1. भक्ति आंदोलन का प्रारंभ किया गया था-
U.P. U.D.A./L.D.A. (pre) 2001
उत्तर-(a)
भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत में हुई, जहां वैष्णव आलवार संतों और शैव नयनार संतों ने तमिल भाषा में भक्ति काव्य रचकर आम जनमानस तक ईश्वर-भक्ति का संदेश पहुंचाया। यह आंदोलन धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर फैला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आलवार संतों की रचनाओं का संकलन “नालायिरा दिव्य प्रबंधम” कहलाता है, जिसे तमिल वेद के समान सम्मान प्राप्त है। इनमें से 12 प्रमुख आलवार संत माने जाते हैं, जिनमें आंडाल एकमात्र महिला संत थीं।
2. बुद्ध और मीराबाई के जीवन दर्शन में मुख्य साम्य था-
R.A.S. / R. T. S (pre) 1992
उत्तर-(c)
बुद्ध और मीराबाई दोनों के दर्शन में यह समानता थी कि संसार को दुःखमय और नश्वर माना गया, जिससे मुक्ति के लिए आध्यात्मिक साधना आवश्यक है। बुद्ध के चार आर्य सत्यों में पहला सत्य “दुःख” ही है, जबकि मीराबाई ने कृष्ण-भक्ति के माध्यम से सांसारिक बंधनों से मुक्ति की खोज की।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीराबाई मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज की पत्नी थीं और विधवा होने के बाद उन्होंने पूर्ण रूप से कृष्ण-भक्ति को समर्पित जीवन अपनाया। उनकी रचनाएं मुख्यतः ब्रज और राजस्थानी भाषा में मिलती हैं और वे कृष्ण को अपना पति मानती थीं।
3. कामरूप में वैष्णव धर्म को लोकप्रिय बनाया-
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
उत्तर-(d)
असम के कामरूप क्षेत्र में वैष्णव भक्ति परंपरा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय शंकरदेव को जाता है। उन्होंने “एक शरण नाम धर्म” नामक एकेश्वरवादी संप्रदाय की स्थापना की, जिसमें कृष्ण भक्ति को केंद्रीय स्थान दिया गया तथा मूर्तिपूजा के स्थान पर नाम-कीर्तन पर बल दिया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकरदेव ने “भाओना” नामक नाट्य शैली और “नामघर” (सामुदायिक प्रार्थना गृह) की परंपरा शुरू की, जो आज भी असम में प्रचलित है। उनके शिष्य माधवदेव ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और “नामघोषा” जैसी रचनाएं कीं।
4. असम एवं कूच बिहार में वैष्णव धर्म का प्रवर्तन किसने किया?
U.P.P.C.S. (Mains) 2011
उत्तर-(c)
असम और कूच बिहार क्षेत्र में वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य शंकरदेव द्वारा किया गया, जिन्होंने भक्ति के माध्यम से जाति-भेद को नकारते हुए समाज में समानता का संदेश दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकरदेव बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे- वे संत, कवि, नाटककार, संगीतकार और चित्रकार भी थे। उन्होंने “बोरगीत” नामक भक्ति संगीत शैली की रचना की तथा असमिया साहित्य को नई दिशा दी।
5. सभी भक्ति संतों के मध्य एक समान विशेषता थी, कि उन्होंने-
47th B.P.S.C. (pre) 2005
उत्तर-(a)
भक्ति आंदोलन के संतों की एक समान विशेषता यह थी कि उन्होंने संस्कृत के स्थान पर स्थानीय एवं लोकभाषाओं का प्रयोग किया, ताकि आम जनता उनका संदेश सरलता से समझ सके। इससे हिंदी, पंजाबी, बंगला, तेलुगू, कन्नड़ और तमिल जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यिक विकास को बल मिला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कबीर ने “सधुक्कड़ी” भाषा में रचनाएं कीं, जो हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी और खड़ी बोली का मिश्रण थी, जबकि गुरु नानक की वाणी पंजाबी में संकलित होकर बाद में “गुरु ग्रंथ साहिब” का हिस्सा बनी।
6. भक्ति संस्कृति का भारत में पुनर्जन्म हुआ-
U.P.P.C.S. (pre) 1993
उत्तर-(d)
भक्ति आंदोलन का पुनरुत्थान पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में हुआ, जब कबीर, नानक, तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई जैसे संतों ने इसका नेतृत्व संभाला और इसे उत्तर भारत में व्यापक जनाधार दिया। इस काल में निर्गुण और सगुण दोनों धाराएं समानांतर रूप से विकसित हुईं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी काल में सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक (1469-1539) ने भी एकेश्वरवाद और समानता का संदेश दिया, जिसने आगे चलकर एक स्वतंत्र धार्मिक परंपरा का रूप लिया।
7. रामानुजाचार्य किससे संबंधित है?
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
उत्तर-(c)
रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्तक थे, जिसके अनुसार ब्रह्म अद्वैत होते हुए भी जीव और जगत की विशेषताओं से युक्त है, अर्थात ईश्वर और जीव के बीच भेद होते हुए भी एक आत्मिक संबंध विद्यमान है। उन्होंने सगुण भक्ति पर विशेष बल दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानुज 11वीं-12वीं शताब्दी में हुए तथा श्रीरंगम को उनकी साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। उन्हें दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक और सबसे प्रभावशाली आचार्यों में गिना जाता है, जिनका प्रभाव बाद में रामानंद जैसे उत्तर भारतीय संतों पर भी पड़ा।
8. “कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से उसका धर्म-संप्रदाय या जाति न पूछे।” यह कथन है-
U.P.P.C.S. (pre) 2009
उत्तर-(b)
यह कथन संत रामानंद का है, जिन्होंने जाति-पांति के भेदभाव को नकारते हुए सभी वर्गों के लिए भक्ति का द्वार खोला। उनके शिष्यों में कबीर (जुलाहा), रैदास (चर्मकार), सेना (नाई) तथा पद्मावती (महिला) जैसे विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानंद मूलतः रामानुज संप्रदाय से जुड़े थे, परंतु उन्होंने राम भक्ति को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया और हिंदी भाषा में उपदेश देकर “रामानंदी संप्रदाय” की स्थापना की, जो आज भी उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रभावशाली वैष्णव संप्रदायों में से एक है।
9. सुप्रसिद्ध मध्यकालीन संत शंकरदेव संबंधित थे-
U.P.P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(b)
शंकरदेव वैष्णव संप्रदाय से संबंधित थे और उन्होंने असम में कृष्ण-केंद्रित एकेश्वरवादी भक्ति परंपरा का प्रचार किया, जिसमें मूर्तिपूजा के बजाय नाम-स्मरण और सामूहिक कीर्तन पर बल दिया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उनके द्वारा स्थापित “सत्र” (मठ जैसी संस्थाएं) आज भी असम में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में “कीर्तन घोषा” शामिल है, जो असमिया वैष्णव साहित्य की आधारशिला मानी जाती है।
10. मध्ययुगीन भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में सूफी संत निम्नलिखित में से किस तरह के आचरण का निर्वाह करते थे?
1. ध्यानसाधना और श्वास-नियमन
2. एकांत में कठोर यौगिक व्यायाम
3.श्रोताओं में आध्यात्मिक हर्षोन्माद उत्पन्न करने के लिए पवित्र गीतों का गायन
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए-
1. ध्यानसाधना और श्वास-नियमन
2. एकांत में कठोर यौगिक व्यायाम
3.श्रोताओं में आध्यात्मिक हर्षोन्माद उत्पन्न करने के लिए पवित्र गीतों का गायन
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिए-
I.A.S (Pre) 2012
उत्तर-(d)
सूफी संत आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने के लिए ध्यानसाधना, श्वास-नियमन और एकांत में कठोर योगाभ्यास करते थे, साथ ही वे “समा” (सूफी संगीत सभा) के माध्यम से कव्वाली एवं पवित्र गीत गाकर श्रोताओं में आध्यात्मिक उन्माद (वज्द) उत्पन्न करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सूफी सिलसिलों में चिश्ती सिलसिला (भारत में सर्वाधिक प्रभावशाली) समा को विशेष महत्व देता था, जबकि सुहरावर्दी सिलसिला राजसत्ता से निकटता रखता था और समा के प्रति उतना उदार नहीं था। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को भारत में चिश्ती सिलसिले का संस्थापक माना जाता है।
11. निम्नलिखित में से किस भक्ति संत ने अपने संदेश के प्रचार के लिए सबसे पहले हिंदी का प्रयोग किया?
I.A.S. (Pre) 2002
उत्तर-(c)
उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक रामानंद ने संस्कृत के स्थान पर हिंदी भाषा में अपने उपदेश देकर आम जनता तक भक्ति का संदेश पहुंचाया। उनका जन्म 1299 ई. के आसपास प्रयाग के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था और उन्होंने राम-सीता की सगुण उपासना को समाज के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानंद मूलतः रामानुज संप्रदाय की परंपरा से जुड़े थे, परंतु उन्होंने अपने संप्रदाय को जाति-बंधन से मुक्त कर दिया और उनके 12 प्रमुख शिष्यों में कबीर, रैदास, धन्ना, सेना जैसे विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के संत शामिल थे।
12. बीजक का रचयिता कौन है?
M.P.P.C.S. (Pre) 2000
उत्तर-(b)
बीजक कबीर की वाणी का संकलन है, जो कबीरपंथी संप्रदाय का प्रमुख धार्मिक ग्रंथ माना जाता है और इसमें साखी, सबद तथा रमैनी शीर्षकों के अंतर्गत उनके दोहे संगृहीत हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कबीर की वाणी का एक अन्य महत्वपूर्ण संकलन “कबीर ग्रंथावली” भी है, तथा उनकी रचनाएं सिख धर्मग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहिब” में भी सम्मिलित की गई हैं, जो उनके प्रभाव की व्यापकता को दर्शाता है।
13. शुद्ध अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया था-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
उत्तर-(b)
वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत (शुद्ध अद्वैतवाद) दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ब्रह्म और जीव में कोई मौलिक भेद नहीं है तथा माया का कोई आवरण ब्रह्म पर नहीं पड़ता। उन्होंने इसी आधार पर पुष्टिमार्ग की स्थापना की, जिसमें कृष्ण-भक्ति को केंद्रीय स्थान दिया गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभाचार्य को वैश्वानर (अग्नि) का अवतार माना जाता है, और उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने पुष्टिमार्ग को व्यवस्थित रूप देकर “अष्टछाप” नामक आठ कवियों के समूह (जिसमें सूरदास शामिल थे) को संगठित किया।
14. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
A. बल्लभाचार्य 1. द्वैतवाद
B. रामानुज 2. पुष्टिमार्ग
C. मध्वाचार्य 3. विशिष्टाद्वैत
D. शंकर 4. अद्वैतवाद
कूट :
A; B; C; D
सूची-I सूची-II
A. बल्लभाचार्य 1. द्वैतवाद
B. रामानुज 2. पुष्टिमार्ग
C. मध्वाचार्य 3. विशिष्टाद्वैत
D. शंकर 4. अद्वैतवाद
कूट :
A; B; C; D
U.P. R.O./A.R.O. (Mains) 2017
उत्तर-(c)
सही सुमेलन है: वल्लभाचार्य-पुष्टिमार्ग, रामानुज-विशिष्टाद्वैत, मध्वाचार्य-द्वैतवाद तथा शंकर-अद्वैतवाद। इन चारों आचार्यों ने वेदांत दर्शन की अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत कीं, जो ब्रह्म और जीव के संबंध को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से समझाती हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: निम्बार्काचार्य ने इन चारों से भिन्न “द्वैताद्वैतवाद” (भेदाभेदवाद) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीव और ब्रह्म में भेद और अभेद दोनों एक साथ सत्य हैं, जैसे सूर्य और उसकी किरणों में संबंध होता है।
15. मध्यकालीन भारत के निम्नलिखित में से किस संत का जन्म प्रयाग में हुआ था ?
U.P.P.C.S. (Mains) 2010
उत्तर-(b)
रामानंद का जन्म प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जबकि रैदास का जन्म वाराणसी में, तुलसीदास का चित्रकूट के राजापुर में तथा कुम्भनदास का जन्म ब्रजभूमि क्षेत्र में हुआ माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानंद ने प्रयाग तथा काशी में शिक्षा प्राप्त की और बाद में उन्होंने काशी को ही अपनी भक्ति-साधना तथा शिष्य-परंपरा के प्रसार का प्रमुख केंद्र बनाया।
16. कबीर एवं धरमदास के मध्य संवादों के संकलन का शीर्षक है-
U.P. U.D.A./L.D.A. (Pre) 2002
U.P. P.C.S. (Pre) 2003
U.P. P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(b)
कबीर और उनके प्रमुख शिष्य धरमदास के बीच हुए संवादों का संकलन “अमरमूल” कहलाता है, जबकि सबद, साखी और रमैनी कबीर की स्वतंत्र काव्य रचनाएं मानी जाती हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: धरमदास कबीरपंथ की एक प्रमुख शाखा “धरमदासी शाखा” के संस्थापक माने जाते हैं, जो छत्तीसगढ़ क्षेत्र में विशेष रूप से प्रभावशाली रही और आज भी वहां कबीरपंथ की सबसे बड़ी शाखाओं में गिनी जाती है।
17. महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली कहां है ?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2015
उत्तर-(d)
पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य का जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य में रायपुर के निकट स्थित चम्पारण्य में एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिनके पिता लक्ष्मण भट्ट दक्षिण भारत के मूल निवासी थे। जन्म के समय की परिस्थितियों के कारण उन्हें वैश्वानर (अग्नि) का अवतार माना गया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वल्लभाचार्य ने अपने जीवनकाल में तीन बार संपूर्ण भारत की परिक्रमा की और उनका अधिकांश साधना-काल ब्रज क्षेत्र, काशी तथा प्रयाग में व्यतीत हुआ, जहां उन्होंने कृष्ण-भक्ति का प्रचार किया।
18. कबीर शिष्य थे-
U.P. Lower Sub. (Pre) 2002
उत्तर-(b)
कबीर संत रामानंद के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं, और उन्होंने अपने गुरु से मिली जाति-निरपेक्ष भक्ति की शिक्षा को अपनी निर्गुण-निराकार उपासना पद्धति में आगे विकसित किया। लोक-परंपरा के अनुसार उनका पालन-पोषण जुलाहा दंपत्ति नीरू और नीमा ने वाराणसी में किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कबीर के अनुयायियों द्वारा स्थापित “कबीरपंथ” आज भी उत्तर भारत तथा छत्तीसगढ़ में एक जीवंत धार्मिक परंपरा है, और उनके दोहे हिंदी साहित्य में निर्गुण भक्ति काव्य की सर्वोच्च कृतियों में गिने जाते हैं।
19. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
1.बीजक संत दादू दयाल के उपदेशों का एक संकलन है।
2. पुष्टिमार्ग के दर्शन को मध्वाचार्य ने प्रतिपादित किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
1.बीजक संत दादू दयाल के उपदेशों का एक संकलन है।
2. पुष्टिमार्ग के दर्शन को मध्वाचार्य ने प्रतिपादित किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
I.A.S. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
दोनों कथन असत्य हैं क्योंकि बीजक संत दादू दयाल का नहीं बल्कि कबीर का उपदेश-संकलन है, तथा पुष्टिमार्ग का प्रतिपादन मध्वाचार्य ने नहीं बल्कि वल्लभाचार्य ने किया था। मध्वाचार्य द्वैतवाद के प्रवर्तक थे, जो ब्रह्म और जीव को पूर्णतः भिन्न मानता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: दादू दयाल की वाणी का संकलन “दादू अनुभव वाणी” या “दादूवाणी” कहलाता है, तथा उन्होंने अहमदाबाद और राजस्थान क्षेत्र में एक निर्गुण भक्ति परंपरा “दादूपंथ” की स्थापना की।
20. निम्नलिखित में कौन सुमेलित है?
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
सही सुमेलन विकल्प (c) में है, क्योंकि द्वैतवाद के प्रवर्तक मध्वाचार्य थे, जबकि अद्वैतवाद के शंकराचार्य, विशिष्टाद्वैतवाद के रामानुजाचार्य तथा शुद्धाद्वैतवाद (पुष्टिमार्ग) के वल्लभाचार्य थे। द्वैताद्वैतवाद (भेदाभेदवाद) का प्रतिपादन निम्बार्काचार्य ने किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मध्वाचार्य कर्नाटक के उडुपी क्षेत्र से संबंधित थे और उन्होंने कृष्ण की अष्ट मठ पूजा-पद्धति की स्थापना की, जो आज भी उडुपी में प्रचलित है तथा दक्षिण भारत की वैष्णव परंपरा का एक प्रमुख केंद्र मानी जाती है।
21. मीराबाई समकालीन थीं –
U.P.P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(b)
मीराबाई (1498-1557 ई.) चैतन्य महाप्रभु (1486-1534 ई.) की समकालीन थीं, दोनों ने ही सोलहवीं शताब्दी में कृष्ण-भक्ति की सगुण धारा को प्रबल रूप से प्रवाहित किया, यद्यपि दोनों की भक्ति-पद्धतियों तथा क्षेत्रों में भिन्नता थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुलसीदास (1532-1623) और गुरुनानक (1469-1539) भी लगभग इसी कालखंड के आसपास हुए, जिससे स्पष्ट होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी भक्ति आंदोलन के पुनरुत्थान का स्वर्णिम काल था, जब एक साथ कई महान संत सक्रिय थे।
22. जिसके शासन में गुरुनानक देव ने सिख धर्म की स्थापना की, वह कौन था ?
उत्तर-(b)
गुरुनानक (1469-1539 ई.) ने सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) के शासनकाल में सिख धर्म की नींव रखी। वे एकेश्वरवाद तथा निर्गुण-निराकार ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे और अवतारवाद को अस्वीकार करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: गुरुनानक ने अपने जीवनकाल में चार प्रमुख उदासियां (धर्म-यात्राएं) कीं, जिनमें वे मक्का-मदीना, श्रीलंका तथा तिब्बत तक गए, और उनकी वाणी बाद में सिखों के पवित्र ग्रंथ “आदि ग्रंथ” (गुरु ग्रंथ साहिब) का आधार बनी।
23. भगवान शिव की प्रतिष्ठा में कितने ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
भारत में शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, जो केदारनाथ, विश्वनाथ, वैद्यनाथ, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, नागेश्वर, सोमनाथ, त्र्यंबकेश्वर, घृष्णेश्वर, भीमशंकर, मल्लिकार्जुन तथा रामेश्वरम में स्थित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ज्योतिर्लिंग की अवधारणा भक्ति आंदोलन से पूर्व की है, परंतु मध्यकाल में शैव भक्ति परंपरा के विस्तार के साथ इन तीर्थ स्थलों का महत्व और अधिक बढ़ा, तथा सोमनाथ मंदिर को मध्यकाल में कई बार आक्रमणों का सामना करना पड़ा था।
24. संत घासीदास के पिताजी का क्या नाम था ?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(d)
संत घासीदास का जन्म दिसंबर 1756 में छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में हुआ था, उनके पिता का नाम महंगूदास तथा माता का नाम अमरौतीन था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: घासीदास ने “सतनाम पंथ” की स्थापना की, जिसमें मूर्तिपूजा तथा जाति-भेद का विरोध करते हुए सत्य के नाम की उपासना पर बल दिया गया, और यह पंथ आज भी छत्तीसगढ़ के दलित समुदाय विशेषकर सतनामी समाज में व्यापक रूप से प्रचलित है।
25. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थान गुरुनानक का जन्म स्थल था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
गुरुनानक का जन्म 15 अप्रैल 1469 को ननकाना साहिब (तलवंडी) में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, और उनका देहांत 1539 ई. में करतारपुर (डेरा बाबा नानक) में हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नांदेर (महाराष्ट्र) सिखों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह का देहांत यहीं हुआ था, तथा यहां स्थित हजूर साहिब गुरुद्वारा सिखों के पांच तख्तों में से एक है।
26. रामानुज के अनुयायियों को कहा जाता है-
U.P.P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य सगुण ईश्वर विष्णु की उपासना में विश्वास रखते थे, अतः उनके अनुयायी वैष्णव कहलाए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रामानुज ने भक्ति के साथ-साथ प्रपत्ति (शरणागति) के सिद्धांत पर भी बल दिया, जिसके अनुसार भक्त को पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में समर्पित हो जाना चाहिए, और उनका प्रभाव आगे चलकर उत्तर भारत में रामानंद के माध्यम से राम-भक्ति परंपरा के रूप में फैला।
27. मलूकदास एक संत कवि थे-
U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008
उत्तर-(d)
संत मलूकदास का जन्म 1574 ई. में उत्तर प्रदेश के कड़ा (वर्तमान कौशाम्बी जिला) में लाला सुंदरदास खत्री के परिवार में हुआ था, और वे निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मलूकदास का प्रसिद्ध दोहा “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम” ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता के भाव को दर्शाता है, तथा उनकी शिष्य-परंपरा को “मलूकदासी संप्रदाय” के नाम से जाना जाता है।
28. ईश्वर केवल मनुष्य के सद्गुण को पहचानता है तथा उसकी जाति नहीं पूछता; आगामी दुनिया में कोई जाति नहीं होगी। यह सिद्धांत किस भक्ति संत का है?
R.A.S. / R. T. S (Pre) 2010
उत्तर-(c)
गुरुनानक का यह मत था कि ईश्वर मनुष्य के कर्मों और गुणों को देखता है, न कि उसकी जाति को, क्योंकि परलोक में जाति का कोई अस्तित्व नहीं रहता। इसी समानता के सिद्धांत के आधार पर उन्होंने गुरु का लंगर की शुरुआत की, जहां जाति भेद के बिना सब एक साथ भोजन करते थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: लंगर की परंपरा आज भी हर गुरुद्वारे में जारी है और यह सिख धर्म के समानता तथा सेवा (निःस्वार्थ सेवा) के मूल सिद्धांतों में से एक मानी जाती है।
29. निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही कालानुक्रम है?
I.A.S. (Pre) 2004
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
Jharkhand P.C.S. (Pre) 2011
उत्तर-(a)
कालक्रम की दृष्टि से शंकराचार्य लगभग आठवीं शताब्दी में, रामानुज 1017-1137 ई. के मध्य तथा चैतन्य महाप्रभु 1486-1534 ई. के मध्य हुए, अतः सही अनुक्रम शंकराचार्य-रामानुज-चैतन्य है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के प्रचार हेतु भारत के चार कोनों में चार मठों (श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी, ज्योतिर्मठ) की स्थापना की, जो आज भी हिंदू धर्म के प्रमुख पीठों में गिने जाते हैं।
30. निम्न में से भक्ति संतों का सही तैथिक (कालानुक्रम) अनुक्रम चुनिए-
U.P.P.C.S. (Mains) 2014
उत्तर-(a)
जन्म-वर्ष के आधार पर सही कालानुक्रम है- कबीर (1398-1518), गुरुनानक (1469-1539), चैतन्य (1486-1534) तथा मीराबाई (1498-1557)। इस प्रकार ये सभी संत लगभग एक ही स्वर्णिम कालखंड (पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी) में सक्रिय रहे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: कबीर को इस सूची में सबसे प्राचीन माना जाता है और उन्हें निर्गुण भक्ति धारा का सबसे प्रभावशाली प्रवर्तक माना जाता है, जिनका प्रभाव आगे चलकर नानक तथा दादू जैसे संतों पर भी पड़ा।
31. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए-
सूची-I (भक्ति संत) सूची-II (व्यवसाय)
सूची-I (भक्ति संत) सूची-II (व्यवसाय)
I.A.S. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
सही सुमेलन है: नामदेव-दर्जी, कबीर-जुलाहा, रविदास-मोची तथा सेना-नाई। यह तथ्य भक्ति आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता को दर्शाता है कि इसके संत निम्न एवं शिल्पकार जातियों से आए थे, जिससे यह आंदोलन सामाजिक रूप से व्यापक जनाधार वाला बना।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रविदास (रैदास) को कबीर के समान ही रामानंद का शिष्य माना जाता है, और उनकी वाणी सिख धर्मग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहिब” में भी संकलित है, जो जाति-भेद के विरुद्ध उनके संदेश की व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।
32. निम्नलिखित में से कौन इस्लाम से प्रभावित था?
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Mains) 2010
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
U.P. U.D.A./L.D.A. (Spl.) (Pre) 2010
उत्तर-(c)
चैतन्य, मीराबाई तथा वल्लभाचार्य सगुण भक्ति परंपरा के अंतर्गत कृष्ण-उपासक थे, जबकि नामदेव निर्गुण संत थे जो मूर्तिपूजा, व्रत, तीर्थयात्रा और कठोर शारीरिक साधना का विरोध करते थे, जिससे इस्लाम की एकेश्वरवादी और मूर्तिपूजा-विरोधी विचारधारा से उनकी निकटता झलकती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नामदेव महाराष्ट्र की वरकरी संप्रदाय परंपरा से जुड़े थे तथा उनकी रचनाएं मराठी के साथ-साथ हिंदी और पंजाबी में भी मिलती हैं, और उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल की गई है।
33. निम्नलिखित संतों को उनके कालानुक्रम में नियोजित कीजिए-
1. कबीर 2. नामदेव
3. मीराबाई 4. नानक
कूट :
1. कबीर 2. नामदेव
3. मीराबाई 4. नानक
कूट :
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
जन्मकाल के आधार पर सही अनुक्रम है- नामदेव (1270-1350), कबीर (1398-1518), गुरुनानक (1469-1539) तथा मीराबाई (1498-1557)। इससे स्पष्ट होता है कि नामदेव भक्ति आंदोलन की पहली पीढ़ी के संतों में से थे, जबकि शेष तीनों उत्तर भारतीय पुनरुत्थान काल (पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी) से जुड़े हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नामदेव को महाराष्ट्र की वरकरी परंपरा में पंढरपुर के विट्ठल की भक्ति के प्रमुख प्रचारकों में गिना जाता है और वे कबीर से लगभग एक शताब्दी पूर्व हुए थे।
34. चैतन्य महाप्रभु किस संप्रदाय से संबद्ध हैं?
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(a)
चैतन्य महाप्रभु (बचपन का नाम निमाई) वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत कृष्ण-भक्ति से जुड़े थे, जिन्होंने नदिया (बंगाल) से लेकर वृंदावन तक कीर्तन-जुलूसों के माध्यम से कृष्ण-लीलाओं का प्रचार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: चैतन्य द्वारा प्रवर्तित परंपरा को “गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय” कहा जाता है, जिसमें सामूहिक संकीर्तन (नाम-जप और नृत्य सहित भक्ति गायन) को भक्ति का सर्वोच्च मार्ग माना गया, और वृंदावन में उनके अनुयायियों द्वारा गोस्वामी परंपरा की स्थापना की गई।
35. राग-गोविंद के रचनाकार हैं-
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
मीराबाई ने कृष्ण-भक्ति में समर्पित कई ग्रंथों की रचना की, जिनमें नरसी जी का मायरा, गीत-गोविंद टीका, राग-गोविंद तथा राग-सोरठ प्रमुख हैं, और उनके भजनों का संकलन “मीराबाई की पदावली” में हुआ है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मीराबाई की रचनाएं मुख्यतः राजस्थानी, ब्रज तथा गुजराती भाषाओं के मिश्रण में मिलती हैं, और वे अपने पदों में स्वयं को कृष्ण की प्रेयसी (सखी) के रूप में चित्रित करती थीं, जो सगुण भक्ति की माधुर्य भाव परंपरा का उदाहरण है।
36. निम्नलिखित भक्ति संतों पर विचार कीजिए-
1. दादू दयाल 2. गुरुनानक
3. त्यागराज
इनमें से कौन उस समय उपदेश देता था/देते थे, जब लोदी वंश का पतन हुआ तथा बाबर सत्तारूढ़ हुआ?
1. दादू दयाल 2. गुरुनानक
3. त्यागराज
इनमें से कौन उस समय उपदेश देता था/देते थे, जब लोदी वंश का पतन हुआ तथा बाबर सत्तारूढ़ हुआ?
I.A.S. (Pre) 2013
उत्तर-(b)
पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी की पराजय के समय केवल गुरुनानक (1469-1539) उपदेशरत थे, जबकि दादू दयाल (1544-1603) एवं त्यागराज (1767-1847) बाद के काल में हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: त्यागराज कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के महानतम संगीतकारों में गिने जाते हैं तथा उन्हें त्रिमूर्ति (त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री) में सर्वाधिक प्रसिद्ध माना जाता है, जबकि दादू दयाल ने राजस्थान में निर्गुण भक्ति की “दादूपंथ” परंपरा स्थापित की।
37. प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीरा के पति का नाम था-
R.A.S./R.T.S. (Pre) 1997
उत्तर-(b)
मीराबाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र राजकुमार भोजराज से हुआ था, परंतु विवाह के कुछ वर्षों बाद ही भोजराज का देहांत हो गया, जिसके पश्चात मीराबाई ने पूर्णतः कृष्ण-भक्ति को समर्पित जीवन अपनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पति की मृत्यु के बाद मेवाड़ राजपरिवार द्वारा विरोध किए जाने पर भी मीराबाई ने सांसारिक बंधनों को त्याग दिया और अंततः वृंदावन तथा द्वारका में समय व्यतीत करते हुए भक्ति-साधना में लीन रहीं।
38. तुलसीदास किसके समकालीन थे?
उत्तर-(a)
तुलसीदास (लगभग 1532-1623 ई.) मुगल सम्राट अकबर (शासनकाल 1556-1605) तथा जहांगीर (शासनकाल 1605-1627) दोनों के समकालीन थे, और उनका अधिकांश साहित्यिक जीवन इसी काल में व्यतीत हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुलसीदास द्वारा रचित “रामचरितमानस” अवधी भाषा में लिखी गई तथा यह सगुण भक्ति काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय कृतियों में से एक मानी जाती है, और उन्होंने अधिकांश जीवन काशी (वाराणसी) में व्यतीत किया।
39. भक्त तुकाराम कौन-से मुगल सम्राट के समकालीन थे?
I.A.S. (Pre) 2006
उत्तर-(c)
संत तुकाराम का काल लगभग 1608 से 1649 ई. माना जाता है, जो मुगल शासक जहांगीर (1605-1627) तथा शाहजहां (1628-1658) के शासनकाल में आता है; विकल्पों में शाहजहां न होने के कारण जहांगीर सही उत्तर है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुकाराम महाराष्ट्र की वरकरी संप्रदाय परंपरा से जुड़े थे और उन्होंने विठोबा (विट्ठल) की भक्ति में मराठी भाषा में “अभंग” नामक भक्ति-पदों की रचना की, जो आज भी महाराष्ट्र में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
40. निम्नलिखित में से कौन वरकरी संप्रदाय का संत था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2002
U.P.P. C.S. (Mains) 2004
U.P.P. C.S. (Mains) 2004
उत्तर-(c)
नामदेव वरकरी संप्रदाय की स्थापना-परंपरा से जुड़े प्रमुख संत थे, जिन्हें बिसोवा खेचर से रहस्यवादी दीक्षा प्राप्त हुई और उन्होंने ईश्वर के सर्वव्यापी निर्गुण स्वरूप का प्रचार किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वरकरी परंपरा में ज्ञानेश्वर को इस संप्रदाय का प्रारंभिक प्रवर्तक माना जाता है, जिन्होंने “ज्ञानेश्वरी” नामक भगवद्गीता की मराठी टीका लिखी, और नामदेव को इस परंपरा को व्यापक जनाधार देने का श्रेय दिया जाता है।
41. निम्नलिखित में से कौन, भक्ति आंदोलन का प्रस्तावक नहीं था?
I.A.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
तुकाराम, त्यागराज तथा वल्लभाचार्य मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रतिनिधि संत हैं, जबकि नागार्जुन ईसा की आरंभिक शताब्दियों में हुए बौद्ध शून्यवाद (माध्यमिक दर्शन) के प्रतिपादक थे, जिनका भक्ति आंदोलन से कोई संबंध नहीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नागार्जुन को महायान बौद्ध दर्शन का सबसे प्रभावशाली दार्शनिक माना जाता है, तथा उनका “मूलमध्यमककारिका” ग्रंथ शून्यता के सिद्धांत की आधारशिला है।
42. वरकरी संप्रदाय की मुख्य पीठ अवस्थित है-
R.A.S./ R.T.S. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
वरकरी संप्रदाय की मुख्य पीठ महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित है, जहां विठोबा (विट्ठल, जिन्हें कृष्ण का अवतार माना जाता है) की पूजा होती है, और ज्ञानेश्वर, नामदेव तथा तुकाराम इस संप्रदाय के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: वरकरी अनुयायी प्रतिवर्ष पंढरपुर तक पैदल “वारी” नामक तीर्थयात्रा निकालते हैं, जो आज भी महाराष्ट्र की एक जीवंत सांस्कृतिक-धार्मिक परंपरा है और लाखों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं।
43. निम्नलिखित युग्मों में कौन सही सुमेलित नहीं है ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
“रसिक प्रिया” रसखान की नहीं बल्कि केशवदास की रचना है, जिन्होंने “रामचन्द्रिका” तथा “कविप्रिया” जैसे अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे; शेष तीनों युग्म सही सुमेलित हैं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रसखान (मूल नाम सैयद इब्राहिम) एक मुस्लिम कवि थे, फिर भी उन्होंने कृष्ण-भक्ति में हिंदी काव्य रचा, जो भक्ति आंदोलन की धार्मिक सहिष्णुता तथा सांप्रदायिक सद्भाव को दर्शाता है।
44. रामचरितमानस नामक ग्रंथ के रचयिता थे-
Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007
उत्तर-(a)
रामचरितमानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में की, जो संस्कृत के वाल्मीकि रामायण से प्रेरित होते हुए भी अपनी भक्तिपूर्ण शैली और लोकभाषा के प्रयोग के कारण उत्तर भारत में अत्यंत लोकप्रिय हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुलसीदास ने इस ग्रंथ की रचना काशी में 1574 ई. के आसपास प्रारंभ की थी, तथा इसे सात कांडों (बालकांड से उत्तरकांड तक) में विभाजित किया गया है।
45. विनय पत्रिका के रचयिता हैं-
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2018
उत्तर-(a)
विनय पत्रिका तुलसीदास की एक प्रमुख रचना है, जिसमें उन्होंने राम के प्रति विनम्र प्रार्थना तथा शरणागति के भाव को पदों के माध्यम से व्यक्त किया है। यह उनके पांच बड़े ग्रंथों में गिनी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: विनय पत्रिका ब्रजभाषा में रचित है, जबकि रामचरितमानस अवधी में, जो दर्शाता है कि तुलसीदास दोनों प्रमुख हिंदी बोलियों में समान दक्षता रखते थे।
46. निम्न में से कौन-सी रचना संत तुलसीदास की नहीं है?
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(d)
तुलसीदास की 12 प्रामाणिक रचनाओं में गीतावली, कवितावली, दोहावली, रामचरितमानस तथा विनय पत्रिका जैसे पांच बड़े ग्रंथ तथा पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण जैसे सात छोटे ग्रंथ शामिल हैं, परंतु “साहित्य रत्न” उनकी रचना नहीं है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: तुलसीदास की सभी रचनाओं में रामभक्ति और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श चरित्र का चित्रण केंद्रीय विषय रहा है, जो सगुण भक्ति धारा की विशिष्ट पहचान है।
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