विजयनगर साम्राज्य : प्रशासन, समाज, कला, साहित्य, व्यापार एवं विदेशी यात्री

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत विजयनगर साम्राज्य
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केन्द्रीय प्रशासन

➣ विजयनगर साम्राज्य का शासन केन्द्रीयकृत राजतंत्र पर आधारित था। शासन व्यवस्था का स्वरूप निरंकुश राजतंत्र का था, जिसमें राजा राज्य का सर्वोच्च शासक एवं प्रशासन का मुख्य केंद्र होता था।

➣ यद्यपि राजसत्ता सिद्धांततः वंशानुगत थी, किन्तु व्यवहार में समय-समय पर विभिन्न राजवंशों का उदय एवं परिवर्तन भी होता रहा।

➣ विजयनगर के शासक को सामान्यतः राय (Raya) कहा जाता था। राजा के हाथों में कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा सैन्य प्रशासन की सर्वोच्च शक्तियाँ निहित थीं। वह राज्य का सर्वोच्च सेनापति, न्यायाधीश तथा संरक्षक माना जाता था।

➣ विजयनगर के राजाओं का वैदिक परंपरा के अनुसार अत्यंत भव्य राज्याभिषेक किया जाता था। राज्याभिषेक के अवसर पर राजा प्रजा की रक्षा, न्याय, धर्मपालन एवं राज्य के कल्याण की शपथ ग्रहण करता था।

➣ राजा के चयन एवं उत्तराधिकार के प्रश्न में मंत्रियों तथा नायकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। अनेक अवसरों पर इन्हीं के समर्थन से नए शासक का चयन किया जाता था।

➣ सामान्यतः राजा का ज्येष्ठ पुत्र युवराज बनाया जाता था। यदि राजा का पुत्र न हो, तो राजपरिवार के किसी योग्य पुरुष को युवराज नियुक्त किया जाता था। युवराज के राज्याभिषेक को पट्टाभिषेकम् कहा जाता था।

➣ यदि युवराज अल्पायु होता था, तो राजा अपने जीवनकाल में ही किसी योग्य मंत्री अथवा सेनानायक को उसका संरक्षक नियुक्त कर देता था। नरसा नायक, वीर नरसिंह तथा रामराय ऐसे प्रमुख संरक्षक थे।

➣ कालांतर में यही संरक्षक व्यवस्था अत्यधिक शक्तिशाली हो गई, जिसके कारण राजसत्ता कमजोर हुई और विजयनगर साम्राज्य के पतन में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

➣ विजयनगर साम्राज्य में संयुक्त शासन की परंपरा भी देखने को मिलती है। इसका प्रमुख उदाहरण हरिहर प्रथम एवं बुक्का प्रथम हैं, जिन्होंने प्रारम्भिक काल में संयुक्त रूप से शासन किया।

➣ सामाजिक एवं धार्मिक विवादों के निपटारे के लिए कबलकार नामक अधिकारी नियुक्त किया जाता था। इसे अरसु कवलकार भी कहा जाता था।

सप्तांग सिद्धांत

➣ विजयनगर की शासन व्यवस्था में प्राचीन भारतीय राजनीतिक परंपरा के सप्तांग सिद्धांत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसके अनुसार राज्य के सात प्रमुख अंग माने गए थे-

राज्य का अंग अर्थ
स्वामी राजा
अमात्य मंत्री एवं प्रशासनिक अधिकारी
जनपद राज्य का भू-भाग एवं प्रजा
दुर्ग सुरक्षा एवं रक्षा व्यवस्था
कोष राजकोष एवं वित्त
दण्ड सेना एवं दण्ड व्यवस्था
मित्र मित्र राज्य एवं कूटनीतिक संबंध

➣ शासन व्यवस्था में राजा के बाद राजपरिषद् तथा उसके पश्चात् मंत्रिपरिषद् का स्थान था, जो प्रशासनिक कार्यों में राजा की सहायता करती थी।

मंत्रिपरिषद् एवं प्रमुख केन्द्रीय अधिकारी

➣ केन्द्रीय प्रशासन के संचालन के लिए एक संगठित मंत्रिपरिषद् होती थी, जिसमें प्रधानमंत्री, मंत्री, उपमंत्री, विभिन्न विभागों के अध्यक्ष तथा राजपरिवार के कुछ विश्वसनीय सदस्य सम्मिलित होते थे।

➣ मंत्रिपरिषद् के प्रधान अधिकारी को प्रधानी अथवा महाप्रधानी कहा जाता था। यह राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता था तथा उसकी स्थिति आधुनिक प्रधानमंत्री के समान मानी जाती है।

➣ कुछ इतिहासकार इसकी तुलना मराठा शासन के पेशवा से भी करते हैं, क्योंकि दोनों ही शासन संचालन में अत्यंत प्रभावशाली पदों पर थे।

➣ मंत्रिपरिषद् में सामान्यतः लगभग 20 सदस्य होते थे। अधिकांश मंत्री अनुभवी एवं वरिष्ठ आयु वर्ग (लगभग 50–70 वर्ष) के होते थे। कई पदों पर आनुवंशिक परंपरा का भी प्रभाव दिखाई देता है।

➣ मंत्रिपरिषद् की बैठकों का आयोजन वेंकटविलास मण्डप नामक सभागार में किया जाता था तथा इसकी अध्यक्षता सभानायक करता था।

अधिकारी मुख्य कार्य
महाप्रधानी (प्रधानी) प्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय प्रशासन का प्रमुख अधिकारी
दण्डनायक उच्च प्रशासनिक अधिकारी। आवश्यकता अनुसार सेनापति, न्यायाधीश, राज्यपाल अथवा प्रशासक का कार्य करता था।
रायसम सचिव। राजा के मौखिक आदेशों को लिखित रूप देता था तथा शासकीय अभिलेख तैयार करता था।
कर्णिकम लेखाकार। आय-व्यय एवं राजकीय अभिलेखों का लेखा-जोखा रखता था।
मानिय प्रधान भूमि अनुदान एवं मान्य भूमि से संबंधित कार्यों का अधिकारी।
मुद्राकर्ता राजकीय मुहर एवं शाही दस्तावेजों का प्रभारी अधिकारी।
कार्यकर्ता विभिन्न विभागों में नियुक्त प्रशासनिक अधिकारी।

केन्द्रीय सचिवालय

➣ विजयनगर साम्राज्य में एक सुव्यवस्थित केन्द्रीय सचिवालय भी था, जहाँ विभिन्न विभागों का स्पष्ट वर्गीकरण किया गया था। प्रत्येक विभाग के लिए अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।

➣ सचिवालय में रायसम (सचिव), कर्णिकम (लेखाकार), मानिय प्रधान, मुद्राकर्ता, गृह विभाग तथा अन्य विभागीय अधिकारी कार्य करते थे। इन अधिकारियों के माध्यम से सम्पूर्ण केन्द्रीय प्रशासन का संचालन किया जाता था।

प्रांतीय शासन

➣ प्रशासनिक सुविधा एवं प्रभावी शासन के लिए विजयनगर साम्राज्य को अनेक प्रांतों (मंडलम्) में विभाजित किया गया था। प्रत्येक प्रांत के अंतर्गत कई प्रशासनिक इकाइयाँ होती थीं।

➣ विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक संरचना निम्नलिखित प्रकार थी-

प्रशासनिक इकाई विवरण
साम्राज्य सम्पूर्ण विजयनगर राज्य
मंडलम् (प्रांत) साम्राज्य की प्रमुख प्रशासनिक इकाई
कोट्टम / वलनाडु जिला (District)
नाडु परगना अथवा तहसील के समान प्रशासनिक इकाई
मेलाग्राम लगभग 50 गाँवों का समूह
उर (ग्राम) प्रशासन की सबसे छोटी इकाई

कोट्टम को वलनाडु भी कहा जाता था। इसके अंतर्गत अनेक नाडु होते थे, जिनकी स्थिति आधुनिक परगना अथवा तहसील के समान मानी जाती है।

➣ प्रत्येक नाडु को कई मेलाग्रामों में विभाजित किया जाता था तथा प्रत्येक मेलाग्राम के अंतर्गत सामान्यतः लगभग 50 गाँव होते थे।

उर (ग्राम) प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी, जहाँ स्थानीय स्तर पर प्रशासन एवं दैनिक कार्यों का संचालन किया जाता था।

➣ प्रत्येक मंडलम् (प्रांत) का प्रशासन एक गवर्नर के अधीन होता था। इस पद पर सामान्यतः राजपरिवार के सदस्य अथवा अनुभवी दण्डनायक नियुक्त किए जाते थे।

➣ प्रांतीय गवर्नरों को प्रशासनिक मामलों में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त थी। उन्हें आवश्यकता पड़ने पर नए कर लगाने, पुराने करों में छूट देने, भूमि अनुदान (भूमिदान) करने तथा कुछ परिस्थितियों में सिक्कों का प्रचलन करने का अधिकार प्राप्त था।

➣ यद्यपि प्रांतीय गवर्नरों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे, फिर भी उन्हें भू-राजस्व का एक निश्चित भाग नियमित रूप से केन्द्रीय सरकार को भेजना अनिवार्य था।

नायकार व्यवस्था

नायकार व्यवस्था विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक एवं सैनिक व्यवस्था की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक थी। इस व्यवस्था ने साम्राज्य के विस्तार, प्रांतीय प्रशासन तथा सैन्य संगठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नायक ऐसे सैनिक अधिकारी अथवा सामन्त होते थे, जिन्हें वेतन के स्थान पर अमरम् नामक भू-भाग प्रदान किया जाता था। इसी कारण इन्हें अमरनायक अथवा नायक कहा जाता था।

अमरम् भूमि से प्राप्त आय का उपयोग नायक अपने प्रशासन तथा सेना के रख-रखाव में करते थे। उन्हें अपनी आय का एक निश्चित भाग केन्द्रीय राजकोष में जमा कराना पड़ता था।

➣ प्रत्येक नायक को अपने अधीन एक निश्चित संख्या में सैनिक, घुड़सवार एवं अन्य सैन्य बल रखना अनिवार्य था। युद्ध अथवा आवश्यकता पड़ने पर इन्हें राजा की सहायता के लिए अपनी सेना सहित उपस्थित होना पड़ता था।

➣ नायकों को अपने क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, कर संग्रह करने तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन करने का भी अधिकार प्राप्त था।

➣ विजयनगर काल में नायकार व्यवस्था का सर्वाधिक विकास एवं प्रचलन तमिलनाडु क्षेत्र में देखने को मिलता है।

➣ इस व्यवस्था में सामन्तवादी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट दिखाई देती थीं। समय के साथ अनेक नायक अत्यधिक शक्तिशाली एवं स्वायत्त हो गए, जिससे केन्द्रीय सत्ता कमजोर हुई। इसे विजयनगर साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारणों में से एक माना जाता है।

➣ इतिहासकारों के अनुसार नायकार प्रणाली का प्रारम्भ सर्वप्रथम काकतीय राजवंश में हुआ था, जिसे बाद में विजयनगर शासकों ने विकसित एवं संगठित रूप प्रदान किया।

नायकार व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ विवरण
अधिकारी नायक (अमरनायक)
वेतन अमरम् नामक भूमि
मुख्य कार्य सैनिक सहायता, कर संग्रह एवं स्थानीय प्रशासन
राजा के प्रति दायित्व राजकोष में आय का भाग जमा करना तथा आवश्यकता पड़ने पर सेना उपलब्ध कराना
प्रमुख क्षेत्र तमिलनाडु
उद्गम काकतीय राजवंश

स्थानीय प्रशासन

➣ विजयनगर काल में स्थानीय प्रशासन के स्तर पर महासभा, नाडु तथा उर जैसी प्राचीन संस्थाएँ विद्यमान थीं। यद्यपि नायकार एवं आयंगार व्यवस्था के प्रभाव के कारण इन संस्थाओं की स्वायत्तता पहले की अपेक्षा कम हो गई थी।

➣ ग्राम सभाओं को नई भूमि अथवा अन्य प्रकार की सम्पत्ति उपलब्ध कराने, सार्वजनिक भूमि के विक्रय तथा स्थानीय प्रशासन से संबंधित अनेक अधिकार प्राप्त थे।

➣ ग्राम सभाएँ राजकीय करों के संग्रह में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं तथा करों को राज्य तक पहुँचाने का कार्य करती थीं।

➣ स्थानीय स्तर पर ग्राम सभाएँ कुछ दीवानी मुकदमों का निपटारा करती थीं तथा छोटे-छोटे फौजदारी मामलों में भी दण्ड देने का अधिकार रखती थीं।

ब्रह्मदेय ग्रामों (ब्राह्मणों को दान में दिए गए ग्राम) की सभाओं को चतुर्वेदी मंगलम् कहा जाता था।

गैर-ब्रह्मदेय ग्रामों की ग्राम सभा को उर कहा जाता था, यद्यपि विजयनगरकालीन अभिलेखों में इसका उल्लेख अपेक्षाकृत कम मिलता है।

➣ ग्राम प्रशासन में विभिन्न अधिकारी नियुक्त होते थे। तलरी गाँव का चौकीदार होता था, बेगरा बेगार एवं श्रमिक व्यवस्था की देखरेख करता था तथा मणियम ग्रामीण सेवक के रूप में कार्य करता था।

➣ पुलिस के सिपाही अथवा चौकीदार को तलइयार (तलारा) कहा जाता था।

➣ ग्राम सभाएँ अपने प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यों के लिए सामान्यतः मंदिरों, उपवनों अथवा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बैठकें आयोजित करती थीं।

स्थानीय संस्था / अधिकारी कार्य
महासभा ब्रह्मदेय ग्रामों का स्थानीय प्रशासन
उर गैर-ब्रह्मदेय ग्रामों की ग्राम सभा
तलरी गाँव का चौकीदार
बेगरा बेगार एवं श्रमिक व्यवस्था की देखरेख
मणियम ग्रामीण सेवक
तलइयार (तलारा) पुलिस सिपाही / सुरक्षा कर्मी

आयंगार व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य में ग्रामीण प्रशासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए प्रत्येक गाँव को एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में संगठित किया गया था।

➣ प्रत्येक गाँव में 12 अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी, जिन्हें सामूहिक रूप से आयंगार कहा जाता था। ये अधिकारी गाँव के प्रशासन, राजस्व संग्रह तथा अभिलेखों के रख-रखाव का कार्य करते थे।

➣ आयंगार अधिकारियों की नियुक्ति राज्य द्वारा की जाती थी। इनके पद सामान्यतः आनुवंशिक होते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर वे अपने पदों को बेच अथवा गिरवी भी रख सकते थे।

➣ इन्हें नियमित वेतन के स्थान पर कर-मुक्त भूमि (मान्यम् भूमि) तथा लगान से प्राप्त आय का एक भाग दिया जाता था।

➣ गाँव में भूमि का हस्तांतरण, भूमि-अनुदान अथवा अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्य आयंगार अधिकारियों की जानकारी एवं स्वीकृति के बिना नहीं किए जा सकते थे।

आयंगार व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ विवरण
अधिकारियों की संख्या 12
नियुक्ति राज्य द्वारा
पद का स्वरूप आनुवंशिक
पारिश्रमिक कर-मुक्त मान्यम् भूमि एवं लगान का हिस्सा
मुख्य कार्य ग्राम प्रशासन, राजस्व संग्रह एवं भूमि संबंधी कार्यों का संचालन
व्यवस्था मुख्य विशेषता
नायकार व्यवस्था सैनिक एवं प्रांतीय प्रशासन से संबंधित व्यवस्था। अमरम् भूमि के बदले सैन्य सेवा।
आयंगार व्यवस्था ग्राम प्रशासन से संबंधित व्यवस्था। 12 अधिकारियों द्वारा स्थानीय प्रशासन का संचालन।

सैन्य प्रशासन

➣ विजयनगर साम्राज्य की शक्ति का प्रमुख आधार उसकी सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था थी। साम्राज्य की सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा तथा राज्य विस्तार में सेना की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

➣ सैन्य विभाग को कन्दाचार कहा जाता था। इस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी दण्डनायक अथवा सेनापति होता था, जो सेना के संगठन, संचालन तथा युद्ध संबंधी कार्यों का प्रमुख होता था।

➣ सैनिक छावनियों को कडगम कहा जाता था। दुर्गों की सुरक्षा एवं देखरेख के लिए नियुक्त ब्राह्मण सैन्य अधिकारियों को दुर्ग-दानायक (दुर्ग दानिक) कहा जाता था।

विजयनगर सेना के प्रमुख अंग

➣ विजयनगर की सेना मुख्यतः चार भागों में विभाजित थी-

सेना का अंग विशेषता
पदाति सेना सेना का सबसे बड़ा भाग। सैनिकों की संख्या सर्वाधिक थी।
अश्वारोही सेना सेना का सबसे प्रभावशाली अंग। युद्धों में विजय का प्रमुख आधार।
हस्ति सेना युद्ध एवं दुर्गों पर आक्रमण में प्रयुक्त।
तोपखाना उत्तरकाल में बारूद एवं तोपों का प्रयोग आरम्भ हुआ।

➣ यद्यपि सैनिकों की संख्या पदाति सेना में सर्वाधिक थी, किन्तु युद्धों में सफलता का प्रमुख आधार अश्वारोही सेना मानी जाती थी।

➣ विजयनगर में उत्तम नस्ल के घोड़ों का अभाव था, इसलिए घोड़ों का आयात मुख्यतः अरब, फारस तथा बाद में पुर्तगालियों के माध्यम से किया जाता था।

➣ समय के साथ सेना में तोपखाने का प्रयोग भी प्रारम्भ हो गया तथा देवराय द्वितीय ने सेना की दक्षता बढ़ाने के लिए तुर्की धनुर्धरों एवं मुस्लिम सैनिकों की भी नियुक्ति की।

➣ विजयनगर साम्राज्य के पास एक नौसेना भी थी, जिसका उपयोग मुख्यतः समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा तथा तटीय क्षेत्रों की रक्षा के लिए किया जाता था। विजयनगर के जहाज मालदीव सहित विभिन्न तटीय क्षेत्रों में निर्मित किए जाते थे।

पुलिस व्यवस्था

➣ प्रांतों में कवलिकार (कवलगर) नामक विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाते थे, जिनका मुख्य कार्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा अपराधों पर नियंत्रण रखना था।

➣ फारसी यात्री अब्दुर्रज्जाक के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में पुलिस अधिकारियों के वेतन का एक भाग वेश्यालयों से प्राप्त कर अथवा उनसे होने वाली आय से दिया जाता था।

सैन्य सम्मान

➣ युद्ध में असाधारण वीरता एवं उत्कृष्ट सेवा के लिए सैनिकों को गंडपेन्द्र नामक पैरों में धारण किए जाने वाले स्वर्ण कड़े से सम्मानित किया जाता था। प्रारम्भ में यह वीरता का प्रतीक था, किन्तु बाद में यह सामान्य राजकीय सम्मान का प्रतीक बन गया।

सैन्य पद / शब्द अर्थ / कार्य
कन्दाचार सैन्य विभाग
दण्डनायक सेनापति / सैन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी
कडगम सैनिक छावनी
दुर्ग-दानायक दुर्गों की देखरेख करने वाला अधिकारी
कवलिकार विशेष पुलिस अधिकारी
गंडपेन्द्र वीरता एवं सम्मान का प्रतीक स्वर्ण कड़ा

न्याय व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य की न्याय व्यवस्था मुख्यतः हिन्दू धर्मशास्त्रों, परम्पराओं तथा स्थानीय रीति-रिवाजों पर आधारित थी। न्याय प्रदान करना राजा का प्रमुख दायित्व माना जाता था।

राजा न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी एवं सर्वोच्च न्यायालय माना जाता था। वह जटिल एवं महत्त्वपूर्ण मामलों में स्वयं न्याय करता था। न्यायिक कार्यों में उसकी सहायता मंत्री, दण्डनायक तथा अन्य उच्च अधिकारी करते थे।

➣ विजयनगर साम्राज्य में न्यायालय मुख्यतः चार प्रकार के माने गए हैं-

न्यायालय कार्य
तिष्ठिता स्थायी न्यायालय
चल भ्रमणशील (चल) न्यायालय
मुद्रिता राजकीय मुहर (मुद्रा) से अधिकृत न्यायालय
शास्त्रिता धर्मशास्त्रों एवं विधि-ग्रंथों के आधार पर न्याय करने वाला न्यायालय

दीवानी मामलों का निर्णय हिन्दू विधि, धर्मशास्त्रों तथा स्थानीय प्रथाओं के आधार पर किया जाता था, जबकि फौजदारी कानून अपेक्षाकृत कठोर था।

चोरी, व्यभिचार, देशद्रोह तथा अन्य गंभीर अपराधों के लिए प्राणदण्ड, अंग-भंग अथवा अन्य कठोर दण्ड दिए जाते थे। समकालीन व्यवस्था में सामान्यतः ब्राह्मणों को मृत्युदण्ड से छूट प्राप्त थी।

➣ प्रांतीय स्तर पर प्रांतपति (गवर्नर) न्यायिक कार्यों का संचालन करता था, जबकि ग्राम स्तर पर आयंगार तथा स्थानीय ग्राम संस्थाएँ छोटे-छोटे विवादों का निपटारा करती थीं।

➣ इस प्रकार विजयनगर की न्याय व्यवस्था में राजा, प्रांतीय अधिकारी तथा स्थानीय संस्थाएँ सभी न्यायिक प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

व्यापार एवं उद्योग

➣ विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि का प्रमुख आधार कृषि, उद्योग तथा आंतरिक एवं विदेशी व्यापार था। साम्राज्य के विभिन्न देशों के साथ व्यापक व्यापारिक संबंध स्थापित थे।

➣ विजयनगर का व्यापार मलाया, बर्मा (म्यांमार), चीन, अरब, ईरान (फारस), अफ्रीका, अबीसीनिया (इथियोपिया), श्रीलंका तथा पुर्तगाल जैसे देशों से होता था।

आयात एवं निर्यात

आयात की प्रमुख वस्तुएँ निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ
अच्छी नस्ल के घोड़े, मोती, ताँबा, पारा, रेशम, हाथीदाँत, बहुमूल्य पत्थर, नारियल, पाम, नमक आदि। सूती वस्त्र, चावल, गन्ना, चीनी, इस्पात, मसाले, काली मिर्च, इत्र, शोरा, हीरे आदि।

➣ विजयनगर के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण आयातित वस्तु उत्तम नस्ल के घोड़े थे। इनका आयात मुख्यतः अरब, फारस तथा बाद में पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से किया जाता था।

मोती मुख्यतः फारस की खाड़ी से तथा बहुमूल्य रत्न पेगू (वर्तमान म्यांमार) से मंगाए जाते थे।

➣ बहमनी राज्य द्वारा उत्तर भारत से हाथियों के व्यापार में बाधा उत्पन्न किए जाने के कारण विजयनगर शासकों को श्रीलंका एवं पेगू से हाथियों का आयात करना पड़ता था।

➣ विजयनगर साम्राज्य हीरों के लिए भी प्रसिद्ध था। नूनिज ने अपने विवरण में ऐसे क्षेत्र का उल्लेख किया है जहाँ विश्व की प्रसिद्ध हीरे की खानें स्थित थीं।

➣ विजयनगर काल में शेट्टी (चेट्टी) सबसे प्रमुख व्यापारी समुदाय था, जबकि दस्तकार एवं शिल्पकार वर्ग के व्यापारियों को वीर पांचाल कहा जाता था।

➣ पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह था तथा मालाबार तट जहाज निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।

➣ फारसी यात्री अब्दुर्रज्जाक के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में लगभग 300 बंदरगाह थे, जो उसके विकसित समुद्री व्यापार के प्रमाण माने जाते हैं।

प्रमुख उद्योग एवं व्यापारिक गतिविधियाँ

➣ विजयनगर काल में वस्त्र उद्योग, इत्र निर्माण, धातु के बर्तन, धातु जड़ाई कला तथा खनन उद्योग विशेष रूप से विकसित थे।

तंजौर धातु जड़ाई कला के लिए प्रसिद्ध था, जबकि विभिन्न क्षेत्रों में लौह एवं अन्य धातुओं से संबंधित उद्योगों का भी पर्याप्त विकास हुआ था।

महत्वपूर्ण तथ्य विवरण
प्रमुख व्यापारी समुदाय शेट्टी (चेट्टी)
दस्तकार व्यापारी वीर पांचाल
प्रमुख बंदरगाह कालीकट
प्रमुख आयात घोड़े
प्रमुख निर्यात सूती वस्त्र, मसाले, काली मिर्च, हीरे
प्रसिद्ध उद्योग वस्त्र, धातु उद्योग, इत्र, खनन

मुद्रा व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि का प्रमुख प्रमाण उसकी विकसित मुद्रा व्यवस्था थी। यहाँ मुख्यतः स्वर्ण मुद्राओं का व्यापक प्रचलन था, जिससे साम्राज्य की सम्पन्नता एवं सुदृढ़ व्यापारिक व्यवस्था का पता चलता है।

➣ विजयनगर की सर्वाधिक प्रसिद्ध स्वर्ण मुद्रा वराह थी, जिसका भार लगभग 52 ग्रेन होता था। विदेशी यात्रियों ने इसे हूण, परदाओ/परदौस तथा पगोडा जैसे नामों से उल्लेखित किया है। इसे पोन (Pon) भी कहा जाता था।

➣ स्वर्ण मुद्रा के अतिरिक्त प्रताप तथा फणम छोटे स्वर्ण सिक्के थे। तार तथा धौरहरे चाँदी की मुद्राएँ थीं, जबकि जीटल ताँबे का सिक्का था।

➣ विजयनगर के सिक्कों पर कन्नड़ एवं नागरी लिपि में लेख अंकित मिलते हैं। अनेक स्वर्ण मुद्राओं पर तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर सहित विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियाँ अंकित थीं।

➣ विजयनगर के सिक्कों से शासकों की धार्मिक आस्था का भी पता चलता है। हरिहर प्रथम के स्वर्ण सिक्कों पर हनुमान तथा गरुड़ की आकृतियाँ अंकित मिलती हैं।

तुलुव वंश के सिक्कों पर बैल, गरुड़, उमामहेश्वर, वेंकटेश तथा बालकृष्ण की आकृतियाँ मिलती हैं। कृष्णदेवराय के सिक्कों पर लक्ष्मी एवं नारायण का अंकन प्राप्त होता है।

अरविडु वंश के शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। अतः उनके सिक्कों पर वेंकटेश, शंख तथा चक्र के चिह्न अंकित मिलते हैं। तिरुमल के सिक्कों पर वराह (सूअर) की आकृति भी अंकित मिलती है।

➣ स्थानीय मुद्राओं के अतिरिक्त विजयनगर साम्राज्य के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में विदेशी व्यापार के कारण क्रूजेडो (पुर्तगाली), दीनार (फारसी), फ्लोरिन तथा डुकेट (इटली) जैसी विदेशी मुद्राओं का भी प्रचलन था।

विजयनगर की प्रमुख मुद्राएँ

मुद्रा धातु / विशेषता
वराह (पगोडा) प्रमुख स्वर्ण मुद्रा (लगभग 52 ग्रेन)
प्रताप छोटी स्वर्ण मुद्रा
फणम छोटी स्वर्ण मुद्रा
तार चाँदी का सिक्का
धौरहरे चाँदी का सिक्का
जीटल ताँबे का सिक्का

➣ विजयनगर की प्रमुख स्वर्ण मुद्रा वराह थी, जिसे विदेशी यात्रियों ने पगोडा, हूण, पोन तथा परदाओ जैसे नामों से भी उल्लेखित किया है।

सामाजिक व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य भारतीय इतिहास का अंतिम प्रमुख हिन्दू साम्राज्य था, जिसने वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित सामाजिक संरचना को संरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान किया। समाज धर्म, परम्पराओं तथा वर्ण-व्यवस्था के आधार पर संगठित था।

➣ विजयनगर कालीन समाज मुख्यतः चार वर्गों में विभाजित था, जिन्हें क्रमशः विप्रुल, राजलु, मोतिकिरतलु तथा नलवजटिवए कहा जाता था। इनका संबंध क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों से माना जाता है।

विजयनगर का सामाजिक वर्ग संबंधित वर्ण
विप्रुल ब्राह्मण
राजलु क्षत्रिय
मोतिकिरतलु वैश्य
नलवजटिवए शूद्र

ब्राह्मणों की स्थिति

➣ विजयनगर समाज में ब्राह्मण सर्वाधिक सम्मानित एवं प्रभावशाली वर्ग था। उन्हें अनेक धार्मिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

➣ ब्राह्मणों को सामान्यतः मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था। वे प्रशासन, न्याय, शिक्षा, धार्मिक कार्यों तथा सेना के उच्च पदों पर भी नियुक्त किए जाते थे।

➣ अनेक ब्राह्मण राजकीय सचिवालय, मंत्रिपरिषद् तथा अन्य प्रशासनिक विभागों में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे।

व्यापारी, दस्तकार एवं अन्य समुदाय

➣ मध्य वर्ग में शेट्टी (चेट्टी) समुदाय सबसे प्रमुख व्यापारी वर्ग था। यह अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं में विभाजित था तथा साम्राज्य के अधिकांश व्यापार पर इनका नियंत्रण था।

➣ व्यापार एवं शिल्प से जुड़े दस्तकार वर्ग को वीर पांचाल कहा जाता था। इस वर्ग में लोहार, स्वर्णकार, बढ़ई, मूर्तिकार, पीतल के कारीगर तथा अन्य शिल्पकार सम्मिलित थे।

➣ विजयनगर काल में दस्तकारों में लोहार तथा बढ़ई का स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था, क्योंकि सैन्य उपकरणों, कृषि औजारों तथा भवन निर्माण में इनकी प्रमुख भूमिका थी।

जुलाहे (कैकोल्लार) वस्त्र निर्माण के अतिरिक्त मंदिर प्रशासन एवं स्थानीय कर व्यवस्था में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते थे।

➣ विजयनगर समाज में विभिन्न व्यवसायों एवं सेवाओं से जुड़े अनेक समुदाय विद्यमान थे, जिनका प्रशासन एवं सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान था।

समुदाय / वर्ग मुख्य कार्य
शेट्टी (चेट्टी) प्रमुख व्यापारी वर्ग
वीर पांचाल दस्तकार एवं शिल्पकार वर्ग
कैकोल्लार जुलाहा (बुनकर) समुदाय
तेलुगु नियोगी राजकीय सचिवालय में नियुक्त ब्राह्मण अधिकारी
कुदि कृषक मजदूर
कंबलत्तर चपरासी / राजकीय सेवक
डॉबर बाजीगर (कलाबाज़)

➣ इस काल में उत्तर भारत से बड़ी संख्या में लोग दक्षिण भारत में आकर बस गए थे। इन्हें बडवा कहा जाता था।

सामाजिक परिवर्तन

➣ विजयनगर कालीन समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि कुछ निम्न जातियों ने समय के साथ उच्च जातियों के कुछ सामाजिक एवं प्रशासनिक विशेषाधिकार प्राप्त कर लिए, जिससे समाज में नए प्रकार के सामाजिक परिवर्तन एवं तनाव उत्पन्न हुए।

➣ जिन निम्न जातियों को उच्च सामाजिक अधिकार प्राप्त हुए, उन्हें सत्-शूद्र अथवा अच्छे शूद्र कहा जाने लगा।

➣ इस काल में वेलंगै (दक्षिण वर्ग) तथा इडंगै (वाम वर्ग) नामक दो प्रमुख औद्योगिक एवं व्यावसायिक समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष भी देखने को मिलता है।

महत्त्वपूर्ण शब्द अर्थ
सत्-शूद्र विशेष सामाजिक अधिकार प्राप्त शूद्र वर्ग
वेलंगै दक्षिण वर्गीय औद्योगिक / व्यावसायिक समूह
इडंगै वाम वर्गीय औद्योगिक / व्यावसायिक समूह
बडवा उत्तर भारत से दक्षिण भारत में आकर बसने वाले लोग

दास प्रथा

➣ विजयनगर काल में दास प्रथा प्रचलित थी। समकालीन अभिलेखों एवं विदेशी यात्रियों के विवरणों से पुरुष तथा महिला दासों दोनों का उल्लेख प्राप्त होता है।

➣ इटली के प्रसिद्ध यात्री निकोलो कोण्टी (Nicolo Conti) ने विजयनगर साम्राज्य में प्रचलित दास प्रथा का विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुसार मनुष्यों के क्रय-विक्रय को वेस-वर्ग (Ves-Varga) कहा जाता था।

➣ निकोलो कोण्टी के अनुसार जो व्यक्ति अपना ऋण चुकाने में असमर्थ रहते थे, उन्हें अनेक बार ऋणदाता अपना दास बना लेता था। इस प्रकार ऋण-दासता (Debt Slavery) भी प्रचलित थी।

➣ दासों का उपयोग मुख्यतः घरेलू कार्यों, कृषि, सेवा कार्यों तथा अन्य श्रमप्रधान कार्यों में किया जाता था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य विवरण
विदेशी यात्री निकोलो कोण्टी
मनुष्यों का क्रय-विक्रय वेस-वर्ग
दास बनने का प्रमुख कारण ऋण न चुका पाना (ऋण-दासता)

स्त्रियों की दशा

➣ विजयनगर कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति सामान्यतः सम्मानजनक थी। उन्हें प्रशासन, साहित्य, संगीत, नृत्य तथा अन्य सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने का अवसर प्राप्त था।

➣ यद्यपि समाज में बाल-विवाह, देवदासी प्रथा तथा सती प्रथा जैसी कुप्रथाएँ भी विद्यमान थीं, फिर भी अन्य समकालीन राज्यों की तुलना में विजयनगर में स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है।

➣ विजयनगर भारतीय इतिहास का ऐसा प्रमुख साम्राज्य था, जहाँ बड़ी संख्या में स्त्रियों को राजकीय पदों पर नियुक्त किया गया। वे प्रशासन, सुरक्षा तथा महल की व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

➣ कुछ स्त्रियाँ न्यायाधीश के पद पर भी कार्य करती थीं। इसके अतिरिक्त वे साहित्य, संगीत, नृत्य तथा ज्योतिष के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित थीं।

➣ स्त्रियों को शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता था। वे शाही अंगरक्षक, महल की रक्षिका, सुरक्षाकर्मी, लेखाधिकारी तथा आवश्यकता पड़ने पर योद्धा के रूप में भी कार्य करती थीं। नूनिज ने भी इसका उल्लेख किया है।

➣ सामन्तों एवं उच्च वर्ग को छोड़कर समाज के अधिकांश भाग में एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी। उच्च वर्ग एवं राजपरिवार में बहुपत्नी प्रथा का भी प्रचलन था।

निकोलो कोण्टी के अनुसार विजयनगर के राजा के लगभग 12,000 रानियाँ थीं, जिनमें से लगभग 4,000 विभिन्न अवसरों पर उसके साथ रहती थीं। इतिहासकार इस विवरण को यात्री का व्यक्तिगत वर्णन मानते हैं, अतः इसकी संख्या को अतिशयोक्तिपूर्ण भी माना जाता है।

बाल-विवाह समाज में सामान्य प्रथा थी। विशेषकर कुलीन वर्ग की कन्याओं का विवाह कम आयु में ही कर दिया जाता था। कन्यादान को आदर्श विवाह माना जाता था।

➣ विजयनगर काल में दहेज प्रथा का भी व्यापक प्रचलन था। 1424–25 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि ब्राह्मण समुदाय के प्रयासों से दहेज लेने-देने को अवैधानिक घोषित किया गया था।

कृष्णदेवराय ने विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इसे कर-मुक्त घोषित किया था। इसके बावजूद समाज में विधवाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं थी।

➣ विजयनगर काल में पर्दा प्रथा का विशेष प्रचलन नहीं था, किन्तु सती प्रथा विद्यमान थी। सामान्यतः यह प्रथा राजपरिवार तथा नायक परिवारों की स्त्रियों तक ही सीमित थी।

➣ समकालीन स्रोतों के अनुसार सती प्रथा को प्रायः स्वैच्छिक माना जाता था तथा इसे सहगमन अथवा महाप्रयाण भी कहा जाता था।

1354 ई. के एक अभिलेख में माला गौडा नामक महिला द्वारा अपने पति की मृत्यु के बाद सती होने का उल्लेख मिलता है।

बार्बोसा, नूनिज, सीजर फ्रेडरिक तथा पियत्रो डेला वाले जैसे विदेशी यात्रियों ने सती प्रथा का प्रत्यक्ष अथवा विस्तृत वर्णन किया है।

➣ सती होने वाली स्त्रियों की स्मृति में सतीकल (महासतीकल) अथवा महासतीगल्लु नामक स्मारक स्थापित किए जाते थे।

बार्बोसा के अनुसार लिंगायतों, चेट्टियों तथा ब्राह्मणों में सती प्रथा का प्रचलन नहीं था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य विवरण
विदेशी यात्री निकोलो कोण्टी, नूनिज, बार्बोसा, सीजर फ्रेडरिक, पियत्रो डेला वाले
आदर्श विवाह कन्यादान
दहेज संबंधी अभिलेख 1424–25 ई.
विधवा विवाह कृष्णदेवराय ने कर-मुक्त किया
सती प्रथा का अन्य नाम सहगमन / महाप्रयाण
सती स्मारक सतीकल (महासतीकल) / महासतीगल्लु

➣ विजयनगर साम्राज्य में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। देवदासियाँ मंदिरों से संबद्ध होती थीं तथा अपना संपूर्ण जीवन मंदिर सेवा, धार्मिक अनुष्ठानों, संगीत एवं नृत्य को समर्पित करती थीं। सामान्यतः उनका विवाह नहीं किया जाता था।

➣ देवदासियाँ धार्मिक उत्सवों, मंदिरों की दैनिक पूजा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं। वे संगीत एवं नृत्य कला में विशेष रूप से प्रशिक्षित होती थीं।

➣ पुर्तगाली यात्री डोमिंगोज पायस के अनुसार विजयनगर समाज में देवदासियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक थी तथा उन्हें समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

➣ इतिहासकारों के अनुसार देवदासी प्रथा का प्रारम्भिक उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है, जबकि दक्षिण भारत में मध्यकाल के दौरान यह व्यवस्था विशेष रूप से विकसित हुई।

देवदासी प्रथा की प्रमुख विशेषताएँ विवरण
संबंध मंदिरों से
मुख्य कार्य पूजा, धार्मिक अनुष्ठान, संगीत एवं नृत्य
वैवाहिक स्थिति सामान्यतः अविवाहित रहती थीं
विदेशी यात्री डोमिंगोज पायस

➣ विजयनगर समाज में गणिकाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। वे संगीत, नृत्य तथा अन्य सांस्कृतिक कलाओं में दक्ष होती थीं।

➣ समकालीन स्रोतों के अनुसार गणिकाओं को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया गया था-

गणिकाओं का वर्ग विशेषता
मंदिर से संबंधित गणिकाएँ धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में भाग लेती थीं।
स्वतंत्र गणिकाएँ स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करती थीं।

राजस्व व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी, इसलिए भू-राजस्व (लगान) राज्य की आय का सबसे प्रमुख स्रोत था। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति कर, व्यापारिक कर, व्यावसायिक कर, उद्योग कर, सामाजिक एवं सामुदायिक कर तथा अर्थदण्ड आदि से भी पर्याप्त आय प्राप्त होती थी।

➣ विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख भूमिकर शिष्ट (Shisti) कहलाता था। यह राज्य की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता था।

भूमिकर एवं अन्य प्रमुख कर

➣ भूमि से लिया जाने वाला लगान भूमि की उत्पादकता, उर्वरता, सिंचाई की सुविधा तथा उत्पादित फसल के आधार पर निर्धारित किया जाता था। विभिन्न क्षेत्रों में भू-राजस्व की दरें समान नहीं थीं।

➣ सामान्यतः भूमि की उपज एवं उसकी गुणवत्ता के अनुसार कर निर्धारित किया जाता था। उपजाऊ भूमि पर अपेक्षाकृत अधिक तथा कम उपजाऊ भूमि पर कम कर लगाया जाता था।

➣ विजयनगर साम्राज्य में विभिन्न प्रकार की भूमियों पर अलग-अलग दर से भू-राजस्व लिया जाता था। उदाहरणार्थ-

  • ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली भूमि से सामान्यतः उपज का 1/20 भाग लिया जाता था।
  • मंदिरों की भूमि से सामान्यतः उपज का 1/30 भाग कर के रूप में वसूल किया जाता था।

➣ भू-राजस्व के अतिरिक्त विजयनगर साम्राज्य में अनेक प्रकार के कर लगाए जाते थे। अभिलेखों में कदमाई, मगसाई, कनिक्कई, कत्तनम्, वरम्, कणम्, भोगम्, वारि, पत्तम, इराई तथा कत्तायम् जैसे करों का उल्लेख मिलता है।

➣ राज्य द्वारा मकानों, पशुओं, गड़ेरियों, धोबियों, मनोरंजन करने वाले कलाकारों तथा नाइयों पर भी विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे।

सदाशिव राय के शासनकाल में नाइयों को व्यावसायिक कर से मुक्त कर दिया गया था।

➣ सामाजिक करों में विवाह कर का विशेष महत्त्व था। यह कर वर तथा कन्या-दोनों पक्षों से लिया जाता था।

विधवा विवाह को विवाह कर से मुक्त रखा गया था। इसका उद्देश्य विधवा विवाह को सामाजिक मान्यता देना तथा विधवाओं की स्थिति में सुधार करना था।

कृष्णदेवराय ने भी विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए इस नीति का समर्थन किया।

➣ समकालीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि विजयनगर काल में भिखारियों, वेश्याओं तथा कुछ परिस्थितियों में मंदिरों पर भी कर लगाया जाता था।

➣ विजयनगर साम्राज्य में लगभग प्रत्येक व्यवसाय किसी-न-किसी प्रकार के कर के अंतर्गत आता था। रामराय ने केवल नाइयों को व्यावसायिक कर से मुक्त किया था।

राजस्व विभाग

➣ विजयनगर साम्राज्य का केन्द्रीय राजस्व विभाग अठावने (अथवन/अस्थवन) कहलाता था। इसी विभाग के माध्यम से राजस्व संग्रह, लेखा-जोखा तथा कर व्यवस्था का संचालन किया जाता था।

➣ राज्य की आय का सबसे बड़ा भाग भूमिकर (शिष्ट) से प्राप्त होता था, जबकि अन्य करों से भी राजकोष को पर्याप्त आय होती थी।

भूमि सर्वेक्षण एवं मापन

कृष्णदेवराय ने भूमिकर का उचित निर्धारण करने के उद्देश्य से सम्पूर्ण साम्राज्य की भूमि का सर्वेक्षण कराया। इससे भूमि की वास्तविक उपज, क्षेत्रफल एवं कर निर्धारण में सुविधा हुई।

➣ भूमि की माप के लिए विशेष भूमि-मापक पट्टिकाओं (जरीबों) का उपयोग किया जाता था। इनके प्रमुख नाम नदलक्कुल राव्यंदकोल तथा गंडरायगण्डकोल थे।

➣ विजयनगर साम्राज्य की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता था। तालाबों, बाँधों, नहरों तथा जलाशयों का निर्माण एवं संरक्षण राज्य की महत्त्वपूर्ण नीति का भाग था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य विवरण
राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व (शिष्ट)
केन्द्रीय राजस्व विभाग अठावने (अथवन)
भूमि सर्वेक्षण कृष्णदेवराय द्वारा
ब्राह्मण भूमि पर कर उपज का 1/20 भाग
मंदिर भूमि पर कर उपज का 1/30 भाग
विवाह कर से मुक्त विधवा विवाह
व्यावसायिक कर से मुक्त नाई (रामराय / सदाशिव राय के काल में उल्लेख)
भूमि मापक नदलक्कुल राव्यंदकोल, गंडरायगण्डकोल

भूमि के प्रकार एवं भू-धारण व्यवस्था

➣ विजयनगर साम्राज्य में भूमि को उसके स्वामित्व, उपयोग, कर व्यवस्था तथा अनुदान के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक प्रकार की भूमि का उद्देश्य एवं प्रशासनिक महत्त्व अलग-अलग था।

भूमि का प्रकार विवरण
ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दान स्वरूप प्रदान की जाने वाली कर-मुक्त भूमि
देवदेय मंदिरों को धार्मिक कार्यों एवं उनके रख-रखाव के लिए दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि
मठापुर मठों एवं धार्मिक संस्थाओं को प्रदान की जाने वाली कर-मुक्त भूमि
अमरम् सैनिक एवं असैनिक अधिकारियों को विशेष सेवाओं के बदले दिया जाने वाला भू-अनुदान। इस भूमि के धारक अमरनायक कहलाते थे।
भंडारवाद ग्राम / भूमि केन्द्र सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली भूमि। इस भूमि से प्राप्त कर सीधे राजकोष में जमा होता था। इसकी तुलना मुगलकाल की खालसा भूमि से की जाती है।
उंबलि ग्राम स्तर पर विशेष सेवाओं के बदले प्रदान की जाने वाली लगान-मुक्त भूमि
कुट्टगि (कुत्तगि) बड़े भू-स्वामियों, मंदिरों अथवा ब्राह्मणों द्वारा छोटे किसानों को पट्टे (Lease) पर दी जाने वाली भूमि।
रत्त (खत) कोडगै युद्ध में वीरता दिखाने वाले सैनिकों अथवा युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिवारों को पुरस्कार स्वरूप दी जाने वाली भूमि।
एरिपत्ति जलाशयों से संबंधित भूमि, जिसकी आय का उपयोग तालाबों एवं जलाशयों के रख-रखाव के लिए किया जाता था। यह व्यवस्था पल्लव एवं चोल काल से प्रचलित थी।
मान्या आयंगार अधिकारियों को प्रदान की जाने वाली कर-मुक्त भूमि

➣ विजयनगर साम्राज्य में भूमि अनुदान केवल धार्मिक संस्थाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि सैनिक अधिकारियों, प्रशासनिक कर्मचारियों तथा ग्राम सेवकों को भी उनकी सेवाओं के बदले भूमि प्रदान की जाती थी।

ब्रह्मदेय, देवदेय, मठापुर, उंबलि तथा मान्या जैसी भूमियाँ सामान्यतः कर-मुक्त होती थीं।

अमरम् भूमि के माध्यम से सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को पारिश्रमिक दिया जाता था। इसी व्यवस्था ने आगे चलकर नायकार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।

भंडारवाद भूमि पर राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण होता था, इसलिए इससे प्राप्त सम्पूर्ण राजस्व सीधे केन्द्रीय कोष में जमा किया जाता था।

कुट्टगि व्यवस्था के माध्यम से बड़े भू-स्वामी अपनी भूमि छोटे किसानों को खेती के लिए पट्टे पर देते थे, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती थी।

भूमि किसे दी जाती थी कर की स्थिति
ब्रह्मदेय ब्राह्मण कर-मुक्त
देवदेय मंदिर कर-मुक्त
मठापुर मठ कर-मुक्त
अमरम् सैनिक एवं अधिकारी सेवा के बदले भू-अनुदान
भंडारवाद राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में कर सीधे राजकोष में
उंबलि ग्राम सेवक लगान-मुक्त
कुट्टगि पट्टेदार किसान पट्टे पर दी जाने वाली भूमि
रत्त (खत) कोडगै वीर सैनिक / सैनिकों के परिवार पुरस्कार स्वरूप भूमि
एरिपत्ति जलाशय रख-रखाव हेतु आय जलाशयों पर व्यय होती थी
मान्या आयंगार अधिकारी कर-मुक्त

➣ विजयनगर के शासकों ने कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा भू-राजस्व में वृद्धि के उद्देश्य से सिंचाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने अनेक नहरों, बाँधों, तालाबों तथा b>जलाशयों का निर्माण एवं मरम्मत करवाई।

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➣ राज्य द्वारा सिंचाई साधनों के निर्माण एवं संरक्षण को प्रोत्साहित किया जाता था। जो व्यक्ति अथवा संस्था तालाब, बाँध या अन्य सिंचाई साधनों का निर्माण कराती थी, उसे पुरस्कारस्वरूप कर-मुक्त भूमि भी प्रदान की जा सकती थी।

➣ सिंचाई साधनों के पुनर्निर्माण एवं मरम्मत के लिए कई बार राज्य द्वारा स्थानीय करों में छूट अथवा कर-माफी भी दी जाती थी, जिससे जनसहभागिता को बढ़ावा मिलता था।

➣ सिंचाई परियोजनाओं के लिए निजी पूँजी निवेश को भी प्रोत्साहित किया जाता था। इसके बदले निवेशकर्ताओं को सिंचाई से होने वाली आय में भागीदारी अथवा अन्य आर्थिक लाभ प्राप्त होते थे।

➣ सिंचाई व्यवस्था से संबंधित इस प्रकार के निवेश को तमिल क्षेत्र में दासवंदा तथा आंध्र एवं कर्नाटक क्षेत्र में कोट्टकुडमै कहा जाता था।

महत्त्वपूर्ण शब्द अर्थ / विशेषता
दासवंदा तमिल क्षेत्र में सिंचाई परियोजनाओं में निजी पूँजी निवेश की व्यवस्था
कोट्टकुडमै आंध्र एवं कर्नाटक क्षेत्र में सिंचाई निवेश की व्यवस्था
राजकीय प्रोत्साहन सिंचाई साधनों के निर्माण पर कर-मुक्त भूमि एवं करों में छूट

धर्म

➣ विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। यद्यपि अधिकांश शासक शैव अथवा वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने अन्य सम्प्रदायों एवं धर्मों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखा।

➣ विजयनगर दक्षिण भारत का प्रमुख हिन्दू साम्राज्य था, जिसने मध्यकाल में हिन्दू धर्म, संस्कृति तथा परम्पराओं के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ दक्षिण भारत में विट्ठल (विठोबा) को भगवान विष्णु का रूप माना जाता था तथा विजयनगर काल में विट्ठल एवं विरुपाक्ष दोनों की व्यापक पूजा होती थी।

➣ उत्तरकाल में विशेषकर अरविडु वंश के समय भगवान वेंकटेश्वर की उपासना का प्रभाव बढ़ गया और तिरुपति एक प्रमुख धार्मिक केन्द्र के रूप में विकसित हुआ।

1556 ई. में रामराय के आग्रह पर सदाशिव राय ने श्रीपेरम्बदूर स्थित रामानुज मंदिर एवं उससे संबंधित संस्थाओं के लिए 31 गाँव दानस्वरूप प्रदान किए।

➣ विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख राज्योत्सव महानवमी था, जिसे अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता था। इस अवसर पर राजकीय समारोह, सैन्य प्रदर्शन, धार्मिक अनुष्ठान तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।

महत्त्वपूर्ण तथ्य विवरण
धार्मिक नीति धार्मिक सहिष्णुता
प्रमुख राज्योत्सव महानवमी
1556 ई. का दान सदाशिव राय द्वारा रामानुज मंदिर को 31 गाँव
प्रमुख धार्मिक केन्द्र तिरुपति (वेंकटेश्वर)

भाषा एवं साहित्य

➣ विजयनगर साम्राज्य में संस्कृत, तेलुगू, कन्नड़ तथा तमिल भाषाओं का विकास हुआ, किन्तु तेलुगू को विशेष राजकीय संरक्षण प्राप्त था। इसी कारण इसे विजयनगर साम्राज्य की प्रमुख राजकीय भाषा माना जाता है।

कृष्णदेवराय का शासनकाल तेलुगू साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है। उन्होंने स्वयं भी साहित्य सृजन किया तथा अनेक विद्वानों एवं कवियों को संरक्षण प्रदान किया।

➣ कृष्णदेवराय के दरबार में प्रसिद्ध अष्टदिग्गज विद्यमान थे, जिन्होंने तेलुगू साहित्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

अल्लसानी पेद्दन को तेलुगू कविता का पितामह तथा आन्ध्र कविता का पिता कहा जाता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ स्वारोचिष-सम्भव (जिसे मनुचरित्रम् भी कहा जाता है) तथा हरिकथासार हैं।

नन्दी तिम्मन, जो अष्टदिग्गजों में प्रमुख स्थान रखते थे, ने प्रसिद्ध ग्रंथ पारिजातापहरणम् (परिजातहरण) की रचना की।

नन्नय ने महाभारत का तेलुगू भाषा में अनुवाद प्रारम्भ किया, किन्तु वे इसे पूर्ण नहीं कर सके। बाद में अन्य विद्वानों ने इस कार्य को आगे बढ़ाया।

वीरभद्र ने कालिदास के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् का तेलुगू भाषा में अनुवाद किया, जिससे संस्कृत एवं तेलुगू साहित्य के बीच सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा मिला।

साहित्यकार प्रमुख रचना / योगदान
अल्लसानी पेद्दन स्वारोचिष-सम्भव (मनुचरित्रम्), हरिकथासार। तेलुगू कविता के पितामह
नन्दी तिम्मन पारिजातापहरणम् (परिजातहरण)
नन्नय महाभारत का तेलुगू अनुवाद प्रारम्भ किया
वीरभद्र अभिज्ञानशाकुन्तलम् का तेलुगू अनुवाद

शिक्षा, संगीत एवं मनोरंजन

शिक्षा

➣ विजयनगर के शासकों ने चोल एवं पल्लव शासकों की भाँति राज्य द्वारा बड़े पैमाने पर विद्यालय एवं महाविद्यालय स्थापित नहीं किए, फिर भी उन्होंने शिक्षा एवं विद्या को पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया।

➣ शिक्षा के विकास के लिए शासकों ने मठों, मंदिरों तथा अग्रहारों को संरक्षण दिया। ये संस्थाएँ उस समय के प्रमुख शिक्षा केन्द्र थे।

अग्रहारों में मुख्यतः वेद, वेदांग, दर्शन, व्याकरण तथा अन्य शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी। प्रत्येक अग्रहार में किसी-न-किसी विषय के विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे।

➣ समकालीन वैष्णव संतों तथा विभिन्न धार्मिक मठों ने भी शिक्षा एवं ज्ञान के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ विशेष रूप से तुलुव वंश के शासकों ने विद्वानों, साहित्यकारों एवं शिक्षण संस्थाओं को पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया।

संगीत

➣ विजयनगर काल में संगीत तथा नृत्य कला का उल्लेखनीय विकास हुआ। राजाओं द्वारा संगीतज्ञों एवं कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया जाता था।

लक्ष्मी नारायण, कृष्णदेवराय के दरबार का प्रसिद्ध संगीतज्ञ था। उसने संगीत सूर्योदय नामक ग्रंथ की रचना की।

➣ विजयनगर काल का सबसे लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित वाद्य यंत्र वीणा था।

➣ इसी काल में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध यक्षगान नृत्य-नाट्य परंपरा का प्रारम्भिक विकास हुआ, जिसने आगे चलकर कर्नाटक एवं तटीय क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान बनाई।

मनोरंजन

➣ विजयनगर काल में बोमलाट (छाया नाटक) जनसामान्य के बीच अत्यंत लोकप्रिय मनोरंजन का साधन था। इसका मंचन प्रायः मंडपों तथा सार्वजनिक स्थलों पर किया जाता था।

➣ इसके अतिरिक्त शतरंज, पासा तथा अन्य खेल भी लोकप्रिय थे।

कृष्णदेवराय स्वयं शतरंज का प्रेमी था तथा उसने कुशल शतरंज खिलाड़ियों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान किया।

क्षेत्र महत्त्वपूर्ण तथ्य
शिक्षा केन्द्र मंदिर, मठ एवं अग्रहार
प्रमुख ग्रंथ संगीत सूर्योदय
दरबारी संगीतज्ञ लक्ष्मी नारायण
प्रमुख वाद्य वीणा
प्रमुख नृत्य परंपरा यक्षगान
लोकप्रिय लोकनाट्य बोमलाट (छाया नाटक)
लोकप्रिय खेल शतरंज एवं पासा

स्थापत्य कला

➣ विजयनगर साम्राज्य की स्थापत्य कला का विकास मुख्यतः द्रविड़ शैली के आधार पर हुआ। इस शैली में चोल, पाण्ड्य, होयसाल तथा चालुक्य स्थापत्य परम्पराओं का समन्वय दिखाई देता है।

➣ विजयनगर काल में मंदिर स्थापत्य की एक विशिष्ट शैली विकसित हुई, जिसे सामान्यतः विजयनगर शैली अथवा प्रौढ़ द्रविड़ शैली कहा जाता है। इसमें द्रविड़ शैली के साथ बेसर शैली के कुछ तत्वों का भी प्रभाव दिखाई देता है।

कृष्णदेवराय ने विजयनगर स्थापत्य को विशेष संरक्षण दिया। उसके शासनकाल में हजारा राम मंदिर तथा विट्ठलस्वामी मंदिर का उल्लेखनीय विकास एवं विस्तार हुआ।

➣ कृष्णदेवराय ने चिदम्बरम् मंदिर, पार्वती मंदिर तथा कांचीपुरम् स्थित वरदराज (वरदराज पेरुमल) मंदिर एवं एकाम्बरेश्वर (एकाम्बरनाथ) मंदिर के निर्माण एवं विस्तार में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

तिरुपति स्थित श्री वेंकटेश्वर मंदिर में कृष्णदेवराय, उनकी रानियाँ तिरुमला देवी एवं चिन्ना देवी तथा वेंकट द्वितीय की प्रतिमाएँ स्थापित हैं।

विजयनगर स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ

➣ विजयनगर शैली के मंदिरों में विशाल गोपुरम्, कल्याण मण्डप, सहस्र (हजार) स्तम्भों वाले मण्डप, अम्मन (अम्मान) मण्डप तथा अत्यंत कलात्मक स्तम्भ इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।

अम्मन मण्डप मुख्य देवता की पत्नी (देवी) को समर्पित पृथक मण्डप होता था, जबकि कल्याण मण्डप का उपयोग धार्मिक उत्सवों एवं देव-विवाह समारोहों के आयोजन के लिए किया जाता था।

➣ विजयनगर स्थापत्य के उत्तरकालीन रूप को मदुरा शैली कहा जाता है, क्योंकि इसे मदुरा (मदुरै) के नायक शासकों ने विशेष संरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान किया।

चित्रकला

➣ विजयनगर काल में चित्रकला की एक स्वतंत्र शैली का विकास हुआ, जिसे लेपाक्षी चित्रकला के नाम से जाना जाता है।

➣ लेपाक्षी शैली के चित्रों का मुख्य विषय रामायण, महाभारत, पुराणों तथा हिन्दू धार्मिक आख्यान थे। इन चित्रों में धार्मिक कथाओं के साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का भी सुंदर चित्रण मिलता है।

स्थापत्य / कला महत्त्वपूर्ण तथ्य
मुख्य स्थापत्य शैली द्रविड़ शैली (विजयनगर / प्रौढ़ द्रविड़ शैली)
प्रमुख मंदिर हजारा राम मंदिर, विट्ठलस्वामी मंदिर
प्रमुख स्थापत्य विशेषताएँ गोपुरम्, कल्याण मण्डप, अम्मन मण्डप, सहस्र स्तम्भ मण्डप
उत्तरकालीन शैली मदुरा शैली
प्रमुख चित्रकला शैली लेपाक्षी चित्रकला
चित्रकला के प्रमुख विषय रामायण, महाभारत एवं पुराण

➣ विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने संस्कृत, तेलुगू, कन्नड़ तथा तमिल साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। विशेषकर कृष्णदेवराय के शासनकाल में साहित्य एवं विद्वानों को अभूतपूर्व राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।

संस्कृत साहित्य

सायण ने चारों वेदों पर प्रसिद्ध भाष्य (टीका) लिखी, जिसे वैदिक साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। उन्होंने सुभाषित सुधानिधि सहित अनेक ग्रंथों की भी रचना की।

हेमाद्रि ने धर्मशास्त्रों पर महत्त्वपूर्ण टीकाएँ लिखीं, जिनका मध्यकालीन भारतीय धर्म एवं विधि साहित्य में विशेष स्थान है।

माधव विद्यारण्य ने पाराशर स्मृति पर कालनिर्णय नामक टीका लिखी। इस ग्रंथ में तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के साथ विजयनगर के प्रारम्भिक इतिहास का भी उल्लेख मिलता है।

तेलुगू साहित्य

➣ विजयनगर काल विशेषकर कृष्णदेवराय के शासनकाल को तेलुगू साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है। उन्होंने तेलुगू भाषा एवं साहित्य को विशेष संरक्षण प्रदान किया।

➣ कृष्णदेवराय के दरबार में प्रसिद्ध अष्टदिग्गज विद्यमान थे, जिन्होंने तेलुगू साहित्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

अल्लसानी पेद्दन को तेलुगू कविता का पितामह तथा आन्ध्र कविता का पिता कहा जाता है। उनकी प्रमुख रचना स्वारोचिष-सम्भव (मनुचरित्रम्) है।

नन्दी तिम्मन ने प्रसिद्ध ग्रंथ पारिजातापहरणम् की रचना की।

तेनाली रामकृष्ण (तेनालीराम) ने पाण्डुरंग माहात्म्य तथा उद्भटाराध्य चरितम् की रचना की।

श्रीनाथ ने श्रृंगार नैषधम्, श्रृंगार दीपिका तथा हरविलासम् जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।

नन्नय ने महाभारत का तेलुगू भाषा में अनुवाद प्रारम्भ किया, जिसे बाद में अन्य विद्वानों ने पूर्ण किया।

वीरभद्र ने कालिदास के प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् का तेलुगू अनुवाद किया।

अन्य प्रमुख साहित्यकार

हरिहर प्रथम के शासनकाल में आनन्द भूषण ने रामायण का तेलुगू अनुवाद किया।

देवराय द्वितीय ने विद्वानों को संरक्षण दिया तथा उनके काल में महाभारत का तेलुगू अनुवाद आगे बढ़ाया गया।

कुमार कम्पन की पत्नी गंगा देवी ने अपने प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ मधुरा विजयम् में कुमार कम्पन द्वारा मदुरै विजय का विस्तृत वर्णन किया है।

संगीत संबंधी ग्रंथ

लक्ष्मीनारायण, कृष्णदेवराय के दरबार के प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। उन्होंने संगीत सूर्योदय की रचना की।

रामामात्य ने भारतीय संगीत पर प्रसिद्ध ग्रंथ स्वरमेलकलानिधि की रचना की।

तेलुगू साहित्य के पाँच महाकाव्य

महाकाव्य रचनाकार
आमुक्तमाल्यदा कृष्णदेवराय
मनुचरित्रम् (स्वारोचिष-सम्भव) अल्लसानी पेद्दन
वसुचरित्र भट्टमूर्ति
राघव पाण्डवीयम् पिंगली सूरन्न
पाण्डुरंग माहात्म्य तेनाली रामकृष्ण

प्रमुख साहित्यकार एवं उनकी रचनाएँ

साहित्यकार प्रमुख रचना
सायण वेदों पर भाष्य, सुभाषित सुधानिधि
माधव विद्यारण्य कालनिर्णय
अल्लसानी पेद्दन मनुचरित्रम्
नन्दी तिम्मन पारिजातापहरणम्
तेनाली रामकृष्ण पाण्डुरंग माहात्म्य
श्रीनाथ श्रृंगार नैषधम्, हरविलासम्
रामामात्य स्वरमेलकलानिधि
गंगा देवी मधुरा विजयम्

समकालीन विदेशी यात्री

➣ विजयनगर साम्राज्य के इतिहास, प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति के अध्ययन में समकालीन विदेशी यात्रियों के विवरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।

विदेशी यात्री देश समकालीन शासक प्रमुख विवरण
निकोलो कोण्टी (Nicolo Conti) इटली देवराय प्रथम विजयनगर नगर, सामाजिक जीवन एवं दास प्रथा का वर्णन।
अब्दुर्रज्जाक फारस देवराय द्वितीय राजधानी, राजदरबार, सचिवालय, प्रशासन एवं समृद्धि का विस्तृत वर्णन।
डोमिंगोज पायस पुर्तगाल कृष्णदेवराय विजयनगर के नगर, शिल्प, व्यापार, सेना एवं आर्थिक समृद्धि का वर्णन।
दुआर्ते बारबोसा पुर्तगाल कृष्णदेवराय सामाजिक जीवन, व्यापार, सती प्रथा एवं प्रशासन का वर्णन।
फर्नाओ नूनीज (Nuniz) पुर्तगाल अच्युत देवराय विजयनगर का इतिहास, सती प्रथा एवं सामाजिक जीवन का वर्णन।
सीजर फ्रेडरिक इटली तालीकोट युद्ध के बाद तालीकोट युद्ध के बाद विजयनगर के पतन एवं उसके अवशेषों का वर्णन।
अफ़ानासी निकितिन रूस बहमनी सुल्तान मुहम्मद तृतीय के समकालीन दक्षिण भारत की सामाजिक एवं आर्थिक असमानता तथा विजयनगर-बहमनी क्षेत्र का वर्णन।

परीक्षा की दृष्टि से अब्दुर्रज्जाक, निकोलो कोण्टी, डोमिंगोज पायस, फर्नाओ नूनीज तथा दुआर्ते बारबोसा विजयनगर साम्राज्य के अध्ययन के सबसे महत्त्वपूर्ण विदेशी यात्रियों में गिने जाते हैं।

➣ विजयनगर साम्राज्य में प्रशासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। उनके प्रमुख पद एवं कार्य निम्नलिखित थे-

पदाधिकारी मुख्य कार्य
नायक बड़े सेनानायक तथा प्रांतीय सैन्य अधिकारी। अमरम् भूमि के धारक।
महानायकाचार्य ग्राम सभाओं एवं स्थानीय प्रशासन का निरीक्षक अधिकारी।
दण्डनायक सेनापति। आवश्यकता पड़ने पर प्रशासनिक, न्यायिक एवं प्रांतीय दायित्व भी निभाता था।
महाप्रधानी (प्रधानी) मंत्रिपरिषद का प्रमुख। प्रधानमंत्री के समान पद।
रायसम सचिव। राजा के आदेशों को लिखित रूप देता था।
कर्णिकम लेखाधिकारी (Accountant)। आय-व्यय एवं अभिलेखों का संधारण।
अमरनायक अमरम् भूमि प्राप्त सामंत। आवश्यकता पड़ने पर राजा को सैनिक सहायता प्रदान करता था।
आयंगार वंशानुगत ग्रामीण अधिकारी। ग्राम प्रशासन का संचालन करने वाले 12 अधिकारियों का समूह।
पलैयगार (पालिगार) स्थानीय सामंत / जमींदार। क्षेत्र की सुरक्षा एवं राजस्व वसूली का उत्तरदायित्व।
स्थानिक मंदिरों का प्रबंधक एवं प्रशासनिक अधिकारी।
सेनेटेओवा ग्राम की आय-व्यय एवं लेखा व्यवस्था की देखरेख करने वाला अधिकारी।
तलारी (तलर) ग्राम का चौकीदार / रखवाला।
गौड ग्राम का प्रधान अथवा ग्राम प्रशासक।
अत्रिमार ग्राम प्रशासन से संबंधित स्थानीय अधिकारी।
परूपत्यगार राजा अथवा प्रांतीय गवर्नर का प्रतिनिधि। प्रशासनिक कार्यों का निरीक्षण करता था।

दक्कनी राज्यों के प्रमुख व्यक्ति

➣ दक्कन के विभिन्न राज्यों में अनेक ऐसे प्रशासक, सेनानायक एवं राजनेता हुए जिन्होंने अपने-अपने राज्यों के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राज्य प्रमुख व्यक्ति विशेष योगदान
बहमनी महमूद गवाँ बहमनी सुल्तान मुहम्मद तृतीय का प्रसिद्ध वज़ीर। प्रशासनिक सुधारों एवं शिक्षा के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध।
अहमदनगर मलिक अम्बर छापामार (गुरिल्ला) युद्ध नीति एवं राजस्व सुधारों के लिए प्रसिद्ध।
गोलकुंडा मीर जुमला कुतुबशाही राज्य का प्रमुख मंत्री एवं सेनानायक। बाद में मुगल सेवा में गया।
बीजापुर अफजल खाँ छत्रपति शिवाजी के साथ प्रतापगढ़ (1659 ई.) के युद्ध में मारा गया।
विजयनगर नरसा नायक, कुमार कम्पन नरसा नायक विजयनगर का शक्तिशाली संरक्षक एवं सेनानायक था। कुमार कम्पन ने मदुरै विजय का नेतृत्व किया, जिसका वर्णन उनकी पत्नी गंगा देवी ने मधुरा विजयम् में किया है।

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