जैन धर्म : महावीर स्वामी और अहिंसा का सिद्धांत

📚 विषय सूची
 जन्म540 ई.पू.
 जन्मस्थलवैशाली के कुण्डग्राम के निकट बिहार
 पितासिद्धार्थ
 कुलक्षत्रिय
 मातात्रिशला (लिच्छवी शासक चेटक की बहन)
 बचपन का नामवर्द्धमान
 पत्नीयशोदा (कुण्डिय गोत्र के राजा समरवती की कन्या)
 पुत्रीप्रियदर्शना (अणोज्जा)
 गृह त्याग30 वर्ष की आयु में
 प्रथम शिष्यजमालि/जामालि (दामाद)
 प्रथम शिष्याचंदना
 प्रमुख शिष्यमक्खलि पुत्र गोशाल (आजीवक संप्रदाय के संस्थापक)
 प्रथम विरोधीजमालि
 द्वितीय विरोधीतीसगुप्त (ज्ञान प्राप्ति के 16वें वर्ष)
 ज्ञान प्राप्त स्थलजृम्भिक ग्राम में ऋजुपालिका नदी के तट पर
 ज्ञान प्राप्तिवृक्ष साल वृक्ष
 पहला उपदेशराजगृह में वितुलाचल पहाड़ी पर स्थित वाराकर नदी के तट पर।
 प्रमुख उपाधिकेवलिन (सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त व्यक्ति),जिन (विजेता), निर्ग्रन्थ (बंधनरहित), अर्हत्(पूज्य)।
 निर्वाण468 ई. में पावापुरी (राजगृह) बिहार में 72 वर्ष की आयु में

जैन धर्म

➣ जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है, जिसका अर्थ विजेता होता है अर्थात् जिन्होंने अपने मन, वाणी एवं काया को जीत लिया हो।

➣ जैन अनुश्श्रुतियों और परंपराओं के अनुसार जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए, परंतु इनमें से पहले 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

ऋषभदेव

➣ जैन धर्म की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ को जाता है, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया।

➣ ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) व अरिष्टनेमि (22वें तीर्थकर) का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। अरिष्टनेमि वासुदेव श्री कृष्ण के समकालीन थे।

➣ ऋषभदेव का जन्म अयोध्या में माना जाता है। ऋषभदेव अयोध्या के राजा थे। ऋषभदेव को आदिनाथ एवं केसरियानाथ भी कहा जाता है। इन्होंने कैलाश पर्वत पर शरीर त्यागा था।

➣ विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में ऋषभदेव का उल्लेख नारायण के अवतार के रूप में मिलता है एवं भागवत पुराण में इन्हें विष्णु का अवतार कहा गया है।

पार्श्वनाथ

➣ जैनधर्म के 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ थे, जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका जन्म वाराणसी (काशी) में 850 ई.पू. के आस-पास हुआ।

➣ इनका काल महावीर से 250 ई.पू. माना जाता है। इनके अनुयायियों को निग्रंथ कहा जाता था।

➣ जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 84 दिन की तपस्या के बाद 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत (झारखंड के गिरिडीह जिले में) पर कैवल्य प्राप्त हुआ।

➣ पार्श्वनाथ ने नारियों को भी अपने धर्म में प्रवेश दिया। पार्श्वनाथ के प्रथम अनुयायी इनकी माता वामा एवं पत्नी प्रभावती थी।

➣ पार्श्वनाथ के अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता था। पार्श्वनाथ वैदिक कर्मकाण्ड एवं देववाद के कटु आलोचक थे।

➣ उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को मोक्ष का अधिकारी बताया तथा नारियों को भी अपने संप्रदाय में प्रवेश दिया।

आर्यदत्त पार्श्वनाथ के भिक्षु संघ के अध्यक्ष एवं पुष्पचुला भिक्षुणी संघ की अध्यक्षा थी।

➣ पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रतों (चातुर्याम)- सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह एवं अस्तेय में महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य नामक महाव्रत जोड़ा।

महावीर स्वामी

➣ जैनधर्म के 24वें व अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी थे। इन्हें ही जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना गया है।

➣ महावीर का जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के निकट कुण्डग्राम (वज्जिसंघ का गणराज्य) के ज्ञात कुल के प्रधान सिद्धार्थ के यहाँ हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था।

➣ इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे एंव माता त्रिशला अथवा विदेहदत्ता वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थीं।

➣ इनकी पत्नी का नाम यशोदा (कुंडिन्य गोत्र की कन्या) था। इससे उन्हें अणोज्जा (प्रियदर्शना) नामक पुत्री उत्पन्न हुई। इसका विवाह जमालि के साथ हुआ था।

➣ महावीर ने 30 वर्ष की आयु में भाई नन्दिवर्धन की अनुमति से गृहत्याग कर संन्यास (यती) ले लिया और वस्त्रों का त्याग कर उन्हें सुवर्ण-बलुआ/स्वर्ण-बालूका नदी में बहा दिया।

12 वर्ष तक लगातार कठोर तपस्या एवं साधना के बाद 42 वर्ष की अवस्था में महावीर को जृम्भिकग्राम के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) नदी के किनारे साल के वृक्ष के नीचे कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ।

➣ ज्ञान प्राप्ति के कारण महावीर स्वामी को केवलिन कहा गया है तथा योग्यतम (पूज्य) होने के कारण अर्हत् (योग्य) कहलाये।

➣ इन्द्रियों के जीतने के कारण जिन (विजेता) एवं महावीर कहलाये। बंधनों से मुक्त होने के कारण वे निर्ग्रन्थ (बन्धन रहित) कहलाये।

➣ महावीर ने प्रथम वर्षावास अस्तिकाग्राम एवं अन्तिम वर्षावास पावापुरी में व्यतित किया। सर्वाधिक वर्षावास वैशाली में व्यतीत किए, इसलिए वैशाली को महावीर की जननी कहा जाता है।

➣ कैवल्य प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी ने अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ किया। वैशाली के लिच्छवी सरदार चेटक, जो उनके मामा थे, जैन धर्म के प्रचार में मुख्य योगदान दिया।

➣ महावीर स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में दिया। उनके अनुयायी उनके दामाद जामिल बने।

➣ कालांतर में महावीर स्वामी का उनके शिष्य जमालि से मतभेद हो गया, मतभेद का कारण क्रियमाणकृत सिद्धांत (कार्य करते ही पूर्ण हो जाना) था। मतभेद के कारण जमालि ने संघ छोड़ दिया और एक नए सिद्धांत बहुरतवाद (कार्य पूर्ण होने पर ही पूर्ण माना जाएगा) का प्रतिपादन किया। ।

➣ महावीर का निर्वाण 468 ई पू में बहत्तर साल की उम्र में आज के राजगीर के समीप पावापुरी में राज हस्तिपाल के राजा प्रासाद में हुआ। दूसरी परंपरा के अनुसार उनका देहांत 527 ई पू में हुआ।

➣ चेटक ने अपनी एक बहन का विवाह मगधराज बिम्बिसार से किया। अतः बिम्बिसार महावीर स्वामी का संबंधी था।

  • प्रथम जैन भिक्षुणी चम्पा नरेश दधिवाहन की बेटी चन्दना थी, जो भिक्षुणी संघ की अध्यक्ष भी थी।
  • महावीर स्वामी ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में बाँटा था।
  • महावीर की मृत्यु के पश्चात् जैन संघ का प्रमुख थेर (धर्मगुरु) आर्य सुधर्मण को बनाया गया।
  • 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ वस्त्र धारण करने के समर्थक थे, जबकि महावीर स्वामी ने पूर्णत: नग्न रहने का समर्थन किया।
  • जैन संघ से अलग होने वाले प्रथम व्यक्ति जामिल था।
  • महावीर ने प्राकृत भाषा में अपने उपदेश दिये, ताकि जनसामान्य उन्हें समझ सकें।

शिक्षाएँ एंव सिद्धांत

➣ महावीर स्वामी ने पंच महाव्रत की शिक्षा दी जो हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य। भिक्षुओं के लिए पंच महाव्रत तथा गृहस्थों के लिए पंच अणुव्रतों की व्यवस्था है।

➣ जैन धर्म अनीश्वरवादी है। उनके अनुसार सृष्टि में निर्माण सार्वभौमिक विधान से हुआ है, इसलिए जैन धर्म प्रलय की अवधारणा में विश्वास नहीं करता।

➣ उन्होंने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकांतिक मतों को छोड़कर बीच का मार्ग अपनाया, जिसेअनेकांतवाद अथवा स्यादवाद कहा गया। स्यादवाद को सप्तभंगीनय के नाम से भी जाना जाता है। यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है।

➣ महावीर स्वामी पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे, किंतु ईश्वर के अस्तित्व उनका विश्वास नहीं था। उन्होंने ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में नहीं स्वीकारा।

➣ महावीर ने वस्त्र का सर्वथा त्याग करने का आदेश दिया था। इसका आशय यह था कि वे अपने अनुयायियों के जीवन में और भी अधिक संयम लाना चाहते थे। इसके चलते, बाद में जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया- श्वेतांबर अर्थात् सफेद वस्त्र धारण करने वाले, और दिगंबर अर्थात् नग्न रहने वाले।

➣ महावीर ने वेदों एवं वैदिक कर्मकाण्डों को नकार दिया एवं शुद्ध सरल तथा संयमित जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने जीवन का मुख्य उद्देश्य कैवल्य (निर्वाण) या ज्ञान प्राप्त करना बताया।

➣ बौद्ध धर्म में वर्णव्यवस्था की जो निंदा है वह इस धर्म में नहीं है। मगर उसका आधार उन्होंने कर्म को बताया जन्म को नहीं।

➣ महावीर के अनुसार, पूर्वजन्म में अर्जित पुण्य या पाप के अनुसार ही किसी का जन्म उच्च या निम्न कुल में होता है।

➣ महावीर ने चांडालों में भी मानवीय गुणों का होना संभव बताया है। उनके मत में शुद्ध और अच्छे आचरण वाले निम्न जाति के लोग भी मोक्ष पा सकते हैं।

➣ जैन धर्म में देवताओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया है, पर उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है।

➣ जैन धर्म में सभी वस्तुओं में आत्मा की परिकल्पना की गयी है और अमर माना गया है। वे आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं।

➣ जैन धर्म में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित हैं, क्योंकि दोनों में जीवों की हिंसा होती है। फलत: जैन धर्मावलंबियों में व्यापार और वाणिज्य करने वाले की संख्या अधिक हो गई।

➣ जैन धर्मानुसार ज्ञान के तीन स्रोत हैं- (1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान तथा (3) तीर्थंकरों के वचन।

ज्ञान के प्रकार

  • मति (इन्द्रिय-जनित ज्ञान)
  • श्रुति (श्रवण ज्ञान)
  • अवधि (दिव्य ज्ञान)
  • मनः पर्याय (दूसरों के मन का ज्ञान)
  • कैवल्य (पूर्ण ज्ञान / सर्वोच्च ज्ञान)

➣ जैन धर्म के अनुसार, यह संसार 6 द्रव्यों से मिलकर बना है ये हैं- 1. जीव, 2. पुद्गल (भौतिक तत्व), 3. धर्म, 4. अधर्म, 5. आकाश, 6. काल।

काल अनस्तिकाय द्रव्य है, जबकि अन्य पाँच अस्तिकाय द्रव्य हैं।

➣ जैन धर्म में आठ कर्म18 पापों का विवरण है।

➣ जैन धर्म के अनुसार ज्ञान के पांच साधन हैं –

  1. मतिजन्य (मन व इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान)
  2. श्रुतिजन्य (धार्मिक पुस्तकों से प्राप्त होने वाला ज्ञान)
  3. मनःप्रज्ञ ज्ञान (दूसंवेदी ज्ञान)
  4. अवधि जन्य ज्ञान (सूक्ष्मदर्शी, प्रत्यक्ष ज्ञान)
  5. कैवल्य-जन्य ज्ञान (सांसारिक ज्ञान)

त्रिरत्न

➣ जैन धर्म दर्शन का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना है। इसके लिए जैन धर्म ने तीन साधन आवश्यक बताए गए हैं। इन तीनों को जैन धर्म में ‘त्रिरत्न’ की संज्ञा दी गई है।

➣ इसके लिए निम्न त्रिरत्न बताएं गए हैं –

सम्यक् ज्ञानवास्तविक ज्ञान।
सम्यक् दर्शनसत्य में विश्वास।
सम्यक् चरित्र इन्द्रियों व कर्मों पर पूर्ण नियन्त्रण।

➣ त्रिरत्नों में सर्वाधिक बल सम्यक् आचरण पर दिया गया है। पंच महाव्रत इसी का अंग है।

➣ त्रिरत्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है, जिसे संवर कहते हैं। इसके बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं, इसे निर्जरा कहा गया है।

➣ जब जीव में कर्म का अवशेष पूर्ण समाप्त हो जाता है, तब वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है और वह अनन्त चतुष्ट्य को प्राप्त कर लेता है। अनंत चतुष्ट्य है-अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य तथा अनंत सुख।

पंच महाव्रत

➣ इसमें से पहले चार पूर्ववर्ती तीर्थंकर (पार्श्वनाथ) की देन थे। अन्तिम महाव्रत ब्रह्मचर्य को महावीर ने जोड़ा था। जैन धर्म के पांच व्रत हैं-

अहिंसा (अहिंसाणुव्रत)जीव की हिंसा न करना।
सत्य (सत्याणुव्रत)सदा सत्य का मधुर बोलना।
अपरिग्रह (अपरिग्रहाणुव्रत)सम्पत्ति ग्रहण न करना।
अस्तेय (अस्तेयाणुव्रत)चोरी न करना।
ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्याणुव्रत)इन्द्रिय निग्रह करना।

➣ उपर्युक्त पाँच महाव्रत/अणुव्रतों के अतिरिक्त तीन गुणव्रत भी बताए हैं-

1. दिग्नतदिशाओं में भ्रमण की मर्यादा बांधना;
2. अनर्थ दण्डवत्प्रयोजन हीन, पाप उत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना;
3. भोगोपभोग परिमाण अर्थात् भोग्य पदार्थों का परिमाण-निर्धारण।

➣ जैन धर्म में सात शील व्रतों का उल्लेख है-

1. दिग्व्रत अपनी क्रियाओं को विशेष परिस्थिति में नियंत्रित रखना;
2. दशव्रत अपने कार्य कुछ विशिष्ट प्रदेशों तक सीमित रखना:
3. अनर्थदण्ड व्रत बिना कारण अपराध न करना;
4. सामयिक चिंतन के लिये कुछ समय निश्चित करना;
5. प्रोषधोपवास मानसिक एवं कायिक शुद्धि के लिये उपवास करना;
6. उपभोगप्रतिभोग परिणाम जीवन में प्रतिदिन काम आने वाली वस्तुओं व पदार्थों को नियंत्रित करना;
7. अतिथि संविभाग अतिथि को भोजन कराने के उपरांत भोजन करना।

➣ जैन धर्म में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं, ‘ये इस प्रकार हैं-

1. उत्तम क्रमा क्रोधहीनता
2. उत्तम मार्दव अहंकार का अभाव
3. उत्तम मार्जव सरलता एवं कुटिलता का अभाव
4. उत्तम सोच सांसारिक बंधनों से आत्मा को परे रखने की सोच
5. उत्तम सत्य सत्य गंभीर अनुरक्ति
6. उत्तम संयम सदा संयमित, जीवन-यापन
7. उत्तम तप जीव को आजीव से मुक्त करने के लिये कठोर तपस्या
8. उत्तम अकिंचन आत्मा के स्वाभाविक गुणों में आस्था
9. उत्तम ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य व्रत का कड़ाई से अनुपालन
10. उत्तम त्याग त्याग की भावना को सर्वोपरि रखना

दर्शन

अनकातवाद बहुरूपता का सिद्धांत
सप्तभगीनय/स्यादवाद सापेक्षता का सिद्धांत
नवावद आशिक दृष्टिकोण के सिद्धांत
➣ जैन धर्म से निम्नलिखित शब्दावलियां सम्बन्धित हैं-
नय आशिक ज्ञान को नय कहा जाता है।
आस्रव कर्म का जीव की ओर प्रवाह आस्रव कहलाता है।
संवरजब जीव की ओर कर्मों का प्रवाह रूक जाए, तो इसे संवर कहते हैं।
निर्जरा संचित कर्मों का नष्ट होना निर्जरा कहलाता है।
मोक्ष आस्रव के कारण जीव बंधन में पड़ता है। संवर एवं निर्जरा के कारण जीव को मुक्ति मिलती है, जिसे मोक्ष कहते हैं।
कसाय वे तत्व हैं, जिन पर कर्म पुद्गल चिपकते हैं। चार कसाय हैं- लोभ, क्रोध, मोह एवं मान।
थेरा जैन धर्म में मुख्य उपदेशक को थेरा कहा जाता है।

जैन धर्म के सिद्धांत

दार्शनिक सिद्धांत अनीश्वरवाद कर्मवाद, आत्मवाद निर्वाण, पुनर्जन्म
व्यावहारिक सिद्धांत पंच महाव्रत, अणुव्रत
सामाजिक सिद्धांत नारी स्वातंत्र्य, आचार नग्नता, पाप

➣ बौद्ध साहित्य में महावीर स्वामी को निगण्ठ नाटपुत्त कहा गया है।

➣ जैन धर्म में अहिंसा या किसी प्राणी को न सताने के व्रत को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है। महावीर के पूर्व तीर्थंकर राजा, पशु की हत्या करने वालों को फाँसी पर चढ़ा देते थे।

जैन संगीतियाँ

प्रथम जैन संगीति

➣ चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में 300 ई.पू. में पाटलिपुत्र में जैन धर्म उपदेशों के संकलन हेतु एक महासभा का आयोजन किया गया। यह सभा स्थूलभद्र एवं सम्भूति विजय नामक स्थविरों के निरीक्षण में हुई।

➣ इसमें जैन धर्म के प्रधान भाग 14 पूर्वी (पर्वों) का स्थूलभद्र ने 12 अंगों में सम्पादन किया। श्वेताम्बरों ने 12 अंगों को स्वीकार किया।

➣ इस महासभा का दक्षिण के दिगम्बर जैनों यथा- भद्रबाहु आदि ने बहिष्कार किया। इसमें, जैन धर्म श्वेताम्बर एवं दिगम्बर संप्रदायों में बँट गया-

  • दिगम्बर – नग्न रहने वाले (भद्रबाहु के नेतृत्व में)
  • श्वेताम्बर – श्वेत वस्त्र धारण करने वाले (स्थूलभद्र के नेतृत्व में)
  • दिगम्बर साधु को क्षुल्लक, एल्लक एवं निर्ग्रन्थ कहा जाता था।
  • श्वेताम्बर साधु को यति, साधु एवं आचार्य कहा जाता था।

द्वितीय जैन संगीति

➣ 512-513 ई. में देवर्धिगणि (क्षमाश्रमण) के नेतृत्व में एवं मैत्रेक वंश के शासक श्रवसेन-प्रथम के संरक्षण में गुजरात में वल्लभी में द्वितीय जैन महासभा का आयोजन हुआ।

द्वितीय जैन संगीति का मूल उद्देश्य जैन धर्म के मूल पाठों को एकत्र कर उन्हें आगमों का रूप देना था।

➣ इसमें धर्म-ग्रन्थों को अंतिम रूप से अर्धमागधी भाषा में संकलित कर लिपिबद्ध किया गया तथा 12 उपांग जोड़े गये। प्रथम सभा में संकलित 12वाँ अंग समय खो गया था।

संगीति वर्ष स्थलअध्यक्ष
प्रथम 300 ईसा पूर्वस्थूलभद्र(पाटलिपुत्र में)स्थूलभद्र
द्वितीयद्वितीय शताब्दीसम्भूति विजय (कलिंग में)क्षमाश्रवण

➣ प्रथम संगीति के पश्चात् जैन धर्म का दो भागों में विभाजन हो गया-

  • तेरापन्थी (श्वेताम्बर)
  • समैया (दिगम्बर)

उपवास द्वारा शरीर त्यागना श्वेताम्बरों में संथारा एवं दिगम्बरों में सल्लेखना कहलाता है।

श्वेताम्बर (तेरापंथी)

300 ई.पू. में मगध में अकाल पड़ने पर स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध में ही निवास करने वाले एवं श्वेत वस्त्र धारण करने वाले जैन भिक्षु श्वेताम्बर कहलाये।

  • इनके अनुसार मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक नहीं था।
  • श्वेताम्बर स्त्रियों को भी निर्वाण के योग्य माना गया है।
  • ये महावीर को विवाहित मानते और उनकी सन्तानें थीं।
  • इनके अनुसार भोजन ग्रहण करना आवश्यक है।
  • तीर्थंकरों का जीवन-चरित लिखते समय चरित्र शब्द का प्रयोग करते हैं।
  • इन्होंने जैन आगम ग्रन्थ को स्वीकार किया।
  • पुजेरा/डेरावासी, दुढिया/स्थानकवासी एवं थैरापंथी इसके उप सम्प्रदाय हैं।
  • श्वेताम्बर सम्प्रदाय के लोगों ने ही सर्वप्रथम महावीर एवं अन्य तीर्थंकरों (पार्श्वनाथ) की पूजा आरम्भ की।

दिगम्बर (समैया)

❑ अकाल के समय छठे जैन आचार्य या अन्तिम थेरा (थेर) भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़कर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) जाने वाले जैन दिगम्बर कहलाये। इन्हें दक्षिणी जैन भी कहा जाता है।

  • दिगम्बर अपने को शुद्ध बताते थे एवं नग्न रहते थे। इनके अनुसार मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्र त्याग आवश्यक था।
  • यह संप्रदाय स्त्रियों के निर्वाण को आवश्यक नहीं मानता।
  • ये महावीर को अविवाहित मानते थे।
  • भोजन आवश्यक नहीं है। तीर्थंकरों का जीवन-चरित लिखते समय पुराण शब्द का प्रयोग करते हैं।
  • इन्होंने जैन आगम ग्रन्थ को अस्वीकार किया।
  • तेरापंथी, तारणपंथी/समैया, तोतापंथी, बीसपंथी एवं गुमानपंथी इसके उप-सम्प्रदाय हैं।
  • प्रथम शताब्दी ई. में यापानीय नामक जैन सम्प्रदाय की स्थापना कल्याणगढ़ में श्वेताम्बर साधु कलस ने की। यापानीय सम्प्रदाय श्वेताम्बर एवं दिगम्बर का मिश्रण है।

जैन संघ

➣ जैन धर्म के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए महावीर ने अपने अनुयायियों का संघ बनाया जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को स्थान मिला।

➣ महावीर ने अपने जीवन काल में केवल एक संघ की ही स्थापना की, जिसमें 11 प्रमुख अनुयायी सम्मिलित थे। इनको गणधर (गन्धर्व) कहा जाता था। इनके नामों की जानकारी कल्पसूत्र, आवश्यकनियुक्ति एवं आवश्यकचूर्णि में मिलती है।

➣ इनके नाम हैं-इंद्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति (तीनों भाई), आर्य व्यक्त, सुधर्मन, मंडित, मौर्यपुत्र, अकंपित, अचलभ्राता, मेतार्य तथा प्रभास। ये गणधर ब्राह्मण थे, जिनको पावा में दीक्षा दी गयी।

➣ इन 11 गणधरों में से 10 की मृत्यु महावीर स्वामी के समय में ही हो गयी थी। सिर्फ एक गणधर आर्य सुधर्मण जीवित बचा था।

➣ जबकि जयशंकर मिश्र के अनुसार महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद सुधर्मन एवं इन्द्रभूति नामक दो गणधर जीवित रहे तथा सुधर्मन महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन धर्म/संघ के प्रथम अध्यक्ष बने, जो प्रथम थेरा भी थे।

➣ सुधर्मन की मृत्यु के पश्चात जम्बू 44 वर्षों तक संघ का अध्यक्ष रहा। अंतिम नंद राजा के समय सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु संघ के अध्यक्ष थे। अन्तिम थेरा (थेर) भद्रबाहु थे।

सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु महावीर द्वारा प्रदत्त 14 पूव्वो (पूर्वो) (प्राचीनतम जैन ग्रंथों) के विषय में जानने वाले ये दोनों अंतिम व्यक्ति थे।

➣ जैन धर्म में भिक्षु व भिक्षुणी सन्यासी जीवन व्यतीत करते है, जबकि श्रावक व श्राविका गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे।

➣ जैन धर्म में सिर्फ संघ के सदस्यों के लिये कैवल्य का नियम है, सामान्य जन के लिये नहीं। सामान्य जन या गृहस्थों को भिक्षु जीवन में प्रवेश करने से पूर्व II कोटियों से होकर गुजरना पड़ता है।

जैन धर्म का प्रचार-प्रसार

➣ जैनों ने मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा संपोषित संस्कृत भाषा का परित्याग किया और अपने धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया।

➣ महावीर स्वामी के समय जैन धर्म का सर्वाधिक प्रसार हुआ। महावीर के समकालीन शासक बिम्बिसार, चंडप्रद्योत, अजातशत्रु, उदायिन, दधिवाहन एवं चेटक थे। ये सभी जैन धर्म के अनुयायी थे।

➣ उत्तर भारत में जैन धर्म के दो प्रमुख केन्द्र उज्जैन एवं मथुरा थे। पश्चिम में गिरनार प्रमुख केन्द्र था । पूर्वी भारत में पुण्ड्रवर्धन एवं दक्षिण भारत में कर्नाटक दिगम्बर संप्रदाय का प्रमुख केन्द्र था।

गंग वंश के राजा राजमल चतुर्थ का मंत्री एवं सेनापति चामुंड राय में 974 ई. में एक बाहुबली जिन की मूर्ति (गोमतेश्वर) का निर्माण श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में करवाया। यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष में महामस्तकाभिषेक किया जाता है।

➣ मौर्य वंश का शासक चंद्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म का अनुयायी था। अशोक का पौत्र संप्रति जैन धर्म का संरक्षक था। उसने जैन आचार्य सुहास्ति से शिक्षा ली थी। वह उज्जैन में शासन करता था, जिसके कारण उज्जैन जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

➣ जैनियों का दूसरा प्रमुख केंद्र मथुरा था। यहां से अनेक मंदिर, प्रतिमाएं, अभिलेख आदि प्राप्त हुए हैं।

➣ कलिंग का चेदि शासक खारवेल जैन धर्म का महान संरक्षक था। इसने भुवनेश्वर के नजदीक उदयगिरि तथा खंडगिरि की पहाड़ियों को कटवा कर जैन भिक्षुओं के निवास के लिए गुहा विहार बनवाए थे।

स्कन्दगुप्त के कहौम अभिलेख से जैन तीर्थंकरों की पाँच प्रतिमाओं की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

उदयगिरि (विदिशा, मध्यप्रदेश) की बाघ गुफा से कुमारगुप्त प्रथम के समय (425 ई.) का एक लेख मिला है, जिसके अनुसार शंकर नामक एक व्यक्ति ने जैन तीर्थंकर की मूर्ति का निर्माण करवाया।

➣ पूर्व मध्यकाल में राष्ट्रकूट, गंग, गुजरात के चालुक्य एवं चंदेल शासकों ने भी जैन धर्म को प्रश्रय दिया। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था. इसने रत्नमालिका नामक ग्रंथ की रचना की।

राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल (9वीं शताब्दी) में गुजरात एवं राजस्थान में जैन धर्म 11वीं तथा 12वीं शताब्दियों में अधिक लोकप्रिय रहा। खजुराहो के मंदिर हिंदू धर्म और जैन धर्म से संबंधित हैं।

माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं। इनका निर्माण गुजरात चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था।

श्रवणबेलगोला कर्नाटक राज्य में स्थित है। जहाँ गंग शासक रचमल्ल चतुर्थ (पंचमल्ल) के शासनकाल में चामुंडराय नामक मंत्री ने लगभग 981 ई. में बाहुबली (गोमतेश्वर) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण कराया। बाहुबली, प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र माने जाते हैं।

महामस्तकाभिषेक, जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण उत्सव है, जो 12 वर्ष के अंतराल पर कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला में आयोजित किया जाता है।

दक्षिण भारत में प्रचार

➣ एक परवर्ती परंपरा के अनुसार, कर्नाटक में जैन धर्म का प्रचार सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य (322-298 ई० पू०) ने किया। उसने अपने अंतिम समय में राज्य को त्याग दिया और जैन धर्म को अपना लिया। अपने जीवन के अंतिम वर्ष जैन साधु होकर कर्नाटक में जैन धर्म का प्रचार करते हुए बिताए तथा सल्लेखना विधि से प्राण त्याग किये।

➣ दक्षिण भारत में जैन धर्म के फैलने का दूसरा कारण यह बताया जाता है कि महावीर के निर्वाण के 200 वर्ष बाद मगध में भारी अकाल पड़ा।

➣ अकाल बारह वर्षों तक रहा, अत: बहुत-से जैन बाहुभद्र के नेतृत्व में प्राण बचाने के लिए दक्षिणापथ चले गए, शेष जैन लोग स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध में ही रह गए।

➣ अकाल समाप्त होने पर जब वे मगध लौट आए तो स्थानीय जैनों से उनका मतभेद हो गया। फलत: जैन संघ दो भागों में विभाजित हुआ। दक्षिणी जैन दिगंबर कहलाए और मगध के जैन श्वेतांबर।

➣ जैन धर्म को उतना राजाश्रय नहीं मिला जितना बौद्ध धर्म को, और पूर्वकाल में इसका प्रसार भी उतना तेज नहीं हुआ, तथापि यह जहाँ-कहीं पहुँचा अपना अस्तित्व हुए है। इसके विपरीत बौद्ध धर्म तो मानों भारतीय उपमहादेश से लुप्त ही हो गया।

जैन धर्म के संरक्षक

उत्तर भारत के शासक

  • महापद्मनंद व घनानंद (नन्द वंश)
  • बिम्बिसार, अजातशत्रु व उदायिन (हर्यक वंश)
  • चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार व सम्प्रति (मौर्य वंश)
  • चण्डप्रद्योत (अवंति)
  • उदायिन (सिंधु-सोवीर)
  • खारवेल (कलिंग नरेश)

दक्षिण भारत के शासक

  • मृगेशवर्मन (कदम्ब वंश)
  • अमोधवर्ष (राष्ट्रकूट वंश)
  • सोमदेव, सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल (चालुक्य/सोलंकी वंश)

जैन साहित्य

➣ अब तक उपलब्ध जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में मिलते हैं। (प्रारंभिक जैन साहित्य अर्द्ध-मागधी भाषा में लिखा गया। बाद में जैन धर्म ने प्राकृत भाषा को अपनाया। कालांतर में जैनियों ने शौरसेनी, संस्कृत और कन्नड़ भाषा में भी साहित्य लिखा।)

➣ जैन साहित्य को आगम (सिद्धांत) कहा जाता है। इसके अंतर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, 10 प्रकीर्णसूत्र और 2 चूलिकासूत्र की गणना की जाती है।

➣ जैन आगम में बारह अंगों का प्रमुख स्थान है। ये हैं आयारंग-सुत्त (आचारांग-सूत्र), सूयगदंग (सूत्रकृतांग), थाणंग (स्थानांग), समवायंग (समवायांग), भगवई वियाहपन्नति (भगवती व्याख्याप्रज्ञप्ति), णयाधम्म-कहाओ (ज्ञात्रधर्मकथा), उवासगदसाओ (उपासकदशा), अंतगददसाओं (अंतकर्दशा), अणुत्तरोव- वाइयदसाओं (अनुत्तरउपपातिकदाशा), पण्हावागरनाइ (प्रश्नव्याकरण), विवागसूयम (विवाकासुत) और दिट्ठिवाय (दृष्टिवाद) |

➣ बारह अंगों से संबंधित एक-एक उपांग ग्रंथ हैं। इनमें ब्रह्मांड का वर्णन, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल विद्या, काल विभाजन, मरणोत्तर जीवन का वर्णन आदि का उल्लेख प्राप्त होता है।

➣ बारह उपांग हैं-उववाइय (औपपातिक), रायपसेणइज्जा (राजप्रश्नीय), जीवाजीवाभिगम, पण्णवणा (प्रज्ञापना),सूरियपण्णति (सूर्यप्रज्ञप्ति), जम्बुद्दीवापण्णति (जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति), चंदपण्णति (चन्द्रप्रज्ञप्ति), निश्यावली, कप्पावदंसिआओ (कल्पावतंसिका), पुप्पहिआओ (पुष्पिका), पुप्पहचूलिआओ (पुष्पचूलिका) और वण्हिदसाओं (वृष्णिदशा)।

दस प्रकीर्ण प्रमुख ग्रंथों के परिशिष्ट हैं। ये हैं-चउसरण (चतःशरण), उरपच्चक्प्वाण (आतुरप्रत्याख्यान), भत्तपरिण्णा (भक्तपरिज्ञा), संथार (संस्तारक), तंदुलवेयालिय (तंदुलवैचारिक), चंदाविज्झय (चन्द्रवेध्यक), देविंदत्थय (देवेन्द्रस्तव), गणिविज्जा (गणिविद्या), महापच्चक्खाण (महाप्रत्याख्यान) और वीरत्थय (वीरस्तव)।

➣ छेदसूत्र’ की संख्या छः है। इसमें जैन-भिक्षुओं के लिए विधि नियमों का संकलन है। छ: छेदसूत्र हैं—आयारदसाओ (आचारदरंग), बिहाकप्प (बृहत्कल्प), ववहाद (व्यवहार),निसीह (निशीथ), महानिसीह (महानिशीथ) और जीयकत्प (जीतकल्प) |

➣ मूलसूत्र की संख्या चार है। इनमें जैन धर्म के उपदेश, विहार के जीवन, भिक्षुओं के कर्तव्य, यम-नियम आदि का वर्णन है।

➣ मूलसूत्र हैं-दसवेयालिय (दशवैकालिक), उत्तरज्झयण (उत्तराध्ययन), आवसय (आवश्यक) और पिंडानिज्जुत्ति (पिंडानिर्युक्ति)।

दो चूलिका सूत्र हैं- नंदी-सुत्तम (नंदी सूत्र) और अणुओगद्दाराइ (अनुयोगद्धार-सूत्र), जो एक प्रकार का विश्वकोश है। इनमें भिक्षुओं के लिए आचरणीय बातें लिखी गई हैं।

➣ उपर्युक्त सभी ग्रंथ श्वेतांबर संप्रदाय के लिए हैं। जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी इनकी प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते।

अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ

➣ जैन ग्रंथ के आचारांगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार-नियम व विधि-निषेधों का विवरण, भगवती सूत्र में महावीर के जीवन, न्यायधम्मकहासुत्त में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह तथा उवासगदसूओं में हूण शासक तोरमाण तथा भद्रबाहुचरित से चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यकाल की घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।

➣ अधिकांश जैन धर्म ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में लिखे गये हैं। कुछ ग्रंथ अपभ्रंश में भी लिखे गये हैं। जैन मुनि हेमचन्द्र ने अपभ्रंश भाषा का पहला व्याकरण तैयार किया।

➣ जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ कल्पसूत्र संस्कृत में लिखा गया। कल्पसूत्र की रचना भद्रबाहु ने की।

➣ कल्पसूत्र में प्रारम्भिक जैन धर्म का इतिहास मिलता है। कल्पसूत्र तीन भागों में संकलित है, जिनमें पहले भाग में महावीर स्वामी से पूर्व के 23 तीर्थंकरों के जीवन का वर्णन है, दूसरे भाग में जैन धर्म के नियम एवं सिद्धान्त तथा तीसरे भाग में जैन गाथाओं का वर्णन है।

➣ भगवती सूत्र, महावीर के जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। आचरांग सूत्र और भगवती सूत्र सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

सूत्रकृतांग में विभिन्न जैन मतों का वर्णन है। सूत्रकृतांग एवं आचरांग सूत्र प्राचीनतम् जैन अंग हैं।

शलाकापुरुष अवधारणा जैन धर्म से संबंधित है। जैनों द्वारा 63 शलाकापुरुषों का उल्लेख मिलता है, जिसमें कृष्ण को भी स्थान दिया गया।

हेमचन्द्र सूरी ने त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् की रचना की, जिसका परिशिष्ट, परिशिष्टपर्व के नाम से जाना जाता है।

प्राकृत भाषा में रामकथा के जैन रूपान्तर पउमचरिअम का लेखक विमलसूरि था, जिनका समय प्रथम शताब्दी ई. का है।

➣ जैन कवि स्वयंभू (सत्यभूदेव) ने सातवीं सदी में पउमचरिअम् (पद्मचरितम्) की रचना अपभ्रंश में की। यह अपभ्रंश में रामायण का जैन रूपान्तरण है। स्वयंभू को अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा गया है।

➣ महावीर स्वामी द्वारा दिये गये सिद्धान्त चौदह प्राचीन ग्रंथों में संकलित हैं। इन ग्रंथों को पूर्व कहते हैं।

➣ उवासगदसाओं में 10 जैन व्यापारियों की कथा का वर्णन है, जिन्होंने जैन धर्म अपनाकर मोक्ष प्राप्त किया।

➣ जैनों ने अपभ्रंश भाषा में पहली बार कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे और इसका पहला व्याकरण तैयार किया। जैन साहित्य में महाकाव्य, पुराण, आख्यायिका और नाटक हैं।

➣ बौद्धों की तरह जैन लोग भी आरंभ में मूर्तिपूजक नहीं थे। बाद में वे महावीर और तीर्थंकरों की भी पूजा करने लगे।

जैन धर्म का समाज पर प्रभाव

➣ सर्वप्रथम जैन धर्म ने ही वर्णव्यवस्था की जटिलता और कर्मकांडो की बुराइयों को रोकने के लिये सकारात्मक प्रयास प्रारंभ किये गए।

➣ जैनों ने ब्राह्मणीय भाषा संस्कृत के स्थान पर आप जनमानस की भाषा प्राकृत में उपदेश दिया। जैन साहित्य अर्द्ध मागधी लिखे गए हैं।

➣ जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक बल देने के कारण इसके अनुयायी कृषि तथा युद्ध में संलग्न न होकर व्यापार एवं वाणिज्य को महत्व देते थे, जिससे व्यापार-वाणिज्य की उन्नति हुई।

➣ जनता को जैन धर्म के सीधं एवं सरल उपदेशों ने आकर्षित किया तथा उत्तर वैदिककालीन कर्मकांडीय जटिल विचारधारा के जैन धर्म के रूप में जीवन-यापन का सीधा-साधा मार्ग प्रस्तुत किया।

जैन धर्म के पतन के कारण

बौद्ध धर्म का विस्तार एवं ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान।

➣ जैन धर्म के कठोर नियम थे जैसे- आत्मपीड़न, कठोर व्रत एवं तपस्या पर बल, अहिंसा पर अत्यधिक बल, जाति व्यवस्था के दर्शन को बनाए रखना।

अनेकातिवाद, द्वैतवादी तत्वज्ञान आदि को समझना साधारण जनता के वश की बात न थी। परिणामस्वरूप जैन धर्म तपस्वियों तक ही सिमित रहा।

➣ प्रारंभ में जैन धर्म एक सशक्त आंदोलन था, किंतु बाद में जैन धर्म दो संप्रदायो- दिगबर और श्वेताबर में विभाजित हो गया। जैन धर्म का यह सांप्रदायिक विभाजन जैन धर्म के लिये अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ और जैन धर्म पतन की ओर हो

➣ प्रारंभ में जैन साहित्य का लेखन प्राकृत भाषा में था। जो जनसाधारण की भाषा थी, किंतु बाद में जैन साहित्य संस्कृत में लिखा जाने लगा। परिणामतः जनसाधारण का जैन धर्म के प्रति दृष्टिकोण उदासीन होता चला गया।

➣ जैन धर्म के उत्कर्ष में तत्कालीन नरेशों का महत्वपूर्ण योगदान था किंतु बाद में जैन धर्म को राजकीय आश्रय प्राप्त न हो सका। फलतः राजाश्रय के अभाव से जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी।

➣ जैन मठो को बसादी कहा जाता है-

अयोध्या यहाँ 5 तीर्थकरों का जन्म हुआ था। जिनमे प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव का जन्म भी शामिल हैं।
सम्मेद शिखरयहाँ पार्श्वनाथ ने अपना शरीर त्यागा था।
पावापुरीयहाँ महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया था।
कैलाश पर्वतयहाँ आदिनाथ ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया।
श्रवणबेलगोलायहाँ गोमतेश्वर बाहुबली की विशाल प्रतिमा है।
माउंट आबूयहाँ सफेद संगमरमर से बने दिलवाड़ा के जैन मंदिर स्थित है।

सल्लेखना विधि

➣ जैन दर्शन में सल्लेखना सत्लेखना शब्द से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ अच्छाई का लेखा जोखा होता है।

➣ जैन दर्शन में सल्लेखना शब्द उपवास द्वारा प्राणत्याग करने की विधि का वर्णन मिलता है। इस दर्शन में अहिंसा एवं काया-क्लेश पर अत्यधिक बल दिया गया है।

➣ ई.पू. तीसरी सदी में सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में सल्लेखना विधि द्वारा ही अपने शरीर का त्याग किया था। अन्य मौर्य शासक अशोक का उत्तराधिकारी सम्प्रति का भी सल्लेखना विधि से प्राण त्यागने की जानकारी मिलती है।

➣ आधुनिक काल में ‘सल्लेखना’ को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और विनोवा भावे जैसे महापुरुषों द्वारा व्यापक समर्थन मिला।

➣ सल्लेखना को निष्प्रतीकारमरण वयकुण्ठ (वय यानि ‘आयु कुण्ठित’ यानी क्षीण या नष्ट हो जाना) भी कहा जाता है।

➣ इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अगस्त, 2015 को रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट ने इस प्रथा को आत्महत्या की श्रेणी में माना है। जैन धर्म के लोगों द्वारा भारी विरोध के बाद हाई कोर्ट को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

➣ सल्लेखना को प्रायः संथारा के नाम से भी जाना जाता है।

प्रसिद्ध जैन मंदिर

➣ प्रारंभ में जैनों ने स्तूपों का निर्माण किया, बाद में मूर्तिकला एवं मंदिरों का विकास हुआ। कुषाण काल में मथुरा जैन कला का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। गुप्त काल में जैन कला की मथुरा शैली उन्नत अवस्था में थी। प्रमुख जैन मंदिर हैं-

ऋषभनाथ मंदिर, जलमंदिर, दिलवाड़ा का जैन मंदिर, पारसनाथ का जैन मंदिर, मेगुती जैन मंदिर, कुमारग्राम प्राचीन मंदिर, दिगंबर जैन मंदिर-पार्श्वनाथ का मंदिर, रणकपुर जैन मंदिर, शोभनाथ मंदिर, श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ, जैन श्वेतांबर-त्रिलोकपुर तीर्थ आदि।

संधारा प्रथा

➣ संथारा प्रथा के अंतर्गत जब किसी व्यक्ति को लगता है कि वह मृत्यु के निकट है तो वह एकांतवास ग्रहण कर लेता है और अन्न जल त्याग देता है और मोन व्रत धारण करता है। इसके बाद वह किसी भी दिन देह त्याग देता है।

➣ उल्लेखनीय है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अगस्त 2015 में संधारा प्रथा पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट इस प्रथा को आत्महत्या की श्रेणी में रखते हुए भारतीय दंड संहिता 306 तथा 309 के तहत दंडनीय बताया था।

➣ परंतु सुप्रीम कोर्ट ने जैन समुदाय से जुड़े संगठनों की याचिकाओं पर ‘संथारा’ को गैर-कानूनी घोषित करने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी।

गोमटेश्वर की मूर्ति

➣कर्नाटक के हासन जिला के श्रवणबेलगोला में बिना किसी सहारे खड़ी पत्थर से निर्मित विश्व की ऊँची प्रतिमा स्थापित है।

➣गोमटेश्वर या बाहुबलि जैन धर्म के प्रथम उपदेशक ऋषभदेव के पुत्र थे।

➣गोमटेश्वर की विशालकाय प्रतिमा 17.5 मीटर ऊँची है यह एक बड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है।

➣यह मूर्ति विजयनगर के शासकों भैरासा सामंतों द्वारा 1432 ई. में स्थापित की गई थी।

प्रत्येक 12 वर्ष बाद इस मूर्ति को विधि-विधान से दूध-दही व घी से स्नान कराया जाता है। इस प्रक्रिया को महामस्तकाभिषेक कहते हैं।

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व प्रतीक चिह्न

. . तीर्थंकरजन्म स्थल प्रतीक चिह्नवृक्ष निर्वाण-स्थल
1. ऋषभदेव (आदिनाथ)विनित्तानाग; पुरिमतल बैलवात (बरगद) अष्टपद (कैलश)
2. अजितनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर हाथीशाल (शोरि रोबस्टा) सम्मेद शिखर
3. सम्भवनाथश्रावस्ती (सावथी) घोड़ाप्रयाल सम्मेद शिखर
4. अभिनंदननाथअयोध्या; सम्मेत शिखर बंदरप्रियांगु सम्मेद शिखर
5. सुमतिनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर चकवाजेवियर सेला सम्मेद शिखर
6. पद्मप्रभुकौशाम्बी, सम्मेत शिखर लाल कमलछत्र सम्मेद शिखर
7. सुपार्श्वनाथवाराणसी; सम्मेत शिखर स्वस्तिकबबूल सम्मेद शिखर
8. चंद्रप्रभुचन्द्रपुर; सम्मेत शिखर चंद्रमानाग सम्मेद शिखर
9. सुविधिनाथ (पुष्पदंत )कनान्दिनाग; सम्मेत शिखर मगरसलि सम्मेद शिखर
10. शीतलनाथभद्रपुरा (आदिलपुरा) कल्पवृक्षप्रियांगु सम्मेद शिखर
11. श्रेयांसनाथसिंहापुरी गैंडातन्दुक सम्मेद शिखर
12. वासुमूल चम्पापुरी, सम्मेत शिखर भैंसापटल चम्पापुरी
13. विमलनाथकांपिल्यपुरा, सम्मेत शिखर शूकरजम्बू सम्मेद शिखर
14. अनन्तनाथअयोध्या; सम्मेत शिखर सेहीअशोक सम्मेद शिखर
15. धर्मनाथरत्नापुरी, सम्मेत शिखर वज्रदण्डदधिपर्ण सम्मेद शिखर
16. शांतिनाथगजपुरा, सम्मेत शिखर हिरण (मृग)नंदी. सम्मेद शिखर
17. कुन्थुनाथगजपुरा, सम्मेत शिखर बकराभिलक सम्मेद शिखर
18. अरनाथ (अरहनाथ जी)गजपुरा, सम्मेत शिखर मच्छ (मीन)उदेग ननाई सम्मेद शिखर
19. मल्लिनाथसम्मेद शिखर कलशअशोक सम्मेद शिखर
20. मुनिसुब्रतनाथ राजगृह; सम्मेत शिखर कछुआचंपक सम्मेद शिखर
21. नमिनाथसम्मेद शिखर नील कमलबाकुला सम्मेद शिखर
22. अरिश्टनेमि (नेमिनाथ)सौरिपुर व उज्जैन शंखजीबेटासा गिरनार पर्वत
23. पार्श्वनाथवाराणसी सर्पधताकी सम्मेद शिखर
24. महावीरकुण्डग्राम सिंहसागौन पावापुरी

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