कन्नौज का गहड़वाल वंश (1080-1194ई.)

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गहड़वाल वंश (11वीं – 12वीं शताब्दी) : कन्नौज की प्रमुख शक्ति

➣ प्रतिहार साम्राज्य के पतन के पश्चात कन्नौज तथा बनारस में जिस राजवंश का शासन स्थापित हुआ उसे गहड़वाल वंश कहा जाता है। यह चन्द्रवंशी थे।

➣ इस वंश के शासक हिन्दू धर्म व संस्कृत के पोषक थे। गहड़वालों का मूल निवास स्थल विन्ध्याचल का पर्वतीय वन प्रांत माना जाता था।

शासकशासनकालपरिचय / प्रमुख तथ्य
चन्द्रदेव1080 – 1100 ई.गहड़वाल वंश का संस्थापक, कन्नौज में सत्ता स्थापित की और प्रतिहारों के बाद उत्तर भारत में नई शक्ति के रूप में उभरे।
मदनपाल1104 – 1114 ई.अल्पकालीन शासक, साम्राज्य को स्थिर रखने का प्रयास किया लेकिन सीमित सफलता मिली।
गोविंद चन्द्र1114 – 1155 ई.सबसे शक्तिशाली गहड़वाल शासक, कन्नौज का स्वर्णकाल। उत्तर भारत में व्यापक प्रभाव और मजबूत प्रशासन स्थापित किया।
विजय चन्द्र1155 – 1169 ई.शासनकाल में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास, लेकिन बाहरी दबाव और राजनीतिक कमजोरियाँ बढ़ने लगीं।
जयचन्द्र1170 – 1194 ई.अंतिम शक्तिशाली शासक, पृथ्वीराज चौहान से संघर्ष के लिए प्रसिद्ध। तराइन के युद्ध (1192 ई.) के बाद मुहम्मद गोरी के आक्रमण से कन्नौज का पतन हो गया।

चन्द्रदेव (1080 – 1100 ई.) : कन्नौज में गहड़वाल सत्ता की स्थापना

➣ गुर्जर प्रतिहारों के बाद चन्द्रदेव ने कन्नौज में गहड़वाल वंश की स्थापना की। चन्द्रदेव ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

➣ गहड़वाल शासकों को काशी नरेश के रूप में भी जाना जाता था। क्योंकि बनारस इनके राज्य की पूर्वी सीमा के निकट था। दिल्ली के तोमरों ने भी उसकी अधीनता स्वीकार की।

➣ अभिलेखों में उसे परमभटारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर उपाधियों से सम्बोधित किया गया।

➣ बदायूँ तथा सेत-माहेत लेखों में चन्द्रदेव को कन्नौज का राजा (गाधिपुराधिप) कहा गया है।

➣ चन्द्रदेव का पुत्र मदनपाल को तुर्क आक्रमणकारियों ने कन्नौज पर आक्रमण करके उसे बंदी बना लिया। उसके पुत्र गोविंद चन्द्र ने संघर्ष के बाद उसे मुक्त कराया।

गोविंद चन्द्र (1114 – 1155 ई.) : गहड़वाल वंश का स्वर्णकाल

➣ चन्द्रदेव का पौत्र गोविन्द चन्द्र इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था उसने पालों से मगध जीता।

➣ गोविन्द चन्द्र ने सबसे पहले कलचुरि राजाओं द्वारा धारण की जाने वाली उपाधियां अश्वपति, गजपति, नरपति, राजत्रयाधिपति धारण किया था।

➣ उसने आधुनिक पश्चिमी बिहार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक का समस्त भाग अपने अधीन करके कन्नौज के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित किया। उसने पालों से मगध जीता तथा मालवा पर अधिकार किया।

➣ कश्मीर, गुजरात एवं चोल वंश के शासकों से गोविन्द चन्द्र के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। उसके कार्यकाल में कन्नौज को पुनः उसकी पुरानी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

➣ गोविन्द चन्द्र के समय में उसके मंत्री लक्ष्मीधर ने कल्पद्रुम नामक विधि ग्रंथ की रचना की थी। लक्ष्मीधर को मंत्र महिमा का आश्चर्य कहा गया है। तीर्थ विवेचन काण्ड भी लक्ष्मीघर ने लिखा।

➣ एक विद्वान् के रूप में भी गोविन्द्र चन्द्र बड़ा प्रसिद्ध था। उसे उसके लेखों में विविध विद्याविचार वायस्पति कहा गया है।

➣ गोविन्द चन्द्र की पत्नी पाल राजकुमारी कुमारदेवी बौद्ध थी। कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्मचक्रजिन विहार बनवाया। कुमारदेवी ने अशोक द्वारा सारनाथ में निर्मित धर्मराज का स्तूप का छटा परिवर्धन करवाया।

➣ कुमारदेवी के सारनाथ लेख में गोबिन्दचन्द्र को विष्णु का अवतार कहा गया है,

➣ गोविन्द चन्द्र स्वयं बढ़ा विद्वान था। उसने विविधविद्याविचारयाचस्पति की व्याधि ग्रहण की।

➣ उसने उड़ीसा के बौद्ध मिनु शाक्य रश्चित तथा चोल राज्य के बौद्ध बागेश्वर रश्चित का स्वागत किया और उनके द्वारा संचालित जेतवन बिहार को 6 गाँव दान में दिये।

➣ गोविन्द्र चन्द ने कल्चुरी सिक्कों की नकल पर बैठी हुई लक्ष्मी शैली के सोने, चाँदी एवं तांबे के सिक्के चलाए। इससे पूर्व गहड़वालों के सिक्के सोने के नहीं थे।

➣ गोविन्द चन्द्र गहड़वाल के 800 स्वर्ण सिक्के 1887 ई. में उत्तरप्रदेश में बहराइच जिले के ननपारा स्थान से मिले। सिक्कों से चार भुजाओं वाली लक्ष्मी की बैठी हुई आकृति मिली।

➣ गोविन्द चन्द्र की रानी कुमार देवी के सारनाथ अभिलेख में गोविन्द्रचन्द्र को बनारस की तुर्की से रक्षा करने के लिए हरि का अवतार कहा गया है,लेकिन व्यक्तिगत जीवन में गोविन्द चन्द्र शैव धर्म का अनुयायी था।

विजय चन्द्र (1155 – 1169 ई.) : प्रशासनिक स्थिरता

➣ गोविन्द चन्द्र का उत्तराधिकारी उसका पुत्र विजय चन्द्र हुआ।

➣ इसके शासन काल में सेनवंश का शासक लक्ष्मण सेन ने आक्रमण किया किन्तु वह पराजित हुआ।

➣ विजयचन्द ने जौनपुर में अटाला देवी के मन्दिर का निर्माण करवाया। बाद में 14वीं सदी में मुसलमानों ने यहां अटाला देवी मस्जिद का निर्माण कराया।

➣ विजयचन्द्र के काल में ही गढ़वालों की स्थित कमजोर होना आरम्भ हो गयी थी। दिल्ली का प्रदेश गहड़वालों के हाथ में निकलकर चौहान नरेशों के हाथ में चला गया।

जयचन्द्र (1170 – 1194 ई.) : तराइन युद्ध एवं गहड़वाल वंश का पतन

➣ विजय चन्द्र का पुत्र जयचन्द्र गहड़वाल वंश का अन्तिम शासक था। भारतीय लोक साहित्य तथा कथाओं में वह राजा जयचन्द्र के नाम से विख्यात है। उसका समकालीन दिल्ली तथा अजमेर का चौहान नरेश पृथ्वीराज तृतीय था।

➣ चन्दबरदाई के पृथ्वीराजरासो से दोनों की पारस्परिक शत्रुता का पता चलता है। उसके अनुसारपृथ्वीराज चौहान ने जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया था। यही घटना चौहान व गहड़वाल वंश के मध्य शत्रुता का कारण बनी।

➣ जयचन्द्र ने देवगिरि के यादवों, गुजरात के सोलंकियों और तुर्कों को कई बार हराया। अपनी विजय के उपलक्ष्य में उसने राजसूय यज्ञ भी किया था।

➣ उसका समकालीन सेनवंशी शासक लक्ष्मणसेन था। सेनवंश के लेखों से पता चलता है कि लक्ष्मणसेन ने काशी के राजा को जीता तथा काशी और प्रयाग में उसने विजय स्तम्भ स्थापित किये थे।

➣ जब मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया तब जयचन्द्र तटस्थ रहा। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं जयचन्द्र ने ही गोरी को पृथ्वीराज के राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था।

➣ तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज को हराने के पश्चात 1194 ई. में मुहम्मद गोरी ने जयचन्द्र के राज्य पर भी आक्रमण किया।

➣ दोनों के मध्य चन्दावर (एटा जिला) के मैदान में युद्ध हुआ, जहां कुतुबुउद्दीन ऐबक के नेतृत्व में 5 हजार सैनिकों का जयचन्द्र की विशाल सेना से सामना हुआ। दुर्भाग्यवश हाथी पर सवार जयचन्द्र की आंख में एक तीर लग जाने से उसकी मृत्यु हो गयी।

➣ पृथ्वीराज चौहान एंव जयचंद्र की मृत्यु के साथ ही उत्तर-भारत में मुस्लिम शासन का आरम्भ हुआ।

➣ हरिशचन्द्र इस वंश का अन्तिम शासक था।

➣ जयचन्द का कमौली अभिलेख बनारस से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख है।

➣ जयचंद ने संस्कृत के प्रख्यात कवि श्रीहर्ष को संरक्षण प्रदान किया, जिसने नैषेधचरित एवं खंडन-खंड-खाद्य की रचना की। जयचन्द ने स्वयं रम्भामंजरी नाटक लिखा।

➣ जयचन्द को दलपुंगल भी कहा गया है, क्योंकि उसकी विशाल सेना सदैव विचरण करती रहती थी।

➣ गहड़वाल शासकों की मुहरों पर गरूड़ की आकृति है तथा इनके अभिलेखों में इन्हें परम माहेश्वर कहा गया है।

➣ गहड़वाल शासकों ने मुस्लिम व्यापारियों पर तुरुष्कदण्ड या मल्लकर नामक कर लगाया। इसका उल्लेख गोविन्द चन्द्र के मनेर ताम्रपत्र लेख में है।

➣ गहड़वाल अभिलेखों में जल कर (उदक भाग) लगाने का साक्ष्य भी है।

➣ पत्ताल व पाठक गहड़वालों की प्रशासनिक इकाइयाँ थी।

➣ गहड़वाल अभिलेखों में प्रवणि कर का उल्लेख है, जो फुटकर व्यापारियों से लिया जाता था।

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