शैव धर्म | One-Liner Practice

❑ पूर्व-वैदिक धर्म अर्थात् सिंधु धर्म का महत्वपूर्ण अवयव पशुपति महादेव की पूजा करना था। इस देवता को आदिम-शिव कहकर वर्णित किया गया है और वैदिक धर्म विशेषकर उत्तर-वैदिक धर्म में रुद्र को पशुपति महादेव का वैदिक प्रतिरूप माना गया है।

❑ शैव मत उत्तर-उपनिषद् काल में उस समय सुस्पष्ट तौर पर प्रकट हुआ जब शिव की पहचान आतंकित करने वाले वैदिक देवता रुद्र के साथ की गयी।

❑ शिव का अभिप्राय मंगलमय होना है।

❑ लिंग के रूप में शिव की व्यापक स्तर पर पूजा होती है। यह अभिव्यक्ति तथा जीवन का स्रोत है और जिसके अन्दर स्वाभाविक रूप में विखण्डन एवं मृत्यु के बीज विद्यमान है।

❑ स्त्री का प्रजनन अवयव (योनि) शिव की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और यह उसकी लौकिक ऊर्जा का मानवीय गुण है।

❑ कुछ पुराणों ने सम्पूर्ण सृष्टि की पहचान शिव के साथ उसके पांच रूपों तत्पुरुष, नामदेव, अघोरेश, साधोजात एवं इशान की अवधारणा के माध्यम से की है।

❑ शिव के पाँचों रूपों को पाँच दिशाओं का शासक बताया गया है जिसमें पाताल और आकाश के चार बिंदु शामिल हैं और यह स्थलीय विस्तार की पूर्णता को निश्चित करता है।

❑ शिव के 11 रुद्र अवतार हैं-कपिल, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्त्र, अजपाद, अहिरबुधन्य, शम्भू, चाँद तथा भाव।

❑ शिव के निम्नलिखित अवतार हैं-अर्द्धनारीश्वर, नंदी, शरभ, गृहपति, नीलकंठ, ऋषि दुर्वाशा, महेश, हनुमान, वृषभ, पिप्पलाद, वैजनाथ (वैश्यनाथ), यतिननाथ, कृष्णदर्शन, अवधुवेश्वर, भिछुवरेया (विश्वेश्वर), सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनातनार्टक, साधु, विभु अश्वथमा, किराट, वीरभद्र, भैरव, अल्लमा, खानदोबा।

❑ शैवमत के भावनात्मक पक्ष का प्रचार नायनारों द्वारा किया गया था जबकि उसके सैद्धान्तिक पक्ष को शैव बुद्धिजीवियों (आचार्यों) ने पूर्ण किया। ये आचार्य अगमनत, शुद्ध तथा वीरशैव जैसे शैव आंदोलन के रूपों से संबंधित थे।

❑ शुद्ध शैववादियों ने रामानुज की शिक्षाओं को अपनाया और श्रीकान्त शिवाचार्य उनका महान व्याख्याकार था।

❑ मत्स्यपुराण में लिंग पूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मिलता है।

❑ शिव धर्म के विकास की प्रक्रिया में कुछ संप्रदायों- पशुपति, कापालिक, कालामुख, लिंगायत आदि का विकास हुआ। इसका वर्णन वामन पुराण में मिलता है।

❑ कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे जिसका प्रमुख केन्द्र श्रीशैल नामक स्थान था।

❑ कालामुख संप्रदाय के लोगों को महाव्रतधर कहा जाता है।

❑ लिंगायत को जंगम या वीरशैव संप्रदाय भी कहा जाता है। यह दक्षिण भारत में प्रचलित था। इस संप्रदाय के प्रवर्तक अल्लभ प्रभु और इनके शिष्य बासव थे।

❑ वीरशैववादियों का नेतृत्व बासव द्वारा किया गया।

❑ पाशुपत संप्रदाय के संस्थापक लकुलीश थे जिसको शिव का अवतार माना जाता है। इसके द्वारा रचित मुख्य ग्रंथ पाशुपत सूत्र है।

❑ पाशुपत संप्रदाय का मुख्य संबंध अनुष्ठान एवं अनुशासन से है। इसका अंतिम लक्ष्य शिव के साथ अन्तरविलीन होना है जिससे सभी प्रकार के दुःख एवं परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होना है।

❑ अथर्ववेद में शिव को शर्व, भव, पशुपति तथा भूपति कहा गया है।

❑ नाथ संप्रदाय की स्थापना मत्स्येन्द्र नाथ ने की थी। इसके प्रमुख प्रचारक बाबा गोरखनाथ थे।

❑ कालामुख संप्रदाय के अनुयायियों को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा गया है। इस संप्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल तथा सुरापान करते हैं और साथ ही अपने शरीर पर चिता की भस्म मलते हैं।

❑ दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव एवं चोलों के समय लोकप्रिय रहा।

❑ कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिव एवं नन्दी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।

❑ तमिल शैवमत की शिक्षाओं को प्रथम बार व्यवस्थित करने वाला मेयकान्तर था।

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