विजयनगर साम्राज्य : प्रशासन, समाज, कला, साहित्य, व्यापार एवं विदेशी यात्री

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत विजयनगर साम्राज्य
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केन्द्रीय प्रशासन

➣ विजयनगर का शासन केन्द्रीय राजतंत्र पर आधारित था तथा शासन का आधार निरंकुश राजतंत्र था। राजतंत्र की संस्था सिद्धान्तः वंशानुगत थी परन्तु व्यवहार में राजवंशों का परिवर्तन होता रहता था।

राजा का पद सर्वोच्च होता था जो राज्य तथा शासन का केंद्र बिन्दु था। राजा को सामान्यतः राय कहा जाता था।

➣ प्राचीन भारत की राज्याभिषेक पद्धति के अनुरूप इस काल में राजाओं का भव्य राज्याभिषेक किया जाता था। राजा के चयन में राज्य के मंत्रियों और नायकों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

➣ राज्याभिषेक के समय विजयनगर नरेश को वैदिक राजाओं की भाँति प्रजा-पालन और निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती थी।

➣ पुत्र न होने की स्थिति में राजपरिवार के किसी योग्य पुरुष को युवराज नियुक्त किया जाता था। युवराज का राज्याभिषेक पट्टद्धाभिषेकम कहा जाता था।

➣ युवराज के अल्पायु होने की स्थिति में राजा अपने जीवन काल में ही स्वयं किसी मंत्री को उसका संरक्षक नियुक्त करता था। इस काल में कुछ महत्त्वपूर्ण संरक्षक थे- वीर नरसिंह, नरसा नायक एवं रामराय आदि।

➣ कालान्तर में यही संरक्षक व्यवस्था ही विजयनगर के पतन में बहुत कुछ ज़िम्मेदार रही।

➣ विजयनगर में संयुक्त शासक की भी परम्परा थी। जैसे हरिहरबुक्का नामक दो भाईयों ने एक साथ ही विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की और सहवर्ती शासक के रूप में शासन किया।

➣ साम्राज्य में कबलकार नाम का एक अधिकारी भी हुआ करता था, जो प्राय: सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर निर्णय देता था। इसे अरसुकवलकार के नाम से भी जाना जाता था।

➣ मौर्य शासक व्यवस्था की तरह सप्तांग व्यवस्था का अनुसरण किया गया। राजा के बाद राजपरिषद् और इसके बाद शासन संचालन के लियें केंद्रीय मंत्रिपरिषद् होती थी।

➣ प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी, जिसमें प्रधानमंत्री, मंत्री, उपमंत्री, विभागों के अध्यक्ष तथा राज्य के कुछ नज़दीक के सम्बन्धी होते थे।

➣ मंत्रिपरिषद के मुख्य अधिकारी को प्रधानी या महाप्रधानी कहा जाता था। इसकी स्थिति प्रधानमंत्री जैसी थी। इसकी तुलना मराठा कालीन पेशवा से की जा सकती है।

➣ मंत्रिपरिषद में लगभग 20 सदस्य होते थे जिनकी आयु 50 से 70 वर्ष के मध्य होती थी। मंत्रियों के चयन में आनुवंशिकता के सिद्धान्त का संभवतः अनुसरण किया जाता था।

➣ इनकी सभाएं वेंकटविलास मण्डप नामक सभागार में आयोजित की जाती थीं। मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष को सभानायक कहा जाता था।

➣ केन्द्र में दण्डनायक नाम का उच्च अधिकारी होता था। दंडनायक का अर्थ, प्रशासन का प्रमुख और सेनाओं का नायक होता था। उसे न्यायधीश, सेनापति, गर्वनर या प्रशासकीय अधिकारी आदि का कार्यभार सौंपा जाता था।

➣ कुछ अन्य अधिकारियों को कार्यकर्ता कहा जाता था। केन्द्र में एक सचिवालय की व्यवस्था होती थी, जिसमें विभागों का वर्गीकरण किया जाता था।

➣ इन विभागों में रायसम या सचिव, कर्णिकम या एकाउन्टेंट होते थे। रायसम राजा के मौखिक अधिकारों को लिपिबद्ध करता था। अन्य विभाग एवं उनके अधिकारी मानिय प्रधान, गृहमंत्री, मुद्राकर्ता, शाही-मुद्रा को रखने वाला अधिकारी आदि थे।

प्रांतीय शासन

➣ प्रान्त को मंडल एवं मंडल को कोट्म या ज़िले में विभाजित किया गया था।

➣ कोट्टम को वलनाडु भी कहा जाता था। कोट्टम का विभाजन नाडुओं में हुआ था, जिसकी स्थिति आज के परगना एवं ताल्लुका जैसी थी।

➣ नाडुओं को मेंलाग्राम में बाँटा गया था। एक मेलाग्राम के अन्तर्गत लगभग 50 गाँव होते थे।

साम्राज्य→ राज्य (मंडलम्)→ जिला (कोट्टम या वलनाडु) →परगना (नाडु)→ मेलाग्राम (50 गाँवों का समूह)→ ग्राम (उर)

उर या ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई थी।

➣ प्रान्तों के गर्वनर के रूप में राज परिवार के सदस्य या अनुभवी दण्डनायकों की नियुक्ति की जाती थी। इन्हें सिक्कों को प्रसारित करने, नये कर लगाने, पुराने कर माफ करने एवं भूमिदान करने आदि की स्वतन्त्रता प्राप्त थी।

➣ प्रान्त के गर्वनर को भू-राजस्व का एक निश्चित हिस्सा केन्द्र सरकार को देना होता था।

➣ राज्य को प्रांत , कमिश्नरी को मण्डप , जिले को कोट्टम या वलनाडु,परगना या तहसील को नाडु कहा जाता था।

➣ प्रांतों का प्रशासन गवर्नर देखते थे। इस पद पर राजकुमार व दण्डनायकों की नियुक्ति होती थी।

➣ विजयनगर में नायंकार व्यवस्था प्रांतीय शासन से एंव आयंगार व्यवस्था स्थानीय शासन से सम्बंधित थी।

नायकार व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य की प्रान्तीय प्रशासन व्यवस्था के सन्दर्भ में नायकार व्यवस्था उसका एक बहुत महत्त्वपूर्ण अंग थी। इसे विजयनगर साम्राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता बताया गया है।

➣ नायक, वे सेना नायक होते थे जिन्हें वेतन के बदले अमरम् नामक भूखण्ड प्रदान किया जाता था। अमरम् भूमि का प्रयोग करने के कारण इन्हे अमरनायक/नायक भी कहा जाता था।

➣ इन्हें अपनी आय का एक हिस्सा केन्द्रीय खजाने में जमा कराना पड़ता था व राजा की सहायता के लिए सेना भी रखनी पड़ती थी।

➣ सामान्यतः प्रान्तों में राजपरिवार के व्यक्तियों को ही गवर्नर नियुक्त किया जाता था। राजकुमार को जब गवर्नर बनाया जाता था तब उसे उदैयार कहते थे।

➣ विजयनगर काल में नायंकार व्यवस्था का सर्वाधिक प्रचलन तमिलनाडु में देखने को मिलता है।

➣ नायंकार व्यवस्था में सामन्तवादी लक्षण बहुत अधिक थे, जो विजयनगर साम्राज्य के विनाश का कारण बना।

➣ नायंकार प्रणाली सर्वप्रथम काकतीय राजवंश में विकसित हुई थी।

स्थानीय प्रशासन

➣ इस काल में भी महासभा, नाडु तथा उर का अस्तित्व तो था लेकिन नायंकारआयगार व्यवस्था के कारण स्थानीय संस्थाओं का पतन हो गया।

➣ इन ग्रामीण सभाओं को नई भूमि या अन्य प्रकार की सम्पत्ति को उपलब्ध करने व गाँव की सार्वजनिक जमीन को बेचने का अधिकार था। ये ग्राम सभाएँ राजकीय करों को भी एकत्रित करती थीं।

➣ ग्राम सभाएँ कुछ दीवानी मुकदमों का फैसला करती थीं और फौजदारी के कुछ छोटे-छोटे मामलों में भी अपराधी को दण्ड दे सकती थीं।

ब्रह्मदेय ग्रामों (ब्राह्मणों को भू-अनुदान के रूप प्रदत्त ग्राम) की सभाओं को चतुर्वेदि मंगलम् कहा गया है।

गैर ब्रह्मदेय ग्राम की सभा उर कहलाती थी। यद्यपि विजयनगर कालीन अभिलेखों में उर का उल्लेख बहुत ही कम हुआ है।

सेनेटेओवा गाँव के आय-व्यय की देखभाल करता था, तलरी गांव के चौकीदार को कहते थे। बेगरा गाँव में बेगार, मज़दूरी आदि की देखभाल करता था।

➣ ग्राम सभाएँ अपने कार्यों के लिए मन्दिरों और उपवनों जैसे स्थानों में अपनी बैठकें करती थीं।

मणियम ग्रामीण सेवक होता था। पुलिस के सिपाही या चौकीदार को तलइयार (तलारा) कहा जाता था।

नाडु

नाडु गाँव की बड़ी राजनीतिक इकाई के रूप में प्रचलित थी। नाडु की सभा को नाडु एवं सदस्यों को नात्वार कहा जाता था।

नाडु का अधिकार क्षेत्र काफी बड़ा होता था। ये स्थानीय संस्थाएं शासकीय नियंत्रण के बाहर नहीं होती थीं। नियमानुसार व्यवस्था न कर पाने पर इन्हें दण्डित किया जा सकता था।

आयंगर व्यवस्था

➣ ग्रामीण प्रशासन के संचालन के लिये प्रत्येक गाँव को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में संगठित किया गया और इनके संचालन के लिये 12 अधिकारियों की नियुक्ति की गई, जिन्हें सामूहिक रूप से आयंगर कहा गया।

➣ इन अधिकारियों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती थी। आयंगारों के पद आनुवांशिक होते थे। आयंगार अपने पदों को बेंच या गिरवी भी रख सकते थे।

➣ उन्हें वेतन के बदले लगान और कर मुक्त भूमि (मान्यम् भूमि) प्रदान की जाती थी।

➣ इन आयंगारों की बिना जानकारी के सम्पत्ति का हस्तांन्तरण और भूमि अनुदान नहीं किया जा सकता था।

सैन्य प्रशासन

➣ सैन्य विभाग को कन्दाचार कहा जाता था। इस विभाग का उच्च अधिकारी दण्डनायक या सेनापति होता था। सैनिक छावनियों को कडगम कहा जाता था।

➣ जो ब्राह्मण सैन्य अधिकारी दुर्गों की देखभाल करते थे उन्हे दुर्ग दानिक कहा जाता था।

➣ विजयनगर की सेना के चार अंग थे- पदाति, अश्वारोही, हस्तिसेना एवं तोपखाना। इसमें सबसे अधिक संख्या पदाति सेना की थी, परन्तु अधिकांश युद्धों के अश्वारोही सेना से ही जीत पाना संभव होता था।

➣ सेना का मुख्य अंग अश्व सेना था। तोपखाने का प्रयोग भी होने लगा था। घोड़ो की आपूर्ति पुर्तगालियों द्वारा की जाती थी।

➣ मुस्लिम सैनिकों की भी नियुक्ति की जाने लगी। नौसेना का अस्तित्व था।

➣ प्रान्तों में कवलिकार (कवलगर) नामक विशेष पुलिस अधिकारी भी होते थे। विजयनगर शासकों के जहाज मालदीव में बनते थे।

अब्दुर्रज्जाक के विवरण से जानकारी मिलती है कि विजयनगर साम्राज्य में पुलिस का वेतन वेश्यालयों से होने वाली आय से दिया जाता था।

➣ देवराय द्वितीय ने सेना में तुर्की धनुर्धरों को भर्ती किया था।

सैनिक, असैनिक अधिकारों को विशेष सेवाओं के बदले जो भू खण्ड दिये जाते थे, अमरम कहलाते थे।

➣ युद्ध में वीरता दिखाने वाले पुरुषों के लिए गंडपेद्र नामक पैर में धारण करने वाले कड़े को सम्मान का प्रतीक माना जाता था। प्रारम्भ में इसे युद्ध में वीरता का प्रतीक माना जाता था, परन्तु बाद में इसे सम्मान का प्रतीक माना जाने लगा।

न्याय व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य में राजा स्वयं सर्वोच्च न्यायालय था। उसकी सहायता के लिए मंत्री एवं अधिकारी होते थे।

➣ न्यायालय चार-प्रकार के होते थे। यथा- तिस्ठिता, चल, मुद्रिता व शास्त्रिता

हिन्दू विधि के सिद्धान्तों एवं देश की प्रथाओं के अनुसार दीवानी मुकदमों का निर्णय होता था। फौजदारी कानून को कठोरता से लागू किया जाता है।

चोरी, व्यभिचार एवं देश द्रोह के लिए प्राणदण्ड अथवा अंग-भंग सुनिश्चित था। इन दण्डों से ब्राह्मण मुक्त थे।

➣ प्रान्तों में प्रान्तपति तथा गाँवों में आयंगार न्याय करता था। न्याय व्यवस्था हिन्दू धर्म पर आधारित थी।

व्यापार एंव उद्योग

➣ विजयनगर काल में मलाया, बर्मा, चीन, अरब, ईरान, अफ़्रीका, अबीसीनिया एवं पुर्तग़ाल से व्यापार होता था।

घोड़े, मोती, ताँबा, कोयला, पारा, रेशम आदि विदेशों से मंगाये जाते थे। मोती फ़ारस की खाड़ी से तथा बहुमूल्य पत्थर पेगू से मंगाये जाते थे।

➣ मुख्य निर्यातक वस्तुऐं थीं – कपड़ा, चावल, गन्ना, इस्पात, मसाले, इत्र, शोरा, चीनी आदि। कृषि उत्पाद (फसल) काली मिर्च का व्यापक रूप से निर्यात किया जाता था।

➣ आयात की जाने वाली वस्तुऐं थीं – अच्छी नस्ल के घोड़े, हाथी दांत, मोती बहुमूल्य पत्थर, नारियल, पॉम, नमक आदि। सबसे महत्वपूर्ण आयातित वस्तु घोड़े थे।

➣ वहमनियों ने उत्तर भारत से हाथियों के व्यापार को अवरुद्ध कर दिया था इस कारण विजयनगर साम्राज्य द्वारा श्रीलंकापेगू से हाथियों का आयात किया जाता था।

➣ विजयनगर से हीरों का भी निर्यात किया जाता था। नूनिज ने हीरों के ऐसे बन्दरगाह की चर्चा की है, जहाँ विश्व भर में सर्वाधिक हीरों की खानें पायी जाती थीं।

➣ इस काल में महत्त्वपूर्ण व्यापारी समूह शेट्टी या चेट्टी था। दस्तकार वर्ग के व्यापारियों को वीर पांचाल कहा जाता था।

➣ मालाबार तट पर कालीकट में जहाजों का निर्माण होता था। कालीकट विजयनगर का पश्चिमी तट पर सबसे प्रमुख बन्दरगाह भी था। अरब राजदूत अब्दुर्रज्जाक के अनुसार साम्राज्य में तीन सौ बन्दरगाह थे।

वस्त्र, इत्रधातु के बर्तन बनाना यहां का मुख्य उद्योग था। खनन कार्य भी बहुत होता था। तंजौर धातु जड़ाई कला के लिए प्रसिद्ध था।

मुद्रा व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य में स्वर्ण धातु के सिक्कों का सर्वाधिक प्रचलन था जिससे साम्राज्य की समृद्धि का पता चलता है।

➣ विजयनगर का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिक्का स्वर्ण का वाराह (वज़न 52 ग्रेन) था। जिसे विदेशी यात्रियों ने हूण, परदौस (पगोड़ा) के रूप में उल्लेख किया है। इसे पोन, हूण, परदाव/परदौस या पगौड़ा भी कहा गया है।

➣ चाँदी के छोटे सिक्के तार कहलाते थे। धौरहरे भी चांदी का सिक्का था।सोने के छोटे सिक्के को प्रताप तथा फणम कहा जाता था।

➣ जीतल तांबे का सिक्का था। सिक्कों पर कन्नड़ एवं नागरी लिपि में लेख मिलते हैं। स्वर्ण मुद्राओं पर तिरूपति (भगवान वेकंटेश्वर) की मूर्ति का अंकन था।

➣ विजयनगर साम्राज्य के सिक्कों से वहां के नरेशों के धार्मिक विश्वासों का भी पता चलता है। विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक हरिहर प्रथम के स्वर्ण सिक्कों (वराह) पर हनुमान एवं गरुड़ की आकृतियाँ अंकित है।

➣ तुलुव वंश के सिक्कों पर बैल, गरुड़, उमामहेश्वर, वॅकटेश और बालकृष्ण की आकृतियाँ एवं कृष्णदेव राय के सिक्कों पर लक्ष्मी, नारायण की आकृति अंकित है।

अरविडु वंश के शासक वैष्णव धर्मानुयायी थे, अतः उनके सिक्कों पर वेंकटेश, शंख एवं चक्र अंकित हैं। तिरुमल के सिक्कों पर वराह (सुअर) का अंकन मिलता है।

➣ स्थानीय मुद्राओं के अतिरिक्त विजयनगर राज्य के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में क्रूजेडो (पुर्तगाली), दीनार (फारसी) फ्लोरिनडुकेट (इटली) मुद्राएं प्रचलित थी।

विजयनगर की मुद्रा पैगोडा और बहमनी की मुद्रा हूण थी।

सामाजिक व्यवस्था

➣ यह भारतीय इतिहास का अन्तिम साम्राज्य था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित पारस्परिक सामाजिक संरचना को सुरक्षित और सम्वर्धित करना अपना कर्त्तव्य समझता था।

➣ विजयनगर साम्राज्य में समाज चार वर्गों में विभाजित था, जो इस प्रकार थे – विप्रुल, राजलु, मोतिकिरतलु और नलवजटिवए। इनका संबंध क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र से था।

➣ चारों वर्गों में ब्राह्मण सर्वप्रमुख था। इन्हें अनेक विशेषाधिकार थे। ब्राह्मणों को कभी मृत्युदण्ड नहीं दिया जा सकता था। विजयनगर की सेना एवं शासन व्यवस्था में उन्हें ऊँचे पद प्राप्त थे।

➣ मध्य वर्गों में शेट्टी या चेट्टि नामक एक बहुत बड़ा समूह था। इनकी अनेक शाखाएँ या उपशाखाएँ थीं। अधिकांश व्यापार इन्हीं के हाथों में था।

➣ चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले तथा दस्तकार वर्ग के लोगों को वीरपांचाल कहा जाता था।

➣ निम्न व छोटे समूह के अन्तर्गत लोहार, स्वर्णकार, पीतल का काम करने वाले, बढ़ई, मूर्तिकार और जुलाहे आदि प्रमुख आते थे।

➣ जुलाहों का मन्दिर के प्रशासन एवं स्थानीय करों के आरोपण में बहुत बड़ा योगदान था। विजयनगर युगीन समाज में दस्तकरों में लोहारों और बढ़ई की स्थिति सर्वोच्च थी।

कैकोल्लार (जुलाहे) कबलत्तर अर्थात् चपरासी तथा शस्त्रवाहक, नाई और आन्ध्र प्रदेश में रेड्डी कुछ महत्त्वपूर्ण समुदायों में माने जाते हैं।

➣ इस काल में उत्तर भारत से बहुत बड़ी संख्या में लोग दक्षिण में आकर बस गये थे, इन्हें बडवा कहा जाता था।

➣ इस काल की सामाजिक व्यवस्था की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि नीची जाति के कुछ वर्गों ने ऊँची जाति के लोगों के विशेषाधिकारों को हड़प लिया। इसने नये सामाजिक तनाव को जन्म दिया।

➣ जिन निचली जातियों को उच्च जातियों के विशेषाधिकार प्रदान किये गये वे सत्-शूद्र या अच्छे शूद्र कहलाए गए।

➣ इसी प्रकार का संघर्ष वेलंगै अर्थात् दक्षिण वर्गीय तथा इडुंगै अर्थात् वाम-वर्गीय नामक दो औद्योगिक वर्गों के बीच हुआ।

वीर पांचाल दस्तकार वर्ग
कैकोल्लार जुलाहा वर्ग
तेलगु नियोगी राजकीय सचिवालय में नियुक्त ब्राह्मण
कुदि कृषक मजदूर
कंबलत्तर चपरासी
डॉबर बाजीगर (कलावाज)

दास प्रथा

➣ विजयनगर काल में दास प्रथा प्रचलित थी। समकालीन अभिलेखों में पुरुषमहिला दासों का उल्लेख प्राप्त मिलता है।

➣ इटाली यात्री निकोलो कोण्टी ने दास प्रथा का विस्तृत वर्णन किया है। मनुष्यों के क्रय-विक्रय को वेस-वग कहा जाता था।

➣ निकोली कोण्टी ने लिखा है कि“विजयनगर साम्राज्य में विशाल संख्या में दास हैं, जो कर्जदार अपना ॠण अदा नहीं कर पाते हैं, उन्हें सर्वत्र ऋणदाता द्वारा अपनी सम्पत्ति (या दास) बना लिया जाता है।

स्त्रियों की दशा

➣ विजयनगर कालीन समाज में स्त्रियों की सम्मानजनक स्थिति थी। यद्दपि समाज में बाल विवाह, देवदासी एवं सती प्रथा जैसी कुप्रथाएँ भी विद्यमान थी।

➣ संपूर्ण भारतीय इतिहास में विजयनगर ही ऐसा एकमात्र साम्राज्य था, जिसने विशाल संख्या में स्त्रियों को राजकीय पदों पर नियुक्त किया था।

➣ कुछ स्त्रियाँ न्यायधीश भी होती थी, समाज एवं साहित्य में स्त्रियों ने ऊँचा स्थान प्राप्त किया था, विभिन्न शस्त्रों के प्रयोग का उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता था

➣ स्त्रियां संगीत व नृत्य के अलावा ज्योतिष, शाही अंगरक्षक, यौद्धा, सुरक्षाकर्मी, लेखाधिकारी, महल की रक्षिकाओं आदि का कार्य भी करती थी। वे युद्धभूमि में भी जाती थी। नूनिज भी यह लिखता है।

➣ सामन्तों व उच्चवर्गों को छोड़कर बाकी समाज में एक पत्नी प्रथा प्रचलित थी। निकोलो कोन्टी लिखता है कि विजयनगर के राजा के 12000 रानियां थी। इनमें से 4000 उसके साथ हर जगह जाती थी।

बाल-विवाह सामान्य प्रथा थी। कुलीन वर्ग की कन्याओं का विवाह अल्पायु में कर दिया जाता था। कन्यादान को आदर्श विवाह माना जाता था।

➣ विजयनगर साम्राज्य में दहेज की कुरीति इतनी बढ़ गई थी कि ब्राह्मण समुदाय ने मिलकर दहेज को अवैधानिक घोषित करा दिया। 1424- 25 ई. के एक अभिलेख में दहेज को अवैधानिक घोषित किया गया।

➣ विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए कृष्णदेव राय द्वारा इसे कर मुक्त किया गया था। तथापि विधवाओं की स्थिति दयनीय थी।

पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, परन्तु सती प्रथा विद्यमान थी। सती प्रथा स्वैच्छिक थी। सामान्यतया यह प्रथा राजपरिवारों व नायक परिवार के स्त्रियों तक ही सीमित था।

1354 ई. के एक अभिलेख में माला गौडा नामक महिला का अपने पति की मृत्यु के बाद सती प्रथा का सहगमन करके स्वर्गारोहण का उल्लेख है। इस काल में इसे सहगमन अर्थात् महाप्रयाण नामों से पुकारा जाता था।

➣ इस काल में सती प्रथा का आंखों देखा वर्णन करने वाले यात्री बार्बोसा, नूनिज, सीजर फ्रेडरिक, पियत्रो देलावाले थे।

➣ सती (सहगमन) करने वाली स्त्रियों की स्मृति में सती स्मारक सतीकल (महासतीकल) अथवा महासतीगल्लु स्थापित किए जाते थे।

➣ बार्बोसा ने लिखा है कि सती प्रथा लिंगायतों, चेट्टिद्धयों और ब्राह्मणों में प्रचलित नहीं था।

➣ मंदिरों में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। ये आजीवन कुवांरी रहती थी। डोमिंगोज पायस के अनुसार विजय नगर की सामाजिक व्यवस्था में देवदासियों की अच्छी सामाजिक स्थिति थी।

देवदासी प्रथा का सर्वप्रथम उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है।

➣ गणिकाओं का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। इन्हें कौन-से दो वर्गों में बांटा गया था। पहला- जो मंदिर से संबंधित थीं दूसरा- जो स्वतंत्र जीवनयापन करती थीं।

➣ विजयनगर में मंदिर मठ एवं अग्रहार विद्या के केंद्र थे। अग्रहारों में मुख्यतः वेदों की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

राजस्व व्यवस्था

➣ कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण लगान आय का प्रमुख साधन था। इसके अतिरिक्त अन्य प्रमुख स्रोत थे जैसे- सम्पत्ति कर, व्यापारिक कर, व्यावसायिक कर, उद्योग कर, सामाजिक और सामुदायिक करअर्थदण्ड आदि।

➣ लगान का निर्धारण भूमि की उत्पादकता और उसकी स्थिति के अनुसार किया जाता था, परन्तु भूमि से होने वाली पैदावार और उसकी किस्म भू-राजस्व के निर्धारण का सबसे बड़ा आधार थी।

➣ विजयनगर काल में पूरे साम्राज्य में भू-राजस्व के दरें समान नहीं थीं। जैसे- ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली भूमि से उपज का बीसवां भाग और मन्दिरों की भूमि से उपज का तीसवां भाग लगान के रूप में लिया जाता था।

➣ अन्य विविध कर-विजयनगर साम्राज्य द्वारा वसूल किये जाने वाले विविध करों के नाम थे- कदमाई, मगसाई, कनिक्कई, कत्तनम्, वरम्, कणम्, भोगम् वारि, पत्तम, इराई और कत्तायम्

➣ लगान के अतिरिक्त मकान, पशुओं, गड़ेरियों, धोबी, मनोरंजन करने वाले व नाइयों पर भी कर लगता था। 16वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में नाइयों को व्यवसायिक कर से मुक्त कर दिया। गया। (सदाशिव राय के समय)

➣ सामाजिक करों में विवाह कर महत्वपूर्ण था। यह वरकन्या दोनों पक्षों पर लगता था। विधवा विवाह को विवाह कर से मुक्ति थी।

विधवा विवाह को विवाह कर से मुक्त करके इस प्रकार के विवाह को न केवल सामाजिक मान्यता प्रदान करने का प्रयास किया वरन् विधवाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने की चेष्टा की। (कृष्णदेव राय द्वारा)

➣ इस काल में भिखारियों, मंदिरोंवेश्याओं पर भी कर लगाए जाते थे।.

➣ विजयनगर साम्राज्य में कोई ऐसा वर्ग नहीं था, जिससे व्यवसायिक कर नहीं लिया जाता हो। रामराय ने केवल नाइयों को व्यावसायिक कर से मुक्त कर दिया।

➣ शिष्ट नामक कर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। केन्द्रीय राजस्व विभाग को अठावने (अस्थवन या अथवन) कहा जाता था।

➣ समकालीन अभिलेखों में कृष्णदेव राय द्वारा भूमिकर के सही निर्धारण के लिए सम्पूर्ण साम्राज्य की भूमि के सर्वेक्षण का उल्लेख है।

भूमि-मापक पट्टिकाओं या जंरीबों के विभिन्न नाम थे जैसे- नदलक्कुल राव्यंदकोल और गंडरायगण्डकोल

➣ भू-धारण पद्धति सिंचाई एवं कृषि मध्यकालीन भारत के अन्य प्रदेशों की भाँति विजयनगर साम्राज्य में अधिकांश जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी।

भूमि के प्रकार

➣ विजयनगर साम्राज्य में निम्नलिखित प्रकार के भू-क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है-

ब्रह्म देय ब्राह्मणों को दी गई करमुक्त भू
देवदेय मंदिरों को दी गई करमुक्त भूमि
मठापुर मठों को दी गई करमुक्त भमि
अमरम सैनिक व असैनिक अधिकारियों को विशेष सेवाओं के बदले दिया जाने वाला भू-अनुदान ।
भंडारवाद ग्राम/भूमि ऐसे ग्राम/भूमि जो केन्द्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण (खालसा की तरह) में थी तथा इस भूमि के किसान राज्य को प्रत्यक्ष कर देते थे।
उंबलि गाँवों में विशेष सेवाओं के बदले दी जाने वाली लगान मुक्त भूमि।
कुट्टगि (कुत्तगरी) बड़े भू स्वामियों, मन्दिरों व ब्राह्मणों द्वारा खेती के लिए छोटे किसानों को पट्टे पर दी गई भूमि।
रत्त (खत) कोडगै युद्ध में शौर्य प्रकट करने वाले या युद्ध में मृत सैनिकों के परिवार वालों को दी गई भूमि ।
एरिपत्ति यह जलाशय की भूमि केवल दक्षिण में ही होती थी। एरिपत्ति भूमि के राजस्व का प्रयोग ग्राम के जलाशयों की देखरेख के लिए होता था। यह पल्लव-चोलकाल से ही प्रचलित थी।
मान्या आयंगरो को प्रदत्त कर मुक्त भूमि।

सिंचाई व्यवस्था

➣ सिंचाई व्यवस्था पर विजयनगर के शासकों ने विशेष बल देते हुए नहरोंबांधों का निर्माण करवाया।

➣ यहाँ तक कि सिंचाई साधनों का विकास करने वाले को राज्य कर-मुक्त भूमि भी दे सकता था और सिंचाई साधनों के पुनर्निर्माण के लिये राज्य द्वारा स्थानीय करों की माफी का भी उल्लेख मिलता है।

➣ सिंचाई व्यवस्था में पूंजी निवेश द्वारा भी आय प्राप्त की जाती थी, जिसे तमिल क्षेत्र में दासवंदा तथा आंध्र व कर्नाटक क्षेत्र में कोट्टकुडमै कहा जाता था।

धर्म

➣ धर्म के मामले में धर्मनिरपेक्ष नीति का अनुसरण किया गया। विजयनगर के राजाओं ने अपने व्यक्तिगत धर्म के बाद भी धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया।

विट्टस्त्रल (बिठोबा) दक्षिण में विष्णु को कहा जाता था। वेंकट-II के विरुपाक्ष का स्थान भगवान वेंकटेश्वर ने ले लिया।

1556 ई. में रामराय के कहने पर सदाशिव ने श्री परेम्बटूर में रामानुज मंदिर तथा राज्योत्सव महानवमी था। उससे जुड़ी संस्थाओं के लिए 31 गांव दान में दिये थे।

➣ विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख राज्योत्सव महानवमी था।

➣ यह दक्षिण भारत का एक मात्र हिन्दू राज्य था, जिसने हिन्दू धर्म की संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखा।

भाषा

➣ विजयनगर की राजभाषा तेलुगू थी।

➣ कृष्ण देवराय का शासन काल तेलुगू भाषा का स्वर्णिम काल था।

➣ पेद्दन को तेलगू कविता के पितामहआन्ध्र कविता का पिता की उपाधि प्राप्त थी। उसकी मुख्य रचना स्वरोचितसम्भव या मनुचरितम तथा हरिकथासार है।

➣ अष्टदिग्गजों के दूसरा कवि नन्दी तिम्म था जिसने परिजातहरण की रचना की थी। नन्नया ने महाभारत का तेलगू भाषा में अनुवाद आरम्भ किया किन्तु इसे पूर्ण नहीं कर सके।

वीरभद्र ने कालिदास रचित अभिज्ञानशाकुन्तलम का तेलुगू भाषा में अनुवाद किया।

शिक्षा, संगीत एंव मनोरंजन

➣ विजयनगर नरेशों ने चोलों और पल्लवों की भाँति अपनी प्रजा की शिक्षा के लिए विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की स्थापना नहीं की, फिर भी उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा को प्रोत्साहन दिया।

➣ उन्होंने मठों और असंख्य अग्रहारों की स्थापना करके शिक्षा और ज्ञान को प्रोत्साहन दिया। मंदिर, मठ एवं अग्रहार विद्या के केन्द्र थे।

➣ प्रत्येक अग्रहार में ज्ञान की किसी विशेष शाखा में पारंगत ब्राह्मण होते थे। अग्रहारों में मुख्यतः वेदों की शिक्षा दी जाती थी।

➣ समकालीन वैष्णव सन्तों ने उत्तरदायी शिक्षा के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

तुलुव वंश ने भी विद्या एवं ज्ञान को पर्याप्त प्रश्रय दिया।

लक्ष्मी नारायण कृष्णदेव राय का दरबारी संगीतकार था। उसने संगीत सूर्योदय नामक पुस्तक की रचना की थी।

वीणा विजयनगर साम्राज्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय संगीतवाद्य था।

➣ विजयनगर काल में दक्षिण भारत की यक्षगान नृत्य परम्परा का प्रथम बार विकास हुआ।

बोमलाट (छाया नाटक) भी लोकप्रिय, जिसका आयोजन मण्डपों में किया जाता था।

➣ इसके अतिरिक्त शतरंज एवं पासा का खेल भी लोकप्रिय था। कृष्णदेव राय स्वयं शतरंज प्रेमी था। उसने प्रवीण शतरंज खिलाड़ियों को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया।

स्थापत्य कला

द्रविड़ शैली के आधार पर विजयनगर साम्राज्य का स्थापत्य विकसित हुआ।

➣ विजयनगर में मंदिर स्थापत्य की प्रोविदा शैली थी। यह बेसर शैली का ही एक रूप थी। कृष्णदेव राय ने हजारा राम एवं विट्टस्त्रलस्वामी मंदिर का निर्माण कराया।

➣ कृष्णदेव राय ने चिदम्बरम मंदिर का निर्माण, पार्वती का मंदिर तथा कांचीपुरम में बरदराजएकम्बरनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।

➣ तिरुपति मंदिर में कृष्ण देवराय व उसकी पत्नियां तिरुमलचिन्ता देवी तथा वैंकेट प्रथम की मूर्तियां हैं।

➣ अमान मंडप (देवता की पत्नी के लिए पृथक मन्दिर), हजार स्तम्भों का मण्डपकल्याण मण्डप प्रोविदा शैली की विशेषता थी।

➣ विजयनगर वास्तुकला की अन्तिम शैली को मदुरा शैली कहा जाता है क्योंकि इसे सर्वाधिक प्रोत्साहन मदुरा के नायकों ने दिया।

➣ विजयनगर काल में चित्रकला की स्वतंत्र शैली विकसित हुयी। विजयनगर की चित्रकला, लिपाक्षी कला के नाम से जानी जाती है। इस चित्रकला के विषय रामायणमहाभारत से लिए गए हैं।

साहित्य कला

सायण ने वेदों पर व हेमाद्रि ने धर्मशास्त्रों पर टीका लिखी। सायण ने सुधानिधि की रचना की थी।

➣ कृष्णदेवराय ने तेलुगू को संस्कृत के प्रभाव से मुक्त किया जिसके कारण तेलुगू भाषा की स्वतंत्र रचना प्रबन्ध का निर्माण हो सका।

पाण्डुरंग माहात्म्य एवं उद्भटाचार्य चरित के लेखक तेनाली राम कृष्ण देवराय के दरबार में थे।

➣ माघव विद्यारण्य ने पाराशर स्मृति पर कालनिर्णय नामक टीका लिखी जो 1335 ई. से 1360 ई. के बीच लिखी गई। काल निर्णय में विजयनगर के शासकों का इतिहास दिया।

➣ श्रीनाथ ने श्रृंगार दीपिका एवं श्रृंगार नैषध की रचना की। देवराय द्वितीय ने नानाख्या से महाभारत का तेलुगू अनुवाद करवाया।

हरिहर के शासन में आनन्द भूषण ने रामायण का तेलुगू अनुवाद किया।

➣ कृष्णदेवराय के दरबारी संगीतकार लक्ष्मीनारायण ने संगीत सर्वोदय एवं रामामात्य ने स्वरमेव कलानिधि की रचना की।

➣ कुमार कंपन की पत्नी गंगा देवी ने अपने पति द्वारा मदुरा विजय का अपने ग्रन्थ मदुरा विजयम में उल्लेख किया है। कुमार कंपन हरिहर प्रथम का सेना नायक एंव बुक्का प्रथम का पुत्र था।

तेलुगू साहित्य के पाँच महाकाव्य

1. आमुक्त माल्यद कृष्णदेवराय
2. मनुकारिता/मनुचरितम अल्लासानी पेद्दना
3. वसुचरित भट्टमूर्ति
4. राघव पाण्डवीयम पिंगली सूरल
5. पाण्डुरंग माहात्म्य तेनालीराम

मधूरा कन्नड़ भाषा के प्रथम विद्वान थे। केतन ने कन्नड़ में दण्डी के दशकुमार चरित का अनुवाद किया जिसके कारण उसे अभिनव की उपाधि मिली।

श्रीनाथ ने देवराय द्वितीय के काल में हरविलासम् की रचना की। कृष्णदेव राय के दरबार में राजकवि पेद्दना के अलावा परिजात पहरण के लेखक नन्दी तिमन, ‘परसभूपालियम’ के लेखक भट्टमूर्ति भी थे।

समकालीन विदेशी यात्री

यात्रीदेशशासकविवरण
अब्दुर्रज्जाकफारसदेवराय प्रथम विजयनगर सचिवालय का वर्णन
निकोलो कॉण्टी इटलीदेवराय प्रथम विजयनगर शहर का वर्णन
डोमिंगो पायसपुर्तगालीकृष्णदेवराय विजयनगर के शिल्प व व्यापार का वर्णन
बारबोसापुर्तगाली कृष्णदेवराय सतीप्रथा का वर्णन
सीजर फ्रेडरिकपुर्तगालीतालीकोट युद्ध के बाद विजयनगर का वर्णन
नूनीजपुर्तगाली अच्युत देवराय सती प्रथा का उल्लेख
निकितिनरूसमुहम्मद तृतीय विजयनगर की असमानता का वर्णन

साम्राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

नायकबड़े सेनानायक
महानायकाचार्यग्राम सभाओं का निरीक्षक अधिकारी
दण्डनायकसैनिक विभाग प्रमुख
महाप्रधानीमंत्रिपरिषद का प्रमुख
रायसमसचिव
कर्णिकमलेखाधिकारी
अमरनायकसैन्य मदद देने वाला सामंतों का वर्ग
आयंगावंशानुगत ग्रामीण अधिकारी
पलाइयागार (पालिगार)जमीदार
स्थानिकमंदिरों की व्यवस्था करने वाला
सेनंटओवाग्राम का लेखाधिकारी
तलरग्राम का रखवाला
गौडग्राम प्रशासक
अत्रिमारग्राम प्रशासन का एक अधिकारी
परूपत्यगारराजा या गर्वनर का प्रतिनिधि

दक्कनी राज्यों के प्रमुख व्यक्ति

बहमनी महमूद गँवा (सदाशिव का वजीर, तालीकोटा का युद्ध )
अहमद नगर मलिक अम्बर (छापेमार युद्ध नीति के लिए प्रसिद्ध )
गोलकुंडा मीर जुमला
बीजापुरअफजल खां (छत्रपति शिवाजी द्वारा मारा गया)
विजयनगर नरसा, नायक, कुमार कंपन (मदुरा विजय , बुक्का प्रथम का पुत्र )

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