्यपूर्ण जीवन तथा सांसारिक लोभ से विरक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
प्रमुख शिक्षाएँ
➣ संत तुकाराम ने भगवान विठोबा की निष्काम भक्ति, नाम-स्मरण तथा कीर्तन को ईश्वर-प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग बताया।
➣ उन्होंने जाति-पाँति, धार्मिक आडम्बर तथा सामाजिक ऊँच-नीच का विरोध करते हुए सभी मनुष्यों की समानता पर बल दिया।
➣ उनके अनुसार सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सदाचार, विनम्रता, मानव सेवा एवं दयाभाव के माध्यम से भी ईश्वर की उपासना की जा सकती है।
➣ उन्होंने लोभ, अहंकार तथा सांसारिक मोह का त्याग कर सरल, नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।
➣ उनकी शिक्षाओं में हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव, सामाजिक समरसता तथा लोककल्याण की भावना को विशेष महत्व दिया गया है।
मृत्यु
➣ परम्परागत मान्यता के अनुसार 19 मार्च 1650 ई. (फाल्गुन वद्य द्वितीया) को देहू में कीर्तन करते हुए संत तुकाराम सदेह वैकुण्ठ-गमन कर गए। उनकी स्मृति में यह तिथि आज भी “तुकाराम बीज” के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।
ऐतिहासिक महत्व
➣ संत तुकाराम ने वारकरी भक्ति परम्परा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया तथा मराठी भक्ति साहित्य को समृद्ध बनाया।
➣ उनके अभंगों ने भक्ति आन्दोलन को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और महाराष्ट्र के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।
➣ उनकी शिक्षाओं का प्रभाव आगे चलकर बहिणाबाई सहित अनेक संतों एवं वारकरी परम्परा के अनुयायियों पर पड़ा।
➣ भारतीय भक्ति आन्दोलन के इतिहास में उनका स्थान महाराष्ट्र के महान संत, समाज-सुधारक एवं लोककवि के रूप में माना जाता है।
• जन्म : 1598 ई., देहू (पुणे, महाराष्ट्र)
• सम्प्रदाय : वारकरी सम्प्रदाय (प्रमुख परवर्ती संत)
• गुरु : बाबाजी चैतन्य (केशव चैतन्य)
• उपाधि : “महाराष्ट्र का कबीर”, वारकरी परम्परा में “जगद्गुरु”
• भाषा : मराठी | प्रमुख काव्य-विधा : अभंग
• प्रमुख रचना : तुकारामाची गाथा (अभंगों का संग्रह)
• प्रमुख शिष्या : बहिणाबाई
• समकालीन शासक : छत्रपति शिवाजी (शिवाजी की भेंट स्वीकार नहीं की)
• मृत्यु : 19 मार्च 1650 ई. (परम्परागत मान्यता) | स्मृति-दिवस : तुकाराम बीज
• वारकरी परम्परा का क्रम : ज्ञानेश्वर → नामदेव → एकनाथ → तुकाराम
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