मद्रास महाजन सभा (1884 ई.)
➣ मद्रास महाजन सभा की स्थापना 16 मई 1884 ई. को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में एम. वीरराघवाचार्य, जी. सुब्रमण्यम अय्यर तथा पी. आनंदचार्लू द्वारा की गई थी। यह दक्षिण भारत की सबसे प्रभावशाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था मानी जाती है।
➣ महाजन सभा का शाब्दिक अर्थ है “महान लोगों की सभा”। इसका उद्देश्य किसी विशेष वर्ग का प्रतिनिधित्व करना नहीं था, बल्कि मद्रास प्रेसीडेंसी के शिक्षित भारतीयों को एक ऐसे मंच पर संगठित करना था, जहाँ से वे प्रशासनिक सुधारों, राजनीतिक अधिकारों तथा जनहित के प्रश्नों को प्रभावी ढंग से सरकार के समक्ष रख सकें।
➣ इस संस्था की स्थापना की पृष्ठभूमि मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) से जुड़ी थी, जिसकी स्थापना गज़ुलु लक्ष्मीनरसु चेट्टी ने की थी।
➣ यद्यपि इस संस्था ने दक्षिण भारत में राजनीतिक जागरूकता का प्रारम्भिक कार्य किया, किन्तु 1860 के दशक तक यह लगभग निष्क्रिय हो चुकी थी। परिणामस्वरूप मद्रास प्रेसीडेंसी में पुनः एक प्रभावशाली राजनीतिक संगठन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी।
➣ इसी समय लॉर्ड रिपन की अपेक्षाकृत उदार नीतियों, विशेषकर स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन देने की नीति ने शिक्षित भारतीयों को राजनीतिक रूप से संगठित होने के लिए प्रेरित किया।
➣ इसी अनुकूल वातावरण में मद्रास महाजन सभा का गठन हुआ, जिसने शीघ्र ही दक्षिण भारत की प्रमुख राजनीतिक संस्था के रूप में अपनी पहचान बना ली।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना तिथि | 16 मई 1884 ई. |
| स्थान | मद्रास (वर्तमान चेन्नई) |
| संस्थापक | एम. वीरराघवाचार्य, जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं पी. आनंदचार्लू |
| प्रथम अध्यक्ष | स्रोतों में मतभेद — पी. आनंदचार्लू अथवा पी. रंगैया नायडू |
| प्रारम्भिक सचिव | कुछ स्रोतों के अनुसार एम. वीरराघवाचार्य एवं पी. आनंदचार्लू |
| पूर्ववर्ती संस्था | मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) |
| प्रारम्भिक कार्यालय | द हिन्दू समाचार-पत्र का कार्यालय (एलिस रोड जंक्शन, माउंट रोड) |
| सामाजिक आधार | मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग, अधिवक्ता, पत्रकार, सार्वजनिक कार्यकर्ता एवं मद्रास प्रेसीडेंसी के राष्ट्रवादी नेता |
▪ प्रथम अध्यक्ष को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ स्रोत पी. आनंदचार्लू को, जबकि अन्य पी. रंगैया नायडू को प्रथम अध्यक्ष मानते हैं।
▪ मद्रास महाजन सभा ने दक्षिण भारत में वही भूमिका निभाई, जो इंडियन एसोसिएशन ने पूर्वी भारत तथा पूना सार्वजनिक सभा ने पश्चिमी भारत में निभाई।
द हिन्दू समाचार-पत्र और जनमत निर्माण
➣ मद्रास महाजन सभा के प्रारम्भिक विकास में द हिन्दू (The Hindu) समाचार-पत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सभा का प्रारम्भिक कार्यालय भी द हिन्दू के कार्यालय में स्थित था, जिससे संस्था और पत्रकारिता के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ।
➣ सभा के संस्थापक जी. सुब्रमण्यम अय्यर स्वयं द हिन्दू के संस्थापक-संपादकों में से एक थे। उन्होंने समाचार-पत्र को केवल समाचार प्रकाशित करने का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि प्रशासनिक सुधारों, भारतीय प्रतिनिधित्व तथा जनहित से जुड़े प्रश्नों पर शिक्षित भारतीयों का जनमत तैयार करने का प्रभावी मंच बनाया।
➣ द हिन्दू के माध्यम से मद्रास महाजन सभा के प्रस्ताव, विचार तथा राजनीतिक गतिविधियाँ व्यापक जनता तक पहुँचने लगीं।
इससे सभा का प्रभाव केवल मद्रास नगर तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण मद्रास प्रेसीडेंसी में फैल गया और दक्षिण भारत में राजनीतिक जागरूकता के विकास को नई गति मिली।
▪ द हिन्दू समाचार-पत्र की स्थापना 1878 ई. में हुई थी।
▪ इसके प्रमुख संस्थापकों में जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं एम. वीरराघवाचार्य भी शामिल थे।
▪ मद्रास महाजन सभा का प्रारम्भिक कार्यालय द हिन्दू के कार्यालय में ही स्थित था, जिससे दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ।
विचारधारा एवं प्रमुख माँगें
➣ सभा ने संवैधानिक एवं वैधानिक उपायों को अपनाते हुए प्रशासनिक सुधारों की माँग की। इसके नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहते हुए भी भारतीयों को शासन-व्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व तथा उत्तरदायी प्रशासन की दिशा में निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए।
➣ लॉर्ड रिपन द्वारा प्रारम्भ किए गए स्थानीय स्वशासन के सिद्धांत का सभा ने स्वागत किया और इसे भारतीयों को प्रशासनिक अनुभव प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना।
➣ साथ ही यह भी आग्रह किया कि स्थानीय संस्थाओं को केवल औपचारिक अधिकार न देकर वास्तविक प्रशासनिक शक्तियाँ भी प्रदान की जाएँ।
➣ मद्रास महाजन सभा ने केवल प्रांतीय समस्याओं तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उसने बॉम्बे, पूना एवं कलकत्ता की राजनीतिक संस्थाओं के साथ सहयोग स्थापित कर भारतीयों के साझा राजनीतिक हितों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया। यही दृष्टिकोण आगे चलकर अखिल भारतीय राजनीतिक एकता की नींव बना।
प्रमुख माँगें
- विधान परिषदों का विस्तार तथा उनमें भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
- कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक किया जाए, ताकि न्यायिक व्यवस्था अधिक निष्पक्ष बन सके।
- उच्च सरकारी सेवाओं में भारतीयों को समान अवसर एवं अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए।
- स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को अधिक अधिकार देकर प्रशासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- शिक्षा, लोक वित्त तथा अन्य जनहित के विषयों में प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाया जाए।
स्थानीय स्वशासन के समर्थन के कारण यह संस्था लॉर्ड रिपन की उदार नीतियों की प्रमुख समर्थक राजनीतिक संस्थाओं में गिनी जाती है।
सार्वजनिक पहल एवं राष्ट्रीय समन्वय
प्रथम वार्षिक सम्मेलन (1884 ई.)
➣ मद्रास महाजन सभा का प्रथम वार्षिक सम्मेलन 29 दिसंबर 1884 ई. को आयोजित किया गया। इसमें मद्रास प्रेसीडेंसी के विभिन्न भागों, विशेषकर तमिल एवं तेलुगु क्षेत्रों से प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन का उद्देश्य प्रांत की प्रमुख प्रशासनिक एवं राजनीतिक समस्याओं पर संगठित विचार-विमर्श करना था।
➣ सम्मेलन में विधान परिषदों के विस्तार, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के पृथक्करण, भारतीयों को उच्च सरकारी सेवाओं में अधिक अवसर तथा प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाने जैसे विषयों पर प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों ने सभा की संवैधानिक एवं सुधारवादी कार्यशैली को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
➣ इस सम्मेलन ने दक्षिण भारत के शिक्षित भारतीयों को पहली बार एक संगठित राजनीतिक मंच प्रदान किया। आगे चलकर इसी प्रकार के प्रांतीय सम्मेलनों ने अखिल भारतीय राजनीतिक सम्मेलनों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग एवं इंग्लैंड प्रतिनिधिमंडल (1885 ई.)
➣ सितंबर 1885 ई. में मद्रास महाजन सभा ने इंडियन एसोसिएशन (कलकत्ता), पूना सार्वजनिक सभा तथा बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के साथ मिलकर भारतीयों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखने के लिए संयुक्त रूप से एक प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा।
➣ इस प्रतिनिधिमंडल में मद्रास महाजन सभा का प्रतिनिधित्व रामास्वामी मुदालियार ने किया। प्रतिनिधिमंडल ने ब्रिटिश जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों के समक्ष विधान परिषद सुधार, भारतीय प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया।
➣ यह पहली बार था जब भारत की विभिन्न प्रमुख राजनीतिक संस्थाओं ने किसी साझा उद्देश्य के लिए समन्वित रूप से कार्य किया। इस सहयोग ने अखिल भारतीय राजनीतिक एकता की भावना को मजबूत किया तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
संगठनात्मक कार्यप्रणाली
➣ मद्रास महाजन सभा ने अपने कार्यों को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए पाँच स्थायी उप-समितियों का गठन किया। ये समितियाँ शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, लोक वित्त, अर्थशास्त्र तथा लोक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर अध्ययन कर सभा के समक्ष अपनी रिपोर्ट एवं सुझाव प्रस्तुत करती थीं।
➣ इस व्यवस्था के कारण सभा केवल प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था न रहकर विभिन्न जनहित के विषयों पर अध्ययन, चर्चा एवं नीति-निर्माण का एक संगठित मंच बन गई। यही संगठनात्मक विशेषता उसे दक्षिण भारत की अन्य समकालीन संस्थाओं से अलग पहचान प्रदान करती है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विकास में भूमिका
➣ मद्रास महाजन सभा ने दक्षिण भारत में ऐसी राजनीतिक परिस्थितियाँ तैयार कीं, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना एवं उसके प्रारम्भिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ यह संस्था केवल मद्रास प्रेसीडेंसी तक सीमित नहीं रही, बल्कि अन्य प्रांतीय राजनीतिक संगठनों के साथ मिलकर अखिल भारतीय राजनीतिक सहयोग को भी प्रोत्साहित करती रही।
➣ 1885 ई. में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन बॉम्बे में आयोजित हुआ, तब मद्रास महाजन सभा के अनेक नेता उसमें सक्रिय रूप से सम्मिलित हुए।
➣ सभा ने कांग्रेस को दक्षिण भारत में व्यापक समर्थन दिलाने तथा उसके संगठनात्मक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ जी. सुब्रमण्यम अय्यर, पी. आनंदचार्लू, एम. वीरराघवाचार्य तथा सी. विजयराघवाचार्य जैसे नेताओं ने आगे चलकर कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों एवं राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय योगदान दिया। इससे मद्रास महाजन सभा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच घनिष्ठ वैचारिक एवं संगठनात्मक संबंध स्थापित हो गए।
➣ कांग्रेस की स्थापना के बाद भी मद्रास महाजन सभा का महत्व समाप्त नहीं हुआ। यह संस्था दक्षिण भारत में कांग्रेस की नीतियों के प्रचार-प्रसार, नए कार्यकर्ताओं के निर्माण तथा राजनीतिक जागरूकता फैलाने का प्रमुख केंद्र बनी रही। इसी कारण इसे दक्षिण भारत में कांग्रेस का प्रारम्भिक आधार भी कहा जाता है।
➣ उल्लेखनीय है कि यह संस्था अन्य अनेक कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठनों की तरह शीघ्र समाप्त नहीं हुई, बल्कि लंबे समय तक सक्रिय रही। 31 जनवरी 1945 ई. को इसने अपनी हीरक जयंती (Diamond Jubilee) भी मनाई, जो इसकी दीर्घकालीन सक्रियता एवं ऐतिहासिक महत्व का प्रमाण है।
एक झलक में
मुख्य तथ्य
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थापना तिथि | 16 मई 1884 ई. |
| स्थान | मद्रास (वर्तमान चेन्नई) |
| संस्थापक | एम. वीरराघवाचार्य, जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं पी. आनंदचार्लू |
| पूर्ववर्ती संस्था | मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) |
| प्रारम्भिक कार्यालय | द हिन्दू समाचार-पत्र का कार्यालय (एलिस रोड जंक्शन, माउंट रोड) |
| प्रथम वार्षिक सम्मेलन | 29 दिसंबर 1884 ई. |
| संगठनात्मक विशेषता | शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, लोक वित्त, अर्थशास्त्र एवं लोक स्वास्थ्य हेतु पाँच स्थायी उप-समितियाँ |
| राष्ट्रीय सहयोग | 1885 ई. में पूना सार्वजनिक सभा, बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन एवं इंडियन एसोसिएशन के साथ संयुक्त प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा |
| विशेषता | दक्षिण भारत की सबसे प्रभावशाली कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संस्था; भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान |
कालक्रम (Timeline)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 16 मई 1884 | मद्रास महाजन सभा की स्थापना |
| 29 दिसंबर 1884 | प्रथम वार्षिक सम्मेलन |
| सितंबर 1885 | अन्य प्रांतीय संस्थाओं के साथ संयुक्त प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा |
| दिसंबर 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सक्रिय भागीदारी |
| 31 जनवरी 1945 | हीरक जयंती (सिल्वर जुबली) का आयोजन |
▪ मद्रास महाजन सभा की स्थापना 16 मई 1884 ई. को मद्रास में एम. वीरराघवाचार्य, जी. सुब्रमण्यम अय्यर एवं पी. आनंदचार्लू द्वारा की गई।
▪ इसकी स्थापना मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852) के निष्क्रिय होने के बाद हुई और यह शीघ्र ही दक्षिण भारत की प्रमुख राजनीतिक संस्था बन गई।
▪ जी. सुब्रमण्यम अय्यर द हिन्दू समाचार-पत्र के संस्थापक-संपादकों में से एक थे तथा सभा का प्रारम्भिक कार्यालय भी इसी समाचार-पत्र के कार्यालय में स्थित था।
▪ प्रथम वार्षिक सम्मेलन 29 दिसंबर 1884 को आयोजित हुआ, जिसमें विधान परिषद सुधार एवं कार्यपालिका-न्यायपालिका पृथक्करण जैसे विषयों पर विचार किया गया।
▪ 1885 ई. में सभा ने इंडियन एसोसिएशन, पूना सार्वजनिक सभा एवं बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के साथ मिलकर संयुक्त प्रतिनिधिमंडल इंग्लैंड भेजा।
▪ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक संगठन एवं दक्षिण भारत में उसके विस्तार में मद्रास महाजन सभा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
▪ प्रथम अध्यक्ष को लेकर स्रोतों में मतभेद है—कुछ स्रोत पी. आनंदचार्लू, जबकि अन्य पी. रंगैया नायडू को प्रथम अध्यक्ष मानते हैं।
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