वल्लभाचार्य (1479–1531 ई.) : जीवन, शुद्धाद्वैत दर्शन, पुष्टिमार्ग एवं योगदान

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वल्लभाचार्य : शुद्धाद्वैत वेदान्त (भेदाभेदवाद) के प्रवर्तक

वल्लभाचार्य मध्यकालीन भारत के महान वैष्णव आचार्य तथा शुद्धाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। उन्होंने पुष्टिमार्ग की स्थापना की तथा श्रीकृष्ण (श्रीनाथजी) की भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया।

➣ वल्लभाचार्य के जन्मस्थान के सम्बन्ध में दो प्रमुख मत प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार उनका जन्म 1479 ई. में वाराणसी में हुआ, जबकि दूसरे एवं अधिक प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म छत्तीसगढ़ के चंपारण्य (चंपारण) में हुआ।

➣ इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम इल्लम्मागारू (इलम्मा) था। इनका परिवार मूलतः तेलंगाना के तैलंग ब्राह्मण समुदाय से सम्बन्धित था।

पुष्टिमार्ग की परम्परा के अनुसार समय से पूर्व जन्म होने के कारण इन्हें मृत समझ लिया गया था, किन्तु बाद में सुरक्षित प्राप्त होने पर इन्हें भगवान अग्नि (वैश्वानर) का अवतार माना गया।

➣ बाल्यावस्था में ही उन्होंने वेद, पुराण, स्मृति तथा षड्दर्शन का गहन अध्ययन कर लिया और काशी के विद्वानों के मध्य अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

➣ परम्परा के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में कृष्णदेवराय के शासनकाल में आयोजित शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त करने पर उन्हें ‘महाप्रभु’ की उपाधि प्रदान की गई।

➣ वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत वेदान्त का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार ब्रह्म (श्रीकृष्ण), जीव तथा जगत तीनों वास्तविक हैं। जगत ब्रह्म का ही स्वरूप है, इसलिए उसे माया या मिथ्या नहीं माना जा सकता।

➣ उनके अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं तथा भगवद्-कृपा (अनुग्रह) के द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी सिद्धान्त पर आधारित उनके भक्ति मार्ग को पुष्टिमार्ग (अनुग्रह मार्ग) कहा जाता है।

विषय शुद्धाद्वैत वेदान्त का सिद्धान्त
परम सत्य भगवान श्रीकृष्ण (परब्रह्म)
जीव ब्रह्म का वास्तविक अंश।
जगत वास्तविक है, माया नहीं।
मोक्ष भगवद्-कृपा (पुष्टि) एवं भक्ति द्वारा।

➣ वल्लभाचार्य ने मर्यादा मार्ग की अपेक्षा पुष्टिमार्ग को श्रेष्ठ माना। उनके अनुसार भगवान की कृपा प्राप्त होने पर ही जीव का आध्यात्मिक कल्याण सम्भव है।

श्रीनाथजी एवं पुष्टिमार्ग

➣ वल्लभाचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण की श्रीनाथजी स्वरूप में उपासना को विशेष महत्व दिया तथा ब्रजमण्डल (विशेषतः गोवर्धन) को अपने धार्मिक कार्यों का प्रमुख केन्द्र बनाया।

➣ परम्परा के अनुसार उनके शिष्य पूरनमल खत्री ने गोवर्धन में श्रीनाथजी के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो पुष्टिमार्ग का प्रमुख केन्द्र बना। बाद में औरंगज़ेब के काल में

➣ श्रीनाथजी की मूर्ति को सुरक्षित रूप से नाथद्वारा (राजस्थान) ले जाया गया, जहाँ आज भी यह सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल है।

➣ वर्तमान में नाथद्वारा पुष्टिमार्ग का सबसे प्रमुख तीर्थ माना जाता है, जहाँ देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीनाथजी के दर्शन के लिए आते हैं।

अष्टछाप कवि

➣ वल्लभाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ (गुसाईंजी) के संरक्षण में अष्टछाप के नाम से प्रसिद्ध आठ कृष्णभक्त कवियों की परम्परा विकसित हुई। इन कवियों ने ब्रजभाषा में कृष्ण-भक्ति साहित्य की समृद्ध परम्परा का विकास किया।

➣ अष्टछाप के कवियों ने ब्रजभाषा में श्रीकृष्ण की बाल-लीला, रास-लीला तथा भक्ति-भाव का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया। इनके काव्य ने उत्तर भारत में कृष्ण-भक्ति साहित्य तथा भक्ति आन्दोलन को व्यापक लोकप्रियता प्रदान की।

प्रत्यक्ष रूप से वल्लभाचार्य से सम्बद्ध विट्ठलनाथ से सम्बद्ध
सूरदास गोविन्दस्वामी
कुम्भनदास छीतस्वामी
परमानन्ददास चतुर्भुजदास
कृष्णदास नन्ददास

प्रमुख रचनाएँ

➣ वल्लभाचार्य की प्रमुख रचनाओं में अणुभाष्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य), सुबोधिनी (भागवत पुराण पर टीका), तत्त्वार्थदीपनिबन्ध, सिद्धान्त रहस्य तथा षोडश ग्रन्थ प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों में शुद्धाद्वैत वेदान्त, भगवद्-कृपा (पुष्टि) तथा श्रीकृष्ण भक्ति के सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन मिलता है।

ग्रन्थ संक्षिप्त परिचय
अणुभाष्य ब्रह्मसूत्र पर आधारित भाष्य, जिसमें शुद्धाद्वैत वेदान्त का प्रतिपादन किया गया है।
सुबोधिनी भागवत पुराण की प्रसिद्ध टीका, जिसमें श्रीकृष्ण भक्ति का विस्तार से वर्णन मिलता है।
तत्त्वार्थदीपनिबन्ध शुद्धाद्वैत दर्शन के प्रमुख सिद्धान्तों का विवेचन करने वाला ग्रन्थ।
सिद्धान्त रहस्य पुष्टिमार्ग एवं उसके मूल धार्मिक सिद्धान्तों का संक्षिप्त निरूपण।
षोडश ग्रन्थ पुष्टिमार्ग के मूल सिद्धान्तों और भक्ति-मार्ग का आधार माने जाने वाले सोलह ग्रन्थों का संग्रह।

मृत्यु

➣ परम्परा के अनुसार 1531 ई. में लगभग 52 वर्ष की आयु में वल्लभाचार्य ने काशी के हनुमान घाट पर गंगा में जल-समाधि ग्रहण की। इसे पुष्टिमार्ग की परम्परा में उनका ब्रह्मलीन होना माना जाता है।

जन्म : 1479 ई. | जन्मस्थान के सम्बन्ध में वाराणसी एवं चंपारण्य (छत्तीसगढ़) – दो प्रमुख मत प्रचलित हैं।

माता-पिता : लक्ष्मण भट्ट एवं इल्लम्मागारू

दर्शन : शुद्धाद्वैत वेदान्त

सम्प्रदाय : पुष्टिमार्ग

उपास्य : भगवान श्रीकृष्ण (श्रीनाथजी)

• प्रमुख केन्द्र : गोवर्धन एवं नाथद्वारा

मोक्ष का साधन : भगवद्-कृपा (पुष्टि) एवं भक्ति

प्रमुख ग्रन्थ : अणुभाष्य, सुबोधिनी, तत्त्वार्थदीपनिबन्ध, सिद्धान्त रहस्य एवं षोडश ग्रन्थ

अष्टछाप : सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास एवं नन्ददास

मृत्यु : 1531 ई. (परम्परागत मान्यता), काशी के हनुमान घाट पर जल-समाधि

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