सातवाहन साम्राज्य: प्रशासन, संस्कृति और व्यापार का उत्कर्ष

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत सातवाहन साम्राज्य
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सातवाहन वंश (230 BCE – 220 CE) : दक्षिण भारत का उत्कर्ष

📌 ध्यान दें: सातवाहन साम्राज्य की स्थापना से पहले ही हिन्द-यूनानी तथा शक भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर अधिकार कर चुके थे और वहाँ शासन कर रहे थे।

📌 इसके बाद ईसा पूर्व तथा ईस्वी के प्रारम्भिक काल में दो अन्य विदेशी जातियाँ — पह्लव तथा कुषाण — भी भारत की सीमाओं तक पहुँच गई थीं।

📌 उस समय भारत मुख्यतः दो भागों में विभाजित था — उत्तरी एवं दक्षिणी। उत्तरी क्षेत्र में विदेशियों का प्रभाव था, जबकि दक्षिण में ब्राह्मण वंशीय सातवाहन साम्राज्य का प्रभुत्व था।

सातवाहन  साम्राज्य

मगध के पतन बाद भारत का एकमात्र शक्तिशाली साम्राज्य सातवाहन उभरकर सामने आया जिसने भारत में विदेशियों की जड़ें मजबूत नहीं होने दी।

➣ सातवाहन साम्राज्य से प्रसिद्ध राजा गौतमी पुत्र शातकर्णी (106-130 ई.) हुआ जिसने दक्षिण से विदेशियों को उत्तरी सुदूर इलाकों तक खदेड़ दिया।

➣ विदेशी शासकों में केवल कुषाण वंश, सम्राट कनिष्क (78-102 ई.) के नेतृत्व में ही फला-फुला। जिसके शासनकाल में मध्य एशियाई सभ्यता ने भारत में अपने पांव जमाये।

➣ भारत पर सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला सातवाहन वंश पहला राजवंश था। इनका मूल निवास स्थान महाराष्ट्र में प्रतिष्ठान (गोदावरी) था।

➣ वी.एस. सुक्थंकर महोदय वेल्लारी (कर्नाटक) एवं स्मिथ, भण्डारकर, रेप्सन आदि आन्ध्रप्रदेश को सातवाहनों का मूल निवास मानते हैं।

➣ पुराणों में सातवाहन वंश को आन्ध्रजातीय या आन्ध्रभृत्य कहा गया है। सातवाहन वंश के शासकों का दक्षिणाधिपति तथा इनके द्वारा शासित प्रदेश दक्षिणापथ कहा जाता है।

➣ इस वंश की स्थापना सिमुक ने की थी। इस वंश के इतिहास के लिए मत्स्य पुराण तथा वायु पुराण विशेष रूप से उपयोगी हैं।

➣ सातवाहन वंश की राजधानी प्रतिष्ठान/पैठान थी तथा इसकी राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी एंव चैत्य राजचिह्न था।

➣ सातवाहनों की प्रारम्भिक राजधानी धान्यकटक (अमरावती) थी। शातकर्णी प्रथम ने सर्वप्रथम गोदावरी नदी के किनारे प्रतिष्ठान/पैठन को राजधानी बनाया।

सिमुक (60–37 ई.पू.): सातवाहन वंश का संस्थापक

➣ पुराणों के अनुसार सिमुक ने कण्व वंश के अन्तिम राजा सुशर्मन को युद्ध में मार कर मगध पर अपना अधिकार स्थापित किया था।

➣ पुराणों में सिमुक या सिन्धुक को आन्ध्रजातीय कहा गया है। इसीलिए इस वंश को आन्ध्र-सातवाहन की संज्ञा दी जाती है।

हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के अनुसार कलिंग शासक खारवेल सातवाहन वंश के सातकर्णि का समकालीन था।

➣ जैन गाथाओं के अनुसार सिमुक ने अनेक बौद्ध और जैन मन्दिरों का निर्माण कराया था।

➣ सिमुक के बाद उसका भाई कृष्ण या कन्ह न राज्य संभाला। सिमुक का पुत्र सातकर्णि था, जो अल्पवस्यक था। इसी कारण सिमुक की मृत्यु के बाद उसका भाई कृष्ण राजगद्दी पर बैठा।

कृष्ण (37–27 ई.पू.): सातवाहन साम्राज्य का विस्तार

➣ सिमुक के बाद उसका भाई कृष्ण राजा बना। जिसकी जानकारी नासिक अभिलेख से मिलती है। पुराणों के अनुसार उसने 18 वर्ष तक राज्य किया।

➣ कृष्ण ने भी अपने भाई के समान विजय की प्रक्रिया को जारी रखा तथा नासिक तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

शातकर्णी प्रथम (27–17 ई.पू.): दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति का उदय

➣ शातकर्णी प्रथम इस वंश का प्रथम योग्य शासक था। उसकी उपलब्धियों का ज्ञान नायनिका (नागनिका) के नानाघाट अभिलेख (पूना) से होता है।

➣ शातकर्णी प्रथम कृष्ण का पुत्र या भतीजा था जिसकी जानकारी पेरिप्लस आफ दि एरिथिसन सी नामक पुस्तक में मिलती है।

➣ शातकर्णी प्रथम ने दो अश्वमेधएक राजसूय यज्ञ किया। यह शातकर्णी की उपाधि धारण करने वाला प्रथम शासक था।

➣ शातकर्णी प्रथम ने गोदावरी तट पर स्थित प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाई। प्रारम्भिक राजधानी धान्यकटक (अमरावती) थी।

➣ शिलालेखों में उसे दक्षिणापथ और अप्रतिहतचक्र विशेषणों से विभूषित किया गया है। उसने दक्षिणापथपति की उपाधि धारण की।

➣ उसका विवाह अंगीय वंश की राजकुमारीनायनिका या नागरिका के साथ हुआ था, जो एक बड़े महारथी सरदार की दुहिता थी। इस विवाह के कारण सातकर्णि की शक्ति बहुत बढ़ गई।

सांची स्तूप के दक्षिणी तोरण द्वार पर अभिलेख में शातकर्णी प्रथम का उल्लेख है। इस लेख को वशिष्ठपुत्र आनन्द ने खुदवाया था।

➣ शातकर्णी प्रथम की पत्नी नागनिका या नायनिका के नानाघाट अभिलेख से पता चलता है शातकर्णी ने ब्राह्मणों को भूमि का दान किया था।

उल्लेखनीय है नागनिका का नानाघाट अभिलेख भूमि अनुदान का पहला अभिलेखीय साक्ष्य है।

➣ सातकर्णी ने ऐसे कई प्रदेशो को जीतकर अपने अधीन कर लिए जो पहले मगध साम्राज्य के अधीन थे। यह काल मौर्य साम्राज्य के पतन का काल था।

➣ उसका शासन काल केवल 10 वर्ष तक रहा था। अभी उसके पुत्र वयस्क नहीं हुए थे। अतः उसकी मृत्यु के अनन्तर रानी नायनिका ने शासन-सूत्र का संचालन किया।

➣ शातकर्णी प्रथम ने मालवा शैली की गोल मुद्राएं का प्रचलन किया तथा अपनी पत्नी के नाम पर चाँदी की मुद्राओं का प्रचलन किया था। उसके सिक्कों पर श्वसुर अंगीयकुलीन महारथी त्रणकयिरो का नाम भी अंकित है।

➣ सातवाहन का अगला शासक नरेश हाल (20 -24 ई. पू.) था। यदि प्रारम्भिक सातवाहन राजाओं के युद्ध में शातकर्णी प्रथम, तो शान्ति में हाल महानतम था।

➣ हाल एक बड़ा कवि तथा कवियों एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। उसके राजसभा में बृहत्कथा के रचयिता गुणाढ्य पैशाची भाषा में तथा कातन्त्र नामक संस्कृत व्याकरण के लेखक शर्ववर्मन निवास करते थे।

गाथासप्तशती (प्रेमकाव्य) नामक प्राकृत भाषा में उसने (हाल) ने एक मुक्तक काव्य की रचना की थी। जिसमे उसके प्रेम गाथाओं का वर्णन मिलता है।

लीलावे लीलावती नामक ग्रंथ में हाल की सैन्य उपलब्धियों का वर्णन है, इसमें हाल के सेनापति विजयानन्द के श्रीलंका जाने का उल्लेख है। हाल की रानी मलयवती संस्कृत की ज्ञाता थी।

➣ राजा हाल के बाद क्रमशः पत्तलक, पुरिकसेन, स्वाति और स्कंदस्याति सातवाहन साम्राज्य के राजा हुए। इन चारों का शासन काल कुल लगभग 51 वर्ष था।

➣ स्कंदस्याति के बाद महेन्द्र सातकर्णि राजा बना। इसके समय में फिर विदेशियों के आक्रमण भारत में प्रारम्भ हो गए। सातवाहन साम्राज्य का क्षय और कुषाणों का उत्कर्ष का आरम्भ हुआ।

कडफिसेस हिन्दुकुश के उत्तर-पश्चिम में कम्बोज देश में रहता था। भारत के जीते हुए प्रदेश में उसके क्षत्रप राज्य करते थे।

❑ पहली शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक सेंट थॉमस भारत आया था इसी से भारत में ईसाई धर्म की शुरूआत हुई।

गौतमी पुत्र शातकर्णी का शासन काल प्रारम्भ होने कुछ वर्ष पहले ही 78 ई.पू- 102 ई. तक कालांतर में उत्तर-भारत के अन्य राज्य में कुषाण शासक कनिष्क ने शासन किया था।

गौतमीपुत्र शातकर्णी (106–130 ई.): सातवाहन साम्राज्य का महानतम शासक

➣ यह इस वंश का 23वां और सबसे महान शासक था। इसे आगमन निलय (वेदों का आश्रय) भी कहा गया है।

➣ उसकी विजय की जानकारी उसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख से प्राप्त होती है। इस अभिलेख में उसे अद्वितीय ब्राह्मण (एकब्राह्मण) कहा गया है।

नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णी के बारे में उल्लेखित है कि इसके विजयी घोड़ों ने तीन समुद्रों का पानी पिया है जिसकी पताका अपराजेय है।

➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी के नासिक से दो अभिलेख मिले हैं, जो उसके राज्यभिषेक के 18वें एवं 24वें वर्ष के हैं।

➣ गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शक विजय के उपलक्ष में वेणकटक स्वामी की उपाधि धारण की तथा वेणकटक नामक नगर की स्थापना की। इसके अलावा उसने राजाराज तथा विध्यनरेश की भी उपाधि धारण की।

➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी ने क्षहरात वंश के शासक नहपान को परास्त कर उसके द्वारा चलाये गये चाँदी के सिक्कों को पुनः प्रसारित करवाया। इस विजय की पुष्टि जोगलथम्बी मुद्राभाण्ड (नासिक) से होती

नासिक (जोगलथंबी) से चांदी के लगभग 8 हजार सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक तरफ नहपान तथा दूसरी तरफ गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम है।

➣ गौतमीपुत्र को अभिलेखों में एक ब्राह्मण (एक बहमन्), शकों को हराने वाला व क्षत्रियों के दर्प को चूर करने वाला (खतियदपमानमदनस) कहा गया है।

गौतमीपुत्र को चतुर्वर्ण व्यवस्था का रक्षक कहा गया है।

➣ उसने छिन्न-भिन्न होती वर्ण व्यवस्था की रक्षा की तथा वर्णसंकर प्रथा को रोका। इसके बारे में जानकारी गौमतीपुत्र की माँ गौतमी बलश्री की नासिक प्रशस्ति से मिलती है, जिसे पुलुमावी के शासन में उत्कीर्ण करवाया गया था।

➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी ने खखरातवसनिखसेसकरस (अहरात वंश का निर्मूलन करने वाला) की उपाधि धारण की।

➣ गौतमीपुत्र ने नासिक बौद्ध संघ को अजकालकिय तथा कार्ले भिक्षु संघ को करजक नामक ग्राम दान में दिए।

➣ करजक पहले उपावदात (नहपान का दामाद) के अधिकार में था तथा उपावदात ने भी इसे बौद्ध संघ को दान में दिया था। इस प्रकार करजक ग्राम दो बार बौद्ध संघ को दान में दिया गया।

➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी प्रथम सातवाहन शासक था, जिसने सम्पूर्ण दक्षिणापथ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसका साम्राज्य संभवत: उत्तर में मालवा में लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला हुआ था।

➣ गौतमीपुत्र के पुत्र पुलुमावी के उन्नीसवें वर्ष के नासिक गुहालेख से गौतमी पुत्र द्वारा विजित निम्न क्षेत्रों का पता लगता है-

  1. ऋषिक (कृष्णा नदी का तटीय प्रदेश)
  2. मूलक
  3. अस्मक (गोदावरी का तटीय प्रदेश)
  4. सुराष्ट्र
  5. कुकुट (पश्चिमी राजपूताना)
  6. विदर्भ
  7. अपरान्त (उत्तरी कोंकण)
  8. अनूप (नर्मदा घाटी)
  9. अवन्ति (पश्चिमी मालवा)
  10. आकर (पूर्वी मालवा)

शून्यवाद के संस्थापक नागार्जुन गौतमी पुत्र शातकर्णि के समकालीन थे।

माँ के नाम पर राजा के नामकरण की प्रथा गौतमीपुत्र शतकर्णी के शासन काल से हुई थी इसके बाद सभी सातवाहन शासकों ने यह प्रथा अपनाई थी।

➣ पुराणों के अनुसार इसने 56 साल और जैन अनुश्रुति के अनुसार 55 साल तक राज्य किया था।

➣ कहा जाता है कि अपनी स्थिति को सुरक्षित करने के लिए गौतमी पुत्र शातकर्णी ने अपने पुत्र वाशिष्ठी पुत्र पुलमावि का विवाह शक शासक रुद्रदामन की पुत्री से किया था।

वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (130–154 ई.): सातवाहन साम्राज्य की स्थिरता और व्यापार

➣ गौतमी पुत्र के बाद उसका पुत्र वाशिष्ठी पुत्र पुलमावि राजा बना। आन्ध्र प्रदेश पर विजय सम्भवतः पुलमावि ने ही प्राप्त की। अतः उसे प्रथम आन्ध्र सम्राट भी कहा जाता है। इससे पहले की सातवाहन शासक ने आंध्र क्षेत्र को नहीं जीता था।

➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के अभिलेख ही सातवाहन वंश के आंध्रप्रदेश में पाये जाने वाले सबसे प्राचीन अभिलेख हैं।

➣ नासिक अभिलेख में वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी की उपाधि दक्षिणापथेश्वर (आन्ध्र का शासक) थी। पुराणों में इसका नाम पुलोमा मिलता है।

➣ पुलमावि ने अपनी राजधानी आन्ध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले में गोदावरी नदी के किनारे पैठन या प्रतिष्ठान में बनाई।

➣ उसने शक शासक रुद्रदामन को दो बार पराजित किया। उसने रूद्रदामन की पुत्री से विवाह कर अपनी स्थिति मजबूत की। कन्हेरी अभिलेख में भी इसका वर्णन है।

➣ इसके विपरीत रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि रूद्रदामन ने वसिष्ठीपुत्र पुलुमावी को दो बार पराजित किया था।

➣ पुलमावि के विषय में अमरावती से प्राप्त एक लेख से जानकारी मिलती है। इसके समय में ही अमरावती के बौद्ध स्तूप के चारों ओर वेष्टिनी का निर्माण कर स्तूप को संवर्द्धित किया गया।

वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी एकमात्र सातवाहन शासक है, जिसका अमरावती से अभिलेख मिला है।

➣ वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के नासिक से चार अभिलेख मिले हैं (दूसरे, छठे, 19वें एवं 22वें राज्य वर्ष के) एवं कार्ले से 2 अभिलेख मिले हैं।

➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के कुछ सिक्कों पर दो पतवारों वाले जहाज का चित्र बना हुआ है। ये सिक्के कोरोमण्डल तट से मिले हैं। जिससे नौ -सेना शक्ति के विकास के प्रमाण को दर्शाता है।

➣ पुलुमावी के बाद शिवधी शातकर्णी (154-163 ई.) तथा शिवस्वादशातकर्णी (165 174 ई.) राजा हुए।

वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी गौतमीपुत्र शातकर्णी का पुत्र था। इसे पुराणों में पुलोमा कहा गया है।

➣ यह शक महाक्षत्रप रुद्रदामन के समकालीन था।

➣ उसने बौद्ध संघ को अजकलिकाय तथा कार्ले के भिक्षु संघ को कर्जक नामक ग्राम दान दिए।

➣ वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी के समय अमरावती स्तूप का निर्माण हुआ था इससे पता चलता है की उसने महाराज व दक्षिणेश्वर की उपाधि धारण की थी।

➣ इसने अपने शासन काल में आंध्र को जीता था जिसके बाद इसे पहला आंध्र सातवाहक शासक या प्रथम आंध्र सम्राट कहा गया। इससे पहले की सातवाहन शासक ने आंध्र क्षेत्र को नहीं जीता था।

➣ इसके सिक्कों पर दो पतवारों वाली जहाज का चित्र मिलता है जिससे नौ -सेना शक्ति के विकास के प्रमाण को दर्शाता है।

यज्ञश्री शातकर्णी (165–194 ई.): सातवाहन साम्राज्य का अंतिम शक्तिशाली शासक

यज्ञश्री शातकर्णी इस वंश का अन्तिम महत्त्वपूर्ण शासक था। उसने शकों द्वारा जीते गये भू-भाग उत्तर कोंकण और मालवा को पुनः जीत लिया।

➣ उसके सिक्के आन्ध्र, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में पाए गए हैं। इन सिक्कों पर जहाज का चित्र है, जो जलयात्रा और समुद्री व्यापार प्रति उसके प्रेम को दर्शाता है।

➣ यज्ञ श्री सतकर्णी के उत्तराधिकारी सातवाहन साम्राज्य को आगे बनाए रखने में असमर्थ साबित हुए उनका राज्य पूर्वी दक्कन और कन्नड़ प्रदेश तक सीमित था।

इक्ष्वाकु और पल्लव राजवंश राजवंशों ने सातवाहनों को समाप्त कर दिया। सन् 220 तक इस साम्राज्य का अन्त हो गया।

पुलुमावी चतुर्थ इस वंश का अन्तिम शासक था।

प्रशासन, संस्कृति, धर्म और व्यापार का उत्कर्ष

भौतिक संस्कृति के पहलु

➣ कुषाण ने सोने के सिक्के जारी किये थे जबकि सातवाहन शासकों ने सीसे के सिक्के जारी किए, जो दक्कन से प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने पोटिन, ताम्बे और कांसे के पैसे भी जारी किए। पूर्वी दक्कन में

कृष्णा और गोदावरी के बीच का डेल्टाई क्षेत्र चावल का विशाल भण्डार था। यहाँ के लोग कपास का भी उत्पादन करते थे। जिससे उन्नत ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित हुई।

➣ प्लिनी के अनुसार, आन्ध्र राज्य के पास 1,00,000 पैदल सेना, 2000 घुड़सवार और 1000 हाथी थे।

➣ उत्तर के संपर्क, जहाँ विदेशी शासकों का राज था , में आने से, दक्कन के लोगों ने सिक्कों, पकी ईंटों, गोल कुओं, लेखन कला इत्यादि का उपयोग सीखा लिया।

करीमनगर जिले के पेद्दबाँकुर में (ई.पू. 200–सन् 200), आग में पकी हुई ईंटों एवं चपटे, छेद वाले खपड़ों का नियमित उपयोग मिलता है।

पेद्दबाँकुर में दूसरी शताब्दी में निर्मित ईंटों की दीवार वाले 22 कुएँ भी मिले हैं।

➣ इसके अतिरिक्त इन जगहों पर भूमिगत नालियाँ भी मिली हैं, जो गन्दे पानी को गड्ढे तक पहुंचाती थीं। इसी समय महाराष्ट्र में नगर विकसित हुए।

➣ प्लीनी के अनुसार पूर्वी दक्कन एवं आन्ध्र में कई गाँवों के अलावा दीवारों से घिरे 30 शहर थे ।

सामाजिक संरचना

➣ सातवाहन मूल रूप से दक्कनी कबीलाई के ब्राह्मण जाति के लोग थे।

➣ उनके सबसे प्रसिद्ध राजा गौतमीपुत्र सतकर्णी ने अव्यवस्थित हो गई चातुर्वर्ण (चार वर्णों वाली) व्यवस्था को पुनः स्थापित कर विभिन्न सामाजिक वर्गों के सम्मिश्रण को भी रोका।

➣ सातवाहन, ब्राह्मणों को भूमि अनुदान देने वाले पहले शासक थे, हालाँकि बौद्ध भिक्षुओं के लिए भी ऐसे अनुदानों के उदाहरण मिलते हैं।

➣ इस काल में शिल्प और वाणिज्य के बढ़ने से कई व्यापारी और कारीगर अस्तित्व में आए। उन्होंने छोटे-छोटे स्मारक बनवाए।

➣ कारीगरों के बीच, गन्धिकाओं या इत्र निर्माताओं का दाताओं के रूप में बार-बार उल्लेख मिलता है। आधुनिक कुलनाम गाँधी इसी प्राचीन शब्द से लिया गया है।

पारवारिक संरचना

➣ उत्तर भारतीय राजा समान्यत: पितृसत्तात्मक समाज से सम्बन्धित थे। जबकि सातवाहनों में मातृवंशीय सामाजिक संरचना के संकेत मिलते हैं।

➣ लेकिन उत्तराधिकार पिता से पुत्र को ही प्राप्त होता था। इस काल की दो रानियों नागानिका (शातकर्णी प्रथम की रानी) तथा गौतमी बलश्री ने प्रशासन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

माँ के नाम पर राजा के नामकरण की प्रथा थी। गौतमीपुत्र और वशिष्ठिपुत्र जैसे नामों से स्पष्ट है कि उनके समाज में माँ की अधिक महत्ता थी। कभी-कभी राजा और उसकी माँ दोनों के नाम पर अभिलेख जारी किए जाते थे।

➣ गौतमी पुत्र शातकर्णी को आगमन निलय (वेदों का आश्रय) और अद्वितीय ब्राह्मण कहा गया है। उसने छिन्न-भिन्न होती वर्णव्यवस्था को फिर से स्थापित किया।

प्रशासन

➣ सातवाहनों ने अशोक कालीन कई प्रशासनिक इकाइयों को यथावत बनाए रखा। उनके जिलों को भी आहार कहा जाता था, जैसा कि अशोक के समय में था।

➣ मौर्य काल की तरह ही उनके अधिकारी अमात्य और महामात्य कहलाते थे। सेनापति की नियुक्ति प्रान्त के राज्यपाल या शासनाध्यक्ष के रूप में होती थी।

➣ हालांकि उनके प्रशासनिक विभागों को राष्ट्र और उनके उच्च अधिकारियों को महाराष्ट्रिक कहा जाता था।

➣ ग्रामीण इलाकों में प्रशासन का काम-काज, गौल्मिका को सौंपा जाता था। गौल्मिका सेना की एक टुकड़ी का प्रधान होता था, जिसमें नौ रथ, नौ हाथी, पच्चीस घोडे और पैंतालिस पैदल सैनिक होते थे।

कटक और स्कन्दवर सैन्य शिविर एवं बस्तियाँ होते थे। जो राजा के आने पर प्रशासनिक केन्द्रों के रूप में कार्य करती थीं।

➣ गाँव का प्रशासक गौल्मिक (गौलिक) कहलाता था। गौल्मिक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था। हालिक भी ग्राम प्रशासन के अधिकारी थे। इस समय सामन्तों की तीन श्रेणियां थी-

  • राजा (सिक्का ढालने का अधिकार)
  • महाभोज
  • सेनापति

ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त गाव प्रदान करने की प्रथा सातवाहनों ने ही शुरू की थी।

➣ ब्राह्मणों को भूमिदान देने की प्रथा को सातवाहनों ने प्रारम्भ किया। हालांकि उन्होंने अधिकतर भूमिदान बौद्ध भिक्षुओं को दिया।

➣ इस भूमिदान की प्रथा ने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण एवं सामन्तवाद को जन्म दिया, क्योंकि गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में प्रशासनिक अधिकारियों को भी वेतन के बदले कर मुक्त भूमिदान दी जाने लगी।

गौतमी पुत्र शातकर्णी का नासिक लेख प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है, जिसमें भूमिदान के साथ शुल्क मुक्ति एवं अन्य विशेषाधिकारों की चर्चा की गई है।

➣ इस काल में कृषि की उन्नति के साथ व्यापार वाणिज्य की भी प्रगति हुई। राजा कृषकों के उपज का छठा भाग कर के रूप में प्राप्त करता था।

मिलिदफ्हो एवं महावस्तु से व्यवसायों एवं शिल्पियों की विभिन्न श्रेणियों का पता चलता है जिसके प्रधान को श्रेष्ठन कहा जाता था।

सातवाहन कालीन सिक्के

➣ सातवाहनों ने कुषाणों की भांति सोने के सिक्के नहीं चलाए। सोने का प्रयोग बहुमूल्य धातु के रूप में किया जाता था। उनके अधिकांश सिक्के शीशे के हैं।

सर्वप्रथम सीसे की मुद्रा सातवाहनों ने ही चलाई थी।

➣ सातवाहनों की मुद्राओं पर राजशिर, पांच पत्तियों वाला चैत्य वृक्ष, स्वास्तिक का अंकन है। जहाज का अंकन वाले सिक्के सीसे के थे।

शातकर्णी प्रथम ने सर्वप्रथम राजा के नाम से सिक्के जारी किए।

कार्षापण (काहापन) नामक सिक्के का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य नागनिका का नानाघाट अभिलेख है।

➣ भारी मात्रा में मिले सातवाहन एवं रोमन सिक्कों से बढ़ते हुए व्यापार की ओर संकेत मिलता है। सातवाहनों ने पोटीन, ताँबे व काँसे की मुद्रा भी चलाई।

व्यापार

➣ यहाँ कपास का भारी मात्रा में उत्पादन होता था। भड़ौंच इस समय का प्रमुख बन्दरगाह व व्यापारिक केन्द्र था।

➣ इस काल में आतंरिक एवं बाहय दोनों ही व्यापार होते थे। पश्चिमी देशों के साथ-ही-साथ श्रीलंका, जावा, सुमात्रा आदि के साथ जल मार्ग से व्यापार होता था।

➣ सातवाहन काल में व्यापार व्यवसाय में चाँदी एवं ताँबे के सिक्कों का प्रयोग होता था। जिसे कार्षापण कहा जाता था।

➣ शिल्पियों में गान्धिको का नाम दाता के रूप में बारम्बार उल्लिखित है। गान्धिक वे शिल्पी कहलाते थे, जो इत्र आदि बनाते थे।

➣ शिल्प एवं वाणिज्य में हुई उन्नति के फलस्वरूप इस काल में अनेक वणिक और शिल्पी चमक उठे। शिल्पी और वणिक दोनों ने बौद्ध धर्म के निमित्त उदारतापूर्ण दान दिये।

➣ सातवाहन काल में पश्चिमी व दक्षिण भारत में तगर (तेर), पैठान, धान्य कटक, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भड़ौच, सोपारा, अरिकमेडु, कावेरीपट्टनम आदि समृद्ध नगर थे।

महारठी तथा महाभोज बड़े सामन्त होते थे, जिन्हें अपने क्षेत्र में सिक्के उत्कीर्ण कराने का अधिकार था।

➣ पुलुमावी के कार्ले लेख में कारूकर शब्द कारीगरों के लिए आया है।

➣ व्यापारियों एवं शिल्पियों में महायान बौद्ध धर्म प्रचलित था। बाकी समाज वैष्णव एवं शैव धर्म की प्रधानता थी।

सातवाहन साम्राज्य का राज-धर्म

➣ राजपरिवार की महिलाएँ बौद्ध धर्म को प्रश्रय देती थी, जबकि पुरुष वैदिक धर्म को।

➣ हाल की गाथासप्तशती के प्रारंभ में ही शिव की पूजा की गई है तथा इंद्र, कृष्ण, पशुपति एवं गौरी की पूजा का भी इसमें उल्लेख मिलता है।

➣ सातवाहन काल में राजा स्वयं के साथ देवताओं का तादात्म्य स्थापित करने लगे, जैसे- गौतमी पुत्र शातकर्णी ने स्वयं को कृष्ण, बलराम और संकर्षण का रूप स्वीकार किया था।

➣ फिर भी सातवाहन शासकों ने भिक्षुओं को भूमिदान कर बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया। उनके राज्य में, बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का प्रभाव था।

➣ आन्ध्र प्रदेश में नागार्जुनकोण्डा और अमरावती नगर बौद्ध संस्कृति के मुख्य केन्द्र बन गए।

भाषा

➣ सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत और लिपि ब्राह्मी थी। उनके सारे अभिलेख इसी भाषा और लिपि में लिखे गए हैं।

➣ प्राकृत ग्रन्थ गाथासत्तसई या गाथासप्तसती हल नामक सातवाहन राजा द्वारा लिखा गया। इसमें 700 छन्द शामिल थे, सभी प्राकृत में लिखे गए।

वास्तुकला

➣ सातवाहनों की महत्त्वपूर्ण स्थापत्य कला है कार्ले का चैत्य एवं अमरावंती स्तूप कला का विकास।

➣ सातवाहन काल में, पश्चिमोत्तर दक्कन या महाराष्ट्र में ठोस चट्टानों को काट कर कई पवित्र स्थलों और मठों (विहार) का निर्माण हुआ है।

➣ सबसे प्रसिद्ध चैत्य पश्चिमी दक्कन में कार्ले का है। लगभग 40 मीटर लंबाई, 15 मीटर चौड़ाई और 15 मीटर ऊंचाई वाला, यह चैत्य विशाल चट्टान वास्तुकला का सबसे प्रभावशाली नमूना है।

➣ बरसात के मौसम में भिक्षुओं के निवास हेतु, चैत्यों के निकट ही खुदाई कर मठ बनाए जाते थे।

नासिक में तीन विहार पाए गए हैं। यहाँ नहपन और गौतमीपुत्र के अभिलेख मिलते हैं, जो पहली-दूसरी शताब्दी के हैं।

➣ आन्ध्र के कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र में चट्टान काटकर बनाई गई (शिलाखण्डीय) वास्तुकलाएँ भी पाई गई हैं, किन्तु यह क्षेत्र वस्तुत: स्वतन्त्र बौद्ध संरचनाओं, ज्यादातर स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है।

➣ इनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध अमरावती और नागार्जुनकोण्डा के स्तूप हैं। अमरावती स्तूप की शुरुआत ई.पू. 200 के आस-पास हुई, लेकिन दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका निर्माण पूर्ण हुआ।

➣ सातवाहनों के उत्तराधिकारियों, अर्थात् ईक्ष्वाकुओं के संरक्षण में दूसरी-तीसरी शताब्दी में नागार्जुनकोण्डा सबसे अधिक समृद्ध हुआ।

अमरावती मूर्तिकला: बौद्ध शिल्पकला का उत्कर्ष

➣ अमरावती मूर्तिकला एक प्राचीन मूर्तिकला शैली है, जो दक्षिण-पूर्वी भारत में लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.- तीसरी शताब्दी ई. पू. तक सातवाहन वंश के शासनकाल में फलो-फूली।

➣ अमरावती स्तूप का निर्माण 200 ई.पू. में आरम्भ हुआ। इसका पता सर्वप्रथम ‘मैकेन्जी’ ने 1797 ई. में लगाया। यह स्तूप भित्ति-प्रतिमाओ से भरा हुआ है। जो विश्व में कथात्मक मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

➣ इस मूर्तिकला का विकास अमरावती में होने के कारण इसे अमरावती मूर्तिकला शैली कहा गया।

➣ अमरावती दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के पास स्थित है। अमरावती मूर्तिकला स्वदेशी शैली से विकसित हुई है।

➣ इस पर बाह्य संस्कृतियों का प्रभाव नहीं है। यह मूर्तिकला आंध्र प्रदेश के जग्गबयापेट, नागार्जुनकोंडा तथा महाराष्ट्र में तेर के स्तूप के अवशेषों में देखी जा सकती है।

➣ अमरावती मूर्तिकला में ज्यादातर बुद्ध के जीवन की घटनाओं, पूर्वजन्म की कथाओं (जातक कथाओं) का चित्रण है। हाव-भाव तथा सौंदर्य की दृष्टि से इस शैली की मूर्तियां सभी मूर्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

➣ अमरावती में चित्रांकन की दो विधियां हैं और ये दोनों एक ही फलक पर साथ-साथ दिखाई देती हैं। पहली विधि – मूर्त रूप, जिसमें बैठे या खड़े हुए बुद्ध की प्रतिमा दिखाई गयी है। दूसरी विधि-अमूर्त या प्रतीकात्मक रूप है, जिसमें बुद्ध की उपस्थिति का प्रतीक खाली सिंहासन है।

अमरावती स्तूप: सातवाहन काल का बौद्ध स्मारक

➣ अमरावती स्तूप का निर्माण लगभग 200 ई.पू. में प्रारंभ किया गया था, जिसमें कई बार नवीनीकरण तथा विस्तार किया गया।

अमरावती स्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध था, जिसकी वेदिका तथा गुम्बद दोनों ही संगमरमर के बने हुए थे। इसके चारों ओर बुद्ध की प्रतिमाएं बनाई गयी थीं।

➣ अमरावती के विशाल स्तूप में बुद्ध के जीवन की घटनाओं का चित्रण चूना-पत्थर किया गया है।

➣ यह स्तूप बौद्ध काल में बनाए गये विशाल आकार के स्तूपों में से एक था। इसका व्यास लगभग 50 मीटर तथा ऊंचाई 30 मीटर थी, जो अब अधिकांशतः नष्ट हो चुकी है।

➣ इसके कई पत्थर 19वीं सदी में स्थानीय ठेकेदारों द्वारा चूना बनाने के काम में ले लिए गये। बचे हुए अनेक कथात्मक उभरे चित्र फलक तथा सजावटी फलक अब चेन्नई के राजकीय संग्रहालय और लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में हैं।

➣ लंदन में रखे एक चारदीवारी के पत्थर पर बनी इस स्मारक की एक प्रतिकृति में इसके दूसरी सदी के स्वरूप की झलक मिलती है।

➣ इसमें एक अर्द्धवृत्ताकार नीचा स्तूप प्रदर्शित है, जो चारों ओर से सूक्ष्म नक्काशीदार रेलिंग से घिरा हुआ है।

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