तुगलक वंश : परिचय
➣ तुगलक वंश की स्थापना गियासुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने की थी। खुसरो शाह को समाप्त करके उसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था।
➣ उल्लेखनीय है नसरुद्दीन खुसरों खां ने खिलजी वंश के अंतिम शासक कुतुबुद्दीन मुबारक शाह की हत्या कर गद्दी पर अधिकार कर लिया था किन्तु ज्यादा समय तक शासन नहीं कर सका।
➣ गियासुद्दीन का एक नाम गाजी बेग तुगलक या गाजी तुगलक भी था। इसी कारण इतिहास में उसके उत्तराधिकारियों को भी तुगलक पुकारा जाने लगा और उसका वंश तुगलक वंश कहलाया।
➣ इब्नबतूता तुगलकों को तुर्की की करौना/कराना शाखा का बताता है। करौना तुर्क एवं मंगोल की मिश्रित जनजाति थी।
➣ दिल्ली सल्तनत के काल में तुगलक वंश के शासकों ने सबसे अधिक समय (94 वर्ष) तक शासन किया। दिल्ली पर शासन करने वाले तुर्क राजवंशों में अंतिम तुगलक वंश था। नासिरूद्दीन महमूद तुगलक वंश का अंतिम शासक था।
➣ इस वंश में तीन योग्य शासक हुए। ग़यासुद्दीन तुगलक, उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुग़लक़ और उसका उत्तराधिकारी फ़िरोज शाह तुग़लक़।
➣ फ़िरोज की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत का विघटन हो गया और उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया।
➣ यद्यपि तुग़लक़ 1412 तक शासन करत रहे, तथापि 1398 में तैमूर लंग द्वारा दिल्ली पर आक्रमण के साथ ही तुग़लक़ साम्राज्य का अंत माना जाता है।
| शासक | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|
| गयासुद्दीन तुगलक (1320–1325 ई.) | तुगलक वंश के संस्थापक। तुगलकाबाद नगर एवं तुगलकाबाद किले का निर्माण कराया तथा प्रशासन को सुदृढ़ किया। |
| मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351 ई.) | महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के लिए प्रसिद्ध। राजधानी परिवर्तन, सांकेतिक मुद्रा तथा दोआब में कर वृद्धि जैसी योजनाएँ लागू कीं। |
| फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) | नहरों, नगरों एवं सार्वजनिक निर्माण कार्यों के लिए प्रसिद्ध। फिरोजाबाद नगर की स्थापना की तथा अनेक इमारतों का निर्माण कराया। |
| गयासुद्दीन तुगलक शाह (द्वितीय) (1388–1389 ई.) | फिरोजशाह तुगलक का पौत्र। अल्पकालीन शासन के बाद षड्यंत्र में मारा गया। |
| अबू बक्र शाह (1389–1390 ई.) | सत्ता संघर्ष के दौरान सिंहासन पर बैठा, लेकिन नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह ने उसे पराजित कर गद्दी प्राप्त कर ली। |
| नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह (1390–1394 ई.) | फिरोजशाह तुगलक का पुत्र। आंतरिक विद्रोहों और उत्तराधिकार संघर्षों से जूझता रहा। |
| अलाउद्दीन सिकंदर शाह (लगभग 6 सप्ताह, 1394 ई.) | बहुत अल्पकाल तक शासन किया। बीमारी के कारण शीघ्र मृत्यु हो गई। |
| नसिरुद्दीन नुसरत शाह (1394–1398 ई.) | नासिरुद्दीन महमूद शाह का प्रतिद्वंद्वी। गृहयुद्ध के कारण समानांतर शासक के रूप में शासन किया। |
| नासिरुद्दीन महमूद शाह (1394–1413 ई.) | तुगलक वंश का अंतिम प्रभावी शासक। उसके शासनकाल में 1398 ई. में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया, जिससे तुगलक सत्ता का पतन तेज हो गया। |
➣ नसिरूद्दीन नुसरत शाह (फिरोजाबाद शासक) तथा उसके चचेरे भाई नसिरूद्दीन महमूद शाह (दिल्ली शासक) दोनों ने एक साथ शासन किया था।
ग्यासदीन मुहम्मद तुगलक (1320-25 ई.)
➣ तुगलक वंश का संस्थापक ग्यासदीन मुहम्मद तुगलक था। वह 8 सितम्बर, 1320 को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। वह करौना तुर्क शाखा का था। तुगलक उसकी उपाधि थी।
➣ गाज़ी मलिक का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उसकी मा पंजाब की एक जाट महिला थी और पिता बलवन का तुर्की दास था।
➣ मंगोल को लगभग 29 बार पराजित करने के कारण वह मलिक उल-गाजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➣ उसने अपने नाम में गाजी शब्द जोड़ा। दिल्ली का वह प्रथम सुल्तान था, जिसने गाजी (काफिरों का घातक) की उपाधि धारण की।
➣ गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में कई महत्वपूर्ण अभियानों का अध्यक्ष था। अलाउद्दीन खिलजी के समय वह उत्तरी पश्चिमी सीमा प्रान्त दीपालपुर (पंजाब) का सूबेदार था।
सैन्य अभियान
➣ ग़यासुद्दीन तुग़लक़ पूर्णतः साम्राज्यवादी था। इसने अलाउद्दीन ख़िलजी की दक्षिण नीति त्यागकर दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया।
➣ 1321 ई. में गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जौना खाँ को तेलंगाना (चारंगल) के शासक प्रतापरुद्र देव के विरुद्ध अभियान के लिये भेजा। जौना खाँ अपने प्रथम वारंगल अभियान में असफल रहा।
➣ 1323 ई. में द्वितीय अभियान के अन्तर्गत ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने शाहज़ादे जौना ख़ाँ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुन:स्थापना के लिए भेजा।
➣ जूना खां ने राजधानी वारंगल के दुर्ग को घेर लिया एवं प्रताप रूद्रदेव पर सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने के लिए दबाव डालना आरंभ कर दिया।
➣ तेलंगाना को सुल्तान ने सल्तनत में मिला लिया और वारंगल, जिसका नया नाम सुल्तानपुर रखा गया, दक्षिण में सल्तनत की राजधानी बन गई। यह अब दिल्ली सल्तनत का भाग बन गया।
इस प्रकार सर्वप्रथम ग़यासुद्दीन मुहम्मद तुगलक के समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में वैधानिक रूप से मिलाया गया। इन राज्यों में सर्वप्रथम वारंगल था।
➣ गियासुद्दीन का दूसरा आक्रमण उड़ीसा में स्थित जाजनगर पर हुआ। वहां के राजा भानुदेव द्वितीय ने वारंगल के राजा की सहायता की थी।
➣ जूना खां ने वारंगल से वापस आते समय भानुदेव पर 1324 ई. को आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में जाजनगर का शासक पराजित हुआ और जौना खाँ को प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त हुआ।
➣ राजमुंदरी से प्राप्त 1324 ई. के एक अभिलेख से इस विजय की पुष्टि होती है। इसी अभिलेख में जूना खां (उलूग खां) को विश्व का खान कहा गया है।
➣ गयासुद्दीन ने लगभग संपूर्ण दक्षिण भारत (कापिली को छोड़कर) को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। इससे दिल्ली सल्तनत का क्षेत्रीय विस्तार अधिक हो गया जिसके कारण असंख्य विद्रोह हुए एवं सल्तनत कमजोर हुई।
➣ 1324 ई. में स्वयं गयासुद्दीन तुगलक ने बंगाल पर चढ़ाई की। बलबन के पुत्र बुगरा खाँ के समय से ही बंगाल स्वतंत्र चल रहा था। बंगाल अभियान पर जाने से पहले दिल्ली में मजलिस-ए-हुक्मराम कायम किया।
➣ बंगाल विजय से लौटते वक्त उसने उत्तरी बिहार के क्षेत्र मिथिला के हरिसिंह देव को पराजित किया एवं तिरहुत के क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह प्रथम अवसर था, जब तुर्कों का साम्राज्य विस्तार उत्तरी विहार तक विस्तृत हो गया।
➣ 1324 ई. में मंगोल शीरमुगल ने भारत पर आक्रमण किया, जिसे समाना के सूबेदार मलिक शादी ने हरा दिया।
➣ 1325 ई. में तिरहुत की विजय के पश्चात दिल्ली लौटते हुए मार्ग में तुगलकाबाद के निकट अफगानपुर गाँव में गयासुद्दीन के स्वागत के लिये निर्मित लकड़ी का महल गिरने से गयासुद्दीन की मृत्यु हो गई। उसे तुगलकाबाद में ही दफना दिया गया।
➣ अफगानपुर के लकड़ी के मंडप का निर्माणकर्ता शिल्पी अहमद अयाज था। इसे राजकुमार जौना खाँ ने गयासुद्दीन के स्वागत के लिए बनवाया था।
➣ इब्नबतूता इसके लिये जौना खाँ को जिम्मेदार मानता है। बरनी व फरिश्ता इसे मात्र दुर्घटना मानते है।
➣ गयासुद्दीन तुगलक के चिश्ती सम्प्रदाय के सन्त निजामुद्दीन औलिया से अच्छे सम्बन्ध नहीं थे। उसने औलिया से भी पैसा (5 लाख टंका) लौटाने के लिए कहा जो उन्हें धार्मिक अनुदान के रूप में खुसरो खां के समय में दिया गया था।
➣ ग़यासुद्दीन जब बंगाल में था, तभी सूचना मिली कि, जूना ख़ाँ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) निज़ामुद्दीन औलिया का शिष्य बन गया है और वह उसे राजा होने की भविष्यवाणी कर रहा है।
➣ बंगाल अभियान से वापस लौटते समय सुल्तान ने निजामुद्दीन औलिया के पास संदेश भिजवाया कि वे सुल्तान के आने के पूर्व सल्तनत छोड़कर कहीं और चले जाएं। औलिया ने उत्तर दिया कि, हुनूज दिल्ली दूर अस्त, अर्थात् दिल्ली अभी बहुत दूर है।
सुधार कार्य
➣ अलाउद्दीन के समय की कठोर दण्ड व्यवस्था समाप्त कर दी गई, परंतु कर न देने वालों, सरकारी धन की बेईमानी करने वालों और चोरों को कठोर दण्ड दिए गए।
➣ उसने अलाउद्दीन की कठोर नीति के स्थान पर उदारता की नीति अपनाई। खुतों, चौधरियों एवं मुकद्दमों को हक्क-ए-खोती के पुराने अधिकार लौटा दिये, किन्तु किस्मत-ए-खोती का अधिकार नहीं दिया।
➣ बरनी के अनुसार, तुगलक शाह के न्याय से भेड़िए को भी इस बात का साहस नहीं होता था कि वह किसी भेड की ओर देखे।
➣ गयासुद्दीन ने आर्थिक अपराधों व बकाया राजस्व व ऋण वसूली के लिये दिये जाने वाले शारीरिक दण्ड की प्रथा को त्याग दिया।
➣ मुबारक शाह द्वारा शुरू की गई जागीर व्यवस्था को जारी रखा। किन्तु भूमि नाप की अलाउद्दीन के समय से जारी प्रथा को त्याग कर उसके स्थान पर गल्ला बंटाई और नस्क प्रथा को पुनः शुरू किया।
➣ वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने कृषकों के प्रति सहयोग व उदारता का दृष्टिकोण अपनाया, भूमिकर कम कर 1/3 कर दिया एवं ऋणों की वसूली को बन्द कर दिया।
➣ उसने एक वर्ष में इक्ता के राजस्व में 1/10 से 1/11 भाग से अधिक की वृद्धि नहीं करने का आदेश दिया।
➣ ग्यासुद्दीन ने सूखे की स्थिति में किसानों की सहायता हेतु अकाल नीति अथवा अकाल संहिता का निर्माण किया।
➣ उसके समय में लगान किसानों से पहले की वसूली में पैदावार का 1/5 से 1/3 भाग वसूल किया जाने लगा। आवश्यकतानुसार अकाल की स्थिति में भूमि कर को माफ किया गया।
➣ उसने भू-राजस्व में राज्य की मांग का आधार हुक्म-ए-मसाहत के स्थान पर हुक्म-ए-हासिल (पैदावार के अनुरूप) के अनुरूप किया, जिसमें फसल के नुकसान को समायोजित करने के प्रावधान थे।
➣ अपने शासन काल में ग़यासुद्दीन ने क़िलों, पुलों और नहरों का निर्माण कराया। इसने सिंचाई के साधनों विशेषकर नहरों का निर्माण करवाया
सल्तनत काल में नहर बनाने वाला ग़यासुद्दीन तुग़लक़ प्रथम शासक था।
➣ गयासुद्दीन की डाक व्यवस्था उत्कृष्ट थी और शीघ्र डाक पहुँचाने के लिये प्रत्येक 3/4 मील पर डाक पहुँचाने वाले कर्मचारी या घुड़सवार नियुक्त किये गए। डाक विभाग का मुखिया बरीद-ए-मुमालिक नामक अधिकारी होता था।
डाक प्रणाली को पूर्णतः व्यवस्थित करने का श्रेय गियासुद्दीन को जाता है।
➣ इसके अलावा अलाउद्दीन द्वारा चलाई गई, दाग (घोड़ो का चिन्ह) तथा चेहरा-प्रथा (सैनिक पंजिका) को प्रभावशाली ढंग से लागू किया गया।
➣ यह प्रशासन में नैतिक नियमों का समर्थक था और शराब उत्पादन एवं उसकी बिक्री पर इसने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही मुहतसिव नामक अधिकारी को नैतिक शिष्टाचार के अनुपालन का दायित्व दे दिया।
➣ गयासुद्दीन तुगलक ने पुरानी सड़कों की मरम्मत कराई तथा पुलों एवं नई सड़कों का निर्माण कराया।
➣ बरनी के अनुसार गयासुद्दीन के काल में भिखारी भी काम-धंधों में लग गए।
व्यक्तित्व
➣ ग्यासुद्दीन ने अलाउद्दीन की कठोर नीति के खिलाफ उदारता की नीति अपनाई जिसे रस्मे मियाना (तरीक-ए-एत्दाल) कहा गया है।
➣ हिंदुओं के प्रति गयासुद्दीन की नीति कठोर थी। उसने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि हिंदू न तो इतने धनवान बन सके कि विद्रोह करने को तैयार हो जाएँ और न ही इतने निर्धन हो जाए कि कृषि छोड़कर भाग जाएँ।
➣ ग़यासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम धर्म में उसकी गहरी आस्था और उसके सिद्धान्तों का वह सावधानीपूर्वक पालन करता था। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ संगीत का घोर विरोधी था।
➣ बरनी के अनुसार अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन स्थापित करने के लिये जहाँ रक्तपात व अत्याचार की नीति अपनाई, वहीं ग़यासुद्दीन ने चार वर्षों में ही उसे बिना किसी कठोरता के संभव बनाया।
➣ गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के समीप स्थित पहाड़ियों पर तुगलकाबाद नाम का एक नया नगर स्थापित किया। रोमन शैली में निर्मित इस नगर में एक दुर्ग का निर्माण भी हुआ। इस दुर्ग को छप्पनकोट के नाम से भी जाना जाता है।
➣ अब्बास द्वारा रचित मसालिक-उल-अबसार नामक अरबी रचना मुहम्मद बिन तुगलक के काल में लिखी गई थी। इससे इस काल की प्रामाणिक जानकारी मिलती है।
मुहम्मद बिन तुगलक (1325-51 ई०)
➣ पिता ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र जूना खां (जौना खा), मुहम्मद बिन तुग़लक़ के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसका मूल नाम उलूग ख़ाँ था।
प्रारंभिक जीवन
➣ राजकुमार जौना खाँ, गयासुद्दीन तुगलक का ज्येष्ठ पुत्र था। उसका पालन-पोषण एक सैनिक की भाँति हुआ था।
➣ खुसरो शाह द्वारा उसे शाही घोड़े का मुख्य पदाधिकारी नियुक्त किया गया था, कालांतर में उसने खुसरो शाह को अपदस्त करने में अपने पिता की सहायता की।
➣ 1320 ई. में पिता गयासुद्दीन तुगलक के सम्राट वन जाने के बाद राजकुमार जौना खाँ की उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति हो गई और उसे उलूग खाँ की उपाधि दी गई।
➣ जौना खाँ ने 1321 और 1322-23 ई. में वारंगल में दो अभियानों का नेतृत्व किया। यद्यपि अपने प्रथम अभियान में असफल रहने के बाद वह दूसरे अभियान में सफल रहा।
राज्याभिषेक
➣ ऐसा माना जाता है कि अपने पिता की मृत्यु का शोक उसने 40 दिन तक तुगलकाबाद में रहकर मनाया। 40 दिन के बाद उसने अपने राज्याभिषेक के लिये दिल्ली प्रस्थान किया।
➣ बलबन के लाल महल में मुहम्मद बिन तुगलक ने राज्याभिषेक करवाया। उसके राज्यारोहण का किसी ने भी विरोध नहीं किया। वह मुक्त हस्त से धन, उपाधियां एवं जागीरें प्रदान करता हुआ निर्विरोध शासक बन गया।
➣ मुहम्मद विन तुगलक के समय में जियाउद्दीन बरनी द्वारा लिखी पुस्तक तारीख-ए-फिरोजशाही और मोरक्को यात्री इब्न बतूता के यात्रा वृत्तांतों से हमें मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के रोचक तथ्यों की जानकारी मिलती है।
➣ सिंहासन पर बैठने के बाद उसने तातार ख़ाँ को बहराम ख़ाँ की उपाधि, मलिक क़बूल को इमाद-उल-मुल्क की उपाधि एवं वज़ीर-ए-मुमालिक का पद दिया।
➣ उसने मलिक अरूयाज को ख्वाजा जहान की उपाधि के साथ शहना-ए-इमारत का पद, मौलाना ग़यासुद्दीन को (सुल्तान का अध्यापक) कुतुलुग ख़ाँ की उपाधि के साथ वकील-ए-दर की पदवी, अपने चचेरे भाई फ़िरोज शाह तुग़लक़ को नायब बारबक का पद प्रदान किया।
➣ दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ शिहाबुद्दीन को दीवान-ए-मुस्तखराज नियुक्त किया तथा शेख़ मुईजुद्दीन को गुजरात का गर्वनर तथा सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी को सेना में नियुक्त किया।
➣ उसने गैर-तुर्कों और भारतीय मुसलमानों को भी सरकारी पदों पर नियुक्त किया था। जिसके कारण बरनी ने उसकी कटु आलोचना की और ऐसे व्यक्तियों को छिछोरा, माली, जुलाहा, नाई, रसोइया आदि कहा है।
व्यक्तित्व
➣ सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान, धर्म-निरेपक्ष, कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था। इसे इतिहास में एक बुद्धिमान मूर्ख शासक के रूप में जाना जाता है।
➣ वह अरबी भाषा एवं फ़ारसी भाषा का विद्धान तथा खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था।
➣ अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे स्वप्नशील, पागल एवं रक्त-पिपासु कहा गया है।
➣ बरनी, सरहिन्दी , निज़ामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ के मरने पर इतिहासकार बदायूंनी ने कहा कि, सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।
➣ यह प्रथम तुगलक सुल्तान था जिसने सती प्रथा पर रोक लगाया था। प्रथम मध्य कालीन सुल्तान जिसने उत्तर व दक्षिण भारत को एकीकरण का प्रयास किया गया था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिए एक नए विभाग दीवान-ए-अमीर-ए-कोही की स्थापना की। इसका प्रधान अमीर-ए-कोही था। इस विभाग का मुख्य कार्य कृषकों को प्रत्यक्ष सहायता देकर अधिक भूमि कृषि कार्य के अधीन लाना था।
साम्राज्य
➣ मुहम्मद तुग़लक़ के सिंहासन पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत कुल 23 प्रांतों में बँटा थी, जिनमें मुख्य थे – दिल्ली, देवगिरि, लाहौर, मुल्तान, सरमुती, गुजरात, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, मालवा, जाजनगर (उड़ीसा), द्वारसमुद्र आदि।
➣ नगर कोट की विजय (1337 ई.) तथा कोढ़न की विजय मुहम्मद बिन तुगलक की एक नवीन विजय मानी जाती हैं। केवल राजस्थानी में उसे सफलता नहीं मिली। दक्षिण भारत की विजय को पूर्ण करने का श्रेय उसी को है।
➣ दिल्ली सल्तनत की सीमा का सर्वाधिक विस्तार इसी के शासनकाल में हुआ था। कश्मीर एवं बलूचिस्तान दिल्ली सल्तनत में शामिल नहीं थे।
➣ उसके अंतिम समय में दक्षिण में नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई और ये क्षेत्र दिल्ली सल्तनत से पूरी तरह से अलग हो गए। बंगाल भी स्वतंत्र हो गया। इनमे प्रमुख थे – विजयनगर, बहमनी, मुदरै।
शासन नीति
➣ उसने धार्मिक एवं न्यायिक मामलों से उलेमा वर्ग का वर्चस्व समाप्त कर एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की।
➣ अलाउद्दीन ख़िलजी की भाँति अपने शासन काल के प्रारम्भ में उसने, न तो ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया।
➣ कालांतर में उलेमाओं के विरोध से परेशान होकर राजनैतिक मजबूरियों के कारण मिस्र के अब्बासी खलीफा से स्वीकृति पत्र प्राप्त किया तथा खुतबा व सिक्कों पर अपने नाम को हटवाकर उसके स्थान पर खलीफा का नाम अंकित किया।
मुहम्मद बिन तुगलक की पांच योजनाएं
➣ मुहम्मद बिन तुगलक को उसकी पाँच महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के कारण व्यापक चर्चा मिली थी-
1. दोआब में कर वृद्धि (1325-26 ई.)
2. देवगिरि को राजधानी बनाना (1327 ई.)
3. सांकेतिक मुद्रा चलाना (1329 ई.)
4. खुरासान अभियान (1332-1334 ई.)
5. कराचिल अभियान (1332-1334 ई.)
➣ सुल्तान की पहली असफल योजना राजधानी में परिवर्तन तथा अन्तिम (पाँचवीं) योजना दोआब में कर वृद्धि थी।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा दीनार की संज्ञा दी गई थी।
दौआब में कर वृद्धि (1325-26 ई.)
➣ दोआब में कर वृद्धि लगभग 1/10 से 1/20 के बीच थी। उपज का 50 प्रतिशत लगान के रूप में तय किया गया।
➣ सम्भवतः दोआब में लगान वृद्धि को इस कारण लागू किया गया था, क्योंकि यह सल्तनत का सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र था।
➣ किन्तु दुर्भाग्य से जिस वर्ष वृद्धि हुई उसी वर्ष अकाल और तदुपरान्त प्लेग की महामारी फैल गयी। इस प्रकार सुल्तान की यह योजना विफल रही।
➣ इस संकटापन्न स्थिति में सुल्तान ने कृषकों को सहायता प्रदान करने के लिए केन्द्र में कृषि विभाग (दीवान-ए-अमीर कोही) की स्थापना की।
➣ अकाल राहत संहिता तैयार करवायी, सिंचाई के लिए सैकड़ों कुएं खुदवाये तथा अकालग्रस्त कृषकों को कृषि ऋण (तकावी) प्रदान की गयी। इसे सोनधर भी कहा गया है।
➣ दिल्ली में ही महामारी में इतने व्यक्ति मरे कि दिल्ली की हवा भी दूषित हो गई। इससे बचने के लिए सुल्तान को दिल्ली छोड़कर 1337-40 ई. के मध्य स्वर्गद्वारी (कन्नौज के निकट) जाकर रहना पड़ा।
राजधानी परिवर्तन (1327 ई.)
➣ सने 1327 ई. में अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) स्थानान्तरित की ताकि उत्तर व दक्षिण भारत के सम्पूर्ण साम्राज्य को नियंत्रत किया जा सके।
➣ देवगिरि को कुव्वतुल इस्लाम भी कहा गया है। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम कुतुबाबाद रखा था और मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया।
➣ लेकिन न तो जनता इसके महत्व को समझ सकी और न ही इस प्रकार नियंत्रण रखना सम्भव हो सका और उसने 1355 ई. में दौलताबाद से लोगों को दिल्ली वापस आने की अनुमति दे दी।
➣ राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ, जिसने अंततः बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग खोला।
➣ इसामी के अनुसार दिल्ली के नागरिकों की शक्ति को तोड़ने हेतु राजधानी स्थानान्तरित की। इब्नबतूता के अनुसार दिल्लीवासियों ने सुल्तान को धमकी भरे पत्र लिखे, अतः वह उन्हें दण्ड देना चाहता था।
➣ स्टेनले लेनपूल ने दौलताबाद को एक गुमराह शक्ति का स्मारक चिह्न कहा।
सांकेतिक मुद्रा (1329 ई.)
➣ तीसरी योजना के अन्तर्गत मुहम्मद तुग़लक़ ने सांकेतिक व प्रतीकात्मक सिक्कों का प्रचलन करवाया। सिक्के संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसे धनवानों का राजकुमार (प्रिंस ऑफ मोनियर्स) कहा है।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ ने दोकानी नामक सिक्के का प्रचलन करवाया। सुल्तान ने चाँदी के सिक्कों के स्थान पर ताँबें की सांकेतिक मुद्रा चलायी। उसने अदली नामक 140 ग्रेन का चाँदी का सिक्का भी चलाया।
➣ उसका उद्देश्य सोने-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को नष्ट होने से बचाना था परन्तु बड़े स्तर पर नकली सिक्कों का निर्माण शुरू हो गया।
➣ इसलिए मुहम्मद बिन तुगलक ने बाजार से सभी ताँबे के सिक्के लेकर सरकारी खजाने से उनके बदले में चाँदी के सिक्के दे दिए। इससे खजाना रिक्त हो गया। फलत: योजना विफल हो गयी।
➣ बरनी ने तांबे का, फरिश्ता ने कांसे/पीतल का प्रयोग सांकेतिक मुद्रा में बताया है। सतीश चन्द्र एवं मुहम्मद हबीब के अनुसार कांसे का प्रयोग सांकेतिक मुद्रा के रूप में किया था।
➣ सांकेतिक मुद्रा चलाने की प्रेरणा चीन तथा ईरान से मिली। चीन में सर्वप्रथम कुबलाई खां ने 1260 ई. में कागज की मुद्रा चान (चाओ) का सांकेतिक मुद्रा के रूप में सफल प्रयोग किया था।
खुरासान अभियान (1332-1334 ई.)
➣ अपनी चौथी योजना के अंतर्गत सुल्तान ने मध्य एशिया में स्थित खुरासान में उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ उठाकर वहाँ कब्जा करने की सोची।
➣ इसके लिए अतिरिक्त सेना का गठन किया और 1 वर्ष का वेतन पेशगी में दे दिया, परन्तु खुरासान में व्यवस्था कायम हो जाने के कारण सुल्तान की यह योजना भी विफल रही और उसे आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ी।
कराचिल अभियान (1332-1334 ई.)
➣ कुमाऊं पहाड़ियों में स्थित कराचिल का विद्रोह दबाने और उसे विजित करने के उद्देश्य से सुल्तान ने अपनी सेना भेजी, परन्तु आरम्भिक सफलता के बाद वहाँ सुल्तान को जन व धन की भारी हानि उठानी पड़ी।
➣ उसकी पूरी सेना जंगली रास्तों में भटक गई, इब्न बतूता के अनुसार अन्ततः केवल तीन अधिकारी ही बचकर वापस आ सके। इस प्रकार मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी असफल रही।
अपनी महत्त्वाकांक्षी असफल योजनाओं के कारण मुहम्मद तुग़लक़ को असफलताओं का बादशाह कहा जाता है।
➣ एडवर्ड थामस ने इसे सिक्का बनाने वाला सुल्तान, व धनवानों का युवराज (प्रिंस आफ मनीअर्स) कहा, मुहम्मद तुगलक को मुद्राशास्त्री भी कहा जाता है।
➣ 1328 ई. के संस्कृत में रचित सरबन शिलालेख में उसे पृथ्वी के सभी सम्राटों में मुकुट का मोती कहा गया है।
प्रमुख विद्रोह
➣ मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल में सबसे अधिक (लगभग 34) विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह अकेले दक्षिण-भारत में ही हुए थे।
➣ विद्रोहों के बारे में एक बार सुल्तान ने कहा था मेरा साम्राज्य रोगग्रस्त हो गया है और यह किसी इलाज से ठीक नहीं होता है। हकीम सरदर्द ठीक करता है तो बुखार हो जाता है, बुखार ठीक करता है तो कुछ और हो जाता है।
➣ उसने दक्षिण में सौ गाँवों पर अमीर-ए-सादा नियुक्त किये। इन सादा अमीरो ने ही सर्वाधिक विद्रोह किये। सादा अमीर शाही सेवा में विदेशी अमीर थे। सादा अमीर ही दक्षिण में बहमनी राज्य की स्थापना से सम्बन्धित थे।
➣ प्रथम विद्रोह 1326-27 ई. में तुग़लक़ के चचेरे भाई सुल्तान गुरशास्प ने किया, जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। वह सुल्तान द्वारा बुरी तरह से पराजित किया गया।
➣ गुर्शास्प को दक्षिण में स्थित आखिर हिन्दू रजवाड़े काम्पिली के शासक काम्पिलदेव ने शरण दी, तब काम्पिली को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक के समय अवध के सूबेदार आइन-उल-मुल्क मुल्तानी का विद्रोह सर्वाधिक भयंकर था। आइन उल मुल्क का एकमात्र विद्रोह था, जिसे मुहम्मद बिन तुगलक ने क्षमा किया था।
➣ आइन-उल-मुल्क ने इंशा- ए-महरू नामक पुस्तक भी लिखी। इस पुस्तक में फिरोज तुगलक की शासन व्यवस्था की जानकारी है।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध बंगाल में गयासुद्दीन, 1327-1328 ई. में मुल्तान में बहराम किश्लू खाँ (बहराम आइबा) एवं माबर में सैयद हसन खाँ (1334-1335 ई.) ने विद्रोह हुए। इसमें बंगाल का विद्रोह (1330-1331 ई.) प्रमुख हैं।
➣ मदुरा (माबर) में जलालुद्दीन अहसान खाँ ने विद्रोह करके स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और 1334-35 ई. में स्वतंत्र हो गया जो दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र होने वाला प्रथम राज्य था।
➣ बंगाल के विद्रोह को यद्यपि प्रारंभ में दबा लिया गया था, किन्तु 1340-1341 ई. के लगभग बंगाल दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया। मलिक हाजी इलियास सुल्तान शमसुद्दीन के नाम से बंगाल का स्वतंत्र शासक बन बैठा।
➣ 1337-1338 ई. में कड़ा के सूबेदार निज़ाम भाई का विद्रोह, 1338-1339 ई. में बीदर के सूबेदार, नुसरत ख़ाँ का विद्रोह, 1339-1340 ई. में गुलबर्गा के अलीशाह का विद्रोह आदि भी मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध किये गये विद्रोहों में प्रमुख हैं।
➣ मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में ही दक्षिण में 1336 ई. में हरिहर एवं बुक्का नामक दो भाईयों ने स्वतंत्र विजयनगर की स्थापना की थी।
➣ अन्तिम विद्रोह 1351 ई. में गुजरात में मुहम्मद बिन तुगलक के दास तगी ने किया। तगी के विद्रोह को दबाते समय सिन्ध के थट्टा में 20 मार्च 1351 को मुहम्मद की मृत्यु हो गई। जिस समय मुहम्मद की मृत्यु हुई उस समय उसके शिविर में नासिरूद्दीन चिराग देहलवी उपस्थित थे।
➣ बदायूनी मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु पर लिखता है कि ‘सुल्तान को उसकी प्रजा से व प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।’
➣ शेख नासिरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली सुल्तान के विरोधियों में था।
विदेशी यात्री
➣ इब्नबतूता (1333-1347) मोरक्को मूल का अफ्रीकी यात्री था। यह मुहम्मद बिन तुगलक के कार्यकाल में भारत आया था। उसने दिल्ली में 8 वर्षों तक काजी का पद सम्भाला।
➣ 1342 ई. में इब्नबतूता को मुहम्मद बिन तुगलक ने अपना राजदूत बनाकर चीनी सम्राट तोगन तिमुर के दरबार में भेजा। इब्नबतूता ने इस काल की घटनाओं का वर्णन अपनी पुस्तक रेहला में किया है।
➣ 1341 ई. में उसके दरबार में चीन के सम्राट तोगन तिमुर ने भी एक शिष्ट मण्डल बौद्ध मन्दिरों को देखने व उनके रख रखाव हेतु भेजा था।
➣ वह प्रथम सुल्तान था, जिसने चीन, ईरान, मिश्र एवं सीरिया आदि देशों के साथ वैदेशिक सम्बन्ध स्थापित कर राजदूतों का आदान-प्रदान किया अर्थात् एशियाई एवं अफ्रीकी देशों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्धों को आरम्भ किया।
➣ इब्नबतूता ने मुहम्मद बिन तुगलक के साम्राज्य लिए हिन्द तथा सिन्ध शब्द प्रयोग किया है।
हिन्दुओ के प्रति नीति
➣ वह प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दुओं के साथ सहिष्णुता का व्यवहार किया। मुहम्मद बिन तुगलक प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने होली व अन्य हिन्दू त्यौहारों में भाग लिया।
➣ 1337 ई. में नगर कोट पर आक्रमण के समय उसने ज्वालामुखी मन्दिर को नष्ट नहीं किया, जबकि फिरोज ने मन्दिरों को नष्ट कर दिया।
➣ वह प्रथम सुल्तान था, जिसने सती प्रथा पर रोक लगाई एंव हिन्दुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया।
➣ रतन नामक हिन्दू को उसने सिन्ध का राजस्व अधिकारी नियुक्त किया। रतन के अतिरिक्त मुहम्मद बिन तुगलक ने एक हिन्दू मंत्री साईराज (श्रीराम) को धारा का नायब वजीर तथा बाजरान इन्द्री को गुलबर्गा का वजीर बनाया। मीरनराय भी एक हिन्दू पदाधिकारी था।
➣ सर्वप्रथम मुहम्मद तुग़लक़ ने ही बिना किसी धार्मिक-भेदभाव के योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया। नस्ल और वर्ग-विभेद को समाप्त करके योग्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्त करने की नीति अपनायी।
व्यक्तित्व
➣ सुल्तान ने जैन विद्वान जिन प्रभ सूरी व राजशेखर का सम्मान कर धार्मिक उदारता का प्रमाण दिया हिन्दू योगियों व जैन सन्तों से परिचर्चा के मामले में वह अकबर का पूर्वगामी था।
➣ वह जिनप्रभु सूरी के साथ विचार विमर्श करता था। जिनप्रभु के मार्गदर्शन में ही शत्रुजय तथा गिरनार मन्दिरों की यात्रा की थी।
➣ वह प्रथम सुल्तान था जिसने माण्उट आबू में स्थित जैन मन्दिरों में दर्शन किए। जैन मुनियों के लिए आरामगाह (उपाश्रय) के निर्माण का फरमान जारी किया।
➣ उसकी असफलता का कारण उसका निजी व्यक्तित्व था। उसे अभागा, आदर्शवादी, खूनी कहा गया है।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने शासन के अन्त में हताश होकर यह कहा कि मेरा साम्राज्य रूग्ण हो गया है। यह किसी उपचार से ठीक नहीं होता
अन्य तथ्य
➣ सुल्तान ने उश्र व जकात को छोड़कर शेष सभी कर समाप्त कर दिये।
➣ योग्यता के आधार पर नियुक्ति एवं नस्ल व वर्गभेद की समाप्ति मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई।
➣ उसके अमीर वर्ग में खानदानी अमीरों के अतिरिक्त मंगोल, विदेशी तथा हिन्दू भी थे। विदेशी अमीरों को ऐज्जा कहा जाता था।
➣ न्याय व्यवस्था में विधि की समता का सिद्धान्त लागू किया।
➣ सुल्तान ने इक्ताओं की आय-व्यय का हिसाब रखने के लिये एक रजिस्टर तैयार कराया, जिसे हश्म ए बहिलास्त कहा गया है।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने दास प्रथा को प्रश्रय नहीं दिया था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक गंगा नदी का पानी पीता था। अकबर भी गंगाजल पीता था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने ही सर्वप्रथम राजस्व वसूली को ठेके पर देने की इजारेदारी प्रथा (मुकाता प्रथा) प्रारम्भ की।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक अकाल पीड़ितों को सहायता देने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था। वह प्रथम सुल्तान था जिसने अकाल संहिता (उस्लूम) बनाई।
➣ फसलों में चक्रावर्तन पद्धति को अपनाया। मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषकों की सहायतार्थ दीवान-ए-कोही की स्थापना की एवं तकावी/सोन्धार (कृषि ऋण) प्रदान किये।
मंगोल आक्रमण
➣ इसके समय 1328-29 ई. के मध्य मंगोल आक्रमणकारी तरमाशरीन चग़ताई ने एक विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण कर मुल्तान, लाहौर से लेकर दिल्ली तक के प्रदेशों को रौंद डाला।
➣ फरिश्ता के अनुसार सुल्तान ने मंगोल नेता को संभवतः घूस देकर लौटा दिया, जबकि इसामी के अनुसार मंगोल हार गए। बरनी इस आक्रमण का उल्लेख नहीं करता।
निर्माण कार्य
➣ डॉ. के.ए. निजामी के अनुसार, सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने देवगिरि का नाम कुतबाबाद रखा तथा मुहम्मद तुगलक ने दौलताबाद। देवगिरि को कुव्वत-उल इस्लाम भी कहा गया है।
➣ मुहम्मद-बिन-तुगलक ने बदायूँ में मीरन मुलहीम, दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया, मुल्तान में शेख रुकनुद्दीन, अजुधन में शेख मुल्तान आदि सन्तों की कब्र पर मकबरे बनवाए।
सूफी संत सालार मसूद गाजी (बहराइच) व ख्याजा मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) की दरगाह पर जाने वाला प्रथम सुल्तान था।
➣ मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सिक्कों पर अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह (सुल्तान ईश्वर की छाया है), ईश्वर सुल्तान का समर्थक है आदि वाक्य अंकित करवाया।
फिरोजशाह तुगलक (1351 ई.-1388 ई.)
➣ फिरोजशाह तुगलक का जन्म 1309 ई. में हुआ था। उसके पिता का नाम मलिक रजब था। उसकी माँ बीबी नैला राजपूत सरदार रणमल की पुत्री थी।
➣ गियासुद्दीन तुगलक ने अपने भाई की मृत्यु के पश्चात फिरोज की देखभाल की। मुहम्मद तुगलक ने भी इसका विशेष ध्यान रखा और उसे राजनीति एवं प्रशासन की समुचित शिक्षा प्रदान किया गया।
➣ उसे अमीर-ए-हाजिब के पद पर नियुक्त किया गया। इस पर रहते हुए उसने सुल्तान मुहम्मद तुगलक की सेवा कर उसका विश्वास प्राप्त कर लिया।
➣ उलेमा के सहयोग से मुहम्मद तुग़लक़ की मुत्यु के बाद 20 मार्च, 1351 को फ़िरोज़ तुग़लक़ का राज्याभिषक थट्टा के निकट हुआ। पुनः फ़िरोज़ का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ।
➣ फ़िरोज़ कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने उलेमा वर्ग की सलाह मानते हुए धार्मिक आधार पर एक इस्लामिक राज्य की स्थापना की।
➣ फिरोज ने अपने को खलीफा का नाइब पुकारा व खलीफा का नाम सिक्कों पर अंकित किया तथा दो बार खलीफा से खिल्लत प्राप्त की।
➣ पहली बार दिल्ली सल्तनत के किसी सुल्तान ने अपने को खलीफा का सहायक (नाईब) कहा। खलीफा ने उसे सैयद उस सलातीन की उपाधि दी।
➣ फिरोज ने अपने खुतबे में कुतुबुद्दीन ऐबक को छोड़कर शेष सभी सुल्तानों का नाम अंकित करवाया। कुतुबुद्दीन ऐबक सुल्तान बनते समय दासता से मुक्त नहीं हुआ था, अतः उसका नाम खुतबे मे अंकित नहीं करवाया।
➣ तुगलक काल वजीर पद का स्वर्ण युग था। फिरोज के काल में वजीर पद चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। फिरोज का वजीर मलिक मकबूल था जिसे खान-ए-जहां की उपाधि दी गई।
➣ बरनी ने फिरोज के शासन में शांति व समृद्धि के लिये उलेमा के समर्थन को जिम्मेदार माना है। फिरोज पहला सुल्तान था जिसने उलेमा को इतनी अधिक प्रधानता दी।
निरंकुश कल्याणकारी राज्य
➣ फ़िरोज़शाह तुग़लक़ का शासन कल्याणकारी निरंकुशता पर आधारित था। इसलिए फिरोज को मध्यकालीन भारत का ‘कल्याणकारी निरंकुश कहा जाता है।
➣ फिरोज के लोक कल्याणकारी कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) दास विभाग की स्थापना
(ii) रोजगार दफ्तर की स्थापना
(iii) दीवान-ए-खैरात की स्थापना
(iv) दीवान-ए-एइस्तिहाक की स्थापना
(v) दारुल शफा या शिफाखाना ।
➣ सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सभी क़र्ज़े माफ कर दिए, जिसमें सोंधर ऋण भी शामिल था, जो मुहम्मद तुग़लक़ के समय किसानों को दिया गया था।
➣ उसने कर प्रणाली को धार्मिक या मजहबी स्वरूप प्रदान किया और कम से कम चौबीस प्रचलित करों को समाप्त करके इस्लामी शरियत कानून द्वारा अनुमति प्राप्त केवल चार करों- खराज, जकात, जजिया और खुम्स को आरोपित किया।
➣ हिंदुओं को जिम्मी की संज्ञा दी। अब ब्राह्मणों को भी जजिया कर देने को बाध्य किया गया। हिंदुओं के अनेक मंदिर नष्ट कर दिए गए, मंदिरों की मरम्मत पर पाबंदी लगा दी गई।
दिल्ली सल्तनत में प्रथम बार फ़िरोज़ तुग़लक़ ने ब्राह्मणों से भी जज़िया कर लिया।
➣ उसने सरकारी पदों (सैनिक तथा असैनिक) को वंशानुगत बनाया तथा अधिकतर सैनिकों को वेतन के बदले जागीरें देने की प्रथा को पुनर्जीवित किया।
➣ नहर प्रणाली के निर्माण के बाद उसने उलेमा की स्वीकृति के पश्चात् शर्व नामक सिंचाई कर भी लगाया, जो भूमि की उपज का 10 प्रतिशत होता था।
➣ तुगलक ने रोजगार दफ्तर खोलकर तथा प्रत्येक मनुष्य के गुण एवं योग्यता की पूरी जांच-पड़ताल के बाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को नियुक्ति देकर उसने बेकारी (बेरोजगरी) की समस्या को हल करने का प्रयास किया।
➣ अनाथ व विधवा मुस्लिम स्त्रियों की सहायता हेतु दीवाने खैरात की स्थापना की। इसके अन्तर्गत ही विवाह विभाग खोला। यह विभाग गरीब मुस्लिम लड़कियों के विवाह में भी मदद करता था।
➣ फिरोज शाह तुंगलक को दासों का बहुत शौक था। उसके दासों की संख्या संभवतः एक लाख अस्सी हजार तक पहुंच गई थी। उनकी देखभाल के लिए एक पृथक विभाग (दीवान-ए-बंदगान) का गठन किया गया था।
➣ फिरोजशाह तुगलक ने राज्य की आय में वृद्धि के लिये नई नीति बनाई। उसने लगभग 1200 फलों के बाग लगवाए, जिससे राज्य को 1,80,000 टंका प्रतिवर्ष अतिरिक्त आय प्राप्त हुई।
➣ राजपरिवार के उपयोग में आने वाली आवश्यक वस्तुओं तथा विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन के लिये 36 शाही कारखानों की स्थापना करवाई, जो राज्य के द्वारा संचालित होते थे।
➣ ख्वाजा हिसामुद्दीन जुनैदी के अनुसार फिरोज के शासन में वार्षिक आय छ: करोड़ पिच्चासी लाख टंका थी। अफीफ के अनुसार फिरोज ने ही हिसामुद्दीन को साम्राज्य की वार्षिक आय निर्धारित करने का कार्य सौंपा।
➣ फिरोज तुगलक का शासनकाल भारत में नहरों के सबसे बड़े जाल का निर्माण करने के कारण प्रसिद्ध रहा। सिंचाई की सुविधा के लिए उसने पांच बड़ी नहरों का निर्माण कराया।
यमुना नदी से हिसार तक 150 मील लंबी अलूगखनी-नहर
सतलज से घग्घर तक 96 मील लंबी रजबाह नहर ।
सिरमौर से हांसी तक की नहर ।
घग्घर से फिरोजाबाद तक की नहर ।
यमुना से फिरोजाबाद तक की नहर ।
➣ फिरोज तुगलक ने सिंचाई और यात्रियों की सुविधा के लिए 150 कुंए भी खुदवाए। फरिश्ता के अनुसार, फिरोज ने सिंचाई की सुविधा के लिए विभिन्न स्थानों पर 50 बांधों और 30 झीलों अथवा जल को संग्रह करने के लिए तालाबों का निर्माण करवाया।
सिक्के
➣ फिरोज ने चाँदी का शंशगनी नामक सिक्का चलाया। इसका मूल्य 6 जीतल था। 8 जीतल मूल्य का सिक्का हस्तगनी या चिहल कहलाता था। शंसगनी के आधे मूल्य का सिक्का दोगानी कहलाता था।
➣ अफीफ के अनुसार फिरोज ने अद्धा एवं बिख नामक ताँबे के सिक्के भी चलाये। ये जीतल के क्रमशः आधे व चौथाई होते थे।
➣ उसने सिक्कों पर अपने नाम के साथ अपने पुत्र अथवा उत्तराधिकारी फ़तह ख़ाँ का नाम अंकित करवाया।
जजिया कर❑ भारत में पहली बार जजिया कर 712 ई. के युद्ध के पश्चात मुहम्मद बिन कासिम ने लगाया था यह क्षेत्र देवल (सिंध प्रान्त) था। ❑ फ़िरोज़ तुग़लक़ के शासनकाल में पहली बार ब्राह्मणों से भी जज़िया कर वसूला गया। ❑ कश्मीर में जजिया कर सर्वप्रथम जजिया कर सिकंदर शाह द्वारा लगाया गया। जबकि उसके पुत्र जैनुल आबदीन (1420-70 ईo) ने इसे समाप्त कर दिया इसीलिए इसे कश्मीर का अकबर कहा गया है। ❑ गुजरात में जजिया कर सर्वप्रथम अहमदशाह (1411-42ई.) के समय लगाया गया। ❑ दिल्ली का पहला शासक अकबर था जिसने सन 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया था लेकिन 1575 ई. में पुन: लगा दिया था। इसके बाद 1579-80 ई. में पुनः समाप्त कर दिया। ❑ मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने जजिया कर पुन 1679 में लगाया दिया। ❑ 1712ई.में मुग़ल बादशाह जहांदार शाह ने जुल्फिकार खां एंव असद खां के कहने पर जजिया को विधिवत रूप से समाप्त कर दिया। ❑ मुग़ल बादशाह फरुख्शियर ने 1713 ई. में जजिया कर हटा दिया था किन्तु पुन: 1717 ई. में लगा दिया। ❑ अन्तत: मुग़ल मयूर सिहांसन (तख़्त-ए-ताऊत) पर बैठने वाला अंतिम मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह/रौशनअख्तर/ रंगीला (1719-48 ई.) ने जजिया कर को सदा के लिए समाप्त कर दिया था। |
➣ डॉ. आर.सी. मजूमदार ने कहा है कि, फ़िरोज़ इस युग का सबसे धर्मान्ध एवं इस क्षेत्र में सिंकदर लोदी एवं औरंगज़ेब का अप्रगामी था।
सैनिक अभियान
➣ सुल्तान फ़िरोज़ तुग़लक़ ने अपने शासन काल में कोई भी सैनिक अभियान साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं किया और जो भी अभियान उसने किया, वह मात्र साम्राज्य को बचाये रखने के लिए किया।
➣ सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़ तुग़लक़ ने दिल्ली सल्तनत से अलग हुए अपने प्रदेशों को जीतने के अभियान के अन्तर्गत बंगाल एवं सिंध पर आक्रमण किया। बंगाल को जीतने के लिए सुल्तान ने 1353 ई. में आक्रमण किया। उस समय शम्सुद्दीन इलियास शाह वहाँ का शासक था।
➣ सुल्तान फ़िरोज़ अन्ततः क़िले पर अधिकार करने में असफल होकर 1355 ई. में वापस दिल्ली आ गया।
➣ पुनः बंगाल पर अधिकार करने के प्रयास के अन्तर्गत 1359 ई. में फ़िरोज़ तुग़लक़ ने वहाँ के तत्कालीन शासक शम्सुद्दीन के पुत्र सिकन्दर शाह पर आक्रमण किया, किन्तु असफल होकर एक बार फिर वापस आ गया।
➣ द्वितीय अभियान के बाद जौनपुर नगर की स्थापना की गई तथा फतह खां को सुल्तान ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
भारत का प्रथम सुल्तान जिसके सिक्कों पर अपने नाम के साथ फतह खां व खलीफा का नायब नाम भी खुदवाया था।
➣ उसने दक्षिण में स्वतंत्र हुए राज्य विजयनगर, बहमनी एवं मदुरा को पुनः जीतने का कोई प्रयास नहीं किया, जो मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में स्वतंत्र हो गए थे।
➣ 1360 ई. में सुल्तान फ़िरोज़ ने जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण करके वहाँ के शासक भानुदेव तृतीय को परास्त किया।
➣ उलेमा का समर्थन एवं प्रशंसा पाने के उद्देश्य से फिरोज ने पुरी एवं वहां स्थित जगन्नाथ के मंदिर को लूटा व मंदिर की मूर्ति समुद्र में फेंक दी गई।
➣ बाध्य होकर जाजनगर के राजा ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली। जाजनगर के बाद वीरभूमि के हिंदू-राजा और अनेक सामंतों को पराजित करता हुआ, दिल्ली लौट गया।
➣ 1365 ई. में फिरोजशाह ने कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) का सफल अभियान किया। इस अभियान में ज्वालामुखी मंदिर से. अनेक संस्कृत रचनाएँ पांडुलिपियों के रूप में प्राप्त हुई।
➣ फिरोज का अन्तिम सैन्य अभियान सिन्ध के थट्टा पर 1365-67 ई. में हुआ। लगभग दो वर्षों के अभियान के बावजूद उसे कोई सफलता नहीं मिली।
➣ अफीफ के अनुसार सिन्ध का अभियान सर्वाधिक कुव्यवस्थित सैन्य अभियान था। सिन्ध व गुजरात के विरुद्ध अभियान फिरोज का सबसे लम्बा अभियान भी था।
शिक्षण एंव रचनाएं
➣ शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में सुल्तान फ़िरोज़ ने अनेक मक़बरों एवं मदरसों (लगभग 13) की स्थापना करवायी।
➣ उसने जियाउद्दीन बरनी एवं शम्स-ए-सिराज अफीफ को अपना संरक्षण प्रदान किया। बरनी ने फ़तवा-ए-जहाँदारी एवं तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही की रचना की।
➣ फ़िरोज़ ने अपनी आत्मकथा फुतूहात-ए-फ़िरोज़शाही की रचना की जबकि सीरत-ए-फ़िरोज़शही की रचना किसी अज्ञात विद्धान द्वारा की गई है।
➣ दिल्ली के सुल्तान फिरोज तुगलक ने इस उद्देश्य से एक अनुवाद विमांग की स्थापना की थी कि उससे हिंदू एवं मुस्लिम दोनों संप्रदायों के लोगों में एक-दूसरे के विचारों की समझ बेहतर हो सके।
➣ उसने कुछ संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी करवाया। ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय से लूटे गए 1300 ग्रंथों में से कुछ को फारसी में विद्वान एजुद्दीन द्वारा दलायते-फिरोजशाही नाम से अनुवाद करवाया गया। यह आयुर्वेद से संबंधित ग्रन्थ था।
➣ फिरोजाबाद में फिरोजशाही मदरसे की स्थापना की, जिसमें जलालुद्दीन रूमी प्रधानाचार्य थे। इल्तुतमिश के दिल्ली के मदरसे को फिर शुरू किया।
स्थापत्य कला
➣ सल्तनत काल में सर्वप्रथम फिरोज शाह तुगलक ने ही लोक निर्माण विभाग की स्थापना की थी। कहा जाता है कि फिरोज ने 300 नवीन नगरों का निर्माण कराया।
➣ उसके राज्य का मुख्य वास्तुकार मलिक गाजी शहना था। प्रत्येक भवन की योजना को उसके व्यय अनुमान के साथ दीवान-ए-विजारत के सम्मुख रखा जाता था तभी उस पर धन स्वीकार किया जा सकता था।
➣ फरिश्ता के अनुसार फिरोज ने 40 मस्जिदें, 30 विद्यालय, 20 महल, 100 सराएं, 200 नगर, 100 अस्पताल, 5 मकबरे, 100 सार्वजनिक स्नानगृह, 10 स्तंभ और 150 पुलों का निर्माण कराया था।
➣ उसके द्वारा बसाए नगरों में फतेहाबाद, हिसार, फिरोजपुर, जौनपुर और फिरोजाबाद प्रमुख थे। जौनपुर नगर अपने भाई जौना ख़ाँ (मुहम्मद तुग़लक़) की स्मृति में बसाया गया था।
➣ अपने बंगाल अभियान के दौरान उसने इकदला का नया नाम आजादपुर तथा पंडुआ का नया नाम फिरोजाबाद रखा।
➣ फिरोजशाह तुगलक ने ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उसने दिल्ली में जामा मस्जिद, कुतुबमीनार, शम्सी तालाब, जहाँपनाह तथा निजामुद्दीन औलिया की समाधि का पुनरुद्धार करवाया।
➣ फिरोज काल में निर्मित खान-ए-जहाँ तेलंगानी के मकबरा की तुलना जेरुसलम में निर्मित उमर के मस्जिद से की जाती है। उसने दिल्ली में कोटला फिरोजशाह दुर्ग क निर्माण करवाया।
➣ फिरोज शाह तुगलक द्वारा अशोक के दो स्तंभों को मेरठ एवं टोपरा (अब अम्बाला जिले में) से दिल्ली लाया गया। टोपरा वाले स्तंभ को महल तथा फिरोजाबाद की मस्जिद के निकट पुनः स्थापित कराया गया।
➣ मेरठ वाले स्तंभ को दिल्ली के वर्तमान बाड़ा हिंदू राव अस्पताल के निकट एक टीले कश्के-शिकार या आखेट स्थान के पास पुनः स्थापित कराया गया।
➣ उसने फिरोजाबाद (दिल्ली) में नक्षत्रशाला की स्थापना की एवं समय सूचक उपकरण जलघड़ी (तास धड़ियाल) का विकास किया। उसे सल्तनत का जयसिंह भी कहा जाता है।
अन्य तथ्य
➣ हेनरी इलिएट और एलफिन्सटन ने फ़िरोज़ तुग़लक़ को सल्तनत युग का अकबर कहा है।
➣ अफीफ की तारीखे फिरोजशाही में फिरोज तुगलक के काल का संपूर्ण वर्णन है।
➣ बरनी ने फिरोज को दिल्ली का आदर्श सुल्तान एवं सच्चा मुसलमान कहा है, यद्यपि फिरोज ने बरनी को जेल में भी डाल दिया था।
➣ फिरोज ने वृद्धावस्था पेंशन हेतु दीवान-ए-इश्तिहाक एवं सार्वजनिक निर्माण विभाग शोहरत-ए-आम की स्थापना करवाई।
➣ फिरोज ने अपनी आत्मकथा फारसी में फुतुहात-ए-फिरोजशाही के नाम से लिखी।
➣ फिरोज ने सीमा विस्तार की नीति नहीं अपनाई। सीमा विस्तार के स्थान पर जनकल्याण को आदर्श बनाया।
➣ समकालीन इतिहासकारों द्वारा फिरोज़शाह तुगलक को मध्यकालीन भारत का पहला कल्याणकारी निरंकुश शासक कहा गया।
➣ वह प्रथम सुल्तान था, जिसनें विजयों तथा युद्धों की तुलना में अपनी प्रजा की भौतिक उन्नति को श्रेष्ठ स्थान दिया।
➣ फिरोज ने सर्वप्रथम मुस्लिम स्त्रियों को दिल्ली के बाहर स्थित मजारों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया।
➣ फिरोज तुगलक ने लगान वसूली हेतु ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत की थी।
➣ फिरोज ने कर्मचारियों तथा सैनिकों को सेवा के बदले नकद वेतन न देकर जागीर प्रदान करने की नीति लागू की।
➣ फिरोज ने सैन्य सेवा को वंशानुगत बना दिया। एक व्यक्ति अपनी जगह किसी रिश्तेदार अथवा गुलाम को सैन्य कार्य के लिए भेज सकता था।
➣ प्रशासनिक सुधारों के कारण फिरोजशाह तुगलक को सल्तनत काल का अकबर कहा जाता है।
➣ इक्ता प्रथा की दुबारा शुरुआत फिरोज तुगलक ने की थी।
➣ उसने निर्धन वर्ग के निःशुल्क चिकित्सा हेतु एक खैराती अस्पताल दारूल-शफा की स्थापना की।
➣ इसके अलावा फिरोजशाह तुगलक ने मैरिज ब्यूरो, लोक निर्माण विभाग तथा रोजगार कार्यालय की स्थापना की थी।
➣ फिरोजशाह ने दो नये सिक्के अधा (जीतल का 50%) तथा बिख (जीतल का 25%) चलाये थे।
➣ उसका दरबारी प्रसिद्ध इतिहासकार बरनी था उसने तारीख -ए-फिरोजशाही तथा फतवा-ए-जहाँदारी नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं।
➣ फ़िरोज़शाह तुग़लक़ की सफलताओं का श्रेय उसके प्रधानमंत्री ख़ान-ए-जहाँ मकबूल का दिया जाता है।
➣ फिरोज तुगलक ने दासों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था एंव उन्हें सेना में भर्ती करना प्रारंभ कर दिया।
➣ सुल्तान पहला सल्तनत कालीन शासक था, जिसने राज्य की आमदनी का ब्यौरा तैयार करवाया।
➣ फिरोज पहला सुल्तान था जिसने उलेमा को इतनी अधिक प्रधानता दी थी। उसके काल में उलेमा वर्ग चरमोत्कर्ष पर था।
➣ फिरोज तुगलक के समय सैय्यद मोहम्मद के नेतृत्व में महदवी आन्दोलन शुरू हुआ था, जिसे फिरोज ने कठोरता से दबा दिया।
➣ अफीफ के अनुसार सर्वप्रथम फिरोज के शासनकाल में ही मदिरा विभाग की स्थापना हुई।
➣ सितम्बर 1388 ई. में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद तुगलक वंश का पतन प्रारंभ हो गया क्योंकि उसके बाद के शासक अयोग्य साबित हुए।
ग़यासुद्दीन तुग़लक़ द्वितीय (1388-89 ई0)
➣ ग़यासुद्दीन तुग़लक़ द्वितीय को 1389 ई. में फ़िरोज शाह तुग़लक़ की मृत्यु के बाद दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
➣ फिरोजशाह की मृत्यु के पश्चात गियासुद्दीन तुगलक शाह द्वितीय के नाम से 1388 ई. में गद्दी पर बैठा। तुगलकशाह एक दुर्बल और अयोग्य शासक था। वह फ़िरोज शाह तुग़लक़ के पुत्र फ़तेह ख़ाँ का पुत्र था।
➣ मुहम्मद खां ने पुनः राजसत्ता हथियाने का प्रयास किया, परंतु पराजित होकर भाग खड़ा हुआ। इसी समय जफर खां के पुत्र अबू बक्र ने भी गद्दी हथियाने का प्रयास किया।
➣ उसने अपने सहयोगियों के साथ फरवरी, 1389 ई. में राजमहल पर आक्रमण कर तुगलक शाह की हत्या कर दी एवं स्वयं शासक बन बैठा।
अबू बक्रशाह (1389-90 ई.)
➣ फरवरी, 1389 ई. में अबू बक्र सुल्तान बन बैठा, परंतु वह भी एक वर्ष से अधिक समय तक शासन नहीं कर सका। उसका सारा समय राजनीतिक षड्यंत्रों एवं कुचक्रों को दबाने में व्यतीत हुआ।
➣ मुहम्मद खां (मुहम्मदशाह) की निगाहें अब भी दिल्ली पर लगी हुई थी। उसने अपने-आपको समाना में सुल्तान घोषित कर दिया। उसकी सहायता मुल्तान, समाना, लाहौर, हिसार और हांसी के अक्तादार कर रहे थे। इनके सहयोग से उसने दिल्ली पर आक्रमण की योजना बनाई।
➣ दिल्ली का कोतवाल भी उससे मिल गया। 1390 ई. में अबू बक्र को गद्दी से उतार कर मुहम्मदशाह स्वयं सुल्तान बन बैठा।
नसिरूद्दीन मुहम्मदशाह (1390-1394 ई.)
➣ 1390 ई. में नसिरुद्दीन मुहम्मदशाह सुल्तान बन गया, तथापि उसकी स्थिति उसके पूर्व के सुल्तानों से अच्छी नहीं थी। प्रारंभ में उसने अपनी शक्ति स्थापित करने का प्रयास किया एवं राजनीतिक षड्यंत्रों पर नियंत्रण कायम किया।
➣ उसने जफर खां को भेजकर गुजरात में नियंत्रण स्थापित किया। इटावा एवं दोआब के विद्रोहों का भी दमन किया गया।
➣ उसे अधिक शराब पीने की आदत थी। इसी आदत के कारण जनवरी, 1394 में उसकी मृत्यु हो गई।
अलाउद्दीन सिकंदर शाह-I (1394ई.)
➣ मुहम्मदशाह शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमायूं खां अलाउद्दीन सिकंदर शाह की उपाधि धारण कर 22 जनवरी, 1394 ई. को गद्दी पर बैठा।
➣ उसका अल्पकाल उपद्रवों से भरा रहा। सिकंदरशाह ने केवल 1 माह 16 दिन शासन किया। 7 मार्च, 1394 ई. को उसकी मृत्यु हो गयी।
नसिरूद्दीन नुसरत शाह (1394-1398 ई.)
➣ फतेह खां का पुत्र नसिरूद्दीन नुसरत शाह ने फिरोजाबाद में स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिल्ली पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा तथा अपनी शासन शक्ति पुनर्गठित किया। उसने तातार खां को बजीर नियुक्त किया।
➣ इस प्रकार तुगलक वंश के दो स्वतंत्र शासक बने-
1. नसिरूद्दीन नुसरत शाह – फिरोजाबाद शासक
2. चचेरा भाई नसिरूद्दीन महमूद शाह– दिल्ली शासक
➣ 11 दिसम्बर 1398 ई. में तैमूर लंग का भारत पर आक्रमण करते हुए दिल्ली पहुंचा उस समय दिल्ली का शासक नसिरूद्दीन महमूद शाह था। तैमूर के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को ही नष्ट कर दिया।
➣ तैमूर भारत से वापस जाते समय मुल्तान. लाहौर व दीपालपुर का सूबेदार खिज खां को नियुक्त किया था।
नसिरुद्दीन महमूद शाह (1394-1413 ई.)
➣ सिकन्दर शाह की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई नसिरूद्दीन महमूद शाह तुगलक वंश का अंतिम शासक, मार्च 1394 ई. में बना।
➣ उसके समय में सल्तनत की स्थिति और अधिक बिगड़ गई। लगातार विद्रोह एवं षड्यंत्र होने लगे। महमूदशाह में इन्हें दबाने की क्षमता नहीं थी।
➣ ख्वाजाजहां को मलिक-उस-शर्क (पूर्व का स्वामी) की उपाधि देकर जौनपुर का प्रमुख बना दिया उसने जौनपुर में स्वतंत्र शक राज्य की स्थापना कर ली।
➣ इसी प्रकार बंगाल, ख़ानदेश, गुजरात, मालवा, राजस्थान, बुन्देलखण्ड में स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की गई। दीपालपुर के सुबेदार सारंग खां ने समस्त पश्चिमोत्तर सीमा को भी अपने कब्जे में कर लिया।
➣ यह कथन इसी शासक के लिए प्रचलित था-शहंशाह की सल्तनत दिल्ली से पालम तक फैली हुई है। इसकी मृत्यु फरवरी 1413 ई. में कैथल (हरियाणा) में हुई थी।
➣ कालांतर में खिज्र खां दिल्ली को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लग गया।
तैमूर का आक्रमण-1398
➣ 1398 ई. में मध्य एशिया के दुर्दान्त आक्रमणकारी तैमूर लंग ने भारत पर नासिरूद्दीन महमूद तुगलक के समय दिल्ली पर आक्रमण किया था। तैमूर के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को नष्ट कर दिया।
➣ एक पैर से लंगड़ा होने के कारण उसका नाम तैमूर लंग पड़ा था। तैमूर 15 दिन दिल्ली में रहने के पश्चात वापस चला गया।
➣ तैमूर लंग का प्रमुख उद्देश्य भारत में लूटपाट करना था। उसने दिल्ली , मेरठ, फिरोजाबाद , हरिद्वार में काफी लूटपाट की। जिसमे उसे काफी मात्रा में धन , सोना- चाँदी , हीरे-जवाहरात प्राप्त हुए। वह अपने साथ अनेक कारीगरों को भी अपने साथ ले गया।
➣ भारत पर आक्रमण के दौरान ख्रिज खां ने तैमूर की सहायता की थी। इस प्रकार अपने विजित प्रदेशों का राज्य पाल खिज्र खाँ को नियुक्त किया।
➣ वापस लौटते समय तैमूर ने जीते गये क्षेत्रों लाहौर, मुल्तान, दीपालपुर आदि का प्रशासन खिज्र खाँ को सौंप दिया। इसी खिज्र खाँ ने आगे चलकर दिल्ली में सैयद वंश की स्थापना की थी।
➣ तैमूर के वापस जाने के पश्चात् महमूद तुग़लक़ ने अपने वजीर मल्लू इमबार की सहायता से पुन: दिल्ली सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
➣ कालान्तर में मल्लू इक़बाल मुल्तान के सूबेदार ख़िज़्र ख़ाँ से युद्ध करते हुए मारा गया। मल्लू इक़बाल के मरने के बाद सुल्तान ने दिल्ली की सत्ता एक अफ़ग़ान सरदार दौलत ख़ाँ लोदी को सौंप दी।
➣ इस प्रकार 1413 ई. में सरदारों ने दौलत खां को दिल्ली का सुल्तान चुना। परंतु उसे खिज्र खां ने पराजित कर दिया।
➣ तैमूर के आक्रमण के बाद 1414 ई. में उसने दिल्ली पर अधिकार कर एक नए वंश सैयद वंश की नींव डाली।
➣ भारत में मुग़ल का संस्थापक बाबर इसी तैमूर के वंश का था।
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