लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838): स्थापना, उद्देश्य, कार्य एवं महत्व

📚 विषय सूची

परिचय

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी, जिसे प्रारम्भ में जमींदारी संघ कहा जाता था, की स्थापना मार्च 1838 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई थी। स्थापना के कुछ समय बाद इसका नाम बदलकर लैंडहोल्डर्स सोसाइटी रखा गया।

➣ यह भारत की प्रारम्भिक राजनीतिक संस्थाओं में से एक थी और इसने संगठित एवं संवैधानिक राजनीतिक गतिविधियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ अधिकांश इतिहासकार लैंडहोल्डर्स सोसाइटी को भारत की प्रथम संगठित सार्वजनिक राजनीतिक संस्था मानते हैं। यद्यपि बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) को सामान्यतः भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था कहा जाता है, परन्तु लैंडहोल्डर्स सोसाइटी एक औपचारिक सदस्यता, निश्चित संगठनात्मक ढाँचे तथा सार्वजनिक राजनीतिक उद्देश्यों वाली संस्था थी।

इसी कारण अनेक इतिहासकार इसे आधुनिक भारत का पहला संगठित सार्वजनिक राजनीतिक संगठन मानते हैं।

➣ इस संस्था की स्थापना द्वारकानाथ टैगोर के नेतृत्व में बंगाल के प्रमुख जमींदारों, शिक्षित अभिजात वर्ग तथा धनाढ्य भू-स्वामियों द्वारा की गई थी। इसके प्रमुख संस्थापक सदस्यों में द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार ठाकुर, राजा राधाकांत देब, रामकमल सेन तथा भवानी चरण बंद्योपाध्याय प्रमुख थे।

➣ संस्था का मूल उद्देश्य बंगाल के जमींदारों के अधिकारों एवं हितों की रक्षा करना तथा भूमि एवं राजस्व संबंधी समस्याओं को संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण माध्यमों से ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना था। इसके साथ ही यह प्रशासनिक सुधारों तथा जनहित से जुड़े कुछ प्रमुख प्रश्नों को भी उठाती थी।

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की सदस्यता मुख्यतः जमींदार वर्ग तक सीमित थी। इसके अतिरिक्त भारत में रहने वाले ऐसे गैर-सरकारी ब्रिटिश नागरिक, जिनका भूमि अथवा जमींदारी से प्रत्यक्ष संबंध था, उन्हें भी संस्था की सदस्यता प्रदान की जाती थी। इससे स्पष्ट होता है कि यह संस्था केवल भारतीयों तक सीमित न होकर समान आर्थिक हित रखने वाले व्यक्तियों को भी अपने साथ जोड़ना चाहती थी।

➣ यद्यपि यह संस्था किसी व्यापक जन-आंदोलन का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी, फिर भी इसने भारत में संगठित राजनीतिक संगठन, याचिकाओं एवं ज्ञापनों के माध्यम से अधिकारों की माँग तथा संवैधानिक राजनीति की परम्परा को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताओं ने भी इसी प्रकार की कार्यशैली को अपनाया।

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी ने यह सिद्ध किया कि संगठित राजनीतिक संस्था के माध्यम से किसी वर्ग के हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। इसी कारण इसे भारत में संगठित हित-समूह की प्रारम्भिक संस्थाओं में भी गिना जाता है।

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की स्थापना की पृष्ठभूमि

➣ 18वीं शताब्दी के अंत में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू किए गए स्थायी बंदोबस्त (1793) के परिणामस्वरूप बंगाल में एक शक्तिशाली जमींदार वर्ग विकसित हुआ। समय के साथ ब्रिटिश सरकार की भूमि एवं राजस्व संबंधी नीतियों के कारण इस वर्ग के हित प्रभावित होने लगे।

➣ सरकार द्वारा भू-राजस्व संबंधी नियमों में परिवर्तन, लगान-मुक्त भूमि की पुनर्ग्रहण नीति तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण जमींदारों में असंतोष बढ़ने लगा। उन्हें अनुभव हुआ कि यदि वे संगठित होकर अपनी समस्याएँ सरकार के समक्ष प्रस्तुत नहीं करेंगे, तो उनके अधिकारों की रक्षा करना कठिन होगा।

➣ इसी समय बंगाल में अंग्रेजी-शिक्षित भद्रलोक वर्ग का भी उदय हो चुका था। बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) जैसी संस्थाओं ने सार्वजनिक एवं राजनीतिक विषयों पर विचार-विमर्श की परम्परा प्रारम्भ कर दी थी। ऐसे वातावरण में जमींदारों ने अपने हितों की रक्षा के लिए एक पृथक एवं संगठित संस्था बनाने का निर्णय लिया।

➣ परिणामस्वरूप मार्च 1838 ई. में लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की स्थापना हुई। यद्यपि इसका प्रमुख उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा करना था, फिर भी इसने भारतीयों द्वारा संगठित रूप से राजनीतिक अधिकारों की माँग करने की परम्परा को और अधिक व्यवस्थित एवं संस्थागत रूप प्रदान किया।

बंगभाषा प्रकाशिका सभा और लैंडहोल्डर्स सोसाइटी में अंतर

➣ परीक्षा की दृष्टि से बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836) और लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838) के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है। दोनों संस्थाएँ कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठनों में शामिल थीं, किन्तु इनके स्वरूप एवं उद्देश्य अलग-अलग थे।

बंगभाषा प्रकाशिका सभा लैंडहोल्डर्स सोसाइटी
स्थापना – 1836 ई. स्थापना – 1838 ई.
सामान्यतः भारत की प्रथम संगठित राजनीतिक संस्था मानी जाती है। सामान्यतः भारत की प्रथम संगठित सार्वजनिक राजनीतिक संस्था मानी जाती है।
उद्देश्य – राजनीतिक चेतना एवं सार्वजनिक विचार-विमर्श को बढ़ावा देना। उद्देश्य – जमींदारों के अधिकारों एवं भूमि संबंधी हितों की रक्षा करना।
सदस्य – शिक्षित भद्रलोक एवं समाज सुधारक। सदस्य – मुख्यतः जमींदार एवं भू-स्वामी वर्ग।
स्वरूप अपेक्षाकृत व्यापक था। स्वरूप मुख्यतः वर्ग-हित (जमींदार हित) आधारित था।

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी के उद्देश्य

  • बंगाल के जमींदारों एवं भू-स्वामियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना।
  • स्थायी बंदोबस्त की व्यवस्था को सुरक्षित रखना तथा उसे भारत के अन्य भागों में भी लागू करने की माँग करना।
  • भूमि एवं राजस्व संबंधी सरकारी नीतियों, विशेषकर लगान-मुक्त भूमि की पुनर्ग्रहण नीति में सुधार की माँग करना।
  • न्यायपालिका, पुलिस तथा राजस्व प्रशासन में सुधार के लिए ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करना।
  • जमींदारों एवं अन्य भू-स्वामियों की समस्याओं को याचिकाओं, ज्ञापनों एवं प्रार्थना-पत्रों के माध्यम से सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना।
  • प्रशासनिक निर्णयों में अधिक पारदर्शिता तथा न्यायसंगत नीति अपनाने की माँग करना।
  • राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों को अपनाना।

याचिका-राजनीति

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी ने भारत में याचिका-राजनीति को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। संस्था का मानना था कि सरकार की नीतियों का विरोध हिंसात्मक उपायों के बजाय संवैधानिक एवं वैधानिक माध्यमों से किया जाना चाहिए।

➣ इसी उद्देश्य से यह समय-समय पर अपनी माँगों एवं सुझावों से संबंधित ज्ञापन, याचिकाएँ तथा प्रतिवेदन ब्रिटिश अधिकारियों एवं ब्रिटिश संसद तक भेजती थी। इससे भारतीयों के बीच यह विश्वास विकसित हुआ कि संगठित रूप से अपनी बात रखने से प्रशासनिक सुधारों की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।

➣ आगे चलकर बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1843), ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851) तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के प्रारम्भिक नेताओं ने भी इसी संवैधानिक एवं याचिका-आधारित राजनीतिक कार्यशैली को अपनाया। इसलिए लैंडहोल्डर्स सोसाइटी भारतीय संवैधानिक राजनीति के प्रारम्भिक विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।

ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (लंदन) से संबंध

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी ने अपनी माँगों को केवल भारत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें ब्रिटिश संसद तक पहुँचाने का भी प्रयास किया। इसी उद्देश्य से इसने लंदन स्थित ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839) के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए।

➣ संस्था ने प्रसिद्ध ब्रिटिश उदारवादी एवं भारत-समर्थक नेता जॉर्ज थॉम्पसन (George Thompson) को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया। उनका कार्य ब्रिटेन में भारतीय जमींदारों की समस्याओं तथा प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना था।

➣ ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के साथ इस सहयोग ने भारतीय राजनीतिक प्रश्नों को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का मार्ग प्रशस्त किया। आगे चलकर इसी सहयोग ने भारत और ब्रिटेन के उदारवादी वर्ग के बीच राजनीतिक संवाद को भी मजबूत किया।

योगदान

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी ने भारत में संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष की परम्परा को और अधिक संगठित रूप प्रदान किया। इसने यह सिद्ध किया कि संगठित संस्था के माध्यम से सरकार के समक्ष अधिकारों एवं हितों की प्रभावी पैरवी की जा सकती है।

➣ इस संस्था ने भारत में याचिका-आधारित राजनीति (Petition Politics) को लोकप्रिय बनाया। बाद में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताओं ने भी इसी कार्यपद्धति को अपनाया।

➣ यद्यपि इसका उद्देश्य मुख्यतः जमींदारों के हितों की रक्षा करना था, फिर भी इसने भारतीयों में राजनीतिक संगठन, प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सीमाएँ

➣ लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की सदस्यता मुख्यतः जमींदारों एवं धनाढ्य भू-स्वामियों तक सीमित थी। किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता की इसमें प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी, इसलिए यह व्यापक जन-आधारित राजनीतिक संगठन नहीं बन सकी।

➣ संस्था का दृष्टिकोण मुख्यतः वर्ग-हित पर आधारित था। इसका प्रमुख उद्देश्य जमींदारों के अधिकारों की रक्षा करना था, न कि समस्त भारतीय समाज के हितों का प्रतिनिधित्व करना।

➣ संस्था केवल संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों पर निर्भर थी। उसके पास सरकार पर व्यापक जनदबाव बनाने अथवा जन-आंदोलन चलाने जैसी क्षमता नहीं थी।

➣ इसकी अधिकांश गतिविधियाँ बंगाल तक सीमित रहीं। इसलिए यह अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकी।

➣ ब्रिटिश सरकार संस्था की माँगों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं थी। परिणामस्वरूप इसके अनेक ज्ञापनों एवं सुझावों का तत्काल अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा।

पतन के कारण

➣ समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि केवल जमींदारों के हितों तक सीमित रहकर व्यापक राजनीतिक प्रभाव स्थापित नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, भारत में अधिक व्यापक दृष्टिकोण वाली नई राजनीतिक संस्थाओं का उदय होने लगा।

1843 ई. में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना के बाद दोनों संस्थाएँ कई समान राजनीतिक एवं प्रशासनिक विषयों पर कार्य करने लगीं। परिणामस्वरूप दोनों के बीच सहयोग बढ़ा और अंततः उनके विलय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

➣ अंततः 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 31 अक्टूबर) को लैंडहोल्डर्स सोसाइटी तथा बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी का विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की गई। इसके साथ ही लैंडहोल्डर्स सोसाइटी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया, किंतु इसकी संगठनात्मक एवं संवैधानिक कार्यशैली भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण विरासत बन गई।

आगे का विकास

➣ 1843 ई. में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना हुई। दोनों संस्थाओं के उद्देश्य अनेक विषयों पर समान थे और दोनों संवैधानिक माध्यमों से भारतीयों के अधिकारों की रक्षा तथा प्रशासनिक सुधारों की माँग कर रही थीं।

➣ समय के साथ दोनों संस्थाओं के बीच सहयोग बढ़ा और अंततः 29 अक्टूबर 1851 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 31 अक्टूबर) को इनका विलय कर ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की गई। इसके साथ ही लैंडहोल्डर्स सोसाइटी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

➣ इस विलय के साथ कांग्रेस-पूर्व राजनीतिक संगठनों का एक नया चरण प्रारम्भ हुआ। ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ने लैंडहोल्डर्स सोसाइटी की अपेक्षा अधिक व्यापक स्तर पर भारतीयों के राजनीतिक एवं प्रशासनिक हितों का प्रतिनिधित्व किया।

महत्वपूर्ण तथ्य

विषय विवरण
स्थापना मार्च 1838 ई.
स्थान कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता)
प्रारम्भिक नाम जमींदारी संघ (Zamindari Association)
प्रमुख संस्थापक द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार ठाकुर, राजा राधाकांत देब, रामकमल सेन तथा भवानी चरण बंद्योपाध्याय
मुख्य उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा तथा भूमि एवं राजस्व संबंधी सुधारों की माँग
कार्यशैली याचिकाएँ, ज्ञापन एवं संवैधानिक उपाय
ब्रिटिश प्रतिनिधि जॉर्ज थॉम्पसन
विशेषता सामान्यतः भारत की प्रथम संगठित सार्वजनिक राजनीतिक संस्था मानी जाती है।

कालक्रम (Timeline)

वर्ष घटना
1793 स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement)
1836 बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना
1838 लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (जमींदारी संघ) की स्थापना
1839 लंदन में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना
1843 बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना
1851 लैंडहोल्डर्स सोसाइटी एवं बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के विलय से ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन का गठन

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram