विजयनगर साम्राज्य : मध्यकालीन भारत का एकमात्र हिन्दू राज्य
➣ यह मध्यकालीन भारत का एकमात्र साम्राज्य था जिसने हिन्दू धर्म को अक्षुण बनाये रखा।
➣ वर्ष 1325 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेर भाई बहाउद्दीन गुर्शस्प ने कर्नाटक में सागर नामक स्थान पर विद्रोह कर दिया। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक इस विद्रोह को दबाने के लिए स्वयं दक्षिण आया।
➣ बहाउद्दीन ने भाग कर कर्नाटक में स्थित कंपिली के राजा के पास शरण ली। तुगलक ने कंपिली को विजित कर उसे दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
➣ कंपिली विजय के दौरान ही मुहम्मद तुगलक ने उस राज्य के अधिकारियों में हरिहर व बुक्का नामक दो भाईयों को भी बंदी बना लिया तथा उन्हें दिल्ली ले आया।
➣ बंदी बनाए जाने के बाद हरिहर व बुक्का ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया।
➣ कालांतर में मदुरई के गवर्नर ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारगंल के शासक भी स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहे थे।
➣ तुगलक ने दोनों भाइयों को दक्षिण में विद्रोह शांत करने भेजा गया। दोनों भाईयों बुक्का ने विद्रोह का दमन किया।
➣ इसी समय वे विद्यारण्य नामक एक संत के प्रभाव में आए। विद्यारण ने दोनों भाइयों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया।
➣ दोनों भाइयों ने अपने गुरु शृंगेरी के विद्यारण्य एंव सायण (वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार) की प्रेरणा से 1336 ई. में तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर अनेगोण्डी के सामने विजयनगर शहर की स्थापना की।
➣ विजयनगर साम्राज्य के. 4 राजवंशों (संगम वंश, सालुव वंश, तुलुव वंश और अराविडु वंश) ने 300 वर्षों से अधिक समय तक शासन किया।
➣ विजयनगर साम्राज्य की राजधानियाँ भी बदलती रहीं, जिनका क्रम है- अनेगोण्डी (1336 ई.), विजयनगर/विद्यानगर (1342 ई.), बेनुगोण्डा/पेनुगोण्ड (1570 ई.) तथा चन्द्रगिरि (1614 ई.)।
➣ विजय नगर का वर्तमान नाम हम्पी है। इसके ध्वंसावशेष हम्पी में विद्यमान हैं। हम्पी के भग्नावशेषों को सर्वप्रथम मैकेन्जी ने 1800 ई. में खोजा था।
➣ संगम वंश विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंशों में प्रथम था। इसमें में 10 शासक हुए। हरिहर प्रथम इस वंश का पहला जबकि विरुपाक्ष द्वितीय (1465-86 ई.) अन्तिम शासक था।
➣ हरिहर व बुक्का संगम के पुत्र थे। इन्होंने अपने पिता संगम के नाम पर ही इस वंश का नाम संगम वंश रखा।
हरिहर -1 (1336-1356 ई.)
➣ हरिहर-I संगम वंश का प्रथम शासक था। इसकी पहली राजधानी अनेगोण्डी थी जो तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित थी। कालांतर में सुरक्षा की दृष्टि से उसने विजयनगर (1342 ई. में) को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
➣ हरिहर ने अपने भाई बुक्का के साथ सहकारिता के आधार पर संयुक्त शासन किया। बुक्का गुट्टी (यह उपराजधानी थी) से शासन करता था।
➣ हरिहर को एक समुद्र का अधिपति कहा गया है। हरिहर एवं उसके उत्तराधिकारियों ने विरूपाक्ष (शिव) देवता के अभिकर्ता के रूप में शासन किया।
➣ गद्दी पर बैठने के उपरान्त हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्का की सहायता से साम्राज्य विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया तथा विजयनगर साम्राज्य को उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर दक्षिण में कावेरी नदी तक विस्तृत किया।
➣ पड़ोसी राज्यों में वारंगल का संस्थापक कायप नायक, उसका मित्र प्रोलय वेम व वीर वल्लाल तृतीय उसके विरुद्ध थे। देवगिरी का सुबेदार कुतलुग खां भी हरिहर का विरोधी था।
➣ 1342 ई. में वीर वल्लाल-III की मदुरा के सुलतान गयासुद्दीन दमगान शाह ने धोखे से हत्या कर दी। इसके बाद उसका पुत्र वीर वल्लाल-IV शासक बना जो अयोग्य सिद्ध हुआ।
➣ उसकी अयोग्यता का लाभ हरिहर ने 1346 ई. में होयसल राज्य को अपने राज्य में मिला लिया। तत्पश्चात् 1347 ई. में उसने कादम्ब प्रदेश को भी विजयनगर में शामिल किया।
➣ उसने राज्य में कृषि विकास के लिए कार्य किया। उसने काकतीय राजव्यवस्था का अनुसरण कर अपने राज्य को देश, स्थल तथा नाडुओं में विभक्त किया।
➣ हरिहर-I ने प्रशासनिक व्यवस्था में भी सुधार का प्रयास किया। उसने काकतीय राजव्यवस्था का अनुकरण कर अपने राज्य को देश, स्थल तथा नाड्डुओं में विभाजित किया ।
➣ शासन में कार्यों के लिए करणमों के रूप में ब्राह्मणों की नियुक्ति की थी। उसने राज्य में कृषि के विकास के लिए भी कार्य किया।
➣ चूँकि इसका साम्राज्य चारों तरफ से शत्रु शक्तियों से घिरा था, अतः इसने राजा या महाराजधिराज की उपाधि धारण नहीं की क्योंकि इस नवोदित राज्य से पुरानी शक्तियाँ ईर्ष्याभाव रखती थीं।
➣ 1336 ई. में हरिहर-I की मृत्यु हो गयी ।
➣ बहमनी वंश के संस्थापक अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ने कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित रायचूर के किले पर अधिकार कर लिया।
➣ यह बहमनी व विजयनगर के मध्य संघर्ष का प्रारंभ था जो लगभग 200 वर्षों तक चलता रहा।
बुक्का प्रथम (1356-77 ई.)
➣ यह हरिहर प्रथम का भाई था। जो हरिहर प्रथम के साथ संयुक्त रूप से शासन करने के बाद, उसकी मृत्यु के बाद बुक्का प्रथम 1356 ई. में विजयनगर का शासक बना।
➣ अभिलेखों से उसे तीन समुद्रों का अधिपति, पूर्वी, पश्चिमी व दक्षिणी सागरों का स्वामी कहा गया है। किंतु इसने भी महाराज की पदवी धारण नहीं की।
➣ सन 1377ई. में बुक्का-I की एक महान विजय मदुरा विजय थी जिसके कारण उसका राज्य सुदूर दक्षिण में रामेश्वर तक पहुंच गया। इसमें तमिल व चेर (केरल) के प्रदेश भी सम्मिलित थे।
➣ मदुरा विजय हेतु बुक्का ने अपने पुत्र कंपन को भेजा था। मदुरा को विजित करने के बाद कुक्का ने अपने पुत्र कम्पन को इस नवविजित तमिल प्रदेशों पर विजयनगर का वाइसराय नियुक्त किया।
➣ कुमार कंपन की पत्नी गंगा देवी ने अपने पति द्वारा मदुरा विजय का अपने ग्रन्थ मदुरा विजयम में बड़ा सजीव वर्णन किया है।
बुक्का प्रथम के समय में ही बहमनी व विजयनगर के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हुआ। कृष्णा नदी के उत्तर में बहमनी एवं दक्षिण विजयनगर साम्राज्य था।
➣ बुक्का प्रथम के समय में बहमनी व विजयनगर साम्राज्य के बीच लम्बे समय तक चलने वाले युद्ध की शुरुआत हुई। बहमनी – विजयनगर के बीच युद्ध का कारण रायचूर दोआब पर नियंत्रण को लेकर था।
➣ रायचूर दोआब कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था। रायचूर दोआब हीरों व लोहे की खानों के लिए प्रसिद्ध था। 1356 ई. में बहमनी शासक अलाउद्दीन बहमनशाह ने रायचूर दोआब पर अधिकार कर लिया था।
➣ बुक्का ने बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह प्रथम से 1367 ई. में युद्ध किया व समझौते के फलस्वरूप रायचूर दोआब पर विजयनगर का अधिकार हो गया। कृष्णा नदी को बहमनी व विजयनगर राज्य की सीमा मान लिया गया।
➣ सर्वप्रथम बुक्का ने ही बहमनी वंश और विजयनगर साम्राज्य के मध्य बने विवाद के कारण कृष्णा नदी को दोनों साम्राज्य की सीमा माना।
➣ यह पहला अवसर था जब किसी बहमनी शासक ने विजय नगर की सीमा में प्रवेश किया। इस युद्ध में ही पहली बार बारूद का प्रयोग हुआ तथा यह नियम भी बनाया गया कि युद्ध के दौरान आम जनता की हत्या नहीं की जायेगी ।
➣ बुक्का प्रथम ने वेदमार्ग प्रतिष्ठापक की उपाधि ग्रहण की तथा वैदिक मग्ग प्रवर्तका नामक ग्रंथ की रचना की। किन्तु उसने अन्य धर्मों को भी धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की एवं मन्दिरों की मरम्मत करवायी।
➣ धार्मिक दृष्टि उसने हिन्दू धर्म की सुरक्षा का दावा किया तथा वेदमार्ग प्रतिष्ठापक की उपाधि धारण किया। इसके अतिरिक्त अन्य धर्मों के प्रति भी उसने सहिष्णुता की नीति का पालन किया।
➣ उसने वेद और अन्य धार्मिक ग्रन्थों की नवीन टीकाएं लिखवायीं एंव तेलगू साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उसने तेलुगू कवि नचन सोम तथा वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायणाचार्य को प्रश्रय दिया था।
➣ उसने राज्य की वैदेशिक नीति को विकसित करने हेतु सन 1374ई. चीन में अपना एक दूतमण्डल भेजा।
हरिहर एवं बुक्का ने राजा एवं महाराजा की उपाधि ग्रहण नहीं की थी। 1377 ई. बुक्का की मृत्यु हो गयी।
हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.))
➣ बुक्का-I के मृत्यु के बाद हरिहर – II गद्दी पर बैठा। वह विजयनगर साम्राज्य का प्रथम शासक था जिसने राजाधिराज और राजपरमेश्वर की उपाधि धारण की।
➣ वल्लूर अनुदान लेख में इसे राज वाल्मीकि एवं राज व्यास कहा गया है। हरिहर द्वितीय के काल में पूर्वी समुद्री तट की तरफ साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई गई।
➣ उसने कनारा, मैसूर, त्रिचनापल्ली, कांची आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। हरिहर द्वितीय के चन्नरय पटन शिलालेख में बुक्का प्रथम की सैन्य उपलब्धियों का वर्णन है।
➣ उसकी सबसे बड़ी सफलता पश्चिमी समुद्री तट पर बहमनी साम्राज्य से 1377 ई. में बेलगाँव व गोवा को छीनना था। उसने दभोल एवं चोल बन्दरगाह भी प्राप्त किया।
➣ संपूर्ण सुदूर दक्षिण भारत पर विजयनगर साम्राज्य का विस्तार करने का श्रेय हरिहर – II दिया जा सकता है। अब साम्राज्य की सीमा दक्षिण में त्रिचनापल्ली तक पहुँच गयी थी।
➣ उसने उत्तरी श्रीलंका में भी एक समुद्री अभियान भेजा व वहाँ के राजा से कर प्राप्त किया।
➣ भगवान शिव के विरुपाक्ष रूप का वह उपासक था, किन्तु अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था। उसने वैष्णव व जैनियों को भी समान रूप से संरक्षण दिया।
➣ नानार्थ रत्नमाला का लेखक ईरूगापा दण्डाधिनाथ उसका सेनापति एंव वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार सायणायाचार्य उसका मुख्यमंत्री था।
➣ एतरेय ब्राह्मण के टीकाकार सायण एवं सर्वदर्शन संग्रह के लेखक माधवाचार्य और हरिविलास के लेखक श्रीनाथ इसके दरबार में थे।
➣ हरिहर द्वितीय अपनी विद्वता एवं विद्वानो को संरक्षण देने के कारण राज व्यास या राज वाल्मीकि कहलाया था।
➣ उसके एक अभिलेख में माधव विद्यारण्य को सर्वोच्च प्रकाश का अवतार कहा गया है।
➣ 1404 ई. में हरिहर-II की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में सत्ता के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो गया अन्त में देवराय-I शासक बना।
विरुपाक्ष प्रथम (1404 ई.)
➣ 1404 ई. में पिता हरिहर द्वितीय की मृत्यु के बाद विरुपाक्ष प्रथम ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ राजगद्दी पर अधिकार करने के बाद उसी वर्ष उसे अपने ही भाई बुक्का द्वितीय के द्वारा अपदस्थ कर दिया गया। इस प्रकार उसका शासन बहुत ही अल्प कालीन रहा।
बुक्का द्वितीय (1404-06 ई.)
➣ यह बुक्का प्रथम का पौत्र था। विजयनगर साम्राज्य के राजगद्दी पर बैठाये जाने के समय उसके भाई विरुपाक्ष प्रथम ने उसका विरोध किया था।
➣ बुक्का द्वितीय केवल दो वर्ष तक ही शासन कर सका।
➣ बुक्का द्वितीय के पश्चात् साम्राज्य की गद्दी पर आगे की उत्तराधिकार-प्रक्रिया जारी रही, जो अंततः देवराय प्रथम के सिंहासनारोहण के साथ अपेक्षाकृत स्थिरता की ओर अग्रसर हुई।
देवराय प्रथम (1406-22 ई.)
➣ हरिहर-II के बाद अगला शासक देवराय-I था। राज्यारोहण के तुरंत बाद, देवराय-I को बहमनियों के उग्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने कोंडविडु के रेडियों, वारंगल के वेलमाओं व उड़ीसा के गजपति नरेशों के साथ सैनिक गठबन्धन कर लिया था।
➣ इसके शासनकाल में समकालीन बहमनी सुल्तान फ़िरोजशाह ने आक्रमण किया। जिसे सोनार की बेटी का युद्ध नाम से जाना जाता है। जिसमें देवराय प्रथम पराजित हुआ।
➣ अन्त में दोनों के मध्य एक संधि हुई जिसके अनुसार देवराय ने हर्जाने के रूप में दस लाख हून, मोती व हाथी देने पड़े। उसे अपनी पुत्री का विवाह भी फिरोज से करना पड़ा व बांकापुर का क्षेत्र दहेज में देना पड़ा।
➣ कालांतर में सुल्तान फिरोजशाह से संबंध पुनः कटु होने पर देवराय प्रथम ने वारंगल से एक संधि कर बहमनी सुल्तान फिरोजशाह को पराजित किया और कृष्णा नदी के तट का (बहमनी राज्य) संपूर्ण रेड्डी क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया।
➣ देवराय को अपने समय में आंतरिक विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा था, परन्तु अन्ततः वह इन्हें दबाने में सफल हुआ।
➣ उसने तंगभद्रा नदी पर बांध बनाकर विजयनगर के लिए नहरें निकाली जिससे कृषि का अत्यधिक विकास हुआ। उसने हरिद्रा नदी पर भी बांध बनवाया।
➣ देवराय प्रथम के शासन काल में इतालवी यात्री निकोली कोण्टी ने 1420 ई. में विजयनगर की यात्रा की थी। उसने विजयनगर में मनाए जाने वाले दीपावली, नवरात्र आदि जैसे उत्सवों का भी वर्णन किया है। निकोली कोण्टी ने विजयनगर समाज में प्रचलित बहुविवाह तथा सती प्रथा का भी उल्लेख किया है।
➣ उसने हरविलास नामक ग्रन्थ के रचनाकार व प्रसिद्ध तेलुगू कवि श्रीनाथ को संरक्षण प्रदान किया था। उसके समय में विजयनगर दक्षिण भारत में विद्या का केन्द्र बन गया था।
➣ देवराय प्रथम के विषय में कहा गया है कि, सम्राट अपने राजप्रसाद के मुक्ता सभागार में प्रसिद्ध व्यक्तियों को सम्मानित किया करता था। 1422 ई. देवराय प्रथम की मृत्यु हो गयी।
रामचन्द्र (6 महीने)
➣ 1422 ई. में देवराय – I की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र इसका उत्तराधिकारी हुआ। किन्तु उसने मात्र 6 माह तक शासन किया।
वीर विजय-I (6 महीने)
➣ विजय-I शासक बना जो विजयभूपति, विजय बुक्का या वीर बुक्का-III के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
➣ सम्भवतः इसने भी मात्र 6 महीने तक शासन किया। इसके बाद देवराय द्वितीय शासन बना।
देवराय द्वितीय (1422-46 ई.)
➣ वह विजय प्रथम का पुत्र था। देवराय द्वितीय संगम वंश का महान शासक हुआ। उसने इम्मादी देवराय (प्रौढ़ देवराय) उपाधि धारण की थी।
➣ इस शासक के अभिलेख सम्पूर्ण विजयनगर साम्राज्य में प्राप्त हुए हैं और उसका शासन काल संगम युगीन विजयनगर साम्राज्य के वैभव और समृद्धि की पराकाष्ठा का सूचक है।
➣ देवराय द्वितीय को इम्माडि देवराय एवं पुरोधा भी कहा जाता है।
➣ एक अभिलेख में देवराय द्वितीय को गजबेटकर (हाथियों का शिकारी) कहा गया है। पौराणिक आख्यानों में उसे इन्द्र का अवतार बताया गया है।
➣ देवराय द्वितीय ने मुसलमानों को मस्जिद निर्माण की स्वतन्त्रता दे रखी थी। उसने अपने सिंहासनारोहण के समय क़ुरान रखा था, ताकि मुसलमानों के साथ भी समन्वय बना रहे।
➣ उसने विजयनगर साम्राज्य का विस्तार उड़ीसा से मलबार और श्रीलंका (सीलोन) के तट से गुलबर्ग तक कर दिया और साथ ही दक्षिण भारत के कई बंदरगाहों पर भी कब्जा कर लिया।
➣ उसने अपनी सैनिक शक्ति मजबूत करने के लिए 2000 तुर्की धनुर्धरों को अपनी सेना में भर्ती किया तथा उन्हें जागीरें प्रदान की।
➣ अपने लिंगायत धर्मावलम्बी मंत्री लक्कना (लखमख) को दक्षिणी सागर का स्वामी नियुक्त किया ।
➣ जब तेलगू के प्रसिद्ध कवि श्रीनाथ ने उसके दरबारी कवि दिनदिमा को एक शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तो देवराय-II ने उसे कवि सार्वभौम की उपाधि से सम्मानित किया और उस पर सोने के सिक्कों की (कनकाभिषेक सम्मान) बौछार की थी।
➣ देवराय द्वितीय साहित्य का महान संरक्षक था और स्वयं संस्कृत का एक निष्णात विद्वान था। उसे दो संस्कृत ग्रन्थों महानाटक सुधानिधि एवं बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर टीका की रचना करने का गौरव प्राप्त है।
➣ वर्ष 1425 ई. में देवराय द्वितीय दहेज़ प्रथा को अवैध घोषित कर दिया था।
➣ वाणिज्य को नियंत्रित एवं नियमित करने के लिए उसने लक्कन्ना या लक्ष्मण, जो उसका दाहिना हाथ था, को दक्षिण समुद्र का स्वामी बना दिया। अर्थात् विदेश व्यापार का भार सौंप दिया।
➣ देवराय-II के समय में फारस (ईरान) के शासक मिर्जा शाहरुख के राजदूत के रूप में बदुर्रज्जाकभारत आया था। अब्दुल रज्जाक ने लिखा है कि, विजयनगर उसे दुनिया के सबसे भव्य शहरों में से एक लगा, जो उसने देखे या सुने थे।
➣ नूनिज कृष्णदेव राय के समय आया था। नूनिज (पुर्तगाली) कहता है कि क्विलान, श्रीलंका, पुलीकट, पेगू, तेनसिरिम (क्रमशः बर्मा और मलाया) के राजा देवराय द्वितीय को कर देते थे। 1446 ई. में देवराय द्वितीय की मृत्यु के बाद संगम वंश का पतन शुरू हो गया।
मल्लिकार्जुन (1446-65 ई.)
➣ देवराय द्वितीय के बाद उसका उसका पुत्र मल्लिकार्जुन विजयनगर साम्राज्य की राजगद्दी संभाली। उसे प्रौढ़ देवराय के नाम से भी जाना जाता है।
➣ माल्लिकार्जुन राज्यारोहण के समय अल्पायु था। उसने भी अपने पिता देवराय-I की भांति इम्मादि देवराय, गजबेटकर की उपाधि धारण की थी।
➣ इस स्थिति का लाभ उठाकर बहमनी शासक अलाउद्दीन-I तथा उड़ीसा के गजपति शासक कपिलेश्वर ने संयुक्त रूप से विजयनगर पर आक्रमण किए किन्तु मल्लिकार्जुन ने उनके इस अभियान को विफल कर दिया।
➣ अंत में गजपतियों ने उसके कोण्डवीर और उदयगिरि नामक दो महत्वपूर्ण किलों को छीनने में सफल रहे।
➣ कुछ समय के बाद चन्द्रगिरि के नरसिंह सालुव ने उसका सिंहासन उससे छीन लिया। नरसिंह सालुव, मल्लिकार्जुन का सामंत था।
➣ 1465 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसका उत्तराधिकारी विरुपाक्ष-II हुआ।
➣ मल्लिकार्जुन के शासन काल में 1451 ई. में माहुयान नामक चीनी यात्री ने समुद्री यात्रा कर विजयनगर आया था।
विरुपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.)
➣ विरुपाक्ष-II संगम वंश का अन्तिम शासक था। इसके शासनकाल में आंतरिक विघटन व वाह्य आक्रमण के फलस्वरूप संगम वंश का पतन आरंभ हो गया। विजयनगर से गोवा, कोंकण एवं उत्तरी कर्नाटक के कुछ भाग अलग हो गये।
➣ बहमनी वजीर महमूद गवा तथा उड़ीसा के गजपति नरेश कपिलेश्वर ने विजयनगर पर आक्रमण किया जिसमें बहमनी साम्राज्य ने गोवा, दाबुल और चौल तथा गजपतियों ने उदयगिरि व विजयनगर साम्राज्य के आन्ध्र प्रदेशों पर अधिकार कर लिया।
➣ 1485 ई. में विरुपाक्ष की हत्या कर दी गई।
प्रौढ़ देवराय (1485 ई.)
➣ विरुपाक्ष की हत्या के बाद कुछ समय तक प्रौढ़ देवराय गद्दी पर बैठा।
➣ प्रौढ़ देवराय के गद्दी पर बैठते ही राज्य में अराजकता व्याप्त हो गयी जिसका उल्लेख पुर्तगाली यात्री नूनीज ने भी किया है।
➣ पुर्तग़ाली यात्री नूनिज के अनुसार- इस समय विजयनगर में चारों ओर अराजकता एवं अशान्ति का माहौल था।
➣ इस अराजकतापूर्ण स्थिति को देखकर चन्द्रगिरि के गवर्नर सालुक नरसिंह के सेनानायक नरसा नायक ने राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया और नरसिंह को राजगद्दी पर बैठने के लिए निमंत्रण दिया।
➣ इन्हीं परिस्थितियों का फ़ायदा उठाकर सालुव नरसिंह के सेनानायक नरसा नायक ने राजमहल पर क़ब्ज़ा कर लिया। नरसा नायक ने सालुव नरसिंह को राजगद्दी पर बैठने के लिए निमंत्रण दिया।
इस घटना को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में प्रथम बलापहार कहा गया है।
➣ इस प्रकार विजयनगर के प्रथम वंश, संगम वंश का अंत हुआ और एक नए राजवंश, सालुव वंश की स्थापना हुई।
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