अरविडु वंश (1570-1646 ई.) : विजयनगर साम्राज्य का अंतिम चौथा राजवंश | शासक एवं प्रमुख घटनाएँ

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत अरविडु वंश (1570-1646 ई.)
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तालीकोटा युद्ध के पश्चात् की स्थिति

तालीकोटा के युद्ध (1565 ई.) में विजयनगर साम्राज्य की भीषण पराजय हुई और राजधानी विजयनगर पूर्णतः नष्ट कर दी गई। इस विनाशकारी युद्ध के पश्चात् रामराय का भाई तिरुमल, राजा सदाशिव राय को साथ लेकर वैनुगोंडा (पेनुगोंडा) आ गया और वहीं से शासन संचालित करना प्रारंभ किया।

➣ कुछ समय पश्चात् तिरुमल ने सदाशिव राय की हत्या कर दी (कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह उसकी स्वाभाविक मृत्यु के बाद हुआ) और स्वयं सत्ता पर अधिकार कर लिया।

➣ इस प्रकार विजयनगर के चतुर्थ एवं अंतिम राजवंश अरविडु वंश की स्थापना हुई।

तिरुमल (1570-72 ई.)

➣ सदाशिव राय को गद्दी से उतारकर तिरुमल ने अरविडु वंश की स्थापना की। चूँकि उसने अत्यंत विषम और संकटपूर्ण परिस्थितियों में सत्ता प्राप्त की थी, इसलिए उसे पतनशील कर्नाटक साम्राज्य का उद्धारक की उपाधि प्रदान की गई।

➣ तालीकोटा के युद्ध में मूल राजधानी विजयनगर पूर्णतः ध्वस्त हो जाने के कारण तिरुमल ने पेनुकोंडा को अपनी नई राजधानी बनाया, जहाँ से उसने साम्राज्य के पुनर्गठन का प्रयास किया।

➣ साहित्यिक दृष्टि से भी तिरुमल का काल उल्लेखनीय रहा — विद्वान भट्टमूर्ति (भट्टुमूर्ति) ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ वसुचरितम् तिरुमल को ही समर्पित किया था।

श्रीरंग प्रथम (1572-85 ई.)

➣ तिरुमल की मृत्यु के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र श्रीरंग प्रथम विजयनगर की गद्दी पर बैठा और अरविडु वंश का दूसरा शासक बना।

➣ श्रीरंग प्रथम की प्रमुख उपलब्धियों में सर्वप्रथम मत्स्य क्षेत्रीय तट (मछुआरा तटीय क्षेत्र) के उदंड मरावरों के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन करना शामिल है, जिससे तटीय क्षेत्रों में शांति स्थापित हुई।

➣ इसके अतिरिक्त उसने मुस्लिम शासकों से अहोबिलम (अहोवलम) जिले को पुनः जीतकर विजयनगर साम्राज्य के अधिकार में ले लिया, जो उसकी एक महत्वपूर्ण सैन्य सफलता मानी जाती है।

वेंकट द्वितीय (1586-1614 ई.)

➣ श्रीरंग प्रथम की कोई पुत्र-संतान नहीं थी, इसलिए उत्तराधिकार की समस्या उत्पन्न हुई। 1585 ई. में जब श्रीरंग प्रथम की मृत्यु हुई, तो उसके छोटे भाई वेंकट द्वितीय ने विजयनगर साम्राज्य की गद्दी संभाली।

➣ वेंकट द्वितीय को अरविडु वंश का महानतम शासक माना जाता है, क्योंकि अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह विजयनगर साम्राज्य की अखंडता और अस्तित्व को बनाए रखने में सफल रहा।

➣ वेंकट द्वितीय ने सर्वप्रथम चंद्रगिरि को अपना प्रशासनिक मुख्यालय बनाया। बाद में कालांतर में उसने अपना मुख्यालय पेनुकोंडा स्थानांतरित कर दिया, जो साम्राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से लिया गया निर्णय था।

1598 ई. में वेंकट द्वितीय ने अपने दरबार में ईसाई पादरियों का स्वागत किया और उन्हें अपने संपूर्ण साम्राज्य में धर्म-प्रचार करने तथा गिरजाघर (चर्च) बनवाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की, जो उसकी धार्मिक सहनशीलता की नीति को दर्शाता है।

➣ इसी नीति के अंतर्गत उसने पुर्तगालियों को वेल्लोर में गिरजाघर निर्मित करने की भी विशेष अनुमति दी।

यूरोपीय शक्तियों से संबंध (डच और अंग्रेज)

1610 ई. में वेंकट द्वितीय ने डचों (Dutch) को पुलिकट में व्यापारिक कारखाना (Factory) स्थापित करने की अनुमति प्रदान की और साथ ही उन्हें व्यापार करने की भी स्वतंत्रता दी।

➣ इस कूटनीतिक निर्णय से विदेशी शक्तियों की दृष्टि में विजयनगर साम्राज्य की प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप चंद्रगिरि में अनेक विदेशी राजनयिक मंडल (Diplomatic Missions) आने लगे और वे नियमित रूप से उसके दरबार में उपस्थित होने लगे।

➣ वेंकट द्वितीय को चित्रकला में विशेष व्यक्तिगत रुचि थी। इस रुचि के कारण उसने स्पेन के शासक फिलिप तृतीय के साथ पत्र-व्यवहार (Correspondence) किया और उनसे आग्रह करके ईसाई चित्रकारों को अपने दरबार में आमंत्रित किया।

परवर्ती शासक

➣ वेंकट द्वितीय की मृत्यु के साथ ही अरविडु वंश और संपूर्ण विजयनगर साम्राज्य दोनों का पतन प्रारंभ हो गया। इसके पश्चात् साम्राज्य की स्थिति निरंतर कमजोर होती गई।

➣ वेंकट द्वितीय के बाद क्रमशः — श्रीरंग द्वितीय (1614 ई.) अत्यंत अल्पकालीन शासन, रामदेव (1614-30 ई.), वेंकट तृतीय (1630-42 ई.), श्रीरंग तृतीय (1642-52 ई.) — यह वंश का अंतिम शासक था।

➣ इस वंश के अंतिम शासक श्रीरंग तृतीय के काल में साम्राज्य का विघटन चरम पर पहुँच गया और मैसूर, बेदनूर तथा तंजौर जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र राज्यों की स्थापना हो गई। परिणामस्वरूप विजयनगर साम्राज्य सिकुड़कर मात्र वेल्लोर के एक छोटे प्रदेश तक सीमित रह गया।

अंग्रेजों को मद्रास में अनुमति (फोर्ट सेंट जॉर्ज की नींव)

➣ वेंकट तृतीय का एक अत्यंत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली मंत्री दरमेला वेंकटप्पा था। उसी के प्रयासों से वेंकट तृतीय के शासनकाल में 1639 ई. में अंग्रेजों को कोवल (Covelong) में अनुदान (भूमि) तथा मद्रासपट्टनम में दुर्ग बनवाने की अनुमति प्रदान की गई।

➣ यही दुर्ग कालांतर में विकसित होकर प्रसिद्ध फोर्ट सेंट जॉर्ज बना, जो भारत में अंग्रेजी सत्ता के विस्तार का एक महत्वपूर्ण आधार-बिंदु साबित हुआ।

पतन

1664 ई. के युद्ध में मद्रास से संबंधित यह प्रदेश भी अंततः बीजापुर और गोलकुंडा की संयुक्त सेनाओं के अधिकार में चला गया। इस घटना के साथ ही अरविडु वंश का पूर्ण रूप से पतन हो गया।

➣ इस प्रकार विजयनगर साम्राज्य लगभग तीन शताब्दियों (1336-1650 ई.) से अधिक समय तक अस्तित्व में रहा, जो दक्षिण भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम और महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

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