पूना सार्वजनिक सभा (1870)
➣ पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना 2 अप्रैल 1870 ई. को पूना (वर्तमान पुणे) में महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी (जो सार्वजनिक काका के नाम से प्रसिद्ध थे), एस.एच. चिपलूणकर तथा अन्य समाज सुधारकों एवं शिक्षित बुद्धिजीवियों के सहयोग से की गई थी।
इसके प्रथम अध्यक्ष भवानराव श्रीनिवासराव पंत प्रतिनिधि बने, जो औंध रियासत के शासक थे।
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत में राजनीतिक चेतना का विस्तार हो रहा था। बंगाल में ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन तथा बॉम्बे में बॉम्बे एसोसिएशन जैसी संस्थाएँ कार्यरत थीं, किन्तु पूना में कोई स्थायी एवं प्रभावशाली राजनीतिक संस्था अस्तित्व में नहीं थी।
➣ इससे पूर्व स्थापित डेक्कन एसोसिएशन (1850) तथा पूना एसोसिएशन (1867) अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं। फलस्वरूप पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने एक अधिक स्थायी, प्रतिनिधिक एवं आधुनिक राजनीतिक संस्था की आवश्यकता अनुभव की।
➣ पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना के पीछे एक तात्कालिक कारण पूना के एक स्थानीय मंदिर के प्रबंधन को लेकर उत्पन्न सार्वजनिक विवाद भी था। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता की समस्याओं को सरकार एवं प्रशासन के समक्ष प्रभावी ढंग से रखने के लिए एक संगठित प्रतिनिधि संस्था का होना आवश्यक है।
➣ सभा का उद्देश्य केवल शिक्षित वर्ग का संगठन बनना नहीं था, बल्कि जनता और सरकार के बीच एक प्रतिनिधि संस्था के रूप में कार्य करना था।
➣ विशेष रूप से किसानों, ग्रामीण जनता तथा मध्यम वर्ग की समस्याओं को संगठित रूप से सामने लाना इसकी प्राथमिकताओं में शामिल था। इसी कारण यह संस्था शीघ्र ही कांग्रेस-पूर्व काल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में गिनी जाने लगी।
➣ आगे चलकर बाल गंगाधर तिलक, गोपाल हरि देशमुख, एम.एम. कुंटे, विष्णु एम. भिड़े तथा गोपाल कृष्ण गोखले जैसे अनेक प्रमुख नेता भी इस संस्था से जुड़े। इन नेताओं के कारण पूना सार्वजनिक सभा केवल एक प्रांतीय संगठन न रहकर भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई।
संगठनात्मक स्वरूप एवं उद्देश्य
➣ पूना सार्वजनिक सभा को अपने समय की एक आधुनिक एवं प्रतिनिधिक राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित किया गया था। नेतृत्व मुख्यतः वकीलों, अध्यापकों, पत्रकारों, न्यायिक एवं शिक्षा विभाग से जुड़े शिक्षित मध्यम वर्ग के हाथों में था, किंतु सभा स्वयं को किसानों, ग्रामीण जनता तथा अन्य सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधि मंच मानती थी।
➣ सभा की एक प्रमुख विशेषता इसकी प्रतिनिधित्व-आधारित सदस्यता व्यवस्था थी। सदस्य सीधे मनोनीत नहीं किए जाते थे, बल्कि एक निश्चित संख्या के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों को सभा में स्थान दिया जाता था।
➣ इस व्यवस्था ने इसे उस समय की अन्य राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान किया।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 2 अप्रैल 1870 ई., पूना |
| प्रथम अध्यक्ष | भवानराव श्रीनिवासराव पंत प्रतिनिधि (औंध रियासत) |
| संस्थापक | महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी, एस.एच. चिपलूणकर तथा अन्य सहयोगी |
| प्रारम्भिक सदस्य | 95 सदस्य |
| प्रतिनिधित्व का आधार | लगभग 6,000 व्यक्तियों के समूह में से निर्वाचित प्रतिनिधि |
| सामाजिक संरचना | मुख्यतः वकील, अध्यापक, पत्रकार, न्यायिक एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी तथा शिक्षित मध्यम वर्ग |
| अन्य प्रमुख सदस्य | एम.एम. कुंटे, विष्णु एम. भिड़े, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल हरि देशमुख तथा आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले |
उद्देश्य
- जनता और सरकार के बीच एक प्रतिनिधि संस्था के रूप में कार्य करना।
- किसानों, ग्रामीण जनता तथा मध्यम वर्ग की समस्याओं को संगठित रूप से उठाना।
- भूमि-राजस्व, प्रशासनिक एवं विधायी सुधारों की माँग करना।
- अकाल एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत एवं जनसेवा कार्यों का संचालन करना।
- भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता तथा सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की भावना को प्रोत्साहित करना।
- भारतीयों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित प्रयास करना।
प्रमुख गतिविधियाँ
➣ पूना सार्वजनिक सभा ने अपनी स्थापना के बाद शीघ्र ही किसानों, भूमि-राजस्व, अकाल राहत, प्रशासनिक सुधारों तथा भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उठाना प्रारम्भ किया। सभा ने विशेष रूप से किसानों की आर्थिक कठिनाइयों का अध्ययन कर उनके हितों की रक्षा के लिए विभिन्न प्रतिवेदन तैयार किए।
➣ 1875 ई. में सभा ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स को एक महत्वपूर्ण याचिका भेजी, जिसमें ब्रिटिश संसद में भारत के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की माँग की गई। उस समय किसी भारतीय राजनीतिक संस्था द्वारा प्रतिनिधित्व की यह सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक माँगों में से एक थी।
➣ सभा ने अपनी गतिविधियों को केवल राजनीतिक प्रश्नों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अकाल एवं अन्य प्राकृतिक संकटों के समय राहत कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इसने प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी एकत्रित की तथा राहत व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित किया।
➣ पूना सार्वजनिक सभा ने एक त्रैमासिक पत्रिका का भी प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका में सभा की कार्यवाहियों के अतिरिक्त राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते थे। यह पत्रिका पश्चिमी भारत में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी।
➣ 1877 ई. में दिल्ली दरबार के अवसर पर सभा ने गणेश वासुदेव जोशी को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा।
➣उन्होंने वहाँ हाथ से बुने खादी वस्त्र धारण कर महारानी विक्टोरिया के समक्ष भारतीयों को ब्रिटिश नागरिकों के समान राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार प्रदान करने की माँग वाला एक ऐतिहासिक वक्तव्य प्रस्तुत किया।
उल्लेखनीय है खादी का यह प्रतीकात्मक उपयोगमहात्मा गांधी द्वारा इसे राष्ट्रीय प्रतीक बनाए जाने से कई दशक पहले की घटना है।
पतन एवं योगदान
पतन
➣ 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद देशभर की अनेक प्रांतीय राजनीतिक संस्थाओं की भाँति पूना सार्वजनिक सभा का प्रभाव भी धीरे-धीरे सीमित होने लगा।
➣ राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के उभरने से राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र व्यापक अखिल भारतीय मंच की ओर स्थानांतरित होने लगा।
➣ 1895 ई. तक आते-आते सभा के भीतर उदारवादी तथा उग्रवादी विचारधाराओं के बीच मतभेद स्पष्ट होने लगे।।
➣ बाल गंगाधर तिलक के समर्थकों ने सभा पर प्रभाव स्थापित कर लिया, जबकि महादेव गोविंद रानाडे एवं उनके सहयोगी अपेक्षाकृत पीछे हट गए। इस आंतरिक विभाजन के कारण सभा की एकजुटता एवं प्रभाव दोनों में कमी आई।
योगदान
➣ पूना सार्वजनिक सभा ने भारत में प्रतिनिधिक राजनीति की अवधारणा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अपने समय की उन प्रारम्भिक संस्थाओं में थी, जिसने जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से सार्वजनिक प्रश्नों को संगठित रूप से उठाने का प्रयास किया।
➣ सभा ने विशेष रूप से किसानों, भूमि-राजस्व, अकाल राहत तथा प्रशासनिक सुधारों जैसे विषयों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। इससे जनसामान्य की समस्याएँ पहली बार संगठित रूप से सार्वजनिक चर्चा में आने लगीं।
➣ इस संस्था ने महादेव गोविंद रानाडे, बाल गंगाधर तिलक तथा गोपाल कृष्ण गोखले जैसे अनेक प्रमुख नेताओं को सार्वजनिक जीवन का अनुभव प्रदान किया। आगे चलकर इन नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ अपने लोकतांत्रिक संगठन, जनप्रतिनिधित्व की भावना तथा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी के कारण पूना सार्वजनिक सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की प्रमुख अग्रदूत संस्थाओं में से एक माना जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य एक झलक में
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना तिथि | 2 अप्रैल 1870 ई. |
| स्थान | पूना (वर्तमान पुणे) |
| प्रमुख संस्थापक | महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी, एस.एच. चिपलूणकर तथा अन्य सहयोगी |
| प्रथम अध्यक्ष | भवानराव श्रीनिवासराव पंत प्रतिनिधि (औंध रियासत के शासक) |
| संगठनात्मक स्वरूप | 95 निर्वाचित सदस्य; लगभग 6,000 व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व |
| प्रमुख सदस्य | एम.एम. कुंटे, विष्णु एम. भिड़े, गोपाल हरि देशमुख, बाल गंगाधर तिलक तथा आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले |
| मुख्य गतिविधियाँ | 1875 की हाउस ऑफ कॉमन्स याचिका, अकाल राहत, भूमि-राजस्व प्रश्न, त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन, 1877 दिल्ली दरबार में प्रतिनिधित्व |
| विशेष घटना | 1877 में गणेश वासुदेव जोशी द्वारा खादी वस्त्र पहनकर दिल्ली दरबार में भारतीयों के अधिकारों की माँग प्रस्तुत करना |
| विभाजन | 1895 ई. में उदारवादी एवं उग्रवादी मतभेदों के कारण |
| विशेषता | कांग्रेस-पूर्व काल की सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक संस्थाओं में से एक तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अग्रदूत |
कालक्रम (Timeline)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1850 | डेक्कन एसोसिएशन की स्थापना |
| 1867 | पूना एसोसिएशन की स्थापना (अल्पकालिक) |
| 2 अप्रैल 1870 | पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना |
| 1875 | ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स को भारतीय प्रतिनिधित्व संबंधी याचिका |
| 1877 | दिल्ली दरबार में गणेश वासुदेव जोशी द्वारा खादी धारण कर भारतीय अधिकारों की माँग |
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना; सभा के अनेक सदस्य कांग्रेस से जुड़े |
| 1895 | आंतरिक मतभेदों के कारण सभा का विभाजन |
▪ पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना 2 अप्रैल 1870 को महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी, एस.एच. चिपलूणकर आदि ने की।
▪ प्रथम अध्यक्ष – भवानराव श्रीनिवासराव पंत प्रतिनिधि (औंध रियासत); इन्हें संस्थापकों से भ्रमित न करें।
▪ सभा में प्रारम्भ में 95 निर्वाचित सदस्य थे, जो लगभग 6,000 व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे।
▪ 1875 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स को भारत के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की माँग वाली याचिका भेजी गई।
▪ 1877 के दिल्ली दरबार में गणेश वासुदेव जोशी ने खादी वस्त्र पहनकर भारतीयों को ब्रिटिश नागरिकों के समान अधिकार देने की माँग प्रस्तुत की।
▪ बाल गंगाधर तिलक तथा गोपाल कृष्ण गोखले दोनों इसी संस्था से जुड़े रहे और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेता बने।
▪ 1895 में उदारवादी एवं उग्रवादी मतभेदों के कारण सभा विभाजित हो गई।
▪ पूना सार्वजनिक सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की प्रमुख अग्रदूत संस्थाओं में से एक माना जाता है।
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