परिचय
➣ 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के विस्तार के साथ भारत में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन तीव्र गति से होने लगे।
➣ अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार, आधुनिक प्रेस के विकास, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा पश्चिमी उदारवादी विचारों के प्रभाव से भारतीयों, विशेषकर शिक्षित मध्यम वर्ग में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ।
➣ ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों, प्रशासन में भारतीयों की सीमित भागीदारी, आर्थिक शोषण तथा नागरिक अधिकारों की उपेक्षा के कारण भारतीयों ने अपने हितों की रक्षा के लिए विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का गठन करना प्रारम्भ किया।
➣ इन संस्थाओं का उद्देश्य सरकार के समक्ष भारतीयों की समस्याएँ एवं माँगें संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण माध्यमों से प्रस्तुत करना था।
➣ इन प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक जागरूकता तथा संगठन की भावना को विकसित किया। यद्यपि अधिकांश संस्थाएँ प्रांतीय स्तर तक सीमित थीं, फिर भी इन्होंने देशव्यापी राजनीतिक संगठन की आवश्यकता को स्पष्ट किया और आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 ई.) की स्थापना के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ इसी कारण इन्हें कांग्रेस-पूर्व की राजनीतिक संस्थाएँ अथवा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पूर्ववर्ती संस्थाएँ कहा जाता है।
| संस्था | संस्थापक | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|---|
| बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) | राजा राधाकांत देव | भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था, जिसने शिक्षित भारतीयों एवं ब्रिटिश सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। |
| जमींदार सभा / लैंडहोल्डर्स’ सोसाइटी (1838) | द्वारकानाथ टैगोर एवं प्रसन्न कुमार टैगोर | भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था तथा प्रथम जमींदार राजनीतिक संगठन, जिसने संवैधानिक तरीकों से जमींदारों के हितों एवं प्रशासनिक सुधारों की माँग उठाई। |
| ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839) | विलियम एडम | ब्रिटेन में स्थापित पहली संस्था, जिसने भारतीयों के अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों तथा भारत से संबंधित जनमत निर्माण का कार्य किया। |
| बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843) | जॉर्ज थॉम्पसन | ब्रिटिश शासन में प्रशासनिक सुधार, भारतीय हितों के संरक्षण तथा राजनीतिक जागरूकता के विकास हेतु स्थापित प्रमुख संस्था। |
| ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851) | राजेंद्रलाल मित्र, रामगोपाल घोष आदि (बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी एवं लैंडहोल्डर्स’ सोसाइटी के विलय से) | भारत की प्रथम प्रभावशाली राजनीतिक संस्था, जिसने संगठित संवैधानिक राजनीतिक आंदोलन तथा प्रशासनिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) | गज़ुलु लक्ष्मीनरसु चेट्टी | मद्रास प्रेसीडेंसी (दक्षिण भारत) की प्रथम प्रमुख राजनीतिक संस्था, जिसने दक्षिण भारत में संगठित राजनीतिक चेतना का प्रारम्भ किया। |
| बॉम्बे एसोसिएशन (1852) | जगन्नाथ शंकरशेठ (नौरोजी फुरदूनजी का भी महत्वपूर्ण योगदान) | बॉम्बे प्रेसीडेंसी (पश्चिमी भारत) की प्रथम प्रमुख राजनीतिक संस्था, जिसने पश्चिमी भारत में संवैधानिक राजनीति की नींव रखी। |
| पूना सार्वजनिक सभा (1870) | महादेव गोविंद रानाडे, गणेश वासुदेव जोशी, एस.एच. चिपलूणकर आदि | महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था, जिसने किसानों के प्रश्नों, प्रशासनिक सुधारों तथा जनप्रतिनिधित्व को प्रमुखता से उठाया। |
| इंडियन लीग (1875) | शिशिर कुमार घोष एवं शंभु चरण मुखर्जी | शिक्षित मध्यम वर्ग को संगठित कर राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक शिक्षा एवं राष्ट्रीय एकता का प्रसार करने वाली प्रारम्भिक संस्था। |
| इंडियन एसोसिएशन (1876) | सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एवं आनंदमोहन बोस | कांग्रेस-पूर्व काल की प्रथम अखिल भारतीय एवं सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्था, जिसने भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पृष्ठभूमि तैयार की। |
| मद्रास महाजन सभा (1884) | एम. वीरराघवाचार्य, जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं पी. आनंदचार्लू | दक्षिण भारत की सबसे प्रभावशाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था, जिसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक संगठन एवं विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। |
| बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885) | फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग एवं बदरुद्दीन तैयबजी | पश्चिमी भारत की प्रमुख राजनीतिक संस्था, जिसने कांग्रेस के प्रारम्भिक नेतृत्व एवं राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया। |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) | ए.ओ. ह्यूम | भारत का प्रथम अखिल भारतीय राजनीतिक दल, जिसने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया और स्वतंत्रता संघर्ष का प्रमुख मंच बना। |
कांग्रेस-पूर्व की संस्थाओं की सीमाएँ
➣ यद्यपि इन संस्थाओं ने भारतीयों को संगठित करने तथा राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने का कार्य किया, फिर भी इनके स्वरूप एवं कार्यप्रणाली की कुछ विशेषताएँ आगे चलकर इनकी सीमाएँ भी बन गईं।
➣ यही कारण था कि ये संस्थाएँ व्यापक जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सकीं तथा अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता अनुभव की गई। इनकी प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित थीं-
➣ प्रांतीय स्वरूप : अधिकांश संस्थाएँ किसी एक प्रांत या क्षेत्र तक ही सीमित थीं। इनके बीच समन्वय एवं अखिल भारतीय दृष्टिकोण का अभाव था, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी आंदोलन विकसित नहीं हो सका।
➣ शिक्षित मध्यम वर्ग का प्रभुत्व : इन संस्थाओं का नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग, वकीलों, पत्रकारों, जमींदारों एवं समाज सुधारकों के हाथों में था। सामान्य जनता का नेतृत्व एवं सहभागिता अपेक्षाकृत कम थी।
➣ सीमित सदस्यता एवं जनाधार का अभाव : किसान, मजदूर, महिलाएँ तथा निम्न वर्ग इन संस्थाओं से पर्याप्त रूप से नहीं जुड़ सके। परिणामस्वरूप ये व्यापक जन-समर्थन प्राप्त नहीं कर सकीं।
➣ संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों पर निर्भरता : इन संस्थाओं ने याचिकाओं, ज्ञापनों, प्रस्तावों एवं सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से अपनी माँगें रखीं। इनके पास सरकार पर प्रभावी दबाव बनाने के साधन सीमित थे।
➣ ब्रिटिश शासन के प्रति उदार दृष्टिकोण : अधिकांश संस्थाओं को विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की समस्याओं का समाधान करेगी। इसलिए उन्होंने प्रारम्भिक वर्षों में उग्र राजनीतिक संघर्ष का मार्ग नहीं अपनाया।
➣ मुख्यतः प्रशासनिक सुधारों तक सीमित माँगें : इन संस्थाओं का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार, भारतीयों को सरकारी सेवाओं में अवसर, विधायी परिषदों में प्रतिनिधित्व तथा आर्थिक सुधारों की माँग तक ही सीमित रहा। उस समय पूर्ण स्वशासन अथवा स्वतंत्रता की स्पष्ट माँग नहीं उठाई गई।
➣ संगठनात्मक कमजोरी : इन संस्थाओं के पास सीमित संसाधन, सीमित सदस्य संख्या एवं स्थायी संगठनात्मक ढाँचे का अभाव था, जिसके कारण उनका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहा।
➣ अखिल भारतीय संगठन का अभाव : इन संस्थाओं के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि पूरे देश के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
कांग्रेस-पूर्व की संस्थाओं का योगदान
➣ कांग्रेस-पूर्व की राजनीतिक संस्थाओं ने भारत में आधुनिक राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि इन संस्थाओं का कार्यक्षेत्र सीमित था तथा अधिकांश संस्थाएँ प्रांतीय स्तर पर कार्य करती थीं, फिर भी इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की आधारशिला रखने का कार्य किया।
➣ राजनीतिक चेतना का विकास : इन संस्थाओं ने भारतीयों, विशेषकर शिक्षित मध्यम वर्ग में राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों एवं नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न की।
➣ राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रोत्साहन : विभिन्न प्रांतों में स्थापित इन संस्थाओं ने क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर भारतीयों में राष्ट्रीय एकता एवं सहयोग की भावना को विकसित किया।
➣ संवैधानिक आंदोलन की परंपरा का विकास : इन संस्थाओं ने याचिकाओं, ज्ञापनों, प्रस्तावों तथा सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक ढंग से अपनी माँगें प्रस्तुत करने की परंपरा स्थापित की।
➣ ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध : इन संस्थाओं ने प्रशासनिक भेदभाव, आर्थिक शोषण, भारतीयों के सीमित प्रतिनिधित्व तथा अन्य दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुए सुधारों की माँग की।
➣ भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा : इन संस्थाओं ने भारतीयों के लिए उच्च सरकारी सेवाओं में अवसर, विधायी परिषदों में प्रतिनिधित्व, न्यायिक सुधार तथा प्रशासन में भारतीय भागीदारी की माँग को संगठित रूप से उठाया।
➣ राजनीतिक नेतृत्व का निर्माण : इन संस्थाओं ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविंद रानाडे, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, जी. सुब्रमण्यम अय्यर आदि अनेक नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का अवसर प्रदान किया।
➣ जनमत निर्माण में योगदान : इन संस्थाओं ने सभाओं, भाषणों, समाचार-पत्रों तथा राजनीतिक अभियानों के माध्यम से जनता में राजनीतिक विचारों का प्रसार किया और राष्ट्रीय मुद्दों पर जनमत तैयार किया।
➣ अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता का बोध : विभिन्न प्रांतीय संस्थाओं के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि भारतीयों की समस्याओं के समाधान के लिए एक अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता है, जो पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर सके।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार की : इन संस्थाओं ने राजनीतिक संगठन, नेतृत्व, जनमत एवं राष्ट्रीय चेतना का ऐसा वातावरण तैयार किया, जिसके परिणामस्वरूप 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना संभव हो सकी।
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