राष्ट्रकूट वंश (736–973 ई.) : संक्षिप्त परिचय और इतिहास

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत राष्ट्रकूट वंश (736–973 ई.)
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राष्ट्रकूट वंश (8वीं – 10वीं शताब्दी) : दक्कन की प्रमुख शक्ति

➣ इस समय में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं- पश्चिमी-उत्तर भाग में गुर्जर प्रतिहार एंव पूर्व में मगध के पाल वंश। जबकि दक्षिण में राष्ट्रकूट वंश।

➣ राष्ट्रकूट का विस्तार दक्षिण (चेर व पांडय को छोड़कर, वर्तमान – केरल ) से कन्नौज तक था। राष्ट्रकूटों के अभिलेखों में उनका मूल निवास स्थन लातूर माना गया है।

➣ राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ दन्तिदुर्ग से लगभग 752 -56 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। कालांतर में अमोघवर्ष प्रथम ने राजधानी मान्य खेत स्थान्तरित कर दी। इनकी प्रारम्भिक राजधानी मयूरखण्डी थी।

➣ हालाँकि इससे पहले भी इस वंश के राज्य की सत्ता थी, परन्तु राज्य स्वतंत्र नहीं था। संभवत: वह चालुक्य (बादामी /वातापी) साम्राज्य के सामंत थे।

➣ राष्ट्रकूट शब्द किसी जाति का सूचक न होकर पद का सूचक है। राष्ट्रकूट पहले प्रशासनिक अधिकारी थे। इस शब्द का अर्थ राष्ट्र (प्रान्त) का कूट अर्थात प्रधान है।

प्रारंभिक शासक

➣ राष्ट्रकूट वंश का प्रथम शासक दन्तिवर्मा (650-665-70 ई.) हुआ। उसकी उपलब्धियाँ अज्ञात है। उसके बाद इन्द्रपृच्छकराज (670-690 ई.) तथा गोविन्दराज (690-700 ई.) राजा बने।

➣ इनके कार्यो के विषय में भी कोई जानकारी नहीं है। गोविन्दराज के बाद उसका पुत्र कर्कराज शासक बना।

➣ कर्कराज के तीन पुत्रों के (1. इन्द्र, 2.कृष्ण, 3. नन्न) नाम मिलते है। इनमें इन्द्र शक्तिशाली था।

शासक काल उपलब्धियाँ / कार्य
दन्तिदुर्ग 736–756 ई. • राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की
• चालुक्यों को पराजित कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित की
• मालवा और दक्कन क्षेत्र में शक्ति विस्तार किया
• साम्राज्य की राजनीतिक नींव मजबूत की
कृष्ण प्रथम 756–772 ई. • प्रसिद्ध कैलाश मंदिर (एलोरा) का निर्माण कराया
• दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट शक्ति को सुदृढ़ किया
• कला एवं स्थापत्य को प्रोत्साहन दिया
• साम्राज्य का विस्तार जारी रखा
गोविन्द द्वितीय 773–780 ई. • प्रशासनिक कमजोरियों के कारण प्रभाव सीमित रहा
• साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया
• आंतरिक संघर्षों का सामना किया
ध्रुव धारावर्ष 780–793 ई. • त्रिपक्षीय संघर्ष (पाल-प्रतिहार-राष्ट्रकूट) में विजय प्राप्त की
• उत्तर भारत में कन्नौज तक प्रभाव बढ़ाया
• राष्ट्रकूटों को अखिल भारतीय शक्ति बनाया
• सैन्य शक्ति का विस्तार किया
गोविन्द तृतीय 793–814 ई. • उत्तर भारत तक सफल सैन्य अभियान चलाया
• कन्नौज पर अधिकार कर राजनीतिक श्रेष्ठता स्थापित की
• दक्षिण से उत्तर तक विशाल साम्राज्य का निर्माण
• राष्ट्रकूटों की सर्वोच्च शक्ति का काल
अमोघवर्ष प्रथम 814–878 ई. • सबसे लंबा शासनकाल (लगभग 64 वर्ष)
• जैन धर्म का संरक्षण और प्रचार किया
• कन्नड़ साहित्य को प्रोत्साहन (कविराजमार्ग की परंपरा)
• शांतिप्रिय नीति अपनाई और युद्धों से दूरी रखी
• प्रशासनिक स्थिरता स्थापित की
कृष्ण द्वितीय 878–915 ई. • गुजरात और मालवा में प्रतिहारों से संघर्ष
• साम्राज्य की सीमाएँ बनाए रखने का प्रयास
• राजनीतिक संतुलन बनाए रखा
• व्यापार और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया
इन्द्र तृतीय 915–917 ई. • कन्नौज पर पुनः अधिकार किया
• राष्ट्रकूट शक्ति का पुनरुत्थान किया
• उत्तर भारत में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया
• साम्राज्य को अस्थायी स्थिरता दी
अमोघवर्ष द्वितीय 917–918 ई. • अत्यल्प शासनकाल
• प्रशासनिक प्रभाव सीमित रहा
• आंतरिक अस्थिरता जारी रही
गोविन्द चतुर्थ 918–934 ई. • विद्रोहों और राजनीतिक कमजोरी का सामना किया
• केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई
• साम्राज्य के विघटन की शुरुआत हुई
अमोघवर्ष तृतीय 934–939 ई. • चालुक्यों के बढ़ते दबाव का सामना किया
• साम्राज्य की रक्षा का प्रयास किया
• राष्ट्रकूट शक्ति कमजोर पड़ती गई
कृष्ण तृतीय 939–967 ई. • अंतिम महान राष्ट्रकूट शासक
• चोलों पर विजय प्राप्त की
• दक्षिण भारत में साम्राज्य विस्तार किया
• सैन्य शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ाई
खोट्टिग अमोघवर्ष 967–972 ई. • चालुक्य आक्रमणों का सामना किया
• साम्राज्य का तेज़ी से पतन हुआ
• प्रशासनिक कमजोरी स्पष्ट हुई
कर्क द्वितीय 972–973 ई. • अंतिम राष्ट्रकूट शासक
• तैलप द्वितीय (कल्याणी चालुक्य) द्वारा पराजित
• राष्ट्रकूट वंश का अंत हुआ
राष्ट्रकूट वंश

दन्तिदुर्ग प्रथम (750 – 756 ई.) : राष्ट्रकूट वंश की स्थापना

➣ राष्ट्रकूट वंश की स्वतन्त्रता का जन्मदाता दन्तिदुर्ग प्रथम था। वह इन्द्र की भवनागा नामक चालुक्य राजकन्या से उत्पन्न पुत्र था।

➣ उसने वातापी के चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन द्वितीय को एक युद्ध में परास्त कर स्वंय को स्वतंत्र किया था। इस प्रकार राष्ट्रकूट वंश का उदय हुआ।

➣ उसकी उपलब्धियों के विषय में उसके समय के दो लेखों :- दशावतार (742 ई. ) तथा समनगड़ का लेख (753 ई.) से जानकारी प्राप्त करतें है।

दन्तिदुर्ग ने अपने स्वामी की आज्ञा से गुजरात के चालुक्य राजा जनाश्रय पुलकेशिन की ओर से अरबों से युद्ध कर उन्हें पराजित किया।

➣ उसकी इस सफलता से प्रसन्न होकर विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वीबल्लभ तथा खड्वालोक की उपाधियों से सम्मानित किया था।

➣ उसने कांची, कलिंग, कोशल, श्रीशैल, मालवा, लाट एवं टंक पर विजय प्राप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य को विस्तृत बनाया। वह दक्षिणापथपति बन गया था।

काञ्जी की विजय के कारण दक्षिणी भारत का पल्लव राज्य भी उसकी अधीनता में आ गया था। जो प्रदेश वातापी चालुक्यों सम्राटों की अधीनता में थे, प्रायः वे सब अब दन्तिदुर्ग के आधिपत्य में आ गए थे।

➣ उसने उज्जयिनी में हरिण्यगर्भ (महादान) यज्ञ किया था। एंव महाराजधिराज परमेश्वर, परमभट्टारक आदि उपाधियां धारण की।

➣ दन्तिदुर्ग ने 756 ई. के लगभग तक शासन किया। वह निःसन्तान था, अतः उसके बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम शासक बना था।

➣ दन्तिदुर्ग ने ऐलोरा में दशावतार मन्दिर (गुफा संख्या 15) का निर्माण करवाया था।

कृष्ण प्रथम (756 – 773 ई.) : एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण

➣ दन्तिदुर्ग के पश्चात उसका चाचा कृष्ण प्रथम 756 ई. में शासक बना कृष्ण प्रथम भी दन्तिदुर्ग के समान एक साम्राज्यवादी शासक था। राज्यारोहण के पश्चात् सभी दिशाओं में उसने अपने साम्राज्य का विस्तार प्रारम्भ किया।

➣ उसके राजा बनते ही लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात) के शासक कर्क द्वितीय, जो उसका भतीजा ने विद्रोह कर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दिया।

➣ कृष्ण प्रथम ने मैसूर के गंग की राजधानी मान्यपुर एवं लगभग 772 ई. में हैदराबाद को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया।

➣ उसने दक्षिण कोंकण के कुछ भाग को भी जीता था। जिसमे इसके समकालीन प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया।

➣ राष्ट्रकूटों के द्वारा परास्त होने के बाद भी चालुक्यों की शक्ति का पूर्णरूप से अन्त नहीं हुआ था। उन्होंने एक बार फिर अपने उत्कर्ष का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

➣ कृष्णराज (कृष्ण प्रथम) ने बादामी के चालुक्यों के अस्तित्व को पूर्णतः समाप्त कर दिया। यद्दपि इस समय वेंगी के चालुक्य शाखा का उदय हो रहा था।

➣ उसने राहप्प नामे किसी शासक को पराजित कर उसकी पालिध्वज पताका को छीन लिया तथा राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि ग्रहण किया।

➣ उसने राष्ट्रकूट युवराज को न केवल अपने राज्य का एक बड़ा भाग तथा हर्जाना दिया अपितु अपनी कन्या शीलभट्टारिका का विवाह भी गोविन्द के छोटे भाई ध्रुव से कर दिया। इस विजय के फलस्वरूप वेंगी राज्य का अधिकांश भाग राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया गया।

➣ उसने ऐलोरा में सुप्रसिद्ध गुहा मंदिर (कैलाशनाथ मंदिर) का एक ही चट्टान काटकर निर्माण करवाया। ऐलोरा के कैलाश मन्दिर का मुख्य वास्तुकार कोंकण था। यह एक आयताकार प्रांगण के बीच स्थित है तथा द्रविड़ कला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।

772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द द्वितीय राजा बना। वह अयोग्य शासक साबित हुआ।

➣ कृष्ण प्रथम को क्षतप्रजाबाधः और कृतप्रजापालः कहा गया है। कृष्ण प्रथम की उपाधि शुभतुंग थी।

गोविन्द द्वितीय (773 – 780 ई.) : अल्पकालीन शासन

➣ कृष्ण प्रथम के दो पुत्र (1. गोविन्द द्वितीय, 2. ध्रुव) थे। गोविन्द द्वितीय राजा बना। वह अयोग्य शासक साबित हुआ।

➣ उसने अपने छोटे भाई ध्रुव को नासिक का राज्यपाल नियुक्त किया। राज्य की वास्तविक शक्ति उसके भाई ध्रुव के हाथों में थी। कालांतर में अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया।

ध्रुव धारावर्ष (780 – 793 ई.) : पाल एवं प्रतिहारों पर विजय

➣ अपने भाई गोविन्द को पदच्युत करने के उपरांत ध्रुव सिंहासन आरूढ़ हुआ। राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के बाद ध्रुव अपने भाई के सहायको को दंड दिया।

➣ सबसे पहले उसने गङ्गवाडि पर आक्रमण किया। इस समय यहां पर गङ्गवंश का राजा शिवमार द्वितीय शासन कर रहा था। वह पराजित हुआ। ध्रुव ने उसके सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रकूट साम्राज्य में मिला लिया तथा अपने पुत्र स्तम्भ को वहां का शासक नियुक्त कर दिया।

➣ इसके बाद उसने वेंगी के चालुक्य नरेश विष्णु वर्धन, पल्लव नरेश दंति वर्मन एवं मैसूर के गंगो को पराजित किया तथा उन्हें फिर राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया। इससे राष्ट्रकूट राज्य की दक्षिणी सीमा कावेरी तक जा पहुँची।

➣ दक्षिण की विजय के बाद वह उत्तर की ओर बढ़ा। सबसे पूर्व भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज के साथ उसका युद्ध हुआ। जिसमे वत्सराज परास्त हुआ।

ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।

➣ अब ध्रुव ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज का राजा इन्द्रायुध था। वह ध्रुव का सामना नहीं कर सका, और राष्ट्रकूट की अधीनता को स्वीकृत करने के लिए विवश हुआ।

➣ कन्नौज के राज्य को अपना वशवर्ती बनाने के उपलक्ष्य में ध्रुव ने गंगा और यमुना को भी अपने राजचिह्न्नों में शामिल कर लिया।

➣ हालाँकि ध्रुव के दक्षिण की ओर वापस लौटते ही पाल नरेश धर्मपाल ने पुन : कन्नौज पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया।

➣ इन विजयों के परिणामस्वरूप ध्रुव सम्पूर्ण दक्षिणापथ का एकछत्र शासक बना। अनेक राज्यों की विजय कर 794 ई. में ध्रुव की मृत्यु हुई।

➣ राजा होने पर ध्रुव ने निरूपम कालिवल्लभ, श्रीवल्लभ तथा धारावर्ष की उपाधियाँ धारण की थी। ध्रुव को धारा वर्ष भी कहा जाता है।

गोविन्द तृतीय (793 – 814 ई.) : राष्ट्रकूट शक्ति का उत्कर्ष

➣ ध्रुव के तीन पुत्र- (1. कर्क, 2. स्तम्भ, 3. गोविन्द, 4. इन्द्र) थे। इनमें से कर्क अपने पिता के जीवन-काल में ही मर गया। सबसे बड़ा होने के कारण स्तम्भ ही राज्य का वैधानिक उत्तराधिकारी था,

➣ किन्तु ध्रुव अपने पुत्र गोविन्द की योग्यता एवं कर्मठता पर मुग्ध था। अतः उसने उसी को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया तथा स्तम्भ को गंगवाडी तथा इन्द्र को गुजरात और मालवा का राज्यपाल नियुक्त कर दिया।

➣ इस प्रकार गोविन्द तृतीय अपने पिता का उत्तराधिकारी बना। कालांतर में स्तम्भ ने अपने भाई के विरुद्ध विद्रोह किया परन्तु वह सफल नहीं हुआ।

➣ अपनी मृत्यु के पूर्व उसने अपने एकमात्र पुत्र अमोघवर्ष को गुजरात के राज्यपाल कम्भ कर्क के संरक्षण में डाल दिया।

➣ गोविन्द तृतीय के शासन काल को राष्ट्रकूट शक्ति का चरमोत्कर्ष काल माना जाता है।

➣ दक्षिण भारत में अपने विशाल राज्य के बाद गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत की ओर रुख़ किया। उसने कन्नौज पर अधिपत्य हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।

➣ इसके समकालीन गुर्जर प्रतिहार वंश का राजा इस समय नागभट्ट द्वितीय था। गोविन्द तृतीय ने उसके साथ युद्ध किया, और उसे परास्त किया।

➣ इस समय कन्नौज के राज सिंहासन पर राजा चक्रायुध आरूढ़ था। उसे पाल राजा धर्मपाल ने अधिपति बनाया था।

चक्रायुध गोविन्द तृतीय के द्वारा परास्त हुआ, और इस में राष्ट्रकूट राजा ने हिमालय तक के प्रदेश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। पाल राजा धर्मपाल भी गोविन्द तृतीय के सम्मुख टिक ना सका।

➣ राष्ट्रकूटों के उत्कर्ष के कारण अब पाल वंश का शासन केवल मगध और बंगाल तक ही सीमित रह गया।

➣ इस समय उसकी अनुपस्थिति में पल्लव, पाण्ड्य, चेर एवं गंग शासकों ने उसके विरुद्ध एक संघ बनाया, पर लगभग 802 ई. में गोविन्द ने इस संघ को पूर्णतः नष्ट कर दिया।

➣ गोविन्द तृतीय ने पाल शासक से मालवा छीनकर अपने एक अधिकारी परमार वंश के उपकेन्द्र को सुपर्द कर दिया।

➣ गोविन्द तृतीय श्रीलंका के राजा व उसके मंत्री को बन्दी बनाकर हालापुर ले आया तथा लंका के इष्टदेव की दो प्रतिमायें मान्यखेत लाकर शिवमन्दिर के सामने विजय स्तम्भों के रूप में प्रतिष्ठित कराई।

अमोघवर्ष प्रथम (814 – 878 ई.) : साहित्य एवं कला का संरक्षण

➣ गोविन्द तृतीय के बाद उसका पुत्र अमोघवर्ष गद्दी पर बैठा। उस समय वह अवयस्क था, अत: गुजरात के वायसराय कर्क ने उसके संरक्षक के रूप में कार्य करना प्रारम्भ किया।

➣ उसने मान्यखेट (हैदराबाद के समीप माल्खेद) नामक एक नया नगर बसाया तथा अपनी राजधानी वही ले गया।

➣ तत्कालीन अरब यात्री सुलेमान ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की थी।

जिनसेन अमोघवर्ष का गुरू था और उसी के प्रभाव में आकार जैन वह अनुयायी बन गया। महावीराचार्य उसे स्यादवाद का अनुयायी बताता है। जैन मतावलम्बी होते हुए भी हिन्दू देवी देवताओं का सम्मान करता था।

➣ अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्त भक्त था। उसके संजन ताम्रपत्र से पता चलता है कि उसने प्रजा को महामारी से बचाने के लिए देवी को अपने बाएं हाथ की उंगली चढ़ा दी थी।

संजन लेख में जैन गुरु जिनसेन उसे साहसांक (चन्द्रगुप्त द्वितीय) से भी महान बताया गया है। उसकी तुलना शिव, दधीचि जैसे पौराणिक व्यक्तियों से की जाती है।

➣ अमोघवर्ष का मंत्री करकराज था। अपने सामन्तों के षड़यंत्रों के कारण कुछ समय के लिए अमोघवर्ष को राजसिंहासन से हाथ धोना पड़ा। पर करकराज की सहायता से उसने राज गद्दी पुनः प्राप्त की।

➣ आंतरिक अव्यवस्था के कारण अमोघवर्ष राष्ट्रकूट साम्राज्य को अक्षुण्ण रख सकने में असमर्थ रहा, और चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों की निर्बलता से लाभ उठाकर एक बार फिर अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्न किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली।

➣ अमोघवर्ष के शासन काल में ही कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार राजा मिहिरभोज ने अपने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, और उत्तरी भारत से राष्ट्रकूटों के शासन का अन्त कर दिया।

➣ उसने जिनसेन आदिपुराण के रचनाकार, महावीरचार्य गणितसार-संग्रह के रचनाकार एवं सक्तायाना के रचनाकार जैसे विद्धानों को आश्रय दिया था।

➣ अमोघवर्ष धार्मिक और विद्याव्यसनी था उसने स्वयं ही कन्नड़ के प्रसिद्ध ग्रंथ कविराज मार्ग और प्रश्नोत्तरमालिका की रचना की। यह ग्रन्थ दण्डिन के काव्यादर्श पर आधारित है।

➣ अमोघवर्ष प्रथम की पुत्री चन्द्रोबलब्बे/चन्द्रवल्लभी ने कुछ समय तक रायचूर दोआब का प्रशासन संभाला। अमोघवर्ष प्रथम की उपाधि नृपतुंग एवं वीरनारायण थी।

➣ अपने अंतिम दिनों में राजकार्य मंत्रियों और युवराज पर छोड़ वह विरक्त रहने लगा था तथा संभवतः उसकी मृत्यु 878 ई. में हुई।

कृष्ण द्वितीय (878 – 915 ई.) : चालुक्य संघर्ष

➣ कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद वह 878 ई. में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

➣ कृष्ण द्वितीय एक कमज़ोर शासक था। उसे प्रतिहार एवं चोल शासकों से परास्त होना पड़ा।

वेंगि और अन्हिलवाड़ा में चालुक्यों के जो दो राजवंश इस समय स्थापित हो गए थे, उन दोनों के साथ ही उसके युद्ध हुए। अब राष्ट्रकूटों में इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वे अपने प्रतिस्पर्धी चालुक्यों को पराभूत कर सकते।

➣ कृष्ण द्वितीय का सुदूर दक्षिण के चोलों के साथ भी संघर्ष हुआ। पहले चोलों के साथ उसने संबंध मधुर थे। उसकी एक पुत्री का विवाह चोल नरेश आदित्य प्रथम के साथ हुआ था तथा इससे कन्नर नाम एक पुत्र था।

आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद 907 ई. में परान्तक चोलवंश का राजा हुआ।

➣ कृष्ण द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र इन्द्र तृतीय राजा बना क्योंकि उसके पुत्र जगत्तुंग की मृत्यु पहले ही हो गयी थी। वह राज्यारोहण सैनिक योग्यता वाला शासक था।

इन्द्र तृतीय (915 – 927 ई.) : राष्ट्रकूट सत्ता का पुनर्स्थापन

➣ यह कृष्ण द्वितीय का पौत्र था। यद्यपि शासन की बागडोर उसके हाथों में सिर्फ़ चार वर्ष तक ही रही थी, किन्तु इतने कम समय में ही इन्द्र तृतीय ने विलक्षण पराक्रम दिखाया।

➣ इन्द्र तृतीय का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था- गुर्जर प्रतिहार राजा महीपाल को परास्त करना।

➣ इन्द्र तृतीय ने पाल वंश के देवपाल प्रथम को परास्त करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

➣ इन्द्र तृतीय ने कन्नौज की शक्ति को जड़ से ही हिला दिया। उसने एक बहुत बड़ी सेना लेकर उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और कन्नौज पर चढ़ाई कर इस प्राचीन नगरी का बुरी तरह से बर्बाद कर दिया।

➣ कन्नौज के प्रतापी सम्राट मिहिरभोज की मृत्यु 890 ई. में हो चुकी थी और उसके बाद निर्भयराज महेन्द्र (890-907 ई.) ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को बहुत कुछ सम्भाले रखा था,

➣ लेकिन महेन्द्र के उत्तराधिकारी महीपाल के समय में कन्नौज की शक्ति घटना प्रारम्भ हो गई थी। वह राष्ट्रकूट इंद्रा तृतीय के सम्मुख असहाय रहा।

➣ उसके समय में ही अल मसूदी अरब से भारत आया था। अल मसूदी ने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।

अन्य उत्तराधिकारी

अमोघवर्ष द्वितीय (917-918 ई.) राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय का पुत्र था। उसके शासन काल की किसी भी घटना के विषय में ज्ञात नही है।

➣ उसकी मृत्यु की परिस्थितियां अज्ञात है। उसके बाद उसका छोटा भाई गोविन्द चतुर्थ 930 ई. में राजा बना।

➣ 918 ई. के लगभग गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.) मान्यखेत के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। यह निर्बल शासक साबित हुआ।

इन्द्र तृतीय ने राष्ट्रकूट की शक्ति का पुनरुद्धार करने में जो सफलता प्राप्त की थी, वह गोविन्द चतुर्थ के निर्बल शासन में नष्ट हो गई।

➣ वेंगि के चालुक्यों ने इस समय शक्तिशाली हुए उनके आक्रमणों के कारण राष्ट्रकूट राज्य की शक्ति बहुत क्षीण हो गई।

➣ इसके पश्चात् अमोघवर्ष तृतीय राष्ट्रकूट वंश का राजा बना। उसके शासन काल में दक्षिण के राष्ट्रकूटों और सुदूर दक्षिण के चोल राजाओं के मध्य शत्रुता आरम्भ हो गयी।

अमोघवर्ष तृतीय (936 – 939 ई.) : अल्पकालीन शासन

➣ उसका वास्तविक नाम पड्डेग था तथा पहले वह त्रिपुरा में निवास करता था। यही से उसने मान्यखेट को प्रस्थान किया तथा मंत्रियों और सामन्तों के सहयोग से 936 ई. में राष्ट्रकूट सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

➣ अमोघवर्ष तृतीय धार्मिक प्रवृति का शासक था और वह शासन कार्य सम्भाला। उसने गंगवाडि के शासक राजमल्ल पर आक्रमण कर उसे पदच्युत किया तथा अपने साले भूतुग को राजा बनाया।

➣ युवराज के काल में ही उसने बुन्देलखण्ड क्षेत्र में भी सैनिक अभियान किया।

कृष्ण तृतीय (939 – 967 ई.) : चोलों पर विजय एवं विस्तार

➣ यह राष्ट्रकूट वंश के सबसे प्रतापी राजाओं में से एक था। उसने एक बार फिर राष्ट्रकूटों के गौरव को स्थापित किया और दक्षिणउत्तर दोनों दिशाओं में अपनी शक्ति का विस्तार किया।

➣ राज्यारोहण के समय उसने अकालवर्ष की उपाधि ग्रहण की। बल्लभनरेन्द्र, पृथ्वीबल्लभ, जैसी अन्य उपाधियाँ भी उसकी मिलती है।

कांची और तंजोर को जीतने के बाद उसने कांचीयुम तंजेयमकोड (कांची तथा तंजोर का विजेता) की भी उपाधि ग्रहण की थी।

सैन्य अभियान

➣ कृष्ण-तृतीय एक कुशल सैनिक तथा सामाज्यवादी शासक था। राजा बनने के बाद कुछ वर्षों तक उसने अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ किया। तत्पश्चात् उसने दिग्विजय की एक व्यापक योजना तैयार की। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम उसने चोलो के विरूद्ध सैनिक अभियान किया।

दक्षिण भारत का अभियान

➣ 943 ई. में उसने अपने साले गंगनरेश भूतुग के साथ चोल शासक परान्तक के ऊपर आक्रमण कर दिया। उसका अभियान सफल रहा तथा कांची और तंजोर के ऊपर उसने अधिकार कर लिया।

➣ कुछ समय बाद परान्तक ने सेना एकत्रित कर राष्ट्रकूटो को चुनौती दी। इस सेना का नेतृत्व युवराज राजादित्य ने किया।

➣ 949 ई. में चोल नरेश परान्तक प्रथम तथा राष्ट्रकूट सेनाओं के बीच उत्तरी अर्काट जिले के तकोलम नामक स्थान पर निर्णायक युद्ध हुआ। इतिहास में यह युद्ध तक्कोलम का युद्ध नाम से प्रसिद्ध है।

➣ राष्ट्रकूट लेखों से पता चलता है कि यह युद्ध बड़ा भयानक था। इसमें पहले तो चालुक्य सैनिक प्रबल रहे किन्तु बाद में अपने सेनापति मणलेर तथा गंगराज भूतुग युद्ध में मारा गया।

➣ कृष्ण तृतीय ने कांचीतंजौर को जीतने के बाद कांचीयुम तंजेयम कोंड की उपाधि धारण की तथा तक्कोलम के युद्ध के बाद उसकी सेनायें रामेश्वरम् तक पहुंच गई एवं रामेश्वरम् में एक विजय स्तम्भ का निर्माण कराया।

➣ तत्पश्चात रामेश्वरम में उसने कृष्णेश्वर तथा गण्डमार्तण्डादित्य के मन्दिर बनवाये जो सुदूर दक्षिण में उसकी विजय के प्रमाण है।

कर्हाद के लेख से पता लगता है। कि उसने चोलों के अतिरिक्त पाण्ड्य केरल तथा लंका के शासकों को भी पराजित किया था।

उत्तर-भारत का अभियान

➣ दक्षिण के युद्धो से निवृत्त होने के बाद कृष्ण ने उत्तर भारत की ओर ध्यान दिया।

➣ 10वी सदी के मध्य बुन्देलखण्ड के चन्दल प्रबल हो उठे तथा उन्होंने कालंजर तथा चित्रकूट के दुर्ग के ऊपर. जो अमोघवर्ष के समय में राष्ट्रकूटों के अधिकार में थे अपना अधिकार कर लिया।

➣ इन दुर्गों को पुनः अपने नियंत्रण में करने के लिये कृष्ण ने उत्तर भारत में सैन्य अभियान किया। इस बार उसका साथ चेदि नरेश मारसिंह ने दिया |

➣ जो भूतुग का उत्तराधिकारी था। कृष्ण का इन दुर्गो पर पुनः अधिकार हो गया। इसके बाद 963 ई में उसने मालवा के परमार शासक सीयक को परास्त कर उज्जयिनी पर अधिकार कर लिया

➣ बाद में ताल द्वितीय राजा बना। अम्म ने एसे मारकर पुन: गद्दी पर अधिकार कर लिया। कृष्ण ने उसके सौतेले भाई दानार्णव का समर्थन किया तथा उसकी सहायता में एक सेना वेंगी भेजी।

➣ 956 ई. इस सेना ने अम्म को पुनः परास्त किया तथा उसने भागकर कलिंग के राजा के यहां शरण ली। दानार्णव को कृष्ण ने वेंगी की गद्दी पर आसीन करवाया किन्तु राष्ट्रकूटों सेना के हटते ही अम्म को मुक्त कर दिया।

➣ इस प्रकार कृष्ण अपने वंश के योग्यतम शासकों में से अन्तिम शासक था। वह सही अर्थों में सम्पूर्ण दक्षिणापथ का सार्वभौम सम्राट था और यह श्रेय उसके किसी भी पूर्ववर्ती राजा ने नहीं प्राप्त किया था। गोविन्द तृतीय ने यद्यपि कांची को जीता था लेकिन

➣ वह रामेश्वरम तक नही पहुच पाया था तथा द्रविड़ राजाओं की शक्ति का विनाश भी उसने नहीं किया था। वेंगी पर उसका पूर्णयता अधिकार नहीं था।

➣ किन्तु कृष्ण ने पल्लव तथा खेल राज्य पर अपना नियंत्रण रखने में सफलता पाई थी। चोल राज्य पर अपना नियंत्रण रखने में सफलता पाई थी। चोल के बड़े भाग पर तो वह स्वंय शासन करता था ।

साहित्यिक उपलब्धियाँ

➣ वह विद्वानों का आश्रयदाता भी था जिसकी राजसभा में कन्नड़ भाषा का कवि पोन्न निवास करता था। उसने शान्तिपुराण की रचना की थी।

➣ उसकी सभा का दूसरा विद्वान पुष्पदन्त था जिसकी रचना ज्वालामालिनीकल्प है । उसने 967 ई. तक शासन किया।

खोट्टिग अमोघवर्ष (967 – 972 ई.) : कमजोर शासन

➣ कृष्ण तृतीय नि:सन्तान था। अत: उसका भाई खोट्टिग उसके बाद राष्ट्रकूट वंश का राजा बना। वह अत्यन्त निर्बल शासक था।

➣ खोट्टिग के समय से राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। उसके उत्तर में स्थित मालवा के परमारों ने राष्ट्रकूटों के क्षेत्रों पर आक्रमण करने शुरू कर दिए थे।

उदयपुर प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि परमार राजा हर्षदेव (सियक द्वितीय) ने खोट्टिग की राज्यलक्ष्मी को युद्ध में बंदी बना लिया था। परमारों के इस आक्रमण के समय खोट्टिग काफ़ी वृद्ध हो चुका था और वह उसका सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सका।

➣ लगभग 972 ई. में परमार सेनाओं ने नर्मदा नदी को पार कर राष्ट्रकूट राजधानी मान्यखेट को लूटा और उस पर अधिकार कर लिया गया।

➣ उसी वर्ष 972 ई. में दु:खी जीवन में ही उसका निधन हो गया।

कर्क द्वितीय (972 – 973 ई.) : राष्ट्रकूट वंश का अंत

➣ खोट्टिग का उत्तराधिकारी उसका भतीजा कर्क द्वितीय हुआ। वह भी एक अयोग्य तथा निर्बल शासक था। अपने दो वर्ष के काल में वह सामंतों के विद्रोह हुए जिसे वह दबाने में असमर्थ रहा।

कर्क द्वितीय राष्ट्र वंश का अन्तिम शासक था। उसके साथ ही दक्षिणापथ से राष्ट्रकूटों का दो सदियों का राज्य तथा शासन समाप्त हुआ।

तर्दवाडि बीजापुर जिला के सामन्त तैल द्वितीय ने उसके ऊपर आक्रमण कर उसे पदच्युत कर दिया तथा सिंहासन पर अधिकार जमा लिया।

975 ई तक तैल उसके अन्य सामंतों तथा सहयोगियों को पूरी तरह समाप्त कर दक्षिणापथ का एकछत्र शासक बन गया। तैल ने जिस वंश की स्थापना की उसे कल्याणी का पश्चिमी चालुक्यवंश कहा जाता है।

जानकारी के स्रोत

➣ राष्ट्रकूट राजवंश का इतिहास मुख्य रूप से उसके शासकों द्वारा खुदवाये गये बहुसंख्यक अभिलेखों तथा दानपत्रों से ज्ञात करते है जो उनके साम्राज्य के विभिन्न भू-भाग से प्राप्त किये गये है।

  • दन्तिदुर्ग के एलौरा तथा सामन्तगढ़ के ताम्रपत्राभिलेख।
  • गोविन्द तृतीय के राधनपुर, वनि दिन्दोरी तथा बड़ौदा के लेख
  • अमोघवर्ष प्रथम का संजन अभिलेख
  • इन्द्र तृतीय का कमलपुर अभिलेख
  • गोविन्द IV के काम्बे तथा संगली के लेख
  • कृष्ण तृतीय के कोल्हापुर, देवली तथा कर्नाटक के लेख

➣ अमोघवर्ष का संजन लेख, गोविन्द चतुर्थ का केम्बे एवं संगली लेख राष्ट्रकूट वंश की जानकारी के प्रमुख अभिलेखीय स्रोत हैं।

➣ उपर्युक्त लेखों में से अधिकांश तिथियुक्त है। इनसे राष्ट्रकूट राजाओं की वंशावली, उनके सैनिक अभियानों, धार्मिक अभिरूचि, शासन-व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है।

➣ राष्ट्रकूट काल में कन्नड़ तथा संस्कृत भाषों में अनेक ग्रंथों का रचना हुई थी। इनमें आदिपुराण, महावीराचार्य का गणितसार संग्रह, अमोघवर्ष का कविराजमार्ग उल्लेखनीय है। इनसे अमोघवर्ष के धार्मिक जीवन के विषय में सूचनायें मिलती है।

अशोक के लेखों में रठिक नामक पदाधिकारियों का उल्लेख है। सातवाहन नानाघाट के लेख में मुहारठी त्रनकयिरों का उल्लेख मिलता है। हाथीगुम्फा लेख से पता चलता है कि खारवेल ने रठिकों को पराजित किया था।

➣ बादामी के चालुक्यों को अपदस्थ करने वाले राष्ट्रकूट मूलतः लट्टलूर (महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में वर्तमान लाटूर) के निवासी थे। लेखों में उन्हें लट्टलूरपुरवराधीश्वर कहा गया है।

➣ यह स्थान पहले कर्नाटक में था। इस कुल के लोग चालुक्यों के राज्य में जिलाधिकारी (राष्ट्रकूट) थे। उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। इस वंश के कुछ पूर्वज बरार में जाकर बस गए और 640 ई. में वहां उन्होंने सामंत पद प्राप्त कर लिया।

साहित्य एवं संस्कृति

अमोघवर्ष प्रथम का गुरु जिनसेन तथा कृष्ण द्वितीय का गुरु गुणभद्र था। श्री विजय और नरसिंह नामक राष्ट्रकूट सेनापति जैन थे।

➣ जैन आचार्य जिनसेन ने हरिवंश तथा पार्वाभ्युदय नामक ग्रन्थ लिखे। आदि पुराण नामक ग्रन्थ की रचना भी जिनसेन ने शुरू की किन्तु इसे पूर्ण इनके शिष्य गुणचन्द्र ने किया।

➣ इन्द्र तृतीय के समय त्रिविक्रम नामक विद्वान ने नल चम्पू लिखा।

➣ कृष्ण तृतीय के शासन काल में हलायुध ने कवि रहस्य लिखा तथा कन्नड़ भाषा के आदि कवि पम्पा ने आदि पुराण की रचना की।

➣ शान्ति पुराण का लेखक पोन्न संस्कृत और कन्नड़ दोनों भाषाओं का कवि था इसी कारण इसे उभय कवि चक्रवर्तिन की उपाधि दी गई है।

➣ राष्ट्रकूट नरेशों अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण द्वितीय, इन्द्र तृतीय और इन्द्र चतुर्थ ने जैन धर्म को राजकीय संरक्षण दिया।

➣ सतलोगी का त्रयी पुरूष मन्दिर उच्च शिक्षा का केन्द्र था। इसका निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया था।

➣ अरब लेखक अबूजैद के अनुसार राष्ट्रकूट राजवंश की महिलाएं चेहरे पर पर्दा नहीं करती थी।”

➣ राष्ट्रकूटों ने अपने राज्य में अरब व्यापारियों को बसने, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिद बनवाने की स्वतंत्रता दी थी।

➣ दक्षिण से उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने वाली दक्षिण की पहली शक्ति राष्ट्रकूट थी।

कन्हेरी बौद्ध विहार को शिक्षा के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के रूप में ख्याति राष्ट्रकूटों के काल में मिली।

➣ राष्ट्रकूट शासन में ग्राम महाजन या ग्राम महत्तर (गांव के बुजुर्ग) गाँव के मुखिया की सहायता करते थे।

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