भारत में तुर्की साम्राज्य
➣ भारत पर सफल आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम (712 ई.) था, किन्तु उसकी शीघ्र मृत्यु हो जाने के कारण वह भारत में स्थायी मुस्लिम शासन स्थापित नहीं कर सका। उसके आक्रमण का सबसे स्थायी प्रभाव सिंध की विजय था।
➣ मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद ग़ज़नवी ने भारत पर अनेक आक्रमण किए, किन्तु उसका मुख्य उद्देश्य धन-संपत्ति की लूट था। उसने भी भारत में स्थायी शासन स्थापित करने का प्रयास नहीं किया।
➣ इसके विपरीत मुहम्मद गौरी एक महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसका उद्देश्य केवल लूटमार करना नहीं, बल्कि भारत में स्थायी तुर्की शासन की स्थापना करना था।
➣ उसके आक्रमणों ने उत्तर भारत में तुर्की सत्ता की नींव को सुदृढ़ किया तथा आगे चलकर दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
➣ उस समय पश्चिमी पंजाब, मुल्तान तथा सिंध के अधिकांश भाग पर ग़ज़नवी वंशजों का अधिकार था। भारत का प्रवेश-द्वार माने जाने वाले पंजाब पर अधिकार किए बिना उत्तर भारत में स्थायी शासन स्थापित करना संभव नहीं था।
➣ इसी उद्देश्य से मुहम्मद गौरी ने 1175 से 1205 ई. के मध्य भारत पर अनेक अभियान चलाए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए।
मुहम्मद गौरी शंसबानी वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। महमूद ग़ज़नवी के विपरीत उसका उद्देश्य केवल लूट नहीं, बल्कि भारत में स्थायी तुर्की शासन की स्थापना करना था।
प्रारम्भिक जीवन एवं गोर साम्राज्य
➣ मुहम्मद गौरी का पूरा नाम मुइज़ुद्दीन मुहम्मद बिन साम था। उसे शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी तथा गौर का मुहम्मद भी कहा जाता है। वह शंसबानी (शंसबनी) वंश का प्रमुख शासक था, जिसने भारत में तुर्की सत्ता की सुदृढ़ नींव रखी।
➣ ‘गौरी’ नाम उसके जन्मस्थान गोर के कारण पड़ा। गोर वर्तमान मध्य अफ़ग़ानिस्तान का एक दुर्गम पर्वतीय प्रदेश था, जो ग़ज़नी और हेरात के बीच स्थित था।
प्रारम्भ में यह क्षेत्र ग़ज़नवी शासकों के अधीन था, किन्तु बाद में शंसबानी वंश ने यहाँ स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।➣ मुहम्मद गौरी के जन्म की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है, किन्तु अधिकांश इतिहासकार उसका जन्म 12वीं शताब्दी के मध्य में मानते हैं। उसके पिता का नाम बहाउद्दीन साम था। बचपन से ही उसे युद्धकला, घुड़सवारी तथा प्रशासन का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ।
➣ मुहम्मद गौरी का अपने बड़े भाई गियासुद्दीन मुहम्मद के साथ अत्यंत घनिष्ठ संबंध था। गियासुद्दीन गोर का प्रमुख शासक था, जबकि मुहम्मद गौरी उसके विश्वसनीय सहयोगी के रूप में राज्य के विस्तार और सैन्य अभियानों का नेतृत्व करता था।
➣ 1173 ई. में गियासुद्दीन ने मुहम्मद गौरी को ग़ज़नी का शासक नियुक्त किया। ग़ज़नी पर अधिकार प्राप्त होने के बाद गौरी की शक्ति और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा यहीं से उसने भारत की ओर अपने अभियानों की योजना बनानी प्रारम्भ की।
➣ 1203 ई. में गियासुद्दीन की मृत्यु के बाद मुहम्मद गौरी गोर साम्राज्य का स्वतंत्र शासक बना और उसने मुइज़ुद्दीन (धर्म का गौरव बढ़ाने वाला) की उपाधि धारण की। इसके बाद उसने अपने साम्राज्य का विस्तार और अधिक तीव्र गति से किया।
भारत पर आक्रमण के उद्देश्य
➣ मुहम्मद गौरी का उद्देश्य केवल धन-संपत्ति की लूट नहीं था। वह भारत में स्थायी तुर्की शासन स्थापित करना चाहता था, जिससे उसके साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सके।
➣ भारत उस समय राजनीतिक रूप से अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। राजपूत शासकों के बीच परस्पर संघर्ष तथा एकता का अभाव गौरी के लिए अनुकूल परिस्थिति सिद्ध हुआ।
➣ पंजाब और सिंध पर अधिकार स्थापित करना उसके लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत आवश्यक था, क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों के माध्यम से भारत में सुरक्षित रूप से प्रवेश किया जा सकता था।
➣ भारत के समृद्ध नगर, विकसित व्यापार तथा अपार धन-संपदा भी उसके आक्रमण का एक प्रमुख कारण थे। किन्तु महमूद ग़ज़नवी के विपरीत गौरी का लक्ष्य केवल लूटकर लौट जाना नहीं, बल्कि विजित प्रदेशों पर स्थायी शासन स्थापित करना था।
➣ मुहम्मद गौरी ने अपनी विजय नीति में योग्य सेनापतियों और दास अधिकारियों को विशेष महत्व दिया। उसने कुतुबुद्दीन ऐबक, बख्तियार खिलजी तथा अन्य विश्वसनीय सेनानायकों को विजित प्रदेशों का प्रशासन सौंपकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यही नीति आगे चलकर दिल्ली सल्तनत की स्थापना का आधार बनी।
भारत पर प्रारम्भिक आक्रमण (1175–1192 ई.)
➣ भारत पर आक्रमण करने से पहले गौरी ने यह समझ लिया था कि यदि उसे भारत में स्थायी शासन स्थापित करना है, तो सबसे पहले मुल्तान, उच्छ, सिंध तथा पंजाब जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों पर अधिकार करना आवश्यक होगा।
➣ इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज ने अपनी प्रसिद्ध कृति तबकात-ए-नासिरी में गौरी के भारतीय अभियानों का विस्तृत वर्णन किया है।
➣ 1175 ई. में मुहम्मद गौरी ने पहली बार भारत की ओर अभियान प्रारम्भ किया। उसने भारत आने के लिए गोमल दर्रे का मार्ग अपनाया।
मुल्तान एवं उच्छ पर विजय (1175–1176 ई.)
➣ 1175 ई. में मुहम्मद गौरी ने भारत पर अपना पहला आक्रमण मुल्तान पर किया। उस समय यहाँ करमाती (इस्माइली) शासकों का शासन था। गौरी ने उन्हें पराजित कर मुल्तान पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ अगले वर्ष 1176 ई. में उसने उच्छ पर भी अधिकार कर लिया। मुल्तान और उच्छ की विजय से गौरी को भारत में एक सुरक्षित सैन्य आधार प्राप्त हो गया, जिससे आगे के अभियानों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
गुजरात अभियान (1178 ई.)
➣ मुल्तान और उच्छ पर अधिकार के बाद गौरी ने सीधे गुजरात की ओर बढ़ने का निश्चय किया। उसका उद्देश्य पश्चिमी भारत के समृद्ध व्यापारिक मार्गों तथा समुद्री बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करना था।
➣ 1178 ई. में उसने गुजरात पर आक्रमण किया, जहाँ उस समय चालुक्य (सोलंकी) वंश का शासन था। तत्कालीन शासक मूलराज द्वितीय अल्पायु था, इसलिए युद्ध का नेतृत्व उसकी माता रानी नायिका देवी ने किया।
➣ आबू पर्वत के निकट कायदरा (कसारहड़ा) के युद्ध में रानी नायिका देवी ने मुहम्मद गौरी को करारी पराजय दी। यह भारत में गौरी की प्रथम पराजय थी।
➣ इस पराजय से गौरी ने महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की। उसने समझ लिया कि पश्चिमी मरुस्थलीय मार्ग से भारत को जीतना कठिन है। इसके बाद उसने अपनी रणनीति बदलकर पंजाब के मार्ग से उत्तर भारत में प्रवेश करने का निर्णय लिया।
पेशावर और पंजाब की ओर विस्तार
➣ गुजरात में असफल होने के बाद गौरी ने अपना पूरा ध्यान पंजाब पर केन्द्रित किया। उस समय पंजाब पर ग़ज़नवी वंश का शासन था और वहाँ का शासक खुसरव मलिक था।
➣ 1179 ई. में गौरी ने पेशावर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने धीरे-धीरे पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत करनी प्रारम्भ की।
➣ 1181 ई. में उसने पहली बार लाहौर पर आक्रमण किया, किन्तु खुसरव मलिक ने भारी धनराशि और उपहार देकर अस्थायी रूप से संधि कर ली।
➣ 1185 ई. में गौरी ने सियालकोट पर अधिकार कर वहाँ एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कराया। इससे पंजाब में उसकी सैन्य शक्ति और अधिक मजबूत हो गई।
➣ अंततः 1186 ई. में उसने पुनः लाहौर पर आक्रमण कर खुसरव मलिक को बंदी बना लिया। इसके साथ ही ग़ज़नवी वंश का अंत हो गया और पंजाब पूर्णतः गौरी के अधीन आ गया।
➣ पंजाब की विजय मुहम्मद गौरी के भारतीय अभियानों की सबसे महत्वपूर्ण सफलता थी। अब उसके सामने उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली राजपूत शक्ति चाहमान (चौहान) वंश था।
भटिंडा अभियान (1190 ई.)
➣ पंजाब पर अधिकार स्थापित करने के बाद गौरी ने 1190 ई. में भटिंडा तथा सरहिन्द के दुर्गों पर अधिकार कर लिया।
➣ भटिंडा, पृथ्वीराज चौहान के प्रभाव क्षेत्र की सीमा पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण किला था। इस पर गौरी का अधिकार ही आगे चलकर तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) का तत्कालीन कारण बना।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
➣ भटिंडा पर अधिकार की सूचना मिलते ही अजमेर एवं दिल्ली के शक्तिशाली चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान) ने विभिन्न राजपूत शासकों के साथ मिलकर गौरी का सामना करने का निर्णय लिया।
➣ दोनों सेनाओं का आमना-सामना थानेश्वर के निकट तराइन (तरावड़ी) के मैदान में हुआ। 1191 ई. में लड़े गए इस युद्ध को तराइन का प्रथम युद्ध कहा जाता है।
➣ इस युद्ध में राजपूत सेना ने अत्यंत वीरता का परिचय दिया। पृथ्वीराज चौहान के सेनापति गोविन्दराज (गोविन्द राय) ने युद्ध के दौरान गौरी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। फलस्वरूप गौरी की सेना में भगदड़ मच गई और उसे युद्धक्षेत्र छोड़कर भागना पड़ा।
➣ यह भारत में मुहम्मद गौरी की दूसरी बड़ी पराजय थी। किन्तु उसने इस हार को अंतिम नहीं माना और अगले ही वर्ष अधिक संगठित तैयारी के साथ पुनः भारत आया।
तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)
➣ प्रथम युद्ध में मिली पराजय के बाद मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना का पुनर्गठन किया। उसने बड़ी संख्या में प्रशिक्षित तुर्क घुड़सवारों तथा घुड़सवार तीरंदाजों को सेना में सम्मिलित किया और नई युद्धनीति तैयार की।
➣ 1192 ई. में दोनों सेनाएँ पुनः तराइन के मैदान में आमने-सामने हुईं। इस युद्ध में गौरी ने छलपूर्ण एवं योजनाबद्ध रणनीति अपनाई। उसने अपनी सेना को कई भागों में विभाजित कर राजपूत सेना को चारों ओर से घेर लिया।
➣ दिनभर के भीषण युद्ध के बाद राजपूत सेना पराजित हुई और पृथ्वीराज चौहान गौरी के हाथों बंदी बना लिया गया। इस विजय ने उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया।
➣ तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक युद्ध माना जाता है, क्योंकि इसके बाद उत्तर भारत में तुर्की सत्ता की स्थापना का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया।
1192 ई. का तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस विजय के बाद मुहम्मद गौरी ने उत्तर भारत में तुर्की शासन की सुदृढ़ नींव रखी तथा आगे चलकर इसी आधार पर दिल्ली सल्तनत का विकास हुआ।
➣ तराइन के युद्धों का वर्णन मिनहाज-उस-सिराज द्वारा रचित तबकात-ए-नासिरी में मिलता है।
तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद तुर्की सत्ता का विस्तार (1192–1205 ई.)
➣ 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उत्तर भारत में स्थायी तुर्की शासन स्थापित करने की दिशा में कार्य प्रारम्भ किया। उसने केवल विजय प्राप्त करके लौटने के स्थान पर विजित प्रदेशों में अपने विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति की तथा प्रशासनिक व्यवस्था को संगठित किया।
➣ तराइन की विजय के बाद गौरी ने हाँसी, समाना, कोहराम, सरहिन्द, मेरठ, कोइल (वर्तमान अलीगढ़), दिल्ली तथा अजमेर सहित अनेक महत्वपूर्ण नगरों एवं दुर्गों पर अधिकार स्थापित किया।
प्रारम्भ में उसने अजमेर में स्थानीय व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज को अपना अधीनस्थ शासक नियुक्त किया, किन्तु बाद में राजपूत विद्रोहों के कारण तुर्कों ने वहाँ प्रत्यक्ष शासन स्थापित कर लिया।➣ यद्यपि मुहम्मद गौरी की वास्तविक राजधानी ग़ज़नी ही रही, किन्तु दिल्ली को उसने भारत में अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया। आगे चलकर यही नगर दिल्ली सल्तनत की राजधानी बना।
कुतुबुद्दीन ऐबक की नियुक्ति
➣ तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में विजय के बाद मुहम्मद गौरी ने विजित प्रदेशों में स्थायी शासन स्थापित करने की योजना बनाई। चूँकि उसका मुख्य केन्द्र ग़ज़नी था, इसलिए उसने भारत में प्रत्यक्ष शासन करने के स्थान पर अपने विश्वसनीय दास सेनापतियों के माध्यम से प्रशासन चलाने का निर्णय लिया।
➣ इसी उद्देश्य से मुहम्मद गौरी ने अपने विश्वसनीय सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को हाँसी की इक्ता प्रदान की तथा भारत के विजित प्रदेशों का नायब (प्रतिनिधि) नियुक्त किया।
➣ 1192 से 1206 ई. तक ऐबक ने मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में उत्तर भारत के प्रशासन का संचालन किया। उसने दिल्ली, अजमेर, मेरठ, कोइल (अलीगढ़), हाँसी तथा अन्य क्षेत्रों में तुर्की शासन को सुदृढ़ किया।
➣ मुहम्मद गौरी की यह नीति अत्यंत सफल सिद्ध हुई। उसने स्वयं ग़ज़नी में रहकर साम्राज्य का संचालन किया, जबकि भारत में प्रशासन एवं सैन्य व्यवस्था का उत्तरदायित्व अपने विश्वसनीय प्रतिनिधियों को सौंप दिया। यही व्यवस्था आगे चलकर दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक ढाँचे का आधार बनी।
चंदावर का युद्ध (1194 ई.)
➣ तराइन की विजय के बाद भी उत्तर भारत में गहड़वाल वंश सबसे शक्तिशाली राजवंशों में से एक था। इसका शासक जयचंद्र कन्नौज और वाराणसी पर शासन करता था।
➣ 1194 ई. में मुहम्मद गौरी ने जयचंद्र के विरुद्ध अभियान चलाया। दोनों सेनाओं के मध्य चंदावर (वर्तमान इटावा जनपद के निकट) में भीषण युद्ध हुआ।
➣ इस युद्ध में जयचंद्र वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा गया और गहड़वालों की शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। इसके बाद तुर्कों का अधिकार कन्नौज, वाराणसी तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के विशाल भागों तक स्थापित हो गया।
➣ चंदावर की विजय ने उत्तर भारत में तुर्की सत्ता को और अधिक सुदृढ़ कर दिया। अब गंगा-यमुना दोआब का अधिकांश भाग गौरी के प्रभाव में आ चुका था।
बिहार की विजय
➣ बिहार और बंगाल की विजय का श्रेय मुख्यतः मुहम्मद गौरी के सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी को दिया जाता है। वह गौरी के सबसे साहसी तुर्क सेनानायकों में से एक था।
➣ 1197 से 1202 ई. के मध्य बख्तियार खिलजी ने बिहार के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। इस अभियान के दौरान उसने प्रसिद्ध नालंदा महाविहार, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा उदन्तपुरी (ओदंतपुरी) जैसे बौद्ध शिक्षा केन्द्रों को नष्ट कर दिया।
➣ बिहार की विजय के बाद वहाँ तुर्की शासन की स्थापना हुई और यह क्षेत्र दिल्ली के तुर्की साम्राज्य का महत्वपूर्ण भाग बन गया।
राजपूतों का प्रतिरोध एवं गौरी की नीति
➣ तराइन के द्वितीय युद्ध(1192 ई) तथा चंदावर के युद्ध(1194 ई.) की विजय के बाद भी मुहम्मद गौरी के लिए उत्तर भारत पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना सरल नहीं था। अनेक राजपूत शासकों ने तुर्की सत्ता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और समय-समय पर विद्रोह करते रहे।
➣ अजमेर, रणथंभौर, बयाना, ग्वालियर, बुंदेलखंड तथा गंगा-यमुना दोआब के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय राजाओं और सामंतों ने तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। अवसर मिलते ही वे अपने खोए हुए प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करते थे।
➣ गौरी के निर्देशानुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने विद्रोही क्षेत्रों में अभियान चलाकर तुर्की सत्ता को सुदृढ़ किया। साथ ही, सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नगरों एवं दुर्गों में तुर्की सेनाएँ तैनात की गईं तथा अनेक स्थानीय शासकों को अधीनस्थ (सामंत) के रूप में शासन करने की अनुमति दी गई।
➣ इस प्रकार मुहम्मद गौरी की नीति केवल प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि विजित क्षेत्रों में स्थायी एवं संगठित शासन स्थापित करना भी उसका प्रमुख उद्देश्य था। यही नीति आगे चलकर दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला सिद्ध हुई।
अंतिम अभियान एवं मृत्यु (1205–1206 ई.)
खोखर विद्रोह (1205 ई.)
➣ तराइन तथा चंदावर की विजयों के बाद उत्तर भारत में तुर्की सत्ता स्थापित हो चुकी थी, किन्तु पंजाब क्षेत्र में रहने वाले खोखर जनजाति के लोगों ने समय-समय पर तुर्कों के विरुद्ध विद्रोह किए।
➣ 1205 ई. में खोखरों ने पंजाब में व्यापक विद्रोह कर दिया। उन्होंने लाहौर और ग़ज़नी के मध्य संपर्क मार्गों को बाधित कर दिया, जिससे मुहम्मद गौरी के साम्राज्य के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो गया।
➣ विद्रोह की सूचना मिलने पर मुहम्मद गौरी स्वयं भारत आया। कुतुबुद्दीन ऐबक के सहयोग से उसने खोखरों के विरुद्ध अभियान चलाया और विद्रोह का कठोरता से दमन किया। समकालीन विवरणों के अनुसार इस अभियान में बड़ी संख्या में खोखर मारे गए तथा अनेक लोगों को बंदी बनाया गया। यह भारत में मुहम्मद गौरी का अंतिम सैन्य अभियान था।
हत्या (1206 ई.)
➣ खोखर विद्रोह का दमन करने के बाद मुहम्मद गौरी ग़ज़नी लौट रहा था। मार्ग में सिंधु नदी के निकट दमयक (Dhamiak) नामक स्थान पर 15 मार्च 1206 ई. को सायंकाल की नमाज़ के समय उसकी हत्या कर दी गई।
➣ उसकी हत्या के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार इसे खोखरों द्वारा किया गया प्रतिशोध मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार अन्य स्थानीय समूहों अथवा इस्माइली संप्रदाय की भूमिका का भी उल्लेख करते हैं।
➣ मुहम्मद गौरी की कोई संतान नहीं थी। अतः उसकी मृत्यु के बाद उसके विशाल साम्राज्य का कोई एकमात्र उत्तराधिकारी नहीं बना और उसके विभिन्न प्रांतों पर उसके विश्वसनीय दास सेनापतियों ने अधिकार स्थापित कर लिया।
उत्तराधिकारी एवं साम्राज्य का विभाजन
➣ मुहम्मद गौरी की कोई संतान नहीं थी। इसलिए 1206 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसके विशाल साम्राज्य का कोई एकमात्र उत्तराधिकारी नहीं बना। परिणामस्वरूप उसके प्रमुख दास सेनापतियों ने विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया।
➣ ताजुद्दीन यिल्दिज़ (यल्दौज) ने ग़ज़नी पर अधिकार किया, जबकि नासिरुद्दीन कुबाचा ने मुल्तान एवं उच्छ पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।
➣ भारत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ई. में लाहौर से स्वतंत्र शासन प्रारम्भ किया। इसी के साथ भारत में गुलाम (ममलूक) वंश तथा दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। आगे चलकर दिल्ली सल्तनत का प्रमुख राजनीतिक एवं प्रशासनिक केन्द्र बनी।
| दास सेनापति | प्राप्त क्षेत्र |
|---|---|
| ताजुद्दीन यिल्दिज़ (यल्दौज) | ग़ज़नी |
| कुतुबुद्दीन ऐबक | लाहौर एवं दिल्ली |
| इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी | बिहार एवं बंगाल |
| नासिरुद्दीन कुबाचा | उच्छ एवं मुल्तान |
व्यक्तित्व
➣ मुहम्मद गौरी एक महत्त्वाकांक्षी, धैर्यवान तथा दूरदर्शी शासक था। वह पराजय से निराश होने के बजाय उससे सीख लेकर पुनः अधिक तैयारी के साथ युद्ध करता था।
➣ 1178 ई. में गुजरात के मूलराज द्वितीय से पराजित होने तथा 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में हार मिलने के बाद भी उसने अपने अभियान नहीं छोड़े। अगले ही वर्ष उसने नई रणनीति अपनाकर तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में निर्णायक विजय प्राप्त की।
➣ इतिहासकारों का मत है कि यदि मुहम्मद गौरी केवल लूटपाट तक सीमित रहता, तो भारत में तुर्की शासन की स्थापना संभव नहीं हो पाती।
➣ उसकी संगठित सैन्य नीति, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति तथा विजित प्रदेशों के प्रशासन पर विशेष ध्यान देने के कारण ही भारत में दिल्ली सल्तनत की नींव मजबूत हुई।
मुहम्मद गौरी की उपलब्धियाँ
➣ मुहम्मद गौरी की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत में स्थायी तुर्की शासन की नींव रखना थी। महमूद ग़ज़नवी के विपरीत उसने केवल धन-संपत्ति की लूट तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि विजित प्रदेशों में प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित कर उन्हें अपने साम्राज्य का स्थायी भाग बनाया।
➣ मुहम्मद गौरी की विजय केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रही। उसने विजित प्रदेशों में प्रशासनिक संगठन, सैन्य छावनियों की स्थापना तथा विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति के माध्यम से तुर्की शासन को स्थायी स्वरूप प्रदान किया।
➣ उसने अपने विश्वसनीय दास सेनापतियों—कुतुबुद्दीन ऐबक, इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी, ताजुद्दीन यिल्दिज़ तथा नासिरुद्दीन कुबाचा—को महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपे। उनकी सहायता से तुर्की शासन का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण संभव हुआ।
➣ गौरी के शासनकाल में बिहार और बंगाल तक तुर्की सत्ता का विस्तार हुआ, जिससे उत्तर भारत के विशाल भूभाग पर उसका प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ उसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह थी कि उसने दिल्ली सल्तनत की स्थापना के लिए मजबूत राजनीतिक एवं प्रशासनिक आधार तैयार किया, जिस पर आगे चलकर कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना की।
ऐतिहासिक महत्व
➣ भारतीय इतिहास में मुहम्मद गौरी का महत्व केवल एक विजेता के रूप में नहीं, बल्कि दिल्ली सल्तनत की नींव रखने वाले शासक के रूप में माना जाता है।
➣ यदि गौरी केवल महमूद ग़ज़नवी की भाँति लूटपाट करके लौट जाता, तो भारत में तुर्की शासन की स्थापना संभवतः नहीं हो पाती। उसकी संगठित सैन्य नीति, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति तथा प्रशासनिक व्यवस्था ने मध्यकालीन भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
➣ इस प्रकार मुहम्मद गौरी की नीति केवल प्रदेशों पर विजय प्राप्त करना नहीं थी, बल्कि उन्हें अपने साम्राज्य का स्थायी भाग बनाना भी था। यही नीति आगे चलकर दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला सिद्ध हुई।
महमूद ग़ज़नवी एवं मुहम्मद गौरी में अंतर
| आधार | महमूद ग़ज़नवी | मुहम्मद गौरी |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | धन-संपत्ति की लूट | स्थायी तुर्की शासन की स्थापना |
| भारत पर आक्रमण | लगभग 17 आक्रमण | 1175–1205 ई. के बीच अनेक अभियान |
| विजित प्रदेशों का प्रशासन | स्थायी शासन स्थापित नहीं किया | प्रतिनिधियों की नियुक्ति कर प्रशासन स्थापित किया |
| ऐतिहासिक परिणाम | भारत की आर्थिक क्षति | दिल्ली सल्तनत की नींव रखी |
| भारतीय इतिहास में स्थान | प्रमुख आक्रमणकारी | तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक |
➣ महमूद ग़ज़नवी और मुहम्मद गौरी में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ग़ज़नवी का उद्देश्य मुख्यतः लूटपाट था, जबकि गौरी का उद्देश्य भारत में स्थायी तुर्की शासन स्थापित करना था। इसी कारण इतिहास में मुहम्मद गौरी को दिल्ली सल्तनत की नींव रखने वाला शासक माना जाता है।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
➣ मुहम्मद गौरी के प्रमुख दरबारी कवियों में फखरुद्दीन गाजी तथा निजामी उरूजी का उल्लेख मिलता है।
➣ उसके कुछ सिक्कों पर एक ओर कलमा तथा दूसरी ओर देवी लक्ष्मी अथवा शिव के नंदी की आकृति अंकित मिलती है। इससे स्पष्ट होता है कि उसने भारतीय परिस्थितियों के अनुसार सिक्कों का प्रचलन जारी रखा।
➣ परंपरा के अनुसार ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती लगभग 1192 ई. के आसपास भारत आए और अजमेर को अपना प्रमुख केंद्र बनाया। बाद में उन्होंने भारत में चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तुर्की आक्रमण का प्रभाव
➣ तुर्कों के आक्रमण के बाद भारत में सदियों से चली आ रही बहु-राज्य व्यवस्था खत्म हो गई और राजनीतिक ढांचा एक नए रूप में ढलने लगा।
➣ तुर्कों के आने के साथ ही भारत की पुरानी सामाजिक प्रथाओं में ढिलाई आने लगी, जबकि नए तरह के संबंध और संपर्क बनने शुरू हुए। राजनीतिक स्तर पर देखें तो सामंती ढांचे की जगह अब एक केंद्रीकृत और निरंकुश शासन-प्रणाली स्थापित हो गई।
➣ सेना के गठन, उसकी बनावट और सैनिकों की भर्ती व रख-रखाव के तरीकों में भी बड़ा बदलाव दिखाई दिया। पहले जहां युद्ध करना किसी खास जाति या वर्ग तक सीमित माना जाता था, वहीं अब यह बंधन टूट गया।
➣ सामंतों की निजी सेनाओं की जगह अब मजबूत और स्थायी सेनाएं बनने लगीं, जिनकी भर्ती सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में होती थी।
➣ तुर्क शासकों की विजय के बाद राजकाज की भाषा बदलकर फारसी हो गई, जिससे प्रशासनिक कामकाज में एकरूपता और व्यवस्थित ढांचा देखने को मिला।
➣ इस विजय का एक बड़ा असर भारतीय जाति-व्यवस्था पर भी पड़ा, जिसे गहरा झटका लगा। नतीजा यह निकला कि जो लोग पारंपरिक जाति व्यवस्था के तहत शोषण झेल रहे थे, वे नए सुल्तानों की तरफ झुकने लगे और उनके समर्थक बन गए।
➣ तुर्क अपने साथ भारत में कई नई तकनीकें भी लाए, जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था के ढांचे में गहरा बदलाव आया। शहरों के दोबारा आबाद होने और फलने-फूलने के इसी दौर को देखते हुए इतिहासकार मोहम्मद हबीब ने तुर्कों के आगमन को नगरीय क्रांति यानी शहरी क्रांति का नाम दिया।
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